नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

बुधवार, 16 मई 2018

सत्त्रिया नृत्य

 

15वीं शताब्‍दी ईस्‍वी में असम के महान वैष्‍णव संत और सुधारक श्रीमंत शंकरदेव द्वारा सत्रिया नृत्‍य को वैष्‍णव धर्म के प्रचार हेतु एक शक्तिशाली माध्‍यम के रूप में परिचित कराया गया । बाद में यह नृत्‍य शैली एक विशिष्‍ट नृत्‍य शैली के रूप में विकसित व विस्‍तारित हुई । यह असमी नृत्‍य और नाटक का नया खजाना, शताब्दियों तक सत्रों द्वारा एक बड़ी प्रतिज्ञा के साथ विकसित और संरक्षित किया गया है । ( अर्थात् वैष्‍णव मठ या विहार) इस नृत्‍य शैली को अपने धार्मिक विचार और सत्रों के साथ जुड़ाव के कारण उपयुक्‍त ढंग से सत्रिया नाम दिया गया ।

शंकरदेव ने विभिन्‍न स्‍थानीय शोध प्रबन्‍धों, स्‍थानीय लोक नृत्‍यों जैसे विभिन्‍न घटकों को शामिल करते हुए अपने स्‍वयं की नई शैली में इस नृत्‍य शैली की रचना की । नव वैष्‍णव आंदोलन से पहले असम में दो नृत्‍य शैलियां थीं जैसे ओजा पल्लि और अनेक शास्‍त्रीय तत्‍वों (अवयवों) सहित देवदासी । ओजा पल्लि नृत्‍यों के दो प्रकार अब तक असम में हैं –सुकनानी, जिसमें ओजा पल्लि नृत्‍य सर्प देवी की पूजा के अवसर पर समूह गायन की संगति करते हैं। मनसा और व्‍याहार गीत, रामायण, महाभारत और कुछ पुराणों के असमी रूपांतर से ग्रहण किए गए हैं । शक्ति सम्‍प्रदाय (पंथ) का सुकनानी ओजा पल्लि है और व्‍याहार गीत वैष्‍णव सम्‍प्रदाय का है । श्रीमंत शंकरदेव ने सत्र में अपने दैनिक धार्मिक अनुष्‍ठानों में व्‍याहार गीतों को जोड़ा । अब तक भी व्‍याहार गीत असम के सत्रों के धार्मिक अनुष्‍ठानों का एक भाग है । ओजा पल्लि समूह के नर्तक केवल गायन और नृत्‍य ही नहीं करते पर मुद्राओं और शैलीबद्ध गतियों द्वारा वर्णन (आख्‍यान) को समझाते भी हैं । जहां तक देवदासी नृत्‍य का संबंध है, बड़ी संख्‍या में सत्रिया नृत्‍य के साथ लयात्‍मक शब्‍दों और पाद कार्य के साथ नृत्‍य मुद्राओं की साम्‍यता, देवदासी नृत्‍य का सत्रिया नृत्‍य पर स्‍पष्‍ट प्रभाव निर्देशित करती है । सत्रिया नृत्‍य पर अन्‍य दृश्‍यात्‍मक प्रभाव असमी लोक नृत्‍यों जैसे बिहू, बोड़ो आदि से है । इन नृत्‍य शैलियों में बहुत सी हस्‍तमुड़ाएं तथा लयात्‍मक व्‍यवस्‍थापन एक समान संचालित होता है ।

सत्रिया नृत्‍य परंपरागत हस्‍तमुद्राओं, पाद कार्यों, आहार्य संगीत आदि के संबंध में सख्‍ती से बने सिद्धांतों के द्वारा सत्रिया नृतय की परंपरा संचालित होती है । इस परंपरा में विशिष्‍ट रूप से भिन्‍न दो धाराएं होती हैं – गायन बायनार नाच से खरमारनाच का आरंभ नाटकीय प्रस्‍तुतियों से युक्‍त भाओना संबंधित रंगपटल से होता है तथा दूसरे ऐसे नृत्‍य जो स्‍वतंत्र है जैसे चाली, राजस्‍थान चाली, झुमुरा, नादु भंगी आदि । इसमें चाली को चरित्र लालितयपूर्ण एवं शानदार- वीरोचित जुदाई को प्रदर्शित करते पुरूप चरित्र द्वारा निष्‍पादित किया जाता है ।

 

साभार- संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार

समाज की बात Samaj Ki Baat

कृष्णधर शर्मा Krishnadhar  Sharma

मंगलवार, 15 मई 2018

कायाकल्प-मुँशी प्रेमचंद

 "वह जमाना लद गया जब विद्वानों की कद्र थी, अब तो विद्वान टके सेर मिलते हैं, कोई नहीं पूछता। जैसे और भी चीजें बनाने के कारखाने खुल गए हैं, उसी तरह विद्वानों के कारखाने खुल गए हैं, और उनकी संख्या हर साल बढ़ती जाती है।" (कायाकल्प-मुँशी प्रेमचंद)



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कुचिपुड़ी नृत्य

 

कुचीपुड़ी भारतीय नृत्‍य की एक पारंपरिक शैली है । इस शताब्‍दी के तीसरे व चौथे दशक के आसपास यह नृत्‍य-शैली इस नाम के नृत्‍य-नाटक की लंबी तथा समृद्ध परंपरा से उद्भूत हुई ।

दरअसल, आंध्र प्रदेश के कृष्‍णा जिले में कुचीपुड़ी नाम गांव है । यह विजयवाड़ा से 35 कि.मी. की दूरी पर स्थित है । आंध्र प्रदेश में नृत्‍य-नाटक की एक लंबी परंपरा चली आ रही है, जिसे यक्षगान के जातिगत नाम से जाना जाता था । 17वीं शताब्‍दी में एक प्रतिभाशाली वैष्‍णव कवि तथा द्रष्‍टा सिद्धेन्‍द्र योगी ने यक्षगान के रुप में कुचीपुड़ी शैली की कल्‍पना की, जिनमें अपनी कल्‍पनाओं को मूर्ति एवं साकार रूप प्रदान करने की अद्भुत क्षमता थी । संस्‍कृत में कृष्‍ण-लीला-तरंगिणी नामक काव्‍य के रचयिता, अपने गरु तीर्थनारायण योगी द्वारा मार्गदर्शन प्राप्‍त कर, सिद्धेन्‍द्र योगी यक्षगान की साहित्यिक परंपरा में तल्‍लीन हो गए ।

ऐसा कहा जाता है कि सिद्धेन्‍द्र योगी ने एक स्‍वप्‍न देखा कि भगवान कृष्‍ण उनसे अपनी सर्वाधिक प्रिय रानी सत्‍यभामा हेतु पारिजात लाने की पुराणकथा पर आधारित एक नृत्‍य नाटक की रचना करने का अनुरोध कर रहे हैं । इस अनुरोध का अनुपालन करते हुए सिद्धेन्‍द्र योगी ने उत्‍साहित होकर भामाकलापम् की रचना की, जिसे आज भी कुचीपुड़ी रंगपटल का पीस-डी-रेसिसटेन्‍स माना जाता है । सिद्धेन्‍द्र योगी ने कुचीपुड़ी गांव क ब्राह्मण युवकों को अपनी रचनाओं, विशेषकर भामाकलापम् को प्रस्‍तत करने हेतु प्रोत्‍साहित किया । भामाकलापम् की प्रस्‍तुति एक आश्‍चर्यजनक सफलता थी । इसका सौन्‍दर्यपरक आकर्षण इतना व्‍यापक था कि तत्‍कालीन गोलकुण्‍डा के नवाब अब्‍दुल हसन तनीशाह ने 1675 में एक ताम्र पट्टिका जारी कर इस कला को खोजने वाले ब्राह्मण परिवारों को आग्रहाम् स्‍वरूप कुचीपुड़ी गांव भेंट्स्‍वरूप दे दिया । उस समय सभी अभिनेता पुरुष ही थे और उनके द्वारा प्रस्‍तुत स्‍त्री-पात्र-प्रतिरूपण श्रेष्‍ठ होता था । स्‍त्री-पात्र-प्रतिरूपण या अवतार-धारण के उच्‍च स्‍तर को सत्‍यभामा की भूमिका निभाने वाले वेदांतम् सत्‍यनारायण शर्मा का उदाहरण देखा जा सकता है ।

सिद्धेन्‍द्र योगी क अनुयायियों अथवा शिष्‍यों ने कई नाटकों की रचना की और आज भी कुचीपुड़ी नृत्‍य-नाटक की परंपरा विद्यमान है । इस शैली में एकल नृत्‍य-प्रस्‍तुति व स्‍त्री नर्तकियों के प्रशिक्षण सहित अनेक नए तत्‍त्‍वों का समावेश (1886-1956) लक्ष्‍मी नारायण शास्‍त्री ने किया । पहले भी एकल नृत्‍य-प्रस्‍तुति विद्यमान थी, पर वह केवल समुचित क्रमों में नृत्‍य-नाटकों के एक भाग के रूप में थी । कभी-कभी तो नाटक की प्रस्‍तुति में आवश्‍यकता न होने पर भी, अनुरोध अथवा आग्रह में वृद्धि करने तथा प्रस्‍तुति को बीच में रोकने हेतु एकल नृत्‍य प्रस्‍तुति की जाती थी । तीर्थनारायण योगी की कृष्‍ण-लीला-तरंगिणी से प्रेरित तरंगम् ऐसी ही प्रस्‍तुति है ।

शरीर संतुलन व पादकौशल तथा उसके नियंत्रण में नर्तक कलाकारों की दक्षता प्रदर्शित करने हेतु पीतल की थाली की किनारी पर नृत्‍य करना तथा सिर पर पानी से भरा घड़ा लेकर नृत्‍य करने जैसी कुशलताओं को जोड़ा गया । इस शताब्‍दी के मध्‍य तक कुचीपुड़ी नृत्‍य शैली एक सर्वथा स्‍वतंत्र शास्‍त्रीय एकल नृत्‍य शैली के रूप में पूर्णत: स्‍थापित हो गई । इस प्रकार, अब कुचीपुड़ी नृत्‍य की दो शैलियां हैं: नृत्‍य-नाटक तथा एकल नृत्‍य-प्रस्‍तुति ।

इस शताब्‍दी के चौथे दशक के उत्‍तरार्द्ध से एकल प्रस्‍तुति के क्रम का तेजी से विस्‍तार हुआ । कुचीपुड़ी नृतय-प्रस्‍तुति, एक प्रार्थनामयी प्रस्‍तति से आरंभ होती है, जैसा कि अन्‍य शास्‍त्रीय नृत्‍य शैलियों में होता है । पहले प्रार्थना या आह्वान केवल गणेश वंदना तक ही सीमित था । अब अन्‍य देवताओं का भी आह्वान किया जाता है । तत्‍पश्‍चात् अवर्णनात्‍मक तथा काल्पनिक नृत्‍य अर्थात् नृत्‍त प्रस्‍तुति होती है । अक्‍सर जतिस्‍वरम् को नृत्‍त के ही रूप में प्रस्‍तुत किया जाता है । इसके बाद शब्‍दम् नामक वर्णनात्‍मक प्रस्‍तुति की जाती है । परंपरागत लोकप्रिय शब्‍दम् प्रस्‍तुति में से एक है- दशावतार । शब्‍दम् के बाद नाट्य-प्रस्‍तुति स्‍वरूप कलापम् प्रस्‍तुत किया जाता है । अनेक परंपरागत नर्तक कलाकार, भामाकलापम् नाम परंपरागत नृत्‍य नाटक से सत्‍यभामा पात्र-प्रवेश को प्रस्‍तुत करना पसंद करते है । ‘भामणे, सत्‍यभामणे’ गीत तथा परंपरागत प्रवेश दारू (चरित्र विशेष के प्रवेश के समय प्रस्‍तुत किया जाने वाला गीत) इतना सुरीला व श्रुतिमधुर होता है कि उसका आर्कषण, व्‍यापक और सदाबहार प्रतीत होता है । इसी अनुक्रम में, तत्‍पश्‍चात् पदम्, जावली, श्‍लोकम् आदि साहित्यिक व संगीत स्‍वरूपों पर आधारित विशुद्ध नृत्‍याभिनय-प्रस्‍तुति की जाती है । ऐसी प्रस्‍तुति में गाए गए प्रत्‍येक शब्‍द को नृत्‍य की मुद्राओं द्वारा प्रस्‍तुत किया जाता है । इस प्रकार के नृत्‍य को उपयुक्‍तत: दृश्‍य-कवित्‍त (दृश्‍य-काव्‍य) कहा जा सकता है । सामान्‍यत: कुचीपुड़ी नृत्‍य-प्रस्‍तुति को तरंगम् प्रस्‍तुति के पश्‍चात् समाप्‍त किया जाता है । इस प्रस्‍तुति के साथ कृष्‍ण-लीला-तरंगिणी के उद्धरण गाए जाते हैं । इसमें अक्‍सर नर्तक कलाकार शकट-वदनम् पाद मुद्रा में पीतल की थाली पर पांवों को रखकर खड़ा रहता है (देखिए चित्र सं. 2 घ) और अत्‍यंत कुशलतापूर्वक लयात्‍मक रूप से थाली को घुमाता है ।

नृत्‍य प्रस्‍तुति के साथ संगत रूप में कर्नाटक संगीत की शास्‍त्रीय शैली सहित परिवर्तनीय आह्लादक प्रस्‍तुति की जाती है । गायकों के अतिरिक्‍त, अन्‍य संगत कलाकार भी होते हैं । ताल संगीत प्रस्‍तुत करने हेतु एक मृदंगम्-वादक, सुरीला वाद्यात्‍मक संगीत प्रदान करने हेतु एक वॉयलिन अ‍थवा वीणा-वादक या दोनों, एक मंजीरा-वादक, जो अक्‍सर वाद्य वृंद का संचालन करता है और सोल्‍लुकट्टु (स्‍मरणोपकारी ताल के बोल) का उच्‍चारण करता है ।

 

साभार- संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार

समाज की बात Samaj Ki Baat

कृष्णधर शर्मा Krishnadhar  Sharma

सोमवार, 14 मई 2018

ओडिसी नृत्य

 

पूर्वी समुद्र तट पर स्थित ओडिशा, ओड़ीसी नृत्‍य का घर है और भारतीय शास्‍त्रीय नृत्‍य के अनेक रूपों में से एक है । इंद्रीय और गायन के रूप में ओड़ीसी प्रेम और भाव, देवताओं और मानव से जुड़ा, सांसारिक और लोकोत्तर नृत्‍य है । नाट्य शास्‍त्र में भी अनेक प्रादेशिक विशेषताओं का उल्‍लेख किया गया है । दक्षिणी-पूर्वी शैली उधरा मगध शैली के रूप में जाती है, जिसमें वर्तमान ओड़ीसी को प्राचीन अग्रदूत के रूप में पहचाना जा सकता है ।

भुवनेश्‍वर के पास उदयगिरी और ख्‍ण्‍डगिरी की गुफाओं से इस नृत्‍य रूप के, दूसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व के पुरातत्‍वीय प्रमाण पाए जाते हैं । बाद में अुद्ध प्रतिमाओं के असंख्‍य उदाहरण, नृत्‍य करती योगीनियों की तांत्रिक आकृतियां, नटराज और प्राचीन शिव मंदिरों के अन्‍य दिव्‍य संगीतकार तथा नीकियां दूसरी सदी ईसा पूर्व से दसवीं सदी ईसवी सन् तक की, नृत्‍य की इस निरंतर परम्‍परा का एक प्रमाण प्रस्‍तुत करते हैं । यह प्रभाव एक विशिष्‍ट दर्शन- जगन्नथा के विश्‍वास या धर्म के संश्‍लेषण में स्‍थापित है । यह हिन्‍दुवाद के साथ लगभग सातवीं सदी र्इसवी सन् में उड़ीसा में स्‍थापित हुआ, अनेक प्रभवशाली मंदिरों का निर्माण किया गया । तेरहवीं सदी में निर्मित कोणार्क का देदीप्‍यमान सूर्य मंदिर, इसके नृत्‍य मण्‍डप या नृत्‍य के हॉल सहित मंदिर की इमारत के निर्माण की गतिविधिा का उच्‍चस्‍तर है । आज भी पत्‍थर पर बनी यह नृत्‍य गतिविधियां ओड़ीसी नतीकियों के लिए प्रेरणा स्‍त्रोत हैं ।

शताब्दियों के लिए महरिज इस नृतय की प्रमुख अधिकारिणी रहीं । महरित, जो मुलत: मंदिर की नतीकियां (देवदासी) थीं, धीरे-धीरे शाही दरबारों में काम करने लगीं, जिसके परिणाम स्‍वरूप कला-रूप का हा्स हुआ । इसी समय के आस-पास लड़कों का एक वर्ग, जिसे गोटूपुआ कहा जाता था, जो कला में प्रवीण था, मंदिर में और लोगों के सामान्‍य मनोरंजन के लिए भी नृत्‍य करने लगा । इस शैली के वर्तमान गुरुओं में अनेक गोटूपुआ परम्‍परा से सम्‍बन्धित हैं ।

ओड़ीसी एक उच्‍च शैली का नृत्‍य है और कुछ मात्रा में शास्‍त्रीय नाट्य शास्‍त्र तथा अभिनय दर्पण पर आधारित है । बाद में जदूनाथ सिन्‍हा के अभिनय दर्पण प्रकाश, राजमनी पत्तरा के अभिनय चंद्रिका और महेश्‍वर महापात्र के अन्‍य अभिनय चंद्रिका से अधिकांशत: इसे लिया गया है ।

भारत के अन्‍य भागों की तरह, रचनात्‍मक साहित्‍य ओड़ीसी नतीकियों को प्रेरणा प्रदान करता है और नृत्‍य के लिए विषय-वस्‍तु भी उपलब्‍ध कराता है । यह बात विशेषत: जयदेव द्वारा रचित बारहवीं सदी के गीत गोविन्‍दा के बारे में सत्‍य है । इसकी साहित्यिक शैली और कवित शैली की विषय सूची में अन्‍य उत्‍कृष्‍ट कविताएं और नायक-नायिका भाव का एक गहन उदाहरण है । कृष्‍ण के लिए कवि की भक्ति कार्य से झलकती है ।

ओड़ीसी गुप्‍त रूप से नाट्यशास्‍त्र द्वारा स्‍थापित सिद्धांतों का अनुसरण करता है । चेहरे के भाव, हस्‍त–मुद्राएं और शरीर की गतिविधियों का उपयोग एक निश्चित अनुभूति, एक भावना या नवरसों में से किसी एक के संकेत के लिए किया जाता है ।

गतिविधि की तकनीकियां दो आधारभूत मुद्राओं-चौक और त्रिभंग के आस-पास निर्मित होती हैं । चौक एक वर्ग (चौकोर) की स्थिति है । यह शरीर के भार के समान संतुलन के साथ एक पुरुषोचित मुद्रा है । त्रिभंग एक बहुत स्‍त्रीयोचित मुद्रा है, जिसमें शरीर गले, धड़ और घुटने पर मुड़ा होता है ।

धड़ संचालन ओड़ीसी शैली का एक बहुत महत्‍वपूर्ण और एक विशिष्‍ट लक्षण है । इसमें शरीर का निचला हिस्‍सा स्थिर रहता है और शरीर के ऊपरी हिस्‍से के केन्‍द्र द्वारा धड़ धुरी के समानान्‍तर एक ओर से दूसरी ओर गति करता हैं । इसके संतुलन के लिए विशिष्‍ट प्रशिक्षण की आवश्‍यकता होती है इसलिए कंधों या नितम्‍बों की किसी गतिविधि से बचा जाता है । यहॉं समतल पांव, पदांगुली या ऐड़ी के मेल के साथ निश्चित पद-संचालन हैं । यह जटिल संयोजनों की एक विविधता में उपयोग की जाती है । यहां पैरों की गतिविधियों की बहुसंख्‍यक संभावनाएं भी हैं । अधिकतर पैरों की गतिविधियां धरती पर या अंतराल में पेचदार या वृत्ताकार होती हैं ।

पैरों की गतिविधियों के अतिरिक्‍त यहॉं छलांग या चक्‍कर के लिए चाल की एक विविधता है और निश्चित मुद्राएं मूर्तिकला द्वारा प्रेरित हैं । इन्‍हें भंगी कहा जाता है, यह एक निश्चित मुद्रा में गतिविधि की समाप्ति के वास्‍ताविक संयोग है ।

हस्‍तमुद्राएं नृत्त एवं नृत्‍य दोनों में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करती है । नृत्त में इनका उपयोग केवल सजावटी अलंकरणों के रूप में किया जाता है और नृत्‍य में इनका उपयोग सम्‍प्रेषण में किया जाता है ।

ओड़ीसी का नियमानिष्‍ठ रंगपटल प्रस्‍तुतीकरण का एक निश्चित क्रम है, जहॉं ‘रास’ की कल्‍पना की रचना के लिए प्रत्‍येक क्रमिक एकक का निर्माण साथ ही साथ व्‍यवस्थित रूप से किया जाता है ।

मंगलाचरण आरम्भिक एकक है, जहॉं नर्तकी हाथों में फूल लिए धीरे-धीरे मंच पर प्रवेश करती है और धरती माता को अर्पित करती है । इसके बाद नर्तकी अपने इष्‍टदेव को प्रणाम करती है । आमतौर पर मांगलिक शुभारम्‍भ के लिए गणेश का आह्ववान किया जाता है । एक नृत्त क्रम के साथ एकक का अन्‍त इष्‍टदेव, गुरू और दर्शकों को अभिवादन के साथ होता है ।

अगले एकक को बटु कहा जाता है, जहॉं चौक और त्रिभंगी की आधारभूत भंगिमा द्वारा पुरुषोचित और स्‍त्रीयोचित द्वयात्‍मकता में से ओड़ीसी नृत्त तकनीक के मूल विचार को प्रकाश में लाया जाता है । इसके साथ बजाया जाने वाला संगीत बहुत सरल है- नृत्‍य पाठ्यक्रम का सिर्फ एक स्‍थायी है ।

बटु में नृत्त की बहुत आधारभूत व्‍याख्‍या के बाद पल्‍लवी में गतिविधियों और संगीत के साज-सामान तथा पुष्‍पण का नम्‍बर आता है । एक निश्चित राग में एक संगीतात्‍मक संयोजन का दृश्‍यात्‍मक प्रदर्शन नर्तकी द्वारा मद्धम और यथोचित गतिविधियों के साथ किया जाता है । ताल संरचना के अन्‍दर जटिल नमूनों की विशिष्‍ट लयात्‍मक रूपांतरण में संरचना की जाती है ।

अभिनय की प्रस्‍तुति के द्वारा इसका अनुसरण किया जाता है । उड़ीसा में जयदेव द्वारा रचित बारहवीं सदी के गीत-गोविन्‍दा के अष्‍टपदों के नृत्‍य की सतत् परम्‍परा है । इस कविता का प्रगीत्‍व (लयात्‍मकता) विशेषत: ओड़ीसी शैली के लिए उपयुक्‍त है । गीत गोविन्‍दा के अतिरिक्‍त उपेन्‍द्र भंज, बालदेव रथ, बनमाली और गोपाल कृष्‍ण जैसे अन्‍य ओड़ीसी कवियों की रचनाओं का भी उपयोग किया जाता है ।

रंगपटल का आखिरी एकक, जो शायद एक से ज्‍यादा पल्‍लवी और अभिनय पर आधारित एककों का सम्मिश्रण है, को मोक्ष कहा जाता है । पखावज़ पर अक्षरों का वर्णन होता है और नर्तकी धीरे-धीरे घूमती हुई तीव्रता से चरमोत्‍कर्ष पर पहुंचती है । तब नर्तकी आखिरी प्रणाम करती है ।

ओड़ीसी वादक मण्‍डल में मूलत: एक पखावज़ वादक (जो कि आमतौर पर स्‍वयं गुरू होता है ), एक गायक, एक बांसरी वादक, एक सितार या वीणा वादक और एक मंजीरा वादक होता है ।

नर्तकी अलंकृत, चांदी के ओड़ीसी आभूषणों का श्रृंगार करती है और इसमें एक विशेष केश-सज्‍जा होती है । आजकल आमतौर पर साड़ी सिली हुई होती है और विशिष्‍ट शैली में पहनी जाती है ।

प्रत्‍येक प्रस्‍तुति में यहॉं तक कि एक आधुनिक ओड़ीसी नर्तकी भी देवदासियों या महरिज की धार्मिक निष्‍ठा में विश्‍वास रखती है, जहॉं व नृत्‍य के माध्‍यम से मोक्ष या मुक्ति को खोजती है ।

 

साभार- संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार

समाज की बात Samaj Ki Baat

कृष्णधर शर्मा Krishnadhar  Sharma

मणिपुरी नृत्य

 

मणिपुरी नृत्‍य भारत के उत्‍तरी-पूर्वी भाग में स्थित राज्‍य मणिपुर में उत्‍पन्‍न हुआ । यह भारतीय शास्‍त्रीय नृत्‍यों की विभिन्‍न शैलियों में से प्रमुख नृत्‍य है । इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण मणिपुर के लोग बाहरी प्रभाव से बचे रहे हैं और इसी कारण यह प्रदेश अपनी विशिष्‍ट परम्‍परागत संस्‍कृति को बनाये रखने में समर्थ है ।

मणिपुरी नृत्‍य का उद्भव प्राचीन समय से माना जा सकता है, जो लिपिबद्ध किये गये इतिहास से भी परे है । मणिपुर में नृत्‍य धार्मिक और परम्‍परागत उत्‍सवों के साथ जुड़ा हुआ है । यहां शिव और पार्वती के नृत्‍यों तथा अन्‍य देवी-देवताओं, जिन्‍होंने सृष्टि की रचना की थी, की दंतकथाओं के संदर्भ मिलते हैं ।

लाई हारोबा मुख्‍य उत्‍सवों में से एक है और आज भी मणिपुर में प्रस्‍तुत किया जाता है, पूर्व वैष्‍णव काल से इसका उद्भव हुआ था । लाई हारोबा नृत्‍य का प्राचीन रूप है, जो मणिपुर में सभी शैली के नृत्‍य के रूपों का आधार है । इसका शाब्दिक अर्थ है- देवताओं का आमोद-प्रमोद । यह नृत्‍य तथा गीत के एक अनुष्‍ठानिक अर्पण के रूप में प्रस्‍तुत किया जाता है । मायबा और मायबी (पुजारी और पुजारिनें) मुख्‍य अनुष्‍ठानक होते हैं, जो सृष्टि की रचना की विषय-वस्‍तु को दोबारा अभिनीत करते हैं ।

15वीं सदी ईसवी सन् मे वैष्‍णव काल के आगमन के साथ क्रमश: राधा और कृष्‍ण के जीवन की घटनाओं पर आधारित रचनायें प्रस्‍तुत की गयीं । ऐसा राजा भाग्‍यचंद्र के शासन काल में हुआ, इसी समय मणिपुर के प्रसिद्ध रास-लीला नृत्‍यों का प्रवर्तन हुआ था । यह कहा जाता है कि 18वीं सदी के इस दार्शनिक राजा ने एक स्‍वप्‍न में इस सम्‍पूर्ण नृत्‍य की उसकी विशिष्‍ट वेशभूषा और संगीत सहित कल्‍पना की थी । क्रमिक शासकों के तहत् नई लीलाओं, तालों और रागात्‍मक रचनाओं की प्रस्‍तुती की गयी ।

मणिपुरी नृत्‍य का एक विस्‍तृत रंगपटल होता है, तथापि रास, संकीर्तन और थंग-ता इसके बहुत प्रसिद्ध रूप हैं । यहां पांच मुख्‍य रास नृत्‍य हैं, जिनमें से चार का सम्‍बन्‍ध विशिष्‍ट ऋृतुओं से है । जबकि पांचवां साल में किसी भी समय प्रस्‍तुत किया जा सकता है । मणिपुरी रास में राधा, कृष्‍ण और गोपियां मुख्‍य पात्र होते हैं ।

विषय-वस्‍तु बहुधा राधा और गोपियों की कृष्‍ण से अलग होने की व्‍यथा को दर्शाती है । रासलीला नृत्‍यों में परेंग या शुद्ध नृत्‍य क्रम प्रस्‍तुत किये जाते हैं । इसमें निर्दिष्‍ट लयात्‍मक भंगिमाओं और शरीर की गतिविधियों का अनुसरण किया जाता है, जो परम्‍परागत रूप से अनुसरणीय होते हैं । रास की वेशभूषा में प्रचुर मात्रा में कशीदा किया गया एक सख्‍त घाघरा शामिल होता है, जो पैरों पर फैला होता है ।

इसके ऊपर महीन मलमल का एक घाघरा पहना जाता है । शरीर का ऊपरी भाग गहरे रंग के मखमल के ब्‍लाऊज से ढका रहता है और एक परम्‍परागत घूँघट एक विशेष केश-सज्‍जा के ऊपर पहना जाता है, जो मनोहारी रूप से चेहरे के ऊपर गिरा होता है । कृष्‍ण को पीली धोती, गहरे मखमल की जाकेट और मोरपंखों का एक मुकुट पहनाया जाता है । इनके अलंकरण उत्‍कृष्‍ट होते हैं और उनकी बनावट प्रदेश की विशष्टिता लिये होती है ।

सामूहिक गान का कीर्तन रूप नृत्‍य के साथ जुड़ा हुआ है, जिसे मणिपुर में संकीर्तन के रूप में जाना जाता है । पुरुष नर्तक नृत्‍य करते समय पुंग और करताल बजाते हैं । नृत्‍य का पुरुषोचित पहलू- चोलोम, संकीर्तन परम्‍परा का एक भाग है । सभी सामाजिक और धार्मिक त्‍यौहारों पर पुंग तथा करताल चोलोम प्रस्‍तुत किया जाता है ।

मणिपुर का युद्ध-संबंधी नृत्‍य- थंग-ता उन दिनों उत्‍पन्‍न हुआ, जब मनुष्‍य ने जंगली पशुओं से अपनी रक्षा करने के लिए अपनी क्षमता पर निर्भर रहना शुरू किया था ।

आज मणिपुर युद्ध-संबंधी नृत्‍यों, तलवारों, ढोलों और भालों का उपयोग करने वाले नर्तकों का उत्‍सर्जक तथा कृत्रिम रंगपटल है । नर्तकों के बीच वास्‍तविक लड़ाई के दृश्‍य शरीर के नियंत्रण और विस्‍तृत प्रशिक्षण को दर्शाते हैं ।

मणिपुरी नृत्‍य में तांडव और लास्‍य दोनों का समावेशन है और इसकी पहुंच बहुत वीरतापूर्ण पुरुषोचित पहलू से लेकर शांत तथा मनोहारी स्‍त्रीयोचित पहलू तक है । मणिपुरी नृत्‍य की एक दुर्लभ विशेषता है, जिसे लयात्‍मक और मनोहारी गतिविधियों के रूप में जाना जाता है । मणिपुरी अभिनय में मुखाभिनय को बहुत ज्‍यादा महत्‍व नहीं दिया जाता- चेहरे के भाव स्‍वाभाविक होते हैं और अतिरंजित नहीं होते । सर्वांगाभिनय या सम्‍पूर्ण शरीर का उपयोग एक निश्चित रस को संप्रेषित करने के लिए किया जाता है, यह इसकी विशिष्‍टता है ।

लयात्‍मक समूहों में आमतौर पर देखा जाता है कि नर्तक एक नाटकीय प्रदर्शन में पैरों से ताल देने के लिए घुंघरू नहीं पहनते, संवेदनशील शरीर की गतिविधियों के साथ इसका ज्‍यादा महत्‍व नहीं है । जबकि मणिपुरी नृत्‍य और संगीत एक उच्‍च विकसित ताल तंत्र है ।

मणिपुरी गायन की शास्‍त्रीय शैली को नट कहा जाता है, जो उत्‍तर तथा दक्षिण भारतीय संगीत- दोनों से बहुत अलग है, यह शैली निश्चित प्रकार के स्‍वर-कम्‍पन और अनुकूलन सहित उच्‍च स्‍वरमान के साथ जल्‍दी पहचानी जा सकसती है । मुख्‍य संगीत वाद्य पुंग या मणिपुरी शास्‍त्रीय ढोल है । यहां ढोलों की अन्‍य बहुत सी किस्‍में भी हैं, जो मणिपुरी संगीत और नृत्‍य में प्रयोग में लाई जाती हैं । पेना, एक तारदार वाद्य, लाई हारोबा और पेना गायन में प्रयोग में लाया जाता है । रास और संकीर्तन में करताल की विविध किस्‍में प्रयोग की जाती हैं । स्‍वर-गायन के साथ बांसुरी का भी प्रयोग किया जाता है ।

जयदेव द्धारा रचित गीत-गोविन्‍दा की अष्‍टपदियां बहुत प्रचलित हैं और इन्‍हें मणिपुर में बहुत धर्मोत्‍साह के साथ गाया जाता है तथा नृत्‍य किया जाता है ।

रास और अन्‍य लीलाओं के अलावा हरेक व्‍यक्ति के जीवन के प्रत्‍येक चरण को संकीर्तन प्रस्‍तुतीकरण के साथ मनाया जाता है । बच्‍चे के जन्‍म, उपनयन, विवाह और श्राद्ध इन सभी अवसरों के लिए मणिपुर में नृत्‍य और गायन किया जाता है । सम्‍पूर्ण समुदाय दैनिक जीवन के अनुभवों के हिस्‍से के रूप में नृत्‍य व गायन में भाग लेता है ।

 

साभार- संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार

समाज की बात Samaj Ki Baat

कृष्णधर शर्मा Krishnadhar  Sharma

कथक नृत्य

 

कथक शब्‍द की उत्‍पत्ति कथा शब्‍द से हुई है, जिसका अर्थ एक कहानी से है । कथाकार या कहानी सुनाने वाले वह लोग होते हैं, जो प्राय: दंतकथाओं, पौराणिक कथाओं और महाकव्‍यों की उपकथाओं के विस्‍तृत आधार पर कहानियों का वर्णन करते हैं । यह एक मौखिक परंपरा के रूप में शुरू हुआ । कथन को ज्‍यादा प्रभावशाली बनाने के लिए इसमें स्‍वांग और मुद्राएं कदाचित बाद में जोड़ी गईं । इस प्रकार वर्णनात्‍मक नृत्‍य के एक सरल रूप का विकास हुआ और यह हमें आज कथक के रूप में दिखाई देने वाले इस नृत्‍य के विकास के कारणों को भी उपलब्‍ध कराता है ।

वैष्‍णव धर्म, जो कि 15वीं सदी में उत्‍तरी भारत में प्रचलित था और सिद्धांतत: भक्ति आंदोलन ने लयात्‍मक और संगीतात्‍मक रूपों के एक सम्‍पूर्ण नव प्रसार के लिए सहयोग दिया । राधा-कृष्‍ण की विषय वस्‍तु मीराबार्इ, सूरदास, नंददास और कृष्‍णदास के कार्य के साथ बहुत प्रसिद्ध हुई । रास लीला की उत्‍पत्ति मुख्‍तय: बृज प्रदेश (पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में मथुरा) में एक महत्‍वपूर्ण विकास था । यह अपने आप में संगीत, नृत्‍य और व्‍याख्‍या का संयोजन है । रासलीला में नृत्‍य, जबकि मूल स्‍वांग का एक विस्‍तार था, जो वर्तमान परंपरागत नृत्‍य के साथ आसानी से मिश्रित है ।

मुगलों के आगमन के साथ इस नृत्‍य को एक नया प्रोत्‍साहन मिला । मंदिर के आंगन से लेकर महल के दरबार तक एक परिवर्तन ने अपना स्‍थान बनाया, जिसके कारण प्रस्‍तुतिकरण में अनिवार्य परिवर्तन आए । हिन्‍दू और मुस्लिम, दोनों दरबारों में कथक उच्‍च शैली में उभरा और मनोरंजन के एक मिश्रित रूप में विकसित हुआ । मुस्लिम वर्ग के अंतर्गत यहां नृत्‍य पर विशेष जोर दिया गया और भाव ने इस नृत्‍य को सौंदर्यपूर्ण, प्रभावकारी तथा भावनात्‍मक (इंद्रिय) आयाम प्रदान किए ।

19वीं सदी में अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के संरक्षण के तहत् कथक का स्‍वर्णिम युग देखने को मिलता है । उसने लखनऊ घराने को अभिव्‍यक्ति तथा भाव पर उसके प्रभावशाली स्‍वरांकन सहित स्‍थापित किया । जयपुर घराना अपनी लयकारी या लयात्‍मक प्रवीणता के लिए जाना जाता है और बनारस घराना कथक नृत्‍य का अन्‍य प्रसिद्ध विद्यालय है ।

कथक में गतिविधि (नृत्‍य) की विशिष्‍ट तकनीक है । शरीर का भार क्षितिजिय और लम्‍बवत् धुरी के बराबर समान रूप से विभाजित होता है । पांव के सम्‍पूर्ण सम्‍पर्क को प्रथम महत्‍व दिया जाता है, जहां सिर्फ पैर की ऐड़ी या अंगुलियों का उपयोग किया जाता है । यहां क्रिया सीमित होती है । यहां कोई झुकाव नहीं होते और शरीर के निचले हिस्‍से या ऊपरी हिस्‍से के वक्रों या मोड़ों का उपयोग नहीं किया जाता । धड़ गतिविधियां कंधों की रेखा के परिवर्तन से उत्‍पन्‍न होती है, बल्कि नीचे कमर की मांस-पेशियों और ऊपरी छाती या पीठ की रीढ़ की हड्डी के परिचालन से ज्‍यादा उत्‍पन्‍न होती है ।

मौलिक मुद्रा में संचालन की एक जटिल पद्धति के उपयोग द्वारा तकनीकी का निर्माण होता है । शुद्ध नृत्‍य (नृत्‍त) सबसे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है, जहां नर्तकी द्वारा पहनी गई पाजेब के घुंघरुओं की ध्‍वनि के नियंत्रण और समतल पांव के प्रयोग से पेचीदे लयात्‍मक नमूनों के रचना की जाती है । भरतनाट्यम्, उड़ीसी और मणिपुरी की तरह कथक में भी गतिविधि के एककों के संयोजन द्वारा इसके शुद्ध नृत्‍य क्रमों का निर्माण किया जाता है । तालों को विभिन्‍न प्रकार के नामों से पुकारा जाता है, जैसे टुकड़ा, तोड़ा और परन-लयात्‍मक नमूनों की प्रकृति के सभी सूचक प्रयोग में लाए जाते हैं और वाद्यों की ताल पर नृत्‍य के साथ संगत की जाती है । नर्तकी एक क्रम ‘थाट’ के साथ आरम्‍भ करती है, जहां गले, भवों और कलाईयों की धीरे-धीरे होने वाली गतिविधियों की शुरूआत की जाती है । इसका अनुसरण अमद (प्रवेश) और सलामी (अभिवादन) के रूप में परिचित एक परंपरागत औपचारिक प्रवेश द्वारा किया जाता है ।

इसके बाद अनेक चक्‍कर नृत्‍य खण्‍डों में नृत्‍य शैली की एक बहुत विलक्षण विशेषता है । लयात्‍मक अक्षरों का वर्णन सामान्‍य है; नर्तकी अक्‍सर एक निर्दिष्‍ट छंदबद्ध गीत का वर्णन करती है और उसके बाद नृत्‍य गतिविधि के प्रस्‍तुतीकरण द्वारा उसका अनुसरण करती है । कथक के नृत्‍त भाग में नगमा को प्रयोग में लाया जाता है । ढोल बजाने वाले (यहां ढोल एक परवावज़, मृदंगम् का एक प्रकार या तबले की जोड़ी में से कोई एक हो सकता है) और नर्तकी-दोनों एक सुरीली पंक्ति की आवृत्ति पर निरंतर संयोजनों का निर्माण करते हैं । अर्थात पहले परवावज़ या तबले पर एक पंक्ति को बजाया जाता है, उसके बाद नर्तकी अपनी नृत्‍य गतिविधि या क्रिया में उसे दोहराती है । ढोल पर 16, 10, 14 आघात (ताल) का एक सुरीला क्रम एक आधार पर प्रदान करता है, जिस पर नृत्‍य का पूरा ढांचा निर्मित होता है ।

अभिनय में ‘गत’ कहे जाने वाले साधारण समूहों में शब्‍द का प्रयोग नहीं किया जाता और यह द्रुत लय में कोमलता पूर्वक प्रस्‍तुत किया जाता है । यह लघु वर्णनात्‍मक खण्‍ड है, जो कृष्‍ण के जीवन से ली गई एक लघु उपकथा का प्रस्‍तुतीकरण है अन्‍य समूहों जैसे ठुमरी, भजन, दादरा- सभी संगीतात्‍मक रचनाओं में मुद्राओं के साथ एक काव्‍यात्‍मक पंक्ति की संगीत के साथ संयोजन करके व्‍याख्‍या की जाती है ।

इन खण्‍डों में भरतनाट्यम् या उड़ीसी की तरह यहां शब्‍द से शब्‍द या पक्ति से पंक्ति की व्‍याख्‍या एक ही समय में की जाती है । यहां नृत्‍त (शुद्ध नृत्‍य) और अभिनय (स्‍वांग) दोनों में एक विषय वस्‍तु पर रूपांतरण प्रस्‍तुती करण के सुधार (प्रर्दशन) के लिए बहुत ज्‍यादा अवसर हैं । व्‍याख्‍यात्‍मक और भावनात्‍मक नृत्‍य की तकनीकियां आपस में अन्‍तर्ग्रथित हैं और एक तरफ काव्‍यात्‍मक पंक्ति तथा दूसरी तरफ सुरीली व छंद बद्ध पंक्ति के प्रदर्शन की विविधता के लिए नर्तकी की कुशलता उसकी क्षमता पर निर्भर करती है । अर्थात् यह नर्तकी की सामर्थ्‍य पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार एक ही पंक्ति को विविध रूप से प्रस्‍तुत कर सकती है ।

आज कथक एक श्रेष्‍ठ नृत्‍य के रूप में उभर रहा है । केवल कथक ही भारत का वह शास्‍त्रीय नृत्‍य है, जिसका सम्‍बंध मुस्लिम संस्‍कृति से रहा है, यह कला में हिन्‍दू और मुस्लिम प्रतिभाओं के एक अद्वितीय संश्‍लेषण को प्रस्‍तुत करता है । इसके अतिरिक्‍त सिर्फ कथक ही शास्‍त्रीय नृत्‍य का वह रूप है, जो हिन्‍दुस्‍तानी या उत्‍तरी भारतीय संगीत से जुड़ा । इन दोनों का विकास एक समान है और दोनों एक दूसरे को सहारा व प्रोत्‍साहन देते हैं ।

 

साभार- संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार

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कृष्णधर शर्मा Krishnadhar  Sharma