नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

भूटान : सादगी का वैभव


 प्रकृति की गोद में बसा भूटान एक ऐसा देश है जो खुशहाली पर जोर देता है। जहाँ पूरी दुनिया का जोर जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद पर होता है वहीँ भूटान अपने नागरिकों का जीवन स्तर जीएनएच यानी सकल राष्ट्रीय ख़ुशी से नापता है। यह एक बड़ा फर्क है जो भूटान को पूरी दुनिया से अलग करता है। भूटान की हवाओं में ऑक्सीजन की मात्रा इतनी अधिक है कि आप पूरे समय फ्रेश महसूस करते हैं, यहाँ की दीवारों और सडक़ों पर आपको इश्तेहार नहीं मिलेंगें और शहरों में ना तो भव्य शॉपिंग मॉल है और ना ही ट्रैफिक लाइट की जरूरत पड़ती है। इस मुल्क में सैनिकों से ज्यादा भिक्षु है। कोई भी व्यक्ति हड़बड़ी में नहीं दिखाई पड़ता है। भौतिकवादी दुनिया से बेफिक्र यह मुल्क आत्मसंतोष और अंदरूनी ख़ुशी को ज्यादा तरजीह देता है।


भारत और चीन के बीच घिरे इस छोटे से मुल्क की आबादी लगभग पौने 8 लाख है जिसमें ज्यादातर लोग बौद्ध धर्म को मानने वाले हैं, भूटान में लोकतंत्र और संवैधानिक राजशाही है। राजशाही यहाँ 1907 से है लेकिन 2008 में यहाँ के राजा ने खुद से आगे बढ़ कर लोकतंत्र की घोषणा की। शायद यही वजह है कि भूटानी अपने राजा को बहुत सम्मान की दृष्टि देखते हैं। भूटान के ‘पारो’ और ‘थिम्फू’ दो प्रमुख शहर हैं,जिसमें थिम्फू भूटान की राजधानी है, वही पारो तो जैसे सपनों का शहर है,शांत और ठहरा हुआ जो सुकून देता है। पारो घाटी से दिखने वाली सुंदरता आपको मदहोश कर देती है,यह एक ऐसा शहर है जहाँ की सादगी के वैभव में आप खो सकते हैं। पारो में भूटान का इकलौता हवाई अड्डा भी है । पारो में घुसते ही ऐसा महसूस होता है जैसे आप समय में कहीं पीछे चले गये हों, यह जाकर  किसी प्राचीन नगर का अहसास होता है । पूरे शहर के साथ एक नदी भी बहती है बिलकुल साफ, पारदर्शी और शांत। पारो शहर की खासियत यहाँ की हरियाली पहाड़ी घाटियाँ है। यह एक बेफिक्र शहर है जहाँ बहुमंजिला मकान नहीं है और शहर में ही खेती भी होती है। पारो अपने रहस्यमयी टाइगर नेस्ट के लिए भी मशहूर है, 3120 मीटर की ऊंचाईपर बना टाइगर नेस्ट भूटान के सबसे पवित्र बौद्ध मठों में से एक है पारो शहर से मठ की चढाई शुरू करने की जगह करीब 12 किलोमीटर दूर है यह मठ पारो से उत्तर दिशा में 12 किमी की दूर ताकसंग नामक स्थान  पर है, यहाँ से टाइगर नेस्ट तक जाने के लिए पैदल चलना पड़ता है आधे रास्ते तक घोड़े का भी इन्तेजाम हैं । लम्बी  चढ़ाई के बाद टाइगर नेस्ट तक पहुचने पर आपको अनोखी शांति और रोमांचक अहसास होता है मठ पर पहुंच कर अनोखी का एहसास होता है।

भूटानी अपनी संस्कृति व पर्यावरण को लेकर बहुत संवेदनशील हैं, यह शायद दुनिया का अकेला कार्बन यहाँ की नेगेटिव देश है जहाँ की 70 प्रतिशत जमीन पेड़-पौधों से ढकी है। इनके नीतियों और आदतों दोनों में पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया जाता है। भूटान के संविधान के अनुसार यहाँ के जमीन का 60 प्रतिशत हिस्सा जंगलों और पेड़ पौधों के लिए संरक्षित रखना अनिवार्य है, यहाँ प्राकृतिक सौंदर्य व संपदा के बदले  आर्थिक लाभों को महत्व नहीं दिया जाता है। साल 1999 से यहाँ प्लास्टिक की थैलियां भी प्रतिबंधित हैं। भूटानवासी भी पर्यावरण को लेकर बहुत सचेत होते हैं। पर्यावरण से प्रेम उन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है।
भूटान में बहुत कम संख्या में निजी वाहन है, ज्यादातर लोग पब्लिक ट्रांसर्पोट का उपयोग करते हैं। भूटान में चारो तरफ हरियाली ही हरियाली है इसके बावजूद भी लोग अपने घरों में अलग से बगीचा लगाते हैं और उसमें तरह तरह के रंगबिरंगी फूल उगाते हैं। भूटानी लोग प्रकृति का बहुत सम्मान करते हैं। उनका प्रकृति के प्रति प्रेम महसूस किया जा सकता है। वे इन पहाड़ों से दिल से जुड़े हुए हैं। अपने प्रकृति के प्रति प्रेम और संरक्षण को लेकर गर्व जताते हुए कोई भी आम भूटानी आपको यह बताते हुए मिल जाएगा कि ‘कैसे वे अपने देश के ज्यादातर भू-भाग में पेड़–पौधों के होने के बावजूद इनका दोहन करने के बदले लगातार नये पेड़ लगा रहे हैं और जब उनके राजा के घर बच्चे का जन्म हुआ तो पूरे देश ने 2 करोड़ पेड़ लगाये।’ भूटानी प्रकृति से जितना लेते हैं उससे कई गुना ज्यादा उसे लौटाने की कोशिश करते हैं और यही कारण है कि उनका देश काबर्न उत्सर्जन से पूरी तरह से मुक्त है जो दुनिया के दूसरे मुल्कों के लिए एक मिसाल है।



देश में संसाधन कम होने के बावजूद सरकार लोगों की बुनियादी जरूरतों के प्रति संवेदनशील है और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं पर विशेष ध्यान देती है। यहाँ कानून व्यवस्था भी काफी अच्छी है और अपराध दर व भ्रष्टाचार भी बहुत कम है। कानून का कड़ाई से पालन भी किया जाता है।  भूटान के लोग बहुत मिलनसार और अपनत्व से भरे हुए होते हैं। वे मददगार भी होते हैं। लेकिन इनका भारतीयों के प्रति एक अलग ही अपनापन और लगाव देखने को मिलता है। वे भारतीयों को अपने से अलग नही मानते हैं। इसका प्रमुख कारण भूटान का भारत के साथ पुराना सांस्कृतिक रिश्ता है। भूटान में ज्यादातर जरूरत के सामान भी भारत से आते हैं।
इसी साल के मई माह में मुझे भूटान जाने का मौका मिला। मैंने भूटान में कई लोगों से हैप्पीनेंस इन्डेक्स के सबंध में बात की जिसको लेकर उनका कहना था कि ‘भूटान के लोगों के खुश रहने का प्रमुख कारण यह है कि वे भौतिक वस्तुओं के बदले वेल्यू को ज्यादा महत्व देते हैं।’ उनका कहना था कि ‘यहाँ हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि आपके पास जो नहीं है उससे परेशान रहने की जगह आपके पास जो हैं उसमें ही संतुष्टि और खुशी तलाश की जाए।’ यहाँ पारिवारिक संबंधों और रिश्तों को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है। एक युवा लडक़ी ने बताया कि- मेरा बचपन का सपना है कि मैं एयरहोस्टेज बनू,इसके लिए मैं लम्बे समय से तैयारी भी कर रही थी और कुछ दिन पहले इसके लिए साक्षात्कार भी देकर आयी हूँ लेकिन एयरहोस्टेज के केवल 3 पद हैं जिसके लिए 500 लड़कियों ने साक्षात्कार दिया है अगर मेरा इसमें चयन नही होता तो मुझे दुख तो होगा परन्तु मेरा मानना है कि हर इंसान जो पैदा हुआ है उसके लिए प्रकृति ने कुछ न कुछ भूमिका सोची हुई है तो मैं मान कर चलूंगी कि इससे भी अच्छी नौकरी या भविष्य मेरे लिए है और ये सोच कर जीवन में आगे बढ़ जाऊंगीं। भूटान के लोग बुद्ध के मध्यम मार्ग के विचार को मानते हैं इसी वजह से वे ना ही बहुत सारी चीजों की चाहत रखते हैं और ऐसा भी नही होता कि उनके पास कुछ भी नही है। यही वह संतुलन से जिसे भूटानियों ने साध रखा है। हैप्पीनेंस इन्डेक्स के मूल में भी यही विचार है जिसे 1972 में वहां के सम्राट जिग्मे सिंग्ये वांगचुक सामने लाये थे। उसके बाद भूटान ने तय किया कि उनके देश में समृद्धि का पैमाना जीडीपी नहीं बल्कि उन चीज़ों को बनाया जाएगा जो नागिरकों को खुशी व इंसान और प्रकृति को सामंजस्य देते हों। यह एक जबर्दस्त विचार था लेकिन यह समय की धारा के विपरीत भी था जिसमें पूरी दुनिया प्रकृति का बेरहमी से दोहन करते हुए पूँजी कमाने को विकास मानती है। लेकिन इस विकास ने प्रकृति की अपूर्णनीय क्षति की है और गैर-बराबरी की खाई को भी बहुत चौड़ा कर दिया है। इस विकास मॉडल की एक सीमा और भी है, यहाँ सिर्फ भौतिक खुशहाली पर ही जोर है। लेकिन यही काफी नहीं है, जरूरी नहीं है कि पैसे से सब कुछ खरीद जा सके। हम अपने आस-पास ही समृद्ध लोगों को दुख, असंतोष, अवसाद और  निराशा में डूबे और आत्महत्या करते हुए देख सकते हैं।



भूटान ने अपने सकल राष्ट्रीय खुशहाली में मापक के तौर पर सामाजिक विकास, सांस्कृतिक संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और गुडगवर्नेस जैसी बातों को शामिल किया  है। भूटान में 1972 से ग्रास हैप्पीनेस इंडेक्स लागू हुआ है तब से वहाँ जीने की दर बढ़ कर लगभग दुगनी हो गयी है और  शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के पहुँच तकरीबन पूरी आबादी तक हुई है। भविष्य के लिए भूटान की योजनायें कम प्रभावी नहीं है  जिसमें 2030 तक नेट ग्रीन हाउस गैस को जीरो पहुँचाने और जीरो अपशिष्ट उत्पन्न करने जैसे लक्ष्य रखे गये हैं। इसके लिए अक्षय उर्जा जैसे- बायो गैस, हवा, और सोलर उर्जा पर जोर दिया जा रहा है और सभी गाडिय़ों को इलेक्ट्रिक गाडिय़ों से बदला जाना है। नये पेड़ लगाने का कार्यक्रम तो है ही।
लेकिन  भूटान की सबसे बड़ी सफलता तो कुछ और है। धीरे-धीरे ही सही विकास और ख़ुशी को लेकर दुनिया का नजरिया बदल रहा है।अब दुनिया भूटान के विचारों पर ध्यान दे रही है। तरक्की का पैमानों और असली खुशहाली के महत्व को समझा जा रहा है। 2010 में ब्रिटेन में भी ‘वेल बीईंग एंड हैप्पीनेस इंडेक्स’ की शुरुआत की गयी है। साल 2011 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने प्रस्ताव पारित कर हैप्पीनेस इंडेक्स के विचार को अपने एजेंडे में शामिल किया है और हर साल 20 मार्च को पूरी दुनिया में हैप्पीनेस डे मनाने का फैसला लिया गया है। इसी तरह से 2013 में वेनेजुएला में ‘मिनिस्ट्री ऑफ हैप्पीनेस’ बनाया गया है। यूएई ने ‘हैप्पीनेस और टॉलरेंस मिनिस्ट्री’ बनाई है। भारत में मध्य प्रदेश इस तरह का विभाग बनाने वाला देश का पहला राज्य बन गया है जहाँ ‘हैप्पीनेस डिपार्टमेंट यानी आनंद विभाग’ खोलने की घोषणा की गयी है।

आज दुनिया जिस रास्ते पर चल रही है वह तबाही का रास्ता है। पूरे ब्रह्माण्ड में पृथ्वी ही एक ऐसा ज्ञात ग्रह है जहाँ जीवन के फलने-फूलने का वातावरण है। लेकिन इस नीले ग्रह का सबसे अकलमंद प्राणी ही धरती के संतुलन को बिगाड़ता जा रहा है। पृथ्वी से अनेकों जीव-वनस्पति विलुप्त हो गए हैं, अगर यही हालत रहे तो आने वाले सालों में और जीव-वनस्पति और प्रजातियाँ इस धरती से लुप्त हो सकती हैं जिसमें खुद इंसान भी शामिल है। भूटान का माँडल दुनिया के भविष्य का माँडल है। इसे अपनाना आसान नहीं है लेकिन और कोई विकल्प भी तो नहीं बचा है। अगर कभी भूटान जाने का मौका मिले तो वहां प्रकृति से सामंजस्य बना कर खुश रहने का सबक लेना मत भूलियेगा। भूटान भविष्य है।
जावेद अनीस (साभार देशबंधु)

सोमवार, 16 जनवरी 2017

चुनाव में धर्म, जाति, और भाषा का दुरुपयोग प्रतिबंधित

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर ने अपने पद से विदा देने के पूर्व एक अत्यधिक महत्वपूर्ण निर्णय किया। इस निर्णय से धर्मनिरपेक्षता पर आधारित हमारे गणतंत्र की नींव और मजबूत होगी। सर्वोच्च न्यायालय की एक सात सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट निर्णय दिया है कि चुनावों में धर्म, जाति और भाषा का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।
वैसे तो हमारे जनप्रतिनिधित्व कानून में पहले से ही इस तरह का प्रावधान था परंतु उस प्रावधान के होते हुए भी अनेक पार्टियां धर्म का उपयोग चुनाव प्रचार में करती थीं। जैसे बाबरी मस्जिद के ध्वंस के पूर्व और ध्वंस के बाद खुलेआम भारतीय जनता पार्टी ने संपूर्ण देश के वातावरण को सांप्रदायिक बना दिया था। चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि ‘मंदिर वहीं बनेगा’ और यह कहने में भी नहीं हिचकिचाए कि ‘राम द्रोही, देश द्रोही’। चुनावी सभाओं में भी ‘जय श्रीराम’ के नारे लगते थे। यहां तक कि एक अवसर पर भारतीय जनता पार्टी के सर्वमान्य नेता लालकृष्ण आडवानी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि केन्द्र की सत्ता में आने का बहुत बड़ा श्रेय राम मंदिर आंदोलन को है।
यद्यपि पिछले लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने विकास का नारा दिया था परंतु मैदानी हकीकत यह थी कि अनेक मुद्दों पर सांप्रदायिक आधार पर प्रचार किया गया। अब चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनावों में धर्म, जाति और भाषा का दुरुपयोग एक भ्रष्ट आचरण समझा जाएगा और इसके चलते अब शायद चुनाव में खड़ा कोई भी उम्मीदवार धर्म, जाति और भाषा के आधार पर चुनाव प्रचार करने का साहस नहीं करेगा।
अपना निर्णय देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म को सिर्फ व्यक्ति तक सीमित रखना चाहिए और उसका उपयोग किसी भी सार्वजनिक और विशेषकर राजनीति में कतई नहीं करना चाहिए। चूंकि चुनाव में धर्म के उपयोग से अनेक लोग वोट कबाडऩे में सफल हो जाते थे इसलिए पिछले दिनों इस प्रवृत्ति को बहुत बढ़ावा मिला।
आप कल्पना कीजिए कि यदि हमारी न्यायपालिका पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं होती तो शायद उसके लिए इस तरह का निर्णय करना संभव नहीं होता। मोदी सरकार ने आते ही न्यायपालिका पर सरकार का नियंत्रण मजबूत करने के प्रयास प्रारंभ कर दिए थे। इसी प्रयास के चलते राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बनाने का प्रस्ताव किया गया था। इस आयोग को सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का अधिकार देना प्रस्तावित था। इस आयोग के छह सदस्य प्रस्तावित किए गए थे इनमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त  दो और न्यायाधीश, केन्द्रीय कानून मंत्री और दो प्रतिष्ठित नागरिक थे। इस आयोग के निर्णय बहुमत के आधार पर होने थे। ये दो प्रतिष्ठित नागरिक कौन होंगे, इसे स्पष्ट नहीं किया गया था। इसी तरह पूर्व में कभी भी किसी भी आयोग का सदस्य मंत्री को नहीं बनाया गया था। स्पष्ट है कि ये तथाकथित प्रतिष्ठित सदस्य सत्ताधारी दल से जुड़े होते। उसके अतिरिक्तविधि मंत्री मिलाकर तीन सदस्य हो जाते और फिर किसी एक न्यायाधीश को अपने पक्ष में करके न्यायपालिका में सारी नियुक्तियां सरकार की मंशा के अनुसार होतीं। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने इस आयोग के प्रस्ताव को निरस्त कर दिया और इस तरह एक बहुत बड़े खतरे से देश को बचा लिया। उसके बाद भी अभी अन्य तरीकों से न्यायपालिका पर नियंत्रण पाने के प्रयास जारी हैं। जैसे उच्च न्यायालयों में अभी 430 से ज्यादा न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि इन पदों को शीघ्र भरा जाए। परंतु केन्द्रीय सरकार ने इस संबंध में लगभग चुप्पी साध ली है और कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रस्ताव पर अभी तक कुछ नहीं कहा है। इससे उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या लाखों तक पहुंच गई है।
न्यायमूर्ति टी.एस. ठाकुर ने अपने कार्यकाल के दौरान न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बारे में अपनी प्रतिबद्धता पूरी तरह से दिखाई। अपने विदाई समारोह में उन्होंने यहां तक कहा कि मेरी कामना है कि हमारे देश की न्यायपालिका स्वतंत्र और निष्पक्ष बनी रहे। उनके इन शब्दों की केन्द्रीय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से आलोचना की। पूर्व में शायद ही कभी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के विचारों पर इस तरह की आलोचनात्मक टिप्पणी की गई हो।
चुनाव के संबंध में जो निर्णय सर्वोच्च न्यायालय ने दिया है उसे पूरी तरह से लागू करना अत्यधिक कठिन काम होगा। पूर्व में देखा गया है कि न्यायपालिका के अनेक ऐतिहासिक निर्णयों का क्रियान्वयन ईमानदारी ने नहीं हो पाता है। इस तरह के निर्णयों का ईमानदारी से क्रियान्वयन उसी समय संभव होगा जब जनचेतना जागृत की जाए और इस तरह के सभी संगठनों को जिनकी धर्मनिरपेक्षता पर आस्था है इस तरह की जनचेतना उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि अभी भी देश में ऐसे लोग हैं जो अत्यधिक आपत्तिजनक बातें सार्वजनिक रूप से कहते हैं। जैसे संघ परिवार और शिवसेना से जुड़े अनेक नेता सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि यदि उनका बस चले तो वे अल्पसंख्यकों के मताधिकार को समाप्त कर दें। इस तरह की भाषा भी हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को कमजोर करने वाली है। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से इस तरह की बातें करना भी आपत्तिजनक और भ्रष्ट आचरण समझा जाएगा। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट कर दिया है कि धर्म, जाति और भाषा का उपयोग सार्वजनिक जीवन में नहीं किया जाना चाहिए, वह व्यक्ति तक ही सीमित रहना चाहिए। इसलिए इस बात की आवश्यकता है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को अमलीजामा पहनाने के लिए उन सब लोगों को एकजुट हो जाना चाहिए जो चाहते हैं कि हमारे देश के लोकतंत्र का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप कायम रहे।
यह  सभी को ज्ञात है कि केन्द्र में जिस राजनीतिक दल की सरकार है उसका वैचारिक संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा हमारे देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की है। यदि हिन्दू राष्ट्र बनाने के प्रयासों को शिकस्त देना है तो सारे देश को सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के समर्थन में खड़े हो जाना चाहिए और उसे लागू करवाने में एकजुट होकर प्रयास करना चाहिए।
 एल.एस. हरदेनिया

कफ़न

 

एक

झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अंधकार में लय हो गया था। घीसू ने कहा—“मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।”

 माधव चिढ़कर बोला—”मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?”

तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफ़ाई!”

 तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।”

चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मज़दूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की क़सम थी। जब दो-चार फ़ाक़े हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक़्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनो साधु होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई संपत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिए जाते थे। संसार की चिंताओं से मुक्त! क़र्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई ग़म नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ क़र्ज़ दे देते थे। मटर, आलू की फ़सल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक़्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाए थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहांत हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से यह औरत आई थी, उसने इस ख़ानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-ग़ैरतों का दोज़ख़ भरती रहती थी। जब से वह आई, यह दोनों और भी आलसी और आरामतलब हो गए थे। बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्ब्याज भाव से दुगुनी मज़दूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इंतज़ार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोएँ।

 घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा—“जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!”

माधव को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ़ कर देगा। बोला- “मुझे वहाँ जाते डर लगता है।”

 डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।”

तो तुम्हीं जाकर देखो न?”

 मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं था! और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुँह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी!”

मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हो गया तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!”

 सब कुछ आ जाएगा। भगवान दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपए देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था, मगर भगवान ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।”

जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुक़ाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़्यादा संपन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज़्यादा विचारवान था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाज़ों की कुत्सित मंडली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाज़ों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मंडली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते!

 दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठंडा हो जाने दें। कई बार दोनों की ज़बानें जल गईं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा ज़बान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा ख़ैरियत इसी में थी कि वह अंदर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठंडा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते।

घीसू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आई, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक़ बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ा थी, बोला—“वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लड़की वालों ने सबको भर पेट पूरियाँ खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूरियाँ खाईं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला। कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, माँगो, जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौरियाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कंबल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर!”

 माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मज़ा लेते हुए कहा—“अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।”

अब कोई क्या खिलाएगा? वह ज़माना दूसरा था। अब तो सबको किफ़ायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत ख़र्च करो, क्रिया-कर्म में मत ख़र्च करो। पूछो, ग़रीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, ख़र्च में किफ़ायत सूझती है!”

 तुमने एक बीस पूरियाँ खाई होंगी?”

बीस से ज़ियादा खाई थीं!”

 मैं पचास खा जाता!”

पचास से कम मैंने न खाई होंगी। अच्छा पका था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।”

 आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलियाँ मारे पड़े हों। और बुधिया अभी तक कराह रही थी।

दो

 सवेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठंडी हो गई थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।

माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आए और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।

 मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह ग़ायब था, जैसे चील के घोंसले में माँस?

बाप-बेटे रोते हुए गाँव के ज़मींदार के पास गए। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा—“क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।”

 घीसू ने ज़मीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा—“सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। माधव की घरवाली रात को गुज़र गई। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दग़ा दे गई। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गए। घर उजड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।”

ज़मींदार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कंबल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यूँ तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब ग़रज़ पड़ी तो आकर ख़ुशामद कर रहा है। हरामख़ोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दंड देने का अवसर न था।

 जी में कुढ़ते हुए दो रुपए निकालकर फेंक दिए। मगर सांत्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ़ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो।

जब ज़मींदार साहब ने दो रुपए दिए, तो गाँव के बनिए-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? घीसू ज़मींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना ख़ूब जानता था। किसी ने दो आने दिए, किसी ने चारे आने। एक घंटे में घीसू के पास पाँच रुपए की अच्छी रक़म जमा हो गई। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे।

 गाँव की नर्म दिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं।

तीन

 बाज़ार में पहुँचकर घीसू बोला—“लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गई है, क्यों माधव!”

माधव बोला—“हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।”

 तो चलो, कोई हलक़ा-सा कफ़न ले लें।”

हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?”

 कैसा बुरा रिवाज़ है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।”

कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।”

 और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपए पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।”

दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस बाज़ार की दूकान पर गए, कभी उसकी दूकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गई। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अंदर चले गए। वहाँ ज़रा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा—“साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।”

 इसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आईं और दोनों बरामदे में बैठकर शांतिपूर्वक पीने लगे।

कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गए। घीसू बोला—“कफ़न लगाने से क्या मिलता? आख़िर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।”

 माधव आसमान की तरफ़ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो—“दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बामनों को हज़ारों रुपए क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!”

बड़े आदमियों के पास धन है, फूँके। हमारे पास फूँकने को क्या है?”

 लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?”

घीसू हँसा—“अबे, कह देंगे कि रुपए कमर से खिसक गए। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपए देंगे।”

 माधव भी हँसा, इस अनपेक्षित सौभाग्य पर बोला—“बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो ख़ूब खिला-पिलाकर!”

आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गई। घीसू ने दो सेर पूरियाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबख़ाने के सामने ही दूकान थी। माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया ख़र्च हो गया। सिर्फ़ थोड़े से पैसे बच रहे।

 दोनों इस वक़्त इस शान में बैठे पूरियाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का ख़ौफ़ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था।

घीसू दार्शनिक भाव से बोला—“हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?”

 माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की—“ज़रूर से ज़रूर होगा। भगवान, तुम अंतर्यामी हो। उसे बैकुंठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था।”

एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी। बोला—“क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?”

 घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनंद में बाधा न डालना चाहता था।

जो वहाँ वह हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?”

 कहेंगे तुम्हारा सिर!”

पूछेगी तो ज़रूर!”

 तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!”

माधव को विश्वास न आया। बोला—“कौन देगा? रुपए तो तुमने चट कर दिए। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सेंदुर मैंने डाला था।”

 कौन देगा, बताते क्यों नहीं?”

वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया। हाँ, अबकी रुपए हमारे हाथ न आएँगे।”

 ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाए देता था।

वहाँ के वातावरण में सुरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं।

 और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मज़े ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है।

भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूरियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनंद और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया।

 घीसू ने कहा—“ले जा, ख़ूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गई। मगर तेरा आशीर्वाद उसे ज़रूर पहुँचेगा। रोएँ-रोएँ से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!”

माधव ने फिर आसमान की तरफ़ देखकर कहा—“वह बैकुंठ में जाएगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी।”

 घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला—“हाँ, बेटा बैकुंठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई। वह न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो ग़रीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं?

श्रद्धालुता का यह रंग तुरंत ही बदल गया। अस्थिरता नशे की ख़ासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ।

 माधव बोला—“मगर दादा, बेचारी ने ज़िंदगी में बड़ा दुख भोगा। कितना दुख झेलकर मरी!”

वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर।

 घीसू ने समझाया—“क्यों रोता है बेटा, ख़ुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गई, जंजाल से छूट गई। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बंधन तोड़ दिए।

और दोनों खड़े होकर गाने लगे—

 ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी!”

पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाए जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बनाए, अभिनय भी किए। और आख़िर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े।

प्रेमचंद 

#समाजकीबात #samajkibaat

#कृष्णधरशर्मा #Krishnadharsharma 

रविवार, 15 जनवरी 2017

टॉकिंग पेन के साथ तैयार होता भविष्य

संसाधन केंद्र-केरल द्वारा विकसित टॉकिंग पेन जेएसएस के विद्या कार्यक्रम का हिस्सा है, जो जिले के अनुसूचित जाति के लोगों के लिए एक व्यापक विकास परियोजना है। साक्षरता कार्यक्रमों के लिए मोबाइल कंप्यूटर लैब, एलसीडी प्रोजेक्टर्स सहित कई उन्नत प्रौद्योगिकी टूल्स इस्तेमाल किए जाते हैं। जनजातीय भाषा पनिया सहित हिंदी, अंग्रेजी, मलयालम और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में दिशा-निर्देशों की पेशकश की जाती है। किताबों को समुदायल की स्थानीय भाषा में लिखा गया है और ब्रेललिपि में भी उपलब्ध है। ब्रेली लिटरेसी सामग्री राज्य संसाधन केंद्र-केरल और केरल राज्य साक्षरता मिशन के सहयोग से जेएसएस द्वारा विकसित की गई है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 341 नेत्रहीन लाभार्थियों को ब्रेललिपि साक्षरता के साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए गए हैं।
चैरियालग्राम पंचायत में पलक्कयम कॉलोनी की 80 वर्षीय आदिवासी महिला मनियम्मा को अपने साक्षर बनने के प्रयास में किताबों और स्लेट के साथ जूझना पड़ता था। लेकिन एक ‘टॉकिंग पेन’ जो लिखे गए विवरण की आवाज पैदा करता है, से उनके और आसपास के कई लोगों के लिए काम आसान हो गया है। उन लोगों के लिए इलेक्ट्रॉनिक पेन से अल्फाबेट्स और शब्दों के गाने सुनकर और सीखना आसान हो गया है। मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा प्रायोजित एक एनजीओ के जन शिक्षण संस्थान, मलाप्पुरम में मनियम्मा सहित क्षेत्र के 320 जनजातीय लोग पढऩे के लिए जाते हैं और अक्षर व शिक्षा लेते हैं। वे यहां न सिर्फ अक्षर ज्ञान लेते हैं, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता, बुरी आदतों, वित्तीय साक्षरता और कौशल विकास कार्यक्रमों से जुड़े सबक लेते हैं। यह टॉकिंग पेन है और साक्षरता तथा कौशल विकास कार्यक्रमों की दिशा में किए जा रहे प्रयासों से जन शिक्षण संस्थान (जेएसएस), मलाप्पुरम को यूनेस्को कनफ्यूसियस प्राइज फॉर लिटरेसी, 2016 हासिल करने में खासी मदद मिली।
यूनेस्को द्वारा हर साल साक्षरता के लिए दिया जाने वाला कन्यूसियस प्राइज एक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार है, जिसके माध्यम से दुनिया में साक्षरता के क्षेत्र में किए जाने वाले उत्कृष्ट और प्रेरणादायी प्रयासों को सम्मान दिया जाता है। मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने जेएसएस चेयरमैन और राज्यसभा एमपी अब्दुल वहाब व जेएसएस निदेशक वी उमरकोया के साथ पेरिस में बीते महीने एक कार्यक्रम के दौरान यूनेस्को की महानिदेशक इरीना बोकोवा के हाथों यह पुरस्कार ग्रहण किया। यह चौथी बार है जब भारत के किसी संगठन को यह पुरस्कार मिला है। जेएसएस मलाप्पुरम को मिला यह पुरस्कार पहला नहीं है। संगठन को भारत सरकार के साक्षर भारत पुरस्कार (2014) जैसे कई पुरस्कार मिल चुके हैं।
 

समान मौके देने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण

भले ही केरल देश में सबसे ज्यादा साक्षरता वाला राज्य है, लेकिन इस सफलता का लाभ पारंपरिक तौर पर वंचित समूहों जैसे महिलाओं, अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जनजातियों और प्रवासियों को नहीं मिल पाता है, जो अक्सर वित्तीय तौर पर कमजोर और सीमांत समुदाय होते हैं। जेएसएस जैसे एनजीओ इसी बदलाव की दिशा में काम कर रहे हैं। जेएसएस मलाप्पुरम नव-साक्षर को अनौपचारिक शिक्षा देता है और साक्षर बनने के इच्छुक वयस्कों को विभिन्न व्यावसायिक कौशल का प्रशिक्षण देता है। संगठन लोगों को काम तलाशने या उद्यम शुरू करने में भी लाभार्थियों की मदद करता है। अभी तक 41000 महिलाओं सहित 53000 लोगों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।
राज्य संसाधन केंद्र-केरल द्वारा विकसित टॉकिंग पेन जेएसएस के विद्या कार्यक्रम का हिस्सा है, जो जिले के अनुसूचित जाति के लोगों के लिए एक व्यापक विकास परियोजना है। साक्षरता कार्यक्रमों के लिए मोबाइल कंप्यूटर लैब, एलसीडी प्रोजेक्टर्स सहित कई उन्नत प्रौद्योगिकी टूल्स इस्तेमाल किए जाते हैं। जनजातीय भाषा पनिया सहित हिंदी, अंग्रेजी, मलयालम और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में दिशा-निर्देशों की पेशकश की जाती है। किताबों को समुदायल की स्थानीय भाषा में लिखा गया है और ब्रेललिपि में भी उपलब्ध है। ब्रेली लिटरेसी सामग्री राज्य संसाधन केंद्र-केरल और केरल राज्य साक्षरता मिशन के सहयोग से जेएसएस द्वारा विकसित की गई है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 341 नेत्रहीन लाभार्थियों को ब्रेललिपि साक्षरता के साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए गए हैं।
 

उल्लासम से उन्नति: टिकाऊ विकास के लिए सिलाई परियोजनाएं

जेएसएस मलाप्पुरम में ऐसे कई व्यावसायिक प्रशिक्षण कोर्स हैं, जिनका उद्देश्य सीमांत लोगों के लिए टिकाऊ और भागीदारी पूर्ण विकास है। ऐसी ही परियोजनाओं में उल्लासम (खुश रहकर काम) शामिल है, यह ऐसा उपक्रम है जो पांच दिन तक काम की पेशकश करता है जिसमें एक दिन योग और ध्यान के लिए है। इसके लिए विधवाओं, 40 साल से ज्यादा उम्र की अविवाहित महिलाओं और तलाकशुदा महिलाओं में से विशेष रूप से 250 लाभार्थियों का चयन किया गया है। इस योजना के अंतर्गत कपड़े के बैग, बच्चों के बिस्तर, शॉपर्स, मच्छरदानी आदि बनाए जाते हैं। इस स्कीम के लाभार्थी इस कार्यक्रम के माध्यम से 5000-10000 रुपए महीने कमा रहे हैं। इस योजना के दौरान योग और ध्यान से तनाव कम करने में मदद मिलती है। ‘स्पर्शम’ विभिन्न सक्षम लाभार्थियों के विकास के लिए तैयार एक अन्य नवीन परियोजना है।
‘इनसाइट’ (अंतर्दृष्टि) जेएसएस मलाप्पुरम द्वारा केरल फेडरेशन ऑफ ब्लाइंड के सहयोग से शुरू किया गया विशेष कार्यक्रम है। ग्रामीण आबादी में सब्जियों के उत्पादन में आत्म निर्भर बनाने के लिए जेएसएस ने ‘दालम’ परियोजना की शुरुआत की थी। जेएसएस परिवार के सदस्य अपने घरों के अहाते में सब्जियां पैदा करते हैं और सब्जियों के पौधों का वितरण करते हैं। जेएसएस ने ऐसे मरीजों की क्षमता बढ़ाने के लिए पेन एंड पैलिएटिव सोसाइटी के सहयोग से एक अन्य कार्यक्रम ‘रिलीफ’ (राहत) शुरू किया है, जो लकवा और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं।
जेएसएस ने आदिवासी युवाओं को मदद करने के लिए सरकारी एजेंसियों के सहयोग से विशेष कार्यक्रम कॉम्प्रिहेंसिव रिस्पॉन्सिबल डेवलपमेंट थ्रू एजुकेशन एंड स्किल ट्रेनिंग (सीआरडीईएसटी) डिजाइन किया। इस परियोजना के माध्यम से सौ युवाओं की पहचान की गई है। इस योजना के तहत युवाओं को विभिन्न विषयों में एक सप्ताह की आवासीय कोचिंग प्रदान की जाती है।
बिपिन एस. नाथ 
( लेखक पत्र सूचना कार्यालय, कोच्चि में सूचना सहायक हैं। )

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

जानवर और जानवर

 

बहुत-से लोग यहाँ-वहाँ सिर लटकाए बैठे थे जैसे किसी का मातम करने आए हों। कुछ लोग अपनी पोटलियाँ खोलकर खाना खा रहे थे। दो-एक व्यक्ति पगड़ियाँ सिर के नीचे रखकर कम्पाउंड के बाहर सड़क के किनारे बिखर गए थे। छोले-कुलचे वाले का रोज़गार गर्म था, और कमेटी के नल के पास एक छोटा-मोटा क्यू लगा था। नल के पास कुर्सी डालकर बैठा अर्ज़ीनवीस धड़ाधड़ अर्ज़ियाँ टाइप कर रहा था। उसके माथे से बहकर पसीना उसके होंठों पर आ रहा था, लेकिन उसे पोंछने की फ़ुरसत नहीं थी। सफ़ेद दाढ़ियों वाले दो-तीन लंबे-ऊँचे जाट, अपनी लाठियों पर झुके हुए, उसके ख़ाली होने का इंतिज़ार कर रहे थे। धूप से बचने के लिए अर्ज़ीनवीस ने जो टाट का परदा लगा रखा था, वह हवा से उड़ा जा रहा था। थोड़ी दूर मोढ़े पर बैठा उसका लड़का अँग्रेज़ी प्राइमर को रट्टा लगा रहा था-सी ए टी कैट-कैट माने बिल्ली; बी ए टी बैट-बैट माने बल्ला; एफ ए टी फैट-फैट माने मोटा...। क़मीज़ों के आधे बटन खोले और बग़ल में फ़ाइलें दबाए कुछ बाबू एक-दूसरे से छेड़खानी करते, रजिस्ट्रेशन ब्रांच से रिकार्ड ब्रांच की तरफ़ जा रहे थे। लाल बेल्ट वाला चपरासी, आस-पास की भीड़ से उदासीन, अपने स्टूल पर बैठा मन ही मन कुछ हिसाब कर रहा था। कभी उसके होंठ हिलते थे, और कभी सिर हिल जाता था। सारे कंपाउंड में सितम्बर की खुली धूप फैली थी। चिड़ियों के कुछ बच्चे डालों से कूदने और फिर ऊपर को उड़ने का अभ्यास कर रहे थे और कई बड़े-बड़े कौए पोर्च के एक सिरे से दूसरे सिरे तक चहलक़दमी कर रहे थे। एक सत्तर-पचहत्तर की बुढ़िया, जिसका सिर काँप रहा था और चेहरा झुर्रियों के गुंझल के सिवा कुछ नहीं था, लोगों से पूछ रही थी कि वह अपने लड़के के मरने के बाद उसके नाम एलाट हुई ज़मीन की हक़दार हो जाती है या नहीं...?

अंदर हॉल कमरे में फ़ाइलें धीरे-धीरे चल रही थीं। दो-चार बाबू बीच की मेज़ के पास जमा होकर चाय पी रहे थे। उनमें से एक दफ़्तरी काग़ज़ पर लिखी अपनी ताज़ा ग़ज़ल दोस्तों को सुना रहा था और दोस्त इस विश्वास के साथ सुन रहे थे कि वह ग़ज़ल उसने 'शमा' या 'बीसवीं सदी' के किसी पुराने अंक में से उड़ाई है।

 

अज़ीज़ साहब, ये शेअर आपने आज ही कहे हैं, या पहले के कहे हुए शेअर आज अचानक याद हो आए हैं? साँवले चेहरे और घनी मूँछों वाले एक बाबू ने बाईंआँख को ज़रा-सा दबाकर पूछा। आस-पास खड़े सब लोगों के चेहरे खिल गए।

यह बिल्कुल ताज़ा ग़ज़ल है, अज़ीज़ साहब ने अदालत में खड़े होकर हलफ़िया बयान देने के लहज़े में कहा, इससे पहले भी इसी वज़न पर कोई और चीज़ कही हो तो याद नहीं। और फिर आँखों से सबके चेहरों को टटोलते हुए वे हल्की हँसी के साथ बोले, अपना दीवान तो कोई रिसर्चदां ही मुरत्तब करेगा...।

 

एक फ़रमायशी कहकहा लगा जिसे 'शी-शी' की आवाज़ों ने बीच में ही दबा दिया। क़हक़हे पर लगाई गई इस ब्रेक का मतलब था कि कमिश्नर साहब अपने कमरे में तशरीफ़ ले आए हैं। कुछ देर का वक़्फ़ा रहा, जिसमें सुरजीत सिंह वल्द गुरमीत सिंह की फ़ाइल एक मेज़ से एक्शन के लिए दूसरी मेज़ पर पहुँच गई, सुरजीत सिंह वल्द गुरमीत सिंह मुस्कुराता हुआ हॉल से बाहर चला गया, और जिस बाबू की मेज़ से फ़ाइल गई थी, वह पाँच रुपये के नोट को सहलाता हुआ चाय पीने वालों के जमघट में आ शामिल हुआ। अज़ीज़ साहब अब आवाज़ ज़रा धीमी करके ग़ज़ल का अगला शेअर सुनाने लगे।

साहब के कमरे से घंटी हुई। चपरासी मुस्तैदी से उठकर अंदर गया, और उसी मुस्तैदी से वापस आकर फिर अपने स्टूल पर बैठ गया।

 

चपरासी से खिड़की का पर्दा ठीक कराकर कमिश्नर साहब ने मेज़ पर रखे ढेर-से काग़ज़ों पर एक साथ दस्तख़त किए और पाइप सुलगाकर 'रीडर्ज़ डाइजेस्ट' का ताज़ा अंक बैग से निकाल लिया। लेटीशिया बाल्ड्रिज का लेख कि उसे इतालवी मर्दों से क्यों प्यार है, वे पढ़ चुके थे। और लेखों में हृदय की शल्य चिकित्सा के संबंध में जे.डी. रैटक्लिफ का लेख उन्होंने सबसे पहले पढ़ने के लिए चुन रखा था। पृष्ठ एक सौ ग्यारह खोलकर वे हृदय के नए ऑपरेशन का ब्यौरा पढ़ने लगे।

तभी बाहर से कुछ शोर सुनाई देने लगा।

 

कंपाउंड में पेड़ के नीचे बिखरकर बैठे लोगों में चार नए चेहरे आ शामिल हुए थे। एक अधेड़ आदमी था जिसने अपनी पगड़ी ज़मीन पर बिछा ली थी और हाथ पीछे करके तथा टाँगें फैलाकर उस पर बैठ गया था। पगड़ी के सिरे की तरफ़ उससे ज़रा बड़ी उम्र की एक स्त्री और एक जवान लड़की बैठी थीं; और उनके पास खड़ा एक दुबला-सा लड़का आस-पास की हर चीज़ को घूरती नज़र से देख रहा था, अधेड़ मर्द की फैली हुई टाँगें धीरे-धीरे पूरी खुल गई थीं और आवाज़ इतनी ऊँची हो गई थी कि कम्पाउंड के बाहर से भी बहुत-से लोगों का ध्यान उसकी तरफ़ खिंच गया था। वह बोलता हुआ साथ अपने घुटने पर हाथ मार रहा था। सरकार वक़्त ले रही है! दस-पाँच साल में सरकार फ़ैसला करेगी कि अर्ज़ी मंज़ूर होनी चाहिए या नहीं। सालो, यमराज भी तो हमारा वक़्त गिन रहा है। उधर वह वक़्त पूरा होगा और इधर तुमसे पता चलेगा कि हमारी अर्ज़ी मंज़ूर हो गई है।

चपरासी की टाँगें ज़मीन पर पुख़्ता हो गईं, और वह सीधा खड़ा हो गया। कम्पाउंड में बिखरकर बैठे और लेटे हुए लोग अपनी-अपनी जगह पर कस गए। कई लोग उस पेड़ के पास आ जमा हुए।

 

दो साल से अर्ज़ी दे रखी है कि सालो, ज़मीन के नाम पर तुमने मुझे जो गड्ढा एलाट कर दिया है, उसकी जगह कोई दूसरी ज़मीन दो। मगर दो साल से अर्ज़ी यहाँ के दो कमरे ही पार नहीं कर पाई! वह आदमी अब जैसे एक मजमे में बैठकर तकरीर करने लगा, इस कमरे से उस कमरे में अर्ज़ी के जाने में वक़्त लगता है! इस मेज़ से उस मेज़ तक जाने में भी वक़्त लगता है! सरकार वक़्त ले रही है! लो, मैं आ गया हूँ आज यहीं पर अपना सारा घर-बार लेकर। ले लो जितना वक़्त तुम्हें लेना है!...सात साल की भुखमरी के बाद सालों ने ज़मीन दी है मुझे-सौ मरले का गड्ढा! उसमें क्या मैं बाप-दादों की अस्थियाँ गाड़ूँगा? अर्ज़ी दी थी कि मुझे सौ मरले की जगह पचास मरले दे दी-लेकिन ज़मीन तो दो! मगर अर्ज़ी दो साल से वक़्त ले रही है! मैं भूखा मर रहा हूँ, और अर्ज़ी वक़्त ले रही है!

चपरासी अपने हथियार लिए हुए आगे आया-माथे पर त्योरियाँ और आँखों में क्रोध। आस-पास की भीड़ को हटाता हुआ वह उसके पास आ गया।

 

ए मिस्टर, चल हियाँ से बाहर! उसने हथियारों की पूरी चोट के साथ कहा, चल...उठ...!

मिस्टर आज यहाँ से नहीं उठ सकता1 वह आदमी अपनी टाँगें थोड़ी और चौड़ी करके बोला, मिस्टर आज यहाँ का बादशाह है। पहले मिस्टर देश के बेताज बादशाहों की जय बुलाता था। अब वह किसी की जय नहीं बुलाता। अब वह ख़ुद यहाँ का बादशाह है... बेलाज बादशाह उसे कोई लाज-शरम नहीं है। उस पर किसी का हुक्म नहीं चलता। समझे, चपरासी बादशाह!

 

अभी तुझे पता चल जाएगा कि तुझ पर किसी का हुक्म चलता है या नहीं, चपरासी बादशाह और गर्म हुआ, अभी पुलिस के सुपुर्द कर दिया जाएगा तो तेरी सारी बादशाही निकल जाएगी...।

हा-हा! बेलाज बादशाह हँसा। तेरी पुलिस मेरी बादशाही निकालेगी? तू बुला पुलिस को। मैं पुलिस के सामने नंगा हो जाऊँगा और कहूँगा कि निकालो मेरी बादशाही! हममें से किस-किसकी बादशाही निकालेगी पुलिस? ये मेरे साथ तीन बादशाह और हैं। यह मेरे भाई की बेवा है—उस भाई की जिसे पाकिस्तान में टाँगों से पकड़कर चीर दिया गया था। यह मेरे भाई का लड़का है जो अभी से तपेदिक का मरीज़ है। और यह मेरे भाई की लड़की है जो अब ब्याहने लायक़ हो गई है। इसकी बड़ी कुँवारी बहन आज भी पाकिस्तान में है। आज मैंने इन सबको बादशाही दे दी है। तू ले आ जाकर अपनी पुलिस, कि आकर इन सबकी बादशाही निकाल दे। कुत्ता साला...!

 

अंदर से कई-एक बाबू निकलकर बाहर आ गए थे। 'कुत्ता साला' सुनकर चपरासी आपे से बाहर हो गया। वह तैश में उसे बाँह से पकड़कर घसीटने लगा, तुझे अभी पता चल जाता है कि कौन साला कुत्ता है! मैं तुझे मार-मारकर... और उसने उसे अपने टूटे हुए बूट की एक ठोकर दी। स्त्री और लड़की सहमकर वहाँ से हट गई। लड़का एक तरफ़ खड़ा होकर रोने लगा।

बाबू लोग भीड़ को हटाते हुए आगे बढ़ आए और उन्होंने चपरासी को उस आदमी के पास से हटा लिया। चपरासी फिर भी बड़बड़ाता रहा, कमीना आदमी, दफ़्तर में आकर गाली देता है। मैं अभी तुझे दिखा देता कि...

 

एक तुम्हीं नहीं, यहाँ तुम सबके-सब कुत्ते हो, वह आदमी कहता रहा, तुम सब भी कुत्ते हो, और मैं भी कुत्ता हूँ। फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि तुम लोग सरकार के कुत्ते हो-हम लोगों की हड्डियाँ चूसते हो और सरकार की तरफ़ से भौंकते हो। मैं परमात्मा का कुत्ता हूँ। उसकी दी हुई हवा खाकर जीता हूँ, और उसकी तरफ़ से भौंकता हूँ। उसका घर इंसाफ़ का घर है। मैं उसके घर की रखवाली करता हूँ। तुम सब उसके इंसाफ़ की दौलत के लुटेरे हो। तुम पर भौंकना मेरा फ़र्ज़ है, मेरे मालिक का फ़रमान है। मेरा तुमसे अज़ली बैर है। कुत्ते का बैरी कुत्ता होता है। तुम मेरे दुश्मन हो, मैं तुम्हारा दुश्मन हूँ। मैं अकेला हूँ, इसलिए तुम सब मिलकर मुझे मारो। मुझे यहाँ से निकाल दो। लेकिन मैं फिर भी भौंकता रहूँगा। तुम मेरा भौंकना बंद नहीं कर सकते। मेरे अंदर मेरे मालिक का नर है, मेरे वाहगुरु का तेज़ है। मुझे जहाँ बंद कर दोगे, मैं वहाँ भौंकूँगा, और भौंक-भौंककर तुम सबके कान फाड़ दूँगा। साले, आदमी के कुत्ते, जूठी हड्डी पर मरनेवाले कुत्ते दुम हिला-हिलाकर जीनेवाले कुत्ते...!

बाबा जी, बस करो, एक बाबू हाथ जोड़कर बोला, हम लोगों पर रहम खाओ, और अपनी यह संतबानी बंद करो। बताओ तुम्हारा नाम क्या है, तुम्हारा केस क्या है...?

 

मेरा नाम है बारह सौ छब्बीस बटा सात! मेरे माँ-बाप का दिया हुआ नाम खा लिया कुत्तों ने। अब यही नाम है जो तुम्हारे दफ़्तर का दिया हुआ है। मैं बारह सौ छब्बीस बटा सात हूँ। मेरा और कोई नाम नहीं है। मेरा यह नाम याद कर लो। अपनी डायरी में लिख लो। वाहगुरु का कुत्ता-बारह सौ छब्बीस बटा सात।

बाबा जी, आज जाओ, कल या परसों आ जाना। तुम्हारी अर्ज़ी की कार्रवाई तक़रीबन-तक़रीबन पूरी हो चुकी है...।

 

तक़रीबन-तक़रीबन पूरी हो चुकी है! और मैं ख़ुद ही तक़रीबन-तक़रीबन पूरा हो चुका हूँ! अब देखना यह है कि पहले कार्रवाई पूरी होती है, कि पहले मैं पूरा होता हूँ! एक तरफ़ सरकार का हुनर है और दूसरी तरफ़ परमात्मा का हुनर है! तुम्हारा तक़रीबन-तक़रीबन अभी दफ़्तर में ही रहेगा और मेरा तक़रीबन-तक़रीबन कफ़न में पहुँच जाएगा। सालों ने सारी पढ़ाई ख़र्च करके दो लफ़्ज़ ईज़ाद किए हैं-शायद और तक़रीबन। 'शायद आपके काग़ज़ ऊपर चले गए हैं-तक़रीबन-तक़रीबन कार्रवाई पूरी हो चुकी है!' शायद से निकालो और तक़रीबन में डाल दो! तक़रीबन से निकालो और शायद में ग़र्क़ कर दो। तक़रीबन तीन-चार महीने में तहक़ीक़ात होगी।...शायद महीने-दो महीने में रिपोर्ट आएगी।' मैं आज शायद और तकरीबन दोनों घर पर छोड़ आया हूँ। मैं यहाँ बैठा हूँ और यहीं बैठा रहूँगा। मेरा काम होना है, तो आज ही होगा और अभी होगा। तुम्हारे शायद और तक़रीबन के गाहक ये सब खड़े हैं। यह ठगी इनसे करो...।

बाबू लोग अपनी सद्भावना के प्रभाव से निराश होकर एक-एक करके अंदर लौटने लगे।

 

बैठा है, बैठा रहने दो।

बकता है, बकने दो।

 

साला बदमाशी से काम निकालना चाहता है।

लेट हिम बार्क हिमसेल्फ टु डेथ।

 

बाबुओं के साथ चपरासी भी बड़बड़ाता हुआ अपने स्टूल पर लौट गया। मैं साले के दाँत तोड़ देता। अब बाबू लोग हाकिम हैं और हाकिमों का कहा मानना पड़ता है, वरना...

अरे बाबा, शांति से काम ले। यहाँ मिन्नत चलती है, पैसा चलता है, धौंस नहीं चलती,

 

भीड़ में से कोई उसे समझाने लगा।

वह आदमी उठकर खड़ा हो गया।

 

मगर परमात्मा का हुक्म हर जगह चलता है, वह अपनी क़मीज़ उतारता हुआ बोला, और परमात्मा के हुक्म से आज बेलाज बादशाह नंगा होकर कमिश्नर साहब के कमरे में जाएगा। आज वह नंगी पीठ पर साहब के डंडे खाएगा। आज वह बूटों की ठोकरें खाकर प्रान देगा। लेकिन वह किसी की मिन्नत नहीं करेगा। किसी को पैसा नहीं चढ़ाएगा। किसी की पूजा नहीं करेगा। जो वाहगुरु की पूजा करता है, वह और किसी की पूजा नहीं कर सकता। तो वाहगुरु का नाम लेकर...

और इससे पहले कि वह अपने कहे को किए में परिणत करता, दो-एक आदमियों ने बढ़कर तहमद की गाँठ पर रखे उसके हाथ को पकड़ लिया। बेलाज बादशाह अपना हाथ छुड़ाने के लिए संघर्ष करने लगा।

 

मुझे जाकर पूछने दो कि क्या महात्मा गाँधी ने इसीलिए इन्हें आज़ादी दिलाई थी कि ये आज़ादी के साथ इस तरह संभोग करें? उसकी मिट्टी ख़राब करें? उसके नाम पर कलंक लगाएँ? उसे टके-टके की फ़ाइलों में बाँधकर ज़लील करें? लोगों के दिलों में उसके लिए नफ़रत पैदा करें? इंसान के तन पर कपड़े देखकर बात इन लोगों की समझ में नहीं आती। शरम तो उसे होती है जो इंसान हो। मैं तो आप कहता हूँ कि मैं इंसान नहीं, कुत्ता हूँ...!

सहसा भीड़ में एक दहशत-सी फैल गई। कमिश्नर साहब अपने कमरे से बाहर निकल आए थे। वे माथे की त्योरियों और चेहरे की झुर्रियों को गहरा किए भीड़ के बीच में आ गए।

 

क्या बात है? क्या चाहते हो तुम?

आपसे मिलना चाहता हूँ, साहब, वह आदमी साहब को घूरता हुआ बोला, सौ मरले का एक गड्ढा मेरे नाम एलाट हुआ है। वह गड्ढा आपको वापस करना चाहता हूँ ताकि सरकार उसमें एक तालाब बनवा दे, और अफ़सर लोग शाम को वहाँ जाकर मछलियाँ मारा करें। या उस गड्ढे में सरकार एक तहख़ाना बनवा दे और मेरे जैसे कुत्तों को उसमें बंद कर दे...।

 

ज़ियादा बक-बक मत करो, और अपना केस लेकर मेरे पास आओ।

मेरा केस मेरे पास नहीं है, साहब! दो साल से सरकार के पास है—आपके पास है। मेरे पास अपना शरीर और दो कपड़े हैं। चार दिन बाद ये भी नहीं रहेंगे, इसलिए इन्हें भी आज ही उतारे दे रहा हूँ। इसके बाद बाक़ी सिर्फ़ बारह सौ छब्बीस बटा सात रह जाएगा। बारह सौ छब्बीस बटा सात को मार-मारकर परमात्मा के हुज़ूर में भेज दिया जाएगा...।

 

यह बकवास बंद करो ओर मेरे साथ अंदर आओ।

और कमिश्नर साहब अपने कमरे में वापस चले गए। वह आदमी भी कमीज़ कंधे पर रखे उस कमरे की तरफ़ चल दिया।

 

दो साल चक्कर लगाता रहा, किसी ने बात नहीं सुनी। ख़ुशामदें करता रहा, किसी ने बात नहीं सुनी। वास्ते देता रहा, किसी ने बात नहीं सुनी...।

चपरासी ने उसके लिए चिक उठा दी और वह कमिश्नर साहब के कमरे में दाख़िल हो गया। घंटी बजी, फ़ाइलें हिलीं,बाबुओं की बुलाहट हुई, और आधे घंटे के बाद बेलाज बादशाह मुस्कराता हुआ बाहर निकल आया। उत्सुक आँखों की भीड़ ने उसे आते देखा, तो वह फिर बोलने लगा, चूहों की तरह बिटर-बिटर देखने में कुछ नहीं होता। भौंको, भौंको,सबके-सब भौंको। अपने-आप सालों के कान फट जाएँगे। भौंको कुत्तों, भौंको...

 

उसकी भौजाई दोनों बच्चों के साथ गेट के पास खड़ी इंतज़ार कर रही थी। लडक़े और लडक़ी के कंधों पर हाथ रखते हुए वह सचमुच बादशाह की तरह सडक़ पर चलने लगा।

हयादार हो, तो सालहा-साल मुँह लटकाए खड़े रहो। अर्ज़ियाँ टाइप कराओ और नल का पानी पियो। सरकार वक़्त ले रही है! नहीं तो बेहया बनो। बेहयाई हज़ार बरकत है।

 

वह सहसा रुका और ज़ोर से हँसा।

यारो, बेहयाई हज़ार बरकत है।

 

उसके चले जाने के बाद कम्पाउंड में और आस-पास मातमी वातावरण पहले से और गहरा हो गया। भीड़ धीरे-धीरे बिखरकर अपनी जगहों पर चली गई। चपरासी की टाँगें फिर स्टूल पर झूलने लगीं। सामने के कैंटीन का लडक़ा बाबुओं के कमरे में एक सेट चाय ले गया। अर्ज़ीनवीस की मशीन चलने लगी और टिक-टिक की आवाज़ के साथ उसका लडक़ा फिर अपना सबक दोहराने लगा। पी ई एन पेन-पेन माने कलम; एच ई एन हेन-हेन माने मुर्गी; डी ई ऐन डेन-डेन माने अँधेरी गुफ़ा...!

 

मोहन राकेश

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शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

मधुशाला

 

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।

प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरूँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।

सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रुनझुन रुनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।

जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रुनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।

मेंहदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।

बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूँद मिले'
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
'और लिये जा, और पिये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।

बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।

बड़े बड़े परिवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,
जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।

सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला,
धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
जगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।

भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,
छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,
पटे कहाँ से, मधु औ' जग की जोड़ी ठीक नहीं,
जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।

बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुँह पर पड़ जाएगा ताला,
दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।

हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,
वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,
स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,
पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।

नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,
कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,
जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।

बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
बनी रहे वह मिट्टी जिससे बनता है मधु का प्याला,
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।

सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,
मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,
मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,
कहा करो 'जय राम' न मिलकर, कहा करो 'जय मधुशाला'।।२९।

सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।

तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,
सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,
मत्त समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।

अधरों पर हो कोई भी रस जिह्वा पर लगती हाला,
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।

पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,
माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,
झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।

प्रति रसाल तरु साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,
छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,
छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली
हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।

मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला
भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,
हरे हरे नव पल्लव, तरुगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,
छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।

साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,
तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,
अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,
प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।

उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,
जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते
सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।

अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।

किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
किसी ओर मैं देखूँ, मुझको दिखलाई देता साकी
किसी ओर देखूँ, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।

साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,
जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,
देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।

वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।

चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला,
जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला,
मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते,
चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२।

घन श्यामल अंगूर लता से खिंच खिंच यह आती हाला,
अरुण-कमल-कोमल कलियों की प्याली, फूलों का प्याला,
लोल हिलोरें साकी बन बन माणिक मधु से भर जातीं,
हंस मत्त होते पी पीकर मानसरोवर मधुशाला।।४३।

हिम श्रेणी अंगूर लता-सी फैली, हिम जल है हाला,
चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला,
कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं,
पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला।।४४।

धीर सुतों के हृदय रक्त की आज बना रक्तिम हाला,
वीर सुतों के वर शीशों का हाथों में लेकर प्याला,
अति उदार दानी साकी है आज बनी भारतमाता,
स्वतंत्रता है तृषित कालिका बलिवेदी है मधुशाला।।४५।

दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।४६।

पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलती हाला,
सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला,
मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।।४७।

सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।

बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।

कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!।५१।

और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,
इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,
कर लें पूजा शेख, पुजारी तब तक मस्जिद मन्दिर में
घूँघट का पट खोल न जब तक झाँक रही है मधुशाला।।५२।

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,
होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई, फिर
जहाँ अभी हैं मन्दिर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला।।५३।

यज्ञ अग्नि सी धधक रही है मधु की भटठी की ज्वाला,
ऋषि सा ध्यान लगा बैठा है हर मदिरा पीने वाला,
मुनि कन्याओं सी मधुघट ले फिरतीं साकीबालाएँ,
किसी तपोवन से क्या कम है मेरी पावन मधुशाला।।५४।

सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,
द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,
वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,
युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।५५।

वही वारुणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,
रंभा की संतान जगत में कहलाती 'साकीबाला',
देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!
किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।५६।

कभी न सुन पड़ता, 'इसने, हा, छू दी मेरी हाला',
कभी न कोई कहता, 'उसने जूठा कर डाला प्याला',
सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,
सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।

श्रम, संकट, संताप, सभी तुम भूला करते पी हाला,
सबक बड़ा तुम सीख चुके यदि सीखा रहना मतवाला,
व्यर्थ बने जाते हो हरिजन, तुम तो मधुजन ही अच्छे,
ठुकराते हैं मंदिरवाले, पलक बिछाती मधुशाला।।५८।

एक तरह से सबका स्वागत करती है साकीबाला,
अज्ञ विज्ञ में है क्या अंतर हो जाने पर मतवाला,
रंक राव में भेद हुआ है कभी नहीं मदिरालय में,
साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है यह मेरी मधुशाला।।५९।

बार बार मैंने आगे बढ़ आज नहीं माँगी हाला,
समझ न लेना इससे मुझको साधारण पीने वाला,
हो तो लेने दो ऐ साकी दूर प्रथम संकोचों को,
मेरे ही स्वर से फिर सारी गूँज उठेगी मधुशाला।।६०।

कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला
हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,
आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है,
कल की हो न मुझे मधुशाला काल कुटिल की मधुशाला।।६१।

आज मिला अवसर, तब फिर क्यों मैं न छकूँ जी-भर हाला
आज मिला मौका, तब फिर क्यों ढाल न लूँ जी-भर प्याला,
छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी-भर कर लूँ,
एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला।।६२।

आज सजीव बना लो, प्रेयसी, अपने अधरों का प्याला,
भर लो, भर लो, भर लो इसमें, यौवन मधुरस की हाला,
और लगा मेरे होठों से भूल हटाना तुम जाओ,
अथक बनू मैं पीनेवाला, खुले प्रणय की मधुशाला।।६३।

सुमुखी तुम्हारा, सुन्दर मुख ही, मुझको कन्चन का प्याला
छलक रही है जिसमें माणिक रूप मधुर मादक हाला,
मैं ही साकी बनता, मैं ही पीने वाला बनता हूँ
जहाँ कहीं मिल बैठे हम तुम़ वहीं गयी हो मधुशाला।।६४।

दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला,
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला,
नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ,
अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ - अदाई मधुशाला।।६५।

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करूँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।६६।

क्या पीना, निर्द्वन्द न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला,
क्या जीना, निश्चिंत न जब तक साथ रहे साकीबाला,
खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे,
मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला।।६७।

मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी-सी हाला!
मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!
इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरूँ,
सिंधु-तृषा दी किसने रचकर बिंदु-बराबर मधुशाला।।६८।

क्या कहता है, रह न गई अब तेरे भाजन में हाला,
क्या कहता है, अब न चलेगी मादक प्यालों की माला,
थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी तो शेष नहीं कुछ पीने को,
प्यास बुझाने को बुलवाकर प्यास बढ़ाती मधुशाला।।६९।

लिखी भाग्य में जितनी बस उतनी ही पाएगा हाला,
लिखा भाग्य में जैसा बस वैसा ही पाएगा प्याला,
लाख पटक तू हाथ पाँव, पर इससे कब कुछ होने का,
लिखी भाग्य में जो तेरे बस वही मिलेगी मधुशाला।।७०।

कर ले, कर ले कंजूसी तू मुझको देने में हाला,
दे ले, दे ले तू मुझको बस यह टूटा फूटा प्याला,
मैं तो सब्र इसी पर करता, तू पीछे पछताएगी,
जब न रहूँगा मैं, तब मेरी याद करेगी मधुशाला।।७१।

ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला,
गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला,
साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा,
दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला।।७२।

क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुर्बल मानव मिटटी का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर कटु-मधु जीवन की हाला,
मृत्यु बनी है निर्दय साकी अपने शत-शत कर फैला,
काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला।।७३।

प्याले सा गढ़ हमें किसी ने भर दी जीवन की हाला,
नशा न भाया, ढाला हमने ले लेकर मधु का प्याला,
जब जीवन का दर्द उभरता उसे दबाते प्याले से,
जगती के पहले साकी से जूझ रही है मधुशाला।।७४।

अपने अंगूरों से तन में हमने भर ली है हाला,
क्या कहते हो, शेख, नरक में हमें तपाएगी ज्वाला,
तब तो मदिरा खूब खिंचेगी और पिएगा भी कोई,
हमें नमक की ज्वाला में भी दीख पड़ेगी मधुशाला।।७५।

यम आएगा लेने जब, तब खूब चलूँगा पी हाला,
पीड़ा, संकट, कष्ट नरक के क्या समझेगा मतवाला,
क्रूर, कठोर, कुटिल, कुविचारी, अन्यायी यमराजों के
डंडों की जब मार पड़ेगी, आड़ करेगी मधुशाला।।७६।

यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला,
यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला,
हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर,
मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला।।७७।

याद न आए दुखमय जीवन इससे पी लेता हाला,
जग चिंताओं से रहने को मुक्त, उठा लेता प्याला,
शौक, साध के और स्वाद के हेतु पिया जग करता है,
पर मै वह रोगी हूँ जिसकी एक दवा है मधुशाला।।७८।

गिरती जाती है दिन प्रतिदिन प्रणयनी प्राणों की हाला
भग्न हुआ जाता दिन प्रतिदिन सुभगे मेरा तन प्याला,
रूठ रहा है मुझसे रूपसी, दिन दिन यौवन का साकी
सूख रही है दिन दिन सुन्दरी, मेरी जीवन मधुशाला।।७९।

यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला,
पी न होश में फिर आएगा सुरा-विसुध यह मतवाला,
यह अंतिम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है,
पथिक, प्यार से पीना इसको फिर न मिलेगी मधुशाला।८०।

ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला
पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला,
हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जिह्वा भूले
कानो में तुम कहती रहना, मधु का प्याला मधुशाला।।८१।

मेरे अधरों पर हो अंतिम वस्तु न तुलसीदल प्याला
मेरी जिह्वा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२।

मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आँसू में हाला
आह भरे वो, जो हो सुरभित मदिरा पी कर मतवाला,
दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों
और जलूँ उस ठौर जहाँ पर कभी रही हो मधुशाला।।८३।

और चिता पर जाये उँड़ेला पात्र न घृत का, पर प्याला
कंठ बँधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
प्राण प्रिये यदि श्राद्ध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालों को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।।८४।

नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५।

ज्ञात हुआ यम आने को है ले अपनी काली हाला,
पंडित अपनी पोथी भूला, साधु भूल गया माला,
और पुजारी भूला पूजा, ज्ञान सभी ज्ञानी भूला,
किन्तु न भूला मरकर के भी पीनेवाला मधुशाला।।८६।

यम ले चलता है मुझको तो, चलने दे लेकर हाला,
चलने दे साकी को मेरे साथ लिए कर में प्याला,
स्वर्ग, नरक या जहाँ कहीं भी तेरा जी हो लेकर चल,
ठौर सभी हैं एक तरह के साथ रहे यदि मधुशाला।।८७।

पाप अगर पीना, समदोषी तो तीनों - साकी बाला,
नित्य पिलानेवाला प्याला, पी जानेवाली हाला,
साथ इन्हें भी ले चल मेरे न्याय यही बतलाता है,
कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८।

शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,
'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।।८९।

जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,
जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,
जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,
जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!।९०।

देख रहा हूँ अपने आगे कब से माणिक-सी हाला,
देख रहा हूँ अपने आगे कब से कंचन का प्याला,
'बस अब पाया!'- कह-कह कब से दौड़ रहा इसके पीछे,
किंतु रही है दूर क्षितिज-सी मुझसे मेरी मधुशाला।।९१।

कभी निराशा का तम घिरता, छिप जाता मधु का प्याला,
छिप जाती मदिरा की आभा, छिप जाती साकीबाला,
कभी उजाला आशा करके प्याला फिर चमका जाती,
आँख मिचौली खेल रही है मुझसे मेरी मधुशाला।।९२।

'आ आगे' कहकर कर पीछे कर लेती साकीबाला,
होंठ लगाने को कहकर हर बार हटा लेती प्याला,
नहीं मुझे मालूम कहाँ तक यह मुझको ले जाएगी,
बढ़ा बढ़ाकर मुझको आगे, पीछे हटती मधुशाला।।९३।

हाथों में आने-आने में, हाय, फिसल जाता प्याला,
अधरों पर आने-आने में हाय, ढुलक जाती हाला,
दुनियावालो, आकर मेरी किस्मत की ख़ूबी देखो,
रह-रह जाती है बस मुझको मिलते-मिलते मधुशाला।।९४।

प्राप्य नही है तो, हो जाती लुप्त नहीं फिर क्यों हाला,
प्राप्य नही है तो, हो जाता लुप्त नहीं फिर क्यों प्याला,
दूर न इतनी हिम्मत हारूँ, पास न इतनी पा जाऊँ,
व्यर्थ मुझे दौड़ाती मरु में मृगजल बनकर मधुशाला।।९५।

मिले न, पर, ललचा ललचा क्यों आकुल करती है हाला,
मिले न, पर, तरसा तरसाकर क्यों तड़पाता है प्याला,
हाय, नियति की विषम लेखनी मस्तक पर यह खोद गई
'दूर रहेगी मधु की धारा, पास रहेगी मधुशाला!'।९६।

मदिरालय में कब से बैठा, पी न सका अब तक हाला,
यत्न सहित भरता हूँ, कोई किंतु उलट देता प्याला,
मानव-बल के आगे निर्बल भाग्य, सुना विद्यालय में,
'भाग्य प्रबल, मानव निर्बल' का पाठ पढ़ाती मधुशाला।।९७।

किस्मत में था खाली खप्पर, खोज रहा था मैं प्याला,
ढूँढ़ रहा था मैं मृगनयनी, किस्मत में थी मृगछाला,
किसने अपना भाग्य समझने में मुझसा धोखा खाया,
किस्मत में था अवघट मरघट, ढूँढ़ रहा था मधुशाला।।९८।

उस प्याले से प्यार मुझे जो दूर हथेली से प्याला,
उस हाला से चाव मुझे जो दूर अधर से है हाला,
प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला।।९९।

साकी के पास है तनिक सी श्री, सुख, संपित की हाला,
सब जग है पीने को आतुर ले ले किस्मत का प्याला,
रेल ठेल कुछ आगे बढ़ते, बहुतेरे दबकर मरते,
जीवन का संघर्ष नहीं है, भीड़ भरी है मधुशाला।।१००।

साकी, जब है पास तुम्हारे इतनी थोड़ी सी हाला,
क्यों पीने की अभिलषा से, करते सबको मतवाला,
हम पिस पिसकर मरते हैं, तुम छिप छिपकर मुसकाते हो,
हाय, हमारी पीड़ा से है क्रीड़ा करती मधुशाला।।१०१।

साकी, मर खपकर यदि कोई आगे कर पाया प्याला,
पी पाया केवल दो बूँदों से न अधिक तेरी हाला,
जीवन भर का, हाय, परिरश्रम लूट लिया दो बूँदों ने,
भोले मानव को ठगने के हेतु बनी है मधुशाला।।१०२।

जिसने मुझको प्यासा रक्खा बनी रहे वह भी हाला,
जिसने जीवन भर दौड़ाया बना रहे वह भी प्याला,
मतवालों की जिह्वा से हैं कभी निकलते शाप नहीं,
दुखी बनाया जिसने मुझको सुखी रहे वह मधुशाला!।१०३।

नहीं चाहता, आगे बढ़कर छीनूँ औरों की हाला,
नहीं चाहता, धक्के देकर, छीनूँ औरों का प्याला,
साकी, मेरी ओर न देखो मुझको तनिक मलाल नहीं,
इतना ही क्या कम आँखों से देख रहा हूँ मधुशाला।।१०४।

मद, मदिरा, मधु, हाला सुन-सुन कर ही जब हूँ मतवाला,
क्या गति होगी अधरों के जब नीचे आएगा प्याला,
साकी, मेरे पास न आना मैं पागल हो जाऊँगा,
प्यासा ही मैं मस्त, मुबारक हो तुमको ही मधुशाला।।१०५।

क्या मुझको आवश्यकता है साकी से माँगूँ हाला,
क्या मुझको आवश्यकता है साकी से चाहूँ प्याला,
पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से!
मैं तो पागल हो उठता हूँ सुन लेता यदि मधुशाला।।१०६।

देने को जो मुझे कहा था दे न सकी मुझको हाला,
देने को जो मुझे कहा था दे न सका मुझको प्याला,
समझ मनुज की दुर्बलता मैं कहा नहीं कुछ भी करता,
किन्तु स्वयं ही देख मुझे अब शरमा जाती मधुशाला।।१०७।

एक समय संतुष्ट बहुत था पा मैं थोड़ी-सी हाला,
भोला-सा था मेरा साकी, छोटा-सा मेरा प्याला,
छोटे-से इस जग की मेरे स्वर्ग बलाएँ लेता था,
विस्तृत जग में, हाय, गई खो मेरी नन्ही मधुशाला!।१०८।

बहुतेरे मदिरालय देखे, बहुतेरी देखी हाला,
भाँति भाँति का आया मेरे हाथों में मधु का प्याला,
एक एक से बढ़कर, सुन्दर साकी ने सत्कार किया,
जँची न आँखों में, पर, कोई पहली जैसी मधुशाला।।१०९।

एक समय छलका करती थी मेरे अधरों पर हाला,
एक समय झूमा करता था मेरे हाथों पर प्याला,
एक समय पीनेवाले, साकी आलिंगन करते थे,
आज बनी हूँ निर्जन मरघट, एक समय थी मधुशाला।।११०।

जला हृदय की भट्टी खींची मैंने आँसू की हाला,
छलछल छलका करता इससे पल पल पलकों का प्याला,
आँखें आज बनी हैं साकी, गाल गुलाबी पी होते,
कहो न विरही मुझको, मैं हूँ चलती फिरती मधुशाला!।१११।

कितनी जल्दी रंग बदलती है अपना चंचल हाला,
कितनी जल्दी घिसने लगता हाथों में आकर प्याला,
कितनी जल्दी साकी का आकर्षण घटने लगता है,
प्रात नहीं थी वैसी, जैसी रात लगी थी मधुशाला।।११२।

बूँद बूँद के हेतु कभी तुझको तरसाएगी हाला,
कभी हाथ से छिन जाएगा तेरा यह मादक प्याला,
पीनेवाले, साकी की मीठी बातों में मत आना,
मेरे भी गुण यों ही गाती एक दिवस थी मधुशाला।।११३।

छोड़ा मैंने पथ मतों को तब कहलाया मतवाला,
चली सुरा मेरा पग धोने तोड़ा जब मैंने प्याला,
अब मानी मधुशाला मेरे पीछे पीछे फिरती है,
क्या कारण? अब छोड़ दिया है मैंने जाना मधुशाला।।११४।

यह न समझना, पिया हलाहल मैंने, जब न मिली हाला,
तब मैंने खप्पर अपनाया ले सकता था जब प्याला,
जले हृदय को और जलाना सूझा, मैंने मरघट को
अपनाया जब इन चरणों में लोट रही थी मधुशाला।।११५।

कितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,
टूट चुकी अब तक कितने ही मादक प्यालों की माला,
कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गए,
कितने पीनेवाले आए, किन्तु वही है मधुशाला।।११६।

कितने होठों को रक्खेगी याद भला मादक हाला,
कितने हाथों को रक्खेगा याद भला पागल प्याला,
कितनी शक्लों को रक्खेगा याद भला भोला साकी,
कितने पीनेवालों में है एक अकेली मधुशाला।।११७।

दर दर घूम रहा था जब मैं चिल्लाता - हाला! हाला!
मुझे न मिलता था मदिरालय, मुझे न मिलता था प्याला,
मिलन हुआ, पर नहीं मिलनसुख लिखा हुआ था किस्मत में,
मैं अब जमकर बैठ गया हूँ, घूम रही है मधुशाला।।११८।

मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,
प्याले में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला,
इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!।११९।

किसे नहीं पीने से नाता, किसे नहीं भाता प्याला,
इस जगती के मदिरालय में तरह-तरह की है हाला,
अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार सभी पी मदमाते,
एक सभी का मादक साकी, एक सभी की मधुशाला।।१२०।

वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला,
जिसमें मैं बिंबित-प्रतिबिंबित प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।

मतवालापन हाला से ले मैंने तज दी है हाला,
पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला,
साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया,
मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।

मदिरालय के द्वार ठोंकता किस्मत का छूंछा प्याला,
गहरी, ठंडी सांसें भर भर कहता था हर मतवाला,
कितनी थोड़ी सी यौवन की हाला, हा, मैं पी पाया!
बंद हो गई कितनी जल्दी मेरी जीवन मधुशाला।।१२३।

कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गयी सुरिभत हाला,
कहाँ गया स्वपिनल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!
पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।

अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया -
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।

'मय' को करके शुद्ध दिया अब नाम गया उसको, 'हाला'
'मीना' को 'मधुपात्र' दिया 'सागर' को नाम गया 'प्याला',
क्यों न मौलवी चौंकें, बिचकें तिलक-त्रिपुंडी पंडित जी
'मय-महिफल' अब अपना ली है मैंने करके 'मधुशाला'।।१२६।

कितने मर्म जता जाती है बार-बार आकर हाला,
कितने भेद बता जाता है बार-बार आकर प्याला,
कितने अर्थों को संकेतों से बतला जाता साकी,
फिर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला।।१२७।

जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।१२८।

जिन अधरों को छुए, बना दे मस्त उन्हें मेरी हाला,
जिस कर को छू दे, कर दे विक्षिप्त उसे मेरा प्याला,
आँख चार हों जिसकी मेरे साकी से दीवाना हो,
पागल बनकर नाचे वह जो आए मेरी मधुशाला।।१२९।

हर जिह्वा पर देखी जाएगी मेरी मादक हाला
हर कर में देखा जाएगा मेरे साकी का प्याला
हर घर में चर्चा अब होगी मेरे मधुविक्रेता की
हर आंगन में गमक उठेगी मेरी सुरभित मधुशाला।।१३०।

मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
जिसकी जैसी रुचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला।।१३१।

यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,
नहीं-नहीं कवि का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।।१३२।

कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!।१३३।

विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
यदि थोड़ी-सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला,
शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई,
जन्म सफल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला।।१३४।

बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,
कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,
मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।।१३५।

स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।

मैं कायस्थ कुलोद्भव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,
मेरे तन के लोहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला,
पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,
मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।

बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,
बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,
पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही
और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।

पितृ पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिट्टी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।

हरिवंशराय बच्चन

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