नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

सोमवार, 24 मई 2021

रेल की रात

 

गाड़ी आने के समय से बहुत पहले ही महेंद्र स्टेशन पर जा पहुँचा था। गाड़ी के पहुँचने का ठीक समय मालूम न हो, यह बात नहीं कही जा सकती। जिस छोटे शहर में वह आया हुआ था, वहाँ से जल्दी भागने के लिए वह ऐसा उत्सुक हो उठा था कि जान-बूझ कर भी अज्ञात मन से शायद किसी अबोध बालक की तरह वह समझा था कि उसके जल्दी स्टेशन पर पहुँचने से संभवत: गाड़ी भी नियत समय से पहले ही आ जाएगी।

होल्डाल में बँधे हुए बिस्तरे और चमड़े के एक पुराने सूटकेस को प्लेटफ़ार्म के एक कोने पर रखवा कर वह चिंतित तथा अस्थिर-सा अन्यमनस्क भाव से टहलते हुए टिकट-घर की खिड़की के खुलने का इंतिज़ार करने लगा।

 

महेंद्र की आयु बत्तीस-तैंतीस वर्ष के लगभग होगी। उसके क़द की ऊँचाई साढ़े पाँच फ़ीट से कम नहीं मालूम होती थी। उसके शरीर का गठन देखने से उसे दुबला तो नहीं कहा जा सकता, तथापि मोटा वह नाम का भी न था। रंग उसका गेहुँआ था, कपोल कुछ चौड़ा, भौंहें कुछ मोटी किंतु तनी हुई, आँखें छोटी पर लंबी, काली मूँछें घनी पर पतली और दोनों सिरों पर कुछ ऊपर को उठी थीं। वह खद्दर का एक लंबा कुरता और खद्दर की धोती पहने था। सर पर टोपी नहीं थी। पाँवों में घड़ियाल के चमड़े के बने हुए चप्पल थे। उसके व्यक्तित्व में आकर्षण अवश्य था, पर वह आकर्षण सब समय सब व्यक्तियों की दृष्टि को अपनी ओर नहीं खींचता था।

सूरज बहुत पहले डूब चुका था और शुक्ल पक्ष का अपूर्ण गोलाकार चंद्रमा अपने किरण-जाल से दिग्-दिगंत को स्निग्ध आलोक-छटा से विभासित करने लगा था। स्टेशन पर अधिक भीड़ न थी। प्लेटफ़ार्म पर टहलते-टहलते पूर्व की ओर क़दम निकल जाने पर ऐसा मालूम होने लगता था कि चाँदनी दीर्घ-विस्तृत समतल भूमि पर अलस क्लांति की तरह पड़ी हुई है। झिल्ली-झनकार का एकांतिक मर्मर स्वर इस अलसता की वेदना को निर्मम भाव से जगा रहा था, जिससे महेंद्र के हृदय की सुप्त व्याकुलता तिलमिला उठती थी।

 

सिगनल डाउन हो गया था। टिकट-घर खुल गया था। थर्ड क्लास का टिकट ख़रीद कर महेंद्र गाड़ी का इंतिज़ार करने लगा। थोड़ी देर में दूर ही से सर्चलाइट के प्रखर प्रकाश से तिमिर-विदारण करती हुई गाड़ी दिखाई दी और झक-झक करती हुई स्टेशन पर आ खड़ी हुई।

सामने के कंपार्टमेंट में केवल दो व्यक्ति बैठे थे और वे भी उतरने की तैयारी कर रहे थे। महेंद्र एक हाथ में बिस्तर की गठरी और दूसरे हाथ से सूटकेस पकड़ कर उसी में जा घुसा। जो दो व्यक्ति कंपार्टमेंट में थे, उनके उतरते ही एक चश्माधारी सज्जन ने दो महिलाओं के साथ भीतर प्रवेश किया। कुली ने आ कर नवागंतुक महाशय का सामान भीतर रख दिया और मजूरी के संबंध में काफ़ी हुज्जत करने के बाद पैसे ले कर चला गया। चश्माधारी सज्जन महिलाओं के साथ महेंद्र के सामने वाले बेंच पर बड़े आराम से बैठ गए। मालूम होता था कि वह बड़ी हड़बड़ी के साथ गाड़ी के आने के कुछ ही समय पहले स्टेशन पहुँचे थे और घबराहट में थे, कि महिलाओं को साथ ले कर यदि किसी कंपार्टमेंट में जगह न मिली, तो क्या हाल होगा। वह अभी तक हाँफ रहे थे, जिससे उनकी अब तक की परेशानी स्पष्ट व्यक्त होती थी। अब जब आराम से बैठने को ख़ाली जगह मिल गई, तो एक लंबी साँस ले कर चश्मा उतार कर रूमाल से मुँह का पसीना पोंछने लगे। पसीना पोंछते-पोंछते महेंद्र की ओर देख कर उन्होंने प्रश्न किया, ‘शिकोहाबाद कै बजे गाड़ी पहुँचेगी, आप बता सकते हैं?’

 

महेंद्र ने उत्तर दिया, ‘जहाँ तक मेरा ख़याल है, बारह बजे के क़रीब पहुँचेगी।’

महेंद्र कनखियों से महिलाओं की ओर देख रहा था। महिलाएँ उसके एकदम सामने बैठी थीं और यदि दृष्टि सीधी करके स्वाभाविक रूप से उन्हें देखता रहता, तो भी शायद न तो चश्माधारी सज्जन को और न महिलाओं को कोई आपत्ति होती, पर उसे अपनी स्वाभाविक संकोचशीलता के कारण उनकी ओर स्थिर दृष्टि से देखने का साहस नहीं होता था। दोनों महिलाएँ बेपर्दा बैठी थीं। उनमें एक की अवस्था प्राय: पैंतीस वर्ष की होगी, वह एक सफ़ेद चादर ओढ़े खड़ी थी, दूसरी बाईस-तेईस वर्ष की जान पड़ती थी, वह एक गुलाबी रंग की सुंदर, सुरुचिपूर्ण साड़ी पहने थी। दोनों यथेष्ट सभ्य और सुशील जान पड़ती थीं। ज्येष्ठा के देखने से ऐसा अनुमान लगाया जा सकता था कि किसी समय वह सुंदर रही होगी, पर अब अस्वस्थता के कारण उसका मुखमंडल बिलकुल निस्तेज जान पड़ता था। कनिष्ठा यद्यपि सौंदर्य-कला की दृष्टि से सुंदरी नहीं थी, तथापि उसके मुख की व्यंजना में एक ऐसी सरल मधुरिमा वर्तमान थी, जो बरबस आँखों को आकर्षित कर लेती थी।

 

आज कई कारणों से महेंद्र का जी दिन भर अच्छा नहीं रहा। गाड़ी में बैठने तक वह चिंतित, अन्यमनस्क तथा उदास था। पर गाड़ी में बैठते ही शिष्ट, सुशील तथा सुंदरी महिलाओं के साहचर्य से उसके खिन्न मन में एक सुखद सरलता छा गई। यद्यपि वह संकोच के कारण कुछ कम घबराया हुआ न था, तथापि चश्माधारी सज्जन की भोली आकृति तथा सरल भाव-भंगिमाओं से और महिलाओं की शालीनता से उसे इस बात पर धीरे-धीरे विश्वास होने लगा था कि उनके बीच किसी प्रकार का संकोच अनावश्यक ही नहीं बल्कि अशोभन भी है।

चश्माधारी सज्जन ने चश्मा उतार कर एक रूमाल से उसे पोंछते हुए पूछा, ‘आप क्या शिकोहाबाद जा रहे हैं?’

 

‘जी नहीं, मैं दिल्ली जा रहा हूँ। क्या आप शिकोहाबाद में ही रहते हैं?’

‘जी नहीं, मुझे टुँडला जाना है। मैं वहाँ कोर्ट में प्रैक्टिस करता हूँ। इधर कुछ दिनों के लिए घर आया हुआ था। अब अपनी ‘वाइफ़’ को और ‘सिस्टर’ को ले कर वापस जा रहा हूँ। ‘सिस्टर’ की तबीअत ठीक नहीं रहती, इसलिए उसे हवा-बदली के लिए ले जा रहा हूँ।’

 

एक साधारण-से प्रश्न के उत्तर में इतनी बातों से परिचित होने पर महेंद्र को नवपरिचित सज्जन की बे-तकल्लुफ़ी पर आश्चर्य हुआ और वह मन ही मन मुस्कराने लगा। उसने अनुमान लगाया कि ज्येष्ठा महिला ‘सिस्टर’ होगी और कनिष्ठा ‘वाइफ़’।

थोड़ी देर में गाड़ी चलने लगी। कोई दूसरा यात्री उस डिब्बे में न आया।

 

चश्माधारी महाशय गाड़ी चलने के कुछ देर बाद ऊँघने लगे। वे रह न सके और बँधे हुए बिस्तर को तकिया बना कर एक दूसरे बेंच पर लेट गए और लेटते ही ख़र्राटे लेने लगे। न जाने क्यों, महेंद्र के मन में यह विश्वास जम गया कि इन नवपरिचित महाशय का जीवन बड़ा सुखी है। उनकी बे-तकल्लुफ़ी तथा उनके मुख का आत्म-संतोषपूर्ण भाव देख कर उनके मन में यह विश्वास जमने लगा था और जब उसने उन्हें निश्चिंत सोते हुए तथा ख़र्राटे भरते देखा, तो उसकी यह धारणा दृढ़ हो गई।

ज्येष्ठा महिला ने भी थोड़ी देर में ऊँघना शुरू कर दिया। वह ऊँघती जाती थी और बीच-बीच में जब ज़बर्दस्त हिचकोला खाती थी तो जाग पड़ती थी। केवल कनिष्ठा महिला पूर्णत: सजग थी। वह कभी खिड़की के बाहर झाँक कर चाँदनी के उज्ज्वल आलोक में शायद ‘पल-पल परिवर्तित’ प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेती थी, कभी ऊँघने वाली महिला की ओर देखती थी, कभी ख़र्राटे भरने वाले महाशय, शायद अपने पति को एक बार सरसरी निगाह से देख लेती थी और कभी महेंद्र को स्निग्ध किंतु विस्मय की उत्सुकता से पूर्ण आँखों से देखने लगती थी। उन आँखों की स्थिर दृष्टि जब महेंद्र पर आ कर पड़ती थी तो, उसे ऐसा मालूम होने लगता कि मोहाविष्ट हुआ जा रहा है और उसकी सारी आत्मा, यहाँ तक कि सारा शरीर भी अपना रूप बदल रहा है और यह किसी अव्यक्त तथा अतींद्रिय मायावी स्पर्श से कुछ का कुछ हुआ जा रहा है। वह उस स्थिर दृष्टि का तेज़ सहन न कर सकने के कारण आँखें फिरा लेता था।

 

गाड़ी टटर-टट्ट-टटर-टट्ट शब्द से चली जा रही थी। जाग्रत महिला की गुलाबी साड़ी का आँचल हवा के झोंके से नीचे खिसक कर उसके लहराते हुए घनकुंचित काले केशों की बहार दिखा रहा था। गुलाबी साड़ी भी हवा के ज़ोर से फ़र-फ़र फ़हरा रही थी। महेंद्र पूर्ण जाग्रत अवस्था में स्वप्न देखने लगा। उसे यह भी भ्रम होने लगा कि यह महिला, जो इसके पहले उसके लिए एकदम अज्ञात थी और निश्चय ही सदा अज्ञात रहेगी, न जाने किस चिदानंदमय लोक से अकस्मात आविर्भूत हो कर उसके पास आ बैठी है और गुलाबी रंग की पताका फ़हरा कर विश्व-विजय को निकली है और वह उसका सारथी बन कर उस अनंतगामी रेल रूपी रथ पर चला जा रहा है। सारा विश्व, समस्त मानवी तथा मानसी सृष्टि उसके लिए उस कंपार्टमेंट के भीतर समा गई थी, जिसमें ऊँघनेवाली महिला तथा सोए हुए सज्जन का कोई अस्तित्व नहीं था, और उसके बाहर क्षण-क्षण में परिवर्तित होने वाले अस्थिर माया जगत का चिर चंचल रूप एकदम असत्य सत्ताहीन-सा लगता था।

महेंद्र सोचने लगा कि उसने जीवन में कितनी ही स्त्रियों को विभिन्न रूपों तथा विचित्र परिस्थितियों में देखा है, पर आज का यह बिलकुल साधारण-सा अनुभव उसे क्यों ऐसा अपूर्व तथा अनुपम लग रहा है। वह सोच ही रहा था कि फिर उस विश्व-विजयिनी ने अपनी सुंदर विस्मित आँखों की रहस्यमयी उत्सुकता से भरी स्थिर दृष्टि से उसकी ओर देखा। वह मन ही मन संबोधित करते हुए कहने लगा, चिर अज्ञाता, चिर अपरिचिता देवी! तुम मुझसे क्या चाहती हो। तुम्हारी इस मर्मभेदिनी दृष्टि का क्या अर्थ है? दैवयोग से महाकाल के इस नगण्यतम क्षण में, जिसकी सत्ता महासागर में एक क्षुद्रतम बुदबुदे के बराबर भी नहीं है, हम दोनों का आकस्मिक मिलन घटित हुआ है, और महासागर में बुदबुदे की तरह यह क्षण सदा के लिए विलीन हो जाएगा। तथापि इतने ही अर्से में क्या तुम हम दोनों के जन्मांतर के संबंध से परिचित हो गई अथवा यह सब कुछ नहीं है? तुम्हारी आँखों की उत्सुकता का कोई मूल्य नहीं है, मेरी विह्वल भावुकता का कोई महत्व नहीं है! महत्वपूर्ण जो कुछ है, वह है तुम्हारे पास लेटे हुए व्यक्ति का ख़र्राटे भरना।

 

शिकोहाबाद पहुँचने पर चश्माधारी सज्जन की नींद न टूटी और ज्येष्ठा महिला ऊँघती रही। पर महेंद्र की विश्व-विजयिनी की आँखों में एक क्षण के लिए भी निद्रा-रसावेश का लेश नहीं दिखाई दिया। वह बीच-बीच में अपनी मर्म-भेदिनी दृष्टि की प्रखर उत्सुकता से उसके हृदय को अकारण निर्मम रूप से बिद्ध करती चली जाती थी। फलस्वरूप महेंद्र की गुलाबी मोहकता भी शिकोहाबाद पहुँचने तक अखंड बनी रही।

शिकोहाबाद पहुँचने पर विश्व-विजयिनी ने चश्माधारी सज्जन के किंचित स्थूल शरीर को हाथ से हिलाते हुए जगाया। ऊँघती हुई महिला भी सँभल कर बैठ गई। कुलियों से सामान उतरवा कर चारों व्यक्ति उतर पड़े। दिल्ली वाली गाड़ी जिस प्लेटफ़ार्म पर लगने वाली थी, वहाँ को जाने के लिए पुल पार करना पड़ा। पुल पार करके वे लोग जिस प्लेटफ़ार्म पर आए, वहाँ कहीं एक भी बत्ती जली हुई नहीं थी। पर चूँकि सर्वत्र निर्मल चाँदनी छिटक रही थी, इसलिए बत्ती की कोई आवश्यकता न जान पड़ी। गाड़ी के आने में अभी डेढ़ घंटे की देर थी। चश्माधारी महाशय एक बेंच पर बिस्तर फैला कर लेट गए। दोनों महिलाएँ भी नीचे रखे हुए सामान के ऊपर बैठ गईं।

 

चश्माधारी सज्जन ने महेंद्र से कहा, ‘आप भी किसी बेंच पर बिस्तर बिछा कर लेट जाइए।’

पर कोई बेंच ख़ाली नहीं थी और न महेंद्र सोने के लिए ही उत्सुक था। आज की रेलवे यात्रा की चंद्रोज्ज्वल रात्रि उसे चिरजाग्रत तथा चिरजीवित स्वप्न-लोक में विचरण का अवसर दे रही थी। वह प्लेटफ़ार्म पर टहलते हुए अपने अंतर्मन में नवोद्घाटित जीवन-वैचित्र्य की चहल-पहल देख कर विस्मित हो रहा था। उसे ऐसा अनुभव हो रहा था कि वह जीवन की मधुरिमा से आज प्रथम बार परिचित हो रहा था। रेलवे लाइन के उस पार दिगंत विस्तृत ज्योत्स्ना-राशि अपने आवेश में स्वयं पुलकित हो रही थी और सामने काफ़ी दूर पर दो रक्तरंजित गोलाकार प्रकाश-चिह्न आकाश-दीप की तरह मानो आनंदोज्ज्वल रंगीन जीवन का मार्ग उसके लिए इंगित कर रहे थे। रेलगाड़ी में हो कर वह अनेक बार आया था और गया था और कितनी ही बार उसे रात के समय स्टेशनों पर गाड़ी के इंतिज़ार में ठहरना पड़ा था, पर आज की ऐंद्रजालिक उल्लासपूर्ण अनुभूति उसके लिए एकदम नई थी। इस बार इंद्रजाल के उद्घाटन का श्रेय जिसको था, वह मायाविनी इस समय टीन की छत के नीचे की छाया में बैठी हुई थी और अंधकार में उसकी आँखों के जादू का चलना बंद हो गया था। पर वहाँ पर मात्र उसका अस्तित्व ही महेंद्र की आत्मा में मायालोक की मोहकता का सृजन करने के लिए पर्याप्त था।

 

वह टहलते-टहलते न मालूम किन निरुद्देश्य स्वप्नों की माया के फेर में पड़ा हुआ था कि अचानक चश्माधारी महाशय ने बेंच पर से पुकारते हुए कहा, ‘अरे जनाब, कब तक टहलिएगा। अगर लेटना नहीं चाहते, तो यहाँ पर बैठ तो जाइए। नींद तो अब आवेगी नहीं। इसलिए गाड़ी के आने तक गप-शप ही रहे।’ महाशयजी पहले ही काफ़ी सो चुके थे इसलिए अब नींद नहीं आ रही थी। महेंद्र मुस्कराता हुआ उनके पास अपने सूटकेस के ऊपर बैठ गया।

महाशयजी ने कहा, ‘आप दिल्ली में कहीं मुलाज़िम हैं?’

 

‘जी नहीं।’

‘तब आप क्या करते हैं, आप खद्दर पहने हैं, क्या आप राजनीतिज्ञ हैं?’

 

‘पहले था, अब नहीं के बराबर हूँ।’

‘वह कैसे?’

 

इस प्रश्न के उत्तर में महेंद्र ने परम क्लांति का भाव दिखाते हुए कहा, ‘अरे साहब, सुन के क्या कीजिएगा। व्यर्थ में आपके संस्कारों को आघात पहुँचेगा। इस चर्चा को हटाइए और किसी अच्छे विषय की चर्चा चलाइए।’

स्वभावत: चश्माधारी का कौतूहल बढ़ा। उन्होंने आग्रह के साथ कहा, ‘फिर भी ज़रा सुनें तो सही। आख़िर कौन-सी ऐसी बात हो गई।’

 

महेंद्र की सुप्त स्मृतियाँ तिलमिला उठीं थीं। कनखियों से उसने देखा, प्राय: अंधकार में बैठी हुई मायाविनी महिला का ध्यान उसी की ओर था। पल में उसके मानसिक चक्षुओं के आगे उसके सारे विगत जीवन के व्यर्थता के दु:खद संस्मरणों की झाँकी चित्रपट पर क्रम से परिवर्तित होने वाले चित्रों की तरह भासमान होने लगी। भाव के आवेश में आ कर उसने कहा, ‘अच्छा तो सुनिए। ग्यारह वर्ष से ले कर तीस वर्ष तक की अवस्था तक गाँधी के सिद्धांतों के पीछे पागल हो कर, भूखों रह कर, पग-पग ठोकरें खा कर, समाज तथा परिवार की फटकारें सह कर, जीवन के सब सुखों को अपने ध्येय के लिए तिलांजलि दे कर, राष्ट्रीय आदर्श को ब्रह्मतत्व से भी अधिक महत्व दे कर सच्ची लगन से अपनी सारी आत्मा को निमज्जित करके देश का काम किया। तीन बार काफ़ी अवधि के लिए जेल में सड़ता रहा, बार-बार पुलिस के डंडे सर पर पड़ते रहे। ज़मीन-जायदाद कुर्क हो गई, माता-पिता अपनी कपूत संतान के कारण तबाह हो कर मानसिक और शारीरिक पीड़ा की पराकाष्ठा भोग कर चल बसे, पत्नी तड़प-तड़प कर अपने भाग्य को कोसती हुई मर गई। फिर भी मैं राष्ट्र से कल्याण के परम ध्येय को स्त्री, परिवार, आत्मा और परमात्मा से बहुत ऊँचा मानता हुआ सच्ची लगन से काम करता रहा। जब अंतिम बार जेलख़ाने में बंदी मियाद पूरी करने के बाद थका-माँदा मन तथा शरीर से क्लिष्ट और क्लांत हो कर मैं बाहर आया, तब एक-एक करके उन स्नेही जनों की स्मृतियाँ मेरे मन में उदित हो-हो कर व्यक्त होने लगीं, जिनकी मैं सदा अवज्ञा करता आया था। अपनी पत्नी से मैंने जीवन में शायद दो दिन भी घनिष्ठता से बातें न की होंगी। जब मैं बाहर रहता था, तो उसके पत्र बराबर मेरे पास आते रहते थे और मैं सरसरी दृष्टि से पढ़ कर अवज्ञा से फाड़ कर फेंक देता था। एक या दो बार से अधिक मैंने उसके पत्रों का उत्तर नहीं दिया और दो बार जो उत्तर दिया था, वह भी चार पंक्तियों में बिल्कुल रूखे-सूखे ढंग से। अब जब मैं अपने को सारे संसार में अकेला, स्नेह तथा संवेदना से वंचित, असहाय तथा निरुपाय अनुभव करने लगा तो उसकी भोली-भाली, सकरुण, स्नेह की वेदना से भरी सहज सलोनी मूर्ति प्रतिपल मेरी आँखों के आगे भासित होने लगी। उसके पत्रों में सरल शब्दों में वर्णित कातर व्याकुलता के हाहाकार की पुकार मानो मेरी स्मृति के अतुल गह्वर में दीर्घ सुप्ति की घोर जड़ता के बाद अकस्मात जागरित हो कर मेरे हृदय पर जलते हुए अंगारों के गोलों से आघात करने लगी। अपने जीवन में कभी किसी बात पर नहीं रोया था। माता-पिता तथा पत्नी, किसी की मृत्यु पर आँसू की एक बूँद मेरी आँखों से न निकली थी। अब रह-रह कर उन लोगों की याद में बिलख-बिलख कर मैं बार-बार रो पड़ता। मेरी स्नेहशील पतिपरायण पत्नी की करुण पुण्यछवि उज्ज्वल नक्षत्र की तरह मेरी आँखों के आगे स्पष्ट भासमान होने लगी। रह-रह कर मेरा जी विकल हो उठता था और मुझे ऐसा प्रतीत होने लगता, जैसे मेरे हृदय में किसी के निष्कलंक सुकुमार प्राणों की पैशाचिक हत्या का अपराध पाषाण-भार की तरह पड़ा हो। बहुत दिनों तक इस नृशंस अपराध की भयंकर अनुभूति का भूत मेरी आत्मा को अत्यंत निष्ठुरता से दबाता रहा। अब भी यह भौतिक आतंक कभी-कभी मेरे मन में जागरित हो उठता है। फिर भी अब मैंने अपने मन को बहुत समझा लिया है और जीवन को एक नई दृष्टि से नए रूप में देखने लगा हूँ और साधारण से साधारण घटना भी कभी-कभी मेरे मन में एक अलौकिक आनंद का आश्चर्य उत्पन्न करने लगती है। किसी स्त्री को देखते ही अब मेरे हृदय में एक श्रद्धा-पूर्ण उत्सुकता का भाव जाग पड़ता है। ऐसा मालूम होने लगता है, जैसे अपने जीवन में पहले स्त्री को देखा भी न हो, अब पहली बार इस आनंददायिनी रहस्यमयी जाति के अस्तित्व का अनुभव मुझे हुआ हो।’

महेंद्र का लंबा लेक्चर समाप्त होते ही चश्माधारी सज्जन ‘हा हा’ करके ठठा कर हँसते हुए बोले, ‘आप भी बड़े मज़े के आदमी हैं। ख़ूब!’ यह कह कर वह बेंच पर आराम से लेट गए और उन्होंने आँखें बंद कर लीं। थोड़ी देर बाद वह ज़ोरों से ख़र्राटे लेने लगे।

 

एक लंबी साँस लेते हुए महेंद्र ने प्राय: अंधकार में अस्पष्ट झलकती हुई गुलाबी साड़ी की ओर देखा। दो आँखों की मार्मिक दृष्टि से तीव्र मोहकता उस अर्द्ध अंधकार में भी विस्मित वेदना की उत्सुक उज्ज्वल रेखाओं को विकीरित कर रही थी। महेंद्र पुलक-विह्वल हो कर मंत्र-मुग्ध-सा बैठा रहा।

घंटी बजी, दिल्ली को जाने वाली गाड़ी के आने की सूचना देते हुए सिग्नल डाउन हुआ। सामने रक्त आकाश-द्वीप के बदले हरे रंग का प्रकाश जल उठा। यह हरित आलोक महेंद्र के मानसपट में साड़ी के गुलाबी रंग के साथ मिल कर एक स्निग्ध-शुचि सौंदर्य-लोक का सृजन करने लगा।

 

थोड़ी देर में दूर ही से गाड़ी का सर्चलाइट दिखाई दिया। चश्माधारी महाशय महेंद्र के जगाने पर फड़फड़ाते हुए उठे। कुलियों ने सामान सँभाल लिया। भक-भक करती हुई गाड़ी प्लेटफ़ार्म पर आ लगी। बड़ी भीड़ थी। चश्माधारी सज्जन को महिलाओं के साथ कुली लोग इंजन के उल्टी ओर बहुत दूर तक ले गए। कहीं स्थान न पा कर अंत में एक डिब्बे में ज़बर्दस्ती घुस गए। महेंद्र भी उन लोगों के साथ-साथ जा रहा था पर जिस डिब्बे में वे लोग घुसे, उस डिब्बे में स्थान का निपट अभाव देख कर वह विवश हो कर एक दूसरे डिब्बे में चला गया। वहाँ भी काफ़ी भीड़ थी। किसी प्रकार उसने अपने बैठने के लिए थोड़ा-सा स्थान बनाया।

गार्ड ने सीटी दी। गाड़ी चल पड़ी। महेंद्र के मस्तिष्क में नाना अस्पष्ट भावनाएँ चक्कर काटने लगीं। दो दिन से उसे नींद नहीं आई थी। आज भी वह अभी तक सो नहीं पाया। इसलिए सोचते-सोचते वह ऊँघने लगा। ऊँघते हुए उसने देखा कि गुलाबी रंग की साड़ी द्रौपदी के चीर की तरह फैलती हुई अकारण सारे आकाश में छा गई है। सहसा दो स्थानों पर वह गगनव्यापी साड़ी फटी और उन दो छिद्रों से हो कर दो वेदनाशील, तीक्ष्ण, उज्ज्वल आँखें तीर की तरह प्रखर वेग से उसकी ओर धावित हो कर एक रूप में मिल कर एक बड़ी आँख के आकार में परिणत हो गईं। वह बड़ी आँखें उसके शरीर को छेद कर उसके हृत्पिंड को छू कर फिर ऊपर आकाश की ओर तीर की तरह छूटीं और आकाश में फैली हुई गुलाबी साड़ी में जा लगीं और फट कर फिर से दो सुंदर, किंतु करुणा-विकल आँखों के आकार में विभक्त हो गईं।

 

टुँडला स्टेशन पर गाड़ी ठहरने पर महेंद्र पूर्णत: सचेत हो कर बैठ गया। चश्माधारी महाशय दोनों महिलाओं को साथ ले कर कंपार्टमेंट से बाहर उतरे और सामान को कुलियों के हवाले करके उनके साथ बाहर फाटक की ओर चले। महेंद्र ने अपने कंपार्टमेंट से अपनी विश्वविजयिनी को देखा। वह इस उत्सुकता में था कि एक बार अंतिम समय के लिए दोनों की आँखें चार हो जावें, पर न हुईं और गुलाबी साड़ी से आवृत सजीव प्रतिमा व्यस्त विह्वल-सी आगे को निकल गई।

टुँडला से गाड़ी छूटने पर महेंद्र के कानों में चश्माधारी सज्जन के ठठा कर हँसने का शब्द गूँजने लगा। उसके अदृष्ट का चिर व्यंग्य पुकार मानो बार-बार कहता था— हा! हा! आप भी बड़े मज़े के आदमी हैं : ख़ूब!

 

इलाचंद्र जोशी

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मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

जहरीली 'जीएम' फसलों पर जरूरी है नियंत्रण

 'अमेरिका की माताएं' (मॉम्स् एक्रॉस अमेरिका) की संस्थापक जेन हनीकट ने अदालत के इस निर्णय का स्वागत करते हुए मानवता के लिए व धरती पर पनप रहे सभी तरह के जीवन के लिए इसे एक जीत बताया। फ्रांस के पर्यावरण मंत्री ब्रूने पायरसन ने इस 'ऐतिहासिक निर्णय' का स्वागत किया। भारत सहित सभी देशों को 'जीएम' फसलों, रासायनिक खरपतवार-नाशकों, जंतुनाशकों व कीटनाशकों के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर दुष्परिणामों के बारे में व्यापक जन-चेतना का अभियान चलाना चाहिए, जिससे इनके बारे में सही व प्रामाणिक जानकारी किसानों व आम लोगों तक पंहुच सके। कृषि व खाद्य क्षेत्र में 'जेनेटिक इंजीनियरिंग' की टैक्नॉलॉजी मात्र चंद बहुराष्ट्रीय कंपनियों (व उनकी सहयोगी या उप-कंपनियों) के हाथ में केंद्रित है।  

यदि कोई अवैध कार्रवाई हो रही हो तो सरकार का कर्तव्य है कि इस पर तुरंत रोक लगाए। पर हाल में कुछ लोगों ने कहा है कि सरकार कानून ही इस तरह बदल दे कि जो अवैध है वह वैध नजर आने लगे। यह अजीब स्थिति 'जीएम' (जेनेटिकली मोडीफाईड या जीन-संवर्धित) फसलों के संदर्भ में देखने में आई है। अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे चुके हैं कि स्वास्थ्य, पर्यावरण, जैव-विविधता, कृषि व खाद्य-व्यवस्था के लिए 'जीएम' फसलें बहुत खतरनाक हैं। इसके बावजूद 'जीएम' बीजों व इनसे जुड़ी रासायनिक दवाओं को बढ़ाने वाली कंपनियां अपने उत्पादों की बिक्री को तेजी से बढ़ाने के लिए इनका प्रचार-प्रसार करती रही हैं व अपनी अपार धन-दौलत के बल पर उन्होंने अपने अनेक समर्थक उत्पन्न कर लिए हैं। हाल में इन लोगों ने सरकार को विचित्र सलाह देते हुए कहा है कि कुछ 'जीएम' फसलों को अवैध रूप से भारत के खेतों में फैलाया जा रहा है जिसे रोकने के लिए सरकार को चाहिए कि वह इन 'जीएम' फसलों को वैधता दे दे। 

यह अजीब तर्क है कि किसी अवैधता को रोकने के लिए उस अवैधता को वैध कर दो, पर 'जीएम' फसलों का सारा ताना-बाना ही इस तरह के मिथ्या व भ्रामक प्रचार के बल पर खड़ा हुआ है।  'जीएम' फसलों के विरोध का एक मुख्य आधार यह रहा है कि ये फसलें स्वास्थ्य व पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित नहीं हैं तथा उनका यह असर 'जेनेटिक प्रदूषण' के माध्यम से अन्य सामान्य फसलों व पौधों में फैल सकता है। इस विचार को 'इंडिपेंडेंट साईंस पैनल' (स्वतंत्र विज्ञान मंच) ने बहुत सारगर्भित ढंग से व्यक्त किया है। इस पैनल में एकत्रित हुए अनेक देशों के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों ने 'जीएम' फसलों पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार किया है। इसके निष्कर्ष में उन्होंने कहा है 'जीएम' फसलों के बारे में जिन लाभों का वायदा किया गया था, वे प्राप्त नहीं हुए हैं व ये फसलें खेतों में बढ़ती समस्याएं उपस्थित कर रही हैं। अब इस बारे में व्यापक सहमति है कि इन फसलों का प्रसार होने पर 'ट्रान्सजेनिक प्रदूषण' से बचा नहीं जा सकता। अत: 'जीएम' फसलों व 'गैर-जीएम' फसलों का सह-अस्तित्व नहीं हो सकता है।

 सबसे महत्वपूर्ण यह है कि 'जीएम' फसलों की सुरक्षा प्रमाणित नहीं हो सकी है। इसके विपरीत ऐसे पर्याप्त प्रमाण मिल चुके हैं जिनसे इन फसलों की सुरक्षा संबंधी गंभीर चिंताएं उत्पन्न होती हैं। यदि इनकी उपेक्षा की गई तो स्वास्थ्य व पर्यावरण की क्षति होगी जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। 'जीएम' फसलों को अब दृढ़ता से खारिज कर देना चाहिए। इन फसलों से जुड़े खतरे का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष कई वैज्ञानिकों ने यह बताया है कि जो खतरे पर्यावरण में फैलेंगे उन पर हमारा नियंत्रण नहीं रह जाएगा व गंभीर दुष्परिणाम सामने आने पर भी हम इनकी क्षति-पूर्ति नहीं कर पाएंगे। जेनेटिक प्रदूषण का मूल चरित्र ही ऐसा है। वायु-प्रदूषण व जल-प्रदूषण की गंभीरता पता चलने पर उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है, पर जेनेटिक-प्रदूषण एक बार पर्यावरण में चले जाने पर हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों को केवल इस कारण परेशान किया गया है या उनका अनुसंधान बाधित किया गया है, क्योंकि उनके अनुसंधान से 'जीएम' फसलों के खतरे पता चलने लगे थे। 

इन कुप्रयासों के बावजूद निष्ठावान वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों से 'जीएम' फसलों के गंभीर खतरों को बताने वाले दर्जनों अध्ययन उपलब्ध हैं। जैफरी एम. स्मिथ की पुस्तक 'जेनेटिक रुलेट् (जुआ)' के 300 से अधिक पृष्ठों में ऐसे दर्जनों अध्ययनों का सार-संक्षेप या परिचय उपलब्ध है। इनमें चूहों पर हुए अनुसंधानों में पेट, लिवर, आंतों जैसे विभिन्न महत्वपूर्ण अंगों के बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने की चर्चा है। 'जीएम' फसल या उत्पाद खाने वाले पशु-पक्षियों के मरने या बीमार होने की चर्चा है व जेनेटिक उत्पादों से मनुष्यों में भी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का वर्णन है। हाल ही में देश के जीनेटिक साइंस के महान वैज्ञानिक प्रोफेसर पुष्प भार्गव का निधन हुआ है। वे 'सेण्टर फॉर सेल्यूेलर एंड मॉलीक्यूलर बॉयोलाजी, हैदराबाद' के संस्थापक निदेशक व 'नेशनल नॉलेज कमीशन' के उपाध्यक्ष रहे थे। उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियां बहुचर्चित रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने प्रो. पुष्प भार्गव को 'जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी' (जीईएसी) के कार्य पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त किया था। प्रो. पुष्प भार्गव ने बहुत प्रखरता से 'जीएम' फसलों का बहुत स्पष्ट और तथ्य आधारित विरोध किया था। 

अंग्रेजी दैनिक 'हिंदुस्तान टाईम्स' के अपने लेख में प्रो. भार्गव ने लिखा था कि लगभग 500 अनुसंधान प्रकाशनों ने 'जीएम' फसलों के मनुष्यों, अन्य जीव-जंतुओं व पौधों के स्वास्थ्य पर हानिकारक असर को स्थापित किया है। ये सभी प्रकाशन ऐसे वैज्ञानिकों के हैं जिनकी ईमानदारी के बारे में कभी, कोई सवाल नहीं उठा है। प्रो. भार्गव ने आगे लिखा कि दूसरी ओर 'जीएम' फसलों का समर्थन करने वाले लगभग सभी पेपर या प्रकाशन उन वैज्ञानिकों के हैं जिन्होंने 'कॉन्फ्लिओक्ट ऑफ इंटरेस्ट' स्वीकार किया है या जिनकी विश्वसनीयता व ईमानदारी के बारे में सवाल उठ सकते हैं। 'जीएम' फसलों के समर्थक प्राय: कहते हैं कि इनको वैज्ञानिकों का समर्थन मिला है, पर प्रो. भार्गव ने इस विषय पर समस्त अनुसंधानों का आंकलन कर स्पष्ट बता दिया था कि अधिकतम निष्पक्ष वैज्ञानिकों ने 'जीएम' फसलों का विरोध ही किया है। साथ में उन्होंने यह भी बताया था कि जिन वैज्ञानिकों ने 'जीएम' को समर्थन दिया है उनमें से अनेक किसी-न-किसी स्तर पर 'जीएम' बीज बेचने वाली कंपनियों या इस तरह के निहित स्वार्थों से किसी-न-किसी रूप में जुड़े या प्रभावित रहे हैं। कुछ 'जीएम' फसलों के साथ खतरनाक खरपतवार-नाशकों को जोड़ दिया गया है। ऐसा 'ग्लाईफोसेट' नामक एक खरपतवार-नाशक स्वास्थ्य के लिए बहुत खतरनाक पाया गया है। हाल ही में कैलिफोर्निया (अमरीका) की एक अदालत ने अपने महत्वापूर्ण निर्णय में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को जानसन नामक व्यक्ति को बहुत अधिक क्षतिपूर्ति राशि देने को कहा है। यह कंपनी 'ग्लाईफोसेट' नामक खतरनाक रसायन बनाती है। जानसन का कार्य स्कूलों के मैदानों की देख-रेख था। उसने इन खरपतवार-नाशकों का छिड़काव वर्षों तक किया जिससे उसे रक्त-कोशिका का एक ऐसा गंभीर कैंसर हो गया था जिसे 'नॉन-हाजकिन लिंफोमा' कहा जाता है। इस मुकदमे के दौरान यह भी देखा गया कि इस खरपतवार-नाशक को किसी-न-किसी तरह सुरक्षित सिद्ध कर पाने के लिए कंपनी ने स्वयं तथ्य गढ़े और फिर किसी विशेषज्ञ का नाम उससे जोड़ दिया। यह इसके बावजूद किया गया कि 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' (डब्यूेषज एचओ) की कैंसर से जुडी अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान एजेंसी (आईएआरसी) ने वर्ष 2015 में ही इस खरपतवार-नाशक से होने वाले कैंसर की संभावना के बारे में बता दिया था। भारत में भी इसका उपयोग होता है। 'ग्लाईफोसेट' का उपयोग 'जीएम' फसलों के साथ नजदीकी से जुड़ा रहा है और इसके गंभीर खतरों के सामने आने से 'जीएम' फसलों से जुड़े खतरों की पुष्टि होती है।

 विशालकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियां, जैसे-'मानसेंटो' व 'बेयर' (जो बहुत बड़े सौदे के बाद एक हो गई हैं) बीज और कृषि रसायनों के व्यवसाय को साथ-साथ कर रही हैं व कई फसलों (विशेषकर 'जीएम' फसलों) के बीजों के साथ ही उनके लिए उपयुक्त खरपतवार-नाशकों, कीटनाशकों आदि को भी बेचा जाता है। इससे कंपनियों की कमाई बहुत तेजी से बढ़ती है और किसानों का खर्च और कर्ज उससे भी तेजी से बढ़ते हैं। वकीलों जिस टीम ने जानसन की ओर से मुकदमा लड़ा था उनमें एडवर्ड केनेडी भी थे जिनके इसी नाम के विख्यात सीनेटर पिता थे। एडवर्ड केनेडी ने मुकदमे में जीत के बाद कहा कि इस तरह के उत्पादों की बिक्री के कारण न केवल बहुत से लोग गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से त्रस्त हो रहे हैं, अपितु अनेक अधिकारियों को भ्रष्ट बनाया जा रहा है, प्रदूषण से बचाने वाली एजेंसियों पर नियंत्रण किया जा रहा है व विज्ञान को झुठलाया जा रहा है। 'अमेरिका की माताएं' (मॉम्स् एक्रॉस अमेरिका) की संस्थापक जेन हनीकट ने अदालत के इस निर्णय का स्वागत करते हुए मानवता के लिए व धरती पर पनप रहे सभी तरह के जीवन के लिए इसे एक जीत बताया। फ्रांस के पर्यावरण मंत्री ब्रूने पायरसन ने इस 'ऐतिहासिक निर्णय' का स्वागत किया। भारत सहित सभी देशों को 'जीएम' फसलों, रासायनिक खरपतवार-नाशकों, जंतुनाशकों व कीटनाशकों के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर दुष्परिणामों के बारे में व्यापक जन-चेतना का अभियान चलाना चाहिए, जिससे इनके बारे में सही व प्रामाणिक जानकारी किसानों व आम लोगों तक पंहुच सके। कृषि व खाद्य क्षेत्र में 'जेनेटिक इंजीनियरिंग' की टैक्नॉलॉजी मात्र चंद बहुराष्ट्रीय कंपनियों (व उनकी सहयोगी या उप-कंपनियों) के हाथ में केंद्रित है। इनका उद्देश्य 'जेनेटिक इंजीनियरिंग' के माध्यम से दुनियाभर की कृषि व खाद्य व्यवस्था पर ऐसा नियंत्रण स्थापित करना है जैसा विश्व इतिहास में आज तक संभव नहीं हुआ। इन तथ्यों व जानकारियों को ध्यान में रखते हुए सभी 'जीएम' फसलों का विरोध जरूरी है। इसके साथ अवैध ढंग से हमारे देश में जिन 'जीएम' खाद्य उत्पादों का आयात होता रहा है, उस पर रोक लगाना भी जरूरी है।  

भारत डोगरा  (साभार- देशबंधु) 

समाज की बात Samaj Ki Baat कृष्णधर शर्मा KD Sharma

बड़ी मानवीय त्रासदी बन सकती है म्यांमार की स्थिति

  हाल के समय में ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं जब आंतरिक हिंसा बढ़ने पर व गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर खाद्य संकट भी उत्पन्न हो गया व स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी अनिवार्य सुविधाएं भी ध्वस्त हो गईं।

हाल के समय में ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं जब आंतरिक हिंसा बढ़ने पर व गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर खाद्य संकट भी उत्पन्न हो गया व स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी अनिवार्य सुविधाएं भी ध्वस्त हो गईं। अत: म्यांमार को इस स्थिति से बचाने के लिए अभी से समुचित प्रयासों को अपनाना चाहिए। एक पड़ोसी देश होने के नाते और इस क्षेत्र की एक बड़ी ताकत होने के नाते भारत का भी कर्तव्य है कि वह इन प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए ताकि म्यांमार में लोकतंत्र की वापसी हो सके, हिंसा पर नियंत्रण लग सके व आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि भी सुनिश्चित हो सके। म्यांमार (बर्मा) में जिस तरह से बड़े टकराव की स्थिति सैन्य बल और लोकतांत्रिक ताकतों के बीच आ गई है, उसका कोई आसान व शीघ्र समाधान अभी नजर नहीं आ रहा है। 

यदि भारी बहुमत से जीत कर आए राजनीतिक दल से सरकार बनाने का अधिकार छीना जाए और उसके लोकप्रिय नेताओं को जेल में डाल दिया जाए तो उसके समर्थकों का सड़क पर उतरना निश्चित ही है और वही हो रहा है। यदि सेना को यही सब कुछ करना है तो चुनाव करवाने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है। दूसरी ओर इतना जोर-जुल्म करने के बाद सेना को यह भी आसान नहीं लग रहा है कि लोकतंत्र की ओर शीघ्र वापसी की जाए। दो महीने में ही 500 लोकतंत्र प्रहरियों को मार देना भयानक है। जहां एक ओर हाल ही में आरंभ हुआ संघर्ष लंबा खिंच सकता है, वहां अल्पसंख्यक समुदायों के अनेक संघर्ष म्यांमार में काफी समय से चलते रहे हैं। मौजूदा अराजकता के दौर में वे नए सिरे से जोर पकड़ सकते हैं और ऐसे हमलों के समाचार हाल में मिले भी हैं। इस तरह कई स्तरों पर हिंसा और दमन का दौर निकट भविष्य में म्यांमार में हावी हो सकता है और गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसी स्थिति का अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ना स्वाभाविक है। 

ऐसी अशान्त और अस्थिर स्थिति में स्वाभाविक है कि घरेलू और बाहरी निवेश बहुत कम होगा। तिस पर यदि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका जैसे देशों ने प्रतिबंध सख्त किए तो व्यापार पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। हालांकि चीन जैसे कुछ बड़े देशों का बाजार म्यांमार के लिए खुले रहने की पूरी संभावना है, पर जरूरी है कि निर्यात के स्थान कम होने पर निर्यातों से प्राप्त होने वाले मूल्य पर कुछ असर तो पड़ेगा ही।  इसका दूसरा पक्ष यह है कि आयात के लिए विदेशी मुद्रा भी कम उपलब्ध होगी।  हिंसा व  दमन के बढ़ते दौर में सैन्य शासकों को सैन्य सामग्री के अधिक आयात की जरूरत पड़ेगी। धनी तबके भी अपने लिए आयात करते ही रहेंगे। अत: आयात कम करने की क्षमता का असर आम लोगों की जरूरतों की आपूर्ति पर अधिक पड़ सकता है। 

दूसरी ओर स्थानीय स्तर के औद्योगिक और कृषि उत्पादन पर व कुछ जरूरी सेवाओं पर भी हिंसा के दौर में प्रतिकूल असर पड़ने की पूरी संभावना है। इस स्थिति में आजीविका के स्रोत भी कम होंगे व गरीबी बढ़ेगी। जहां एक ओर अनेक आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति कम होगी वहां बहुत से लोगों की क्रय शक्ति में भी कमी आएगी। इन दोनों के मिले-जुले असर से लोगों की जीवन की कठिनाईयां बहुत बढ़ सकती हैं। वैसे साधारणत: म्यांमार को कृषि निर्यातक की दृष्टि से अतिरिक्त उत्पादन का देश माना जाता है। यहां की अधिकांश जनसंख्या कृषि से जुड़ी रही है। चावल मुख्य भोजन है। चावल के निर्यातक देश के रूप में भी म्यांमार की एक बड़ी पहचान बनी हुई है। इस आधार पर यह दावा किया जात है कि यहां भूख, अल्प-पोषण या कुपोषण की समस्या नहीं है या कम है। पर जरूरी नहीं है कि ऐसा हो। 

कृषि निर्यात की अधिकता की स्थिति में भी कई देशों में भूख व कुपोषण की समस्या देखी गई है। कुछ समुदायों व स्थानों में यह समस्या अधिक हो सकती है जो भेदभाव का शिकार हैं। म्यांमार की हकीकत भी ऐसी स्थिति के नजदीक की है। इस स्थिति में यदि हिंसा का प्रसार अधिक होता है तो कृषि उत्पादन कम हो सकता है पर यह उत्पादन कम होने के बावजूद निर्यात अधिक बनाए रखने के प्रयास हो सकते हैं क्योंकि शासक वर्ग को आयातों के लिए विदेशी मुद्रा चाहिए। दूसरी ओर सैनिकों व सेना को समर्थन करने वाले संगठनों के लिए भी पर्याप्त खाद्य उपलब्धि काफी कम हो सकती है। विशेषकर जो क्षेत्र व स्थान विद्रोहियों के या विपक्षियों के गढ़ माने जाते हैं वहां के लिए खाद्य व अन्य आवश्यक उत्पादों की स्थिति कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में अनेक स्थानों के लिए जरूरी दवाओं व स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धि सामान्य स्थिति से कहीं कम हो सकती है व इसका बहुत घातक असर पड़ सकता है। यदि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कड़े प्रतिबंध हो तो दवाओं की कमी और विकट हो सकती है। यदि सकारात्मक पहलू को देखें तो म्यांमार के पास तेल व गैस का अच्छा भंडार है, अन्य मूल्यवान खनिज हैं जिनसे अर्थव्यवस्था कुछ समय के लिए संभल सकती है पर प्रतिबंधों की स्थिति में इनसे आय अर्जन में भी कमी आ सकती है। 

इन सभी विकट संभावनाओं से बचने के लिए जरूरी है कि अपेक्षाकृत आरंभिक स्थिति में ही राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर यहां अमन-शांति व लोकतंत्र स्थापना के प्रयास तेज किए जाएं। इसके अतिरिक्त ग्रामीण समुदायों को चाहिए कि कठिन समय में वे खाद्य उत्पादन बढ़ाने के अधिक आत्म-निर्भर उपायों को अपनाएं ताकि हर स्थिति में कम से कम खाद्य सुरक्षा को बनाए रखा जा सके। विश्व खाद्य कार्यक्रम को भी खाद्य सहायता पहुंचाने के लिए म्यांमार की बदलती स्थिति पर नजर रखनी चाहिए। डाक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों के कुछ संगठन हिंसा-प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाते रहे हैं। उन्हें भी म्यांमार की जरूरतों को निकट भविष्य में ध्यान में रखना होगा। उम्मीद तो यह जरूर रखनी चाहिए कि निकट भविष्य में संकट सुलझ जाए, पर अधिक विकट स्थितियों में सहायता पहुंच सके इसकी तैयारी भी अभी से करनी चाहिए। 

हाल के समय में ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं जब आंतरिक हिंसा बढ़ने पर व गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर खाद्य संकट भी उत्पन्न हो गया व स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी अनिवार्य सुविधाएं भी ध्वस्त हो गईं। अत: म्यांमार को इस स्थिति से बचाने के लिए अभी से समुचित प्रयासों को अपनाना चाहिए। एक पड़ोसी देश होने के नाते और इस क्षेत्र की एक बड़ी ताकत होने के नाते भारत का भी कर्तव्य है कि वह इन प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए ताकि म्यांमार में लोकतंत्र की वापसी हो सके, हिंसा पर नियंत्रण लग सके व आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि भी सुनिश्चित हो सके। 

भारत डोगरा (साभार-देशबंधु)

समाज की बात Samaj Ki Baat कृष्णधर शर्मा  KD Sharma

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

मंगल ग्रह का पानी उड़ा नहीं, वहीं 4 अरब साल से सतह की नीचे छुपा है

 Martian waters मंगल ग्रह को धरती से मिलता-जुलता ग्रह माना जाता है, साथ ही वैज्ञानिकों यह भी उम्मीद है कि मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना हो सकती है। 

मंगल ग्रह को लेकर किए गए अभी तक सभी शोधों व वैज्ञानिक परीक्षणों में यह खुलासा हुआ है कि अरबों साल पहले मंगल ग्रह पर बड़ी तादाद में सागर और झीलें हुआ करती थी, लेकिन फिलहाल ये ग्रह पूरी तरह से सूख गया है और एक चट्टानी ग्रह बन गया है। साथ ही वैज्ञानिक यह भी मानते आए हैं कि मंगल ग्रह से पानी अब अंतरिक्ष में उड़ गया है। 

लेकिन अब NASA द्वारा वित्तपोषित एक अध्ययन के मुताबिक मंगल ग्रह से पानी कहीं नहीं गया, बल्कि ग्रह की ऊपरी सतह में खनिजों के बीच ही फंसा हुआ है. मंगल ग्रह की ऊपरी सतह पर ही मौजूद है पानी 'साइंस' पत्रिका में नए शोधपत्र की मुख्य लेखिका ईवा स्केलर ने कहा कि मंगल ग्रह की परी सतह पानी भरे खनिजों से बनी है, ऐसे खनिज, जिनके क्रिस्टल स्ट्रक्चर में ही पानी है। 



स्केलर के मॉडल से संकेत मिलता है कि मंगल ग्रह पर करीब 30 से 99 फीसदी पानी इन्हीं खनिजों में फंसा हुआ है। शोध के मुताबिक मंगल ग्रह पर इतना पानी था कि वह लगभग 100 से 1,500 मीटर (330 से 4,920 फुट) समुद्र से ही समूचे ग्रह को कवर कर सकता था। मंगल ग्रह ने अपना अपना मैग्नैटिक फील्ड खो दिया था इस कारण से मंगल ग्रह का पर्यावरण धीरे-धीरे समाप्त हो गया।

 पूरा पानी अंतरिक्ष में नहीं उड़ा शोधकर्ताओं का दावा है कि मंगल ग्रह का पूरा पानी अंतरिक्ष में नहीं उड़ा है। नए अध्ययन के लेखकों के अनुसार कुछ पानी जरूर खत्म हुआ होगा, या गायब हो गया होगा, लेकिन अधिकतर पानी ग्रह पर ही है। 

मार्स रोवरों द्वारा किए गए ऑब्जर्वेशनों और ग्रह के उल्कापिंडों का इस्तेमाल कर टीम ने पानी के अहम हिस्से हाइड्रोजन पर फोकस किया है। हाइड्रोजन के अलग-अलग तरह के अणु होते हैं। अधिकतर के न्यूक्लियस में सिर्फ एक प्रोटॉन होता है, लेकिन बहुत कम (लगभग 0.02 प्रतिशत) के भीतर एक पेरोटॉन के साथ एक न्यूट्रॉन भी होता है, जिसकी वजह से उनका वजन बढ़ जाता है। इन्हें ड्यूटेरियम या 'भारी' हाइड्रोजन के नाम से जाना जाता है। हल्के अणु ग्रह के वातावरण को तेज गति से छोड़ जाते हैं, अधिकतर पानी अंतरिक्ष में चले जाने की वजह से कुछ भारी ड्यूटेरियम पीछे छूट गए।

साभार-नई दुनिया 

समाज की बात samaj ki baat कृष्णधर शर्मा  KD Sharma

स्मॉग टॉवर : क्या यही है राइट च्वाइस ?

 सारा विवाद इसी को लेकर है कि स्मॉग टॉवर वायु प्रदूषण की समस्या का हल नहीं है और यह प्रदूषण उत्पन्न करने वाले कारकों पर कोई प्रभाव नहीं डालता है। 

बीते महीने के अंत में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण पर सुनवाई करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्मॉग टॉवर न लगने पर कड़ी नाराजगी जताई थी। शीर्ष अदालत ने पूछा था कि उसके आदेश के बावजूद अभी तक टॉवर क्यों नहीं लगे। शीर्ष अदालत की फटकार पर सरकार की तरफ से अदालत को सही तकनीकी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई बल्कि मीडिया में जो खबरें आईं उससे यही प्रतीत होता है कि सरकार वायु प्रदूषण की समस्या की असल जड़ से अदालत और जनता का ध्यान हटाना कर स्मॉग टॉवर में उलझाना चाहती है। 

सरल शब्दों में समझें तो स्मॉग टॉवर एक तरह से बहुत बड़ा एयर प्योरीफायर होता है, जो वैक्यूम क्लीनर की तरह धूल कणों को हवा से खींच लेता है। आमतौर पर स्मॉग टॉवर में एयर फिल्टर की कई परतें फिट होती हैं, जो प्रदूषित हवा, जो उनके माध्यम से गुजरती है, को साफ करती है। विशेषज्ञों के मुताबिक एक स्मॉग टॉवर 50 मीटर की परिधि की वायु को साफ कर सकता है। 

स्मॉग टॉवर का आईडिया मूलतः चीन से आया है। वर्षों से वायु प्रदूषण से जूझ रहे चीन के पास अपनी राजधानी बीजिंग में और उत्तरी शहर शीआन में दो स्मॉग टॉवर हैं। पूर्व क्रिकेटर और पूर्वी दिल्ली के भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने इस वर्ष 3 जनवरी को राष्ट्रीय राजधानी के लाजपत नगर में एक प्रोटोटाइप एयर प्यूरीफायर का उद्घाटन किया। उन्होंने ट्वीट किया, “मेरा नाम गौतम गंभीर है। मैं बात करने में विश्वास नहीं करता, मैं जीवन को बदलने में विश्वास करता हूँ! सतत समर्थन के लिए माननीय गृह मंत्री अमित शाह जी को धन्यवाद।” 

अब इन स्मॉग टॉवर को लेकर विवाद उठ रहे हैं। इसी महीने सर्वोच्च न्यायालय ने वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली में स्मॉग टॉवर स्थापित करने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की एक याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी थी कि इससे चीनी कंपनियों को पैसा मिलेगा और यह साबित करने के लिए कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है कि स्मॉग टॉवर प्रदूषण को नियंत्रित कर सकता है। इसके इतर काउंसिल ऑफ एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर (CEEW) के अनुसार राजधानी दिल्ली की हवा को साफ करने के लिए कम से कम लगभग पौने दो करोड़ रूपये की लागत वाले पच्चीस लाख स्मॉग टावरों की जरूरत होगी।

 दरअसल सारा विवाद इसी को लेकर है कि स्मॉग टॉवर वायु प्रदूषण की समस्या का हल नहीं है और यह प्रदूषण उत्पन्न करने वाले कारकों पर कोई प्रभाव नहीं डालता है। असल बात यह है कि जब तक प्रदूषण फैलाने वाले स्रोत बंद नहीं किए जाएंगे, तब तक स्मॉग टॉवर जैसे टोटके सिर्फ जन-धन की हानि करते रहेंगे। वायु प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोत कल कारखाने और थर्मल पॉवर प्लांट हैं। प्रदूषण उत्पन्न करने वाले इन असल स्रोतों पर कोई आंच नहीं आए इसी लिए कभी पराली जलाने को वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जा ता ह और कभी कोई और तर्क दे दिए जाते हैं।   

पर्यावरण मंत्रालय ने दिसंबर 2015 में बिजली संयंत्रों के लिए नए उत्सर्जन नियमों की पुष्टि की थी। उन्हें लागू करने की मूल समय सीमा पहले दिसंबर 2017 थी, लेकिन फिर दिसंबर 2019 तक आगे धकेल दी गई और बाद में इसे दिसंबर 2022 तक कंपित कार्यान्वयन में बदल दिया गया। इधर इस वर्ष के शुरू में आई एक खबर पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है। 

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के हवाले से मीडिया में रिपोर्ट्स प्रकाशित हुई थीं कि भारत के आधे से अधिक कोयला-आधारित बिजली संयंत्रों और 94% कोयला-संचालित इकाइयों में वायु प्रदूषण को रोकने के लिए रेट्रोफिट उपकरण का आदेश दिया गया था। लेकिन नई दिल्ली के आसपास कोयले से चलने वाले उद्योग भारतीय अधिकारियों की इस चेतावनी कि अगर उन्होंने साल के अंत तक सल्फर ऑक्साइड के उत्सर्जन में कटौती करने के लिए उपकरण नहीं लगाए तो इन उद्योगों को बंद कर दिया जाएगा, के बावजूद ये संयंत्र बिना उपकरणों के चल रहे थे। 

एक तरफ तो दिल्ली में स्मॉग टॉवर लगाकर वायु प्रदूषण पर लगाम कसने के टोटके किए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ सरकार कोयला क्षेत्र को निजी खनन के लिए खोलकर देश की हवा को और अधिक जहरीला बनाने के इंतजाम कर रही है। जरूरत इस बात की थी कि जो भी याचिकाकर्ता सर्वोच्च न्यायालय में यह दलील देने गए थे कि स्मॉग टॉवर से चीन की इकॉनॉमी को पायदा होगा, वह शीर्ष अदालत के सामने सही तर्क प्रस्तुत करते कि स्मॉग टॉवर समस्या का समाधान नहीं है और यह सिर्फ जनता की मेहनत की गाढ़ी कमाई की बर्बादी है, इसलिए इससे बहुत कम खर्च पर कोयला-संचालित इकाइयों में वायु प्रदूषण को रोकने के लिए रेट्रोफिट उपकरण लगाने पर सख्ती की जाए। 

(अमलेन्दु उपाध्याय  साभार-देशबंधु )

समाज की बात samaj ki baat कृष्णधर शर्मा KDSharma

शनिवार, 9 जनवरी 2021

ऊर्जा-क्षेत्र में सौर ऊर्जा की दावेदारी

 'राष्ट्रीय विद्युत नीतिके अनुसार अगले दशक में विद्युत की बढ़ती मांग को 2027 तक दो लाख 75 हजार मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा किया जा सकता हैइसलिए कोयले के नये संयंत्रों की जरूरत नहीं पड़ेगी। ऐसी परिस्थितियों में बिजली की मांग और अर्थव्यवस्था की गति को बनाए रखने के लिए आवश्यक हो गया है कि नवीकरणीय ऊर्जा में निरंतर वृद्धि करते हुए विद्युत उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भरता कम की जाए। वैसे भीवैश्विक एनजीओ 'ग्रीन पीसके अनुसार कोयले से उत्पन्न बिजलीसौर और पवन ऊर्जा से 65 फीसदी महंगी है।

सौर ऊर्जा में सस्ती टेक्नालॉजी और नवाचार ने पूरी दुनिया में बिजली का परिदृश्य बदल दिया है। सन् 2010 में भारत का 'राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशनशुरू किया गया था। उस समय सौर ऊर्जा से मात्र 17 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता था। बीस जून 2020 तक सौर बिजली उत्पादन की स्थापित क्षमता 35 हजार 739 मेगावाट हो गई है। वर्तमान केंद्र सरकार ने 2022 तक एक लाख मेगावाट सौर ऊर्जा, 60 हजार मेगावाट पवन ऊर्जा और 15  हजार मेगावाट  अन्य परम्परागत क्षेत्रों से बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा है। देश के पांच प्रमुख राज्यों में सोलर ऊर्जा का उत्पादन इस प्रकार है (मेगावाट में) कर्नाटक (7100), तेलगांना (5000), राजस्थान (4400), गुजरात (2654)। मध्यप्रदेश भी इस सूची में जल्द ही शामिल होने वाला है।

 एक नवम्बर 2020 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में विभिन्न स्रोतों से मिलने वाली बिजली (मेगावाट में) इस प्रकार है - राज्य थर्मल (5400), राज्य जल विद्युत (917), संयुक्त उपक्रम एवं अन्य (2456), केंद्रीय क्षेत्र  (5055), निजी क्षेत्र (1942), अल्ट्रा-मेगा पावर प्रोजेक्टस  (1485) एवं नवकरणीय ऊर्जा (3965) अर्थात 21 हजार 220 मेगावाट प्रतिदिन की क्षमता है। दिसम्बर 2020 में राज्य में अधिकतम बिजली की मांग 15 हजार मेगावाट दर्ज की गई थीजबकि वर्ष भर में औसत मांग लगभग हजार मेगावाट है। 

इसके अतिरिक्त रीवा में 750 मेगावाट की 'अल्ट्रा मेगा सोलर प्लांटशुरू हो चुका है। एक सरकारी विज्ञप्ति के मुताबिक इससे हर साल 15.7 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को रोका जाएगाजो दो करोड़ 60 लाख पेड़ों के लगाने के बराबर है। मध्यप्रदेश के विभिन्न अंचलों में सोलर पावर प्लांट (मेगावाट में) कीआगर (550), नीमच (500), मुरैना(1400), शाजापुर(450), छतरपुर(1500) औरओंकारेश्व र (600) परियोजनाएंअर्थात कुल पांच हजार मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं।        

भारत में तीन करोड़ कृषि पम्प हैं जिनमें से एक करोड़ पम्प डीजल से चलाए जाते हैं। इन किसानों को  'ऊर्जा सुरक्षा उत्थान महा-अभियान' (कुसुम) योजना के तहत जो सोलर पम्प दिए जा रहे हैंउनसे कुल 28 हजार 250 मेगावाट बिजली पैदा होगी। मध्यप्रदेश सरकार का दावा है कि अब तक 14 हजार 250 किसानों के लिए सोलर पम्प स्थापित किये जा चुके हैं। तीन सालों में दो लाख पम्प और लगाने का लक्ष्य है। दूसरी ओरमध्यप्रदेश में अब तक 30 मेगावाट क्षमता के सोलर रूफ-टॉप संयत्र स्थापित किये जा चुके हैं। इस साल 700 सरकारी भवनों पर 50 मेगावाट के सोलर रूफ-टॉप और लगेंगे। भोपाल के निकट मंडीदीप में 400 औद्योगिक इकाईयों के लिए 32 मेगावाट क्षमता की सोलर रूफ-टॉप परियोजनाओं पर कार्य किया जा रहा है।

जबलपुर शहर की 'गन-कैरिज फैक्ट्री' (जीसीएफ)  और 'व्हीटकल फैक्ट्री' (वीएफजे) में 10-10 मेगावाट के सोलर प्लांट लगाए गए हैं। इन दोनों जगहों से बिजली का उत्पादन और वितरण किया जा रहा है। अब जितनी बिजली इन प्लांट से बनती हैउतना क्रेडिट इनके बिल में किया जा रहा है। ऐसे में न केवल 'वीएफजेऔर 'जीसीएफ,' बल्कि 'आयुध निर्माणीखम्हरिया' (ओएफके)तथा 'ग्रे-आयरनफाउंड्री' (जीआइएफ) को भी बिलों में बचत होने लगी है। न केवल चारों आयुध निर्माणी फैक्ट्रियांबल्कि इस्टेट के बंगले एवं क्वार्टर में होने वाली बिजली की खपत भी इसमें समाहित की गई है। इन दोनों सोलर प्लांट से हर साल करोड़ 60 लाख यूनिट से ज्यादा का बिजली उत्पादन किये जाने की अपेक्षा है। एक अनुमान के अनुसार इन दोनों प्लांट से 40 हजार टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को रोका जा सकेगा।                   

देश में अधिकांशलगभग 58 फीसदीबिजली का उत्पादन कोयले से होता है। भारत में बिजली की स्थापित क्षमतातीन लाख 73 हजार 436 मेगावाट हैजिसमें कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों का योगदान  दो लाख 21 हजार 803 मेगावाट है। इसमें से 30 हजार मेगावाट से अधिक क्षमता के संयंत्र 20 साल से ज्यादा पुरानेखर्चीले और प्रदूषणकारी हैं। औद्योगिक विकास के लिए कोयला और पेट्रोलियम जलाने से निकलने वाला कार्बन का धुआं पृथ्वी के जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारक है। 'ग्लोबल रिस्क इंडेक्स-2020' के अनुसार सन् 1998 से 2017 के बीच भारत में जलवायु परिवर्तन (सूखाअतिवृष्टिसमुद्री तूफान आदि) के कारण पांच लाख 99 हजार करोड़ रुपयों का आर्थिक नुकसान हुआ है। वहीं केवल सन् 2018 में जलवायु परिवर्तन से दो लाख 79 हजार करोड़ रुपयों का आर्थिक नुकसान हुआ और 2081 लोगों की मौतें हो गईं थीं।

 'राष्ट्रीय विद्युत नीतिके अनुसार अगले दशक में विद्युत की बढ़ती मांग को 2027 तक दो लाख 75 हजार मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा किया जा सकता हैइसलिए कोयले के नये संयंत्रों की जरूरत नहीं पड़ेगी। ऐसी परिस्थितियों में बिजली की मांग और अर्थव्यवस्था की गति को बनाए रखने के लिए आवश्यक हो गया है कि नवीकरणीय ऊर्जा में निरंतर वृद्धि करते हुए विद्युत उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भरता कम की जाए। वैसे भीवैश्विक एनजीओ 'ग्रीन पीसके अनुसार कोयले से उत्पन्न बिजलीसौर और पवन ऊर्जा से 65 फीसदी महंगी है।

सम्पूर्ण भारतीय भूभाग पर 5000 लाख करोड़ किलोवाट प्रति वर्ग किलोमीटर के बराबर सौर ऊर्जा आती हैजो कि विश्व की सम्पूर्ण खपत से कई गुना है। देश में वर्ष में 250 से 300 दिन ऐसे होते हैं जब सूर्य की रोशनी पूरे दिन भर उपलब्ध रहती है। भारत का दुनिया भर में बिजली के उत्पादन और खपत के मामले में पांचवां स्थान है। भारत की लगभग 72 फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है और इनमें से हजारों गांव ऐसे भी हैं जो आज भी बिजली जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित है। यह देश को ऊर्जा की गुणवत्तासंरक्षण और ऊर्जा के नवीन स्रोतों पर ध्यान देने का उचित समय है। सौर ऊर्जाभारत में ऊर्जा की आवश्यकताओं की बढती मांग को पूरा करने का सबसे अच्छा तरीका है।राजकुमार सिन्हा

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