मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

दलाई लामा कुछ वर्ष अरुणाचल क्यों नहीं रहते?


 चीन का एक अद्र्ध सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भारत को नसीहत के साथ-साथ नाकाबिले बर्दाश्त की भी धमकी दी है। वजह दलाई लामा हैं, जिनके अरुणाचल जाने पर चीन को आपत्ति है। तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा 10 अप्रैल तक अरुणाचल प्रदेश में रहेंगे। परम पावन कोई पहली बार अरुणाचल नहीं आये हैं। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में बस जाने के बाद वे सातवीं बार अरुणाचल भ्रमण पर आये हैं। 24 मार्च से 6 मई 1983 को परम पावन का पहला अरुणाचल दौरा था, तब भी चीन काफी उछला-कूदा था। दलाई लामा का दूसरा दौरा 7 से 16 दिसंबर 1996, तीसरा 7 से 21 अक्टूबर 1997 को हुआ था। 2003 में दो बार 29 अप्रैल से 9 मई, और 11 से 17 दिसंबर को तिब्बती धर्मगुरु का अरुणाचल आना हुआ था। दलाई लामा का छठा अरुणाचल दौरा 8 से 15 नवंबर 2009 को संपन्न हुआ था। चीन, दलाई लामा के हर अरुणाचल दौरे पर भारत को धमका चुका है। उसकी गीदड़ भभकी को क्या गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है?
चीन दलाई लामा के हर अरुणाचल दौरे पर दो कारणों से उछलता है। पहला, 1914 का शिमला कन्वेंशन है, जिसके मुताबिक तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने माना था कि दक्षिणी तिब्बत के पड़ोस में बसा तवांग और संपूर्ण अरुणाचल भारत का हिस्सा है। चीन 1914 के शिमला कन्वेंशन को मानने से इंकार करता रहा है। दूसरा, 1959 में विद्रोह के तुरंत बाद दलाई लामा का तिब्बत से महाभिनिष्क्रमण हुआ। 30 मार्च 1959 को वे तवांग आये, और फिर 18 अप्रैल को असम के तेजपुर पहुंचे। कुछ महीने बाद कोई 80 हजार शरणार्थियों के साथ धर्मशाला में तिब्बत की निर्वासित सरकार की स्थापना हुई। अरुणाचल का तवांग एक तारीखी स्थान है, जब भी दलाई लामा इस सूबे में आते हैं, तवांग जरूर जाकर अपनी याद ताजा करते हैं। चीन के इस दर्द को बदस्तूर जारी रखने के लिए दलाई लामा को चाहिए कि वे अरुणाचल ही कुछ वर्ष रहें।
एक आम फहम है कि तिब्बत की निर्वासित सरकार की स्थापना पंडित नेहरू की वजह से हुई। मगर, सच यह है कि इस पूरे खेल को सीआईए के ‘स्पेशल एक्टिविटी डिवीजन’ ने अंजाम दिया था। 1942 से पहले तिब्बत में अंदरूनी दांव-पेंच से शेष दुनिया अनजान थी। तिब्बत में पीत वस्त्र धारी गेलुग (जिसके धर्मगुरु 14वें दलाई लामा हैं), ‘काग्यु’, ‘न्यींगमां’, और शाक्य मत को मानने वाले ग्यालपो धर्मगुरु विभिन्न मठों के जरिये अपना अखंड राज चला रहे थे। 1642 से 1950 तक ल्हासा से लेकर तिब्बत पठार के बड़े हिस्से पर एक से चौदहवें दलाई लामाओं ने राज किया है। बीच में 1705 से 1750 की अवधि को छोडक़र, जब मांचु और छिंग राजाओं का शासन तिब्बत में था।
चीन का मकसद था, बहुसंख्यक गेलुग मतावलंबियों को कमजोर करना। उसने दलाई लामा के विकल्प के रूप में पणछेन लामाओं को तैयार किया। यह किस्सा 1933 का है, जब तेरहवें दलाई लामा की मृत्यु हो चुकी थी। उन दिनों नौवें पणछेन लामा थुब्तेन चोक्यी न्यीमा पांच सौ चीनी सैनिकों और कुछ समर्थक लामाओं के साथ खाम आये और कमजोर मठों को दबाकर सत्ता पर काबिज हो गये। 1942 के बाद च्यांग काई शेक ने तिब्बत में विस्तार देने की नीयत से और भी साजिशें कराईं। फिर भी गेलुग लामा उनके काबू नहीं आ रहे थे।
22 फरवरी 1940 को जब ल्हासा में 14वें दलाई लामा तेन्जिंग ग्यात्सो का राज्याभिषेक हुआ तब वे पांच साल के बालक थे। 17 नवंबर 1950 को वे पन्द्रह वर्ष के हो चुके थे, उस दिन उन्हें गेलुग शासन के राजनीतिक फैसले लेने का अधिकार मिल चुका था। तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र के शासक की हैसियत से दलाई लामा के कई पत्र ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ को भेजे जाते रहे। 27 सितंबर 1954 को चीनी संसद ‘नेशनल पीपुल्स कांग्रेस’ की स्टैंडिंग कमेटी के ‘वॉइस चेयरमैन’ दलाई लामा बनाये गये। यह दर्शाता है कि तत्कालीन चीनी सरकार दलाई लामा को तिब्बत में बहैसियत शासक की मान्यता दे रही थी। लेकिन च्यांगकाई शेक तिब्बत पर प्रतिरूपी प्रशासक नहीं, प्रत्यक्ष चीनी आधिपत्य चाहते थे।
14वें दलाई लामा को तख्ता पलट का अंदाजा हो चुका था। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से इस वास्ते 1956 में मदद भी मांगी थी। परंतु पंडित नेहरू ने 1954 में चीन से हुई संधि का हवाला देकर, प्रत्यक्ष मदद देने से इंकार कर दिया था। पंडित नेहरू नहीं चाहते थे, कि इसे लेकर चीन से टकराव आरंभ हो जाए। इस बीच सीआईए का ‘स्पेशल एक्टिविटी डिवीजन’(एसएडी) ने दलाई लामा का तिब्बत से पलायन का इंतजाम किया। उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहॉवर संभवत: पंडित नेहरू को समझा पाने में सफल हुए थे कि तिब्बत की निर्वासित सरकार भविष्य में चीन पर अंकुश का काम करेगी। बाद में जनवरी 1961 में राष्ट्रपति निक्सन सत्ता में आये, तो तिब्बत की निर्वासित सरकार को और भी फंड व ताकत मिली। 1959, 1961, और 1965 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में तिब्बत से संबंधित तीन प्रस्ताव पास किये गये। 21 सितंबर 1987 को अमेरिकी कांग्रेस में तिब्बत को शांति क्षेत्र बनाने संबंधी पांच सूत्री प्रस्ताव पर भी मुहर लगी। इसे लेकर चीन की भृकुटि तनी रही।
तिब्बत को केंद्र में रखकर सीआईए जो कुछ कर रही थी, उसे रूसी एजेंसियां ‘काउंटर’ तो नहीं कर पा रही थीं, मगर समय-समय पर उन गतिविधियों पर से पर्दा उठाने का काम क्रेमलिन की तरफ से होता रहा। रूसी इतिहासकार दिमित्रि बर्खोतुरोव ने कई सारे दस्तावेजों के आधार पर खुलासा किया कि यूएस कांग्रेस ने 1 लाख 80 हजार डॉलर 1964 के ड्राफ्ट बजट में आबंटित किया था। तिब्बत आंदोलन में सीआईए की कितनी गहरी दिलचस्पी रही है, उसका सबसे बड़ा उदाहरण पश्चिमी नेपाल सीमा से लगा तिब्बत का खाम प्रदेश है, जहां 1959 में खंफा युद्ध हुआ था। इसके लिए अमेरिका के कोलराडो स्थित कैंप हाले में 2100 खंफा लड़ाके लाये गये और उन्हें गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग देकर नेपाल के बरास्ते वापिस खाम भेजा गया। इस पूरे कार्यक्रम में नौ लाख डॉलर के खर्चे की मंजूरी अमेरिकी कांग्रेस से ली गई थी। जिसमें चार लाख डॉलर कैम्प हाले में व्यय किया गया था।
 बदलते वक्त के साथ तिब्बतियों को सीआईए का सहयोग धीरे-धीरे कम होता गया। 1968 में सूचना मिली कि सीआईए के जरिये तिब्बतियों को बजटीय सहयोग कम करके 11 लाख, 65 हजार डॉलर कर दिया गया था। कुछ कूटनीतिक मानते हैं कि इस सारे खेल के पीछे चीन के प्रथम नाभिकीय परीक्षण को पटरी से उतारना था, जो 16 अक्टूबर 1964 को लोप नूर में संपन्न हुआ था। लोप नूर तिब्बत से सटे शिन्चियांग में हैं, जहां के उईगुर अलगाववादी चीन को चुनौती देते रहे हैं। चीनी मामलों के जानकार जोनाथन मिस्की ने सूचना दी कि 1972 में राष्ट्रपति निक्सन के चीन दौरे के बाद ‘खंफा ऑपरेशन’ के बाद के काम को भी स्थगित कर दिया गया।
6 जुलाई 2017 को 14 वें दलाई लामा 82 साल के हो जाएंगे। उनके तेवर, उम्र के साथ ढीले पडऩे लगे हैं। उनमें बदलाव दो दशक पहले से आरंभ था। 21 सितंबर 1987 को जर्मनी के श्ट्राशबुर्ग में परम पावन ने पांच सूत्री मध्य मार्ग का प्रस्ताव दिया था। जिसमें पूरे तिब्बत को शांति क्षेत्र घोषित करने, चीनी मूल के हान वंशियों को कहीं और शिफ्ट करने, तिब्बत में मानवाधिकार, तिब्बत को नाभिकीय कचरे का ठिकाना बनाने से परहेज करने जैसे लीपापोती वाले प्रस्ताव थे। ऐसे प्रस्ताव से तिब्बत स्वतंत्र हो जाएगा, ऐसा दलाई लामा का कोई अंधभक्त ही सोच सकता है।
दलाई लामा कुछ वर्षों से धर्मगुरु का ब्रांड लेकर विचरण करते रहे हैं। लेकिन उनकी धार्मिक यात्रा पर भी चीन को आपत्ति है। बड़ा सवाल यह है कि इस समय सीआईए तिब्बत के मामले में कितना सक्रिय है? और ट्रंप प्रशासन दलाई लामा के बारे में क्या सोचता है? ट्रंप व्यापारी नेता हैं, और वे स्पष्ट कर चुके हैं कि दुनिया का राजनीतिक मानचित्र बदलने के लिए अमेरिकी टैक्स पेयर्स का पैसा अब और नहीं गलाएंगे। दलाई लामा यों भी चीन के विरूद्ध हथियार डाल चुके हैं। एक-दो मौकों पर जब दलाई लामा ने बयान दिया कि वे ‘वन चाइना पॉलिसी’ का समर्थन करते हैं, तो उन बचे-खुचे लोगों को आश्चर्य हुआ, जिन्होंने तिब्बत की आजादी के वास्ते बड़ी कुर्बानियां दी थीं। क्या दलाई लामा बदल चुके हैं? इस प्रश्न पर निष्पक्ष रूप से चिंतन की आवश्यकता है।
 चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने बयान दिया कि दलाई लामा के अरुणाचल दौरे से चीन की ‘वन चाइना पॉलिसी’ को धक्का पहुंचा है, और इससे भारत-चीन संबंध प्रभावित होते हैं। तो क्या हम अरुणाचल की कीमत पर ‘वन चाइना पॉलिसी’ को समर्थन दें? अरुणाचल भारत का अभिन्न अंग है, और रहेगा। भाड़ में जाए वन चाइना पॉलिसी! इसके लिए चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग प्रधानमंत्री मोदी के साथ अगली बार झूला झुलने से मना कर दें, तो उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए।
चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने 6 अप्रैल को नुमाया संपादकीय ‘इंडिया यूज दलाई लामा कार्ड’ को बड़े ही नकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। उसकी टिप्पणी थी, ‘एनएसजी का सदस्य नहीं बन पाने, और यूएन में मसूद अजहर को आतंकी लिस्ट में शामिल न करा पाने का हिसाब भारत दलाई लामा के जरिये चुकता कर रहा है।’ संपादकीय लिखने वाला जैसे सीमा पर खड़ा ललकार रहा हो, ‘अगर नई दिल्ली ‘साइनो-इंडिया’ संबंध को खराब करता है, और दोनों देश प्रतिद्वंद्वी के रूप में आमने-सामने होते हैं, तो क्या भारत उसके दुष्परिणामों को झेल पायेगा? इसलिए राष्ट्रवादी मित्रों, इस देश में सिर्फ एक बार चीनी माल की बिक्री संपूर्ण रूप से बंद करा दीजिए। चीन इस आर्थिक झटके को झेल नहीं पायेगा!

पुष्परंजन
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शुक्रवार, 17 मार्च 2017


आमेर का किला जयपुर 
राजस्थान का  उपनगर आमेर  4 वर्ग किलोमीटर (1.5 वर्ग मीटर) में फैला एक शहर है जो भारत के राजस्थान राज्य के जयपुर से 11 किलोमीटर दुरी पर स्थित है. यह किला ऊँचे पर्वतो पर बना हुआ है, असल में आमेर शहर को मीनाओ ने बनवाया था और बाद में राजा मान सिंह प्रथम ने वहा शासन किया. यह जयपुर के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है, जो कि पहाड़ी पर स्थित है। आमेर दुर्ग का निर्माण राजा मान सिंह-प्रथम ने करवाया था। आमेर दुर्ग हिन्दू तत्वों की अपनी कलात्मक शैली के लिए जाना जाता है। अपनी विशाल प्राचीर, दरवाजों की श्रंखला और लम्बे सर्पिलाकार रास्ते के साथ यह अपने सामने की ओर स्थित मावठा झील की ओर देखता हुआ खड़ा है।
इस अजेय दुर्ग का सौंदर्य इसकी चारदीवारी के भीतर मौजूद इसके चार स्तरीय लेआउट प्लान में स्पष्ट दिखाई पड़ता है, जिसमें लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से निर्मित दीवान-ऐ-आम या "आम जनता के लिए विशाल प्रांगण", दीवान-ऐ-ख़ास या "निजी प्रयोग के लिए बना प्रांगण", भव्य शीश महल या जय मंदिर तथा सुख निवास शामिल हैं, जिन्हें गर्मियों में ठंडा रखने के लिए दुर्ग के भीतर ही कृत्रिम रूप से बनाये गए पानी के झरने इसकी समृद्धि की कहानी कहते हैं। इसीलिये, यह आमेर दुर्ग "आमेर महल" के नाम से भी जाना जाता है। राजपूत महाराजा अपने परिवारों के साथ इस महल में रहा करते थे। महल के प्रवेश द्वार पर, किले के गणेश द्वार के साथ चैतन्य सम्प्रदाय की आराध्य माँ शिला देवी का मंदिर स्थित है।
यह आमेर का किलाजयगढ़ दुर्ग के साथ, अरावली पर्वत श्रृंखला पर चील के टीले के ठीक ऊपर इस प्रकार स्थित है कि ये दो अलग अलग किले होते हुए भी समग्र रूप में एक विशाल संरचना का रूप लेते हुए दिखाई पड़ते हैं क्योंकि दोनों किले ना सिर्फ एक दूसरे के बेहद करीब स्थित हैं, बल्कि एक सुरंग के रास्ते से दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए भी हैं। आमेर के किले से जयगढ़ के किले तक की यह सुरंग इस उद्देश्य से बनायी गयी थी कि युद्ध के समय में राज परिवार के लोग आसानी से आमेर के किले से जयगढ़ के किले में पहुँच सकें, जो कि आमेर के किले की तुलना में अधिक दुर्जेय है।
यह मुगलों और हिन्दूओं के वास्तुशिल्प का मिलाजुला और अद्वितीय नमूना है। जयपुर से पहले कछवाहा राजपूत राजवंश की राजधानी आमेर ही थी। राजा मानसिंह जी ने वर्ष १५९२ में इसका निर्माण आरंभ किया था। पहाड़ी पर बना यह महल टेढ़े मेढ़े रास्तों और दीवारों से पटा पड़ा है। महल के पीछे से जयगढ दिखाई देता है। महल को बनाने में लाल पत्थरों और सफ़ेद मार्बल का बहुत अच्छे से उपयोग किया गया है। महल के कई अनुभाग देखने योग्य हैं।

महल में जय मंदिर, शीश महल, सुख निवास और गणेश पोल देखने और घूमने के अच्छे स्थान हैं। इन्हें समय-समय पर राजा मानसिंह ने दो सदी के शासन काल के दौरान बनवाया था। आमेर का पुराना नगर महल के पास नीचे की ओर बसा था। यहाँ का जगत शिरोमणि मंदिर, नरसिंह मंदिर देखने योग्य हैं।

आमेर का किला, कला का एक सुंदर नमूना भी है। यहाँ पर बहुत सी फिल्मों की शूटिंग भी होती है।






आमेर का किला विश्व धरोहर
राजस्थान सरकार ने जनवरी २०११ को राजस्थान के कुछ किलों को विश्व धरोहर में शामिल करने के लिए प्रस्ताव भेजा था। उसके बाद यूनेस्को टीम की आकलन समिति के दो प्रतिनिघि जयपुर आए और एएसआई व राज्य सरकार के अघिकारियों के साथ बैठक की। इन सबके पश्चात मई २०१३ में इसे विश्व धरोहर में शामिल कर लिया गया।

आमेर जयपुर नगर सीमा मे ही स्थित उपनगर है, इसे मीणा राजा आलन सिंह ने बसाया था, कम से कम 967 ईस्वी से यह नगर मौजूद रहा है, इसे 1037 ईस्वी मे राजपूत जाति के कच्छावा कुल ने जीत लिया था। आमेर नगरी और वहाँ के मंदिर तथा किले राजपूती कला का अद्वितीय उदाहरण है। यहाँ का प्रसिद्ध दुर्ग आज भी ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माताओं को शूटिंग के लिए आमंत्रित करता है। मुख्य द्वार गणेश पोल कहलाता है, जिसकी नक्काशी अत्यन्त आकर्षक है। यहाँ की दीवारों पर कलात्मक चित्र बनाए गए थे और कहते हैं कि उन महान कारीगरों की कला से मुगल बादशाह जहांगीर इतना नाराज़ हो गया कि उसने इन चित्रों पर प्लास्टर करवा दिया। ये चित्र धीरे-धीरे प्लास्टर उखड़ने से अब दिखाई देने लगे हैं। आमेर में ही है चालीस खम्बों वाला वह शीश महल, जहाँ माचिस की तीली जलाने पर सारे महल में दीपावलियाँ आलोकित हो उठती है। हाथी की सवारी यहाँ के विशेष आकर्षण है, जो देशी सैलानियों से अधिक विदेशी पर्यटकों के लिए कौतूहल और आनंद का विषय है।





नाम का स्रोत

प्राचीन काल में आमेर को अम्बावती, अमरपुरा तथा अमरगढ़ के नाम से जाना जाता था। कुछ लोगों को कहना है कि अम्बकेश्वर भगवान शिव के नाम पर यह नगर "आमेर" बना, परन्तु अधिकांश लोग और तार्किक अर्थ अयोध्या के राजा भक्त अम्बरीश के नाम से जोड़ते हैं। कहते हैं भक्त अम्बरीश ने दीन-दुखियों के लिए राज्य के भरे हुए कोठार और गोदाम खोल रखे थे। सब तरफ़ सुख और शांति थी परन्तु राज्य के कोठार दीन-दुखियों के लिए खाली होते रहे। भक्त अम्बरीश से जब उनके पिता ने पूछताछ की तो अम्बरीश ने सिर झुकाकर उत्तर दिया कि ये गोदाम भगवान के भक्तों के गोदाम है और उनके लिए सदैव खुले रहने चाहिए। भक्त अम्बरीश को राज्य के हितों के विरुद्ध कार्य करने के लिए आरोपी ठहराया गया और जब गोदामों में आई माल की कमी का ब्यौरा अंकित किया जाने लगा तो लोग और कर्मचारी यह देखकर दंग रह गए कि कल तक जो गोदाम और कोठार खाली पड़े थे, वहाँ अचानक रात भर में माल कैसे भर गया।

भक्त अम्बरीश ने इसे ईश्वर की कृपा कहा। चमत्कार था यह भक्त अम्बरीश का और उनकी भक्ति का। राजा नतमस्तक हो गया। उसी वक्त अम्बरीश ने अपनी भक्ति और आराधना के लिए अरावली पहाड़ी पर इस स्थान को चुना, उनके नाम से कालांतर में अपभ्रंश होता हुआ अम्बरीश से "आमेर" या "आम्बेर" बन गया।







देवी मंदिर



आम्बेर देवी के मंदिर के कारण देश भर में विख्यात है। शीला-माता का प्रसिद्ध यह देव-स्थल भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने, देवी चमत्कारों के कारण श्रद्धा का केन्द्र है। शीला-माता की मूर्ति अत्यंत मनोहारी है और शाम को यहाँ धूपबत्तियों की सुगंध में जब आरती होती है तो भक्तजन किसी अलौकिक शक्ति से भक्त-गण प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। देवी की आरती और आह्वान से जैसे मंदिर का वातावरण एकदम शक्ति से भर जाता है। रोमांच हो आता है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं और एक अजीब सी सिहरन सारे शरीर में दौड़ जाती है। पूरा माहौल चमत्कारी हो जाता है। निकट में ही वहाँ जगत शिरोमणि का वैष्णव मंदिर है, जिसका तोरण सफ़ेद संगमरमर का बना है और उसके दोनों ओर हाथी की विशाल प्रतिमाएँ हैं।
 शीश महल


इसकी भीतरी दीवारों, गुम्बदों और छतों पर शीशे के टुकड़े इस प्रकार जड़े गए हैं कि केवल कुछ मोमबत्तियाँ जलाते ही शीशों का प्रतिबिम्ब पूरे कमरे को प्रकाश से जगमग कर देता है।
आम्बेर का किला अपने शीश महल के कारण भी प्रसिद्ध है। इसकी भीतरी दीवारों, गुम्बदों और छतों पर शीशे के टुकड़े इस प्रकार जड़े गए हैं कि केवल कुछ मोमबत्तियाँ जलाते ही शीशों का प्रतिबिम्ब पूरे कमरे को प्रकाश से जगमग कर देता है। सुख महल व किले के बाहर झील बाग का स्थापत्य अपूर्व है।
भक्ति और इतिहास के पावन संगम के रूप में स्थित आमेर नगरी अपने विशाल प्रासादों व उन पर की गई स्थापत्य कला की आकर्षक पच्चीकारी के कारण पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। पत्थर के मेहराबों की काट-छाँट देखते ही बनती है। यहाँ का विशेष आकर्षण है डोली महल, जिसका आकार उस डोली (पालकी) की तरह है, जिनमें प्राचीन काल में राजपूती महिलाएँ आया-जाया करती थीं। इन्हीं महलों में प्रवेश द्वार के अन्दर डोली महल से पूर्व एक भूल-भूलैया है, जहाँ राजे-महाराजे अपनी रानियों और पट्टरानियों के साथ आँख-मिचौनी का खेल खेला करते थे। कहते हैं महाराजा मान सिंह की कई रानियाँ थीं और जब राजा मान सिंह युद्ध से वापस लौटकर आते थे तो यह स्थिति होती थी कि वह किस रानी को सबसे पहले मिलने जाएँ। इसलिए जब भी कोई ऐसा मौका आता था तो राजा मान सिंह इस भूल-भूलैया में इधर-उधर घूमते थे और जो रानी सबसे पहले ढूँढ़ लेती थी उसे ही प्रथम मिलन का सुख प्राप्त होता था।
यह कहावत भी प्रसिद्ध है कि अकबर और मानसिंह के बीच एक गुप्त समझौता यह था कि किसी भी युद्ध से विजयी होने पर वहाँ से प्राप्त सम्पत्ति में से भूमि और हीरे-जवाहरात बादशाह अकबर के हिस्से में आएगी तथा शेष अन्य खजाना और मुद्राएँ राजा मान सिंह की सम्मति होगी। इस प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त करके ही राजा मान सिंह ने समृद्धशाली जयपुर राज्य का संचलन किया था। आमेर के महलों के पीछे दिखाई देता है नाहरगढ़ का ऐतिहासिक किला, जहाँ अरबों रुपए की सम्पत्ति ज़मीन में गड़ी होने की संभावना और आशंका व्यक्त की जाती है।




आमेर किले की कुछ रोचक बाते

1. आमेर का नामकरण अम्बा माता से हुआ था, जिन्हें मीनाओ की देवी भी कहा जाता था.
2.
आमेर किले की आतंरिक सुंदरता में महल में बना शीश महल सबसे बड़ा आकर्षण है.
राजपूतो के सभी किलो और महलो में आमेर का किला सबसे रोमांचक है.
3.
आमेर किले की परछाई मौटा झरने में पड़ती है, जो एक चमत्कारिक परियो के महल की तरह ही दीखता है.
4.
किले का सबसे बड़ा आकर्षण किले के निचे है जहा हाथी आपको आमेर किले में ले जाते है. हाथी की सैर करना निश्चित ही सभी को आकर्षित करता है.
5.
अम्बेर में स्थापित, जयपुर से 11 किलोमीटर की दुरी पर स्थित आमेर किला कछवाह राजपूतो की राजधानी हुआ करती थी, लेकिन जयपुर के बनने के बाद जयपुर उसकी राजधानी बन गयी थी.
6.
महल का एक और आकर्षण चमत्कारिक फूल भी है, जो एक मार्बल का बना हुआ है और जिसे साथ अद्भुत आकारो में बनाया गया है. मार्बल द्वारा बनी यह आकृति सभी का दिल मोह लेती है.
7.
महल का एक और आकर्षण प्रवेश द्वार गणेश गेट है, जिसे प्राचीन समय की कलाकृतियों और आकृतियों से सजाया गया है.
8.
जयगढ़ किले और आमेर किले के बीच एक 2 किलोमीटर का गुप्त मार्ग भी बना हुआ है. पर्यटक इस रास्ते से होकर एक किले से दूसरे किले में जा सकते है.



साभार- विकिपीडिया व् अन्य स्रोत 

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

भूटान : सादगी का वैभव


 प्रकृति की गोद में बसा भूटान एक ऐसा देश है जो खुशहाली पर जोर देता है। जहाँ पूरी दुनिया का जोर जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद पर होता है वहीँ भूटान अपने नागरिकों का जीवन स्तर जीएनएच यानी सकल राष्ट्रीय ख़ुशी से नापता है। यह एक बड़ा फर्क है जो भूटान को पूरी दुनिया से अलग करता है। भूटान की हवाओं में ऑक्सीजन की मात्रा इतनी अधिक है कि आप पूरे समय फ्रेश महसूस करते हैं, यहाँ की दीवारों और सडक़ों पर आपको इश्तेहार नहीं मिलेंगें और शहरों में ना तो भव्य शॉपिंग मॉल है और ना ही ट्रैफिक लाइट की जरूरत पड़ती है। इस मुल्क में सैनिकों से ज्यादा भिक्षु है। कोई भी व्यक्ति हड़बड़ी में नहीं दिखाई पड़ता है। भौतिकवादी दुनिया से बेफिक्र यह मुल्क आत्मसंतोष और अंदरूनी ख़ुशी को ज्यादा तरजीह देता है।


भारत और चीन के बीच घिरे इस छोटे से मुल्क की आबादी लगभग पौने 8 लाख है जिसमें ज्यादातर लोग बौद्ध धर्म को मानने वाले हैं, भूटान में लोकतंत्र और संवैधानिक राजशाही है। राजशाही यहाँ 1907 से है लेकिन 2008 में यहाँ के राजा ने खुद से आगे बढ़ कर लोकतंत्र की घोषणा की। शायद यही वजह है कि भूटानी अपने राजा को बहुत सम्मान की दृष्टि देखते हैं। भूटान के ‘पारो’ और ‘थिम्फू’ दो प्रमुख शहर हैं,जिसमें थिम्फू भूटान की राजधानी है, वही पारो तो जैसे सपनों का शहर है,शांत और ठहरा हुआ जो सुकून देता है। पारो घाटी से दिखने वाली सुंदरता आपको मदहोश कर देती है,यह एक ऐसा शहर है जहाँ की सादगी के वैभव में आप खो सकते हैं। पारो में भूटान का इकलौता हवाई अड्डा भी है । पारो में घुसते ही ऐसा महसूस होता है जैसे आप समय में कहीं पीछे चले गये हों, यह जाकर  किसी प्राचीन नगर का अहसास होता है । पूरे शहर के साथ एक नदी भी बहती है बिलकुल साफ, पारदर्शी और शांत। पारो शहर की खासियत यहाँ की हरियाली पहाड़ी घाटियाँ है। यह एक बेफिक्र शहर है जहाँ बहुमंजिला मकान नहीं है और शहर में ही खेती भी होती है। पारो अपने रहस्यमयी टाइगर नेस्ट के लिए भी मशहूर है, 3120 मीटर की ऊंचाईपर बना टाइगर नेस्ट भूटान के सबसे पवित्र बौद्ध मठों में से एक है पारो शहर से मठ की चढाई शुरू करने की जगह करीब 12 किलोमीटर दूर है यह मठ पारो से उत्तर दिशा में 12 किमी की दूर ताकसंग नामक स्थान  पर है, यहाँ से टाइगर नेस्ट तक जाने के लिए पैदल चलना पड़ता है आधे रास्ते तक घोड़े का भी इन्तेजाम हैं । लम्बी  चढ़ाई के बाद टाइगर नेस्ट तक पहुचने पर आपको अनोखी शांति और रोमांचक अहसास होता है मठ पर पहुंच कर अनोखी का एहसास होता है।

भूटानी अपनी संस्कृति व पर्यावरण को लेकर बहुत संवेदनशील हैं, यह शायद दुनिया का अकेला कार्बन यहाँ की नेगेटिव देश है जहाँ की 70 प्रतिशत जमीन पेड़-पौधों से ढकी है। इनके नीतियों और आदतों दोनों में पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया जाता है। भूटान के संविधान के अनुसार यहाँ के जमीन का 60 प्रतिशत हिस्सा जंगलों और पेड़ पौधों के लिए संरक्षित रखना अनिवार्य है, यहाँ प्राकृतिक सौंदर्य व संपदा के बदले  आर्थिक लाभों को महत्व नहीं दिया जाता है। साल 1999 से यहाँ प्लास्टिक की थैलियां भी प्रतिबंधित हैं। भूटानवासी भी पर्यावरण को लेकर बहुत सचेत होते हैं। पर्यावरण से प्रेम उन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है।
भूटान में बहुत कम संख्या में निजी वाहन है, ज्यादातर लोग पब्लिक ट्रांसर्पोट का उपयोग करते हैं। भूटान में चारो तरफ हरियाली ही हरियाली है इसके बावजूद भी लोग अपने घरों में अलग से बगीचा लगाते हैं और उसमें तरह तरह के रंगबिरंगी फूल उगाते हैं। भूटानी लोग प्रकृति का बहुत सम्मान करते हैं। उनका प्रकृति के प्रति प्रेम महसूस किया जा सकता है। वे इन पहाड़ों से दिल से जुड़े हुए हैं। अपने प्रकृति के प्रति प्रेम और संरक्षण को लेकर गर्व जताते हुए कोई भी आम भूटानी आपको यह बताते हुए मिल जाएगा कि ‘कैसे वे अपने देश के ज्यादातर भू-भाग में पेड़–पौधों के होने के बावजूद इनका दोहन करने के बदले लगातार नये पेड़ लगा रहे हैं और जब उनके राजा के घर बच्चे का जन्म हुआ तो पूरे देश ने 2 करोड़ पेड़ लगाये।’ भूटानी प्रकृति से जितना लेते हैं उससे कई गुना ज्यादा उसे लौटाने की कोशिश करते हैं और यही कारण है कि उनका देश काबर्न उत्सर्जन से पूरी तरह से मुक्त है जो दुनिया के दूसरे मुल्कों के लिए एक मिसाल है।



देश में संसाधन कम होने के बावजूद सरकार लोगों की बुनियादी जरूरतों के प्रति संवेदनशील है और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं पर विशेष ध्यान देती है। यहाँ कानून व्यवस्था भी काफी अच्छी है और अपराध दर व भ्रष्टाचार भी बहुत कम है। कानून का कड़ाई से पालन भी किया जाता है।  भूटान के लोग बहुत मिलनसार और अपनत्व से भरे हुए होते हैं। वे मददगार भी होते हैं। लेकिन इनका भारतीयों के प्रति एक अलग ही अपनापन और लगाव देखने को मिलता है। वे भारतीयों को अपने से अलग नही मानते हैं। इसका प्रमुख कारण भूटान का भारत के साथ पुराना सांस्कृतिक रिश्ता है। भूटान में ज्यादातर जरूरत के सामान भी भारत से आते हैं।
इसी साल के मई माह में मुझे भूटान जाने का मौका मिला। मैंने भूटान में कई लोगों से हैप्पीनेंस इन्डेक्स के सबंध में बात की जिसको लेकर उनका कहना था कि ‘भूटान के लोगों के खुश रहने का प्रमुख कारण यह है कि वे भौतिक वस्तुओं के बदले वेल्यू को ज्यादा महत्व देते हैं।’ उनका कहना था कि ‘यहाँ हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि आपके पास जो नहीं है उससे परेशान रहने की जगह आपके पास जो हैं उसमें ही संतुष्टि और खुशी तलाश की जाए।’ यहाँ पारिवारिक संबंधों और रिश्तों को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है। एक युवा लडक़ी ने बताया कि- मेरा बचपन का सपना है कि मैं एयरहोस्टेज बनू,इसके लिए मैं लम्बे समय से तैयारी भी कर रही थी और कुछ दिन पहले इसके लिए साक्षात्कार भी देकर आयी हूँ लेकिन एयरहोस्टेज के केवल 3 पद हैं जिसके लिए 500 लड़कियों ने साक्षात्कार दिया है अगर मेरा इसमें चयन नही होता तो मुझे दुख तो होगा परन्तु मेरा मानना है कि हर इंसान जो पैदा हुआ है उसके लिए प्रकृति ने कुछ न कुछ भूमिका सोची हुई है तो मैं मान कर चलूंगी कि इससे भी अच्छी नौकरी या भविष्य मेरे लिए है और ये सोच कर जीवन में आगे बढ़ जाऊंगीं। भूटान के लोग बुद्ध के मध्यम मार्ग के विचार को मानते हैं इसी वजह से वे ना ही बहुत सारी चीजों की चाहत रखते हैं और ऐसा भी नही होता कि उनके पास कुछ भी नही है। यही वह संतुलन से जिसे भूटानियों ने साध रखा है। हैप्पीनेंस इन्डेक्स के मूल में भी यही विचार है जिसे 1972 में वहां के सम्राट जिग्मे सिंग्ये वांगचुक सामने लाये थे। उसके बाद भूटान ने तय किया कि उनके देश में समृद्धि का पैमाना जीडीपी नहीं बल्कि उन चीज़ों को बनाया जाएगा जो नागिरकों को खुशी व इंसान और प्रकृति को सामंजस्य देते हों। यह एक जबर्दस्त विचार था लेकिन यह समय की धारा के विपरीत भी था जिसमें पूरी दुनिया प्रकृति का बेरहमी से दोहन करते हुए पूँजी कमाने को विकास मानती है। लेकिन इस विकास ने प्रकृति की अपूर्णनीय क्षति की है और गैर-बराबरी की खाई को भी बहुत चौड़ा कर दिया है। इस विकास मॉडल की एक सीमा और भी है, यहाँ सिर्फ भौतिक खुशहाली पर ही जोर है। लेकिन यही काफी नहीं है, जरूरी नहीं है कि पैसे से सब कुछ खरीद जा सके। हम अपने आस-पास ही समृद्ध लोगों को दुख, असंतोष, अवसाद और  निराशा में डूबे और आत्महत्या करते हुए देख सकते हैं।



भूटान ने अपने सकल राष्ट्रीय खुशहाली में मापक के तौर पर सामाजिक विकास, सांस्कृतिक संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और गुडगवर्नेस जैसी बातों को शामिल किया  है। भूटान में 1972 से ग्रास हैप्पीनेस इंडेक्स लागू हुआ है तब से वहाँ जीने की दर बढ़ कर लगभग दुगनी हो गयी है और  शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के पहुँच तकरीबन पूरी आबादी तक हुई है। भविष्य के लिए भूटान की योजनायें कम प्रभावी नहीं है  जिसमें 2030 तक नेट ग्रीन हाउस गैस को जीरो पहुँचाने और जीरो अपशिष्ट उत्पन्न करने जैसे लक्ष्य रखे गये हैं। इसके लिए अक्षय उर्जा जैसे- बायो गैस, हवा, और सोलर उर्जा पर जोर दिया जा रहा है और सभी गाडिय़ों को इलेक्ट्रिक गाडिय़ों से बदला जाना है। नये पेड़ लगाने का कार्यक्रम तो है ही।
लेकिन  भूटान की सबसे बड़ी सफलता तो कुछ और है। धीरे-धीरे ही सही विकास और ख़ुशी को लेकर दुनिया का नजरिया बदल रहा है।अब दुनिया भूटान के विचारों पर ध्यान दे रही है। तरक्की का पैमानों और असली खुशहाली के महत्व को समझा जा रहा है। 2010 में ब्रिटेन में भी ‘वेल बीईंग एंड हैप्पीनेस इंडेक्स’ की शुरुआत की गयी है। साल 2011 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने प्रस्ताव पारित कर हैप्पीनेस इंडेक्स के विचार को अपने एजेंडे में शामिल किया है और हर साल 20 मार्च को पूरी दुनिया में हैप्पीनेस डे मनाने का फैसला लिया गया है। इसी तरह से 2013 में वेनेजुएला में ‘मिनिस्ट्री ऑफ हैप्पीनेस’ बनाया गया है। यूएई ने ‘हैप्पीनेस और टॉलरेंस मिनिस्ट्री’ बनाई है। भारत में मध्य प्रदेश इस तरह का विभाग बनाने वाला देश का पहला राज्य बन गया है जहाँ ‘हैप्पीनेस डिपार्टमेंट यानी आनंद विभाग’ खोलने की घोषणा की गयी है।

आज दुनिया जिस रास्ते पर चल रही है वह तबाही का रास्ता है। पूरे ब्रह्माण्ड में पृथ्वी ही एक ऐसा ज्ञात ग्रह है जहाँ जीवन के फलने-फूलने का वातावरण है। लेकिन इस नीले ग्रह का सबसे अकलमंद प्राणी ही धरती के संतुलन को बिगाड़ता जा रहा है। पृथ्वी से अनेकों जीव-वनस्पति विलुप्त हो गए हैं, अगर यही हालत रहे तो आने वाले सालों में और जीव-वनस्पति और प्रजातियाँ इस धरती से लुप्त हो सकती हैं जिसमें खुद इंसान भी शामिल है। भूटान का माँडल दुनिया के भविष्य का माँडल है। इसे अपनाना आसान नहीं है लेकिन और कोई विकल्प भी तो नहीं बचा है। अगर कभी भूटान जाने का मौका मिले तो वहां प्रकृति से सामंजस्य बना कर खुश रहने का सबक लेना मत भूलियेगा। भूटान भविष्य है।
जावेद अनीस (साभार देशबंधु)

सोमवार, 16 जनवरी 2017

चुनाव में धर्म, जाति, और भाषा का दुरुपयोग प्रतिबंधित

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर ने अपने पद से विदा देने के पूर्व एक अत्यधिक महत्वपूर्ण निर्णय किया। इस निर्णय से धर्मनिरपेक्षता पर आधारित हमारे गणतंत्र की नींव और मजबूत होगी। सर्वोच्च न्यायालय की एक सात सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट निर्णय दिया है कि चुनावों में धर्म, जाति और भाषा का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।
वैसे तो हमारे जनप्रतिनिधित्व कानून में पहले से ही इस तरह का प्रावधान था परंतु उस प्रावधान के होते हुए भी अनेक पार्टियां धर्म का उपयोग चुनाव प्रचार में करती थीं। जैसे बाबरी मस्जिद के ध्वंस के पूर्व और ध्वंस के बाद खुलेआम भारतीय जनता पार्टी ने संपूर्ण देश के वातावरण को सांप्रदायिक बना दिया था। चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि ‘मंदिर वहीं बनेगा’ और यह कहने में भी नहीं हिचकिचाए कि ‘राम द्रोही, देश द्रोही’। चुनावी सभाओं में भी ‘जय श्रीराम’ के नारे लगते थे। यहां तक कि एक अवसर पर भारतीय जनता पार्टी के सर्वमान्य नेता लालकृष्ण आडवानी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि केन्द्र की सत्ता में आने का बहुत बड़ा श्रेय राम मंदिर आंदोलन को है।
यद्यपि पिछले लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने विकास का नारा दिया था परंतु मैदानी हकीकत यह थी कि अनेक मुद्दों पर सांप्रदायिक आधार पर प्रचार किया गया। अब चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनावों में धर्म, जाति और भाषा का दुरुपयोग एक भ्रष्ट आचरण समझा जाएगा और इसके चलते अब शायद चुनाव में खड़ा कोई भी उम्मीदवार धर्म, जाति और भाषा के आधार पर चुनाव प्रचार करने का साहस नहीं करेगा।
अपना निर्णय देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म को सिर्फ व्यक्ति तक सीमित रखना चाहिए और उसका उपयोग किसी भी सार्वजनिक और विशेषकर राजनीति में कतई नहीं करना चाहिए। चूंकि चुनाव में धर्म के उपयोग से अनेक लोग वोट कबाडऩे में सफल हो जाते थे इसलिए पिछले दिनों इस प्रवृत्ति को बहुत बढ़ावा मिला।
आप कल्पना कीजिए कि यदि हमारी न्यायपालिका पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं होती तो शायद उसके लिए इस तरह का निर्णय करना संभव नहीं होता। मोदी सरकार ने आते ही न्यायपालिका पर सरकार का नियंत्रण मजबूत करने के प्रयास प्रारंभ कर दिए थे। इसी प्रयास के चलते राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बनाने का प्रस्ताव किया गया था। इस आयोग को सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का अधिकार देना प्रस्तावित था। इस आयोग के छह सदस्य प्रस्तावित किए गए थे इनमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त  दो और न्यायाधीश, केन्द्रीय कानून मंत्री और दो प्रतिष्ठित नागरिक थे। इस आयोग के निर्णय बहुमत के आधार पर होने थे। ये दो प्रतिष्ठित नागरिक कौन होंगे, इसे स्पष्ट नहीं किया गया था। इसी तरह पूर्व में कभी भी किसी भी आयोग का सदस्य मंत्री को नहीं बनाया गया था। स्पष्ट है कि ये तथाकथित प्रतिष्ठित सदस्य सत्ताधारी दल से जुड़े होते। उसके अतिरिक्तविधि मंत्री मिलाकर तीन सदस्य हो जाते और फिर किसी एक न्यायाधीश को अपने पक्ष में करके न्यायपालिका में सारी नियुक्तियां सरकार की मंशा के अनुसार होतीं। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने इस आयोग के प्रस्ताव को निरस्त कर दिया और इस तरह एक बहुत बड़े खतरे से देश को बचा लिया। उसके बाद भी अभी अन्य तरीकों से न्यायपालिका पर नियंत्रण पाने के प्रयास जारी हैं। जैसे उच्च न्यायालयों में अभी 430 से ज्यादा न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि इन पदों को शीघ्र भरा जाए। परंतु केन्द्रीय सरकार ने इस संबंध में लगभग चुप्पी साध ली है और कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रस्ताव पर अभी तक कुछ नहीं कहा है। इससे उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या लाखों तक पहुंच गई है।
न्यायमूर्ति टी.एस. ठाकुर ने अपने कार्यकाल के दौरान न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बारे में अपनी प्रतिबद्धता पूरी तरह से दिखाई। अपने विदाई समारोह में उन्होंने यहां तक कहा कि मेरी कामना है कि हमारे देश की न्यायपालिका स्वतंत्र और निष्पक्ष बनी रहे। उनके इन शब्दों की केन्द्रीय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से आलोचना की। पूर्व में शायद ही कभी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के विचारों पर इस तरह की आलोचनात्मक टिप्पणी की गई हो।
चुनाव के संबंध में जो निर्णय सर्वोच्च न्यायालय ने दिया है उसे पूरी तरह से लागू करना अत्यधिक कठिन काम होगा। पूर्व में देखा गया है कि न्यायपालिका के अनेक ऐतिहासिक निर्णयों का क्रियान्वयन ईमानदारी ने नहीं हो पाता है। इस तरह के निर्णयों का ईमानदारी से क्रियान्वयन उसी समय संभव होगा जब जनचेतना जागृत की जाए और इस तरह के सभी संगठनों को जिनकी धर्मनिरपेक्षता पर आस्था है इस तरह की जनचेतना उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि अभी भी देश में ऐसे लोग हैं जो अत्यधिक आपत्तिजनक बातें सार्वजनिक रूप से कहते हैं। जैसे संघ परिवार और शिवसेना से जुड़े अनेक नेता सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि यदि उनका बस चले तो वे अल्पसंख्यकों के मताधिकार को समाप्त कर दें। इस तरह की भाषा भी हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को कमजोर करने वाली है। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से इस तरह की बातें करना भी आपत्तिजनक और भ्रष्ट आचरण समझा जाएगा। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट कर दिया है कि धर्म, जाति और भाषा का उपयोग सार्वजनिक जीवन में नहीं किया जाना चाहिए, वह व्यक्ति तक ही सीमित रहना चाहिए। इसलिए इस बात की आवश्यकता है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को अमलीजामा पहनाने के लिए उन सब लोगों को एकजुट हो जाना चाहिए जो चाहते हैं कि हमारे देश के लोकतंत्र का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप कायम रहे।
यह  सभी को ज्ञात है कि केन्द्र में जिस राजनीतिक दल की सरकार है उसका वैचारिक संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा हमारे देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की है। यदि हिन्दू राष्ट्र बनाने के प्रयासों को शिकस्त देना है तो सारे देश को सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के समर्थन में खड़े हो जाना चाहिए और उसे लागू करवाने में एकजुट होकर प्रयास करना चाहिए।
 एल.एस. हरदेनिया

रविवार, 15 जनवरी 2017

टॉकिंग पेन के साथ तैयार होता भविष्य

संसाधन केंद्र-केरल द्वारा विकसित टॉकिंग पेन जेएसएस के विद्या कार्यक्रम का हिस्सा है, जो जिले के अनुसूचित जाति के लोगों के लिए एक व्यापक विकास परियोजना है। साक्षरता कार्यक्रमों के लिए मोबाइल कंप्यूटर लैब, एलसीडी प्रोजेक्टर्स सहित कई उन्नत प्रौद्योगिकी टूल्स इस्तेमाल किए जाते हैं। जनजातीय भाषा पनिया सहित हिंदी, अंग्रेजी, मलयालम और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में दिशा-निर्देशों की पेशकश की जाती है। किताबों को समुदायल की स्थानीय भाषा में लिखा गया है और ब्रेललिपि में भी उपलब्ध है। ब्रेली लिटरेसी सामग्री राज्य संसाधन केंद्र-केरल और केरल राज्य साक्षरता मिशन के सहयोग से जेएसएस द्वारा विकसित की गई है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 341 नेत्रहीन लाभार्थियों को ब्रेललिपि साक्षरता के साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए गए हैं।
चैरियालग्राम पंचायत में पलक्कयम कॉलोनी की 80 वर्षीय आदिवासी महिला मनियम्मा को अपने साक्षर बनने के प्रयास में किताबों और स्लेट के साथ जूझना पड़ता था। लेकिन एक ‘टॉकिंग पेन’ जो लिखे गए विवरण की आवाज पैदा करता है, से उनके और आसपास के कई लोगों के लिए काम आसान हो गया है। उन लोगों के लिए इलेक्ट्रॉनिक पेन से अल्फाबेट्स और शब्दों के गाने सुनकर और सीखना आसान हो गया है। मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा प्रायोजित एक एनजीओ के जन शिक्षण संस्थान, मलाप्पुरम में मनियम्मा सहित क्षेत्र के 320 जनजातीय लोग पढऩे के लिए जाते हैं और अक्षर व शिक्षा लेते हैं। वे यहां न सिर्फ अक्षर ज्ञान लेते हैं, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता, बुरी आदतों, वित्तीय साक्षरता और कौशल विकास कार्यक्रमों से जुड़े सबक लेते हैं। यह टॉकिंग पेन है और साक्षरता तथा कौशल विकास कार्यक्रमों की दिशा में किए जा रहे प्रयासों से जन शिक्षण संस्थान (जेएसएस), मलाप्पुरम को यूनेस्को कनफ्यूसियस प्राइज फॉर लिटरेसी, 2016 हासिल करने में खासी मदद मिली।
यूनेस्को द्वारा हर साल साक्षरता के लिए दिया जाने वाला कन्यूसियस प्राइज एक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार है, जिसके माध्यम से दुनिया में साक्षरता के क्षेत्र में किए जाने वाले उत्कृष्ट और प्रेरणादायी प्रयासों को सम्मान दिया जाता है। मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने जेएसएस चेयरमैन और राज्यसभा एमपी अब्दुल वहाब व जेएसएस निदेशक वी उमरकोया के साथ पेरिस में बीते महीने एक कार्यक्रम के दौरान यूनेस्को की महानिदेशक इरीना बोकोवा के हाथों यह पुरस्कार ग्रहण किया। यह चौथी बार है जब भारत के किसी संगठन को यह पुरस्कार मिला है। जेएसएस मलाप्पुरम को मिला यह पुरस्कार पहला नहीं है। संगठन को भारत सरकार के साक्षर भारत पुरस्कार (2014) जैसे कई पुरस्कार मिल चुके हैं।
 

समान मौके देने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण

भले ही केरल देश में सबसे ज्यादा साक्षरता वाला राज्य है, लेकिन इस सफलता का लाभ पारंपरिक तौर पर वंचित समूहों जैसे महिलाओं, अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जनजातियों और प्रवासियों को नहीं मिल पाता है, जो अक्सर वित्तीय तौर पर कमजोर और सीमांत समुदाय होते हैं। जेएसएस जैसे एनजीओ इसी बदलाव की दिशा में काम कर रहे हैं। जेएसएस मलाप्पुरम नव-साक्षर को अनौपचारिक शिक्षा देता है और साक्षर बनने के इच्छुक वयस्कों को विभिन्न व्यावसायिक कौशल का प्रशिक्षण देता है। संगठन लोगों को काम तलाशने या उद्यम शुरू करने में भी लाभार्थियों की मदद करता है। अभी तक 41000 महिलाओं सहित 53000 लोगों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।
राज्य संसाधन केंद्र-केरल द्वारा विकसित टॉकिंग पेन जेएसएस के विद्या कार्यक्रम का हिस्सा है, जो जिले के अनुसूचित जाति के लोगों के लिए एक व्यापक विकास परियोजना है। साक्षरता कार्यक्रमों के लिए मोबाइल कंप्यूटर लैब, एलसीडी प्रोजेक्टर्स सहित कई उन्नत प्रौद्योगिकी टूल्स इस्तेमाल किए जाते हैं। जनजातीय भाषा पनिया सहित हिंदी, अंग्रेजी, मलयालम और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में दिशा-निर्देशों की पेशकश की जाती है। किताबों को समुदायल की स्थानीय भाषा में लिखा गया है और ब्रेललिपि में भी उपलब्ध है। ब्रेली लिटरेसी सामग्री राज्य संसाधन केंद्र-केरल और केरल राज्य साक्षरता मिशन के सहयोग से जेएसएस द्वारा विकसित की गई है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 341 नेत्रहीन लाभार्थियों को ब्रेललिपि साक्षरता के साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए गए हैं।
 

उल्लासम से उन्नति: टिकाऊ विकास के लिए सिलाई परियोजनाएं

जेएसएस मलाप्पुरम में ऐसे कई व्यावसायिक प्रशिक्षण कोर्स हैं, जिनका उद्देश्य सीमांत लोगों के लिए टिकाऊ और भागीदारी पूर्ण विकास है। ऐसी ही परियोजनाओं में उल्लासम (खुश रहकर काम) शामिल है, यह ऐसा उपक्रम है जो पांच दिन तक काम की पेशकश करता है जिसमें एक दिन योग और ध्यान के लिए है। इसके लिए विधवाओं, 40 साल से ज्यादा उम्र की अविवाहित महिलाओं और तलाकशुदा महिलाओं में से विशेष रूप से 250 लाभार्थियों का चयन किया गया है। इस योजना के अंतर्गत कपड़े के बैग, बच्चों के बिस्तर, शॉपर्स, मच्छरदानी आदि बनाए जाते हैं। इस स्कीम के लाभार्थी इस कार्यक्रम के माध्यम से 5000-10000 रुपए महीने कमा रहे हैं। इस योजना के दौरान योग और ध्यान से तनाव कम करने में मदद मिलती है। ‘स्पर्शम’ विभिन्न सक्षम लाभार्थियों के विकास के लिए तैयार एक अन्य नवीन परियोजना है।
‘इनसाइट’ (अंतर्दृष्टि) जेएसएस मलाप्पुरम द्वारा केरल फेडरेशन ऑफ ब्लाइंड के सहयोग से शुरू किया गया विशेष कार्यक्रम है। ग्रामीण आबादी में सब्जियों के उत्पादन में आत्म निर्भर बनाने के लिए जेएसएस ने ‘दालम’ परियोजना की शुरुआत की थी। जेएसएस परिवार के सदस्य अपने घरों के अहाते में सब्जियां पैदा करते हैं और सब्जियों के पौधों का वितरण करते हैं। जेएसएस ने ऐसे मरीजों की क्षमता बढ़ाने के लिए पेन एंड पैलिएटिव सोसाइटी के सहयोग से एक अन्य कार्यक्रम ‘रिलीफ’ (राहत) शुरू किया है, जो लकवा और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं।
जेएसएस ने आदिवासी युवाओं को मदद करने के लिए सरकारी एजेंसियों के सहयोग से विशेष कार्यक्रम कॉम्प्रिहेंसिव रिस्पॉन्सिबल डेवलपमेंट थ्रू एजुकेशन एंड स्किल ट्रेनिंग (सीआरडीईएसटी) डिजाइन किया। इस परियोजना के माध्यम से सौ युवाओं की पहचान की गई है। इस योजना के तहत युवाओं को विभिन्न विषयों में एक सप्ताह की आवासीय कोचिंग प्रदान की जाती है।
बिपिन एस. नाथ 
( लेखक पत्र सूचना कार्यालय, कोच्चि में सूचना सहायक हैं। )

बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

एक सियार का दर्द


जैसा कि रोज का नियम था आज सुबह भी मैं घूमने निकला तो मुख्या सड़क छोड़कर पगडंडियों कि तरफ निकल गया. सुबह कि ताज़ी खुशगवार हवा का आनंद लेते हुए कुछ कदम ही चला था कि अचानक एक सियार से मेरा साक्षात हो गया, कुछ पल के लिए तो मैं भयभीत सा हो गया क्योंकि मैने सुन रखा था कि दो-चार सियार एक साथ मिलकर एक अकेले आदमी का तीया-पांचा कर सकते हैं, तो कुच्छ पल के लिए मैं घबराया मगर एक बात ने मुझे काफी राहत पहुंचाई, वह यह कि सियार बिलकुल अकेला था.
कुछ पल तो हम दोनों एक-दूसरे को देखते ही रह गए. मेरी तन्द्रा सियार ने ही भंग की. पहले तो उसने इधर-उधर निगाह दौड़ाई फिर उत्सुकतावश मेरी तरफ देखने लगा. उसकी भाव-भंगिमा से ऐसा आभास हो रहा था मानो वह अपनी व्यथा-कथा मुझे सुनाना चाहता हो.
होता आमतौर पर यह था कि सियार पहले भी मुझे आते-जाते कहीं ना कहीं मिलते थे पर ऐसा पहली बार हो रहा था कि सियार मेरे सामने जरा भी डरे या विचलित हुए उत्सुक नजरों से देखता खड़ा था.

अब मेरे मन में भी उत्सुकता पैदा हुई कि पहले तो सियार सामना होते ही डरकर अगल-बगल हो जाया करते थे पर इस सियार को आज यह क्या हो गया है कि मुझसे किनारा करने कए बजाय मुझसे कुछ कहने को उत्सुक दिख रहा है. मैंने मन ही मन सोचा कि चलो देखा जाए बात क्या है.
मै सियार कि तरफ बढ़ा. सियार जैसे अचानक नींद से जगा हो, मुझे अपनी तरफ बढ़ते देख वह घबराया और अपनी आदत के मुताबिक भागने कि मुद्रा बनाता दिखा तो मैंने उसे रोकते हुए कहा “अरे सियार भाई जरा रुको तो सही मुझे तुमसे कुछ बात करनी है. यह सुनकर सियार जरा ठिठका लेकिन फिर भागते हुए बोला
“नहीं आदमी भाई मैं आपसे बात नहीं कर सकता क्योंकि मेरी जान को खतरा हो सकता है".
 मैंने विस्मित होते हुए पूछा कि
“क्यों भाई तुम्हारी जान को किससे खतरा हो सकता है"
यह सुनकर सियार बोला
“मुझे आदमियों से ही खतरा है और चूंकि तुम भी एक आदमी ही हो इसलिए मैं कह सकता हूँ कि मुझे तुमसे भी खतरा है!"
 मुझे तो अभी तक मालूम ही नहीं था कि सियारों को आदमी से भी कोई खतरा हो सकता है! इसलिए मैनें सियार से पूछा कि
“हम आदमियों से तुम्हें क्या खतरा है? जरा खुलकर बताओ! फ़िलहाल मैं तुम्हें आश्वस्त करता हूँ कि तुम्हे मुझसे कोई खतरा नहीं है इसलिए जरा रुको और बताओ कि तुम्हारी परेशानी क्या है?"
 "और मुझे यह भी लग रहा है कि तुम मुझसे कुछ कहना चाहते थे! तो सारी बातें खुलकर कहो."
मेरी तरफ से ऐसा आश्वासन पाकर सियार कुछ आश्वस्त होता नजर आया. वह मेरे थोडा और नजदीक आकर रुक गया, फिर एक गहरी सांस लेकर बोला,
"क्या बताऊँ! कुछ समझ ही नहीं आता कि तुमसे क्या कहूं?" सियार कि बातें सुनकर मुझे लगा कि जरूर यह अपनी कोई पीड़ा या दुःख मुझे बताना चाहता है पर शायद मुझ पर विश्वास नहीं कर पा रहा है फिर भी मैंने कहा कि
"तुम मुझे अक्सर इन पगडंडियों में मिलते रहे हो और मेरा सामना न करके इधर-उधर हो जाते थे. फिर आज क्यूँ खड़े रहे और मुझे ऐसा क्यों लगा कि तुम मुझसे कुछ कहना चाहते हो!"
मेरी बात सुनकर सियार कुछ सोचता हुआ बोला
“हाँ आदमी भाई, मै सचमुच तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ और मैं सिर्फ तुमसे ही कहना चाहता हूँ क्योंकि मैं बहुत दिनों से तुम्हें देखकर महसूस कर रहा था कि तुम दयावान और प्रकृतिप्रेमी लगते हो इसलिए आज तुमसे बात करने कि हिम्मत जुटा पाया हूँ वरना हमारे सियार समाज में तो मनुष्यों से दूर ही रहने कि हिदायत दी हुई है"

सियार कि बातें सुनकर मैनें कहा
“सियार भाई, तुम मुझे ठीक समझ रहे हो अतः तुम मुझ पर विश्वास करके अपनी व्यथा-कथा कह सकते हो"
तब सियार ने कहना शुरू किया
“आदमी भाई, बुरा मत मानना! क्योंकि मैं जो कुछ कहने जा रहा हूँ वह तुम्हारी मानव बिरादरी के खिलाफ ही है. तुम मुझे भले आदमी लगे इसलिए तुमसे कहने की हिम्मत जुटा पाया हूँ"
मैने कहा
“खुलकर कहो, तुम्हे डरने की कोई जरूरत नहीं है"
 सियार ने कहा
“तुम्हें भी मालुम होगा कि हम सियार लोग तुम इंसानों की बस्ती के आस-पास भी रहना पसंद करते हैं और तुम्हें मालूम हो न हो मगर हमने तुम लोगों को कभी भी नुकसान नहीं पहुंचाया है, हाँ फायदा जरूर पहुंचाया है. तुम इंसानों की बस्ती के आस-पास जो भी गन्दगी रहती है उसे साफ़ करने में कुछ हद तक हम तुम्हारी मदद ही करते हैं फिर भी तुम आदमी लोग हमें कोई फायदा तो पहुंचा नहीं सकते उलटे हमारा ही सफाया करने पर तुले हुए हो. सियार कि बात सुनकर मैनें कहा कि तुम ऐसा कैसे कह सकते हो कि हम तुम्हारा सफाया करने में लगे हुए हैं? बताओ! क्या तुम्हें कोई आदमी मरना चाहता है या अभी तक किसी को मारा है? सियार ने कहा, नहीं ऐसी बात नहीं है, प्रत्यक्षतः तो ऐसा कुछ भी नहीं है पर अप्रत्यक्ष रूप से तुम आदमी लोग हम वन्य जीवों का बहुत नुकसान कर रहे हो. सबसे पहले तो तुम हमारे निवास स्थान जंगलों को ही काट-काट कर ख़त्म कर रहे हो जिससे हमारे रहने के लिए कोई सुरक्षित स्थान ही नहीं बच रहा है जहाँ पर हम स्वतंत्र रूप से विचर सकें. इसके बाद दूसरी सबसे बड़ी गलती तुम लोगों ने की है वह ए है कि सारे वातावरण में तुमने जहर घोल दिया है. जिन फैक्ट्रियों, कारखानों को तुम विकास का नाम दे रहे हो वाही हमारे विनाश का कारण बन रहे हैं. तुमने खेतों में उर्वरक और कीटनाशक रुपी जहर फैला दिया है जिसके दुष्प्रभाव से हम लोगों का जीवन बहुत कठिन होता जा रहा है और हमारी सियार जाति सहित कई और वन्य प्राणियों के विलुप्त हो जाने का खतरा पैदा हो गया है. यही सब बातें कहने के लिए मैं काफी दिनों से बेचैन था मगर कोई भला आदमी ना मिलने कि वजह से किसी से कुछ न कह सका. तुमको देखकर पता नहीं ऐसा क्यों लगा कि तुमसे ये सब बातें कही जा सकती हैं.  इसलिए हे भले आदमी, हमारी विनती सुनो और हमें ख़त्म होने से बचने में हमारी मदद करो इतना कहते-कहते ही सियार अचानक रूक गया और बोला “आदमी भाई कोई और आदमी तुम्हारे पीछे तरफ से आ रहा है इसलिए मैं चलता हूँ मगर हमारी समस्यायों पर ध्यान जरूर देना" यह कहकर सियार जंगल की तरफ निकल गया और मैं उसकी कही बातों के बारे में सोचता हुआ अपनी जगह पर ही खडा रह गया.
कृष्ण धर शर्मा

रेलवे स्टेशन


नारायण जी शासकीय स्कूल से हेडमास्टर की नौकरी से रिटायर होकर इसी छोटे से कस्बे राजनगर में बस गए थे क्योंकि उनके गाँव में पुश्तैनी संपत्ति के नाम पर मात्र एक कच्चा घर था जिसमें उनके दो भाई अपने बड़े परिवार के साथ रहते थे. उस मकान में अब और लोगों के रहने की वैसे भी गुंजाइश नहीं थी.
नारायण जी के पिताजी उत्तरप्रदेश के एक गाँव से बेहद ही गरीब परिवार से थे और भीख मांगकर गुजारा करते थे. बाद में उडीसा के किसी गाँव में उन्हें पुरोहित का काम मिल गया और गाँव वालों ने रहने के लिए एक कच्चा मकान भी दे दिया. पुरोहिती के काम से इन लोगों का गुजारा चल जाता था. नारायणजी तीन भाई और एक बहन थे जिनमे नारायणजी सबसे छोटे थे.
समय बीतता रहा. उस ज़माने में पढाई-लिखाई को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था और आर्थिक स्थित भी कुछ हद तक इसके लिए जिम्मेवार मानी जाती थी इसलिए नारायण जी के भाई-बहनों ने शासकीय स्कूल में चौथी-पांचवी तक पढ़ कर छोड़ दिया मगर नारायण जी की पढाई में विशेष रूचि को देखकर गाँव के ही एक धनाढ्य एवं सज्जन व्यक्ति ने उन्हें आगे पढ़ने में सहयोग किया और इस तरह से नारायणजी की पढाई जारी रही और उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अच्छे अंको से उत्तीर्ण कर ली. अब तक उनके बड़े भाइयों और बहन का भी शादी-ब्याह हो चुका था और उनके लिए भी रिश्ते आने शुरू हो गए थे मगर नारायणजी का कहना था कि अपने पैरों पर खड़े होने के बाद ही विवाह करना उचित होगा. उस समय मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करना ही बड़ी बात थी अतः उन्हें बड़े आराम से शासकीय शिक्षक की नौकरी मिल गई मगर उन्हें अध्यापन हेतु राजनगर जाना पडा जो वहां से सैकडों मील दूर था. नौकरी तो करनी ही थी इसलिए नारायणजी को वहीँ पर किराये का घर लेकर रहना पड़ा. विवाह न करने के लिए भी अब उनके पास कोई बहाना न था इसलिए जल्दी ही उनका विवाह कर दिया गया. नारायणजी अपने परिवार से मिलने कभी-कभार छुट्टियों में ही जा पाते थे क्योंकि उन दिनों आने-जाने के साधन भी बहुत कम हुआ करते थे. छोटे परिवार का महत्व नारायणजी को पता था इसलिए उन्होंने हम दो हमारे दो के नारे पर अमल किया. बड़ी बेटी थी और छोटा बेटा था. नारायणजी ने बच्चों की पढाई-लिखाई पर विशेष ध्यान दिया जिसके परिणाम स्वरूप उनकी बेटी आगे चलकर डाक्टर बन गई और एक बहुत ही संपन्न परिवार में उसका ब्याह हो गया. बेटा भी पढाई-लिखाई में ठीक ही था. कद-काठी ठीक-ठाक थी अतः वह भी पुलिस में भर्ती हो गया और ट्रेनिंग के बाद पोस्टिंग भी इसी कस्बे में मिल गई. बेटे का ब्याह भी पास के ही शहर में हो गया. नारायणजी भी प्रोन्नत होकर अब हेडमास्टर बन चुके थे और इसी वर्ष वह भी रिटायर हुए.
नारायणजी ने काफी पहले से राजनगर में ही बसने का मन बना लिया था क्योंकि यह छोटा सा क़स्बा हरियाली से भी भरपूर था और प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित था. राजनगर में रेलवे स्टेशन भी था जहाँ पर कई पैसेंजर गाड़ियाँ रूकती थीं और आगे चलकर बड़ा स्टेशन बनने की पूरी सम्भावना थी. रिटायर्मेंट में मिले रुपयों से उन्होंने एक तीन कमरों का एक बढ़िया मकान बनाया. मकान के लिए जमीन उन्होंने पहले ही ले रखी थी. नारायणजी के यहाँ अब तक एक पोते और एक पोती का जन्म हो चुका था. बहू का स्वाभाव थोड़ा चिडचिडा था मगर नारायणजी और उनकी धर्मपत्नी सज्जन स्वाभाव के होने की वजह से उसे भी झेल जाते थे. समय बीतता रहा. नारायणजी के पोते-पोती अब बड़े हो गए थे और स्कूल भी जाने लगे थे नारायणजी के यहाँ सब ठीक ही चल रहा था कि उनकी धर्मपत्नी का टीबी की बीमारी से अचानक ही देहांत हो गया जिसके बाद नारायणजी एकदम टूट से गए और काफी अकेलापन महसूस करने लगे. टी.वी., कम्यूटर और मोबाईल के ज़माने में बूढों के पास बैठने का समय आजकल किसके पास है. उन्हें तब और झटका लगा जब बेटे के स्वभाव में भी कुछ परिवर्तन आना शुरू हुआ जिसे नारायणजी ने यह सोचकर टाल दिया कि नौकरी की वजह से थकावट हो जाती होगी इसलिए थोडा चिडचिडा हो गया है मगर जब बच्चों का भी उनके कमरे में आना-जाना बंद हो गया तब उन्हें लगा कि यह सब जानबूझकर किया जा रहा है! हो सकता है पत्नी की मृत्यु टीबी की बीमारी की वजह से हुई है शायद इसलिए उन्हें छुआछूत का डर लगता हो!.

नारायणजी समय बिताने के लिए सुबह-शाम टहलने जाने लगे. सुबह तो पास के बागीचे में चले जाते थे जहाँ पर लोगों की चहल-पहल देखकर ही समय कट जाता था और शाम के समय रेलवे स्टेशन जाने लगे जहाँ पर आठ-दस बूढ़े लोग एकत्रित होकर अपना सुख-दुःख साझा करते थे. बूढों की इस गोष्ठी में ग्राम पंचायत से लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा तक और नुक्कड़ नाटक से लेकर हालीवुड फिल्मों तक की समीक्षा होती थी कई छोटी-बड़ी असहमतियों के बावजूद डेढ़-दो घंटे की गोष्ठी आख़िरकार आपसी संधि पर आकर ख़त्म होती थी और अगले दिन मिलने के वादे के साथ गोष्ठी का समापन होता था.

एक दिन दोपहर के बाद नारायण जी काफी उदास और अकेलापन महसूस कर रहे थे तो उन्होंने सोचा क्यों न बच्चों के कमरे में चलकर बच्चों से कुछ बातें की जाएँ. वह बच्चों के कमरे में पहुंचे तो किताबें फैलाकर पढने का बहाना किये बच्चे मोबाईल पर गेम खेल रहे थे. दादाजी के अनपेक्षित आगमन पर बच्चे अचानक हडबड़ा गए और मोबाईल छुपाने लगे तो नारायण जी हँसते हुए कहने लगे
“तुम लोग पढने के बजाय मोबाईल पर गेम खेलते हो! मैनें तो देख लिया है अब छुपाने से भला क्या फायदा!”.
बच्चे एकदम से घबरा गए तभी बहू भी कमरे में आ गई और पूछने लगी
“क्या हो रहा है यहाँ पर?”.
नारायण जी कुछ कह पाते उसके पहले ही बच्चे बोल पड़े
“हम लोग तो चुपचाप पढाई कर रहे थे दादाजी ही आकर हमें डिस्टर्ब कर रहे हैं.”
नारायणजी कुछ सफाई दे पाते इसके पहले ही बहु शुरू हो गई “आपसे अपने कमरे में नहीं रहा जाता क्या? बच्चों को क्यों परेशान कर रहे हैं.”
नारायणजी का संयोग इतना ख़राब था की उसी समय उनका बेटा भी ड्यूटी से घर आ गया था और शोर-शराबा सुनकर वह भी पत्नी की बातों में आकर नारायणजी को भला-बुरा कहने लगा.
नारायणजी को इतना सब सुनने के बाद कुछ भी न सूझा तो वह अपने कमरे में आकर निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़े. क्या-क्या सपने नहीं देखे थे उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर. हमारे दो ही तो बच्चे हैं, बेटी तो शादी के बाद अपने घर चली जाएगी और हमारा बेटा इतना संस्कारी है की लोगबाग भी इसकी तारीफ़ करते नहीं थकते, कहते हैं कि नारायणजी आपने अपने बच्चों को इतनी अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए हैं. आपका बुढ़ापा तो अच्छे से कटेगा. बच्चों की तारीफ सुनकर नारायणजी गदगद हो जाते और एक सुन्दर और सुखद भविष्य (बुढ़ापे) की तस्वीर उनकी आँखों के सामने आकार लेने लगती. आज नारायणजी की आँखों में आंसू थे और मन बहुत भारी हो चुका था. उन्होंने घडी की तरफ देखा मगर अभी शाम होने में काफी समय था फिर भी उन्होंने अपने आंसू पोछे और छड़ी उठाकर रेलवे स्टेशन की तरफ चल पड़े.
 कृष्ण धर शर्मा

गंदे बालों वाली लड़की

महीनों तक सुबह की सैर के दौरान नियमित रूप से रोज अपने समय पर दिख जाने वाली उस गंदे और मैले-कुचैले कपडे पहने हाथ में प्लास्टिक की बोरी लिये कचरा बीनती हुई लड़की से आज बात करने की हिम्मत आखिरकार जुटाकर उसके पास पहुंचकर रुका ही था की अचानक मुझे अपने सामने पा कर वह गंदे बालों वाली लड़की घबरा सी गई और इधर-उधर देखने लगी. उसकी घबराहट देखकर थोड़ी देर के लिए तो मैं भी घबरा गया मगर फिर थोडा संयत होकर मैंने उसे आश्वासन देते हुए कहा “घबराओ मत, अगर तुम्हें परेशानी न हो तो मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ!” मेरी बात सुनकर उसने जैसे पीछा छुड़ाने की नीयत से कहा “मुझे कुछ भी नहीं मालुम साहब” और मुड़कर जाने को हुई तब मैंने उसे फिर टोका “मुझे गलत मत समझो मैं एक शरीफ इंसान हूँ”. “तुम्हें महीनों से देख रहा हूँ और तुम्हारे बारे में मेरे मन में कई सवाल आ रहे हैं जिनका जवाब सिर्फ तुम्ही दे सकती हो, अगर तुम्हें कोई विशेष परेशानी न हो तो!”.
मेरी बात सुनकर वह ज़रा ठिठकी और बोली “मुझे देखकर तो लोग नाक-भौं सिकोड़कर निकल जाते हैं और आप कह रहे हैं कि मुझे देखकर आप के मन में कुछ सवाल आते हैं! मैं भी जानना चाहूंगी कि  मुझे देखकर आपके मन में क्या सवाल आते हैं?” उसकी ऐसी सपाट बातें सुनकर मैं सकपका गया फिर थोडा सम्हलकर बोला “मेरा कोई भी ऐसा मतलब नहीं था जो कि तुम्हें गलत लगे, मैं तो बस इतना जानना चाह रहा था कि तुम्हें तो और भी कई काम मिल सकते हैं फिर तुम यह कचरा बीनने का काम ही क्यों कर रही हो? क्या तुम्हारा मन नहीं होता कि तुम भी अच्छे कपडे पहनो, साफ-सफाई से रहो!”.
“ख़ुशी से कौन करता है यह सब साहब?”
“तब फिर क्यों करती हो यह सब!”.
“मजबूरी में करना पड़ता है”.
इस काम को करने की भी मजबूरी हो सकती है क्या!”.
“आप ठीक कहते हैं साहब, काम तो मुझे बहुत मिल जायेगा मगर इस काम में मैं अपने को सुरक्षित महसूस करती हूँ”.
“क्या बात कर रही हो! तुम अपने को इतना असुरक्षित क्यों महसूस करती हो? और कौन-कौन हैं तुम्हारे परिवार में?”.
“मैं और मेरी माँ बस इतना ही है मेरा परिवार”.
“तुम्हारे पिता!”.
“लगता है आप मेरी पूरी कहानी सुनना चाहते हैं!”.
मैंने थोडा असहज होते हुए कहा “ऐसी बात नहीं है फिर भी तुम अपनी कहानी मुझे बता सको और मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूँ तो मुझे अच्छा लगेगा”.
“मेरी मदद आप क्या कर पाएंगे! फिर भी मैं सुनाती हूँ आपको अपनी कहानी”.
एक गहरी सांस लेकर उदासी भरे शब्दों में उसने कहना शुरू किया “हम लोग उड़ीसा के रहने वाले हैं. मेरे पिता पहले तो मजदूरी करते थे फिर बाद में ठेकेदारी करने लगे. मेरी बड़ी बहन और मैं हम दोनों ही माँ –बाप के दुलारे थे. हमारे पिता भी हमें बेटों से कम नहीं समझते थे और हमें इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाते थे. हम लोगों का अपना घर नहीं था हम किराये से रहते थे. पिताजी इतना कमा लेते थे जिससे हमारा गुजारा आसानी से हो जाता था. मेरी बड़ी बहन १०वी और मैं १२वी में पढ़ रहे थे, सब ठीक-ठाक  चल रहा था कि अचानक एक दिन घर में खबर आई की पिताजी की हत्या हो गई है. हमारे ऊपर तो जैसे दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा यह खबर सुनकर. इस स्थिति की तो कल्पना तक नहीं की थी किसी ने भी. पुलिस की खोजबीन में पता चला कि किसी अन्य ठेकेदार से पिताजी का मामूली विवाद था जिसके कारण उस ठेकेदार ने पिताजी की हत्या करवा दी. वह ठेकेदार पकड़ा भी गया मगर पुलिस की लापरवाही और सबूतों के अभाव में उसे छोड़ भी दिया गया. उस ठेकेदार की बुरी नजर मेरी बड़ी बहन पर पड़ चुकी थी और जेल से छूट जाने के कारण उसका हौसला भी काफी बढ़ चुका था अब वह हमारे घर पर आकर हमें परेशान करने लगा. हमारा घर के बाहर निकलना मुश्किल हो गया था. एक दिन दीदी ने हिम्मत की और थाने पहुँच गई ठेकेदार के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने. रिपोर्ट तो क्या लिखते पुलिसवाले उलटे उन्होंने ठेकेदार को ही थाने बुलवा लिया और फिर ठेकेदार और कुछ पुलिसवालों ने दीदी के साथ बलात्कार किया और बेहोशी की हालत में सड़क के किनारे फेक कर चले गए. होश आने पर दीदी किसी तरह रोती-बिलखती हुई रात में घर पहुंची. अगले दिन सुबह जब हम मोहल्ले के नेता को लेकर फिर थाने पहुंचे तो हमें धमकाया गया कि हम किसी के सामने अपनी जबान न खोलें वरना अंजाम ठीक नहीं होगा चुप रहने में ही तुम लोगों की भलाई है. मगर दीदी चुप रहने वालों में से नहीं थी वह थाने के सामने ही धरने पर बैठ गई. शाम होते-होते दीदी को पुलिसवालों से मारपीट और दुर्व्यवहार करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और हवालात में डाल दिया गया. अगले दिन कोर्ट से जमानत का आदेश लेकर हम थाने पहुंचे तब तक काफी देर हो चुकी थी, इतनी बेइज्जती और जुल्म दीदी बर्दाश्त नहीं कर पाई थी और दुपट्टे से अपना गला घोट कर उसने अपनी जान दे दी थी. इस पूरी घटना के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई सिर्फ दो पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया गया और पूरा मामला दबा दिया गया.

अब ठेकेदार और पुलिसवाले हमारे घर आकर हमें परेशान करने लगे कि तुम लोग भी अपना मुह बंद रखना नहीं तो तुम्हारा भी यही अंजाम होगा. अपने पति और एक बेटी को खो चुकी मेरी माँ ठेकेदार की मुझ पर गन्दी नजर को पहचान गई थीं और उन्होंने एक बेहद ही कठोर फैसला लिया कि अब हम इस शहर को छोड़ देंगे. मैं अपना शहर छोड़ना नहीं चाहती थी मगर माँ की चिंता भी सही थी इसलिए हमें अपने शहर को छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा. घर से कुछ सामान समेटकर रात में हमने बिना किसी को बताये घर छोड़ दिया और रेलवे स्टेशन पहुंचे जहाँ रायपुर जाने वाली ट्रेन खड़ी थी हम उसमें बैठ गए और अगले दिन रायपुर पहुँच गए. स्टेशन से बाहर निकलकर तो हमें कुछ सूझ ही नहीं रहा था की हम कहाँ जाएँ और क्या करें, इस शहर में हमारा अपना कोई भी नहीं था जो कि हमें शरण दे सके या हमारी कोई मदद कर सके. पूरा दिन इसी उधेड़बुन में गुजर गया और रात हो गई. मजबूरन रात हमें स्टेशन के बाहर ही गुजारनी पड़ी मगर यहाँ पर भी कई जोड़ी हैवानी नजरें हमें रात भर घूरती रहीं. हम काफी निराश हो चुके थे कि स्टेशन में भीख मांगनेवाली एक बूढी माँ ने हमारी तकलीफ देखी और हमें सहारा दिया.वह हमें अपनी झोपडी में लेकर गई, हमें खाना खिलाया, आराम करने को कहा, हमारी दुखभरी कहानी  सुनी और हमें सांत्वना देते हुए कहा कि “तुम लोग घबराओ मत, मैं यहाँ अकेले ही रहती हूँ अब तुम लोग यहीं पर रहो.

हम तो ऐसा महसूस कर रहे थे जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो. अगले दिन मेरी माँ ने बूढ़ी माँ से कहा कि “मुझे भी कुछ काम करना चाहिए आखिर कब तक खाली बैठी रहूंगी!”. बूढी माँ ने कहा कि मैं तो रेलवे स्टेशन में भीख मांगकर अपना गुजारा करती हूँ तुमको भी यही करना हो तो मेरे साथ चल सकती हो या फिर ये काम पसंद न हो किसी के यहाँ झाड़ू-पोछा और बर्तन मांजने का काम भी मिल सकता है. “नहीं मेरी माँ यह सब नहीं करेगी” मैंने बीच में टोकते हुए कहा. “मैं इंग्लिश स्कूल में  दसवीं तक पढ़ी हूँ, मैं ट्यूशन पढ़ा कर गुजारा कर लूंगी”.  बूढी माँ थोड़ी सी दर्द भरी मुस्कराहट के साथ बोली “मेरे कहने का मतलब ये नहीं था बेटी कि तुम्हारी माँ भीख मांगे या किसी दुसरे के यहाँ झाड़ू-पोछा का काम करे. मैंने तो वही कहा जितनी मेरी सोच थी. तुम तो बहुत पढ़ी-लिखी हो बेटी जो करोगी ठीक ही करोगी” कहकर बूढी माँ चुप हो गई. मैं समझ गई थी कि बूढी माँ को मेरी बात का बुरा लगा था इसलिए मैंने बात को सम्हालते हुए कहा “नहीं माँ मेरा मतलब कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे आपको दुःख पहुंचे, मैं तो बस ये कहना चाह रही थी मेरी माँ की हालत अभी इतनी अच्छी नहीं है कि  वह कोई मेहनत का काम कर सकें, वैसे आपने अपने परिवार के बारे में कुछ नहीं बताया माँ?” मैंने बूढी माँ को थोडा कुरेदते हुए कहा. बूढी माँ ने कहा “मेरे पति तो १० साल पहले ही मुझे छोड़कर चले गए थे और दो बेटों में मुझे अपने पास रखने को लेकर आये दिन झगडा होता रहता था और मुझे भी दोनों बेटे और बहु ताने मरते थे की पिताजी के साथ ही तुम क्यों नहीं मर गई. इन बातों से मुझे काफी दुःख होता था. एक दिन मैंने फैसला किया कि मेरी वजह से मेरे बेटों के परिवार में अशांति रहे इससे अच्छा है कि मैं मर ही जाऊं. मैं घर से अपनी जान देने के लिए ही निकली थी, कई दिन तक भटकती रही मगर मरने की हिम्मत न जुटा पाई और भटकते-भटकते रेलवे स्टेशन पहुँच गई और इसी बस्ती की एक बुढ़िया के साथ भीख मांगने लगी. उस बुढ़िया ने यहीं पर मेरी भी झोपडी बनवा दी और फिर मैं यहीं की होकर रह गई.“आपके बेटों ने आपको ढूँढने की कोशिश नहीं की?”. “उनको क्या गरज पड़ी थी बेटी! वह तो मुझसे छुटकारा ही पाना चाहते थे.”
फिर मेरे कहने पर बूढी माँ मुझे कई बड़े घरों में लेकर गई मगर ट्यूशन पढ़ाने के लिए किसी को जरूरत न थी आजकल सब के बच्चे कोचिंग क्लास जाने लगे हैं. घरेलु कामकाज के लिए नौकरानी के रूप में रखने को कई लोग तैयार थे. कोई चारा न देख मैनें घरेलु नौकरानी का काम करना स्वीकार कर लिया. वहां पर मुझे झाड़ू-पोछा, बर्तन मांजना, साफ़-सफाई और कपडे धोने, प्रेस करने का काम करना पड़ता था. मुझे काम करते हुए १ महीने ही हुए थे कि एक दिन मैं काम पर पहुंची तो पता चला कि मालकिन घर में नहीं हैं वह एक दिन के लिए बाहर गई थी. मैं लौटने ही वाली थी कि मालिक ने कहा “कोई बात नहीं है तुम झाड़ू-पोछा कर दो और बर्तन धुल दो बाकी काम कल आकर कर लेना जब मालकिन आ जाएगी. अभी तक ऐसी कोई हरकत मालिक या मालकिन ने नहीं की थी जिससे मुझे किसी भी तरह की शंका हो इसलिए मैं भी संकोचवश मना न कर सकी और काम करने लगी. काम होने के बाद मालिक ने कहा “कल आफिस जाने के लिए मेरे पास प्रेस किये हुए कपडे नहीं है १ जोड़ी कपडे प्रेस कर दोगी क्या!” मैनें कपडे प्रेस कर दिए और जाने के लिए निकली तब तक वह किचन से चाय बनाकर लाया था और मेरे सामने खडा हो गया. उसने कहा तुम काम करके बहुत थक गई होगी थोड़ी सी चाय पी लो” मुझे मालिक की आँखों में कुछ अजीब सा दिखा और मैं घबरा कर बहार की तरफ जाने लगी तो उसने मेरा रास्ता रोक लिया अब मैं बुरी तरह से घबरा गई और चिल्लाने लगी. मुझे चिल्लाते देख मालिक के होश उड़ गए, चाय का कप फेंक कर उसने जल्दी से मेरा मुह दबाया और बोला “चिल्लाना बंद करो पागल लड़की. तुमको जाना है तो जाओ कहकर उसने दरवाजा खोल दिया और मैं वहां से भागती हुई आकर सीधे माँ की गोद में गिर पड़ी. माँ भी एकदम से घबरा गई और रोते हुए पूछने लगी “क्या हुआ बेटी? तेरे साथ क्या हो गया?”. माँ को रोते हुए देख मैंने अपने आपको सम्हाला और पूरी बात बताई कि भगवान की कृपा से मेरे साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ. मगर आगे भी कुछ गलत नहीं होगा इस बात की तसल्ली न माँ को थी न ही मुझे. रात में बूढी माँ के आने पर मैंने उन्हें जब पूरी बात बताई और मालिक के खिलाफ रिपोर्ट करने की बात कही तो बूढी माँ ने समझाते हुए कहा “किस-किस के खिलाफ रिपोर्ट करेगी बेटी! और तेरी रिपोर्ट लिखने वाले भी तो वैसे ही इंसान हैं न!.” अब मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ! फिर बूढी माँ ने कहा अगर तू बुरा ना माने तो एक काम है जिसे तू कर सकती है!”. “आप बताओ क्या काम है”. बूढी माँ ने कहा “बेटी हमारे मोहल्ले की कुछ लड़कियां कचरा बीनने जाती हैं, दिखने में जरूर थोडा गन्दा लगता है मगर बेटी आमदनी भी अच्छी हो जाती उसमें. और अपना हुलिया थोडा बिगाड़ ले, घर के बाहर गंदे और मैले-कुचैले कपडे पहना कर और वैसी ही दिखा कर, इससे लोगों की गन्दी निगाहों से भी बची रहेगी.”

पहले तो मैनें बूढी माँ को साफ़ मना कर दिया ये काम करने के लिए मगर १-२ दिन में मुझे समझ में आ गया कि घर खर्च के लिए रुपया कमाने के साथ-साथ अपनी इज्जत बचाना भी जरूरी है, माँ को मैं भीख मांगते या किसी के घर बर्तन मांजते नहीं देखना चाहती थी इसलिए मैंने कचरा बीनने का काम करना शुरू कर दिया. शुरू में तो मुझे अजीब लगता था मगर अब कुछ भी बुरा नहीं लगता. गन्दी नाली और बदबूदार कचरे के ढेर से अपने काम की चीज उठाने में कोई संकोच नहीं लगता और सबसे अच्छी बात यह है कि मेरे मैले-कुचैले कपडे और मेरी जानबूझकर गन्दी बनाई हुई शक्ल देखकर अब लोगों की आंखों में अजीब से भाव नहीं दिखते बल्कि मुझे देखकर लोग नाक-भौं सिकोड़ते जल्दी से आगे निकल जाते हैं.
“मैं अब चलती हूँ साहब मेरी माँ मेरा इन्तजार कर रही होगी.” उसकी आवाज सुनकर जैसे मैं नींद से जागा, अभी तक मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई फिल्म चल रही हो मेरे सामने. मैं भी उसे रोक न  पाया और उस गंदे बालों वाली लड़की को आँखों से ओझल होने तक देखता खडा रह गया. कृष्ण धर शर्मा 2014