नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शनिवार, 27 अगस्त 2016

विकास के लिए जरूरी है विशेष राज्य का दर्जा

गुवाहाटी में गत सप्ताह सम्पन्न एक उत्तर-पूर्व के राज्यों में सतत विकास लक्ष्यों से संबंधित मुद्दों पर आयोजित एक सेमीनार में कुछ अर्थविदों ने इस बात पर चिन्ता व्यक्त की कि योजना आयोग के खात्मे के कारण 2017-18 से विशेष श्रेणी दर्जा प्राप्त राज्यों को केन्द्र सरकार से राज्यों को मिलनेवाला अनुदान भी समाप्त हो जाएगा। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा लिए गए निर्णय अनुसार योजना आयोग द्वारा इन राज्यों की राज्य योजनाओं के लिए उनके कुल परिव्यय का 90 प्रतिशत वित्तीय सहायता केन्द्रीय अनुदान के रूप में उपलब्ध करवाई जाती थी। राज्यों की योजनाओं के लिए अनुदान देना या वित्तीय सहायता प्रदान करना योजना आयोग के स्थान पर मोदी सरकार द्वारा स्थापित नीति आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। इस प्रकार अब विशेष दर्जा राज्य केवल नाम के लिए रह जाएंगे। फरवरी 2015 में विशेष श्रेणी दर्जा राज्य के संबंध में पत्रकारों द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि चूंकि 14वें वित्त आयोग द्वारा केन्द्रीय कर राजस्व में राज्यों का हिस्सा 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत कर दिया गया है जिससे सभी राज्यों को पहले की तुलना में केन्द्र से 50 प्रतिशत अधिक अंतरण प्राप्त होगा इसलिए अब विशेष दर्जा वर्ग राज्य की जरूरत नहीं रह गई है। विशेष श्रेणी दर्जा राज्य के संबंध में वित्तमंत्री अरुण जेटली के बयान के बाद इनके भविष्य के संबंध में एक अनिश्चितता की स्थिति निर्मित हो गई थी तथा उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों में बेचैनी की स्थिति निर्मित होने लगी। 24 मई 2015 को त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि विशेष श्रेणी दर्जा को समाप्त नहीं किया जाय। 15 जून 2015 को गुवाहाटी में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री द्वारा आमंत्रित पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केन्द्र सरकार से मांग विशेष दर्जा राज्य की व्यवस्था को यथावत रखे जाने की मांग की गई। इस संबंध में अभी तक प्रधानमंत्री से कोई ठोस सकारात्मक उत्तर नहीं मिलने से अभी भी अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है । राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा निर्धारित प्रावधानों के अनुसार सामरिक महत्व की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित ऐसे पहाड़ी राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान किया जाता है जिनके पास स्वयं के संसाधन स्रोत सीमित होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 370 के अंतर्गत जम्मू व कश्मीर विशेष दर्जा प्राप्त भारत का पहला राज्य है। जब तक अनुच्छेद 370 बना रहेगा जम्मू व कश्मीर को विशेष दर्जा प्राप्त रहेगा। संविधान के अनुच्छेद 371 के अंर्तगत विशेष दर्जा प्राप्त नगालैंड की भी लगभग यही स्थिति है। इन दो राज्यों के अलावा उत्तर-पूर्व के असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम एवं त्रिपुरा राज्य उत्तर-पूर्व तथा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड उत्तर में विशेष श्रेणी दर्जा प्राप्त राज्य है। उत्तर-पूर्व राज्यों में प्रचलित मूल्यों पर औसत प्रति व्यक्ति व्यक्ति आमदनी 80,135 रुपए है। प्रति व्यक्ति आमदनी में रुपए 1,95,380 के साथ सिक्किम इन राज्यों में चोटी पर है जबकि मणिपुर रुपए 46,573 सबसे नीचे है। पिछले 10 सालों में मेघालय की जीडीपी विकास दर 9 से 10 प्रतिशत रहने से यह इसके विकास की ओर सबसे अधिक तेज गति से अग्रसर राज्य बन गया है। उत्तर के राज्यों में प्रति व्यक्ति आय उत्तराखंड रुपए 1,15,622 तथा हिमाचल प्रदेश रुपए 92,300 थी। असम को छोडक़र उत्तर-पूर्व के राज्यों का मानव विकास सूचकांक रैंकिंग में केरल, दिल्ली, गोवा, हिमाचल प्रदेश तथा पंजाब के बाद 6 वें स्थान पर है। मानव विकास सूचकांक रैंकिंग में जम्मू-कश्मीर 10वें तथा उत्तराखंड 14वें स्थान पर हैं। भारत के सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों की उपलब्धियों में भी उत्तर-पूर्व राज्यों की प्रगति उत्साहवद्र्धक रही है। 1991 की तुलना में 2015 में गरीबी अनुपात में 50 फीसदी कमी लाने का लक्ष्य सभी राज्यों ने 2015 तक प्राप्त कर लिए थे । सिक्किम और मेघालय में गरीबी अनुपात गिरकर क्रमश: 8.6 तथा 8.9 प्रतिशत पर आ गया है। मणिपुर में गरीबी अनुपात 29.9 प्रतिशत है। हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर गरीबी अनुपात क्रमश: 7.2 तथा 8 प्रतिशत है। पूर्वात्तर राज्यों में सहस्राबदी विकास के लक्ष्यानुसार 2015 तक मातृ मृत्यु दर एवं शिशुु मृत्यु दर दोनों में कमी आई है किन्तु हिमाचल प्रदेश में 5 साल से कम शिशुओं की मृत्यु दर में कमी के लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सके यह अभी भी उच्च बनी हुई है। कुल मिलाकर सहस्राबदी विकास लक्ष्यों में सभी 8 लक्ष्यों में मणिपुर के अलावा अन्य सभी पूर्वोत्तर राज्यों ने उपलब्ध्यिों के लक्ष्य प्राप्त कर लिए हैं। पर्यावरण संरक्षण सूचकांक में पूर्वोत्तर राज्य उच्चतम स्थान पर है। पूर्वोत्तर विकास परिषद की स्थापना के बाद से परिवहन तथा संचार साधनों का तेजी से विकास हुआ है। इसमें दो राय नहीं है कि पूर्वोत्तर एवं उत्तर के राज्यों का जो भी आर्थिक विकास हुआ है वह विशेष श्रेणी राज्य का दर्जा मिलने से उदार केन्द्रीय सहायता के कारण हुआ है। किन्तु अलग-अलग राज्यों में विकास की गति एवं स्तर अलग-अलग रही है। सिक्किम विकास के सभी मानकों पर सबसे आगे है जबकि मणिपुर सबसे पीछे है। इन राज्यों में जिस राज्य में सबसे अधिक शान्ति एवं सुशासन रहा है वहां विकास की गति उतनी ही तेज रही है। दूसरी ओर जिस राज्य में भारतीय सेना की मौजूदगी के बावजूद अलगाववादियों द्वारा निरन्तर हिंसा जारी है तथा राजनीतिक अस्थिरता रही है वहां विकास की गति धीमी है। विशेष श्रेणी दर्जा राज्यों में राजनैतिक स्थिरता, सुशासन एवं आर्थिक विकास के प्रमुख मानकों पर त्रिपुरा को पहले स्थान पर रखा जा सकता है। त्रिपुरा में राजनीतिक स्थिरता का प्रमुख कारण राजनीतिक दर्शन और उस दर्शन के प्रति प्रतिबद्ध सरकार का होना है। त्रिपुरा को उत्तर पूर्व के लिए रोल माडॅल राज्य माना जा सकता है तथा विकास के लिए त्रिपुरा के मुख्यमंत्री को रोल मॉडल मुख्यमंत्री माना जाना चाहिए। यदि इस राज्य के मुख्यमंत्री पूर्वोत्तर के विकास के लिए विशेष श्रेणी दर्जा राज्य की पैरवी कर रहे हैं तो केन्द्र सरकार को पूर्वोत्तर के लिए विकास के लिए इसको जारी रखना चाहिए। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि विशेष राज्य श्रेणी में उन्हीं राज्यों को रखा जाता है जो अपने राज्य की योजनाओं के लिए स्वयं संसाधन जुटाने में अक्षम है, ऐसी स्थिति में दो ही विकल्प हैं या तो केन्द्र सरकार उन्हें पड़ोसी विकसित समृद्ध राज्यों में शामिल कर दे या उनकी विशेष दर्जा यथावत रखा जाय। चूंकि पहला विकल्प संभव नहीं है इसलिए इन राज्यों के विकास के लिए विशेष राज्य का दर्जा जारी रखना ही विकल्प बचता है। (डॉ.हनुमंत यादव)

ओलम्पिक का सफ़र (ये राह नहीं आसान)

ओलंपिक में भारत एक रजत और कांस्य पदक छोड़ कोई अन्य पदक नहीं जीत पाया। वास्तव में यह शर्म की बात है। भारत से बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन उपलब्धि अपेक्षा से बहुत कम रही। हॉकी, जिसे हमने पश्चिम को सिखाया, अब इस उपमहाद्वीप से गायब हो चुका है। खेल को ज्यादा आकर्षक बनाने के नाम पर नियमों में किए गए बदलाव के बाद पश्चिम ने हॉकी पर एकाधिकार स्थापित कर लिया है। लेकिन सिर्फ नियमों में किये गये बदलावों को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। हमारे खिलाडिय़ों के पतन का मूल कारण उनमें आत्मशक्ति एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव रहा है। महिलाओं का प्रदर्शन पुरुषों की तुलना में बेहतर रहा है जबकि इसके लिए कड़ी मेहनत की जरूरत होती है। अगले कुछ वर्षों में हमारा प्रदर्शन उन छोटे देशों से भी खराब हो जाएगा, जो दुनिया के नक्शे पर महज बिंदु भर हैं। आबादी के हिसाब से भारत ओलंपिक पदक के मामले में सबसे निचले पायदान पर है। इसके कई और कारण हैं। भारत में 1500 करोड़ रुपए के केंद्रीय बजट के अलावा मोटे तौर पर प्रत्येक राज्य का 250करोड़ का बजट है। कुछ राज्यों में खेल की आधारभूत संरचनाएं मौजूद हैं, लेकिन उनका सही रखरखाव और नियमित इस्तेमाल नहीं होता। राज्यों एवं केंद्र का खेल के प्रति समग्र रूप में कोई नजरिया नहीं है। नतीजा है कि खेल बजट का महज एक मद होता है, लेकिन किसी भी खास खेल में बेहतरी के नजरिए से कुछ नहीं किया जाता। क्रिकेट आगे बढ़ा है, क्योंकि इसे लेकर जनता ठीक उसी तरह दिवानी है जिस तरह कुछ साल पहले हॉकी को लेकर थी। यह सिर्फ इस बात की हकीकत को दर्शाता है कि खेल को लेकर कोई सही योजना या वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है। मास्को खेल प्रतियोगिता 1980 तक हॉकी भारत का प्रतिष्ठित खेल था, जब भारत ने आठवीं और अंतिम बार हॉकी का स्वर्णपदक जीता था। इसके बाद लगातार गिरावट आती गई और आज तक भारत किसी ओलंपिक में सेमीफाइनल तक भी नहीं पहुंच पाया। इसके विपरीत भारत ने 1983 में पहली बार क्रिकेट का विश्व कप जीता और इसके बाद क्रिकेट लगातार उठान पर ही रहा। आज क्रिकेट ने अनेक अवसर एवं हस्तियां उपलब्ध कराई हैं, जिसके चलते क्रिकेट और भी अधिक लाभप्रद हो गया है। भारत में धर्म के बाद सबसे ज्यादा उन्माद क्रिकेट को लेकर ही है। चूंकि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बहुत अधिक पैसा कमा रहा है, इस कारण क्रिकेट को सरकारी सहायता की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन, इसके साथ ही क्रिकेट समेत दूसरे खेलों में बहुत अधिक राजनीति घुस गई है। प्रत्येक खेल के राष्ट्रीय फेडरेशनों में किसी न किसी पद पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता काबिज हैं और क्रिकेट भी इसका अपवाद नहीं है। खेलों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा है, क्योंकि राजनीतिज्ञ इनका इस्तेमाल अपने नाम एवं शोहरत के लिए कर रहे हैं। खेद की बात है कि पैसा का इंतजाम करने के लिए आज हर खेल फेडरेशनों द्वारा कुछ मंत्रियों या बड़े नौकरशाहों की मदद ली जा रही है। इसके एवज में राजनीतिज्ञ खेल फेडरेशनों में पद हथिया कर रूतबा और अहमियत हासिल करते हैं। दूसरे शब्दों में इससे दोनों का हित सध रहा है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) एवं इसके कामकाज पर जस्टिस लोधा पैनल की रिपोर्ट के आलोक में सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला आंखें खोलने वाली है। पैनल की अनुशंसाएं लागू की जाए तो बीसीसीआई या किसी दूसरे खेल फे डरेशनों के पदों पर राजनीतिज्ञों एवं बड़े नौकरशाहों के काबिज होने पर रोक लगेगी। यह हर कोई जानता है कि व्यवस्था चाहे जो भी हो शरद पवार,अरुण जेटली, फारूख अब्दुल्ला, राजीव शुक्ला, जैसे कई लोग इसके अभिन्न अंग बने रहते हैं। ये लोग चूंकि अधिकारियों या दूसरे स्रोतों से पैसा ला सकते हैं, इसलिए वे यहां बने हुए हैं। अगर ये लोग पद छोड़ दें, और सरकार द्वारा बहुत कम वित्तीय सहायता मिले तो इन फेडरेशनों के पास पैसा का इंतजाम करने के लिए कौन सा तंत्र होगा? खेलों के लिए कारपोरेट से आर्थिक सहायता बहुत ही कम है। सिर्फ क्रिकेट इसका अपवाद है। लेकिन सबसे बड़ी कमजोरी ग्रामीण भारत में खेलों के विकास का नहीं होना है। यह वह जगह है जहां अपरिक्व प्रतिभाएं बहुतायत में होती हैं, लेकिन उन्हें खोजने-तलाशने का सही उपाय नहीं है। पुन: खेदजनक है कि भारत में कोई खेल संस्कृति नहीं है। जूनियर सेक्शन में अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं के आयोजन के लिए खेल फेडरेशनों को जो भी थोड़ा-बहुत पैसा मिलता था उसे सरकार ने बंद कर दिया है। सरकार के इस निर्णय ने फेडरेशनों की मुश्किलें और बढ़ा ही दी हैं। युवा प्रतिभाओं को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त मदद के बगैर सरकार श्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद कैसे करती है? ओलंपिक में भाग लेने वालों के लिए सिर्फ 300 करोड़ आबंटित कर देने, और वह भी रियो से सिर्फ तीन माह पहले, से काम नहीं चलने वाला। सिर्फ लगातार प्रयास एवं सुसंगत तरीके से लंबे समय तक कोष उपलब्ध कराने से पदक पाने में मदद मिल सकती है। चीन का उदाहरण देखें। यह प्रतिभाओं को बहुत कम उम्र में चुन लेता है और इन लडक़े-लड़कियों को ओलंपिक में पदक हासिल करने लायक बनाने के वक्त तक मदद करता है। इन युवा प्रतिभाओं को ज्यों ही नेशनल सेंटर में दाखिल किया जाता है उनकी जवाबदेही सरकार की हो जाती है और उन्हें किसी बात की चिंता नहीं करनी रहती। यहां तक कि अपनी शिक्षा के बारे में भी नहीं। लेकिन भारत में हम खेल की कीमत पर शिक्षा पर ध्यान देते हैं। दीपा कर्माकार का बेहतरीन प्रदर्शन देखने को मिला। वह पहली जिमनास्ट बनी जिसे ओलंपिक में जगह मिली। ओलंपिक में उसे चौथा स्थान मिलना पदक जीतने से कम नहीं है, क्योंकि त्रिपुरा में बहुत कम सुविधाओं के साथ उसे प्रशिक्षण मिला था। भविष्य की ओर देखते हुए भारत को ओलंपिक में गौरव हासिल करने के रास्तों एवं साधनों के बारे में सोचना चाहिए। भारत को कुछ खेलों के युवा प्रतिभाओं को चुनकर उन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए न कि जो भी थोड़ा-बहुत पैसा है उसे अनाप-शनाप तरीके से ओलंपिक के सभी 28 खेलों पर खर्च कर देना चाहिए। इसके अलावा, सरकार एक खेल नीति बना सकती है। यह खेल नीति मौजूदा नीति से अलग होनी चाहिए, जो खिलाडिय़ों को कॅरियर सुनिश्चित करने की गारंटी प्रदान करे। टुकड़े-टुकड़े में प्रोत्साहन देकर हम पदक नहीं जीत सकते। और हमें अगले ओलंपिक के छह माह पहले मुआयना करना चाहिए कि तैयारियों में हमने कहीं देर तो नहीं की है, जैसा कि अब तक होता रहा है। आएं, रियो को भूल जाएं और टोक्यों के बारे में सोचें और आज से ही तैयारी शुरू कर दें. कुलदीप नैय्यर

रविवार, 14 अगस्त 2016

उसने कहा था

 

(एक)

बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की ज़बान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बंबूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगावें। जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-संबंध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की उँगलियों के पोरों को चींथकर अपने-ही को सताया हुआ बताते हैं, और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में, हर-एक लड्ढी वाले के लिए ठहरकर सब्र का समुद्र उमड़ाकर “बचो खालसा जी”, “हटो भाई जी”, “ठहरना भाई”, “आने दो लाला जी”, “हटो बाछा”—कहते हुए सफ़ेद फेंटों, खच्चरों और बत्तकों, गन्ने, खोमचे और भारे वालों के जंगल में से राह खेते हैं। क्या मजाल है कि “जी” और “साहब” बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती नहीं; पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती है। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं—हट जा जीणे जोगिए; हट जा करमाँवालिए; हट जा पुत्तां प्यारिए; बच जा लंबी वालिए। समष्टि में इनके अर्थ हैं, कि तू जीने योग्य है, तू भाग्यों वाली है, पुत्रों को प्यारी है, लंबी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिए के नीचे आना चाहती है?—बच जा।

ऐसे बंबूकार्ट वालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दुकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था, और यह रसोई के लिए बड़ियाँ। दुकानदार एक परदेसी से गुँथ रहा था, जो सेर-भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था।

“तेरे घर कहाँ हैं?”

“मगरे में और तेरे?”

“माँझे में, यहाँ कहाँ रहती है?”

“अतरसिंह की बैठक में; वे मेरे मामा होते हैं।”

“मैं भी मामा के यहाँ आया हूँ, उनका घर गुरु बाज़ार में हैं।”

 

इतने में दुकानदार निबटा, और इनका सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले। कुछ दूर जाकर लड़के ने मुसकराकर पूछा— “तेरी कुड़माई हो गई?” इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ाकर ‘धत्’ कहकर दौड़ गई, और लड़का मुँह देखता रह गया।

दूसरे-तीसरे दिन सब्जी वाले के यहाँ, दूध वाले के यहाँ अकस्मात दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, “तेरी कुड़माई हो गई?” और उत्तर में वही ‘धत्’ मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली—”हाँ, हो गई।”

“कब?”

“कल; देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।”

लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छावड़ी वाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उँड़ेल दिया। सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पाई—तब कहीं घर पहुँचा।

(दो)

“राम-राम, यह भी कोई लड़ाई है। दिन-रात खंदकों में बैठे हड्डियाँ अकड़ गईं। लुधियाना से दस गुना जाड़ा और मेह और बरफ़ ऊपर से। पिंडलियों तक कीचड़ में धँसे हुए हैं। ज़मीन कहीं दिखती नहीं,—घंटे-दो-घंटे में कान के परदे फाड़ने वाले धमाके के साथ सारी खंदक हिल जाती है और सौ-सौ गज़ धरती उछल पड़ती है। इस गैबी-गोले से बचे तो कोई लड़े। नगरकोट का ज़लज़ला सुना था, यहाँ दिन में पचीस ज़लज़ले होते हैं। जो कहीं खंदक से बाहर साफ़ा या कुहनी निकल गई, तो चटाक से गोली लगती है। न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुए हैं या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं।”

“लहनासिंह, और तीन दिन हैं। चार तो खंदक में बिता ही दिए। परसों ‘रिलीफ़’ आ जाएगी और फिर सात दिन की छुट्टी। अपने हाथों झटका करेंगे और पेट-भर खाकर सो रहेंगे। उसी फ़िरंगी मेम के बाग़ में—मख़मल का-सा हरा घास है। फल और दूध की वर्षा कर देती है। लाख कहते हैं, दाम नहीं लेती। कहती है, तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आए हो।”

“चार दिन तक एक पलक नहीं झेंपी। बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही। मुझे तो संगीन चढ़ाकर मार्च का हुक्म मिल जाए। फिर सात जर्मनों को अकेला मारकर न लौटूँ, तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो। पाजी कहीं के, कलों के घोड़े संगीन देखते ही मुँह फाड़ देते हैं, और पैर पकड़ने लगते हैं। यों अँधेरे में तीस-तीस मन का गोला फेंकते हैं। उस दिन धावा किया था—चार मील तक एक जर्मन नहीं छोड़ा था।

पीछे जनरल ने हट जाने का कमान दिया, “नहीं तो—”

“नहीं तो सीधे बर्लिन पहुँच जाते! क्यों?” सूबेदार हज़ारासिंह ने मुसकराकर कहा— ‘लड़ाई के मामले जमादार या नायब के चलाए नहीं चलते। बड़े अफ़सर दूर की सोचते हैं। तीन सौ मील का सामना है। एक तरफ़ बढ़ गए तो क्या होगा?”

“सूबेदार जी, सच है,” लहनासिंह बोला- “पर करें क्या? हड्डियों-हड्डियों में तो जाड़ा धँस गया है। सूर्य निकलता नहीं, और खाई में दोनों तरफ़ से चंबे की बावलियों के-से सोते झर रहे हैं। एक धावा हो जाए, तो गरमी आ जाए।”

“उदमी उठ, सिगड़ी में कोले डाल। वजीरा, तुम चार जने बाल्टियाँ लेकर खाई का पानी बाहर फेंको। लहनासिंह, शाम हो गई है, खाई के दरवाज़े का पहरा बदल दे।” यह कहते हुए सूबेदार सारी खंदक में चक्कर लगाने लगे। वजीरासिंह पलटन का विदूषक था। बाल्टी में गँदा पानी भरकर खाई के बाहर फेंकता हुआ बोला- “मैं पाधा बन गया हूँ। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण!” इस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गए।

लहनासिंह ने दूसरी बाल्टी भरकर उसके हाथ में देकर कहा- “अपनी बाड़ी के खरबूजों में पानी दो। ऐसा खाद का पानी पंजाब-भर में नहीं मिलेगा।”

“हाँ, देश क्या है, स्वर्ग है। मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस घुमा ज़मीन यहाँ माँग लूँगा और फलों के बूटे लगाऊँगा।”

“लाड़ी होराँ को भी यहाँ बुला लोगे? या वही दूध पिलाने वाली फ़िरंगी मेम-”

“चुपकर। यहाँ वालों को शरम नहीं।”

“देश-देश की चाल है। आज तक मैं उसे समझा न सका कि सिख तंबाकू नहीं पीते। वह सिगरेट देने में हठ करती है, ओठों में लगाना चाहती है, और मैं पीछे हटता हूँ तो समझती है कि राजा बुरा मान गया, अब मेरे मुल्क के लिए लड़ेगा नहीं।”

“अच्छा, अब बोधासिंह कैसा है?”

“अच्छा है।”

“जैसे मैं जानता ही न होऊँ! रात-भर तुम अपने कंबल उसे उढ़ाते हो और आप सिगड़ी के सहारे गुज़र करते हो। उसके पहरे पर आप पहरा दे आते हो। अपने सूखे लकड़ी के तख़्तों पर उसे सुलाते हो, आप कीचड़ में पड़े रहते हो। कहीं तुम न माँदे पड़ जाना। जाड़ा क्या है, मौत है और ‘निमोनिया’ से मरने वालों को मुरब्बे नहीं मिला करते।”

“मेरा डर मत करो। मैं तो बुलेल की खड्ड के किनारे मरूँगा। भाई कीरतसिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाए हुए आँगन के आम के पेड़ की छाया होगी।”

वजीरासिंह ने त्योरी चढ़ाकर कहा- “क्या मरने-मारने की बात लगाई है? मरें जर्मनी और तुरक!

“हाँ भाइयों, कुछ गाओ।”

“दिल्ली शहर तें पिशोर नुं जाँदिए,

कर लेणा लौंगां दा बपार मड़िए;

कर लेणा नाड़ेदा सौदा अड़िए-

(ओय) लाणा चटाका कदुए नुँ।

कद्दू बणया वे मज़ेदार गोरिए,

हुण लाणा चटाका कदुए नुँ।।”

कौन जानता था कि दाढ़ियों वाले घरबारी सिख ऐसा लुच्चों का गीत गाएँगे, पर सारी खंदक इस गीत से गूँज उठी और सिपाही फिर ताज़े हो गए, मानों चार दिन से सोते और मौज ही करते रहे हों।

(तीन)

दो पहर रात गई है; अँधेरा है। सन्नाटा छाया हुआ है। बोधासिंह ख़ाली बिसकुटों के तीन टिनों पर अपने दोनों कंबल बिछाकर और लहनासिंह के दो कंबल और एक बरानकोट ओढ़कर सो रहा है। लहनासिंह पहरे पर खड़ा हुआ है। एक आँख खाई के मुँह पर है और एक बोधासिंह के दुबले शरीर पर। बोधासिंह कराहा।

“क्यों बोधा भाई, क्या है?”

“पानी पिला दो।”

लहनासिंह ने कटोरा उसके मुँह से लगाकर पूछा- “कहो कैसे हो?” पानी पीकर बोधा बोला- “कँपनी छुट रही है। रोम-रोम में तार दौड़ रहे हैं। दाँत बज रहे हैं।”

“अच्छा, मेरी जरसी पहन लो!”

“और तुम?”

“मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है। पसीना आ रहा है।”

“ना, मैं नहीं पहनता। चार दिन से तुम मेरे लिए— ”

“हाँ, याद आई। मेरे पास दूसरी गरम जरसी है। आज सबेरे ही आई है। विलायत से मेम बुन-बुनकर भेज रही हैं। गुरु उनका भला करें।” यों कहकर लहना अपना कोट उतारकर जरसी उतारने लगा।

“सच कहते हो?”

“और नहीं झूठ?” यों कहकर नाहीं करते बोधा को उसने ज़बरदस्ती जरसी पहना दी और आप ख़ाकी कोट और जीन का कुरता भर पहनकर पहरे पर आ खड़ा हुआ। मेम की जरसी की कथा केवल कथा थी।

आधा घंटा बीता। इतने में खाई के मुँह से आवाज़ आई- “सूबेदार हजारासिंह।”

“कौन लपटन साहब? हुक्म हुज़ूर!”—कहकर सूबेदार तनकर फ़ौजी सलाम करके सामने हुआ।

“देखो, इसी दम धावा करना होगा। मील भर की दूरी पर पूरब के कोने में एक जर्मन खाई है। उसमें पचास से ज़्यादा जर्मन नहीं हैं। इन पेड़ों के नीचे-नीचे दो खेत काटकर रास्ता है। तीन-चार घुमाव हैं। जहाँ मोड़ है वहाँ पंद्रह जवान खड़े कर आया हूँ। तुम यहाँ दस आदमी छोड़कर सबको साथ ले उनसे जा मिलो। खंदक छीनकर वहीं, जब तक दूसरा हुक्म न मिले, डटे रहो। हम यहाँ रहेंगे।”

“जो हुक्म।”

चुपचाप सब तैयार हो गए। बोधा भी कंबल उतारकर चलने लगा। तब लहनासिंह ने उसे रोका। लहनासिंह आगे हुआ तो बोधा के बाप सूबेदार ने उँगली से बोधा की ओर इशारा किया। लहनासिंह समझकर चुप हो गया। पीछे दस आदमी कौन रहें, इस पर बड़ी हुज्जत हुई। कोई रहना न चाहता था। समझा-बुझाकर सूबेदार ने मार्च किया। लपटन साहब लहना की सिगड़ी के पास मुँह फेरकर खड़े हो गए और जेब से सिगरेट निकालकर सुलगाने लगे। दस मिनट बाद उन्होंने लहना की ओर हाथ बढ़ाकर कहा— “लो तुम भी पियो।”

आँख मारते-मारते लहनासिंह सब समझ गया। मुँह का भाव छिपाकर बोला- “लाओ साहब।” हाथ आगे करते ही उसने सिगड़ी के उजाले में साहब का मुँह देखा। बाल देखे। तब उसका माथा ठनका। लपटन साहब के पट्टियों वाले बाल एक दिन में ही कहाँ उड़ गए और उनकी जगह क़ैदियों से कटे बाल कहाँ से आ गए?

शायद साहब शराब पिए हुए हैं और उन्हें बाल कटवाने का मौका मिल गया है? लहनासिंह ने जाँचना चाहा। लपटन साहब पाँच वर्ष से उसकी रेजिमेंट में थे।

“क्यों साहब, हम लोग हिंदुस्तान कब जाएँगे?”

“लड़ाई ख़त्म होने पर। क्यों, क्या यह देश पसंद नहीं?”

“नहीं साहब, शिकार के वे मज़े यहाँ कहाँ? याद है, पार साल नकली लड़ाई के पीछे हम आप जगाधरी ज़िले में शिकार करने गए थे—“हाँ, हाँ—वहीं जब आप खोते पर सवार थे और आपका ख़ानसामा अब्दुल्ला रास्ते के एक मंदिर में जल चढ़ाने को रह गया था?” ‘बेशक पाजी कहीं का’—सामने से वह नीलगाय निकली कि ऐसी बड़ी मैंने कभी न देखी थी। और आपकी एक गोली कंधे में लगी और पुट्ठे में निकली। ऐसे अफ़सर के साथ शिकार खेलने में मज़ा है। क्यों साहब, शिमले से तैयार होकर उस नीलगाय का सिर आ गया था न? आपने कहा था कि रेजिमेंट की मैस में लगाएँगे।” “हाँ, पर मैंने वह विलायत भेज दिया”—“ऐसे बड़े-बड़े सींग! दो-दो फुट के तो होंगे?”

“हाँ, लहनासिंह, दो फुट चार इंच के थे। तुमने सिगरेट नहीं पिया?”

 

“पीता हूँ साहब, दियासलाई ले आता हूँ”—कहकर लहनासिंह खंदक में घुसा। अब उसे संदेह नहीं रहा था। उसने झटपट निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए।

अँधेरे में किसी सोने वाले से वह टकराया।

“कौन? वजीरासिंह?”

“हाँ, क्यों लहना? क्या क़यामत आ गई? ज़रा तो आँख लगने दी होती?”

(चार)

“होश में आओ। क़यामत आई है और लपटन साहब की वर्दी पहनकर आई है।”

“क्या?”

“लपटन साहब या तो मारे गए है या क़ैद हो गए हैं। उनकी वर्दी पहनकर यह कोई जर्मन आया है। सूबेदार ने इसका मुँह नहीं देखा। मैंने देखा और बातें की है। सौहरा साफ़ उर्दू बोलता है, पर किताबी उर्दू। और मुझे पीने को सिगरेट दिया है?”

“तो अब!

“अब मारे गए। धोखा है। सूबेदार कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर धावा होगा। उठो, एक काम करो। पलटन के पैरों के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर न गए होंगे। सूबेदार से कहो एकदम लौट आएँ। खंदक की बात झूठ है। चले जाओ, खंदक के पीछे से निकल जाओ। पत्ता तक न खड़के। देर मत करो।”

“हुकुम तो यह है कि यहीं…”

“ऐसी तैसी हुकुम की! मेरा हुकुम—जमादार लहनासिंह जो इस वक़्त यहाँ सब से बड़ा अफ़सर है, उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की ख़बर लेता हूँ।”

“पर यहाँ तो तुम आठ ही हो।”

“आठ नहीं, दस लाख। एक-एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ।”

 

लौटकर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खंदक की दीवारों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार-सा बाँध दिया। तार के आगे सूत की एक गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा। बाहर की तरफ़ जाकर एक दियासलाई जलाकर गुत्थी पर रखने—

बिजली की तरह दोनों हाथों से उल्टी बंदूक को उठाकर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तानकर दे मारा। धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी। लहनासिंह ने एक कुंदा साहब की गर्दन पर मारा और साहब “आँख! मीन गौट्ट” कहते हुए चित्त हो गए। लहनासिंह ने तीनों गोले बीनकर खंदक के बाहर फेंके और साहब को घसीटकर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफ़ाफ़े और एक डायरी निकालकर उन्हें अपनी जेब के हवाले किया।

साहब की मूर्च्छा हटी। लहनासिंह हँसकर बोला— “क्यों लपटन साहब? मिज़ाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखीं। यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं। यह सीखा कि जगाधरी के ज़िले में नीलगाएँ होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं। यह सीखा कि मुसलमान ख़ानसामा मूर्तियों पर जल चढ़ाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं। पर यह तो कहो, ऐसी साफ़ उर्दू कहाँ से सीख आए? हमारे लपटन साहब तो बिन डेम के पाँच लफ़्ज़ भी नहीं बोला करते थे।”

लहना ने पतलून के जेबों की तलाशी नहीं ली थी। साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए, दोनों हाथ जेबों में डाले।

लहनासिंह कहता गया— “चालाक तो बड़े हो पर माँझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिए चार आँखें चाहिए। तीन महीने हुए एक तुरकी मौलवी मेरे गाँव आया था। औरतों को बच्चे होने के ताबीज़ बाँटता था और बच्चों को दवाई देता था। चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछाकर हुक़्क़ा पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित हैं। वेद पढ़-पढ़कर उसमें से विमान चलाने की विद्या जान गए हैं। गौ को नहीं मारते। हिंदुस्तान में आ जाएँगे तो गोहत्या बंद कर देंगे। मंडी के बनियों को बहकाता कि डाकख़ाने से रूपया निकाल लो। सरकार का राज्य जाने वाला है। डाक-बाबू पोल्हूराम भी डर गया था। मैंने मुल्लाजी की दाढ़ी मूड़ दी थी। और गाँव से बाहर निकालकर कहा था कि जो मेरे गाँव में अब पैर रखा तो—”

साहब की जेब में से पिस्तौल चली और लहना की जाँघ में गोली लगी। इधर लहना की हैनरी मार्टिन के दो फ़ायरों ने साहब की कपाल-क्रिया कर दी। धड़ाका सुनकर सब दौड़ आए।

बोधा चिल्लाया— “क्या है?”

लहनासिंह ने उसे यह कहकर सुला दिया कि “एक हड़का हुआ कुत्ता आया था, मार दिया” और, औरों से सब हाल कह दिया। सब बंदूकें लेकर तैयार हो गए। लहना ने साफ़ा फाड़कर घाव के दोनों तरफ़ पट्टियाँ कसकर बाँधी। घाव माँस में ही था। पट्टियों के कसने से लहू निकलना बंद हो गया।

इतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े। सिखों की बंदूकों की बाढ़ ने पहले धावे को रोका। दूसरे को रोका। पर यहाँ थे आठ (लहनासिंह तक-तककर मार रहा था—वह खड़ा था, और लेटे हुए थे) और वे सत्तर। अपने मुर्दा भाइयों के शरीर पर चढ़कर जर्मन आगे घुसे आते थे। थोड़े से मिनटों में वे...

अचानक आवाज़ आई, “वाहे गुरुजी की फतह? वाहे गुरुजी का ख़ालसा!!” और धड़ाधड़ बंदूकों के फ़ायर जर्मनों की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौक़े पर जर्मन दो चक्की के पाटों के बीच में आ गए। पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछे वालों ने भी संगीन पिरोना शुरू कर दिया।

एक किलकारी और—“अकाल सिक्खाँ दी फ़ौज आई! वाहे गुरुजी की फतह! वाहे गुरुजी का ख़ालसा ! सत श्री अकालपुरुख!!!” और लड़ाई ख़त्म हो गई। तिरेसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिखों में पंद्रह के प्राण गए। सूबेदार के दाहिने कंधे में से गोली आर-पार निकल गई। लहनासिंह की पसली में एक गोली लगी। उसने घाव को खंदक की गीली मट्टी से पूर लिया और बाक़ी का साफ़ा कसकर कमरबंद की तरह लपेट लिया। किसी को ख़बर न हुई कि लहना को दूसरा घाव—भारी घाव लगा है।

लड़ाई के समय चाँद निकल आया था, ऐसा चाँद, जिसके प्रकाश से संस्कृत-कवियों का दिया हुआ ‘क्षयी’ नाम सार्थक होता है। और हवा ऐसी चल रही थी जैसी बाणभट्ट की भाषा में “दंतवीणोपदेशाचार्य” कहलाती। वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मन भर फ्रांस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी, जब मैं दौड़ा-दौड़ा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहनासिंह से सारा हाल सुन और काग़ज़ात पाकर वे उसकी तुरंत-बुद्धि को सराह रहे थे और कह रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते।

इस लड़ाई की आवाज़ तीन मील दाहिनी ओर की खाई वालों ने सुन ली थी। उन्होंने पीछे टेलीफ़ोन कर दिया था। वहाँ से झटपट दो डॉक्टर और दो बीमार ढोने की गाड़ियाँ चलीं, जो कोई डेढ़ घंटे के अंदर आ पहुँचीं। फ़ील्ड अस्पताल नज़दीक था। सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जाएँगे, इसलिए मामूली पट्टी बाँधकर एक गाड़ी में घायल लिटाए गए और दूसरी में लाशें रखी गईं। सूबेदार ने लहनासिंह की जाँघ में पट्टी बँधवानी चाही। पर उसने यह कहकर टाल दिया कि थोड़ा घाव है, सबेरे देखा जाएगा। बोधासिंह ज्वर में बर्रा रहा था। वह गाड़ी में लिटाया गया। लहना को छोड़कर सूबेदार जाते नहीं थे। यह देख लहना ने कहा— “तुम्हें बोधा की क़सम है, और सूबेदारनीजी की सौगंध है जो इस गाड़ी में न चले जाओ।”

“और तुम?”

 

“मेरे लिए वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना, और जर्मन मुरदों के लिए भी तो गाड़ियाँ आती होंगी। मेरा हाल बुरा नहीं है। देखते नहीं, मैं खड़ा हूँ? वजीरासिंह मेरे पास है ही।”

“अच्छा, पर—”

“बोधा गाड़ी पर लेट गया? भला। आप भी चढ़ जाओ। सुनिए तो, सूबेदारनी होराँ को चिठ्ठी लिखो, तो मेरा मत्था टेकना लिख देना। और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उसने कहा था वह मैंने कर दिया।”

गाड़ियाँ चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़कर कहा- “तैने मेरे और बोधा के प्राण बचाए हैं। लिखना कैसा? साथ ही घर चलेंगे। अपनी सूबेदारनी को तू ही कह देना। उसने क्या कहा था?”

“अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैंने जो कहा, वह लिख देना, और कह भी देना।”

गाड़ी के जाते लहना लेट गया। “वजीरा पानी पिला दे, और मेरा कमरबंद खोल दे। तर हो रहा है।”

(पाँच)

मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ़ हो जाती है। जन्म-भर की घटनाएँ एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यों के रंग साफ़ होते हैं। समय की धुँध बिल्कुल उन पर से हट जाती है।

लहनासिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर में मामा के यहाँ आया हुआ है। दही वाले के यहाँ, सब्जी वाले के यहाँ, हर कहीं, उसे एक आठ वर्ष की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता है, तेरी कुड़माई हो गई? तब धत् कहकर वह भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा, तो उसने कहा- “हाँ, कल हो गई, देखते नहीं यह रेशम के फूलों वाला सालू? सुनते ही लहनासिंह को दुःख हुआ। क्रोध हुआ। क्यों हुआ?

“वजीरासिंह, पानी पिला दे।”

** ** **

पच्चीस वर्ष बीत गए। अब लहनासिंह नं. 77 राइफ़ल्स में जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा। न-मालूम वह कभी मिली थी, या नहीं। सात दिन की छुट्टी लेकर ज़मीन के मुक़दमें की पैरवी करने वह अपने घर गया। वहाँ रेजिमेंट के अफ़सर की चिठ्ठी मिली कि फ़ौज लाम पर जाती है, फ़ौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिठ्ठी मिली कि मैं और बोधासिंह भी लाम पर जाते हैं। लौटते हुए हमारे घर होते जाना। साथ ही चलेंगे। सूबेदार का गाँव रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था। लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा।

जब चलने लगे, तब सूबेदार बेढे में से निकलकर आया। बोला— “लहना, सूबेदारनी तुमको जानती हैं, बुलाती हैं। जा मिल आ।” लहनासिंह भीतर पहुँचा। सूबेदारनी मुझे जानती हैं? कब से? रेजिमेंट के क्वार्टरों में तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं। दरवाज़े पर जाकर ‘मत्था टेकना’ कहा। असीस सुनी। लहनासिंह चुप।

“मुझे पहचाना?”

“नहीं।”

“तेरी कुड़माई हो गई—धत्—कल हो गई—देखते नहीं, रेशमी बूटों वाला सालू—अमृतसर में—”

भावों की टकराहट से मूर्च्छा खुली। करवट बदली। पसली का घाव बह निकला।

“वजीरा, पानी पिला”—उसने कहा था।

** ** **

स्वप्न चल रहा है। सूबेदारनी कह रही है— “मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूँ। मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का ख़िताब दिया है, लायलपुर में ज़मीन दी है, आज नमक-हलाली का मौक़ा आया है। पर सरकार ने हम तीमियों की एक घँघरिया पलटन क्यों न बना दी, जो मैं भी सूबेदारजी के साथ चली जाती? एक बेटा है। फ़ौज में भर्ती हुए उसे एक ही बरस हुआ। उसके पीछे चार और हुए, पर एक भी नहीं जिया। सूबेदारनी रोने लगी। अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन ताँगे वाले का घोड़ा दही वाले की दुकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाए थे, आप घोड़े की लातों में चले गए थे, और मुझे उठाकर दुकान के तख़्ते पर खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे आँचल पसारती हूँ।”

रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी में चली गई। लहना भी आँसू पोंछता हुआ बाहर आया।

“वजीरासिंह, पानी पिला”— उसने कहा था।

 

** ** **

लहना का सिर अपनी गोद में लिटाए वजीरासिंह बैठा है। जब माँगता है, तब पानी पिला देता है। आधे घंटे तक लहना चुप रहा, फिर बोला- “कौन! कीरतसिंह?”

वजीरा ने कुछ समझकर कहा- “हाँ।”

“भइया, मुझे और ऊँचा कर ले। अपने पट्टे पर मेरा सिर रख ले।” वजीरा ने वैसे ही किया।

“हाँ, अब ठीक है। पानी पिला दे। बस, अब के हाड़ में यह आम ख़ूब फलेगा। चचा-भतीजा दोनों यहीं बैठकर आम खाना। जितना बड़ा तेरा भतीजा है, उतना ही यह आम है। जिस महीने उसका जन्म हुआ था, उसी महीने में मैंने इसे लगाया था।” वजीरासिंह के आँसू टप-टप टपक रहे थे।

** ** **

कुछ दिन पीछे लोगों ने अख़बारों में पढ़ा—“फ़्रांस और बेलजियम— 68वीं सूची—मैदान में घावों से मरा—नं. 77 सिख राइफ़ल्स जमादार लहनासिंह।

चंद्रधर शर्मा गुलेरी


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सोमवार, 20 जून 2016

दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी


गर्मी के दिन थे। बादशाह ने उसी फाल्गुन में सलीमा से नई शादी की थी। सल्तनत के सब झंझटों से दूर रहकर नई दुलहिन के साथ प्रेम और आनंद की कलोलें करने, वह सलीमा को लेकर कश्मीर के दौलतख़ाने में चले आए थे।

रात दूध में नहा रही थी। दूर के पहाड़ों की चोटियाँ बर्फ़ से सफ़ेद होकर चाँदनी में बहार दिखा रही थीं। आरामबाग़ के महलों के नीचे पहाड़ी नदी बल खाकर बह रही थी।

 

मोतीमहल के एक कमरे में शमादान जल रहा था, और उसकी खुली खिड़की के पास बैठी सलीमा रात का सौंदर्य निहार रही थी। खुले हुए बाल उसकी फ़िरोज़ी रंग की ओढ़नी पर खेल रहे थे। चिकन के काम से सजी और मोतियों से गुँथी हुई उस फ़िरोज़ी रंग की ओढ़नी पर, कसी हुई कमखाब की कुरती और पन्नों की कमरपेटी पर, अंगूर के बराबर बड़े मोतियों की माला झूम रही थी। सलीमा का रंग भी मोती के समान था। उसकी देह की गठन निराली थी। संगमर्मर के समान पैरों में ज़री के काम के जूते पड़े थे, जिन पर दो हीरे धक्-धक् चमक रहे थे।

कमरे में एक कीमती ईरानी कालीन का फ़र्श बिछा था, जो पैर लगते ही हाथ भर धँस जाता था। सुगंधित मसालों से बने हुए शमादान जल रहे थे। कमरे में चार पूरे क़द के आईने लगे थे। संगमर्मर के आधारों पर सोने-चाँदी के फूलदानों में ताज़े फूलों के गुलदस्ते रखे थे। दीवारों और दरवाज़ों पर चतुराई से गुँथी हुई नागकेसर और चंपे की मालाएँ झूल रही थीं, जिनकी सुगंध से कमरा महक रहा था। कमरे में अनगिनत बहुमूल्य कारीगरों की देश-विदेश की वस्तुएँ क़रीने से सजी हुई थीं।

 

बादशाह दो दिन से शिकार को गए थे। आज इतनी रात हो गई, अभी तक नहीं आए। सलीमा चाँदनी में दूर तक आँखें बिछाए सवारों की गर्द देखती रही। आख़िर उससे न रहा गया, वह खिड़की से उठकर, अनमनी-सी होकर मसनद पर आ बैठी। उम्र और चिंता की गर्मी जब उससे सहन न हुई, तब उसने अपनी चिकन की ओढ़नी भी उतार फेंकी और आप ही आप झुँझलाकर बोली—”कुछ भी अच्छा नहीं लगता। अब क्या करूँ?” इसके बाद उसने पास रखी बीन उठा ली। दो-चार उँगली चलाई, मगर स्वर न मिला। उसने भुनभुनाकर कहा—”मर्दों की तरह यह भी मेरे वश में नहीं है।” सलीमा ने उकताकर उसे रखकर दस्तक दी। एक बाँदी दस्तबस्ता हाज़िर हुई।

बाँदी अत्यंत सुंदरी और कमसिन थी। उसके सौंदर्य में एक गहरे विषाद की रेखा और नेत्रों में नैराश्य-स्याही थी। उसे पास बैठने का हुक्म देकर सलीमा ने कहा—“साक़ी, तुझे बीन अच्छी लगती है या बाँसुरी?”

 

बाँदी ने नम्रता से कहा—“हुज़ूर जिसमें ख़ुश हों।”

सलीमा ने कहा—“पर तू किसमें ख़ुश है?”

 

बाँदी ने कंपित स्वर में कहा—“सरकार बाँदियों की ख़ुशी ही क्या?”

क्षण भर सलीमा ने बाँदी के मुँह की तरफ़ देखा—वैसा ही विषाद, निराशा और व्याकुलता का मिश्रण हो रहा था।

 

सलीमा ने कहा—“मैं क्या तुझे बाँदी की नज़र से देखती हूँ?”

‘‘नहीं, हज़रत की तो लौंडी पर ख़ास मेहरबानी है।”

 

‘‘तब तू इतनी उदास, झिझकी हुई और एकांत में क्यों रहती है? जब से तू नौकर हुई है, ऐसा ही देखती हूँ! अपनी तकलीफ़ मुझसे तो कह प्यारी साक़ी।”

इतना कहकर सलीमा ने उसके पास खिसक कर उसका हाथ पकड़ लिया।

 

बाँदी काँप गई, पर बोली नहीं।

सलीमा ने कहा—“क़समिया! तू अपना दर्द मुझ से कह! तू इतनी उदास क्यों रहती है?”

 

बाँदी ने कंपित स्वर में कहा—“हुज़ूर क्यों इतनी उदास रहती हैं?”

सलीमा ने कहा—“इधर जहाँपनाह कुछ कम आने लगे हैं। इससे तबीयत ज़रा उदास रहती है।”

 

बाँदी—“सरकार, प्यारी चीज़ न मिलने से इंसान को उदासी आ ही जाती है, अमीर और ग़रीब, सभी का दिल तो दिल ही है।”

सलीमा हँसी। उसने कहा—“समझी, अब तू किसी को चाहती है। मुझे उसका नाम बता, उसके साथ तेरी शादी करा दूँगी।”

 

साक़ी का सिर घूम गया। एकाएक उसने बेग़म की आँखों से आँख मिलाकर कहा—“मैं आपको चाहती हूँ।”

सलीमा हँसते-हँसते लोट गई। उस मदमाती हँसी के वेग में उसने बाँदी का कंपन नहीं देखा। बाँदी ने वंशी लेकर कहा—“क्या सुनाऊँ?”

 

बेग़म ने कहा—“ठहर, कमरा बहुत गर्म मालूम देता है। इसके तमाम दरवाज़े और खिड़कियाँ खोल दे। चिराग़ों को बुझा दे, चटख़ती चाँदनी का लुत्फ़ उठाने दे और फूल-मालाएँ मेरे पास रख दे।”

बाँदी उठी। सलीमा बोली—“सुन, पहले एक गिलास शरबत दे, बहुत प्यासी हूँ।”

 

बाँदी ने सोने के गिलास में ख़ुशबूदार शरबत बेग़म के सामने ला धरा। बेग़म ने कहा–“उफ़! यह तो बहुत गर्म है। क्या इसमें गुलाब नहीं दिया?”

बाँदी ने नम्रता से कहा—“दिया तो है सरकार?”

 

‘‘अच्छा, इसमें थोड़ा-सा इस्तम्बोल और मिला।”

साक़ी गिलास लेकर दूसरे कमरे में चली गई। इस्तम्बोल मिलाया और भी एक चीज़ मिलाई। फिर वह सुवासित मदिरा का पात्र बेग़म के सामने ला धरा।

 

एक ही साँस में उसे पीकर बेग़म ने कहा—“अच्छा, अब सुना। तूने कहा कि मुझे प्यार करती है, सुना कोई प्यार का गाना सुना।”

इतना कह और गिलास को गलीचे पर लुढ़काकर मदमाती मसनद पर ख़ुद लुढ़क गई, और रसभरे नेत्रों से साक़ी की ओर देखने लगी। साक़ी ने वंशी का सुर मिलाकर गाना शुरू किया—

 

“दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी...”

बहुत देर तक साक़ी की वंशी और कंठ-ध्वनि कमरे में घूम-घूमकर रोती रही। धीरे-धीरे साक़ी ख़ुद रोने लगी। सलीमा मदिरा और यौवन के नशे में होकर झूमने लगी।

 

गीत ख़तम करके साक़ी ने देखा, सलीमा बेसुध पड़ी है। शराब की तेज़ी से उसके गाल एकदम सुर्ख़ हो गए हैं और तांबूल-राग-रंजित होंठ रह-रहकर फड़क रहे हैं। साँस की सुगंध से कमरा महक रहा है। जैसे मंद पवन से कोमल पत्ती काँपने लगती है, उसी प्रकार सलीमा का वक्षस्थल धीरे-धीरे काँप रहा है। प्रस्वेद की बूँदें ललाट पर दीपक के उज्ज्वल प्रकाश में मोतियों की तरह चमक रही हैं।

वंशी रखकर साक़ी क्षण भर बेग़म के पास आकर खड़ी हुई। उसका शरीर काँपा, आँखें जलने लगीं, कंठ सूख गया। वह घुटने के बल बैठकर बहुत धीरे-धीरे अपने आँचल से बेग़म के मुख का पसीना पोंछने लगी। इसके बाद उसने झुककर बेग़म का मुँह चूम लिया।

 

इसके बाद ज्योंही उसने अचानक आँख उठाकर देखा, ख़ुद दीन-दुनियाँ के मालिक शाहजहाँ खड़े उसकी यह करतूत अचरज और क्रोध से देख रहे हैं।

साक़ी को साँप डस गया। वह हतबुद्धि की तरह बादशाह का मुँह ताकने लगी। बादशाह ने कहा—“तू कौन है, और यह क्या कर रही थी?”

 

साक़ी चुप खड़ी रही। बादशाह ने कहा- ‘‘जवाब दे!”

साक़ी ने धीमे स्वर में कहा—“जहाँपनाह! कनीज़ अगर कुछ जवाब न दे तो?”

 

बादशाह सन्नाटे में आ गए। बाँदी की इतनी स्पर्धा!

उन्होंने कहा—“मेरी बात का जवाब नहीं? अच्छा, तुझे नंगी करके कोड़े लगाए जाएँगे।”

 

साक़ी ने कंपित स्वर में कहा—“मैं मर्द हूँ!”

बादशाह की आँखों में सरसों फूल उठी, उन्होंने अग्निमय नेत्रों से सलीमा की ओर देखा। वह बेसुध पड़ी सो रही थी। उसी तरह उसका भरा यौवन खुला पड़ा था। उसके मुँह से निकला, ‘‘उफ़ फ़ाहिशा।” और तत्काल उनका हाथ तलवार की मूठ पर गया। फिर नीचे को उन्होंने घूमकर कहा—“दोज़ख़ के कुत्ते! तेरी यह मजाल!”

 

फिर कठोर स्वर से पुकारा—“मादूम!”

क्षण भर में एक भयंकर रूप वाली तातारी औरत बादशाह के सामने अदब से आ खड़ी हुई। बादशाह ने हुक्म दिया—“इस मर्दूद को तहख़ाने में डाल दे, ताकि बिना खाए-पिए मर जाए।”

 

मादूम ने अपने कर्कश हाथों में युवक का हाथ पकड़ा और ले चली। थोड़ी देर में दोनों लोहे के एक मज़बूत दरवाज़े के पास आ खड़े हुए। तातारी बाँदी ने चाबी निकालकर दरवाज़ा खोला और क़ैदी को भीतर ढकेल दिया। कोठरी की गच क़ैदी का बोझा ऊपर पड़ते ही काँपती हुई नीचे को धसकने लगी।

प्रभात हुआ। सलीमा की बेहोशी दूर हुई। चौंककर उठ बैठी। बाल सँवारे, ओढ़नी ठीक की और चोली के बटन कसने को आईने के सामने जा खड़ी हुई। खिड़कियाँ बंद थीं। सलीमा ने पुकारा—“साक़ी! प्यारी साक़ी! बड़ी गर्मी है, ज़रा खिड़की तो खोल दे। निगोड़ी नींद ने तो आज ग़ज़ब ढा दिया। शराब कुछ तेज़ थी।”

 

किसी ने सलीमा की बात न सुनी। सलीमा ने ज़रा ज़ोर से पुकारा—“साक़ी!”

जवाब न पाकर सलीमा हैरान हुई। वह ख़ुद खिड़कियाँ खोलने लगी, मगर खिड़कियाँ बाहर से बंद थीं। सलीमा ने विस्मय से मन ही मन कहा—“क्या बात है? लौंडियाँ सब क्या हुईं?”

 

वह द्वार की तरफ़ चली। देखा, एक तातारी बाँदी नंगी तलवार लिए पहरे पर मुस्तैद खड़ी है। बेग़म को देखते ही उसने सिर झुका लिया।

सलीमा ने क्रोध से कहा—“तुम लोग यहाँ क्यों हो?”

 

‘‘बादशाह के हुक्म से।”

‘‘क्या बादशाह आ गए?”

 

‘‘जी, हाँ।”

‘‘मुझे इत्तला क्यों नहीं की?”

 

‘‘हुक्म नहीं था।”

‘‘बादशाह कहाँ हैं?”

 

‘‘ज़ीनतमहल के दौलतख़ाने पर।”

सलीमा के मन में अभिमान हुआ। उसने कहा—“ठीक है, ख़ूबसूरती की हाट में जिनका कारोबार है, मुहब्बत को क्या समझेंगे? तो अब ज़ीनतमहल की क़िस्मत खुली?”

 

तातारी स्त्री चुपचाप खड़ी रही। सलीमा फिर बोली—

‘‘मेरी साक़ी कहाँ है?”

 

‘‘क़ैद में।”

‘‘क्यों?”

 

‘‘जहाँपनाह का हुक्म था।”

‘‘उसका क़ुसूर क्या था?”

 

‘‘मैं अर्ज़ नहीं कर सकती।”

‘‘क़ैदखाने की चाबी मुझे दे, मैं अभी उसे छुड़ाती हूँ।”

 

‘‘आपको अपने कमरे से बाहर जाने का हुक्म नहीं है।”

‘‘तब क्या मैं भी क़ैद हूँ?”

 

‘‘जी हाँ।”

सलीमा की आँखों में आँसू भर आए। वह लौटकर मसनद पर पड़ गई और फूट-फूटकर रोने लगी। कुछ ठहरकर उसने एक ख़त लिखा—“हुज़ूर! मेरा क़ुसूर माफ़ फ़र्मावें। दिन भर की थकी होने से ऐसी बेसुध सो गई कि हुज़ूर के इस्तक़बाल में हाज़िर न रह सकी। और मेरी उस प्यारी लौंडी की भी जाँ-बख़्शी की जाए। उसने हुज़ूर के दौलतख़ाने में लौट आने की इत्तला मुझे वाजबी तौर पर न देकर बेशक भारी क़ुसूर किया है, मगर वह नई, कमसिन, ग़रीब और दुखिया है।

 

कनीज़

सलीमा।”

 

चिट्ठी बादशाह के पास भेज दी गई। बादशाह की तबीयत बहुत नासाज़ थी। तमाम हिंदुस्तान के बादशाह की औरत फ़ाहिशा निकले। बादशाह अपनी आँखों से परपुरुष को उसका मुँह चूमते देख चुके थे। वह ग़ुस्से से तलमला रहे थे और ग़म ग़लत करने को अंधाधुंध शराब पी रहे थे। ज़ीनतमहल मौक़ा देखकर सौतियाडाह का बुख़ार निकाल रही थी। तातारी बाँदी को देखकर बादशाह ने आगबबूला होकर कहा—“क्या लाई हो?”

बाँदी ने दस्तबस्ता अर्ज़ की—“ख़ुदाबंद! सलीमा बीबी की अर्ज़ी है।”

 

बादशाह ने ग़ुस्से से होंठ चबाकर कहा—“उससे कह दे कि मर जाए।”

इसके बाद ख़त में एक ठोकर मारकर उन्होंने उधर से मुँह फेर लिया। बाँदी लौट आई। बादशाह का जवाब सुनकर सलीमा धरती पर बैठ गई। उसने बाँदी को बाहर जाने का हुक्म दिया और दरवाज़ा बंद करके फूट-फूटकर रोई। घंटों बीत गए, दिन छिपने लगा, सलीमा ने कहा—“हाय! बादशाहों की बेग़म होना भी बद-नसीबी है! इंतज़ारी करते-करते आँख फूट जाए, मिन्नतें करते-करते ज़बान घिस जाए, अदब करते-करते जिस्म के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँ, फिर भी इतनी-सी बात पर कि मैं ज़रा सो गई, उनके आने पर जाग न सकी, इतनी सज़ा? इतनी बेइज़्ज़ती?”

 

‘‘तब मैं बेग़म क्या हुई? ज़ीनत और बाँदियाँ सुनेंगी तो क्या कहेंगी? इस बेइज़्ज़ती के बाद मुँह दिखाने लायक़ कहाँ रही? अब तो मरना ही ठीक है। अफ़सोस, मैं किसी ग़रीब की औरत क्यों न हुई!”

धीरे-धीरे स्त्रीत्व का तेज़ उसकी आत्मा में उदय हुआ। गर्व और दृढ़ प्रतिज्ञा के चिह्न उसके नेत्रों में छा गए। वह साँपनी की तरह चपेट खाकर उठ खड़ी हुई। उसने एक और ख़त लिखा—

 

‘‘दुनिया के मालिक! आपकी बीवी और कनीज़ होने की वजह से आपके हुक्म को मानकर मरती हूँ, इतनी बेइज़्ज़ती पाकर एक मलिका का मरना ही मुनासिब है, मगर इतने बड़े बादशाह को औरतों को इस क़दर नाचीज़ तो न समझना चाहिए कि अदना-सी बेवक़ूफ़ी की इतनी बड़ी सज़ा दी जाए। मेरा क़ुसूर तो इतना ही था कि मैं बेख़बर सो गई थी। ख़ैर, फिर एक बार हुज़ूर को देखने की ख़्वाहिश लेकर मरती हूँ। मैं उस पाक परवरदिगार के पास जाकर अर्ज़ करुँगी कि वह मेरे शौहर को सलामत रक्खें।

सलीमा”

 

ख़त को इत्र से सुवासित करके ताज़े फूलों के एक गुलदस्ते में इस तरह रख दिया, जिससे किसी की उस पर नज़र न पड़ जाए। इसके बाद उसने जवाहर की पेटी से एक बहुमूल्य अँगूठी निकाली और कुछ देर तक आँख गड़ा-गड़ाकर उसे देखती रही। फिर उसे चाट गई।

बादशाह शाम की हवाख़ोरी को नज़र-बाग़ में टहल रहे थे। दो-तीन खोजे घबराए हुए आए और चिट्ठी पेश करके अर्ज़ की—“हुज़ूर, ग़ज़ब हो गया। सलीमा बीबी ने ज़हर खा लिया और वह मर रही हैं।”

 

क्षण भर में बादशाह ने ख़त पढ़ लिया। झपटे हुए महल में पहुँचे। प्यारी दुलहिन सलीमा ज़मीन पर पड़ी है। आँखें ललाट पर चढ़ गई हैं। रंग कोयले के समान हो गया है। बादशाह से रहा न गया। उन्होंने घबराकर कहा—“हकीम, हकीम को बुलाओ!” कई आदमी दौड़े।

बादशाह का शब्द सुनकर सलीमा ने उनकी तरफ़ देखा, और धीमे स्वर में कहा—“ज़हे क़िस्मत।”

 

बादशाह ने नज़दीक बैठकर कहा—“सलीमा, बादशाह की बेग़म होकर तुम्हें यही लाज़िम था?”

सलीमा ने कष्ट से कहा—”हुज़ूर, मेरा क़ुसूर मामूली था।”

 

बादशाह ने कड़े स्वर में कहा—“बदनसीब! शाही ज़नानख़ाने में मर्द को भेष बदलकर रखना मामूली क़ुसूर समझती है? कानों पर यक़ीन कभी न करता, मगर आँखों देखी को झूठ मान लूँ?”

जैसे हज़ारों बिच्छुओं के एक साथ डंक मारने से आदमी तड़पता है, उसी तरह तड़पकर सलीमा ने कहा—“क्या?”

 

बादशाह डरकर पीछे हट गए। उन्होंने कहा—“सच कहो, इस वक़्त तुम ख़ुदा की राह पर हो, यह जवान कौन था?”

सलीमा ने अचकचाकर पूछा, ‘‘कौन जवान?”

 

बादशाह ने ग़ुस्से से कहा—“जिसे तुमने साक़ी बनाकर अपने पास रक्खा था?”

सलीमा ने घबराकर कहा—“हैं! क्या वह मर्द है?”

 

बादशाह—“तो क्या, तुम सचमुच यह बात नहीं जानती?”

सलीमा के मुँह से निकला—“या ख़ुदा।”

 

फिर उसके नेत्रों से आँसू बहने लगे। वह सब मामला समझ गई। कुछ देर बाद बोली—“ख़ाविंद! तब तो कुछ शिकायत ही नहीं, इस क़ुसूर की तो यही सज़ा मुनासिब थी। मेरी बदगुमानी माफ़ फ़रमाई जाए। मैं अल्लाह के नाम पर पड़ी कहती हूँ, मुझे इस बात का कुछ भी पता नहीं है।”

बादशाह का गला भर आया। उन्होंने कहा—“तो प्यारी सलीमा, तुम बेक़ुसूर ही चलीं?” बादशाह रोने लगे।

 

सलीमा ने उनका हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रखकर कहा—“मालिक मेरे! जिसकी उम्मीद न थी, मरते वक़्त वह मज़ा मिल गया। कहा-सुना माफ़ हो, एक अर्ज़ लौंडी की मंज़ूर हो।”

बादशाह ने कहा—“जल्दी कहो, सलीमा?”

 

सलीमा ने साहस से कहा—“उस जवान को माफ़ कर देना।”

इसके बाद सलीमा की आँखों से आँसू बह चले और थोड़ी ही देर में ठंडी हो गई।

 

बादशाह ने घुटनों के बल बैठकर उसका ललाट चूमा और फिर बालक की तरह रोने लगा।

ग़ज़ब के अँधेरे और सर्दी में युवक भूखा-प्यासा पड़ा था। एकाएक घोर चीत्कार करके किवाड़ खुले। प्रकाश के साथ ही एक गंभीर शब्द तहख़ाने में भर गया—“बदनसीब नौजवान, क्या होश-हवास में है?”

 

युवक ने तीव्र स्वर से पूछा—“कौन?”

जवाब मिला—“बादशाह।”

 

युवक ने कुछ भी अदब किए बिना कहा—“यह जगह बादशाहों के लायक़ नहीं है—क्यों तशरीफ़ लाए हैं?”

‘‘तुम्हारी कैफ़ियत नहीं सुनी थी, उसे सुनने आया हूँ।”

 

कुछ देर चुप रहकर युवक ने कहा—“सिर्फ़ सलीमा को झूठी बदनामी से बचाने के लिए कैफ़ियत देता हूँ, सुनिए सलीमा जब बच्ची थी, मैं उसके बाप का नौकर था। तभी से मैं उसे प्यार करता था। सलीमा भी प्यार करती थी; पर वह बचपन का प्यार था। उम्र होने पर सलीमा परदे में रहने लगी और फिर वह शाहंशाह की बेग़म हुई, मगर मैं उसे भूल न सका। पाँच साल तक पागल की तरह भटकता रहा। अंत में भेष बदलकर बाँदी की नौकरी कर ली। सिर्फ़ उसे देखते रहने और ख़िदमत करके दिन गुज़ार देने का इरादा था। उस दिन उज्ज्वल चाँदनी, सुगंधित पुष्प-राशि, शराब की उत्तेजना और एकांत ने मुझे बेबस कर दिया। उसके बाद मैंने आँचल से उसके मुख का पसीना पोंछा और मुँह चूम लिया। मैं इतना ही ख़तावार हूँ। सलीमा इसकी बाबत कुछ भी नहीं जानती।”

बादशाह कुछ देर चुपचाप खड़े रहे। उसके बाद वह दरवाज़े बंद किए बिना ही धीरे-धीरे चले गए।

 

सलीमा की मृत्यु को दस दिन बीत गए। बादशाह सलीमा के कमरे में ही दिन-रात रहते हैं। सामने नदी के उस पार, पेड़ों के झुरमुट में सलीमा की सफ़ेद क़ब्र बनी है। जिस खिड़की के पास सलीमा बैठी उस दिन रात को बादशाह की प्रतीक्षा कर रही थी, उसी खिड़की में, उसी चौकी पर बैठे हुए बादशाह उसी तरह सलीमा की क़ब्र दिन-रात देखा करते हैं। किसी को पास आने का हुक्म नहीं। जब आधी रात हो जाती है, तो उस गंभीर रात्रि के सन्नाटे में एक मर्म-भेदिनी गीत-ध्वनि उठ खड़ी होती है। बादशाह साफ़-साफ़ सुनते हैं, कोई करुण-कोमल स्वर में गा रहा है—

‘‘दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी!”

 

चतुरसेन शास्त्री

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