नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

गुरुवार, 15 मई 2014

राजा भोज का सपना

 

वह कौन-सा मनुष्य है जिसने महा-प्रतापी राजा भोज महाराज का नाम न सुना हो! उसकी महिमा और कीर्ति तो सारे जगत् में व्याप रही है, और बड़े-बड़े महिपाल उसका नाम सुनते ही काँप उठते थे और बड़े-बड़े भूपति उसके पाँव पर अपना सिर नवाते। सेना उसकी समुद्र की तरंगों का नमूना और ख़ज़ाना उसका सोने-चाँदी और रत्नों की खान से भी दूना। उसके दान ने राजा कर्ण को लोगों के जी से भुलाया और उसके न्याय ने विक्रम को भी लजाया। कोई उसके राजभर में भूखा न सोता और न कोर्ड उघाड़ा रहने पाता। जो सत्तू माँगने आता उसे मोतीचूर मिलता और जो गजी चाहता उसे मलमल दिया जाता। पैसे की जगह लोगों को अशरफियाँ बाँटता और मेह की तरह भिखारियों पर मोती बरसाता। एक-एक श्लोक के लिए ब्राह्मणों को लाख-लाख रुपया उठा देता और एक-एक दिन में लाख-लाख गोदान करता, सवा लाख ब्राह्मणों को षट्रस भोजन कराके तब आप खाने को बैठता। तीर्थयात्रा-स्नान-दान और व्रत-उपवास में सदा तत्पर रहता। बड़े-बड़े चंद्रायण किए थे और बड़े-बड़े जंगल-पहाड़ छान डाले थे।

एक दिन शरद ऋतु में संध्या के समय सुंदर फुलवाड़ी के बीच स्वच्छ पानी के कुंड के तीर जिसमें कुमुद और कमलों के बीच जल-पक्षी कलोलें कर रहे थे, रत्न−जटित सिंहासन पर कोमल तकिए के सहारे स्वस्थ-चित्त बैठा हुआ महलों की सुनहरी कलसियाँ लगी हुई संगमरमर की गुम्जियों के पीछे से उदय होता हुआ पूर्णिमा का चाँद देख रहा था और निर्जन एकांत होने के कारण मन ही मन में सोचता कि अहो! मैंने अपने कुल को ऐसा प्रकाश किया जैसे सूर्य से इन कमलों का विकास होता है, क्या मनुष्य और क्या जीव-जंतु मैंने अपना सारा जन्म इन्हीं के भला करने में गँवाया और व्रत-उपवास करते-करते अपने फूल से शरीर को काँटा बनाया। जितना मैंने दान दिया उतना तो कभी किसी के ध्यान में भी न आया होगा, जिन-जिन तीर्थों की मैंने यात्रा की वहाँ कभी पंछी ने पर भी न मारा होगा, मुझसे बढ़कर इस संसार में और कौन पुण्यात्मा है और आगे भी कौन हुआ होगा! जो मैं ही कृतकार्य नहीं तो फिर कौन हो सकता है? मुझे अपने ईश्वर पर दावा है, वह मुझे अवश्य अच्छी गति देगा। ऐसा कब हो सकता है कि मुझे भी कुछ दोष लगे।

 

इसी अर्से में चोबदार पुकारा−चौधरी इंद्रत्त निगाह रू−ब−रू श्री महाराज सलामत। भोज ने आँख उठाई, दीवान ने साष्टांग दंडवत् की फिर सम्मुख आ हाथ जोड़ यूँ निवेदन किया, पृथ्वीनाथ! वह कुएँ सड़क पर, जिनके वास्ते आपने हुक्म दिया था, बनकर तैयार हो गए और आम के बाग़ भी सब जगह लग गए। जो पानी पीता है, आपको आसीस देता और जो उन पेड़ों की छाया में विश्राम करता है, आपकी बढ़ती दौलत मनाता है। राजा अति प्रसन्न हुआ और कहा कि सुन, मेरी अमलदारी भर में जहाँ-जहाँ सड़क है, कोस-कोस पर कुएँ खुदवा के सदवर्त बैठा दे और दुतरफ़ा पेड़ भी जल्द लगवा दे।

इसी अर्से में दानाध्यक्ष ने आकर आशीर्वाद दिया और निवेदन किया कि धर्मावतार! वह जो पाँच हज़ार ब्राह्मण हर साल जाड़ों में रज़ाई पाते हैं, सो ड्योढ़ी पर हाज़िर हैं। राजा ने कहा, अब पाँच के बदले पचास हज़ार मिला करे और रज़ाई की जगह शाल-दुशाला दिया जावे। दानाध्यक्ष दुशालों के लाने के वास्ते तोशेख़ाने में गया।

 

इमारत के दारोग़ा ने आकर मुजरा किया और ख़बर दी कि महाराज, वह बड़ा मंदिर जिसके जल्द बना देने के वास्ते सरकार से हुक्म हुआ है, आज उसकी नींव खुद गई, पत्थर गढ़े जाते हैं और लुहार लोहा भी तैयार कर रहे हैं। महाराज ने तिउरियाँ बदलकर उस दारोग़ा को ख़ूब घुड़का और कहा कि मूर्ख, वहाँ पत्थर और लोहे का क्या काम है! बिल्कुल मंदिर संगमरमर और संगमूसा से बनाया जावे और लोहे बदल उसमें सब जगह सोना काम में आवे जिसमें भगवान भी उसे देखकर प्रसन्न हो जावे, मेरा नाम इस संसार में अतुल कीर्ति पावे। यह सुनकर सारा दरबार पुकार उठा कि धन्य महाराज, धन्य, क्यों न हो, जब ऐसे हो तब तो ऐसे हो, आपने इस कलिकाल को सतयुग बना दिया मानो धर्म का उद्धार करने को इस जगत् में अवतार लिया। आज आपसे बढ़कर और दूसरा कौन ईश्वर का प्यारा है। हमने तो पहले से ही आपको साक्षात धर्मराज विचारा है।

व्यास जी ने कथा आरंभ की, भजन-कीर्तन होने लगा। चाँद सिर पर चढ़ आया, घड़ियाली ने निवेदन किया कि महाराज रात आधी के निकट पहुँची। राजा की आँखों में नींद छा रही थी, व्यास जी कथा कहते थे पर राजा को ऊँघ आती थी। उठकर रनिवास में गया, जड़ाऊ पलंग और फूलों की सेज पर सोई रानियाँ पैर दाबने लगीं राजा की आँख झपक गई तो स्वप्न में क्या देखता है कि वह बड़ा संगमरमर का मंदिर बनकर बिल्कुल तैयार हो गया। जहाँ कहीं उस पर नक़्क़शी का काम किया है तो बारीकी और सफ़ाई में हाथी दाँत को भी मात कर दिया है, जहाँ कहीं पच्चीकारी का हुनर दिखलाया है तो जवाहिरों को पत्थरों में जड़कर तसवीर का नमूना बना दिया है, कहीं लालों के गुल्लालों पर नीलम की बुलबुलें बैठी हैं और ओस की जगह हीरों के लोलक लटकाए हैं, कहीं पुखराजों की डंडियों से पन्ने के पत्ते निकालकर मोतियों के भुट्टे लगाए हैं, सोने की चोबों पर कमख़ाब के शामियाने और उनके नीचे बिल्लौर के हौज़ों में गुलाब और केवड़े के फुहारे छूट रहे हैं, मानों धूप जल रहा है, सैंकड़ों कपूर के दीपक बल रहे हैं। राजा देखते ही मारे घमंड के फूलकर मशक बन गया। कभी नीचे, कभी ऊपर, कभी दाहिने, कभी बाएँ निगाह करता और मन में सोचता कि क्या अब इतने पर भी मुझे कोई स्वर्ग में से रोकेगा या पवित्र पुण्यात्मा न कहेगा? मुझे अपने कर्मों का भरोसा है, दूसरे किसी से क्या काम पड़ेगा। इसी अर्से में वह राजा उस सपने के मंदिर में खड़ा-खड़ा क्या देखता है कि एक जोत-सी उसके सामने आसमान से उतरी चली आती है, उसका प्रकाश तो हज़ारों सूर्यों से भी अधिक है परंतु जैसे सूरज को बादल घेर लेता है इस प्रकार उसने मुँह पर घूँघट डाल लिया है नहीं तो राजा की आँखें कब उस पर ठहर सकती थीं वरन् इस घूँघट पर भी मारे चकाचौंध के झपकी चली जाती थीं। राजा उसे देखते ही काँप उठा और लड़खड़ाती-सी ज़ुबान से बोला कि हे महाराज, आप कौन हैं और मेरे पास किस प्रयोजन से आए हैं। उस देव पुरुष ने बादल की गरज के समान गंभीर उत्तर दिया कि मैं सत्य हूँ, मैं अंधों की आँखें खोलता हूँ, मैं उनके आगे से धोखे की पट्टी हटाता हूँ, मैं मृगतृष्णा के भटके हुओं का भ्रम मिटाता हूँ और सपने के भूले हुओं को नींद से जगाता हूँ। हे भोज, यदि कुछ हिम्मत रखता है तो आ, हमारे साथ आ और हमारे तेज के प्रभास से मनुष्यों के मन के मंदिरों का भेद ले, इस समय हम तेरे ही मन को जाँच रहे हैं।

 

राजा के जी पर एक अजब दहशत-सी छा गई। नीची निगाहें करके गर्दन खुजाने लगा। सत्य बोला, भोज! तू डरता है, तुझे अपने मन का हाल जानने में भी भय लगता है। भोज ने कहा कि नहीं इस बात से तो नहीं डरता क्योंकि जिसने अपने तईं नहीं जाना उसने फिर क्या जाना सिवाए इसके मैं तो आप चाहता हूँ कि कोई मेरे मन की थाह लेवे और अच्छी तरह से जाँचे। मारे व्रत और उपवासों के मैंने अपना फूल−सा शरीर कूटा बनाया, ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते-देते सारा ख़ज़ाना ख़ाली कर डाला, कोई तीर्थ बाक़ी न रखा, कोई नदी या तालाब नहाने से न छोड़ा। ऐसा कोई आदमी नहीं है जिसकी निगाह में मैं पवित्र पुण्यात्मा न ठहरूँ। सत्य बोला, ठीक, पर भोज, यह तो बतला कि तू ईश्वर की निगाह में क्या है। क्या हवा में बिना धूप तृसरेणु कभी दिखलाई देते हैं? पर सूरज की किरण पड़ते ही कैसे अनगिनत चमकने लग जाते हैं, क्या कपड़े से छाने हुए मैले पानी में किसी को कीड़े मालूम पड़ते हैं पर जब ख़ुर्दबीन शीशे को लगाकर देखो तो एक-एक बूँद में हज़ारों ही जीव सूझने लग जाते हैं। बस जो तू उस बात के जानने से जिसे अवश्य जानना चाहिए डरता नहीं तो आ, मेरे साथ आ, मैं तेरी आँखें खोलूँगा।

निदान सत्य यह कहके राजा को मंदिर के उस बड़े ऊँचे दरवाज़े पर चढ़ा ले गया कि जहाँ से सारा बाग़ दिखलाई देता था और फिर उससे यूँ कहने लगा कि भोज, मैं अभी तेरे पापकर्मों का कुछ भी चर्चा नहीं करता क्योंकि तूने अपने तईं निरा निष्पाप समझ रखा है पर यह तो बतला कि तूने पुण्यकर्म कौन-कौन से किए हैं कि जिनसे सर्व−शक्तिमान जगदीश्वर संतुष्ट होगा। राजा यह सुनके अत्यंत प्रसन्न हुआ, यह तो मानो उसके मन की बात थी। पुण्यकर्म के नाम से उसके चित्त को कमल−सा खिला दिया। उसे निश्चय था कि पाप तो मैंने चाहे किया हो चाहे न किया हो पर पुण्य मैंने इतना किया कि भारी से भारी पाप भी उसके पासंग में न ठहरेगा। राजा को वहाँ उस समय सपने में तीन पेड़ बड़े ऊँचे-ऊचे अपनी आँख के सामने दिखाई दिए, फलों से इतने लदे हुए कि मारे बोझ के उनकी टहनियाँ धरती तक झुक गई थीं। राजा उन्हें देखते ही हरा हो गया और बोला कि सत्य, यह ईश्वर की भक्ति और जीवों की दया अर्थात् ईश्वर और मनुष्य दोनों की प्रीति के पेड़ हैं। देख फलों के बोझ से धरती पर नये जाते हैं। यह तीनों मेरे ही लगाए हैं। पहले में तो यह सब लाल-लाल फल मेरे दान से लगे हैं। और दूसरे में वह पीले मेरे न्यास से और तीसरे में यह सब सफ़ेद फल मेरे तप का प्रभाव दिखलाते हैं। मानो उस समय चारों ओर से यह ध्वनि राजा के कान में चली आती थी कि धन्य हो महाराज, धन्य हो, आज तुम सा पुण्यात्मा दूसरा कोई नहीं। तुम साक्षात धर्म के अवतार हो। इस लोक में भी तुमने बड़ा पद पाया है और उस लोक में भी तुम्हें इससे अधिक मिलेगा। तुम मनुष्य और ईश्वर दोनों की आँखों में निर्दोष और निष्पाप हो। सूर्य के मंडल में लोग कलंक बतलाते हैं पर तुम पर एक छींटा भी नहीं लगाते। सत्य बोला कि भोज, जब मैं इन पेड़ों के पास से आया था जिन्हें तू ईश्वर की भक्ति और जीवों की दया के बतलाता है तब तो उनमें फल-फूल कुछ भी नहीं था, निरे ठूँठ से खड़े थे, यह लाल, पीले और सफ़ेद फल कहाँ से आ गए! यह सचमुच उन पेड़ों में फल लगे हैं या तुझे फुसलाने और ख़ुश करने को किसी ने उनकी टहनियों से लटका दिए हैं? चल उन पेड़ों के पास चलकर देखें तो सही मेरी समझ में तो यह लाल-लाल फल जिन्हें तू अपने दान के प्रभाव से लगे बतलाता है, यश और कीर्ति फैलाने की चाह अर्थात् प्रशंसा पाने की इच्छा ने इस पेड़ में लगाए हैं।

 

निदान जो हो, सत्य ने उस पेड़ को छूने को हाथ बढ़ाया। राजा सपने में क्या देखता है कि वह सारे फल जैसे आसमान से ओले गिरते हैं, एक आन की आन में धरती पर गिर पड़े। धरती सारी लाल हो गई। पेड़ों पर सिवाए पत्तों के और कुछ न रहा। सत्य ने कहा कि राजा, जैसे कोई किसी चीज़ को मोम से चिपकाता है उसी तरह तूने अपने भुलाने को, प्रशंसा पाने की इच्छा से यह फल इस पेड़ पर लगा दिए थे, सत्य के तेज़ से वहाँ मोम गल गया, पेड़ ठूँठ का ठूँठ रह गया। जो कुछ तूने दिया और किया सब दुनिया के दिखलाने और मनुष्यों से प्रशंसा पाने के लिए। केवल ईश्वर की भक्ति और जीवों की दया से तो कुछ भी नहीं दिया। यदि कुछ दिया हो या किया हो तो तू ही क्यों नहीं बतलाता। मूर्ख इसी के भरोसे पर तू फूला हुआ स्वर्ग में जाने को तैयार हुआ था! भोज ने एक ठंडी साँस ली। उसने तो औरों को भूला समझा था पर वह सबसे अधिक भूला हुआ निकला। सत्य से उस पेड़ की तरफ़ हाथ बढ़ाया जो सोने की तरह चमकते पीले-पीले फलों से लदा हुआ था। सत्य का हाथ पास पहुँचते ही इसका भी वही हाल हो गया जो पहले का हुआ था। सत्य बोला कि राजा, इस पेड़ में ये फल तूने अपने भुलाने को। स्वर्ग को यथार्थ सिद्ध करने की इच्छा से लगा लिए थे। कहने वाले ने ठीक कहा है कि मनुष्य-मनुष्य के कर्मों से उसके मन की भावना का विचार करता है और ईश्वर मनुष्य के मन की भावना के अनुसार उसके कर्मों का हिसाब लेता है। तू अच्छी तरह जानता है कि यही न्याय तेरे राज्य की जड़ है। जो न्याय न करे तो फिर वह राज्य तेरे हाथ में क्योंकर रह सके। जिस राज्य में न्याय नहीं वह तो बे−नींव का घर है, बुढ़िया के दाँतों की तरह हिलता है, अब गिरा तब गिरा। मूर्ख, तू ही क्यों नहीं बतलाता कि यह तेरा न्याय स्वार्थ सिद्ध करने और सांसारिक सुख पाने की इच्छा से है अथवा ईश्वर की, भक्ति और जीवों की दया से।

भोज की पेशानी पर पसीना हो आया, आँखें नीची कर लीं जवाब कुछ न बन पड़ा। तीसरे पेड़ की पारी आई। सत्य का हाथ लगते ही उसकी भी वही हालत हुई। राजा अत्यंत लज्जित हुआ। सत्य ने कहा कि मूर्ख, यह तेरे तप के फल कदापि नहीं इनको तो इस पेड़ पर तेरे अहंकार ने लगा रखा था। वह कौन सा व्रत वा तीर्थयात्रा है जो तूने निहंकार केवल ईश्वर की भक्ति और जीवों की दया से किया हो! तूने यह तप इसी वास्ते किया कि जिसमें तू अपने तईं औरों से अच्छा और बढ़ के विचारे। ऐसे ही तप पर गोबर-गनेश, तू स्वर्ग मिलने की उम्मीद रखता है पर यह तो बतला कि मंदिर की उन मुंडेरों पर वे जानवर से क्या दिखलाई देते हैं? कैसे सुंदर और प्यारे मालूम होते हैं! पर तो उनके पन्ने के हैं और गर्दन फ़ीरोज़े की, दुम में सारे क़िस्म के जवाहिर जड़ दिए हैं। राजा के जी में घमंड की चिड़िया ने फिर फुरफुरी ली मानो बुझते हुए दिये की तरह जगमगा उठा। जल्दी से जवाब दिया कि हे सत्य, यह जो कुछ तू मंदिर की मुंडेरों पर देखता है मेरे संध्या-वंदन का प्रभाव है। मैंने जो रातों जाग-जागकर और माथा रगड़ते-रगड़ते इस मंदिर की देहली को घिसाकर ईश्वर की स्तुति-वंदना और विनती प्रार्थना की है वही अब चिड़ियों की तरह पंख फैलाकर आकाश को जाती है मानों ईश्वर के सामने पहुँचकर अब मुझे स्वर्ग का राजा बनाती हैं।

 

सत्य ने कहा कि राजा, दीनबंधु करुणासागर श्री जगन्नाथ जगदीश्वर अपने भक्तों की विनती सदा सुनता रहता है और जो मनुष्य शुद्ध हृदय और निष्कपट होकर नम्रता और श्रद्धा के साथ अपने दुष्कर्मों का पश्चाताप अथवा उनके क्षमा होने का टुक भी निवेदन करता है वह उसका निवेदन उसी दम सूर्य-चाँद को बेधकर पार हो जाता है। फिर क्या कारण कि यह सब आप अब तक मंदिर की मुंडेर ही पर बैठे रहे। आ चल, देखें तो सही हम लोगों के पास जाने पर आकाश तो उड़ जाते हैं या उसी जगह पर परकटे कबूतरों की तरह फड़फड़ाया करते हैं। भोज डरा लेकिन सत्य का साथ न छोड़ा। जब मुंडेर पर पहुँचा तो क्या देखता है कि वे सारे जानवर जो दूर से ऐसे सुदंर दिखाई देते थे, मरे हुए पड़े हैं, पंख नुचे-खुचे और बहुतेरे बिल्कुल सड़े हुए यहाँ तक कि मारे बदबू के राजा का सिर भिन्ना उठा। दो एक में जिनमें कुछ दम बाकी था जो उड़ने का इरादा भी किया तो उनके पंख पारे की तरह भारी हो गए और उन्हें उसी ठौर दबा रखा, तड़फा ज़रूर किए पर उड़ने ज़रा भी न दिया। सत्य बोला, भोज, बस यही तेरे पुण्यकर्म हैं। इन्हीं स्तुति-वंदना और विनती-प्रार्थना के भरोसे पर तू स्वर्ग में जाना चाहता है! सूरत तो इनकी बहुत अच्छी है पर जान बिल्कुल नहीं। तूने जो कुछ किया केवल लोगों के दिखलाने को, जी से कुछ भी नहीं। जो तू एक बार भी जी से पुकारा होता कि दीनबंधु दीनानाथ दीन-हितकारी, मुझ पापी महा अपराधी डूबते हुए को बचा और कृपा-दृष्टि कर तो वह तेरी पुकार तीर की तरह तारों से पास पहुँची होती।

राजा ने सिर नीचा कर लिया, उत्तर कुछ न बन आया। सत्य ने कहा कि भोज, अब आ फिर इस मंदिर के अंदर चलें और वहाँ तेरे मन के मंदिर को जाँचे। यद्यपि मनुष्य के मन के मंदिर में ऐसे-ऐसे अंधेरे तहखाने और तलघर पड़े हुए हैं कि उनको सिवाय सर्वदर्शी घट-घट अंतर्यामी सकल जगत-स्वामी और कोई भी नहीं देख अथवा जाँच सकता तो भी तेरा परिश्रम व्यर्थ न जावेगा। राजा उस सत्य के पीछे खिंचा-खिंचा फिर मंदिर के अंदर घुसा पर अब तो उसका हाल ही कुछ से कुछ हो गया। सचमुच सपने का खेल सा दिखाई दिया चाँदी की सारी चमक जाती रही, सोने की बिल्कुल दमक उड़ गई, दोनों में लोह की तरह मोर्चा लगा हुआ और जहाँ-तहाँ से मुलम्मा उड़ गया था, भीतर ईंट-पत्थर कैसा दिखलाई देता था, जवाहिरों की जगह केवल काले-काले दाग़ रह गए थे और संगमरमर की चट्टानों में हाथ-हाथ भर गहरे गढ्ढे पड़ गए। राजा यह देखकर भौंचक-सा रह गया। औसान जाते रहे, हक्का-बक्का बन गया धीमी आवाज़ से पूछा कि यह टिड्डी दल की तरह इतने दाग़ इस मंदिर में कहाँ से आए? जिधर मैं निगाह उठाता हूँ सिवाय काले-काले दाग़ों के और कुछ भी नहीं दिखलाई देता, ऐसा तो छीपी छींट भी नहीं छापेगा और न शीतला बिगड़ा किसी का चेहरा देख पड़ेगा। सत्य बोला कि राजा, ये दाग़ जो तुझे मंदिर में दिखलाई देते हैं वे दुर्वचन हैं जो दिन-रात तेरे मुख से निकला किए हैं। याद तो कर तूने क्रोध में आकर कैसी कड़ी-कड़ी बातें लोगों को सुनाई हैं। क्या खेल में और क्या आना अथवा दूसरे का चित्त प्रसन्न करने को, क्या रुपया बचाने अथवा अधिक लाभ पाने को और दूसरे का देश अपने हाथ में लाने अथवा किसी बराबर वाले से अपना मतलब निकालने और दुश्मनों को नीचा दिखलाने को कितना झूठ बोला है! अपने ऐब छिपाने और दूसरों की आँखों में अच्छा मालूम होने अथवा झूठी तारीफ़ पाने के लिए कैसी-कैसी शेख़ियाँ हाँकी हैं! अपने को औरों से अच्छा, औरों को अपने से बुरा दिखलाने को कहाँ तक बातें बनाई हैं तो अब कुछ भी याद नहीं रहा, बिल्कुल एकबारगी भूल गया पर वहाँ वह तेरे मुँह से निकलते ही बही में दर्ज़ हुआ। तू इन दाग़ों को गिनने में असमर्थ है पर उस घट-घट निवासी अनंत अविनाशी को एक-एक बात जो तेरे मुँह से निकली है याद हैं और याद रहेंगी। उसके निकट भूत और भविष्य दोनों वर्तमान-सा है।

 

भोज ने सिर न उठाया पर उस दबी ज़बान से इतना मुँह से और निकाला कि दाग़ पर ये हाथ-हाथ भर गाढ़े क्योंकर पड़ गए, सोने-चाँदी में मोर्चा लग कर ये ईंट पत्थर कहाँ से दिखलाई देने लगे! सत्य ने कहा कि राजा, क्या तूने कभी किसी को कोई लगती हुई बात नहीं कही अथवा बोली-ठोली नहीं मारी? अरे नादान, यह बोली-ठोली तो गोली से अधिक काम कर जाती है। तू तो इन गढ़ों ही को देखकर रोता है पर तेरे ताने तो बहुतों की छातियों से पार हो गए। जब अहंकार का मोर्चा लगा तो फिर यह दिखलावे का मुलम्मा कब तक ठहर सकता है, स्वार्थ और अश्रद्धा का ईंट-पत्थर प्रकट हो आया। राजा को इस अर्से में चिमगादड़ों ने बहुत तंग कर रखा था, मारे बू के सिर फटा जाता था, भनगे और पतंगों से सारा मकान भर गया था। राजा को बीच-बीच में पंख वाले साँप और बिच्छू भी दिखलाई देते थे। राजा घबराकर चिल्ला उठा कि यह मैं किस आफ़त में पड़ा! इन कमबख़्तों को यहाँ किसने आने दिया? सत्य बोला, राजा, सिवाय तेरे इनको यहाँ कौन आने देगा! तू ही तो इन सबको लाया है। यह सब तेरे काम की बुरी वासना है। तूने समझा था कि जैसे समुद्र में लहरें उठा और मिटा करती हैं उसी तरह मनुष्य के मन में भी संकल्प की मौज उठकर मिट जाती है। पर रे मूढ़, याद रख कि आदमी के चित्त में ऐसा सोच-विचार कोई नहीं आता तो जगतकर्ता प्राणदाता परमेश्वर के सामने प्रत्यक्ष नहीं हो जाता। यह चमगादड़ और भनगे और साँप-बिच्छू और कीड़े-मकोड़े जो तुझे दिखलाई देते हैं, संकल्प-विकल्प हैं जो दिन-रात तेरे अंत:करण में उठा किए और उन्हीं चमगादड़ और भनगे और साँप-बिच्छू और कीड़े-मकोड़ों की तरह तेरे हृदय के प्रकाश में उड़ते रहे। क्या कभी तेरे जी में किसी राजा की ओर से कुछ द्वेष नहीं रहा था? उसके मुल्क-माल पर लोभ नहीं आया था? अपनी बड़ाई का अभिमान नहीं हुआ या दूसरे की सुंदर स्त्री देखकर उस पर दिल न चला।

राजा ने एक बड़ी लंबी ठंडी साँस ली और अत्यंत निराश होके वह बात कही कि इस संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो कह सके कि मेरा हृदय शुद्ध और मन में कुछ भी पाप नहीं। इस संसार में निष्पाप रहना बड़ा कठिन है। जो पुण्य करना चाहते हैं उनमें भी पाप निकल आता है। इस संसार में पाप से रहित कोई भी नहीं। ईश्वर के सामने पवित्र पुण्यात्मा कोई भी नहीं। सारा मंदिर वरन सारी धरती, आकाश गूँज उठा, कोई भी नहीं, कोई भी नहीं। सत्य ने जो आँख उठाकर उस मंदिर की एक दीवार की तरफ देखा तो वह उसी संगमरमर से आइना बन गया। राजा से कहा कि अब टुक इस आइने का भी तमाशा देख और जो कर्तव्य कर्मों के न करने से तुझे पाप लगे हैं उनका भी हिसाब ले। राजा उस आइने में क्या देखता है, जिस प्रकार बरसात की बढ़ी हुई किसी नदी के जल के प्रवाह में बहे जाते हैं उस प्रकार अनगिनत सूरतें एक ओर से निकलती और दूसरी ओर अलोप होती चली जाती हैं। कभी तो राजा को वे सब भूखे और नंगे आइने में दिखलाई देते जिन्हें राजा खाने-पहनने को दे सकता था पर न देकर दान का रुपया उन्हीं हट्टे-कट्टे मोटे-मुसटंड खाते-पीते हुओं को देता रहा जो उसकी ख़ुशामद करते थे या किसी की सिफ़ारिश ले आते थे या उसके कारदारों को घूँस देकर मिला लेते थे या सवारी के समय माँगते-माँगते और शोर-गुल मचाते-मचाते उसे तंग कर डालते थे या दरबार में आकर उसे लज्जा के भँवर में गिरा देते थे या झूठा छापा-तिलक लगाकर उसे मक्र के जाल में फँसा लेते थे या जन्मपत्र में भले-बुरे ग्रह बतला कर कुछ धमकी भी दिखला देते थे या सुंदर कवित्त और श्लोक पढ़कर उसके चित्त को लुभाते थे, कभी वे दीन-दुखी दिखलाई देते जिन पर राजा के कारदार ज़ुल्म किया करते थे और उसने कुछ भी उसकी तहक़ीक़ात और उपाय न की, कभी उन बीमारों को देखता जिनका चंगा करा देना राजा के इख़्तियार में था, कभी वे व्यथा के जले और विपत्ति के मारे दिखलाई देते जिनका जी राज के दो बात कहने से ठंडा और संतुष्ट हो सकता था, कभी अपने लड़के और लड़कियों को देखता जिन्हें वह पढ़ा-लिखा कर अच्छी-अच्छी बातें सिखा कर बड़े-बड़े पापों से बचा सकता था, कभी उन गाँव और इलाकों को देखता जिनमें कूप तालाब खुदवाने और किसानों को मदद देने और उन्हें खेती-बारी की नई-नई तरकीबें बतलाने से हज़ारों ग़रीबों का भला कर सकता था, उन टूटे हुए पुल और रास्तों को देखता जिन्हें दुरुस्त करने से वह लाखों मुसाफ़िरों को आराम पहुँच सकता था। राजा से अधिक देखा न जा सका। थोड़ी ही देर में घबरा कर हाथों से अपनी आँखों को ढाप लिया। वह अपने घमंड में उन सब कामों को तो सदा याद रखता था और उनकी चर्चा किया करता जिन्हें वह अपनी समझ में पुण्य के निमित्त किए हुए समझा था पर उन कर्तव्य कामों का कभी टुक सोच न किया जिन्हें अपनी उन्मत्तता से अचेत होकर छोड़ दिया था।

 

सत्य बोला, राजा, अभी से क्यों घबरा गया, आ इधर आ, इस दूसरे आइने में मैं तुझे अब उन पापों को दिखलाता हूँ जो तूने अपनी उम्र में किए हैं। राजा ने हाथ जोड़े और पुकारा कि बस महाराज, बस कीजिए, जो कुछ देखा उसी में मैं तो मिट्टी हो गया, कुछ भी बाक़ी न रहा, अब आगे क्षमा कीजिए। पर यह तो बतलाइए कि आपने यहाँ आकर मेरे शर्बत में क्यों ज़हर घोला और पकी-पकाई खीर में साँप का विष उगला और आपने मेरे आनंद को इस मंदिर में आके नाश में मिलाया जिसे मैंने सर्वशक्तिमान् भगवान् के अर्पण किया है, चाहे जैसा वह बुरा और अशुद्ध क्यों न हो पर मैंने तो उसी के निमित्त बनाया है। सत्य ने कहा, ठीक पर यह तो बतला कि भगवान इस मंदिर में बैठा है? यदि तूने भगवान को इस मंदिर में बैठाया होता तो फिर वह अशुद्ध क्यों रहता। ज़रा आँख उठाकर उस मूर्ति को तो देख जिसे तू जन्म-भर पूजता रहा है। राजा ने आँख उठाई तो क्या देखता है कि वहाँ उस बड़ी ऊँची बेदी पर उसी की मूर्ति पत्थर की गढ़ी हुई रखी है और अभिमान की पगड़ी बांधे हुए है। सत्य ने कहा कि मूर्ख, तूने जो काम किए केवल अपनी प्रतिष्ठा के लिए। इसी प्रतिष्ठा प्राप्त होने की सदा तेरी भावना रही और इसी प्रतिष्ठा के लिए तूने अपनी आप पूजा की। रे मूर्ख, सकल जगत्स्वामी घटघट अंतर्यामी क्या ऐसे मन रूपी मंदिर में भी अपना सिंहासन बिछने देता है जो अभिमान और प्रतिष्ठा-प्राप्ति की इच्छा इत्यादि से भरा है। ये तो उसकी जली पड़ने योग्य हैं। सत्य का इतना कहना था कि सारी पृथ्वी एकबारगी काँप उठी मानो उसी दम टुकड़ा-टुकड़ा होना चाहती थी। आकाश में ऐसा शब्द हुआ कि जैसा प्रलय काल का मेघ गरजा। मंदिर की दीवार चारों ओर से अड़अड़ा गिर पड़ी मानों उस पापी राजा को दबा लेना चाहती थी और उस अहंकार की मूर्ति पर ऐसी एक बिजली गिरी कि वह धरती पर औधें मुँह आ पड़ी। 'त्राहि त्राहि माम्, मैं डूबा' कहके भोज जो चिल्लाया, आँख उसकी खुल गई और सपना सपना हो गया।

इस अर्से में रात बीतकर आस्मान के किनारों पर लाली दौड़ हुई थी। चिड़िया चहचहा रही थी। एक ओर से शीतल मंद सुगंध पवन चली थी दूसरी ओर से बीन और मृदंग की ध्वनि। बंदीजन राजा का जस गाने लगे, हरकारे हर तरफ़ काम को दौड़े, कमल खिले, कुमुद कुम्हालाए। राजा पलंग से उठा, पर जी भारी, माथा थामे हुए। न हवा अच्छी लगती थी न गाने बजाने की सुध-बुध थी। उठते ही पहले यह हुक्म दिया कि इस नगर में जो अच्छे पंडित हों, जल्द उनको मेरे पास लाओ, मैंने एक सपना देखा है कि जिसके आगे अब या सारा राग सपना मालूम होता है। उस सपने के स्मरण से ही मेरे रोंगटे खड़े हुए होते हैं। राजा के मुख से हुक्म निकलने की देर थी, चोबदार ने तीन पंडितों को उस समय वशिष्ठ, याज्ञवलक्य और बृहस्पति के समान प्रख्यात थे, बात-की-बात में राजा के सामने ला खड़ा किया। राजा का मुँह पीला पड़ गया था। माथे पर पसीना हो आया था, पूछा कि वह कौन-सा उपाय है जिससे यह पापी मनुष्य ईश्वर के कोप से छुटकारा पावे। उनमें से एक बड़े बूढ़े पंडित ने आशीर्वाद देकर निवेदन किया कि धर्मराज धर्मावतार, यह भय तो आपके शत्रुओं को होना चाहिए, आपसे पवित्र पुण्यात्मा के जी में ऐसा संदेह क्यों उत्पन्न हुआ? आप अपने पुण्य के प्रभाव का जामा पहन के बे-खटके परमेश्वर के सामने जाइए, न तो वह कहीं से फटा-फटा है और न किसी जगह से मैला-कुचैला हुआ है। राजा क्रोध करके बोला कि बस अधिक अपनी वाणी को परिश्रम न दीजिए और इसी दम अपने घर की राह लीजिए। क्या आप फिर उस पर्दे को डालना चाहते हैं जो सत्य ने मेरे सामने से हटाया और बुद्धि की आँखों को बंद करना चाहते हैं जिन्हें सत्य ने खोला! उस पवित्र परमात्मा के सामने अन्याय कभी नहीं ठहर सकता। मेरे पुण्य का जामा उसके आगे निरा चीथड़ा है। यदि वह मेरे कामों पर निगाह करेगा तो नाश हो जाऊँगा, मेरा कहीं पता भी न लगेगा। इसी में दूसरा पंडित बोल उठा कि महाराज, परब्रह्म परमात्मा जो आनंद-स्वरूप है, उसकी दया के सागर का कब किसी ने वारापार पाया है! वह क्या हमारे इन छोटे-छोटे कामों पर निगाह किया करता है! एक कृपा-दृष्टि से सारा बेड़ा पार लगा देता है। राजा ने आँखें दिखला के कहा कि महाराज, आप भी अपने घर को सिधारिए, आपने ईश्वर को ऐसा अन्याई ठहरा दिया कि वह किसी पापी को सज़ा नहीं देता है, सब धान बाईस पसेरी तोलता है मानो हरभोंगपुर का राज करता है। इसी संसार में क्यों नहीं देख लेते, जो आम बोता है वह आम खाता है और जो बबूल लगाता है वह काँटे चुनता है, तो क्या उस लोक में जो जैसा करेगा सर्वदर्शी घटघट अंतर्यामी से उसका बदला वैसा ही न पावेगा? सारी सृष्टि पुकारे कहती है और हमारा अंत:करण भी इस बात पर गवाही देता है कि ईश्वर अन्याय नहीं करेगा। जो जैसा करेगा वैसा ही उससे उसका बदला पावेगा। अब तीसरा पंडित आगे बढ़ा यूँ ज़बान खोली कि महाराजाधिराज, परमेश्वर के यहाँ से हम लोगों को वैसा ही बदला मिलेगा कि जैसा हम लोग काम करते हैं, इसमें कुछ भी संदेह नहीं। आप यथार्थ फ़रमाते हैं परमेश्वर अन्याय कभी नहीं करेगा पर यह इतने प्रायश्चित्त और होम और यज्ञ और जप-तप तीर्थयात्रा किस लिए बनाए गए हैं? यह इसीलिए हैं कि जिसमें परमेश्वर हम लोगों का अपराध क्षमा करे और वैकुंठ में अपने पास रहने को ठौर देवे। राजा ने कहा, देवताजी, कल तो मैं आपकी सब बात मान सकता था लेकिन अब तो मुझे इन कामों में भी ऐसा कोई नहीं दिखलाई देता जिसके करने से यह पापी मनुष्य पवित्र पुण्यात्मा हो जावे। वह कौन-सा जप-तप, तीर्थयात्रा, होम-यज्ञ और प्रायशिचत्त है जिसके करने से हृदय शुद्ध हो और अभिमान न आ जावे। आदमी को फुसला लेना तो सहज है पर उस घटघट के अंतर्यामी को कोई क्योंकर फुसलावे! जब मनुष्य का मन ही पाप से भरा हुआ है तो फिर उससे पुण्यकर्म कोई कहाँ बन आवे। पहल आप उस स्वप्न को सुनिए जो रात को देखा है तब फिर पीछे वह उपाय बतलाइए जिससे पापी मनुष्य ईश्वर के कोप से छुटकारा पाता है।

 

निदान राजा ने जो कुछ रात को स्वप्न में देखा था सब ज्यों का ज्यों उस पंडित को कह सुनाया। पंडित जी तो सुनते ही आवाक् हो गए, सिर झुका लिया। राजा ने निराश होकर चाहा कि तुषानल में जल मरे, पर एक परदेसी आदमी-सा जो उन पंडितों के साथ बिना बुलाए घुस आया था सोचता-विचारता उठ खड़ा हुआ और धीरे-से यूँ निवेदन किया कि महाराज, हम लोगों का कर्ता ऐसा दीनबंधु कृपासिंधु है कि अपने मिलने की राह पाने की सच्चे जी से मदद माँगिए। हे पाठकजनो, क्या तुम भी भोज की तरह ढूँढ़ते हो और भगवान् से उसके मिलने की प्रार्थना करते हो? भगवान् तुम्हें शीघ्र ऐसी बुद्धि दे और अपनी राह पर चलावे, यही हमारा अत:करण से आशीर्वाद है।

जिन ढूँढ़ा तिन पाइया गहरे पानी पैठ।

 

राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद

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शनिवार, 10 मई 2014

मई दिवस : इतिहास यात्रा : एरिक हॉब्सबॉम

'प्रख्यात ब्रिटिश इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉम अपने प्रगतिशील इतिहास लेखन के लिये जाने जाते हैं। लगभग पाँच दशकों तक ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी से सक्रिय रूप से जुड़े रहने वाले हॉब्सबॉम ने फ्रांस की राज्यक्रांति के बाद आने वाली दुनिया का वृहत्तर इतिहास चार खण्डों-क्रमश:, दी एज ऑफ रिवोल्यूशन, दी ऐज ऑफ कैपिटल, दी एज ऑफ इम्पायर और दी एज ऑफ इक्ट्रीम्स में प्रकाशित किया है, जो अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। इसके अतिरिक्त उन्होंने इतिहास से जुड़े हुए व्यक्तियों, घटनाओं पर प्रभूत लेखन किया है। प्रस्तुत लेख उनकी पुस्तक 'अनकॉमन पीपुलÓ (असाधारण लोग) में संग्रहीत है।
हॉब्सबॉम ने यह लेख 1990 में मई दिवस की शतवार्षिकी के अवसर पर लिखा था। 1990 के बाद पिछले लगभग ढाई दशकों में भूमण्डलीकरण, उदारीकरण और बाजारीकरण के स्तंभों पर टिकी एक नई विश्वव्यवस्था के अस्तित्व में आ जाने की लगातार घोषणा समारोहपूर्वक की जा रही है। इतिहास को मृत अथवा मरणासन्न घोषित किया जा चुका है, राजनैतिक वाम लहूलुहान और विखण्डित हो चुका है, क्रांति की अवधारणा या तो पूरी तरह खारिज की जा चुकी है अथवा अधिरचना तक सीमित हो गई है; लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर बाजार की शक्तियों का पूर्ण अधिपत्य हो चुका है, शोषण, वंचना, अन्याय जैसे शब्द नये रंग-रोगन में अपनी परिवर्तनकारी अंर्तध्वनियों से महरूम कर दिये गये हैं, सपनों पर उपभोक्तावाद के पहरेदारों ने मोर्चा संभाल लिया है। ऐसे में, किसी ऐसी परिवर्तनकामी घटना का स्मरण जिसको पृथ्वी के अकिंचनों ने अंजाम दिया था, आज के उदास सन्नाटापूर्ण माहौल में थोड़ी सी ही सही झनझनाहट तो पैदा ही करता है। इसी झनझनाहट में पाठकों को सहभागी बनाने के लिए इस लेख का सारांश यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।
1990 में माइकेल इग्नतीफ ने 'आब्जर्वर में लिखते हुए यह टिप्पणी की थी कि धर्म-निरपेक्ष समाज धार्मिक अनुष्ठानों के विकल्प देने में कभी भी सफल नहीं हुए हैं। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने यह भी कहा कि संभव है फ्रांस की राज्य क्रांति ने गुलामों को नागरिक बना दिया हो, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे शब्द को प्रत्येक स्कूल में खुदवा दिया हो और मठों (गिरजाघरों) को मलबे में बदल दिया हो लेकिन जुलाई की 14 तारीख के अलावा पुराना ईसाई कैलेण्डर ज्यों का त्यों बना रहा। प्रस्तुत लेख में मेरा विषय है ईसाई अथवा किसी अन्य आधिकारिक कैलेण्डर में किसी धर्मनिरपेक्ष आंदोलन द्वारा किया गया शायद पहला हस्तक्षेप। अर्थात् अवकाश का एक ऐसा दिन जो एक या दो देशों में ही नहीं, अपितु 1990 में आधिकारिक तौर से 107 सरकारों द्वारा मान्यता पा चुका है। इससे भी बड़ी बात यह है कि अवकाश का यह दिन किसी सरकार अथवा विजेता ने घोषित नहीं किया था अपितु इसका जन्म हुआ था गरीब स्त्री-पुरुषों के एक पूर्ण रूप से अनौपचारिक आंदोलन की कोख से। मैं बात कर रहा हूं मई दिवस अथवा, और सटीक ढंग से, मई मास के पहले दिन की, मजदूर आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय पर्व की जिसका शताब्दी समारोह 1990 में मनाया जाना चाहिए था क्योंकि इसका प्रारम्भ हुआ था 1890 में।
''मनाया जाना चाहिये थाÓÓ बहुत ठीक कहा है मैंने क्योंकि इतिहासकारों के अलावा शायद किसी ने भी इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई, यहां तक कि समाजवादी दलों ने भी नहीं जो कि उनके वशंज हैं जिन्होंने 1889 में, जिसे द्वितीय इंटरनेशनल कहा जाता है, उस महासम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय मजदूरों में मई 1890 में कार्य-दिवस को 8 घण्टे तक सीमित करने के पक्ष में प्रदर्शन करने की अपील की थी। यह बात उन दलों के लिये भी सही है जो 1889 में महासम्मेलन में अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से थे और जो आज भी अस्तित्व में है द्वितीय इंटरनेशनल में भागीदारी करने वाले दल अथवा उनके उत्तराधिकारी ही आज पश्चिम यूरोप में सरकारों, मुख्य विरोधी दलों अथवा उनके उत्तराधिकारी ही आज पश्चिम यूरोप में सरकारों, मुख्य विरोधी दलों अथवा वैकल्पिक सरकारों के प्रतिनिधि चुनते हैं। इन दलों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे अपना गौरव-बोध अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में दिखाए अथवा उसमें कम से कम अपनी रुचि तो प्रकट करें ही।
मई दिवस की शतवार्षिकी को लेकर ब्रिटन में सबसे कड़ा प्रतिवाद किया था सेना के एक पूर्व जनरल और लंदन विश्वविद्यालय के एक कॉलेज के पूर्व प्रधान सर जॉन हैकिट ने। उन्होंने मई दिवस खत्म करने की पहल इसलिए की थी क्योंकि इसे वे एक प्रकार का सोवियत हस्तक्षेप अथवा साम्यवादी विचारधारा का प्रतीक मानते थे उनका विचार था कि अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद के खात्मे के बाद मई दिवस को जीवित रखने का काई औचित्य नहीं रह गया है। लेकिन 'यूरोपियन कम्यूनिटीÓ के बासंती मई दिवस के जन्म को बोल्शेविकों से काई संबंध नहीं है। यह कमाल समाजवाद-विरोधी राजनीतिज्ञों का था जिन्होंने यह जान लिया था कि किस तरह मई दिवस यूरोप के मजदूर वर्ग की चेतना में गहरे बैठा है और इसका विरोध करने के लिए उन्होंने मई दिवस के ही दिन एक नया त्यौहार मनाने का निश्चय किया ताकि लोग मई दिवस का मजदूर वर्गों से नाता भूल जाय। यहां फ्रेंच सांसदों द्वारा अप्रैल 1920 में जारी एक प्रस्ताव का जिक्र किया जा सकता है जिस पर हस्ताक्षर करने वालों के बीच सहमति का एक ही आधार था और वह यह कि सभी के सभी समाजवाद के विरोधी थे। प्रस्ताव के अनुसार, ''इस अवकाश के साथ किसी भी प्रकार की ईष्र्या अथवा घृणा का भाव नहीं होना चाहिए (वर्ग संघर्ष/के लिए यह एक प्रकार की कूट शब्दावली थी)। सभी वर्ग, अगर अब भी वर्गों का अस्तित्व है तो, और देश की सभी उत्पादी ऊर्जायें एक ही विचार और एक ही आदर्श से प्रेरित होकर एकजुट हो जाएं।
यूरोपियन कम्यूनिटी के जन्म के पहले मई दिवस के साथ घाल-मेल करने में सबसे पीछे थे धुर दक्षिणपंथी, न कि वामपंथी। सोवियत संघ के बाद हिटलर की सरकार पहली थी जिसने मई दिवस को अधिकारिक राष्ट्रीय श्रमिक दिवस घोषित किया। मार्शल पेतिन की विचो सरकार ने पहली मई को श्रम और सहयोग के त्योहार के रूप में मान्यता दी और ऐसा माना जाता है कि इसकी प्रेरणा पेतिन का स्पेन की तानाशाह जनरल फ्रांको से मिली थी क्योंकि उस समय पेतिन जो फ्रांको के प्रशंसक थे स्पेन में फ्रांस के राजदूत थे। सचतो यह है कि मई दिवस पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा करने वाली यूरोपियन इकोनामिक कम्यूनिटी के अधिकांश सदस्य समाजवाद-विरोधी थे तो भी उन्होंने मार्गरेट थैचर के विरोध की परवाह न करते हुए इसकी घोषणा की। पश्चिमी देशों के आधिकारिक मई दिवस अनौपचारिक मई दिवसों की परंपरा को समझने और इसे मजदूर आंदोलनों, वर्ग-चेतना और वर्ग-संघर्ष से अलग करने के प्रयास थे। लेकिन ऐसा कैसे हो गया कि यह परंपरा इतनी जबर्दस्त साबित हुई कि इसके शत्रुओं को भी इसे स्वीकार करने के बारे में सोचना पड़ा जबकि उसी समय समाजवाद के प्रचंड विरोधी हिटलर, फ्रांको और पेतिन समाजवादी  मजदूर  आंदोलन को समूल नष्ट करने में लगे हुए थे?

मई दिवस के संस्थानीकरण का असाधारण पहलू यह है कि यह किसी योजनाबद्ध क्रम से नहीं हुआ और इस तरह इसे किसी अर्थ में कोई आविष्कृत परंपरा न मानकर एक अचानक होने वाला विस्फोट माना जाना चाहिए। अवसर था फ्रांस की राज्यक्रांति के शताब्दी वर्ष में पेरिस में आयोजित द्वितीय इण्टरनेशनल जिसे माक्र्सवादी इण्टरनेशलन भी कहा जाता है। इसी अवसर पर इण्टरनेशलन में दो संस्थापक लेकिन प्रतिद्वन्द्वी कांग्रेसों में से एक के द्वारा पारित ऐसा प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया जिसके अनुसार एक निश्चित तिथि पर विश्व भर में मजदूरों का प्रदर्शन आयोजित किया जाना चाहिये जिसमें वे अपने-अपने मालिकों (सरकारी और निजी) से 8 घण्टे प्रतिदिन काम करने के वैधानिक अधिकार की मांग करें और चूंकि अमरीकी मजदूर महासंघ ने पहले से ही 1 मई, 1890 को प्रदर्शन का निर्णय ले लिया था अत: इसी दिन को अंतरराष्ट्रीय मजदूर प्रदर्शन के लिए भी चुन लिया गया। इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि अमेरिीका में मई दिवस ने उतनी लोकप्रियता नहीं पाई जितनी अन्य देशों में लेकिन इसका कारण यह था कि वहां पहले से ही सितम्बर मास का पहला सोमवार अधिकारिक रूप से श्रमिक दिवस के रूप में सार्वजनिक अवकाश का दिन मौजूद था।
मई दिवस के पहले ब्रिटेन सहित लगभग सभी देशों में अवकाश धार्मिक अवसरों पर ही होते थे। ब्रिटेन में यूरोपीय समुदाय का मई दिवस बैंक अवकाश में शामिल कर लिया गया है। धार्मिक अवकाश और मई दिवस दोनों में सार्वदेशिकता की आकांक्षा थी जिसे श्रमिक शब्दावली में अंतरराष्ट्रीतावाद कह सकते हैं। सार्वदेशिकता ने इसमें शामिल होने के लिये लोगों को उत्साहित किया और इस दिन के आकर्षण को बढ़ाया। इस अवसर के सांस्कृतिक इतिहास और चित्रांकन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण मई दिवस पर निकाले जाने वाले लंबे पन्नों चित्रांकन के लिये अत्याधिक महत्वपूर्ण मई दिवस पर निकाले जाने वाले लंबे पन्नों  वाले असंख्य अखबार इस बात के प्रमाण हैं। फासिस्ट-पूर्व इटली के 308 ऐसे अखबारों को आज भी सुरक्षित रखा गया है। 1891 में बोलोग्ना से प्रकाशित पहले मई दिवस विशेषांक में इस अवसर की सार्वदेशिकता पर लेख छपे हैं। ईस्टर और हिटसन जैसै धार्मिक पर्वों पर निकलने वाले विशेषांकों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में मनाये जाने वाले वसंतोत्सव में मई दिवस के समारोहों की समानता स्पष्ट है।
कैथोलिक समुदायों और अशिक्षित वर्गों के बीच मई दिवस की लोकप्रियता का एक प्रमाण यह भी है कि इतावली समाजवादी लोग 1811 के पश्चात् मई दिवस के लिए 'श्रमिकों का ईस्टरÓ नाम का प्रयोग करते थे टोर इस तरह के नाम 19वीं सदी के नब्बे के दशक के मध्य से ही बहुत लोकप्रिय हो गए थे और इसके कारण भी साफ हैं। किसी धार्मिक आंदोलन अथवा पुनरूथानवादी धार्मिक आंदोलन से मई दिवस की तुलना, विशेष रूप से प्रारंभिक उत्साह के वर्षों के मई दिवस की तुलना, ठीक ही थी क्योंकि मई दिवस से उसी प्रकार की आशा श्रमिकों के मन में हिलोरें ले रही थीं जैसे किसी मसीहा की भविष्यवाणी से विश्वासी लोगों के मन में होती है।
समाजवादी मजदूर आंदोलन के लिए लोकतंत्र का केन्द्रीय महत्व था। यही नहीं कि मजदूर आंदोलन के लिए यह अनिवार्य था अपितु दोनों को अलग ही नहीं किया जा सकता था। जर्मनी में प्रथम मई दिवस की स्मृति में एक ताम्रपत्र तैयार किया गया था जिसमें एक ओर कार्ल माक्र्स का चित्र था तो दूसरी ओर स्वतंत्रता की मूर्ति का। 1891 के आस्ट्रियाई प्रतिचित्र में कार्ल माक्र्स अपनी पुस्तक पूँजी की प्रति हाथ में लेकर एक खूबसूरत टापू की ओर संकेत कर रहे हैं। जिसकी पृष्ठभूमि में मई दिवस का उगता हुआ सूर्य दिखाई दे रहा है, जो भविष्य की ओर संकेत करने वाला बहुत ही लोकप्रिय प्रतीक सिद्ध हुआ। सूर्य की किरणें फ्रांस की राज्यक्रांति के तीन नारे समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की प्रतीक हैं। मई दिवस के तमाम पुराने स्मृति चिन्हों में ये नारे दिखाई पड़ते हैं। माक्र्स ऐसे मजदूरों से घिरे हुए हैं जो उस टापू की ओर जाने वाले जहाज को चलाने के लिए तत्पर हैं। जहाज के मस्तूलो पर लिखा है: ''सभी को प्रत्यक्ष मताधिकार, आठ घण्टे प्रतिदिन श्रम और श्रमिकों की सुरक्षा। मई दिवस की यही मौलिक परंपरा थी।
जो भी हो, वह स्वर्ण युग नहीं आया ओर मजदूर आंदोलनों की तमाम बातों की तरह मई दिवस भी नियमित और संस्थानीकृत हो गया हालांकि महान संघर्षों और विजयों के पश्चात आगे आने वाले वर्षों में विजय और उम्मीद के पुराने विस्फोट का संकेत इसमें अवश्य ही वापस लौटा। रूसी क्रांति के प्रारंभिक वर्षों में दीवानगी से मनाए जाने वाले मई दिवसों में इसकी झलक देखी जा सकती है और यूरोप में 1919-20 के दौरान लगभग हर जगह यह उत्साह तब देखने को मिला जब आई घण्टे के कार्य दिवस के पहले मई दिवस की माँग मान ली गई। 1934-35 में फ्रांस में लोकप्रिय मोर्चे की सरकार के शुरूआती दिनों में भी इसकी झलक मिली और फासीवाद की पराजय और जबर्दस्ती अधिकृत किए गए यूरोप के अन्य क्षेत्रों की मुक्ति के समय भी ऐसा ही नजारा देखने को मिला। फिर समाजवादी मजदूर आंदोलन वाले तमाम देशों में 1914 के कुछ पहले ही मई दिवस रूटीन में शामिल हो गया।
जिस समाज ने मई दिवस को जन्म दिया वह अब बदल गया है। उस पुराने सर्वहारा ग्रामीण समुदाय का जो बूढ़े इतावली लोगों की यादगार में अभी भी बसा हो सकता है आज क्या महत्व रहा गया है? एक वृद्ध इतावली श्रमिक के अनुसार ''हम लोग पूरे गांव का चक्कर लगाते थे। फिर सार्वजनिक भोज होता था। दल के सभी सदस्य तथा जो लोग आना चाहते थे, सभी लोग मौजूद रहते थे। औद्योगिक देशों में उन लोगों का क्या हुआ जो 1890 के दशक में भी अपने को इंटरनेशनल के उस नारे में खोजते थे जिसके शब्द थे: ''और दुनिया के भूखे, नंगे, नींद से जागो? इटली में 1920 के मई दिवस से कुछ ही पहले चालू हुई एक मिल की एक (उस समय) बारह वर्षीय टेक्सटाइल मजदूर लड़की ने 1980 में उन दिनों को याद करते हुए कहा था, ''आज तो काम पर जाने वाले लोग भद्र स्त्री-पुरुष होते हैं और वे जो भी मांगते हैं उन्हें मिल जाता है। भविष्य में तथा तर्क और तरक्की की विजय में विश्वास जगाने वाले और अखबार मुक्ति के हथियार हैं, विज्ञान और कला के झरने का पानी पियो, न्याय का प्रसार करने में तब तुम काफी मजबूर बन जाओगे। अपनी प्यारी और हरी-भरी धरती पर स्वर्ण उतारने के हमारे सामूहिक स्वप्न का क्या हुआ?
लेकिन बावजूद इन सारी बातों के, अगर आज मई दिवस एक अवकाश से अधिक कुछ नहीं रह गया है, एक फ्रेंच विज्ञापन के अनुसार एक ऐसा दिन जब हमें नींद की गोली नहीं लेनी पड़ती क्योंकि इस दिन में हमें काम नहीं करना होता है। तो भी यह बहुत ही खास किस्म का अवकाश-दिवस बना हुआ है। सच है कि अब यह ''कैलेण्डर से बाहर अवकाश का दिन नहीं रहा जिसे कभी बड़े गर्व से कहा जाता था क्योंकि यूरोप में (और तमाम अन्य देशों में भी) अब यह कैलेण्डर का हिस्सा बन चुका है। (यूरोप में) 25 दिसम्बर और 1 जनवरी को छोड़कर सारे दिनों में से मात्र यही एक ऐसा दिन है जब सारी दुनिया में मजदूर अपना काम बंद कर देते हैं। इस तरह इसने धार्मिक अवकाश के दिनों के अपने मित्रों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। लेकिन इसकी शुरूआत नीचे से (अर्थात् मजदूरों से) हुई। इसे उन अनाम मजदूरों ने स्वयं बनाया जिन्होंने इसके माध्यम से पेशा, भाषा, यहां तक कि राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर एक वर्ग के रूप में अपने को पहचाना और वर्ष भर मेें एक दिन काम न करने के लिए जान-बूझ कर निर्णय किया : श्रम करने की नैतिक, राजनैतिक और आर्थिक अनिवार्यता का दर्प भंग किया। विक्टर अडलर ने नैतिक, राजनैतिक और अर्थिक अनिवार्यता का दर्प भंग किया। विक्टर अडलर ने 1893 में कहा था : ''मई अवकाश का, काम से विश्राम का यही अर्थ है जिससे हमारे विरोधी डरते हैं। यह है जिसे वे क्रांतिकारी मानते हैं।

अनुवाद
रामकीर्ति शुक्ल
 (साभार: अभिनव कदम-30)(देशबन्धु)

सोमवार, 21 अप्रैल 2014

छूट गए लोगों की याद

पेड़, खंबे, खेत, पहाड़ और स्टेशन
छूटते जाते हैं सब यात्रा में
पर साथ चलते जाते हैं
आसमान, तारे, बादल, रेल की पटरी
और पीछे छूट गये लोगों की याद
                                  (कृष्ण धर शर्मा, २०१३)

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

डॉ॰ भीमराव रामजी आंबेडकर

डॉ॰ भीमराव रामजी आंबेडकर का जन्म १४ अप्रैल , १८९१ में मऊ में हुआ था तथा मृत्यु  ६ दिसंबर , १९५६ में दिल्ली में हुई थी। वे एक भारतीय विधिवेत्ता तथा बहुजन राजनीतिक नेता, और एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी होने के साथ साथ, भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार भी थे। उन्हें बाबासाहेब के लोकप्रिय नाम से भी जाना जाता है। इनका जन्म एक गरीब अस्पृश्य परिवार मे हुआ था। बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना सारा जीवन हिंदू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली, और भारतीय समाज में सर्वव्यापित जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। हिंदू धर्म में मानव समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया है। उन्हें बौद्ध महाशक्तियों के दलित बौद्ध आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। बाबासाहेब अम्बेडकर को भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया है, जो भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है।
कई सामाजिक और वित्तीय बाधाएं पार कर, आंबेडकर उन कुछ पहले अछूतों मे से एक बन गये जिन्होने भारत में कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। आंबेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही विधि, अर्थशास्त्र व राजनीति विज्ञान में अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं। आंबेडकर वापस अपने देश एक प्रसिद्ध विद्वान के रूप में लौट आए और इसके बाद कुछ साल तक उन्होंने वकालत का अभ्यास किया। इसके बाद उन्होंने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया, जिनके द्वारा उन्होंने भारतीय अस्पृश्यों के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की। डॉ. आंबेडकर को भारतीय बौद्ध भिक्षुओं ने बोधिसत्व की उपाधि प्रदान की है, हालांकि उन्होने खुद को कभी भी बोधिसत्व नहीं कहा।

भीमराव आम्बेडकर
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पूरा नाम बाबासाहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर
अन्य नाम बाबासाहेब
जन्म 14 अप्रैल, 1891
जन्म भूमि मऊ, मध्य प्रदेश
मृत्यु 6 दिसंबर, 1956
मृत्यु स्थान दिल्ली
मृत्यु कारण स्वास्थ्य ख़राब
अविभावक रामजी मालोजी सकपाल, भीमाबाई मुरबादकर
पति/पत्नी रमाबाई
नागरिकता भारतीय
पार्टी स्वतंत्र लेबर पार्टी
पद अध्यक्ष- स्वतंत्र लेबर पार्टी
विद्यालय एलिफिन्सटन कॉलेज, कोलंबिया विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स
शिक्षा एम.ए. (अर्थशास्त्र), पी एच. डी., एम. एस. सी., बार-एट-लॉ
भाषा हिंदी, अंग्रेज़ी
पुरस्कार-उपाधि भारत रत्न
कार्यक्षेत्र बड़ौदा राज्य के मिलिटरी सेक्रेटरी, अर्थशास्त्र के प्रोफेसर, प्रधानाचार्य
रचनाएँ 'डॉ. बाबा साहब आम्बेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज' (अंग्रेज़ी), बाबा साहब डॉक्टर आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय (हिन्दी), जाति के विनाश
अन्य जानकारी आम्बेडकर विधि विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री, इतिहास विवेचक और धर्म और दर्शन के विद्वान थे।

प्रारंभिक जीवन

भीमराव रामजी आंबेडकर का जन्म ब्रिटिशों द्वारा केन्द्रीय प्रांत ( अब मध्य प्रदेश में ) में स्थापित नगर व सैन्य छावनी मऊ में हुआ था। वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई मुरबादकर की १४ वीं व अंतिम संतान थे। उनका परिवार मराठी था और वो अंबावडे नगर जो आधुनिक महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले मे है, से संबंधित था। वे हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो अछूत कहे जाते थे और उनके साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था। अम्बेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे, और उनके पिता,भारतीय सेना की मऊ छावनी में सेवा में थे और यहां काम करते हुये वो सूबेदार के पद तक पहुँचे थे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक शिक्षा की डिग्री प्राप्त की थी। उन्होने अपने बच्चों को स्कूल में पढने और कड़ी मेहनत करने के लिये हमेशा प्रोत्साहित किया।
कबीर पंथ से संबंधित इस परिवार में, रामजी सकपाल, अपने बच्चों को हिंदू ग्रंथों को पढ़ने के लिए, विशेष रूप से महाभारत और रामायण प्रोत्साहित किया करते थे। उन्होने सेना मे अपनी हैसियत का उपयोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से शिक्षा दिलाने मे किया, क्योंकि अपनी जाति के कारण उन्हें इसके लिये सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था। स्कूली पढ़ाई में सक्षम होने के बावजूद आंबेडकर और अन्य अस्पृश्य बच्चों को विद्यालय मे अलग बिठाया जाता था और अध्यापकों द्वारा न तो ध्यान ही दिया जाता था, न ही कोई सहायता दी जाती थी। उनको कक्षा के अन्दर बैठने की अनुमति नहीं थी, साथ ही प्यास लगने प‍र कोई ऊँची जाति का व्यक्ति ऊँचाई से पानी उनके हाथों पर पानी डालता था, क्योंकि उनको न तो पानी, न ही पानी के पात्र को स्पर्श करने की अनुमति थी। लोगों के मुताबिक ऐसा करने से पात्र और पानी दोनों अपवित्र हो जाते थे। आमतौर पर यह काम स्कूल के चपरासी द्वारा किया जाता था जिसकी अनुपस्थिति में बालक आंबेडकर को बिना पानी के ही रहना पड़ता था। १८९४ मे रामजी सकपाल सेवानिवृत्त हो जाने के बाद सपरिवार सतारा चले गए और इसके दो साल बाद, अम्बेडकर की मां की मृत्यु हो गई। बच्चों की देखभाल उनकी चाची ने कठिन परिस्थितियों में रहते हुये की। रामजी सकपाल के केवल तीन बेटे, बलराम, आनंदराव और भीमराव और दो बेटियाँ मंजुला और तुलासा ही इन कठिन हालातों मे जीवित बच पाये। अपने भाइयों और बहनों मे केवल अम्बेडकर ही स्कूल की परीक्षा में सफल हुए और इसके बाद बड़े स्कूल मे जाने में सफल हुये। अपने एक देशस्त ब्राह्मण शिक्षक महादेव अम्बेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे के कहने पर अम्बेडकर ने अपने नाम से सकपाल हटाकर अम्बेडकर जोड़ लिया जो उनके गांव के नाम "अंबावडे" पर आधारित था।
रामजी सकपाल ने १८९८ मे पुनर्विवाह कर लिया और परिवार के साथ मुंबई (तब बंबई )चले आये। यहाँ अम्बेडकर एल्फिंस्टोन रोड पर स्थित गवर्न्मेंट हाई स्कूल के पहले अछूत छात्र बने। पढा़ई में अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के बावजूद, अम्बेडकर लगातार अपने विरुद्ध हो रहे इस अलगाव और, भेदभाव से व्यथित रहे। १९०७ में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद अम्बेडकर ने बंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और इस तरह वो भारत में कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य बन गये। उनकी इस सफलता से उनके पूरे समाज मे एक खुशी की लहर दौड़ गयी , और बाद में एक सार्वजनिक समारोह उनका सम्मान किया गया इसी समारोह में उनके एक शिक्षक कृषणजी अर्जुन केलूसकर ने उन्हें महात्मा बुद्ध की जीवनी भेंट की, श्री केलूसकर, एक मराठा जाति के विद्वान थे। अम्बेडकर की सगाई एक साल पहले हिंदू रीति के अनुसार दापोली की, एक नौ वर्षीय लड़की, रमाबाई से तय की गयी थी। १९०८ में, उन्होंने एलिफिंस्टोन कॉलेज में प्रवेश लिया और बड़ौदा के गायकवाड़ शासक सहयाजी राव तृतीय से संयुक्त राज्य अमेरिका मे उच्च अध्धयन के लिये एक पच्चीस रुपये प्रति माह का वजीफा़ प्राप्त किया। १९१२ में उन्होंने राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में अपनी डिग्री प्राप्त की, और बड़ौदा राज्य सरकार की नौकरी को तैयार हो गये। उनकी पत्नी ने अपने पहले बेटे यशवंत को इसी वर्ष जन्म दिया। अम्बेडकर अपने परिवार के साथ बड़ौदा चले आये पर जल्द ही उन्हें अपने पिता की बीमारी के चलते बंबई वापस लौटना पडा़, जिनकी मृत्यु २ फरवरी १९१३ को हो गयी।

शिक्षा

1922 में एक वकील के रूप में अम्बेडकर
गायकवाड शासक ने संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय मे जाकर अध्ययन के लिये अम्बेडकर का चयन किया गया साथ ही इसके लिये एक ११.५ डॉलर प्रति मास की छात्रवृत्ति भी प्रदान की। न्यूयॉर्क शहर में आने के बाद, अम्बेडकर को राजनीति विज्ञान विभाग के स्नातक अध्ययन कार्यक्रम में प्रवेश दे दिया गया। शयनशाला मे कुछ दिन रहने के बाद, वे भारतीय छात्रों द्वारा चलाये जा रहे एक आवास क्लब मे रहने चले गए और उन्होने अपने एक पारसी मित्र नवल भातेना के साथ एक कमरा ले लिया। १९१६ में, उन्हे उनके एक शोध के लिए पी. एच.डी. से सम्मानित किया गया। इस शोध को अंततः उन्होंने पुस्तक "इवोल्युशन ओफ प्रोविन्शिअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया" के रूप में प्रकाशित किया। हालाँकि उनकी पहला प्रकाशित काम, एक लेख जिसका शीर्षक, भारत में जाति : उनकी प्रणाली , उत्पत्ति और विकास है। अपनी डाक्टरेट की डिग्री लेकर अम्बेडकर लंदन चले गये जहाँ उन्होने ग्रे'स इन और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में कानून का अध्ययन और अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट शोध की तैयारी के लिये अपना नाम लिखवा लिया। अगले वर्ष छात्रवृत्ति की समाप्ति के चलते मजबूरन उन्हें अपना अध्ययन अस्थायी तौर बीच मे ही छोड़ कर भारत वापस लौटना पडा़ ये विश्व युद्ध प्रथम का काल था। बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में काम करते हुये अपने जीवन मे अचानक फिर से आये भेदभाव से अम्बेडकर उदास हो गये, और अपनी नौकरी छोड़ एक निजी ट्यूटर और लेखाकार के रूप में काम करने लगे। यहाँ तक कि अपनी परामर्श व्यवसाय भी आरंभ किया जो उनकी सामाजिक स्थिति के कारण विफल रहा। अपने एक अंग्रेज जानकार बंबई के पूर्व राज्यपाल लॉर्ड सिडनेम, के कारण उन्हें बंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी। १९२० में कोल्हापुर के महाराजा अपने पारसी मित्र के सहयोग और अपनी बचत के कारण वो एक बार फिर से इंग्लैंड वापस जाने में सक्षम हो गये। १९२३ में उन्होंने अपना शोध प्रोब्लेम्स ऑफ द रुपी (रुपये की समस्यायें) पूरा कर लिया। उन्हें लंदन विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ साईंस की उपाधि प्रदान की गयी। और उनकी कानून का अध्ययन पूरा होने के, साथ ही साथ उन्हें ब्रिटिश बार मे बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया। भारत वापस लौटते हुये अम्बेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके, जहाँ उन्होने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन, बॉन विश्वविद्यालय में जारी रखा। उन्हे औपचारिक रूप से ८ जून १९२७ को कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा पी एच.डी. प्रदान की गयी।

छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष

भारत सरकार अधिनियम १९१९, तैयार कर रही साउथबोरोह समिति के समक्ष, भारत के एक प्रमुख विद्वान के तौर पर अम्बेडकर को गवाही देने के लिये आमंत्रित किया गया। इस सुनवाई के दौरान, अम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका (separate electorates) और आरक्षण देने की वकालत की। १९२० में, बंबई में, उन्होंने साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरूआत की। यह प्रकाशन जल्द ही पाठकों मे लोकप्रिय हो गया, तब्, अम्बेडकर ने इसका इस्तेमाल रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये किया। उनके दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान दिये गये भाषण ने कोल्हापुर राज्य के स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ को बहुत प्रभावित किया, जिनका अम्बेडकर के साथ भोजन करना रूढ़िवादी समाज मे हलचल मचा गया। अम्बेडकर ने अपनी वकालत अच्छी तरह जमा ली, और बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना भी की जिसका उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। सन् १९२६ में, वो बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बन गये। सन १९२७ में डॉ. अम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने के साथ ही उन्होनें अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया। उन्होंने महड में अस्पृश्य समुदाय को भी शहर की पानी की मुख्य टंकी से पानी लेने का अधिकार दिलाने कि लिये सत्याग्रह चलाया।
१ जनवरी १९२७ को डॉ अम्बेडकर ने द्वितीय आंग्ल - मराठा युद्ध, की कोरेगाँव की लडा़ई के दौरान मारे गये भारतीय सैनिकों के सम्मान में कोरेगाँव विजय स्मारक मे एक समारोह आयोजित किया। यहाँ महार समुदाय से संबंधित सैनिकों के नाम संगमरमर के एक शिलालेख पर खुदवाये। १९२७ में, उन्होंने अपना दूसरी पत्रिका बहिष्कृत भारत शुरू की, और उसके बाद रीक्रिश्टेन्ड जनता की। उन्हें बाँबे प्रेसीडेंसी समिति मे सभी यूरोपीय सदस्यों वाले साइमन आयोग १९२८ में काम करने के लिए नियुक्त किया गया। इस आयोग के विरोध मे भारत भर में विरोध प्रदर्शन हुये, और जबकि इसकी रिपोर्ट को ज्यादातर भारतीयों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया, डॉ अम्बेडकर ने अलग से भविष्य के संवैधानिक सुधारों के लिये सिफारिशों लिखीं।

पूना संधि

दूसरा गोलमेज सम्मेलन
अब तक डॉ अम्बेडकर आज तक की सबसे बडी़ अछूत राजनीतिक हस्ती बन चुके थे। उन्होंने मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी कथित उदासीनता की कटु आलोचना की। अम्बेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता मोहनदास गांधी की आलोचना की, उन्होने उन पर अस्पृश्य समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। अम्बेडकर ब्रिटिश शासन की विफलताओं से भी असंतुष्ट थे, उन्होने अस्पृश्य समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल ना हो। 8 अगस्त, 1930 को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने मे है।
हमें अपना रास्ता स्वयँ बनाना होगा और स्वयँ ... राजनीतिक शक्ति शोषितो की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज मे उनका उचित स्थान पाने मे निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा.... उनको शिक्षित होना चाहिए .... एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने, और उनके अंदर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी उँचाइयों का स्रोत है।
इस भाषण में अम्बेडकर ने कांग्रेस और गांधी द्वारा चलाये गये नमक सत्याग्रह की शुरूआत की आलोचना की। अम्बेडकर की आलोचनाओं और उनके राजनीतिक काम ने उसको रूढ़िवादी हिंदुओं के साथ ही कांग्रेस के कई नेताओं मे भी बहुत अलोकप्रिय बना दिया, यह वही नेता थे जो पहले छुआछूत की निंदा करते थे और इसके उन्मूलन के लिये जिन्होने देश भर में काम किया था। इसका मुख्य कारण था कि ये "उदार" राजनेता आमतौर पर अछूतों को पूर्ण समानता देने का मुद्दा पूरी तरह नहीं उठाते थे। अम्बेडकर की अस्पृश्य समुदाय मे बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन के चलते उनको 1931 मे लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में, भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। यहाँ उनकी अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर तीखी बहस हुई। धर्म और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचिका देने के प्रबल विरोधी गांधी ने आशंका जताई, कि अछूतों को दी गयी पृथक निर्वाचिका, हिंदू समाज की भावी पीढी़ को हमेशा के लिये विभाजित कर देगी।
1932 मे जब ब्रिटिशों ने अम्बेडकर के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की, तब गांधी ने इसके विरोध मे पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया। गाँधी ने रूढ़िवादी हिंदू समाज से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता को खत्म करने तथा, हिंदुओं की राजनीतिक और सामाजिक एकता की बात की। गांधी के अनशन को देश भर की जनता से घोर समर्थन मिला और रूढ़िवादी हिंदू नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं जैसे पवलंकर बालू और मदन मोहन मालवीय ने अम्बेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा मे संयुक्त बैठकें कीं। अनशन के कारण गांधी की मृत्यु होने की स्थिति मे, होने वाले सामाजिक प्रतिशोध के कारण होने वाली अछूतों की हत्याओं के डर से और गाँधी जी के समर्थकों के भारी दवाब के चलते अंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचिका की माँग वापस ले ली। इसके एवज मे अछूतों को सीटों के आरक्षण , मंदिरों में प्रवेश/पूजा के अधिकार एवं छूआ-छूत ख़तम करने की बात स्वीकार कर ली गयी । गाँधी ने इस उम्मीद पर की बाकि सभी स्वर्ण भी पूना संधि का आदर कर , सभी शर्ते मान लेंगे अपना अनशन समाप्त कर दिया।
आरक्षण प्रणाली में पहले दलित अपने लिए संभावित उमीदवारों में से चुनाव द्वारा (केवल दलित) चार संभावित उमीदवार चुनते। इन चार उम्मीदवारों में से फिर संयुक्त निर्वाचन चुनाव (सभी धर्म \ जाति) द्वारा एक नेता चुना जाता । इस आधार पर सिर्फ एक बार सन 1937 में चुनाव हुए। आंबेडकर 20-25 साल के लिये आरक्षण चाहते थे लेकिन गाँधी के अड़े रहने के कारण यह आरक्षण मात्र 5 साल के लिए ही लागू हुआ।
पृथक निर्वाचिका में दलित दो वोट देता एक सामान्य वर्ग के उम्मीदवार को ओर दूसरा दलित (पृथक) उम्मीदवार को। ऐसी स्थिति में दलितों द्वारा चुना गया दलित उम्मीदवार दलितों की समस्या को अच्छी तरह से तो रख सकता था किन्तु गैर उम्मीदवार के लिए यह जरूरी नहीं था कि उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास भी करता। बाद मे अम्बेडकर ने गाँधी जी की आलोचना करते हुये उनके इस अनशन को अछूतों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने और उन्हें उनकी माँग से पीछे हटने के लिये दवाब डालने के लिये गांधी द्वारा खेला गया एक नाटक करार दिया। उनके अनुसार असली महात्मा तो ज्योति राव फुले थे ।

राजनीतिक जीवन

13 अक्टूबर 1935, को येओला नासिक मे अम्बेडकर एक रैली को संबोधित करते हुए.
13 अक्टूबर 1935 को,अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानचार्य नियुक्त किया गया और इस पद पर उन्होने दो वर्ष तक कार्य किया। इसके चलते अंबेडकर बंबई में बस गये, उन्होने यहाँ एक बडे़ घर का निर्माण कराया, जिसमे उनके निजी पुस्तकालय मे 50000 से अधिक पुस्तकें थीं। इसी वर्ष उनकी पत्नी रमाबाई की एक लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई। रमाबाई अपनी मृत्यु से पहले तीर्थयात्रा के लिये पंढरपुर जाना चाहती थीं पर अंबेडकर ने उन्हे इसकी इजाज़त नहीं दी। अम्बेडकर ने कहा की उस हिन्दु तीर्थ मे जहाँ उनको अछूत माना जाता है, जाने का कोई औचित्य नहीं है इसके बजाय उन्होने उनके लिये एक नया पंढरपुर बनाने की बात कही। भले ही अस्पृश्यता के खिलाफ उनकी लडा़ई को भारत भर से समर्थन हासिल हो रहा था पर उन्होने अपना रवैया और अपने विचारों को रूढ़िवादी हिंदुओं के प्रति और कठोर कर लिया। उनकी रूढ़िवादी हिंदुओं की आलोचना का उत्तर बडी़ संख्या मे हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा की गयी उनकी आलोचना से मिला। 13 अक्टूबर को नासिक के निकट येओला मे एक सम्मेलन में बोलते हुए अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन करने की अपनी इच्छा प्रकट की। उन्होने अपने अनुयायियों से भी हिंदू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया।उन्होने अपनी इस बात को भारत भर मे कई सार्वजनिक सभाओं मे दोहराया भी।
1936 में, अम्बेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, जो 1937 में केन्द्रीय विधान सभा चुनावों मे 15 सीटें जीती। उन्होंने अपनी पुस्तक जाति के विनाश भी इसी वर्ष प्रकाशित की जो उनके न्यूयॉर्क मे लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी। इस सफल और लोकप्रिय पुस्तक मे अम्बेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जोरदार आलोचना की। उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लोगों को गाँधी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले की कडी़ निंदा की। अम्बेडकर ने रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे।
1941 और 1945 के बीच में उन्होंने बड़ी संख्या में अत्यधिक विवादास्पद पुस्तकें और पर्चे प्रकाशित किये जिनमे ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी शामिल है, जिसमें उन्होने मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की मांग की आलोचना की। वॉट कॉंग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स (काँग्रेस और गान्धी ने अछूतों के लिये क्या किया) के साथ, अम्बेडकर ने गांधी और कांग्रेस दोनो पर अपने हमलों को तीखा कर दिया उन्होने उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया। उन्होने अपनी पुस्तक ‘हू वर द शुद्राज़?’( शुद्र कौन थे?) के द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व मे आने की व्याख्या की. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि किस तरह से अछूत, शुद्रों से अलग हैं। अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन मे बदलते देखा, हालांकि 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में इसने खराब प्रदर्शन किया। 1948 में हू वर द शुद्राज़? की उत्तरकथा द अनटचेबलस: ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी (अस्पृश्य: अस्पृश्यता के मूल पर एक शोध) मे अम्बेडकर ने हिंदू धर्म को लताड़ा।
हिंदू सभ्यता .... जो मानवता को दास बनाने और उसका दमन करने की एक क्रूर युक्ति है और इसका उचित नाम बदनामी होगा। एक सभ्यता के बारे मे और क्या कहा जा सकता है जिसने लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग को विकसित किया जिसे... एक मानव से हीन समझा गया और जिसका स्पर्श मात्र प्रदूषण फैलाने का पर्याप्त कारण है?

अम्बेडकर इस्लाम और दक्षिण एशिया में उसकी रीतियों के भी आलोचक थे। उन्होने भारत विभाजन का तो पक्ष लिया पर मुस्लिम समाज मे व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घोर निंदा की। उन्होंने कहा,
बहुविवाह और रखैल रखने के दुष्परिणाम शब्दों में व्यक्त नहीं किये जा सकते जो विशेष रूप से एक मुस्लिम महिला के दुःख के स्रोत हैं। जाति व्यवस्था को ही लें, हर कोई कहता है कि इस्लाम गुलामी और जाति से मुक्त होना चाहिए, जबकि गुलामी अस्तित्व में है और इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से समर्थन मिला है। हालाँकि कुरान में वर्णित ग़ुलामों के साथ उचित और मानवीय व्यवहार के बारे में पैगंबर के विचार प्रशंसायोग्य हैं लेकिन, इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है जो इस अभिशाप के उन्मूलन का समर्थन करता हो। अगर गुलामी खत्म भी हो जाये पर फिर भी मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था रह जायेगी।
उन्होंने लिखा कि मुस्लिम समाज मे तो हिंदू समाज से भी अधिक सामाजिक बुराइयाँ हैं और मुसलमान उन्हें " भाईचारे " जैसे नरम शब्दों के प्रयोग से छुपाते हैं। उन्होंने मुसलमानो द्वारा अर्ज़ल वर्गों के खिलाफ भेदभाव जिन्हें " निचले दर्जे का " माना जाता था के साथ ही मुस्लिम समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दमनकारी पर्दा प्रथा की भी आलोचना की। उन्होंने कहा हालाँकि पर्दा हिंदुओं मे भी होता है पर उसे धर्मिक मान्यता केवल मुसलमानों ने दी है। उन्होंने इस्लाम मे कट्टरता की आलोचना की जिसके कारण इस्लाम की नातियों का अक्षरक्ष अनुपालन की बद्धता के कारण समाज बहुत कट्टर हो गया है और उसे को बदलना बहुत मुश्किल हो गया है। उन्होंने आगे लिखा कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं जबकि इसके विपरीत तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है।
"सांप्रदायिकता" से पीड़ित हिंदुओं और मुसलमानों दोनों समूहों ने सामाजिक न्याय की माँग की उपेक्षा की है।
हालांकि वे मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग की विभाजनकारी सांप्रदायिक रणनीति के घोर आलोचक थे पर उन्होने तर्क दिया कि हिंदुओं और मुसलमानों को पृथक कर देना चाहिए और पाकिस्तान का गठन हो जाना चाहिये क्योकि एक ही देश का नेतृत्व करने के लिए, जातीय राष्ट्रवाद के चलते देश के भीतर और अधिक हिंसा पनपेगी। उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के सांप्रदायिक विभाजन के बारे में अपने विचार के पक्ष मे ऑटोमोन साम्राज्य और चेकोस्लोवाकिया के विघटन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया।
उन्होंने पूछा कि क्या पाकिस्तान की स्थापना के लिये पर्याप्त कारण मौजूद थे? और सुझाव दिया कि हिंदू और मुसलमानों के बीच के मतभेद एक कम कठोर कदम से भी मिटाना संभव हो सकता था। उन्होंने लिखा है कि पाकिस्तान को अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना चाहिये। कनाडा जैसे देशों मे भी सांप्रदायिक मुद्दे हमेशा से रहे हैं पर आज भी अंग्रेज और फ्रांसीसी एक साथ रहते हैं, तो क्या हिंदु और मुसलमान भी साथ नहीं रह सकते। उन्होंने चेताया कि दो देश बनाने के समाधान का वास्तविक क्रियान्वयन अत्यंत कठिनाई भरा होगा। विशाल जनसंख्या के स्थानान्तरण के साथ सीमा विवाद की समस्या भी रहेगी। भारत की स्वतंत्रता के बाद होने वाली हिंसा को ध्यान मे रख कर यह भविष्यवाणी कितनी सही थी||

संविधान निर्माण

अपने विवादास्पद विचारों और गांधी व कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद अम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई तो उसने अम्बेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को, अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना कि लिए बनी के संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करने के इस काम मे अपने सहयोगियों और समकालीन प्रेक्षकों की प्रशंसा अर्जित की। इस कार्य में अम्बेडकर का शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन बहुत काम आया।
संघ रीति मे मतपत्र द्वारा मतदान, बहस के नियम, पूर्ववर्तिता और कार्यसूची के प्रयोग, समितियाँ और काम करने के लिए प्रस्ताव लाना शामिल है। संघ रीतियाँ स्वयं प्राचीन गणराज्यों जैसे शाक्य और लिच्छवि की शासन प्रणाली के निदर्श (मॉडल) पर आधारित थीं। अम्बेडकर ने हालांकि उनके संविधान को आकार देने के लिए पश्चिमी मॉडल इस्तेमाल किया है पर उसकी भावना भारतीय है।
अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया संविधान पाठ मे संवैधानिक गारंटी के साथ व्यक्तिगत नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा प्रदान की जिनमें, धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की, और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों मे आरक्षण प्रणाली शुरू के लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया, भारत के विधि निर्माताओं ने इस सकारात्मक कार्यवाही के द्वारा दलित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हे हर क्षेत्र मे अवसर प्रदान कराने की चेष्टा की जबकि मूल कल्पना मे पहले इस कदम को अस्थायी रूप से और आवश्यकता के आधार पर शामिल करने की बात कही गयी थी. 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अपने काम को पूरा करने के बाद, बोलते हुए, अम्बेडकर ने कहा :
मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।
1951 मे संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद अम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इस मसौदे मे उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी। हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू, कैबिनेट और कई अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसका समर्थन किया पर संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके खिलाफ़ थी। अम्बेडकर ने 1952 में लोक सभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे लड़ा पर हार गये। मार्च 1952 मे उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और इसके बाद उनकी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे।

बौद्ध धर्म मे परिवर्तन

दीक्षा भूमि ,नागपुर; जहां अम्बेडकर अपने अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म मे परिवर्तित हुए।
सन् 1950 के दशक में अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका(तब सीलोन) गये। पुणे के पास एक नया बौद्ध विहार को समर्पित करते हुए, अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं, और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे। 1954 में अम्बेडकर ने बर्मा का दो बार दौरा किया; दूसरी बार वो रंगून मे तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। 1955 में उन्होने भारतीय बुद्ध महासभा या बौद्ध सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की। उन्होंने अपने अंतिम लेख, द बुद्ध एंड हिज़ धम्म को 1956 में पूरा किया। यह उनकी मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुआ। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया. अम्बेडकर ने एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से तीन रत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इसके बाद उन्होने एक अनुमान के अनुसार लगभग 500000 समर्थको को बौद्ध धर्म मे परिवर्तित किया। नवयान लेकर अम्बेडकर और उनके समर्थकों ने हिंदू धर्म और हिंदू दर्शन की स्पष्ट निंदा की और उसे त्याग दिया। इसके बाद वे नेपाल में चौथे विश्व बौद्ध सम्मेलन मे भाग लेने के लिए काठमांडू गये। उन्होंने अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध या कार्ल मार्क्स को 2 दिसंबर 1956 को पूरा किया।

डा बी.आर. अम्बेडकर ने दीक्षा भूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,14 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं.800000 लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था.उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके.ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं. ये एक सेतु के रूप में बौद्ध धर्मं की हिन्दू धर्म में व्याप्त भ्रम और विरोधाभासों से रक्षा करने में सहायक हो सकती हैं.इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म,जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है.

मृत्यु / महापरिनिर्वाण

अन्नाल अम्बेडकर मनिमंडपम, चेन्नई
पुणे संग्रहालय में अम्बेडकर की प्रतिमा।
1948 से, अम्बेडकर मधुमेह से पीड़ित थे। जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे। राजनीतिक मुद्दों से परेशान अम्बेडकर का स्वास्थ्य बद से बदतर होता चला गया और 1955 के दौरान किये गये लगातार काम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया। अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसंबर 1956 को अम्बेडकर की मृत्यु नींद में दिल्ली में उनके घर मे हो गई। 7 दिसंबर को चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली मे अंतिम संस्कार किया गया जिसमें सैकड़ों हजारों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया।
मृत्युपरांत अम्बेडकर के परिवार मे उनकी दूसरी पत्नी सविता अम्बेडकर रह गयी थीं जो, जन्म से ब्राह्मण थीं पर उनके साथ ही वो भी धर्म परिवर्तित कर बौद्ध बन गयी थीं। विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम शारदा कबीर था। सविता अम्बेडकर की एक बौद्ध के रूप में सन 2002 में मृत्यु हो गई, अम्बेडकर के पौत्र, प्रकाश यश्वंत अम्बेडकर, भारिपा बहुजन महासंघ का नेतृत्व करते है और भारतीय संसद के दोनों सदनों मे के सदस्य रह चुके है।
कई अधूरे टंकलिपित और हस्तलिखित मसौदे अम्बेडकर के नोट और पत्रों में पाए गए हैं। इनमें वैटिंग फ़ोर ए वीसा जो संभवतः 1935-36 के बीच का आत्मकथानात्मक काम है, और अनटचेबल, ऑर द चिल्ड्रन ऑफ इंडियाज़ घेट्टो जो 1951 की जनगणना से संबंधित है।
एक स्मारक अम्बेडकर के दिल्ली स्थित उनके घर 26 अलीपुर रोड में स्थापित किया गया है। अम्बेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश रखा जाता है। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। कई सार्वजनिक संस्थान का नाम उनके सम्मान में उनके नाम पर रखा गया है जैसे हैदराबाद, आंध्र प्रदेश का डॉ. अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, बी आर अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय- मुजफ्फरपुर , डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नागपुर में है, जो पहले सोनेगांव हवाई अड्डे के नाम से जाना जाता था। अम्बेडकर का एक बड़ा आधिकारिक चित्र भारतीय संसद भवन में प्रदर्शित किया गया है।
मुंबई मे उनके स्मारक हर साल लगभग पाँच लाख लोग उनकी वर्षगांठ (14 अप्रैल) पुण्यतिथि (6 दिसम्बर) और धम्म चक्र परिवर्तन् दिन 14 अक्टूबर नागपुर में, उन्हे अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इकट्ठे होते हैं। सैकड़ों पुस्तकालय स्थापित हो गये हैं, और लाखों रुपए की पुस्तकें बेची जाती हैं। अपने अनुयायियों को उनका संदेश था !' शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।

ग्रामीण जीवन पर अम्बेडकर बनाम गांधी

अम्बेडकर, महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्र आलोचक थे. उनके समकालीनों और आधुनिक विद्वानों ने उनके महात्मा गांधी (जो कि पहले भारतीय नेता थे जिन्होने अस्पृश्यता और भेदभाव करने का मुद्दा सबसे पहले उठाया था) के विरोध की आलोचना है।
गांधी का दर्शन भारत के पारंपरिक ग्रामीण जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक, लेकिन रूमानी था, और उनका दृष्टिकोण अस्पृश्यों के प्रति भावनात्मक था उन्होने उन्हें हरिजन कह कर पुकारा। अम्बेडकर ने इस विशेषण को सिरे से अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अपने अनुयायियों को गांव छोड़ कर शहर जाकर बसने और शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया।

आलोचना और विरासत

अम्बेडकर की सामाजिक और राजनैतिक सुधारक की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। स्वतंत्रता के बाद के भारत मे उनकी सामाजिक और राजनीतिक सोच को सारे राजनीतिक हलके का सम्मान हासिल हुआ। उनकी इस पहल ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों मे आज के भारत की सोच को प्रभावित किया। उनकी यह् सोच आज की सामाजिक, आर्थिक नीतियों, शिक्षा, कानून और सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से प्रदर्शित होती है। एक विद्वान के रूप में उनकी ख्याति उनकी नियुक्ति स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री और संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में कराने मे सहायक सिद्ध हुयी। उन्हें व्यक्ति की स्वतंत्रता में अटूट विश्वास था और उन्होने समान रूप से रूढ़िवादी और जातिवादी हिंदू समाज और इस्लाम की संकीर्ण और कट्टर नीतियों की आलोचना की है। उसकी हिंदू और इस्लाम की निंदा ने उसको विवादास्पद और अलोकप्रिय बनाया है, हालांकि उनके बौद्ध धर्म मे परिवर्तित होने के बाद भारत में बौद्ध दर्शन में लोगों की रुचि बढ़ी है।
अम्बेडकर के राजनीतिक दर्शन के कारण बड़ी संख्या में दलित राजनीतिक दल, प्रकाशन और कार्यकर्ता संघ अस्तित्व मे आये है जो पूरे भारत में सक्रिय रहते हैं, विशेष रूप से महाराष्ट्र में। उनके दलित बौद्ध आंदोलन को बढ़ावा देने से बौद्ध दर्शन भारत के कई भागों में पुनर्जागरित हुआ है। दलित कार्यकर्ता समय समय पर सामूहिक धर्म परिवर्तन के समारोह आयोजित उसी तरह करते रहते हैं जिस तरह अम्बेडकर ने 1956 मे नागपुर मे आयोजित किया था।
कुछ विद्वानों, जिनमें से कुछ प्रभावित जातियों से है का विचार है कि अंग्रेज अधिकतर जातियों को एक नज़र से देखते थे और अगर उनका राज जारी रहता तो समाज से काफी बुराईयों को समाप्त किया जा सकता था। यह राय ज्योतिबा फुले समेत कई थी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने रखी है।
नारायण राव काजरोलकर ने अम्बेडकर की आलोचना की है क्योंकि उन्हें विश्वास था कि वे खर्च बजाय सब लोगों के बीच, सिर्फ अपनी ही जाति यानि महार पर खर्च करने मे करते थे। सीताराम नारायण शिवतारकर भी इससे सहमत है।
आधुनिक भारत में कुछ लोग, अम्बेडकर के द्वारा शुरू किए गए आरक्षण को अप्रासांगिक और प्रतिभा विरोधी मानते हैं।

अम्बेडकर के बाद

पिछले वर्षों में लगातार बौद्ध समूहों और रूढ़िवादी हिंदुओं के बीच हिंसक संघर्ष हुये है. 1994 में मुंबई में जब किसी ने अम्बेडकर की प्रतिमा के गले में जूते की माला लटका कर उनका अपमान किया था तो चारों ओर एक सांप्रदायिक हिंसा फैल गयी थी, और हड़ताल के कारण शहर एक सप्ताह से अधिक तक बुरी तरह प्रभावित हुआ था। जब अगले वर्ष इसी तरह की गड़बड़ी हुई तो एक अम्बेडकर प्रतिमा को तोड़ा गया। तमिलनाडु में ऊंची जाति के समूह भी बौद्धों के खिलाफ हिंसा में लगे हुए हैं। इसके अलावा, कुछ परिवर्तित बौद्धों ने हिंदुओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया (2006, महाराष्ट्र में दलितों द्वारा विरोध) और हिंदू मंदिरों मे गन्दगी फैला दी, और देवताओं के स्थान पर अम्बेडकर के चित्र लगा दिये। एक कट्टरपंथी अम्बेडकरवादी संस्था बौद्ध पैंथर्स मूवमेंट ने तो अम्बेडकर के बौद्ध धर्म के आलोचकों की हत्या तक करने का प्रयास किया है।

फिल्म

जब्बार पटेल ने सन 2000 मे डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर नामक हिन्दी फिल्म बनाई थी। इसमे अम्बेडकर की भूमिका माम्मूटी मे निभाई थी. भारत के राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम और सामाजिक न्याय मंत्रालय के द्वारा प्रायोजित, यह फिल्म प्रदर्शन से पहले एक लंबी अवधि तक विवादो मे फँसी रही।
यू. सी. एल. ए. मे मानव शास्त्र के प्रोफेसर और ऐतिहासिक नृवंश विवरणकार, डॉ. डेविड ब्लुंडेल फिल्मों की एक श्रृंखला बनाने की दीर्घकालिक परियोजना बनाई है जो उन घटनाओं पर आधारित है जो भारत में समाज कल्याण की स्थिति के बारे में ज्ञान और इच्छा को प्रभावित करती है। ए राएज़िग लाइट डॉ. बी आर अम्बेडकर के जीवन और भारत में सामाजिक कल्याण की स्थिति पर आधारित है।

साभार-विकिपीडिया