1.
लौट आ ओ धार
टूट मत ओ साँझ के पत्थर
हृदय पर
(मैं
समय की एक लंबी आह
मौन लंबी आह)
लौट आ; ओ फूल की पंखड़ी
फिर
फूल में लग जा
चूमता है धूल का फूल
कोई, हाय।
2.
गोल हैं ख़ूब मगर
आप तिरछे नज़र आते हैं ज़रा।
आप पहने हुए हैं कुल आकाश
तारों-जड़ा;
सिर्फ़ मुँह खोले हुए हैं अपना
गोरा-चिट्टा
गोल-मटोल,
अपनी पोशाक को फैलाए हुए चारों सिम्त।
आप कुछ तिरछे नज़र आते हैं जाने कैसे
—ख़ूब
हैं गोकि!
वाह जी, वाह!
हमको बुद्ध ही निरा समझा है!
हम समझते ही नहीं जैसे कि
आपको बीमारी है :
आप घटते हैं तो घटते ही चले जाते हैं,
और बढ़ते हैं तो बस यानी कि
बढ़ते ही चले जाते हैं—
हम नहीं लेते हैं जब तक बि ल कु ल ही
गोल न हो जाएँ,
बिलकुल गोल।
यह मर्ज़ आपका अच्छा ही नहीं होने में...
आता है।
3.
काल,
तुझसे होड़ है मेरी ׃
अपराजित तू—
तुझमें अपराजित मैं वास करूँ।
इसीलिए तेरे हृदय में समा रहा हूँ
सीधा तीर-सा, जो रुका हुआ लगता हो—
कि जैसा ध्रुव नक्षत्र भी न लगे,
एक एकनिष्ठ, स्थिर, कालोपरि
भाव, भावोपरि
सुख, आनंदोपरि
सत्य, सत्यासत्योपरि
मैं—तेरे भी, ओ ‘काल’ ऊपर!
सौंदर्य यही तो है, जो तू नहीं है, ओ काल!
जो मैं हूँ—
मैं कि जिसमें सब कुछ है...
क्रांतियाँ, कम्यून,
कम्युनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैं।
मैं, जो
वह हरेक हूँ
जो, तुझसे, ओ काल, परे है।
समाज की बात samajkibaat
कृष्णधरशर्मा Krishnadharsharma
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