नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

तो ऐवरेस्ट मसाले आप बनाते हो!?

पप्पू माउंट ऐवरेस्ट पर गया।
वहां तीन बाबा बैठे थे और तंबाकू रगड़ रहे थे।

पप्पू उनसे बोला: बाबा, यह क्या है?
बाबा बोले: मसाला।
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पप्पू: ओह तेरी! तो ऐवरेस्ट मसाले आप बनाते हो!?

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

तुषार कपूर ने

इंग्लिश टीचर: वावल्स (ए, ई, आई, ओ, यू) की खोज किसने की?
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चिंटू: 'गोलमाल' में तुषार कपूर ने।

रविवार, 13 सितंबर 2009

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का बड़प्पन

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद उन दिनों देश के राष्ट्रपति थे। वह अपने साथ काम करने वाले कर्मचारियों का पूरा-पूरा ख्याल रखते थे। छोटे से छोटे पद पर काम करने वाला कर्मचारी भी उनके स्नेह का पात्र था। उनका एक चपरासी था तुलसी। वह उनकी खूब सेवा करता था। राजेन्द्र बाबू को उससे विशेष लगाव था। लेकिन उनके लाड़-प्यार की वजह से तुलसी थोड़ा लापरवाह हो गया।

राजेन्द्र बाबू के पास उपहार में मिला एक पेन था, जो उन्हें बेहद पसंद था। वह हमेशा उसी से लिखते थे। एक दिन सफाई करते हुए तुलसी से यह पेन टूट गया। राजेन्द्र बाबू को जब पता चला तो उन्हें पहली बार क्रोध आ गया और उन्होंने तुलसी का तबादला अपने दफ्तर में किसी और जगह करने का आदेश दे दिया। तुलसी चला गया। पर उस दिन राजेन्द्र बाबू का मन किसी काम में नहीं लगा। वह लगातार तुलसी के बारे में सोच रहे थे।

उनके मन में तरह-तरह के विचार आने लगे कि बेचारा हमेशा सेवा में लगा रहता था। थोड़ा लापरवाह है तो क्या हुआ, ईमानदार और निष्ठावान तो है ही। आखिरकार उन्होंने तुलसी को अपने पास आने का संदेश भिजवा दिया। तुलसी डरते-डरते हाजिर हुआ और सिर झुकाकर खड़ा हो गया। राजेन्द्र बाबू थोड़ी देर उसे देखते रहे फिर हाथ जोड़कर खड़े हो गए और बोले- तुलसी, मुझे माफ कर दो, मुझसे गलती हो गई है। बेचारा तुलसी शर्म से गड़ा जा रहा था। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। राजेन्द्र बाबू ने दोबारा माफी मांगी। तुलसी बोला- कसूर तो मैंने किया है और माफी आप मांग रहे हैं। वह फिर से उनकी सेवा में जुट गया।

नौटंकी दुनिया भर की…

एक बालक जिद पर अड़ गया… बोला की छिपकली खाऊंगा. घरवालों ने बहुत समझाया पर नहीं माना !! हार कर उसके गुरु जी को बुलाया गया। वे जिद तुड़वाने में महारथी थे.. गुरु के आदेश पर एक छिपकली पकड़वाई गई. उसे प्लेट में परोस बालक के सामने रख गुरु बोले, ले खा… बालक मचल गया.. बोला, तली हुई खाऊंगा.. गुरु ने छिपकली तलवाई और दहाड़े, ले अब चुपचाप खा. बालक फिर गुलाटी मार गया और बोला, आधी खाऊंगा.. छिपकली के दो टुकड़े किये गये.. बालक गुरु से बोला, पहले आप खाओ. गुरु ने आंख नाक भींच कर किसी तरह आधी छिपकली निगली… गुरु के छिपकली निगलते ही बालक दहाड़ मार कर रोने लगा की आप तो वो टुकड़ा खा गये जो मैंने खाना था.. गुरु ने धोती सम्भाली और वहां से भाग निकले की अब जरा भी यहां रुका तो ये दुष्ट दूसरा टुकड़ा भी खिला कर मानेगा… करना-धरना कुछ नहीं, नौटंकी दुनिया भर की…

रविवार, 23 अगस्त 2009

शास्त्री जी की किताब

पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जब प्राइमरी में थे, तभी उनके सिर से पिता का साया उठ गया। घर की आर्थिक हालत पहले से ही खराब थी, अब गुजारा चलाना और मुश्किल हो गया। शास्त्री जी पढ़ने में बेहद होशियार थे। घर की हालत ठीक न होने के कारण जरूरी पुस्तकें वे नहीं खरीद पाते थे।

एक अध्यापक रोज उनसे पुस्तक लाने को कहते, पर वे बिना किताब स्कूल आ जाते। एक दिन अध्यापक ने चेतावनी दी-अगर तुम कल पुस्तक नहीं लाए तो क्लास में बैठने नही दिया जाएगा। उस दिन शास्त्री जी अपने एक मित्र के घर गए और उससे उसकी वह पुस्तक इस वादे के साथ ले ली कि कल सुबह स्कूल में लौटा देंगे। वे रात को घर के बाहर बिजली के खंभे के नीचे जा बैठे और उसकी रोशनी में पूरी रात उस पुस्तक की नकल अपनी एक कॉपी में कर ली। अब शास्त्री जी की यह कॉपी पुस्तक बन चुकी थी।

अगले दिन स्कूल पहुंचे तो अध्यापक ने पुस्तक दिखाने को कहा। शास्त्री जी ने वह कॉपी उनके सामने रख दी। अध्यापक गुस्से से लाल होकर बोले-मैं पुस्तक मांग रहा हूं और तू मुझे यह कॉपी दिखा रहा है। शास्त्री जी ने जब कॉपी खोलकर दिखाई तो अध्यापक यह देखकर दंग रह गए कि पुस्तक का एक-एक शब्द हूबहू उस कॉपी में लिखा था। शास्त्री जी बोले-मेरे पिता नहीं हैं। हमारे पास इतने पैसे नहीं कि पुस्तक खरीद सकूं। अध्यापक की आंखों में आंसू आ गए। अध्यापक ने शास्त्री जी के सिर पर स्नेह से हाथ फिराते हुए कहा- मुझे उम्मीद है, एक दिन देश तुम पर गर्व करेगा। अध्यापक की बात सच सबित हुई।

आप स्टार्ट नहीं हो रहे, तो मैं धक्का दूं?

एक आदमी खड़े-खड़े चाबी से अपना कान खुजा रहा था।
चिंटू उसे गौर से देख रहा था।

थोड़ी देर बाद चिंटू बोला: भाई साहब, आप स्टार्ट नहीं हो रहे, तो मैं धक्का दूं?

रविवार, 9 अगस्त 2009

पत्नी को रेलवे स्टेशन छोड़ने गया था

संता के होंठ जले हुए थे।

बंता ने पूछा: कैसे जले?
संता: पत्नी को रेलवे स्टेशन छोड़ने गया था...

बंता: तो...?


संता: खुशी के मारे ट्रेन का इंजन चूम लिया!  

रविवार, 26 जुलाई 2009

मैंने एक बार जब किक मारी थी

तीन गपोड़ी दोस्त आपस में बातें कर रहे थे।

पहला बोला: मैंने एक बार किक मारी तो फुटबॉल 10वीं मंजिल की छत पर पहुंच गई थी!

दूसरा बोला: मैंने एक बार किक मारी तो फुटबॉल दूसरी कॉलोनी के पार्क में जाकर गिरी थी!


तीसरा बोला: यह तो कुछ भी नहीं, मैंने एक बार जब किक मारी थी तो फुटबॉल गायब ही हो गई थी! कुछ दिन बाद आसमान से जमीन पर आकर गिरी और उस पर एक चिट चिपकी हुई थी, जिस पर लिखा था...
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'अगर यह फुटबॉल दोबारा चांद पर आई, तो हम वापस नहीं करेंगे!'
 

रविवार, 19 जुलाई 2009

वकील संता (खूबसूरत युवती से): परसों रात तुम कहां थीं?
युवती: अपने पड़ोसी के साथ डिनर पर गई थी।

संता: और कल रात?
युवती: अपने दूसरे पड़ोसी के साथ डिनर पर गई थी। 



संता: और आज का तुम्हारा क्या प्रोग्राम है?
दूसरा वकील: ऑब्जेक्शन माई लॉर्ड! यह सवाल मैंने पहले ही कर लिया है!

बटन दबाओ खुल जाएगी

चोर आया...

तिजोरी पर लिखा था-
'तोड़ने की जरूरत नहीं, बटन दबाओ खुल जाएगी।'

बटन दबाते ही पुलिस आ गई...

पुलिसः तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना है?


चोरः मां कसम, आज इंसानियत पर से विश्वास उठ गया!

सपनों के अर्थ।

एक महिला दोपहर की झपकी ले रही थी।

थोड़ी देर बाद उसकी आंख खुली और उसने अपने पति को फोन कर कहा: मैंने एक सपना देखा कि तुम वैलंटाइंस डे पर मुझे हीरे का हार दे रहे हो। इसका क्या मतलब हुआ?
पति बोला: तुम्हें शाम को पता चल जाएगा।

शाम को जब पति ऑफिस से घर लौटा, तो उसके हाथ में एक छोटा-सा पैकेट था।


पत्नी ने खुशी से उसके हाथ से वह पैकेट लिया और खोला तो देखा कि उसमें एक किताब है।

किताब का नाम था-
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सपनों के अर्थ।


रविवार, 12 जुलाई 2009

सायना नेहवाल

इंडोनेशियाई ओपन सुपर सीरीज बैडमिंटन चैंपियनशिप का खिताब जीतकर इतिहास रचने वाली 'वंडर गर्ल' सायना नेहवाल की नजरें इस वर्ष शीर्ष पांच खिलाडिय़ों में शामिल होने की है। उनका कहना है कि वह मैच दर मैच रणनीति बनाएंगी। सायना यह खिताब जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी हैं। टूर्नामेंट में सायना ने विश्व की शीर्षस्थ खिलाडिय़ों को हराकर एक मुकाम हासिल किया है। पिछले साल बीजिंग ओलंपिक के क्वार्टरफाइनल तक का सफर तय करने वाली यह युवा खिलाड़ी निरंतर अपनी रैंकिंग में सुधार करती आ रही हैं। इंडोनेशियन ओपन जीतकर सायना ने यह साबित कर दिया कि आने वाले समय में दुनिया की दिग्गज महिला बैडमिंटन खिलाडिय़ों को इस भारतीय बाला से कड़ी टक्कर मिलने वाली है। हालांकि इससे पहले सायना सात खिताब अपनी झोली में डाल चुकी हैं। अपने कॅरियर की शुरुआत धमाकेदार तरीके से करने वाली इस खिलाड़ी ने पहला खिताब 2003 में चेकोस्लोवाकिया जूनियर ओपन जीतकर किया था। उसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार अच्छा प्रदर्शन करती रहीं। सायना विश्व की नंबर तीन खिलाड़ी वांग लिन को हराकर विश्व रैंकिंग में सातवें नंबर पर पहुंच गई हैं। 'भारतीय महिला बैडमिंटन की प्रकाश पादुकोण' कही जा रही सायना जिस प्रकार से सफलता की सीढ़ी चढ़ती जा रही हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि आने वाले दिनों में वह नंबर वन पर भी विराजमान हो सकती हैं। नंबर वन रैंकिंग के बारे में सायना का कहना है कि यह मुश्किल सही पर नामुमकिन नहीं है। 'देशबन्धु' से विशेष बातचीत में सायना ने कहा कि उनका ध्यान सिर्फ खेल पर है। जीत से गदगद सायना ने कहा कि इस प्रतियोगिता के लिए मैंने कड़ी मेहनत की थी, जिसका फल मुझे खिताब के रूप में मिला। मैं चैंपियनशिप जीतकर बहुत खुश हूं। उन्होंने कहा कि मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि इतनी जल्दी खिताब जीतूंगी। पिछले एक साल में सायना के खेल में गजब का सुधार आया है। इस दौरान उन्होंने आक्रामक शैली में बदलाव लाते हुए रक्षात्मक रूख भी अख्तियार करना सीखा है। झन्नाटेदार स्मैश के साथ डिसेप्टिव शॉट्स सायना की हमेशा से ताकत रही है। इस कड़ी मेहनत और लगन को देखकर बैडमिंटन प्रेमी उम्मीद कर सकते हैं कि वह विश्व खिताब पर भी कब्जा करने में सफल होंगी। सायना नेहवाल के स्वदेश लौटने पर उनसे विशेष बातचीत की 'देशबन्धु' के खेल संवाददाता कमलेश कुमार राय ने। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश... सबसे पहले आपको किसने बधाई दी? मैच खत्म होने के बाद मेरी मोबाइल की घंटी रूकने का नाम नहीं ले रही थी, उस समय मैं पुरस्कार दिर्घा में थी। वहां पर मोबाइल पर बात करना मना था। लगभग 4 घंटे बाद मैंने अपने पापा को फोन लगाया और उनसे बात की। मैं उन सभी प्रशंसकों को धन्यवाद करना चाहूंगी जिन्होंने उस दौरान मुझे फोन व एसएमएस किया। क्या आपने इंडोनेशियन ओपन के लिए कोई लक्ष्य निर्धारित किया था? नहीं, मैंने केवल अपने खेल पर ध्यान दिया। मैंने कदम दर कदम रणनीति बनाई। जब आप विश्व के नंबर तीन खिलाड़ी के सामने पहला गेम हार गईं उसके बाद आपके दिमाग में क्या चल रहा था? सच कहूं तो मैं तीसरे गेम में 17-7 से आगे चलने के बावजूद अंदर से कांप रही थी। जबतक गेम ओवर नहीं हुआ मेरे अंदर डर बना हुआ था। जीत का श्रेय किसको देना चाहेंगी ? अपने कोच पुलेला गोपीचंद जी को और माता-पिता को। बैडमिंटन खेलने की प्रेरणा कहां से मिली? मेरे माता-पिता से। उन्होंने ही मुझे इस खेल के लिए प्रेरित किया। पापा ने मेरा हमेशा साथ दिया और मुझे किसी भी चीज के लिए मना नहीं किया। किसी भी बैडमिंटन खिलाड़ी के लिए मानसिक रूप से मजबूत होना जरूरी है या शारीरिक रूप से? दोनों का होना बहुत जरूरी है। आपका प्लस प्वाइंट क्या है? मेरा दृढ़संकल्प करके मैच जीतना। वह कौन सा क्षेत्र है जिसमें अभी भी आप सुधार करना चाहेंगी? मैं अपनी स्टेमिना को और ज्यादा ताकतवर बनाना चाहूंगी। इसके ऊपर मैं काफी मेहनत कर रही हूं। आपको कौन-कौन से खेल पसंद है? टेनिस व कबड्डी। आपके कोच कौन -कौन से रहे हैं? श्री पीएसवी नानी प्रसाद राव (एसएएपी कोच), आरिफ सर (साई कोच) व गोपीचंद जी। बैडमिंटन के अलावा किस खेल के खिलाड़ी पसंद हैं? टेनिस में रोजर फेडरर और क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर। इस खेल में चीन और मलेशिया की बादशाहत का राज क्या है? देखिए, सबसे बड़ी वजह है खेल की सुविधाओं को सही समय पर सही जगह मुहैया करना। ये दोनों देश इस खेल के प्रति कोई भी कोताही नहीं बरतते, चाहे वह खिलाडिय़ों के खान-पान हो या फिर स्टेडियम या खेल उपकरण। खिलाडिय़ों को शुरू से ही बेहतर प्रशिक्षण दिया जाता है और स्टेमिना को कैसे मजबूत व ताकतवर बनाया जाता है इसके ऊपर बहुत ध्यान दिया जाता है। बैडमिंटन में किस देसी व विदेशी खिलाड़ी से आप ज्यादा प्रभावित हैं? मैं अपने वर्तमान कोच गोपीचंद जी से ज्यादा प्रभावित हूं। विदेशी खिलाडिय़ों में इंडोनेशिया के तौफीक हिदायत व डेनमार्क के पीटर हॉग गेडे का खेल मुझे ज्यादा पसंद हैं। वह जीत जो हमेशा याद रखना चाहेंगी? (काफी सोच विचार करने के बाद) देखिए, हर जीत मेरे लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब आप जीतते हैं तो वह जीत एक कीर्तिमान की तरह होता है। जीतने के बाद वह चीज आपको आसान लगने लगती है। सरकार से कितनी मदद मिल रही है? फिलहाल सबकुछ ठीक है। जितनी भी मदद मिल रही है वह पर्याप्त है। सरकार स्टेडियम से लेकर खेल उपकरण तक मुहैया करा रही है। सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी? इस बारे में कभी सोचा ही नहीं। आप पहले भी खिताब जीतकर भारत लौटी हैं लेकिन इस बार जिस प्रकार से एयरपोर्ट पर स्वागत हुआ, क्या ऐसा पहले हुआ ? (हंसते हुए) देखिए, इससे पहले लोग मुझे नहीं जानते थे लेकिन अब मैं धीरे-धीरे अपने प्रदर्शन से पहचान बनाने लगी हूं और अपने प्रशंसकों के दिलोदिमाग में छाने लगी हूं। अगला लक्ष्य? विश्व चैंपियनशिप में बेहतर प्रदर्शन करना व अंत तक मैच में डटकर मुकाबला करना। Interviewer : कमलेश कुमार राय Interview Date : 01,July,2009

रविवार, 24 मई 2009

इसे क्यों घूर रहे हो?

बंटी काफी देर से अपने मैरेज सर्टिफिकेट को घूर कर देख रहा था।

उसकी पत्नी बोली: इतनी देर से इसे क्यों घूर रहे हो?
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बंटी: इसकी एक्सपायरी डेट ढूंढ रहा हूं।

रविवार, 17 मई 2009

ऐसे मिलेगा अच्छा जीवन

जर्मनी में एक बालक विलहेम पढ़ने से जी चुराता था। उसकी मां जब उसे स्कूल ले जाती तो वह नखरे करता। स्कूल में भी पढ़ता कम और शरारत ज्यादा करता रहता था। एक दिन स्कूल से लौटते हुए वह सड़क पर खेल रहे बच्चों को देखकर मां से बोला, 'आप मुझे स्कूल क्यों भेजती हैं? ये बच्चे भी तो बिना स्कूल गए ही बड़े हो रहे हैं। देखिए, ये कितने खुश हैं।'

मां चुपचाप सुनती रही। दूसरे दिन उसने विलहेम को घर के बाहर उग आए झाड़-झंखाड़ की ओर दिखाते हुए उससे पूछा,'बताओ बेटा, इन्हें किसने उगाया है?' विलहेम बोला, 'मां, ये तो खुद ही उग आते हैं और ओस, बारिश का पानी और सूरज की गर्मी पाकर बढ़ जाते हैं।' फिर मां ने घर में लगे गुलाब के पौधों को दिखाते हुए पूछा, 'और अब बताओ, ये फूल कैसे लग रहे हैं?' विलहेम ने जवाब दिया,'मां, ये तो बहुत ही सुंदर लग रहे हैं। इन्हें तो पिताजी रोज तराशते हैं और नियम से खाद-पानी भी देते हैं।'

मां विलहेम से यही सुनना चाहती थी। उसने तपाक से कहा, ' बिल्कुल ठीक। ये फूल इसलिए ज्यादा सुंदर हैं क्योंकि इन्हें प्रयास करके ऐसा बनाया गया है। जीवन भी ऐसा ही है। हमें अच्छा जीवन प्रयासों से ही मिलता है। इसके लिए अच्छी शिक्षा, बेहतर प्रशिक्षण और परिश्रम की जरूरत पड़ती है। तुम में और उन स्कूल न जाने वाले बच्चों में क्या फर्क है, यह तुम्हें आगे चलकर पता चलेगा।' मां की यह सीख विलहेम ने गांठ बांध ली। आगे चलकर इन्हीं विलहेम ने एक्स-रे की खोज की और भौतिकी में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया।

रविवार, 10 मई 2009

टीचर (गुस्से में): तुम कॉलेज क्यों आते हो?

संता: विद्या की खातिर सर।

टीचर: तो अब सो क्यों रहे थे?


संता: सर, आज विद्या आई नहीं है न!
टीचर: मारिया, मैप में ढूंढकर बताओ अमेरिका कहां है?
मारिया: यह रहा सर।

टीचर: शाबाश! ...बच्चो, अब आप लोग मुझे बताओ कि अमेरिका किसने खोजा?
सारे बच्चे एक साथ बोले: मारिया ने....

रविवार, 3 मई 2009

ठीक है, 20 दे दो।


लड़की (दुकानदार से): भैया, क्या आपके पास वैलंटाइंस डे का कोई ऐसा ग्रीटिंग कार्ड है, जिस पर लिखा हो, 'तुम मेरे पहले और आखिरी प्यार हो'?
दुकानदार: हां, है।
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लड़की: ठीक है, 20 दे दो।

रविवार, 22 मार्च 2009

समय का महत्व

यह घटना उस समय की है, जब स्वतंत्रता आंदोलन जोर पकड़ रहा था। गांधीजी घूम-घूमकर लोगों को स्वराज और अहिंसा का संदेश देते थे। एक बार उन्हें एक सभा में बुलाया गया। सभा का संचालन एक स्थानीय नेता को करना था। गांधीजी समय के पाबंद थे। वह निर्धारित समय पर सभास्थल पर पहुंच गए। उन्होंने देखा कि सभास्थल पर सभी लोग पहुंच गए हैं, लेकिन जिन नेता को सभा का संचालन करना था, वह नहीं पहुंच पाए हैं। सभी लोग बेसब्री से उस नेता की प्रतीक्षा करते रहे।

वह पूरे पैंतालीस मिनट बाद सभास्थल पर पहुंचे। उन्होंने देखा कि उनकी अनुपस्थिति में ही सभा चल रही है। यह देखकर वह लज्जित हुए। मंच पर पहुंच कर उन्होंने आयोजकों से पूछा कि उनके बिना सभा कैसे प्रारंभ हुई? इस पर आयोजक कुछ नहीं बोले।

गांधीजी नेताजी के हाव-भाव से उनकी बातें समझ गए। वह मंच पर आए और नेताजी की ओर देखते हुए बोले, 'माफ कीजिएगा, लेकिन जिस देश के अग्रगामी नेतागण ही महत्वपूर्ण सभा में पैंतालीस मिनट देर से पहुंचेगे वहां पर स्वराज भी उतनी ही देर से आएगा। नेता के इंतजार में अन्य लोग भी कार्य प्रारंभ नहीं कर सकते। यह सोचकर मैंने सभा शुरू करा दी क्योंकि मुझे डर था कि आपके देर से आने की आदत धीरे-धीरे अन्य लोगों को भी न लग जाए। मेरा मानना है कि लोग एक-दूसरे की अच्छी बातें ही सीखें, बुरी बातें नहीं।' गांधीजी की बात सुनकर नेताजी को शर्मिंदगी महसूस हुई। उन्होंने उसी क्षण संकल्प लिया कि आगे से वह भी वक्त का महत्व समझेंगे और अपना हर कार्य निर्धारित समय पर करेंगे।

मैं कौन-सा रजनीकांत का बेटा हूं!

 
पापा: तुम्हारे रिजल्ट का क्या हुआ?
चिंटू: देखना पापा, खुद टीचर का बेटा ही फेल हो गया!

पापा: और तुम?
चिंटू: डॉक्टर अंकल का बेटा भी फेल हो गया।

पापा: तुम्हारा रिजल्ट कैसा रहा?
चिंटू: वकील अंकल का बेटा भी फेल हो गया।

पापा (गुस्से से): पर तेरे रिजल्ट का क्या हुआ कमबख्त??
चिंटू: जब इन सबके बेटे फेल हो गए, तो मैं कौन-सा रजनीकांत का बेटा हूं!