नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

जाति प्रथा का विनाश

जाति-व्‍यवस्‍था पर फिर से सवाल उठ रहे हैं। नए सिरे से मूल्‍यांकन हो रहा है। जाति-व्‍यवस्‍था को लेकर सबसे अधिक आरोपों का सामने करने वाली संस्‍था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने स्‍पष्‍ट तौर पर कहा है कि हिंदू जाति-व्यवस्था की दीवारों को ढहा दें। इस व्‍यवस्‍था पर सबसे अधिक सुगठित प्रहार डॉ. भीमराव आंबेडकर ने किया था। उन्‍होंने जाति व्‍यवस्‍था के दंश को झेला भी था। आंबेडकर ने जाति-पांत तोड़क मंडल के लाहौर अधिवेशन के लिए एक लिखित भाषण प्रस्‍तुत किया था। इस भाषण की काफी चर्चा हुई है। वास्‍तव में यह समरस समाज बनाने की दिशा में प्रकाशस्‍तंभ की तरह है।
मित्रों,
जात-पांत तोड़कर  मंडल के जिन सदस्‍यों ने कृपापूर्वक मुझे इस सम्‍मेलन का सभापति चुना है, मुझे चिंता है, उन लोगों से मेरे चुनाव के संबंध में अनेकों प्रश्‍न किए जाएंगे। उनसे पूछा जा सकता है, क्‍या लाहौर में कोई योग्‍य पुरूष नहीं था जो सभापति चुनने के लिए बंबई दौड़ गए। मैं हिंदू धर्म का आलोचक हूं, मैंने महात्‍मा जी के सिद्धांतों की भी, जिन पर हिंदुओं की श्रद्धा है, आलोचना की है, जिससे वे मुझे अपनी वाटिका का सर्प समझते हैं। मैं समझता हूं शायद राजनीतिक हिंदू भी मंडल से जवाब तलब करेंगे कि उसने इस आदरणीय पद के लिए मुझे चुनकर हिंदुओं का अपमान क्‍यों किया। सामान्‍य हिंदुओं को तो यह पसंद नहीं आएगा, क्‍योंकि सवर्ण हिंदुओं की सभा में संबोधन के लिए एक अंत्‍यज का चुना जाना शास्‍त्रीय मर्यादा को भंग करना है। अंत्‍यज कितना भी अनुभवी क्‍यों न हो, शास्‍त्र उसे ‘उपदेष्‍टा’ स्‍वीकार करने की आज्ञा नहीं दे सकते। शास्‍त्रानुसार ब्राह्मण ही तीनों वर्णों का उपदेष्‍टा और गुरु है। हिंदू-राज्‍य के संस्‍थापक शिवाजी के गुरु संत रामदास जी ने अपने मराठी ग्रंथ ‘दासबोध’ में हिंदुओं से प्रश्‍न किया है कि क्‍या तुम किसी अंत्‍यज को, जो तुम्‍हारे सभी प्रश्‍नों का उत्तर दे सकता है, अपना गुरु स्‍वीकार कर सकते हो। यही प्रश्‍न यदि मैं करूं, तो मंडल के पास इसका क्‍या उत्तर होगा। उस कारण को तो मंडल ही जानता है, जिसने उसे बंबई भेजा और जिसने उसे मेरे जैसे व्‍यक्ति को, जो हिंदू धर्म का इतना विरोधी और अंत्‍यज है, मर्यादा के विरुद्ध सवर्ण हिंदुओं को संबोधन करने के लिए सभापति चुना।
अपने संबंध में, मैं आपसे यह कहने की अनुमति चाहता हूं कि मैंने आपके निमंत्रण को अपनी एवं अपने अछूत साथियों की इच्‍छा से स्‍वीकार नहीं किया। मैं जानता हूं, हिंदू मुझसे और मेरे भाइयों से घृणा करते हैं, इसलिए मैंने सदा अपने को उनसे अलग रखा और अपने विचारों का प्रकाश अपने प्‍लेटफार्म पर करता रहा। हिंदुओं के प्‍लेटफार्म पर अपनी बातें सुनाकर अपने को उनके ऊपर रखने की मैंने कभी इच्‍छा नहीं की। यहां भी मैं अपनी इच्‍छा से नहीं, आपके चुनाव से आया हूं। मैंने इससे इनकार करना इसलिए उचित नहीं समझा, क्‍योंकि मुझे बताया गया कि इस सम्‍मेलन का उद्देश्‍य सामाजिक सुधार है, और समाज सुधार एक ऐसा विषय है जिससे मुझे मोह है- विशेषत: उस दशा में, जबकि आप समझते हों कि इस काम से मैं आपकी कुछ सहायता कर सकता हूं, उस समस्‍या के हल के लिए आप कहां तक ग्रहण कर सकेंगे।
इस प्राक्‍कथन के साथ अब मैं मुख्‍य विषय पर अपने विचार आपके सामने रखने की अनुमति चाहता हूं।
कांग्रेस और समाज सुधार
भारत में समाज सुधार का काम निर्वाण-प्राप्ति के मार्ग के समान अनेक कठिनाइयों से पूर्ण हैं। कारण, भारत में समाज सुधार के मित्र थोड़े और शत्रु बहुत अधिक हैं। इंडियन नेशनल कांग्रेस देश की बहुत बड़ी संस्‍था है, किंतु समाज सुधार के साथ उसका व्‍यवहार कैसा रहा है, पहले इसी पर नजर डालिए।
पश्चिमी विद्वानों के संपर्क में जब यह देश आया, तो लोग मानने लगे कि कु‍रीतियों से आक्रांत हिंदू समाज में सामाजिक चेतना नहीं रही। अत: कुरीतियों को मिटाने का प्रयास निरंतर होना चाहिए। इस सत्‍य को स्‍वीकार कर लेने के कारण ही ‘कांग्रेस’ के जन्‍म के साथ, सोशल कान्‍फ्रेंस(समाज सुधार सम्‍मेलन) की भी नींव रखी गई। और कांग्रेस अधिवेशन के साथ ही, उसी पंडाल में ‘सोशल कान्‍फ्रेंस’ का भी अधिवेशन होने लगा। किंतु सामाजिक सुधार की चर्चा चलने पर जब हिंदू समाज व्‍यवस्‍था की तीव्र आलोचना होने लगी, तो यह बात ब्राह्मणों और कट्टर हिंदुओं को बर्दाश्‍त नहीं हुई और कांग्रेस के पूना अधिवेशन में, पूना के ब्राह्मणों के अनुरोध से, जब लोकमान्‍य बाल गंगाधर तिलक ने इसका विरोध किया, तो कांग्रेस ने ‘समाज सुधार सम्‍मेलन’ को अपना पंडाल नहीं दिया और सामाजिक सम्‍मेलन के प्रेमियों ने जब अपना पंडाल अलग बनाना चाहा, तो विरोधियों ने उसे जला डालने की धमकी दी। कांग्रेस के इलाहाबाद अधिवेशन के सभापति मि. डब्‍ल्‍यू. सी. बनर्जी ने ‘समाज सुधार सम्‍मेलन’ के विरुद्ध अपने भाषण में कहा-
‘’मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूं जो कहते हैं कि जब तक हम अपनी सामाजिक पद्धति में सुधार नहीं करते, तब तक हम राजनैतिक सुधार के योग्‍य नहीं हैं। मुझे इन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं दिखाई देता। क्‍या हम राजनैतिक सुधार के योग्‍य इसलिए नहीं हैं क्‍योंकि हमारी विधवाओं का पुनर्विवाह नहीं होता और हमारी लड़कियों की शादी कम उम्र में हो जाती है या हमारी पत्नियां और पुत्रियां हमारे साथ गाड़ी में बैठकर हमारे मित्रों से मिलने नहीं जाती। क्‍योंकि हम अपनी बेटियों को ऑक्‍सफोर्ड और कैम्ब्रिज में पढ़ने के लिए नहीं भेजते। (हर्षध्‍वनि)
मि. बनर्जी के इन आक्षेपों के पर्याप्‍त उत्तर हैं। उनसे पूछा जा सकता है, क्‍या आपको यह मालूम है कि हिंदू समाज व्‍यवस्‍था ने देश की पंचमांश जनसंख्‍या को ‘अछूत’ बना रखा है। पेशवाओं के शासनकाल में, महाराष्‍ट्र में, इन अछूतों को उस सड़क पर चलने की आज्ञा नहीं थी जिस पर कोई सवर्ण हिंदू चल रहा हो। इनके लिए आदेश था कि ये अपनी कलाई में या गले में काला धागा बांधें, ताकि हिंदू इन्‍हें भूल से छू न लें। पेशवाओं की राजधानी पूना में तो इन अछूतों के लिए यह आदेश था कि वे कमर में झाड़ बांध कर चलें ताकि इनके पैरों के चिन्‍ह झाड़ से मिट जाएं और कोई हिंदू इसके पद-चिन्‍हों पर पैर रखकर अपवित्र न हो जाए, अछूत अपने गले में हांड़ी बांधकर चलें, और जब थूकना हो तो उसी में थूकें, भूमि पर पड़े हुए अछूत के थूक पर किसी हिंदू का पैर पड़ जाने से वह अपवित्र हो जाएगा। अछूत भी मनुष्‍य है, पेशवा ब्राह्मण भी मनुष्‍य है। एक मनुष्‍य का दूसरे मनुष्‍य के साथ यह व्‍यवहार।
इसी तरह मध्‍य भारत में गरीब बलाई जाति के विरुद्ध वहां के कालोटों, राजपूतों और ब्राह्मणों ने इंदौर जिले के 15 गांवों में ऐसे अमानवीय कानून बनाए थे, जिनका पालन न कर सकने के कारण बलाइयों को स्‍त्री-बच्‍चों सहित उन चारों को छोड़कर, जहां उनके बाप-दादे पीढि़यों से रहते आए थे, धार, देवास, बागली, भोपाल, ग्‍वालियर और दूसरे निकटवर्ती राज्‍यों के सुनसान गांवों में चला जाना पड़ा, और इन नए घरों में उनके साथ जैसी बीती, वह अवर्णनीय है। बलाई भी मनुष्‍य हैं और ब्राह्मण-राजपूत भी मनुष्‍य हैं। (टाइम्‍स ऑफ इंडिया, 4 जनवरी 1920)
गुजरात के अंतर्गत कविथा ग्राम की घटना अभी पिछले साल की है। कविथा के हिंदुओं के अछूतों के बच्‍चों को सरकारी स्‍कूलों में पढ़ने नहीं दिया। अहमदाबाद के ‘जन’ नामक गांव की नवंबर 1935 की घटना है कि वहां के अछूतों की स्त्रियों पर सवर्ण हिंदुओं ने इस कारण आक्रमण किया क्‍योंकि वे धातु के बर्तनों में पानी लाने लगी थीं। जयपुर राज्‍य के चकवारा गांव की ताजा घटना है कि वहां एक अछूत ने तीर्थयात्रा से लौटकर अपने भाइयों को पकवान का भो‍ज दिया। बेचारे अछूत मेहमान भोजन कर ही रहे थे कि सैकड़ों हिंदू लाठी लेकर उन पर टूट पड़े और उनका भोजन खराब कर दिया, क्‍योंकि वे लोग घी के बने पकवान खा रहे थे। उन्‍होंने अतिथि बन कर घी खाने की ढिठाई क्‍यों की। घी तो हिंदुओं का खाद्य है, अछूतों को घी खाने का अधिकार नहीं।
प्रश्‍न होता है, जिस समाज में मनुष्‍य दुर्बलों पर इस तरह के क्रूर, गर्हित और अमानवी आचरण करते हों, वहां समाज सुधार की आवश्‍यकता क्‍यों नहीं है।
समाज सुधार के दो अर्थ है: एक पारिवारिक सुधार और दूसरा, समाज का पुनर्गठन। विधवा विवाह, बाल विवाह, स्‍त्री शिक्षा आदि पारिवारिक सुधार के अंतर्गत हैं तथा समाज में ऊंच-नीच, छूत-अछूत का अधिकार-भेद, वर्ण भेद या जाति भेद मिटाना सामाजिक सुधार है। हमारे देश में जो सांप्रदायिक बंटवारा(कम्‍यूनल अवार्ड) हुआ, वह सामाजिक सुधार न होने के कारण हुआ। यदि देश की सामाजिक व्‍यवस्‍था ठीक होती, तो सांप्रदायिक बंटवारे का प्रश्‍न ही न उठता। (एक भारत के दो खंड सामाजिक कुव्‍यवस्‍था का फल है।)
इतिहास इस बात का समर्थन करता है कि समुन्‍नत देशों में राजनैतिक क्रांतियों से पहले सामाजिक और धार्मिक क्रांतियां हुई हैं। लूथर द्वारा किया हुआ धार्मिक सुधार यूरोपीय लोगों के राजनैतिक उद्धार का पूर्व लक्षण था। प्‍यूरीटिनिज्‍म एक धार्मिक सुधार था और इसने नए संसार की नींव रखी, अमेरिकी स्‍वतंत्रता का युद्ध जीता। हजरत मुहम्‍मद द्वारा धार्मिक क्रांति होने के बाद ही अरबों ने राजनैतिक शक्ति प्राप्‍त की। भगवान बुद्ध द्वारा की हुई धार्मिक क्रांति के फलस्‍वरूप ही चंद्रगुप्‍त और अशोक जैसे सम्राट हुए। साधु-संतों द्वारा की हुई धार्मिक क्रांति के बाद ही शिवाजी हिंदू राष्‍ट्र की स्‍थापना कर सके। गुरु नानक द्वारा पैदा की गई धार्मिक क्रांति के फलस्‍वरूप ही सिखों ने राजनैतिक शक्ति प्राप्‍त की। तब कैसे कहा जा सकता है कि शक्तिशाली और सुदृढ़ राष्‍ट्र को बनाने के लिए धार्मिक और सामाजिक क्रांति की आवश्‍यकता नहीं है।
कम्‍युनिस्‍ट और समाज सुधार
कांग्रेस के बाद राजनीतिज्ञों का दूसरा दल कम्‍युनिस्‍टों(साम्‍यवादियों) का है। इस दल के सिद्धांत सामाजिक अवस्‍था के अनुरूप स्थिर हुए। कम्‍युनिस्‍टों का ध्‍येय धार्मिक असमानता को मिटाकर समाज में समता लाना है। कम्‍युनिस्‍ट कहते हैं-‘मनुष्‍य एक आर्थिक प्राणी है। उसकी आकांक्षाएं और चेष्‍टाएं आर्थिक तथ्‍यों से बंधी हुई है।‘ ये लोग वर्ण भेद और जाति भेद मिटाकर सामाजिक समता पर ही सारी शक्ति लगा देते हैं। इनके मत में धार्मिक और सामाजिक सुधार भ्रम-मात्र है। साम्‍पत्तिक शक्ति ही एकमात्र शक्ति है, इस बात को मानव समाज का अध्‍ययन करनेवाला कोई भी मनुष्‍य स्‍वीकार नहीं करेगा।
साधु-संतों का सर्वसाधारण पर जो शासन होता है, वह इस विचार का अपवाद है। भारत के करोड़ों लोग लंगोटधारी संपत्तिहीन साधु-संतों की आज्ञा मानते हैं और अपना अंगूठी-छल्‍ला बेचकर काशी, मक्‍का आदि तीर्थों के दर्शनों को जाते हैं। ऐसा क्‍यों होता है। भारत का इतिहास बताता है कि धर्म एक बड़ी शक्ति है। भारत में पुरोहितों का शासन मजिस्‍ट्रेट से भी बढ़कर है। यहां काउंसिलों के चुनाव और हड़तालों को भी आसानी से धार्मिक रंगत मिल जाती है। भारत ही नहीं, यूरोप के इतिहास में भी धर्म की प्रबलता पाई जाती है। रोम के प्रजातंत्री शासन काल में एक काउंसिल (प्रतिनिधि) दूसरे काउंसिल के काम को रद्द कर देता था। वहां प्‍लोवियनों और पेट्रीशियनों का संघर्ष था। रोम की जनता का यह धार्मिक विश्‍वास था कि कोई भी अफसर वहां किसी पद को ग्रहण नहीं कर सकता, जब तक डेल्‍फी देवी की देववाणी उसे स्‍वीकार न करे। डेल्‍फा देवी के पुरोहित पेट्रीशियन थे, इसलिए जब कभी प्‍लेवियन ऐस व्‍यक्ति को अपना नेता चुनते, जो पेट्रीशियनों के विरूद्ध पार्टीमैन होता, तो देववाणी सदा विघोषित कर देती कि डेल्‍फी देवी उसे स्‍वीकार नहीं करतीं। इस कारण प्‍लेवियनों को अपने में कभी ऐसा प्रतिनिधि न मिल सका, जो पेट्रोशियनों का मुकाबला करता। प्‍लेवियन लोग इस ठगी को इसलिए स्‍वीकार कर लेते, क्‍योंकि उनका अपना भी विश्‍वास था कि देवी की स्‍वीकृति आवश्‍यक है, केवल जनता द्वारा चुना जान ही पर्याप्‍त नहीं है। धार्मिक विश्‍वास छोड़ने के बदले प्‍लेवियनों ने अपना लौकिक नाम छोड़ दिया। क्‍या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि प्‍लेवियन संपत्ति की अपेक्षा धर्म को अधिक महत्‍व देते थे।
धर्म, सामाजिक स्थिति और संपत्ति, ये तीनों प्रभुता के स्रोत हैं। आज के यूरोपीय समाज में संपत्ति की प्रमुखता है, किंतु भारत में धर्म और सामाजिक व्‍यवस्‍था का सुधार किए बिना आप आर्थिक सुधार नहीं कर सकते। क्‍या भारत का सर्वहारा वर्ग ऐसी क्रांति लाने के लिए इकट्ठा हो जाएगा। इसके लिए उसे प्रेरणा तभी मिल सकती है जब उसे विश्‍वास हो जाए कि जिनके साथ वह काम कर रहा है, वे समता, बंधुता और न्‍याय के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं तथा क्रांति के बाद वर्ण, जाति और धर्म का कोई भेद न रहेगा। कम्‍युनिस्‍टों का केवल यह कहना काफी नहीं है कि ‘मैं जादि भेद को नहीं मानता।‘ भारत में जहां साधारण जनता धनी और निर्धन, ब्राह्मण और शूद्र एवं ऊंच-नीच के भेद को मानती है और इसे पूर्व जन्‍म के कर्मों का फल, विधाता का विधान अथवा तकदीर समझती है, वहां केवल धनवानों के विरुद्ध कैसे इकट्ठी हो सकती है। और यदि नहीं इकट्ठी हो सकती, तो ऐसी आर्थिक क्रांति का होना ही असंभव है। यदि किसी कारण ऐसी क्रांति हो भी गई, तो ब्राह्मण-शूद्र, ऊंच-नीच और वर्ण जाति के भेद-भाव को उत्‍पन्‍न करनेवाले पक्षपातों से युद्ध किए बिना मार्क्‍सवादी शासन वहां चल सकना संभव नहीं। आप किसी भी ओर मुंह कीजिए वर्ण भेद और जाति भेद एक ऐसा राक्षस है जो सब ओर से आपका मार्ग रोके हुए है। जब तक आप इस राक्षस को वध नहीं करते, आप न यहां राजनैतिक सुधार कर सकते हैं और न आर्थिक सुधार।
क्‍या चातुर्वर्ण श्रम का विभाजन है
कुछ लोग कहा करते हैं कि चातुर्वर्ण व्‍यवस्‍था श्रम का विभाजन है। परंतु वह बात निराधर है। वस्‍तुत: चातुर्वर्ण व्‍यवस्‍था का आधार भोगेश्‍वर्य की सुलभता, समाज पर प्रभुता और श्रेष्‍ठता, श्रम से बचना, आराम और लौकिक सुविधा का स्‍वार्थ है। यही कारण है कि इसे राष्‍ट्रीयता विघातक समझते हुए भी सवर्ण हिंदू नेता इसका विध्‍वंस सहन नहीं कर पाते। धनी और निर्धन की विषमता मिटाकर सापेक्षिक समता लाने का राग अलापनेवाला सोशलिस्‍ट हिंदू भी यहां चातुर्वर्णी मर्यादा की रक्षा के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाता देखा जाता है। सवर्ण हिंदू को मानो जन्‍म में ऊंचाई का पट्टा मिला हुआ है, जिसके भोग में यह ऐसा प्रसक्‍त है कि वह शूद्रों के अभाव-ग्रसित कष्‍टमय जीवन का अनुभव ही नहीं कर सकता। एक अहीर या चमार-मजदूर ब्राह्मण-मजदूर के शाप से डर कर उसका पूजन करता एवं उसकी गाली, डींगें और बदतमीजी बर्दाश्‍त करता है। ब्राह्मण और भंगी के बीच परंपरागत धार्मिक कुसंस्‍कारों के कारण कल्पित उच्‍चता और पवित्रता की दीवार खड़ी है। खेद है, भारत में आज तक जितने सुधारक हुए, वे सब भी सवर्ण हिंदुओं में ही पैदा हुए। यही कारण है कि वर्ण व्‍यवस्‍था द्वारा होनेवाली घोर हानि की वे अनुभूति नहीं कर सके।
वर्ण व्‍यवस्‍था और जाति भेद वस्‍तुत: श्रम का नहीं, श्रमिकों का विभाजन है। यही कारण है कि यहां नीचे गिराई गई जाति का मनुष्‍य ऊपरवाली जाति का पेशा नहीं कर सकता। यहां भंगी हलवाई का काम नहीं कर सकता, परचूनी नहीं कर सकता, चाय और पान की दुकान नहीं रख सकता। पुरोहित नहीं बन सकता। ऐसा कोई सामाजिक कार्य नहीं, जिसमें भंगी से ब्राह्मण तक समान भाव से लग सकें। हिंदुओं को एकता या एक-राष्‍ट्रीयता के सूत्र में बांधनेवाली एक भी बात नहीं, सब अपने को अलग-अलग अनुभव करते हैं। हिंदू का जन्‍म से मरण पर्यंत सारा जीवन अपने वर्ण और जाति की तंग चहारदीवारी के भीतर ही सीमित रहता है। एक जाति और एक वर्ण का मनुष्‍य दूसरी जाति और दूसरे वर्ण से घृणा और द्वेष रखता है। यहां तक कि लोगों ने एक-दूसरे की जाति के विरुद्ध निंदा और घृणापूर्ण कहावतें बना रखी हैं। जैसे कि –
बनिया, बंदर, अग्नि, जल, कुटी, कटक, कलार।
ये दशों अपने नहीं, सूची सुधा सुनार।
बनिया किसका यार, उसको दुश्‍मन क्‍या दरकार।
अहिर मिताई तब करै जब सबै मीत मर जाएं।
पसिया मीत बबुर की छाहीं, छिन मां आपन छिन मां नाहीं।
जहां चार अहिर तहां बात गहिर, जहां चार कोरी तहां बात मोरी।
जाट मरा तब जानिए जब तेरहवीं होय।
यह कायथ की खोपड़ी मरे पै धोखा देय।
करिया बाम्‍हन गोर चमार, इनके साथ न उतरे पार।
ठाकुर मानें कहे-सुने ते, बाम्‍हन मानै खाये।
कागज मानें लिहे-दिहे ते, सूद जाति लतियाये।
बाम्‍हन कुत्ता हाथी, नहीं किसी के साथी।
खत्री-पुत्रं कभी न मित्रं, जब मित्रं तब दगिमदगा।
गगरी दाना, सूद बताना।
ढोल, गंवार, सूद्र, पशु, नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।
इस दुनिया में तीन कसाई, खटमल पिस्‍सू, बाम्‍हन भाई।
जे वर्णाधम तेलि कुम्‍हारा, स्‍वपच किरात कौल कलवारा।
अंग्रेजों के पूर्वज भी ‘वार ऑफ रोजेज’ और क्रामवेल के युद्ध में एक-दूसरे के विरुद्ध लड़े थे, परंतु उनके वंशजों में अब किसी प्रकार का बैर भाव नहीं है। इसके विरुद्ध भारत का ब्राह्मणेतर आज भी ब्राह्मणों को किसी प्रकार क्षमा करने को तैयार नहीं, क्‍योंकि उनके पूर्वजों ने शिवाजी का अपमान किया था-तेली, कुम्‍हार, कलवार, कायस्‍थ और अहीर को वर्णाधम, शूद्र और अधरूप लिखा। इन अनुलोम-प्रतिलोम वर्ण भेद और जाति भेद ने हिंदू समाज को पारस्‍परिक कलह, घृणा और भिन्‍नता के भावों से ऐसा जर्जरित बना रखा है कि हिंदू एक जाति या एक राष्‍ट्र के रूप में संगठित नहीं हो सकते।
आर्य समाज की वर्ण व्‍यवस्‍था
आर्य समाज ने वर्ण व्‍यवस्‍था को आकर्षक बनाने के लिए यह दावा पेश किया कि वर्ण जन्‍म से नहीं, गुण-कर्म-स्‍वभाव से होता है। वह यह भी कहता है कि भारत की चार हजार जातियों और उपजातियों को गलाकर चार वर्णों में ढाल देना चाहिए। ये दोनों बोतें सम्‍भव नहीं हैं। पहली यह है कि यदि व्‍यक्ति को गुणों के अनुसार समाज में आदर मिलता है, तो फिर चार वर्णों का आग्रह कैसा। ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्‍य-शूद्र नाम के गंदे लेबलों की आवश्‍यकता क्‍यों। वर्णों का लेबुल न लगाने से क्‍या समाज में सम्‍मान नहीं मिल सकता। दूसरा यह कि गुण क्‍या चार ही हैं। यदि चार ही हैं, तो यदि एक ही व्‍यक्ति में ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्‍य-शूद्र चारों के गुणों का विकास हो, तो वह किस वर्ण में रहेगा। फिर, ऊंचे वर्ण में जनमे व्‍यक्ति को क्‍या गुण-कर्म के अनुसार नीचे वर्ण में जनमे व्‍यक्ति को गुण-कर्म के अनुसार ऊंचे वर्ण का माना जाने के लिए क्‍या समाज को मजबूर किया जा सकेगा। अत: चार हजार जातियों को चार वर्णों में ढालना असंभव-सा है। फिर गुणों के अनुसार चार वर्णों का विभाग करने के लिए क्‍या म्‍युनिसिपैलिटी और काउंसिलों के इलेक्‍शन की तरह वर्णों का इलेक्‍शन हुआ करेगा अथावा परीक्षाएं लेकर यूनिवर्सिटी से वर्णों का सर्टिफिकेट बंटा करेगा।
इसके सिवाय समाज में आधी आबादी स्त्रियों की है। क्‍या आज भी समस्‍त नारी जाति को ‘शूद्रा’ बनाकर रखा जा सकता है। यदि नहीं, तो क्‍या चातुर्वर्ण के अनुसार कुछ स्त्रियां पुरोहित बनेंगी, कुछ सिपाही का काम करेंगी और कुछ सेठ बनकर व्‍यापारी का काम करेंगी। इतिहास-प्रसिद्ध प्‍लेटों ने भी गुणों के अनुसार विचारक, शूर और बणिक व श्रमिक-तीन श्रेणियों मे समाज को बांटने की व्‍यवस्‍था की थी, किंतु उसकी व्‍याख्‍या भंग हो गई। यह सिद्ध हो गया कि किन्‍हीं दो मनुष्‍यों को भी सदा एक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, क्‍योंकि गुण और स्‍वभाव परिवर्तनशील होते हैं। अतएव आर्य समाजी कल्‍पना से उद्भूत गुणों के अनुसार चातुर्वर्ण व्‍यवस्‍था हानिकर और अस्‍वाभाविक ही नहीं, वरन मूखर्तापूर्ण और असम्‍भव भी है।
वस्‍तुत: चातुर्वर्णी व्‍यवस्‍था चाहे गुण-कर्म के अनुसार हो, चाहे जन्‍म के आधार पर, दोनों रूपों में अस्‍वाभाविक है। स्‍वतंत्र मानव समाज को चार वर्णों में केवल कठोर कानून और राज-दंड के भय से ही ठूंसा जा सकता है, जैसा कि चातुर्वर्ण के रक्षक राम ने शूद्र हो कर तप करने के कारण शंबूक का शिरच्‍छेदन कर दिया। आज बीसवीं शताब्‍दी के स्‍वछन्‍द मानव समाज को मनुस्‍मृति की अंधकारयुगीन दण्‍डनाओं से अनुशासित नहीं किया जा सकता।
वर्ण व्‍यवस्‍था असाध्‍य और हानिकारक
चातुर्वर्ण व्‍यवस्‍था मानव समाज के लिए असाध्‍य ही नहीं, हानिकर भी है। इसका अर्थ है, कुछ इने-गिने मनुष्‍यों के प्रभुत्‍व के लिए बहुत-से लोगों को सर्वहारा बना दिया जाए। थोड़े-से लोगों के जीवन के विकास और प्रकाश के लिए बहुत-से लोगों को प्रवंचित, नि:सत्‍व और अंधकारमय बना दिया जाए। भारत में यही हुआ। इस राक्षसी व्‍यवस्‍था ने यहां के बहुसंख्‍यक लोगों को निर्जीव और पंगु बना दिया। यही कारण है कि दूसरे समुन्‍नत देशों की तरह यहां कभी सा‍माजिक क्रांति नहीं हुई। यहां का खेतिहर हल के सिवाय तलवार नहीं चला सकता था। जनता के पास संगीनें न थीं। क्रांति के द्वारा दासता से मुक्‍त होने का कोई साधन न था। उसे समझाया गया था कि परमेश्‍वर ने ही तुम्‍हारे भाग्‍य में दासता लिखी है। इसके फलस्‍वरूप शूद्र बनाई गई जनता घोर दासता का दु:ख भोगती थी। भारतीय इतिहास में केवल मौर्य साम्राज्‍य का काल ही वह काल था, जब चातुर्वर्ण विध्‍वंस हो गया था, शूद्र औश्र दास होश में आ गए थे और देश के शासक बन गए थे।
महाभारत और पुराण ब्राह्मण-क्षत्रियों के संघर्ष से पूर्ण हैं। कभी ब्राह्मण क्षत्रियों का विनाश करते पाए जाते हैं और कभी क्षत्रिय ब्राह्मणों का। यदि क्षत्रिय और ब्राह्मण गली में मिल जाएं तो कौन किसको पहले प्रणाम करे या रास्‍ता छोड़ दे, ऐसी छोटी बातों पर भी लड़ पड़ते थे। क्षत्रिय और ब्राह्मण एक-दूसरे की आंख के कांटा थे। भागवत में स्‍पष्‍ट लिखा है कि कृष्‍ण का अवतार क्षत्रियों का विनाश करने के लिए हुआ था और ब्रह्म-हत्‍या निवारण के लिए ही राम को अश्‍वमेघ यज्ञ करना पड़ा था। इन सब बातों से सिद्ध हो जाता है कि चातुर्वर्ण व्‍यवस्‍था आदर्श रूप में कभी सफल नहीं हुई।
स्‍वेच्‍छा से व्‍यवसाय न चुन सकने का परिणाम यह होता है कि लोगों को अपने पैतृक कामों से अरुचि उत्‍पन्‍न हो जाती है। इस अरुचि का कारण व्‍यवसायों पर लगा हुआ कलंक तथा इसे करनेवालों के प्रति ऊंच-नीच की सामाजिक भावनाएं होती हैं। इस सबका परिणाम यह होता है कि उस व्‍यवसाय की उन्‍नति नहीं होती।
वर्ण भेद और प्रजनन विज्ञान
वर्ण भेद के हिमायती कुछ लोग इसे रक्‍त की पवित्रता और वंश की विशुद्धि कायम रखने का साधन कहते हैं, किंतु डॉ. भंडारकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्‍तक ‘फॉरेन एलिमेन्‍ट्स इन द हिंदू पॉपुलेशन’ (हिंदू लोगों में विदेशी तत्‍व) पुस्‍तक में तर्क और प्रमाणों ने सिद्ध कर दिया है कि भारत में ऐसी कोई श्रेणी नहीं जिसमें विजातीय अंश न हो। लड़ाकू राजपूत और मराठों में ही नहीं, ब्राह्मणों में भी शुद्ध रक्‍त नहीं है। वर्ण भेद वस्‍तुत: विभिन्‍न जातियों के रक्‍त और संस्‍कृति-सम्मिश्रण के बहुत पीछे बना। पंजाब और मद्रास के ब्राह्मणों अथवा बंगाल और मद्रास के अस्‍पृश्‍यों में ही एक वंश या एक ही रक्‍त नहीं है। वस्‍तुत: पंजाब के ब्राह्मण और पंजाब के चमार एवं मद्रास के बाह्मण और मद्रास के चमार में रक्‍त और वंश की एकता है। यदि विभिन्‍न वर्णों के लोगों में वर्णांतर विवाह होने दिया जाए, तो इससे हानि की अपेक्षा लाभ ही अधिक होगा। हां, पशु और मनुष्‍य में भेद अवश्‍य है। मनुष्‍य-मनुष्‍य में भेद नहीं है, क्‍योंकि विभिन्‍न वर्णों के विवाहों से संतान पैदा होती है, स्त्रियां बांझ नहीं हो जातीं। थोड़ी देर के लिए यदि मान लिया जाए कि रक्‍त सम्मिश्रण की रूकावट सुप्रजजन या रक्‍त शुद्धि की दृष्टि से है, तो विभिन्‍न वर्णों के पारस्‍परिक सहयोग की रूकावट का उद्देश्‍य क्‍या है।
वर्ण भेद यदि सुप्रजनन शास्‍त्र के मौलिक सिद्धांतों के अनुसार होता, तो इस पर अधिक आपत्तियां न होतीं, क्‍योंकि जब उसका उद्देश्‍य उत्तम संतान उत्‍पन्‍न कर नस्‍ल का सुधार करना होता। परंतु ऐसा पाया नहीं जाता। वृक्ष अपने फल से पहचाना जाता है। वर्ण भेद ने ऐसी नस्‍ल पैदा की जिसका न लंबा कद है, न बलिष्‍ठ शरीर। शारीरिक दृष्टि से हिंदू ठिगने और बौने लोगों की जाति है। एक ऐसी नस्‍ल, जिसका दसवां भाग सैनिक सेवा के अयोग्‍य है। ऐसी दशा में यह स्‍वीकार नहीं किया जा सकता कि वर्ण व्‍यवस्‍था का आधार वैज्ञानिक सुप्रजजन शास्‍त्र है। यह तो एक ऐसी सामाजिक पद्धति‍ है जिसमें इसके व्‍यवस्‍थापकों का घमंड और स्‍वार्थ भरा है। इन्‍हें ऐसी शक्ति प्राप्‍त हो गई थी, जिससे ये ऐसा गर्हित व्‍यवस्‍था अपने से छोटों पर लाद सकें। इसने हिंदुओं को पूर्णत: असंगठित और नीति-भ्रष्‍ट बना दिया है।

आदिवासी और जातिभेद
देश में आदिवासियों की एक खासी संख्‍या है, जो मानव समाज से अलग असभ्‍य जंगली हालत में पाए जाते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी हैं जो विवश हो ‘जरायमपेशा’ हो गए हैं। हिंदू डींगे मारते हैं कि उनके वेद में सारे विश्‍व को ‘आर्य’ बनाने का आदेश है, तो फिर अपने ही देश में रहनेवाले इन आदिवासियों को उन्‍होंने अब तक सभ्‍य आर्य क्‍यों नहीं बनाया। क्‍या यह शर्म की बात नहीं है।
हिंदुओं ने इन आदिवासी मानवों को सभ्‍य बनाने का प्रयत्‍न क्‍यों नहीं किया, इसका सही उत्तर यह है कि हिंदू वर्ण और जाति के अहंकार से ग्रसित हैं, इसलिए वह इनसे संपर्क स्‍थापित नहीं कर सकता। इन्‍हें सभ्‍य बनाने में उसे इनके बीच बसना, इनसे प्रेम व सहानुभूति पैदा करना एवं इन्‍हें अपनाना पड़ता। यह सब उनके लिए संभव न था, क्‍योंकि ऐसा करने में हिंदू में वर्ण और जाति की पवित्रता नष्‍ट हो जाती। इसलिए वह इनसे दूर रहा। हिंदुओं को यह कल्‍पना नहीं हुई कि यदि अहिंदुओं ने इन जातियों को सुधार कर इन्‍हें अपने धर्म का साझीदार बना लिया, तो ये बहुसंख्‍यक आदिवासी उनके शत्रुओं की संख्‍या बढ़ा देंगे और तब हिंदुओं को अपने जाति भेद और वर्णभेद को ही धन्‍यवाद देना पड़ेगा।
केवल यही नहीं कि हिंदुओं ने इन जंगलियों को सभ्‍य बनाने का यत्‍न नहीं किया, ऊंचे वर्णवाले हिंदुओं ने अपने से नीचे वर्णवालों के सांस्‍कृतिक विकास को रोका है। महाराष्‍ट्र के सुनारों और पठारे प्रभुओं के साथ बलपूर्वक ऐसा किया गया। बेचारे सुनारों को शौक हुआ कि वे भी ब्राह्मणों की तरह चुनी धोती और त्रिपुंड धारण कर परस्‍पर ‘नमस्‍कार’ किया करें, तो उन्‍हें पेशवाओं ने दबाव डाल कर ऐसा करने से रोक दिया और पठारे प्रभु जब ब्राह्मणों की नकल कर विधवाओं को बिठलाने लगे(क्‍योंकि विधवा विवाह अनार्य प्रथा है, आर्य हिंदुओं में विधवा विवाह नहीं होता), तो कानूनन रोका गया।
हिंदू लोग मुसलमानों और ईसाइयों की हमेशा निंदा किया करते हैं, किंतु ये दोनों धर्म मानवता के अधिक निकट पाए जाते हैं। ये गिरे हुओं को उठाते और ज्ञान का प्रकाश फैलाकर लोगों की लोगों की उन्‍नति का मार्ग खोलते हैं, जबकि हिंदुओं का जातीय राग-द्वेष दुर्बलों को सदा अज्ञानांधकार में रखकर उन्‍हें दासता का सबक सिखाने और उन्‍हें दलित व पीडि़त, प्रवंचित या शोषित करने में ही अपना परम पुरूषार्थ समझता है।
शुद्धि और संगठन
ईसाई मिशनरियों की देखा-देखी हिंदुओं में भी विधर्मियों की शुद्धि करके संख्‍या बढ़ाने का शौक पैदा हुआ। उन्‍होंने यह नहीं सोचा कि हिंदू धर्म मिशनरी(प्रचारक) धर्म नहीं है, अत: शुद्धि आंदोलन एक मूर्खता और व्‍यर्थ चेष्‍टा सिद्ध होगा।
वस्‍तुत: हिंदू समाज वर्णों और उपवर्णों (जातियों) का संग्रह मात्र होने से प्रत्‍येक वर्ण एक ऐसा संगठित संघ है, जिसमें बाहर से भीतर आने का द्वार बंद है। हिंदू संस्‍कृति के अनुसार किसी जाति विशेष में जन्‍म लेनेवाला ही उस जाति का सदस्‍य माना जा सकता है। किंतु जब कोई व्‍यक्ति किसी दूसरे धर्म में जाता है, तो उसके सामने केवल सिद्धांतों और दर्शनों को ही दिमाग में ठूंस लेने का प्रश्‍न नहीं होता, वह यह भी देखता है कि उस समाज में प्रवेश करने पर उसका स्‍थान क्‍या होगा, वह कहां रखा जाएगा, किस बिरादरी में उसे जगह मिलेगी, किन लोगों में उसके बच्‍चों के ब्‍याह होंगे, इत्‍यादि। हिंदुओं का जाति भेद इन प्रश्‍नों का उत्तर देने में विमूड़ है।
जिन कारणों से शुद्धि संभव नहीं है, प्राय: उन्‍हीं कारणों से संगठन भी असंभव है। जातिवाद होने से हिंदू शारीरिक शक्ति रखते हुए भी भीरु, कायर, दब्‍बू और अकेला है। उसे विश्‍वास नहीं है कि संकट पड़ने पर दूसरी जाति का हिंदू उसकी सहायता करेगा। मुसलमानों और सिखों की तरह वह किसी संकटग्रस्‍त को अपने घर में छिपाकर रोटी नहीं खिला सकता, न विभिन्‍न जातियों के हिंदू एक परिवार की तरह संगठित होकर एक घर में रह सकते हैं। यही कारणा है कि जब एक हिंदू पिटता या लुटता है, तो दूसरा उसे बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने की हिम्‍मत नहीं करता। किसी हिंदू लड़की का अपहरण हो जाने पर हिंदू उसे वापस लाने में इसलिए उदासीन रहता है‍ कि उसकी शादी कहां करेगा। बिरादरी में तो उसे कोई अच्‍छा घर-वर मिलेगा नहीं।
वर्ण भेद और जाति भेद से ग्रस्‍त होने के कारण हिंदू समझता है कि भाग्‍य ने उसे अकेला पैदा किया है। हिंदू के रहन-सहन, खान-पान और पूजा-उपासना में कोई ऐसी बात नहीं है, जो उसे मुसलमानों और सिखों की तरह एकनिष्‍ठ करके परस्‍पर सहानुभूति उत्‍पन्‍न करे, न ऐसा कोई सामाजिक बंधन है जिससे एक हिंदू दूसरे हिंदू को अपना भाई समझे। इसीलिए हिंदू संगठित भी नहीं हो पाता।
जाति भेद और सदाचार
वर्णवाद और जातिवाद ने इस देश में मानवी सदाचार का भी संहार कर दिया है, जो अत्‍यंत खेदजनक है। मानवीय सदाचार का अर्थ है सार्वजनिक सद्गुण और सार्वजनिक सदाचार। मनुष्‍यों के केवल दो विभाग किए जा सकते हैं: अच्‍छे और बुरे, ज्ञानी और अज्ञानी, धर्मात्‍मा और धर्महीन, विद्वान और मूर्ख। किंतु वर्ण और जाति की भावना ने हिंदुओं की दृष्टि को ऐसा संकुचित बना दिया है कि अन्‍य मनुष्‍य कितना ही सद्गुणी और सदाचारी क्‍यों न हो, यदि वह किसी वर्ण-विशेष या जाति-विशेष का व्‍यक्ति नहीं है, तो उसकी कोई सुनेगा ही नहीं। एक ब्राह्मण किसी अब्राह्मण को अपना नेता और गुरु नहीं मानेगा। इसी तरह कायस्‍थ कायस्‍थ को और बनिया बनिए को ही अपना नेता मानेगा। वर्ण और जाति का विचार छोड़कर मनुष्‍यों के सद्गुणों की कद्र वह तभी करेगा, जब वह व्‍यक्ति उसका जाति-भाई हो। वहां मानवीय सदाचार ‘कबायली सदाचार’ बन गया है। सद्गुण और सदाचार की प्रधानता नहीं है, वर्ण और जाति की प्रधानता है। (महात्‍मा गांधी भी तभी तक ‘राष्‍ट्रपिता’ रहे थे, जब तक आजादी नहीं मिली थी। आजादी मिल जाने पर उनकी एक नहीं चली, और अंत में वह एक ब्राह्मण की गोली का निशाना बन गए।)
मेरा आदर्श समाज
आप पूछ सकते हैं, यदि आप वर्ण और जाति नहीं चाहते, तो आपका आदर्श समाज क्‍या है। मैं कहूंगा, एक ऐसा समाज, जिसमें न्‍याय, बन्‍धुता, समता और स्‍वतंत्रता हो। मैं समझता हूं, किसी भी विचारवान को इससे इन्‍कार न होना चाहिए। बन्‍धुता का अर्थ यह है कि देश में उत्‍पन्‍न सभी व्‍यक्ति परस्‍पर भाई-भाई हैं और सभी का पिता की संपत्ति की भांति देश की संपत्ति पर समान अधिकार है। जीवन के लिए आवश्‍यक भोजन, वसन, औ‍षधि और शिक्षा के लिए सभी बराबर के हकदार हैं। इसी का नाम बन्‍धुता या भाईचारा है। इसका दूसरा नाम है जनतंत्र या लोकतंत्र।
‘समता’ शब्‍द पर फ्रांसीसी राज्‍य क्रांति के समय बहुत विवाद हुआ, क्‍योंकि सब मनुष्‍य समान नहीं होते। कोई प्रतिभाशाली है। कोई जड़-बुद्धि, कोई कलाकार है, कोई लंठ, कोई बलिष्‍ठ है, कोई दुर्बल, कोई वीर है, कोई भीरु, कोई पुरुषार्थी है, कोई आलसी, कोई कर्मिष्‍ठ है और कोई आरामतलब, कोई सर्वांग-सुन्‍दर है और कोई कुरूप इत्‍यादि। प्राकृतिक असमानता के कारण व्‍यवहार में भी असमानता न्‍यायसंगत है। किंतु प्रत्‍येक व्‍यक्ति को, उसके अन्‍दर निहित शक्ति के पूर्ण विकास में, समान भाव से प्रोत्‍साहन और सुविधा मिलना आवश्‍यक है। इसमें जाति, वंश, खानदान, पारिवारिक ख्‍याति, सामाजिक संबंध इत्‍यादि बातें बाधक नहीं होनी चाहिए। जनतंत्र में वोट सबके समान होते हैं, वोटों का वर्गीकरण नहीं होता। अत: सबके उन्‍नति के अधिकार और व्‍यवहार में भी समता होना अनिवार्यत: आवश्‍यक है।
स्‍वतंत्रता समय की मांग और युग-धर्म है। जैसे उठने-बैठने, चलने-फिरने, हिलने-डुलने, सोने-जागने की स्‍वतंत्रता सभी को प्राप्‍त है, उसी तरह प्रत्‍येक व्‍यक्ति को अपनी इच्‍छानुसार व्‍यवसाय चुनने और आचरण करने की स्‍वतंत्रता होनी चाहिए। दूसरों की इच्‍छानुसार जीविका अर्जन करने और अपने जीवन का कर्तव्‍य स्थिर करने की विवशता होना तो दासता है। वर्ण विधान अर्थात् कल्पित वर्णों के अनुसार कर्मों की व्‍यवस्‍‍था तो एक वैधानिक ‘दास प्रथा’ मात्र है। खान-पान, रहन-सहन, धर्माचरण, चिंतन-भाषण, लेखन-मुद्रण इत्‍यादि की स्‍वतंत्रता सभी को होनी चाहिए।
इस प्रकार न्‍याय, बन्‍धुता, समता और स्‍वतंत्रता से युक्‍त समाज ही मेरा आदर्श समाज है।भीमराव आंबेडकर
[साभार प्रवक्ता.कॉम]

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

भोपाल हम शर्मिंदा हैं

यह देश तुम्हें न्याय नहीं दिला सका : भोपाल गैस त्रासदी पर न्यायालय के निर्णय पर कोई टिप्पणी करने का हमें अधिकार नहीं। हम गणतंत्र देश के वासी हैं, जहां हर तरह की आजादी है लेकिन सत्ता और न्याय के सर्वोच्च पद इतने ऊंचे हैं कि वहां आम भारतीय के ये अधिकार भी बौने लगते हैं। इन पर उंगली उठाना यानी अपनी सामत बुलाना। यह गणतांत्रिक देश हैं यहां हर तरह की आजादी है। अगर रसूख है, ऊंची पहुंच है तो हजारों बेगुनाहों की मौत किसी की वजह से क्यों न हुई हो, उसे छुट्टा घूमने की आजादी है। भोपाल गैस त्रासदी में यही हुआ।
इस त्रासदी में जान गंवाने वाले, अब तक जिंदगी-मौत से जूझने वाले लोगों को न्याय दिलाने के लिए 25 साल तक न्यायिक प्रक्रिया कछुए की चाल चली। 15000 से भी ऊपर जाने इस त्रासदी ने लीं और पांच लाख से भी ज्यादा लोग जिससे प्रभावित हुए। ये लाखों लोग आज भी उस कष्ट को झेल रहे हैं जो गैस त्रासदी ने इन्हें दिया है। उस गुनाह के छह दोषियों को सजा मिली सिर्फ 2 साल की और साथ ही 1-1 लाख रुपये का आर्थिक दंड। इनके अपराध को जमानती माना गया और जाहिर है उन्हें जमानत मिलने में मुश्किल नहीं हुई। आज कई मामलों में फास्ट ट्रैक अदालतें बनतीं हैं, उनमें फैसले भी जल्द होते हैं फिर देश क्या दुनिया की इस सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी के लिए ऐसा क्यों नहीं हुआ? इतने दिन चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद यह नतीजा? क्या यह उन लोगों के साथ अन्याय नहीं जिन्होंने औद्योगिक प्रगति की इतनी बड़ी कीमत चुकाई?
आज बहुराष्ट्रीय कंपनियां पैसा कमाने की आपाधापी में औद्योगिक इकाइयां लगाती हैं और सुरक्षा के सामान्य नियमों तक की कभी-कभी अनदेखी करती हैं जिसका खामियाजा भोपाल जैसी त्रासदियों में निरीह नागरिकों को भोगना पड़ता है। आज भोपाल के पीडि़त लोगों को उचित न्याय नहीं मिला तो इसके लिए देश को, हम सबको शर्मिंदा होना चाहिए कि हम अपने ही नागरिकों को न्याय नहीं दिला सके। बल्कि देश के ऊंचे पदों पर आसीन कई नौकरशाह और सत्ता के कई केंद्रों पर भी इसे लेकर उंगलियां उठने लगी हैं कि किस तरह भोपाल गैस त्रासदी के दोषी वारेन एंडरनसन को देश से भागने की सुविधा मुहैया करायी गयी। उसे सरकारी वाहन दिये गये और सलूट तक किया गया। ये खबरें अगर आज आम हैं तो इनका कोई आधार तो होगा ही। यों ही कोई किसी पर इतना बड़ा आरोप क्यों लगाने लगा। यह जांच का विषय है और जांच करके सच्चाई बाहर लायी जानी चाहिए।
अगर न्यायपालिका भोपाल गैस त्रासदी के गुनहगारों को कड़ी सजा नहीं दिला सकी तो जाहिर कि या तो यह मामला असरदार ढंग से नहीं पेश किया गया या जरूरी साक्ष्य ही नहीं जुटाये जा सके कि दोषियों को कड़ी सजा देने को न्यायालय बाध्य होता। इसके लिए दोषी किसे करार दिया जाये? लगता तो यह है कि अगर कुछ गैर सरकारी संस्थाएं इन गैस पीड़ितों के साथ न खड़ी होतीं तो शायद इनके दुख की दास्तान न न्यायालय पहुंचती और न ही उस पर कार्रवाई ही हो पाती। आखिर इतनी बड़ी औद्योगिक त्रासदी और उससे पीड़ित लाखों लोगों के प्रति ऐसी उदासीनता क्यों? इसके पीछे किन शक्तियों का हाथ है या उनकी और सत्ता के किस केंद्र की दुरभिसंधि है? घटना ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। अब हर राजनेता भोपाल के गैस पीड़ितों का खैरख्वाह बन उनकी आवाज उठाने में लग गया है। अच्छा मौका है राजनीतिक रोटियां सेंकने का। पता नहीं 26 सालों तक ये नेता कहां थे जो गैर सरकारी संस्थाओं को इन गरीबों की लड़ाई लड़नी पड़ी।
आज चारों ओर यही सवाल उठाये जा रहे हैं कि यूनियन कारबाइड के तत्कालीन चेयरमैन वारेन एंडरसन को गिरफ्तार करने के बाद भी जमानत पर रिहा कर देश से बाहर क्यों जाने दिया गया। एंडरसन को मध्यप्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार करने के बाद 7 दिसंबर 1984 को जमानत पर रिहा कर दिया। अगर भोपाल के तत्कालीन कलेक्टर मोती सिंह की बात मानी जाये तो उनके अनुसार एंडरसन रिहा होने के बाद कार (जो एक राजनेता की बतायी जाती है) से हवाई अड्डे गये और वहां से दिल्ली के रास्ते अमरीका उड़ गये और फिर कभी नहीं लौटे। उन्हें बार-बार अदालत की ओर से समन जारी किये गये लेकिन वे भारत नहीं आये। इसके बाद 1992 में उन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया गया। भारत सरकार ने एंडरसन के प्रत्यर्पण का अनुरोध अमरीका सरकार से किया जो 2004 में ठुकरा दिया गया। अमरीकी मूल की कंपनी यूनियन कारबाइड के तत्कालीन चेयरमैन वारेन एंडरसन अब 89 वर्ष के हो गये हैं ऐसे में उनके न्यायिक प्रक्रिया के लिए भारत प्रत्यर्पण की आशा तो क्षीण ही है लेकिन भोपाल गैस त्रासदी के लाखों पीड़ितों को उचित मुआवजा दिला कर कम से कम उनके दर्द में थोड़ी तो मदद की ही जा सकती है।
भोपाल गैस त्रासदी लापरवाही और उदासीनता का नतीजा है। याद है तब हम आनंद बाजार प्रकाशन समूह की पत्रिका ’रविवार’ में थे। भोपाल गैस त्रासदी के पहले भी वहां स्थित यूनियन कारबाइड में गैस रिसाव की घटना हुई थी जिसमें कई श्रमिक प्रभावित हुए थे। उस वक्त एक स्थानीय पत्रकार के हवाले से यह रिपोर्ट स्थानीय समाचारपत्र में छपी थी। इस रिसाव के बारे में कहा गया था कि यह कभी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है। वही हुआ भी। 2-3 दिसंबर 1984 की रात मौत दबे पांव आयी और जाड़े की उस रात में नींद में सोये हजारों लोगों को मौत की नींद सुला गयी और लाखों को सारी जिंदगी बीमारियों से जूझने और तिल-तिल कर मरने को मजबूर कर गयी। कारखाने से रिसी कई टन मिथाइल आइसो साईनेट गैस ने हजारों जानें ले लीं।
अगर उस पत्रकार की बात को प्रबंधन ने गंभीरता से लिया होता और मरम्मत आदि की गयी होती तो शायद इतनी बड़ी त्रासदी न होती। कारखाना घनी आबादी के पास है इसलिए मौतें और ज्यादा हुईं। जिन लोगों ने गैस त्रासदी से मरे लोगों की बिखरी लाशों को देखा है, वे ताजिंदगी इस खौफनाक मंजर को भुला नहीं पायेंगे। इस त्रासदी पर एक पत्रकार की अंग्रेजी में लिखी पुस्तक की समीक्षा ’रविवार’ के लिए मैंने ही की थी। उस पुस्तक के कवर का चित्र इस त्रासदी की भयावहता और खौफ को उजागर करने के लिए काफी था। कवर में एक मृत शिशु का चित्र था , पथरायी आंखों वाला मृत शिशु का शव जिसे पिता के हाथ जमीन में दफना रहे हैं।
रोंगटे खड़े कर देनेवाला वही चित्र अब अखबारों में उन लोगों के बैनरों में दिख रहा है जो भोपाल गैस त्रासदी पर आये फैसले से नाखुश हैं और जगह-जगह इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। जिस किसी भी इनसान में तनिक भी इनसानियत या संवेदना है उसके दिल को हिला देने के लिए वह चित्र ही काफी है। पर पता नहीं सरकारों का दिल क्यों नहीं दहला। आखिर वक्त रहते वारेन एंडरसन के प्रत्यर्पण की गंभीर कोशिश क्यों नहीं की गयी? उसके बाद भी जो  दोषी पाये गये उन्हें इतनी कम सजा क्यों दी गयी? होना तो यह चाहिए था कि इस गंभीर अपराध के लिए ऐसी सजा दी जाती जो आने वाले वक्त के लिए सबक होती और जिसके खौफ से कोई निरीह लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करने से डरता। आखिर ऐसा क्यों नहीं हुआ? ऐसे हजारों क्यों हैं जिनके कठघरे में हर वह शख्स, नौकरशाह, सत्ता के वे केंद्र खड़े हैं जिन्होंने इस हादसे से पीड़ित लोगों को न्याय दिलाने में उदासीनता दिखायी और दोषियों के प्रति नरमी बरती।
आज राजनेता, सामाजिक संगठन और दूसरे कई संगठन भोपाल गैस त्रासदी पर आये निर्णय से असंतुष्ट हैं और चाहते हैं कि एक बार फिर नये सिरे न्यायिक प्रक्रिया चले और बिना किसी लागलपेट के सही-सही जांच और कार्रवाई हो। एंडरसन जिस कार से भोपाल से हवाई अड्डे तक गये वह एक कांग्रेसी नेता की बतायी जाती है। इस बारे में तरह-तरह की अफवाहें और खबरें हवा में हैं जिनमें से कुछ तो यहां तक संकेत करती हैं कि किसी बड़े नेता के इशारे पर एंडरसन को भारत से जाने की सुविधा दी गयी। इस बारे में और कीचड़ उछले, कुछ और दामन दागदार हों इससे पहले सब कुछ साफ होना चाहिए। अब तो कांग्रेसी नेताओं ने भी यह कहना शुरू कर दिया है कि आरोप-प्रत्यारोप बंद होना चाहिए और अगर कुछ सच्चाई है तो उसे सामने आना चाहिए। जिन्हें इसके बारे में सच्चाई पता है उन्हें भी मौन तोड़ सामने आना चाहिए क्योंकि कहा भी है-‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास।’
ऐसा नहीं लगता कि देश में कोई भी व्यक्ति ऐसा होगा जो चाहेगा कि उसका इतिहास दागदार हो। जिसके पास जो भी जानकारी है उसे बाहर आना चाहिए, चाहे नौकरशाह हो या नेता अगर इस मामले को हलका करने, इसके दोषियों को बचाने की किसी ने भी कोशिश की है तो वह साफ होना चाहिए और उस पर नियमानुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए। कारण,जो अभी हो रहा है, जिस तरह से आरोप-प्रत्यारोपों को दौर चल रहा है वह नागरिकों की शंकाओं को और बढ़ा रहा है। शंकाओं में जीता समाज कभी निश्चिंत या सुरक्षित नहीं हो सकता। उसे हमेशा यह आशंका रहेगी कि  अगर न्याय दिलाने का यह हाल है तो भोपाल गैस त्रासदी जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति हो सकती है और उस पर न्याय पाने के लिए पीढ़ियों तक लोगों को इंतजार करना पड़ सकता है।
देश और देशवासियों के हित में यही है कि ऐसी घटनाओं की सही पड़ताल और उस पर उचित कार्रवाई हो। यह देश के नागरिकों की न सिर्फ आशा बल्कि अधिकार भी है। अब जब सरकार ने आरटीआई यानी सूचना के अधिकारी की सहूलियत राष्ट्र को दी है तो फिर ऐसी घटनाओं पर तैयार किये गये मामलों के बारे में भी यह जानकारी सामने आनी चाहिए कि यह मामला इतना लचर क्यों तैयार किया गया कि इसमें मामूली अपराध जैसी सजा मिली और मुख्य अभियुक्त तक न्याय के हाथ पहुंचे तक नहीं। यह सवाल है जो देश आज देश के कर्णधारों और इस मामले की न्यायिक प्रक्रिया से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े अधिकारियों से पूछना चाहता है। इसके जवाब देने के लिए वे बाध्य हैं क्योंकि इसके लिए उनमें से अनेक शपथबद्ध हैं।[साभार भड़ास४मीडिया]  राजेश त्रिपाठी

गांधीजी की सेक्स लाइफ

क्या राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी असामान्य सेक्स बीहैवियर वाले अर्द्ध-दमित सेक्स मैनियॉक थे? जी हां, महात्मा गांधी के सेक्स-जीवन को केंद्र बनाकर लिखी गई किताब “गांधीः नैक्ड ऐंबिशन” में एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री के हवाले से ऐसा ही कहा गया है। महात्मा गांधी पर लिखी किताब आते ही विवाद के केंद्र में आ गई है जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उसकी मांग बढ़ गई है। मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जैड ऐडम्स ने पंद्रह साल के अध्ययन और शोध के बाद “गांधीः नैक्ड ऐंबिशन” को किताब का रूप दिया है।
किताब में वैसे तो नया कुछ नहीं है। राष्ट्रपिता के जीवन में आने वाली महिलाओं और लड़कियों के साथ गांधी के आत्मीय और मधुर रिश्तों पर ख़ास प्रकाश डाला गया है। रिश्ते को सनसनीख़ेज़ बनाने की कोशिश की गई है। मसलन, जैड ऐडम्स ने लिखा है कि गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते ही नहीं थे बल्कि उनके साथ बाथरूम में “नग्न स्नान” भी करते थे।
महात्मा गांधी हत्या के साठ साल गुज़र जाने के बाद भी हमारे मानस-पटल पर किसी संत की तरह उभरते हैं। अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने लंगोटधारी बुजुर्ग की रही है जो दो युवा-स्त्रियों को लाठी के रूप में सहारे के लिए इस्तेमाल करता हुआ चलता-फिरता है। आख़िरी क्षण तक गांधी ऐसे ही राजसी माहौल में रहे। मगर किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई। ऐसे में इस किताब में लिखी बाते लोगों ख़ासकर, गांधीभक्तों को शायद ही हजम हों। दुनिया के लिए गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के आध्यात्मिक नेता हैं। वह अहिंसा के प्रणेता और भारत के राष्ट्रपिता भी हैं। जो दुनिया को सविनय अवज्ञा और अहिंसा की राह पर चलने की प्रेरणा देता है।  कहना न होगा कि दुबली काया वाले उस पुतले ने दुनिया के कोने-कोने में मानव अधिकार आंदोलनों को ऊर्जा दी, उन्हें प्रेरित किया।
नई किताब यह खुलासा करती है कि गांधी उन युवा महिलाओं के साथ ख़ुद को संतप्त किया जो उनकी पूजा करती थीं और अकसर उनके साथ बिस्तर शेयर करती थीं। बहरहाल, ऐडम्स का दावा है कि लंदन से क़ानून की पढ़ाई करने के बाद वकील से गुरु बने गांधी की इमैज कठोर नेता की बनी जो अपने अनोखी सेक्सुअल डिमांड से अनुयायियों को वशीभूत कर लेता है। आमतौर पर लोग के लिए यह आचरण असहज हो सकता है पर गांधी के लिए सामान्य था। ऐडम्स ने किताब में लिखा है कि गांधी ने अपने आश्रमों में इतना कठोर अनुशासन बनाया था कि उनकी छवि 20वीं सदी के धर्मवादी नेताओं जैम्स वॉरेन जोन्स और डेविड कोरेश की तरह बन गई जो अपनी सम्मोहक सेक्स अपील से अनुयायियों को क़रीब-क़रीब ज्यों का त्यों वश में कर लेते थे। ब्रिटिश हिस्टोरियन के मुताबिक महात्मा गांधी सेक्स के बारे लिखना या बातें करना बेहद पसंद करते थे। किताब के मुताबिक हालांकि अन्य उच्चाकाक्षी पुरुषों की तरह गांधी कामुक भी थे और सेक्स से जुड़े तत्थों के बारे में आमतौर पर खुल कर लिखते थे। अपनी इच्छा को दमित करने के लिए ही उन्होंने कठोर परिश्रम का अनोखा स्वाभाव अपनाया जो कई लोगों को स्वीकार नहीं हो सकता।
किताब की शुरुआत ही गांधी की उस स्वीकारोक्ति से हुई है जिसमें गांधी ख़ुद लिखा या कहा करते थे कि उनके अंदर सेक्स-ऑब्सेशन का बीजारोपण किशोरावस्था में हुआ और वह बहुत कामुक हो गए थे। 13 साल की उम्र में 12 साल की कस्तूरबा से विवाह होने के बाद गांधी अकसर बेडरूम में होते थे। यहां तक कि उनके पिता कर्मचंद उर्फ कबा गांधी जब मृत्यु-शैया पर पड़े मौत से जूझ रहे थे उस समय किशोर मोहनदास पत्नी कस्तूरबा के साथ अपने बेडरूम में सेक्स का आनंद ले रहे थे।
किताब में कहा गया है कि विभाजन के दौरान नेहरू गांधी को अप्राकृतिक और असामान्य आदत वाला इंसान मानने लगे थे। सीनियर लीडर जेबी कृपलानी और वल्लभभाई पटेल ने गांधी के कामुक व्यवहार के चलते ही उनसे दूरी बना ली। यहां तक कि उनके परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक साथी भी इससे ख़फ़ा थे। कई लोगों ने गांधी के प्रयोगों के चलते आश्रम छोड़ दिया। ऐडम ने गांधी और उनके क़रीबी लोगों के कथनों का हवाला देकर बापू को अत्यधिक कामुक साबित करने का पूरा प्रयास किया है। किताब में पंचगनी में ब्रह्मचर्य का प्रयोग का भी वर्णन किया है, जहां गांधी की सहयोगी सुशीला नायर गांधी के साथ निर्वस्त्र होकर सोती थीं और उनके साथ निर्वस्त्र होकर नहाती भी थीं। किताब में गांधी के ही वक्तव्य को उद्धरित किया गया है। मसलन इस बारे में गांधी ने ख़ुद लिखा है, “नहाते समय जब सुशीला निर्वस्त्र मेरे सामने होती है तो मेरी आंखें कसकर बंद हो जाती हैं। मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता। मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है। मुझे कतई पता नहीं चलता कि कब वह पूरी तरह से नग्न हो गई है और कब वह सिर्फ अंतःवस्त्र पहनी होती है।”
किताब के ही मुताबिक जब बंगाल में दंगे हो रहे थे गांधी ने 18 साल की मनु को बुलाया और कहा “अगर तुम साथ नहीं होती तो मुस्लिम चरमपंथी हमारा क़त्ल कर देते। आओ आज से हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के साथ सोएं और अपने शुद्ध होने और ब्रह्मचर्य का परीक्षण करें।” ऐडम का दावा है कि गांधी के साथ सोने वाली सुशीला, मनु और आभा ने गांधी के साथ शारीरिक संबंधों के बारे हमेशा अस्पष्ट बात कही। जब भी पूछा गया तब केवल यही कहा कि वह ब्रह्मचर्य के प्रयोग के सिद्धांतों का अभिन्न अंग है।
ऐडम्स के मुताबिक गांधी अपने लिए महात्मा संबोधन पसंद नहीं करते थे और वह अपने आध्यात्मिक कार्य में मशगूल रहे। गांधी की मृत्यु के बाद लंबे समय तक सेक्स को लेकर उनके प्रयोगों पर लीपापोती की जाती रही। हत्या के बाद गांधी को महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया, जिनसे साबित किया जा सकता था कि संत गांधी दरअसल सेक्स मैनियैक थे। कांग्रेस भी स्वार्थों के लिए अब तक गांधी और उनके सेक्स-एक्सपेरिमेंट से जुड़े सच को छुपाती रही है। गांधीजी की हत्या के बाद मनु को मुंह बंद रखने की सलाह दी गई। सुशीला भी इस मसले पर हमेशा चुप ही रहीं।
किताब में ऐडम्स दावा करते हैं कि सेक्स के जरिए गांधी अपने को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और परिष्कृत करने की कोशिशों में लगे रहे। नवविवाहित जोड़ों को अलग-अलग सोकर ब्रह्मचर्य का उपदेश देते थे। ऐडम्स के अनुसार सुशीला नायर, मनु और आभा के अलावा बड़ी तादाद में महिलाएं गांधी के क़रीब आईं। कुछ उनकी बेहद ख़ास बन गईं। बंगाली परिवार की विद्वान और ख़ूबसूरत महिला सरलादेवी चौधरी से गांधी का संबंध जगज़ाहिर है। हालांकि गांधी केवल यही कहते रहे कि सरलादेवी उनकी “आध्यात्मिक पत्नी” हैं। गांधी जी डेनमार्क मिशनरी की महिला इस्टर फाइरिंग को प्रेमपत्र लिखते थे। इस्टर जब आश्रम में आती तो बाकी लोगों को जलन होती क्योंकि गांधी उनसे एकांत में बातचीत करते थे। किताब में ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मैडलीन स्लैड से गांधी के मधुर रिश्ते का जिक्र किया गया है जो हिंदुस्तान में आकर रहने लगीं और गांधी ने उन्हें मीराबेन का नाम दिया।
ऐडम्स ने कहा है कि नब्बे के दशक में उसे अपनी किताब “द डाइनैस्टी” लिखते समय गांधी और नेहरू के रिश्ते के बारे में काफी कुछ जानने को मिला। इसके बाद लेखक की तमन्ना थी कि वह गांधी के जीवन को अन्य लोगों के नजरिए से किताब के जरिए उकेरे। यह किताब उसी कोशिश का नतीजा है। जैड दावा करते हैं कि उन्होंने ख़ुद गांधी और उन्हें बेहद क़रीब से जानने वालों की महात्मा के बारे में लिखे गए किताबों और अन्य दस्तावेजों का गहन अध्ययन और शोध किया है। उनके विचारों का जानने के लिए कई साल तक शोध किया। उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे।
इस बारे में ऐडम्स ने स्वीकार किया है कि यह किताब विवाद से घिरेगी। उन्होंने कहा, “मैं जानता हूं इस एक किताब को पढ़कर भारत के लोग मुझसे नाराज़ हो सकते हैं लेकिन जब मेरी किताब का लंदन विश्वविद्यालय में विमोचन हुआ तो तमाम भारतीय छात्रों ने मेरे प्रयास की सराहना की, मुझे बधाई दी।” 288 पेज की करीब आठ सौ रुपए मूल्य की यह किताब जल्द ही भारतीय बाज़ार में उपलब्ध होगी। 'गांधीः नैक्ड ऐंबिशन' का लंदन यूनिवर्सिटी में विमोचन हो चुका है। किताब में गांधी की जीवन की तक़रीबन हर अहम घटना को समाहित करने की कोशिश की गई है। जैड ऐडम्स ने गांधी के महाव्यक्तित्व को महिमामंडित करने की पूरी कोशिश की है। हालांकि उनके सेक्स-जीवन की इस तरह व्याख्या की है कि गांधीवादियों और कांग्रेसियों को इस पर सख़्त ऐतराज़ हो सकता है। [साभार भड़ास४मीडिया]
लेखक हरिगोविंद विश्वकर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं. इस लेख का स्रोत ब्रिटिश अख़बारों में “गांधीः नैक्ड ऐंबिशन” के छपे रिव्यू और रिपोर्ताज हैं.

भारत एक नजर में

 

पृष्‍ठभूमि

भारत विश्‍व की सबसे पुरानी सम्‍यताओं में से एक है जिसमें बहुरंगी विविधता और समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत है। इसके साथ ही यह अपने-आप को बदलते समय के साथ ढ़ालती भी आई है। आज़ादी पाने के बाद पिछले 62 वर्षों में भारत ने बहुआयामी सामाजिक और आर्थिक प्रगति की है। भारत कृषि में आत्‍मनिर्भर बन चुका है और अब दुनिया के सबसे औद्योगीकृत देशों की श्रेणी में भी इसकी गिनती की जाती है। साथ ही उन चंद देशों में भी इसका शुमार होने लगा है, जिनके कदम चांद तक पहुंच चुके हैं। भारत का क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग कि.मी. है, जो हिमाच्‍छादित हिमालय की ऊंचाइयों से शुरू होकर दक्षिण के विषुवतीय वर्षा वनों तक फैला हुआ है। विश्‍व का सातवां बड़ा देश होने के नाते भारत शेष एशिया से अलग दिखता है जिसकी विशेषता पर्वत और समुद्र ने तय की है और ये इसे विशिष्‍ट भौगोलिक पहचान देते हैं। उत्तर में बृहत् पर्वत श्रृंखला हिमालय से घिरा यह कर्क रेखा से आगे संकरा होता जाता है। पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर तथा दक्षिण में हिन्‍द महासागर इसकी सीमा निर्धारित करते हैं।
पूरी तरह उत्‍तरी गोलार्ध में स्थित भारत की मुख्‍यभूमि 8 डिग्री 4 मिनट और 37 डिग्री 6 मिनट उत्‍तरी अक्षांश और 68 डिग्री 7 मिनट तथा 97 डिग्री 25 मिनट पूर्वी देशान्‍तर के बीच स्थित है । उत्‍तर से दक्षिण तक इसकी अधिकतम लंबाई 3,214 कि.मी. और पूर्व से पश्चिम तक अधिकतम चौड़ाई 2,933 कि.मी. है। इसकी ज़मीनी सीमाओं की लंबाई लगभग 15,200 कि.मी. है। जबकि मुख्‍यभूमि, लक्षद्वीप और अण्‍डमान तथा निकोबार द्वीपसमूह की तटरेखा की कुल लम्‍बाई 7,516.6 कि.मी है।

भूगोल


भारत के बारे में भौगोलिक जानकारी
ब्यौरेविवरण
स्‍थानहिमालय द्वारा भारतीय पेनिसुला का मुख्‍य भूमि एशिया से अलग किया गया है। देश पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण में हिन्‍द महासागर से घिरा हुआ है।
भौगोलिक समन्‍वययह पूर्ण रूप से उत्तरी गोलार्ध मे स्थित है, देश का विस्‍तार 8° 4' और 37° 6' l अक्षांश पर इक्‍वेटर के उत्तर में, और 68°7' और 97°25' देशान्‍तर पर है।
स्‍थायी मान समयजी एम टी + 05:30
क्षेत्र3.3 मिलियन वर्ग किलोमीटर
देश का टेलीफोन कोड+91
सीमाओं में स्थित देशउत्तर पश्चिम में अफगानिस्‍तान और पाकिस्‍तान, भूटान और नेपाल उत्तर में; म्‍यांमार पूरब में, और पश्चिम बंगाल के पूरब में बंगलादेश। श्रीलंका भारत से समुद्र के संकीर्ण नहर द्वारा अलग किया जाता है जो पाल्‍क स्‍ट्रेट और मनार की खाड़ी द्वारा निर्मित है।
समुद्रतट7,516.6 किलोमीटर जिसमें मुख्‍य भूमि, लक्षद्वीप, और अण्‍डमान और निकोबार द्वीपसमूह शामिल हैं।
जलवायुभारत की जलवायु को मोटे तौर पर उष्‍णकटिबंधीय मानसून के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। परन्‍तु भारत का अधिकांश उत्तरी भाग उष्‍णकटिबंधीय क्षेत्र के बाहर होने के बावजूद समग्र देश में उष्‍णकटिबंधीय जलवायु है जिसमें अपेक्षाकृत उच्‍च तापमान और सूखी सर्दी पड़ती है। चार मौसम है:
  1. सर्दी (दिसम्‍बर-फरवरी)
  2. गर्मी (मार्च-जून)
  3. दक्षिण पश्चिम मानसून का मौसम (जून-सितम्‍बर)
  4. मानसून पश्‍च मौसम (अक्‍तूबर-नवम्‍बर)
भूभागमुख्‍य भूमि में चार क्षेत्र हैं नामत: ग्रेट माउन्‍टेन जोन, गंगा और सिंधु का मैदान, रेगिस्‍तान क्षेत्र और दक्षिणी पेनिंसुला।
प्राकृतिक संसाधनकोयला, लौह अयस्‍क, मैगनीज अयस्‍क, माइका, बॉक्‍साइट, पेट्रोलियम, टाइटानियम अयस्‍क, क्रोमाइट, प्राकृतिक गैस, मैगनेसाइट, चूना पत्‍थर, अराबल लेण्‍ड, डोलोमाइट, माऊलिन, जिप्‍सम, अपादाइट, फोसफोराइट, स्‍टीटाइल, फ्लोराइट आदि।
प्राकृतिक आपदामानसूनी बाढ़, फ्लेश बाढ़, भूकम्‍प, सूखा, जमीन खिसकना।
पर्यावरण - वर्तमान मुद्देवायु प्रदूषण नियंत्रण, ऊर्जा संरक्षण, ठोस अपशिष्‍ट प्रबंधन, तेल और गैस संरक्षण, वन संरक्षण, आदि।
पर्यावरण-अंतर्राष्‍ट्रीय करारपर्यावरण और विकास पर रीयो की घोषणा, जैव सुरक्षा पर कार्टाजेना प्रोटोकॉल, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्‍त राज्‍य ढांचागत कार्य सम्‍मेलन के लिए क्‍योटो प्रोटोकॉल, विश्‍व व्‍यापार करार, नाइट्रोजन ऑक्‍साइड के सल्‍फर उत्‍पसर्जन को कम करने सर उनके ट्रांस बाउन्‍ड्री फ्लेक्‍सेस (नोन प्रोटोकॉल) पर एल आर टी ए पी हेन्सिंकी प्रोटोकॉल, वोलाटाइल ऑरगनिक समिश्रण या उनके ट्रांस बाऊन्‍ड्री फलाक्‍सेस (वी वो सी प्रोटोकॉल) के उत्‍सर्जन से संबंधित एल आर टी ए पी के लिए जेनेवा प्रोटोकॉल।
भूगोल-टिप्‍पणीभारत दक्षिण एशिया उप महाद्वीप के बड़े भूभाग पर फैला हुआ है।

व्‍यक्ति


भारतीय नागरिकों के बारे में सूचना
ब्यौरेविवरण
(आबादी) जनसंख्‍या1 मार्च, 2001 की स्थिति के अनुसार भारत की जनसंख्‍या 1,028 मिलियन (531.1 मि लियन पुरुष और 496.4 मिलियन महिला) की।
जनसंख्‍या वृद्धि दरऔसत वार्षिक घातांकी वृद्धि दर वर्ष 1991-2001 के दौरान 1.93 प्रतिशत है।
जन्‍म दरवर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार अनुमानित मृत्‍यु दर 24.8 है।
मृत्‍यु दरवर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार अनुमानित जन्‍म दर 8.9 है।
संम्‍भावित जीवन दर63.9 वर्ष (पुरुष) 66.9 वर्ष (महिला) (सितम्‍बर 2005 की स्थिति के अनुसार)
लिंग अनुपात2001 की जनगणना के अनुसार 933
राष्‍ट्रीयताभारतीय
जातीय अनुपातसभी पांच मुख्‍य प्रकार की जातियां, ऑस्‍ट्रेलियाड, मोंगोलॉयड, यूरोपॉयड, कोकोसिन और नीग्रोइड को भारत की जनता के बीच प्रतिनिधित्‍व मिलती है।
धर्मवर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार 1,028 मिलियन देश की कुल जनसंख्‍या में से 80.5 प्रतिशत के साथ हिन्‍दुओं की अधिकांशता है दूसरे स्‍थान पर 13.4 प्रतिशत की जनसंख्‍या वाले मुस्लिम इसके बाद ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और अन्‍य आते हैं।
भाषाएंभारतीय संविधान द्वारा 22 विभिन्न भाषाओं को मान्यता दी गई है, जिसमें हिन्दी आधिकारिक भाषा है। अनुच्छेद 343 (3) भारतीय संसद को विधि के अधीन कार्यालयीन उद्देश्यों के लिए अंग्रेजी के उपयोग को जारी रखने का अधिकार देता है।
साक्षरता2001 की जनसंख्‍या के अनंतिम परिणाम के अनुसार देश मे साक्षरता दर 64.84 प्रतिशत है। 75.26 प्रतिशत पुरुषों के लिए और महिलाओं के लिए 53.67 है।

सरकार


भारत सरकार के बारे में सूचना
ब्यौरेविवरण
देश का नामरिपब्लिक ऑफ इंडिया; भारत गणराज्‍य
सरकार का प्रकारसंसदीय सरकार पद्धति के साथ सामाजिक प्रजातांत्रिक गणराज्‍य।
राजधानीनई दिल्‍ली
प्रशासनिक प्रभाग28 राज्‍य और 7 संघ राज्‍य क्षेत्र
आजादी15 अगस्‍त 1947 (ब्रिटिश उपनिवेशीय शासन से)
संविधानभारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ।
कानून प्रणालीभारत का संविधान देश की न्‍याय प्रणाली का स्रोत है।
कार्यपालिका शाखाभारत का राष्‍ट्रपति देश का प्रधान होता है, जबकि प्रधानंत्री सरकार प्रमुख होता है और मंत्रिपरिषद् की सहायता से शासन चलाता है जो मंत्रिमंडल मंत्रालय का गठन करते हैं।
विद्यायिका शाखाभारतीय वि‍द्यायिका में लोक सभा (हाउस ऑफ दि पीपल) और राज्‍य सभी (राज्‍य परिषद्) संसद के दोनों सदनों का गठन करते हैं।
न्‍यायपालिका शाखाभारत का सर्वोच्‍च न्‍यायालय भारतीय कानून व्‍यवस्‍था का शीर्ष निकाय है इसके बाद अन्‍य उच्‍च न्‍यायालय और अधीनस्थ न्‍यायालय आते हैं।
झण्‍डे का वर्णनराष्‍ट्रीय झण्‍डा आयताकार तिरंगा है जिसमें केसरिया ऊपर है, बीच में सफेद, और बराबर भाग में नीचे गहरा हरा है। सफेद पट्टी के केन्‍द्र में गहरा नीला चक्र है जो सारनाथ में अशोक चक्र को दर्शाता है।
राष्‍ट्रीय दिवस26 जनवरी (गणतंत्र दिवस)
15 अगस्‍त (स्‍वतंत्रता दिवस)
2 अक्‍तूबर (गांधी जयंती, महात्‍मा गांधी का जन्‍म दिवस)

अर्थव्‍यवस्‍था


भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के बारे में सूचना
ब्यौरेविवरण
अर्थव्‍यवस्‍था सिंहावलोकनस्‍वतंत्रता की प्राप्ति के बाद आधी शताब्‍दी में भारत ने सभी बाधाओं को पार करते हुए आर्थिक स्थिरता का स्‍पष्‍ट स्‍तर, विभिन्‍न क्षेत्रों का शिष्‍टाचार, अदम्‍य सहयोग जैसाकि कृषि, पर्याटन, वाणिज्‍य, विद्युत, संचार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी आदि। जिन्‍होंने भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के सतंभ के रूप में कार्य किया है। आज भारत विश्‍व की छह सबसे तेजी से विकसित अर्थव्‍यवस्‍था में से एक हैं। वर्ष 2001 में शाक्ति समकक्षता खरीदने (पीपीपी) की तर्ज पर भारत का चौथा स्थान है। व्‍यवसाय और विनियामक वातावरण विकसित हो राह है और स्‍थायी सुधार की ओर आगे बढ़ रहा है।
सकल घरेलू उत्‍पादवर्ष 2005-06 की द्वितीय तिमाही में 8 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गई।
सकल घरेलू उत्‍पाद खरीद शक्ति समकक्षताभारत चौथी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है, खरीद शक्ति समकक्षता की तर्ज पर इसका जीडीपी 3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है। यह यूएसए, चीन और जापान के बाद आता है।
जीडीपी प्रति व्‍यक्तिसितम्‍बर, 2005 की स्थिति के अनुसार देश का प्रतिव्‍यक्ति सकल घरेलू उत्‍पाद 543 अमेरिकी डॉलर था।
जीडीपी क्षेत्रकों द्वारा निर्माणसेवाएं 56 प्रतिशत कृषि 22 प्रतिशत और उद्योग 22 प्रतिशत (सितम्‍बर, 2005 की स्थिति के अनुसार
श्रमिक बलइंडिया विजन : 2020 पर समिति की रिपोर्ट के अनुसार भारत का श्रमिक बल 2002 में 375 मिलियन से अधिक पहुंच गई है।
बेरोजगारी की दर9.1% (सितम्‍बर 2005 के अनुसार)
गरीबी रेखा के नीचे जनसंख्‍या1999-2000 को 26.10%
मुद्रास्‍फीति की दरजुलाई 2005 को 4.1%
सार्वजनिक ऋण31 मार्च 2002 को कुल ऋण 72117.58 करोड़ रू है
विनियम दरविनिमय दरों के लिए प्रति दिन भारतीय रिजर्व बैंक (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) की वेबसाइट देखें
कृषि उत्‍पादचावल, गेहूं, चाय, कपास, गन्‍ना, आलू, जूट, तिलहन, पोल्‍ट्री आदि
उद्योगइस्‍पात, वस्‍त्र, पेट्रोलियम, सीमेंट, मशीनरी, लोकोमोटिव, खाद्य प्रसंस्‍करण, भैषजिक उत्‍पाद, खनन आदि
मुद्रा (कोड)भारतीय रूपए (आईएनआर)
वित्‍तीय वर्ष1 अप्रैल से 31 मार्च

[स्रोत: पर्यावरण मंत्रालय, योजना आयोग, स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय, पत्र सूचना कार्यालय, भारत की जनगणना, विदेश मंत्रालय, केन्‍द्रीय बजट, भारतीय रिजर्व बैंक]

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

श्री अटल बिहारी वाजपेयी

देश और दुनिया की राजनीतिक क्षितिज पर ध्रुव तारे की तरह अटल एक सितारा कोई है तो वह है हमारे अपने तथा देश के लाडले नेता माननीय अटलबिहारी वाजपेयी . वे देश के सर्वाधिक लोकप्रिय एवं सर्वमान्य नेता है . एक ऐसे उदार नेता जिनकी कथनी और करनी में कभी अंतर नहीं रहा . वे देश के एक मात्र नेता है जो भाषण के जरिये लाखों लोंगों को घंटो तक बाँधें रखने की क्षमता रखते है . ह्रदय से अत्यंत ही भावुक लेकिन तेजस्वी नेता माननीय अटलबिहारी वाजपेयी का आज 87 वां जन्म दिन है . श्री वाजपेयी का जन्म 25 दिसम्बर, 1924 को ग्वालियर (मध्यप्रदेश) में हुआ था. इनके पिता का नाम श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी और माता का नाम श्रीमती कृष्णा देवी है.श्री वाजपेयी के पास 40 वर्षों से अधिक का एक लम्बा संसदीय अनुभव है. वे 1957 से सांसद रहे हैं. वे पांचवी, छठी और सातवीं लोकसभा तथा फिर दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं , तेरहवीं और चौदहवीं लोकसभा के लिए चुने गए और सन् 1962 तथा 1986 में राज्यसभा के सदस्य रहे.वे लखनऊ (उत्तरप्रदेश) से लगातार पांच बार लोकसभा सांसद चुने गए. वे ऐसे अकेले सांसद हैं जो अलग-अलग समय पर चार विभिन्न राज्यों-उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश तथा दिल्ली से निर्वाचित हुए हैं.
 


 
 

श्री अटल बिहारी वाजपेयी 16 से 31 मई, 1996 और दूसरी बार 19 मार्च, 1998 से 13 मई, 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे. प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद वे ऐसे अकेले प्रधानमंत्री रहे हैं जिन्होंने लगातार तीन जनादेशों के जरिए भारत के प्रधानमंत्री पद को सुशोभित किया. श्री वाजपेयी, श्रीमती इन्दिरा गांधी के बाद ऐसे पहले प्रधानमंत्री रहे हैं जिन्होंने निरन्तर चुनावों में विजय दिलाने के लिए अपनी पार्टी का नेतृत्व किया.
वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन जो देश के विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न पार्टियों का एक चुनाव-पूर्व गठबन्धन है और जिसे तेरहवीं लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों का पूर्ण समर्थन और सहयोग हासिल है, के नेता चुने गए. श्री वाजपेयी भाजपा संसदीय पार्टी जो बारहवीं लोकसभा की तरह तेरहवीं लोकसभा में भी अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, के निर्वाचित नेता रहे हैं.
उन्होंने विक्टोरिया (अब लक्ष्मीबाई) कॉलेज, ग्वालियर और डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर (उत्तरप्रदेश) से शिक्षा प्राप्त की. श्री वाजपेयी ने एम.ए. (राजनीति विज्ञान) की डिग्री हासिल की है तथा उन्होंने अनेक साहित्यिक, कलात्मक और वैज्ञानिक उपलब्धियां अर्जित की हैं. उन्होंने राष्ट्रधर्म (हिन्दी मासिक), पांचजन्य (हिन्दी साप्ताहिक) और स्वदेश तथा वीर अर्जुन दैनिक समाचार-पत्रों का संपादन किया. उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं–”मेरी संसदीय यात्रा”(चार भागों में); ”मेरी इक्यावन कविताएं”; ”संकल्प काल”; ”शक्ति से शांति” और ”संसद में चार दशक” (तीन भागों में भाषण), 1957-95; ”लोकसभा में अटलजी” (भाषणों का एक संग्रह); ”मृत्यु या हत्या”; ”अमर बलिदान”; ”कैदी कविराज की कुंडलियां”(आपातकाल के दौरान जेल में लिखीं कविताओं का एक संग्रह); ”भारत की विदेश नीति के नये आयाम”(वर्ष 1977 से 1979 के दौरान विदेश मंत्री के रूप में दिए गए भाषणों का एक संग्रह); ”जनसंघ और मुसलमान”; ”संसद में तीन दशक”(हिन्दी) (संसद में दिए गए भाषण 1957-1992-तीन भाग); और ”अमर आग है” (कविताओं का संग्रह),1994.
श्री वाजपेयी ने विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया है. वे सन् 1961 से राष्ट्रीय एकता परिषद् के सदस्य रहे हैं. वे कुछ अन्य संगठनों से भी सम्बध्द रहे हैं जैसे-(1) अध्यक्ष, ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एंड असिस्टेंट मास्टर्स एसोसिएशन (1965-70);(2) पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मारक समिति (1968-84); (3) दीनदयाल धाम, फराह, मथुरा (उत्तर प्रदेश); और (4) जन्मभूमि स्मारक समिति, (1969 से) .
पूर्ववर्ती जनसंघ के संस्थापक-सदस्य (1951), अध्यक्ष, भारतीय जनसंघ (1968-73), जनसंघ संसदीय दल के नेता (1955-77) तथा जनता पार्टी के संस्थापक-सदस्य (1977-80), श्री वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष (1980-86) और भाजपा संसदीय दल के नेता (1980-1984,1986 तथा 1993-1996) रहे. वे ग्यारहवीं लोकसभा के पूरे कार्यकाल तक प्रतिपक्ष के नेता रहे. इससे पहले वे 24 मार्च 1977 से लेकर 28 जुलाई, 1979 तक मोरारजी देसाई सरकार में भारत के विदेश मंत्री रहे.
पंडित जवाहरलाल नेहरु की शैली के राजनेता के रुप में देश और विदेश में अत्यंत सम्मानित श्री वाजपेयी के प्रधानमंत्री के रुप में 1998-99 के कार्यकाल को ”साहस और दृढ़-विश्वास का एक वर्ष” के रुप में बताया गया है. इसी अवधि के दौरान भारत ने मई 1998 में पोखरण में कई सफल परमाणु परीक्षण करके चुनिन्दा राष्ट्रों के समूह में स्थान हासिल किया. फरवरी 1999 में पाकिस्तान की बस यात्रा का उपमहाद्वीप की बाकी समस्याओं के समाधान हेतु बातचीत के एक नये युग की शुरुआत करने के लिए व्यापक स्वागत हुआ। भारत की निष्ठा और ईमानदारी ने विश्व समुदाय पर गहरा प्रभाव डाला. बाद में जब मित्रता के इस प्रयास को कारगिल में विश्वासघात में बदल दिया गया, तो भारत भूमि से दुश्मनों को वापिस खदेड़ने में स्थिति को सफलतापूर्वक सम्भालने के लिए भी श्री वाजपेयी की सराहना हुई . श्री वाजपेयी के 1998-99 के कार्यकाल के दौरान ही वैश्विक मन्दी के बाबजूद भारत ने 5.8 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृध्दि दर हासिल की जो पिछले वर्ष से अधिक थी. इसी अवधि के दौरान उच्च कृषि उत्पादन और विदेशी मुद्रा भण्डार जनता की जरुरतों के अनुकूल अग्रगामी अर्थव्यवस्था की सूचक थी . ”हमें तेजी से विकास करना होगा। हमारे पास और कोई दूसरा विकल्प नहीं है ” वाजपेयीजी का नारा रहा है जिसमें विशेषकर गरीब ग्रामीण लोगों को आर्थिक रुप से मजबूत बनाने पर बल दिया गया है . ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने, सुदृढ़ आधारभूत-ढांचा तैयार करने और मानव विकास कार्यक्रमों को पुनर्जीवित करने हेतु उनकी सरकार द्वारा लिए गये साहसिक निर्णय ने भारत को 21वीं सदी में एक आर्थिक शक्ति बनाने के लिए अगली शताब्दी की चुनौतियों से निपटने हेतु एक मजबूत और आत्म-निर्भर राष्ट्र बनाने के प्रति उनकी सरकार की प्रतिबध्दता को प्रदर्शित किया . 52वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लालकिले की प्राचीर से बोलते हुए उन्होंने कहा था, ”मेरे पास भारत का एक सपना है: एक ऐसा भारत जो भूखमरी और भय से मुक्त हो, एक ऐसा भारत जो निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो. ”
श्री वाजपेयी ने संसद की कई महत्वपूर्ण समितियों में कार्य किया है. वे सरकारी आश्वासन समिति के अध्यक्ष (1966-67); लोक लेखा समिति के अध्यक्ष (1967-70); सामान्य प्रयोजन समिति के सदस्य (1986); सदन समिति के सदस्य और कार्य-संचालन परामर्शदायी समिति, राज्य सभा के सदस्य (1988-90); याचिका समिति, राज्य सभा के अध्यक्ष (1990-91); लोक लेखा समिति, लोक सभा के अध्यक्ष (1991-93); विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष (1993-96) रहे.
श्री वाजपेयी ने स्वतंत्रता संघर्ष में हिस्सा लिया और वे 1942 में जेल गये . उन्हें 1975-77 में आपातकाल के दौरान बन्दी बनाया गया था .
व्यापक यात्रा कर चुके श्री वाजपेयी अंतर्राष्ट्रीय मामलों, अनुसूचित जातियों के उत्थान, महिलाओं और बच्चों के कल्याण में गहरी रुचि लेते रहे हैं . उनकी कुछ विदेश यात्राओं में ये शामिल हैं- संसदीय सद्भावना मिशन के सदस्य के रुप में पूर्वी अफ्रीका की यात्रा, 1965; आस्ट्रेलिया के लिए संसदीय प्रतिनिधिमंडल 1967; यूरोपियन पार्लियामेंट, 1983; कनाडा 1987; कनाडा में हुई राष्ट्रमंडल संसदीय संघ की बैठकों में भाग लेने हेतु भारतीय प्रतिनिधिमंडल 1966 और 1984; जाम्बिया, 1980; इस्ले आफ मैन, 1984; अंतर-संसदीय संघ सम्मेलन, जापान में भाग लेने हेतु भारतीय प्रतिनिधिमंडल, 1974; श्रीलंका, 1975; स्वीट्जरलैंड 1984; संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल, 1988, 1990, 1991, 1992, 1993 और 1994; मानवाधिकार आयोग सम्मेलन, जेनेवा में भाग लेने हेतु भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता, 1993.
श्री वाजपेयी को उनकी राष्ट्र की उत्कृष्ट सेवाओं के लिए वर्ष 1992 में पद्म विभूषण दिया गया. उन्हें 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार तथा सर्वोत्तम सांसद के लिए भारत रत्न ,पंडित गोविन्द बल्लभ पंत पुरस्कार भी प्रदान किया गया. इससे पहले, वर्ष 1993 में उन्हें कानपुर विश्वविद्यालय द्वारा फिलॉस्फी की मानद डाक्टरेट उपाधि प्रदान की गई.
श्री वाजपेयी काव्य के प्रति लगाव और वाक्पटुता के लिए जाने जाते हैं और उनका व्यापक सम्मान किया जाता है. श्री वाजपेयीजी पुस्तकें पढ़ने के बहुत शौकीन हैं। वे भारतीय संगीत और नृत्य में भी काफी रुचि लेते हैं.
वे निम्नलिखित पदों पर आसीन रहे :—
•1951 – भारतीय जनसंघ के संस्थापक-सदस्य (B.J.S)
•1957 – दूसरी लोकसभा के लिए निर्वाचित
•1957-77 – भारतीय जनसंघ संसदीय दल के नेता
•1962 – राज्यसभा के सदस्य
•1966-67 – सरकारी आश्वासन समिति के अध्यक्ष
•1967 – चौथी लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (दूसरी बार)
•1967-70 – लोक लेखा समिति के अध्यक्ष
•1968-73 – भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष
•1971 – पांचवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (तीसरी बार)
•1977 – छठी लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (चौथी बार)
•1977-79 – केन्द्रीय विदेश मंत्री
•1977-80 – जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य
•1980 – सातवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (पांचवीं बार)
•1980-86 – भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष
•1980-84, 1986 और 1993-96 – भाजपा संसदीय दल के नेता
•1986 – राज्यसभा के सदस्य; सामान्य प्रयोजन समिति के सदस्य
•1988-90 – आवास समिति के सदस्य; कार्य-संचालन सलाहकार समिति के सदस्य
•1990-91 – याचिका समिति के अध्यक्ष
•1991 – दसवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (छठी बार)
•1991-93 – लोकलेखा समिति के अध्यक्ष
•1993-96 – विदेश मामलों सम्बन्धी समिति के अध्यक्ष; लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता
•1996 – ग्यारहवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (सातवीं बार)
•16 मई 1996 – 31 मई 1996 तक – भारत के प्रधानमंत्री; विदेश मंत्री और इन मंत्रालयों/विभागों के प्रभारी .मंत्री-रसायन तथा उर्वरक; नागरिक आपूर्ति, उपभोक्ता मामले और .सार्वजनिक वितरण; कोयला; वाणिज्य; संचार; पर्यावरण और वन;.खाद्य प्रसंस्करण उद्योग; मानव संसाधन विकास; श्रम; खान; .गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत; लोक शिकायत एवं पेंशन; पेट्रोलियम और .प्राकृतिक गैस; योजना तथा कार्यक्रम कार्यान्वयन; विद्युत; रेलवे,ग्रामीण क्षेत्र और रोजगार; विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी; इस्पात; भूतल परिवहन; कपड़ा; जल संसाधन; परमाणु ऊर्जा; इलेक्ट्रॉनिक्स; जम्मू व कश्मीर मामले; समुन्द्री विकास; अंतरिक्ष और किसी अन्य केबिनेट मंत्री को आबंटित न किए गए अन्य विषय।
•1996-97 – प्रतिपक्ष के नेता, लोकसभा
•1997-98 – अध्यक्ष, विदेश मामलों सम्बन्धी समिति
•1998 – बारहवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (आठवीं बार)
•1998-99 – भारत के प्रधानमंत्री; विदेश मंत्री; किसी मंत्री को विशिष्ट रूप से आबंटित न किए गए मंत्रालयों/विभागों का भी प्रभार
•1999 – तेरहवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (नौवीं बार)
•13 अक्तूबर 1999 से 13 मई 2004 तक- भारत के प्रधानमंत्री और किसी मंत्री को विशिष्ट रूप से .आबंटित न किए गए मंत्रालयों/विभागों का भी प्रभार
•2004 – चौदहवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (दसवीं बार)
इन दिनों वे काफी अस्वस्थ है,19-20 दिसंबर 2010 को मै दिल्ली में था, उनसे मिलने के लिए मैंने काफी हाथ पैर मारा लेकिन मुझे सफलता नहीं मिली .मैंने मा. राजनाथ जी से भी गुजारिश की, उन्होंने भी असमर्थता व्यक्त कर दी अंततः मुझे निराश होकर वापस रायपुर लौटना पढ़ा. आज उनका 87 वां जन्म-दिन है. श्री अटल जी को जन्म दिन की ढेर सारी शुभकामनाएं एवं बधाई. ईश्वर से प्रार्थना है कि अटल जी को दीर्घायु दें तथा स्वस्थ होकर वे देश का पुनः नेतृत्व करें.
अशोक बजाज [साभार प्रवक्ता.कॉम]

विनायक सेन, माओवाद और बेचारा जनतंत्र!

डा. विनायक सेन- एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, पढ़ाई से डाक्टर हैं, प्रख्यात श्रमिक नेता स्व.शंकरगुहा नियोगी के साथ मिलकर मजदूरों के बीच काम किया, गरीबों के डाक्टर हैं और चाहते हैं कि आम आदमी की जिंदगी से अंधेरा खत्म हो। ऐसे आदमी का माओवादियों से क्या रिश्ता हो सकता है ? लेकिन रायपुर की अदालत ने उन्हें राजद्रोह का आरोपी पाया है। आजीवन कारावास की सजा दी है। प्रथम दृष्ट्या यह एक ऐसा सच है जो हजम नहीं होता। रायपुर में रहते हुए मैंने उन्हें देखा है। उनके जीवन और जिंदगी को सादगी से जीने के तरीके पर मुग्ध रहा हूं। किंतु ऐसा व्यक्ति किस तरह समाज और व्यवस्था को बदलने के आंदोलन से जुड़कर कुछ ऐसे काम भी कर डालता है कि उसके काम देशद्रोह की परिधि में आ जाएं, मुझे चिंतित करते हैं। क्या हमारे लोकतंत्र की नाकामियां ही हमारे लोगों को माओवाद या विभिन्न देशतोड़क विचारों की ओर धकेल रही हैं? इस प्रश्न पर मैं उसी समय से सोच रहा हूं जब डा. विनायक सेन पर ऐसे आरोप लगे थे।

अदालत के फैसले पर हाय-तौबा क्यों-
अदालत, अदालत होती है और वह सबूतों की के आधार पर फैसले देती हैं। अदालत का फैसला जो है उससे साबित है कि डा. सेन के खिलाफ आरोप जो थे, वे आरोप सच पाए गए और सबूत उनके खिलाफ हैं। अभी कुछ समय पहले की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इसी मामले पर जमानत दी थी। उस जमानत को एक बड़ी विजय के रूप में निरूपित किया गया था और तब हमारे कथित बुद्धिजीवियों ने अदालत की बलिहारी गायी थी। अब जब रायपुर की अदालत का फैसला सामने है तो स्वामी अग्निवेश से लेकर तमाम समाज सेवकों की भाषा सुनिए कि अदालतें भरोसे के काबिल नहीं रहीं और अदालतों से भरोसा उठ गया है और जाने क्या-क्या। ये बातें बताती हैं कि हम किस तरह के समाज में जी रहे हैं। जहां हम अपनी संवैधानिक संस्थाओं को सम्मान देना तो दूर उनके प्रति अविश्वास पैदा कर न्याय की बात करते हैं। निशाना यहां तक कि जनतंत्र भी हमें बेमानी लगने लगता है और हम अपने न्यायपूर्ण राज्य का स्वर्ग माओवाद में देखने लगते हैं। देश में तमाम ऐसी ताकतें, जिनका इस देश के गणतंत्र में भरोसा नहीं है अपने निजी स्वर्ग रचना चाहती हैं। उनकी जंग जनतंत्र को असली जनतंत्र में बदलने, उसे सार्थक बनाने की नहीं हैं। उनकी जंग तो इस देश के भूगोल को तितर-बितर कर देने के लिए है। वे भारत को सांस्कृतिक इकाई के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं। शायद इसी वैचारिक एकता के नाते अलग काश्मीर का ख्वाब देखने वाले अलीशाह गिलानी, माओ का राज लाने में लगे कवि बरवर राव और देश को टुकड़ों का बांटने की स्वप्नदृष्टा अरूंघती राय, खालिस्तान के समर्थक नेता एक मंच पर आने में संकोच नहीं करते। यह आश्चर्यजनक है इन सबके ख्वाब और मंजिलें अलग-अलग हैं पर मंच एक हैं और मिशन एक है- भारत को कमजोर करना। यह अकारण नहीं है मीडिया की खबरें हमें बताती हैं कि जब छत्तीसगढ़ में माओवादियों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुयी तो उसमें लश्करे तैयबा के दो प्रतिनिधि भी वहां पहुंचे।
उनकी लड़ाई तो देश के गणतंत्र के खिलाफ है-
आप इस सचों पर पर्दा डाल सकते हैं। देश के भावी प्रधानमंत्री की तरह सोच सकते हैं कि असली खतरा लश्करे तैयबा से नहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है। चीजों को अतिसरलीकृत करके देखने का अभियान जो हमारी राजनीति ने शुरू किया है ,उसका अंत नहीं है। माओवादियों के प्रति सहानूभूति रखने वाली लेखिका अगर उन्हें हथियारबंद गांधीवादी कह रही हैं तो हम आप इसे सुनने के लिए मजबूर हैं। क्योंकि यह भारतीय लोकतंत्र ही है, जो आपको लोकतंत्र के खिलाफ भी आवाज उठाने की आजादी देता है। यह लोकतंत्र का सौन्दर्य भी है। हमारी व्यवस्था जैसी भी है किंतु उसे लांछित कर आप जो व्यवस्थाएं लाना चाहते हैं क्या वे न्यायपूर्ण हैं? इस पर भी विचार करना चाहिए। जिस तरह से विचारों की तानाशाही चलाने का एक विचार माओवाद या माक्सर्वाद है क्या वह किसी घटिया से लोकतंत्र का भी विकल्प हो सकता है? पूरी इस्लामिक पट्टी में भारत के समानांतर कोई लोकतंत्र खोजकर बताइए ? क्या कारण है अलग- अलग विचारों के लोग भारत के गणतंत्र या भारतीय राज्य के खिलाफ एक हो जाते हैं। उनकी लड़ाई दरअसल इस देश की एकता और अखंडता से है।
मोहरे और नारों के लिए गरीबों की बात करना एक अलग बात है किंतु जब काश्मीर के आतंकवादियों- पत्थर बाजों, मणिपुर के मुइया और माओवादी आतंकवादियों के सर्मथक एक साथ खड़े नजर आते हैं तो बातें बहुत साफ हो जाती हैं। इसे तर्क से खारिज नहीं किया जा सकता कि घोटालेबाज धूम रहे हैं और विनायक सेन को सजा हो जाती है। धोटालेबाजों को भी सजा होनी चाहिए, वे भी जेल में होने चाहिए। किसी से तुलना करके किसी का अपराध कम नहीं हो जाता। अरूंधती की गलतबयानी और देशद्रोही विचारों के खिलाफ तो केंद्र सरकार मामला दर्ज करने के पीछे हट गयी तो क्या उससे अरूंधती का पाप कम हो गया। संसद पर हमले के आरोपी को सजा देने में भारतीय राज्य के हाथ कांप रहे हैं तो क्या उससे उसका पाप कम हो गया। यह हमारे तंत्र की कमजोरियां हैं कि यहां निरपराध लोग मारे जाते हैं, और अपराधी संसद तक पहुंच जाते हैं। किंतु इन कमजोरियों से सच और झूठ का अंतर खत्म नहीं हो जाता। जनसंगठन बना कर नक्सलियों के प्रति सहानुभूति के शब्दजाल रचना, कूटरचना करना, भारतीय राज्य के खिलाफ वातावरण बनाना, विदेशी पैसों के बल पर देश को तोड़ने का षडयंत्र करना ऐसे बहुत से काम हैं जो हो रहे हैं। हमें पता है वे कौन से लोग हैं किंतु हमारे जनतंत्र की खूबियां हैं कि वह तमाम सवालों पर अन्यान्न कारणों से खामोशी ओढ़ लेता है। वोटबैंक की राजनीति ने हमारे जनतंत्र को सही मायने में कायर और निकम्मा बना दिया है। फैसले लेने में हमारे हाथ कांपते हैं। देशद्रोही यहां शान से देशतोड़क बयान देते हुए घूम सकते हैं। माओ के राज के स्वप्नदृष्टा जरा माओ के राज में ऐसा करके दिखाएं। माओ, स्टालिन को भूल जाइए ध्येन आन-मन चौक को याद कीजिए।
विचारों की तानाशाही भी खतरनाकः
सांप्रदायिकता और आतंकवाद के नाम पर भयभीत हम लोगों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस धरती पर ऐसे हिंसक विचार भी हैं- जिन्होंने अपनी विचारधारा के लिए लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा है। ये हिंसक विचारों के पोषक ही भारतीय जनतंत्र की सदाशयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। आप याद करें फैसले पक्ष में हों तो न्यायपालिका की जय हो , फैसले खिलाफ जाएं तो न्यायपालिका की ऐसी की तैसी। इसे आप राममंदिर पर आए न्यायालय के फैसले से देख सकते हैं। पहले वामविचारी बुद्धिवादी कहते रहे न्यायालय का सम्मान कीजिए और अब न्यायालय के फैसले पर भी ये ही उंगली उठा रहे हैं। इनकी नजर में तो राम की कपोल कल्पना हैं। मिथक हैं। जनविश्वास और जनता इनके ठेंगें पर। किंतु आप तय मानिए कि राम अगर कल्पना हैं मिथक हैं तो भी इतिहास से सच्चे हैं , क्योंकि उनकी कथा गरीब जनता का कंठहार है। उनकी स्तुति और उनकी गाथा गाता हुआ भारतीय समाज अपने सारे दर्द भूल जाता है जो इस अन्यायी व्यवस्था ने उसे दिए हैं।
डा. विनायक सेन, माओवादी आतंकी नहीं हैं। वे बंदूक नहीं चलाते। अरूंधती राय भी नक्सलवादी नहीं हैं। अलीशाह गिलानी भी खुद पत्थर नहीं फेंकते। वे तो यहां तक नाजुक हैं कि नहीं चाहते कि उनका बेटा कश्मीर आकर उनकी विरासत संभाले और मुसीबतें झेले। क्योंकि उसके लिए तो गरीब मुसलमानों के तमाम बेटे हैं जो गिलानी की शह पर भारतीय राज्य पर पत्थर बरसाते रहेंगें, उसके लिए अपने बेटे की जान जोखिम में क्यों डाली जाए। इसी तरह बरवर राव भी खून नहीं बहाते, शब्दों की खेती करते हैं। लेकिन क्या ये सब मिलकर एक ऐसा आधार नहीं बनाते जिससे जनतंत्र कमजोर होता है, देश के प्रति गुस्सा भरता है। माओवाद को जानने वाले जानते हैं कि यह आखिर लड़ाई किस लिए है। इस बात को माओवादी भी नहीं छिपाते कि आखिर वे किसके लिए और किसके खिलाफ लड़ रहे हैं। बहुत साफ है कि उनकी लड़ाई हमारे लोकतंत्र के खिलाफ है और 2050 तक भारतीय राजसत्ता पर कब्जा करना उनका घोषित लक्ष्य है। यह बात सारा देश समझता है किंतु हमारे मासूम बुद्धिवादी नहीं समझते। उन्हें शब्दजाल बिछाने आते है। वे माओवादी आतंक को जनमुक्ति और जनयुद्घ जैसे खूबसूरत नाम देते हैं और चाहते हैं कि माओवादियों के पाप इस शब्दावरण में छिप जाएं। झूठ, फरेब और ऐसी बातें फैलाना जिससे नक्सलवाद के प्रति मन में सम्मान का भाव का आए यही माओवादी समर्थक विचारकों का लक्ष्य है। उसके लिए उन्होंने तमाम जनसंगठन बना रखे हैं, वे कुछ भी अच्छा नहीं करते ऐसा कहना कठिन है। किंतु वे माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं और उन्हें महिमामंडित करने का कोई अवसर नहीं चूकते इसमें दो राय नहीं हैं। ये सारी बातें अंततः हमारे हमारे जनतंत्र के खिलाफ जाती हैं क्या इसमें कोई दो राय है।
देशतोड़कों की एकताः
देश को तोड़ने वालों की एकता ऐसी कि अरूंधती राय, वरवर राय, अली शाह गिलानी को एक मंच पर आने में संकोच नहीं हैं। आखिर कोई भी राज्य किसी को कितनी छूट दे सकता है। किंतु राज्य ने छूट दी और दिल्ली में इनकी देशद्रोही एकजुटता के खिलाफ केंद्र सरकार खामोश रही। यह लोकतंत्र ही है कि ऐसी बेहूदिगियां करते हुए आप इतरा सकते हैं। नक्सलवाद को जायज ठहराते बुद्धिजीवियों ने किस तरह मीडिया और मंचों का इस्तेमाल किया है इसे देखना है तो अरूंधती राय परिधटना को समझने की जरूरत है। यह सही मायने में मीडिया का ऐसा इस्तेमाल है जिसे राजनेता और प्रोपेगेंडा की राजनीति करने वाले अक्सर इस्तेमाल करते हैं। आप जो कहें उसे उसी रूप में छापना और दिखाना मीडिया की जिम्मेदारी है किंतु कुछ दिन बाद जब आप अपने कहे की अनोखी व्याख्याएं करते हैं तो मीडिया क्या कर सकता है। अरूंधती राय एक बड़ी लेखिका हैं उनके पास शब्दजाल हैं। हर कहे गए वाक्य की नितांत उलझी हुयी व्याख्याएं हैं। जैसे 76 सीआरपीएफ जवानों की मौत पर वे “दंतेवाड़ा के लोगों को सलाम” भेजती हैं। आखिर यह सलाम किसके लिए है मारने वालों के लिए या मरनेवालों के लिए। ऐसी बौद्धिक चालाकियां किसी हिंसक अभियान के लिए कैसी मददगार होती हैं। इसे वे बेहतर समझते हैं जो शब्दों से खेलते हैं। आज पूरे देश में इन्हीं तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ऐसा भ्रम पैदा किया है कि जैसे नक्सली कोई महान काम कर रहे हों। ये तो वैसे ही है जैसे नक्सली हिंसा हिंसा न भवति। कभी हमारे देश में कहा जाता था वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। सरकार ने एसपीओ बनाए, उन्हें हथियार दिए इसके खिलाफ गले फाड़े गए, लेख लिखे गए। कहा गया सरकार सीधे-साधे आदिवासियों का सैन्यीकरण कर रही। यही काम नक्सली कर रहे हैं, वे बच्चों के हाथ में हथियार दे रहे तो यही तर्क कहां चला जाता ।
लोकतंत्र में ही असहमति का सौंदर्य कायम-
बावजूद इसके कोई ऐसा नहीं कर सकता कि वह डा. विनायक सेन और उनके साथियों को रायपुर की एक अदालत द्वारा आजीवन कारावास दिए जाने पर खुशी मनाए। वैचारिक विरोधों की भी अपनी सीमाएं हैं। इसके अलावा देश में अभी और भी अदालतें हैं, मेरा भरोसा है कि डा. सेन अगर निरपराध होंगें तो उन्हें ऊपरी अदालतें दोषमुक्त कर देंगीं। किंतु मैं स्वामी अग्निवेश की तरह अदालत के फैसले को अपमानित करने वाली प्रतिक्रिया नहीं कर सकता। देश का एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमें अदालत और उसकी प्रक्रिया में भरोसा करना चाहिए, क्योंकि हमारा जनतंत्र हमें एक ऐसा वातावरण देता हैं, जहां आप व्यवस्था से लड़ सकते हैं। दिल पर हाथ रखकर सोचिए कि क्या माओवाद की लड़ाई हमारे जनतंत्र के खिलाफ नहीं है। अगर है तो हमारे ये समाजसेवी, बुद्धिजीवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता, जनसंगठनों के लोग उनके प्रति सहानुभूति क्यों रख रहे हैं। क्या भारतीय राज्य को गिलानियों, माओवादियों, मणिपुर के मुईया, खालिस्तान समर्थकों के आगे हथियार डाल देने चाहिए और कहना चाहिए आइए आप ही राज कीजिए। इस देश को टुकड़ों में बांटने की साजिशों में लगे लोग ही ऐसा सोच सकते हैं। हम और आप नहीं। जनतंत्र कितना भी घटिया होगा किसी भी धर्म या अधिनायकवादी विचारधारा के राज से तो बेहतर है। महात्मा गांधी जिन्होंने कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया, अरूँधती का बेशर्म साहस ही है जो नक्सलियों को ‘बंदूकधारी गांधीवादी’ कह सकती हैं। ये सारा भी अरूंधती, गिलानी और उनकी मंडली इसलिए कर पा रही है, क्योंकि देश में लोकतंत्र है। अगर मैं लोकतंत्र में असहमति के इस सौंदर्य पर मुग्ध हूं- तो गलत क्या है। बस, इसी एक खूबी के चलते मैं किसी गिलानी के इस्लामिक राज्य, किसी छत्रधर महतो के माओराज का नागरिक बनने की किसी भी संभावना के खिलाफ खड़ा हूं। खड़ा रहूंगा।
संजय द्विवेदी [साभार प्रवक्ता.कॉम] 

रविवार, 11 अप्रैल 2010

इतनी क्यों पी रखी है?

नशे में धुत संता को सड़क पर लड़खड़ाते देख पुलिसवाले ने पूछा: इतनी क्यों पी रखी है?
संता: मजबूरी थी साहब।

पुलिसवाला: ऐसी क्या मजबूरी थी?
संता: बोतल का ढक्कन गुम हो गया था!

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

चाहे तुम घर पहुंचो या नहीं!

नीता: तुम्हारे पति हमेशा ही घर समय पर कैसे पहुंचते हैं?
मीता: मैंने एक आसान सा नियम बनाया हुआ है...
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'रोमांस ठीक 9 बजे शुरू हो जाएगा, चाहे तुम घर पहुंचो या नहीं!'

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

स्लाइड में अपनी पे स्लिप लगा दी

बॉस (बंता से): अपनी प्रेजेंटेशन की शुरुआत एक जोक के साथ करना।
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बंता ने प्रेजेंटेशन की पहली स्लाइड में अपनी पे स्लिप लगा दी।

रविवार, 24 जनवरी 2010

आंटी से कहना, मुझे भूल जाएं

लड़की: मेरी मम्मी को तुम बहुत पसंद आए।

लड़का: कुछ भी हो, मैं शादी तुमसे ही करूंगा। आंटी से कहना, मुझे भूल जाएं।

रविवार, 17 जनवरी 2010

आजादी के लिए

उन दिनों महान स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद देश के नामी वकीलों में गिने जाते थे। उनके पास मान-सम्मान और पैसे की कोई कमी नहीं थी। लेकिन जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तो राजेन्द्र बाबू ने वकालत छोड़ दी और अपना पूरा समय मातृभूमि की सेवा में लगाने लगे। हालांकि अपने एक पुराने मित्र रायबहादुर हरिहर प्रसाद सिंह को दिए वचन के कारण उनके मुकदमों की पैरवी के लिए उन्हें इंग्लैण्ड जाना पड़ा।

सीनियर बैरिस्टर अपजौन इंग्लैण्ड में हरि जी का केस लड़ रहे थे, जिनके साथ राजेन्द्र बाबू को काम करना था। अपजौन देखते कि राजेन्द्र बाबू सुबह से शाम तक अपना काम बिना कुछ बोले, पूरी निष्ठा और लगन के साथ करते रहते हैं। वह उनकी सादगी और विनम्रता से बेहद प्रभावित हुए। एक दिन किसी ने अपजौन को राजेंद्र बाबू के बारे में बताया कि वह एक सफल वकील रहे हैं पर अपने देश को आजाद कराने के लिए उन्होंने वकालत छोड़ दी और अब गांधीजी के निकटतम सहयोगी हैं।

अपजौन को आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगे कि ये इतने दिनों से मेरे साथ काम कर रहे है पर अपने मुंह से आज तक अपने बारे में कुछ नहीं बताया। अपजौन एक दिन राजेन्द्र बाबू से बोले- लोग सफलता, पद और पैसे के पीछे भागते हैं और आप हैं कि इतनी चलती हुई वकालत को ठोकर मार दी। आपने गलत किया। राजेन्द्र बाबू ने जवाब दिया- एक सच्चे हिंदुस्तानी को अपने देश को आजाद कराने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए। वकालत छोड़ना तो एक छोटी सी बात है। अपजौन अवाक रह गए।

लंबी-लंबी तो छोड़ रहा हूं।

प्रेमी: तुम्हारी आंखें कितनी हसीन हैं...

प्रेमिका: छोड़ो ना..

प्रेमी: तुम्हारे बाल कितने खूबसूरत हैं...




प्रेमिका: छोड़ो ना..

प्रेमी: तुम्हारे गाल कितने गुलाबी हैं...

प्रेमिका: छोड़ो ना..

प्रेमी: अरे इतनी देर से लंबी-लंबी तो छोड़ रहा हूं।

रविवार, 27 दिसंबर 2009

बड़ा आया चिड़िया का मामा!

एक डॉक्टर बच्चे के पैर का टांका काटने आया।

उसने कहा: बेटा वह देखो ऊपर, वहां सोने की चिड़िया है।

बच्चा: पहले तू ठीक से नीचे देख, कहीं पैर न कट जाए। बड़ा आया चिड़िया का मामा!

रविवार, 6 दिसंबर 2009

बर्तन धोने के लिए!

चिंटू: मेरी बीवी बहुत अच्छी है। मुझे इतनी सर्दी में पानी गर्म करके देती है।
पिंटू: नहाने के लिए?
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चिंटू: नहीं-नहीं, बर्तन धोने के लिए!

बचपन से पढ़ाई कर रहा हूं,

चिंटू (मां से): मां, पापा जब कॉलेज में हुआ करते थे, तब से शराब और सिगरेट पीते हैं क्या?
मां: हां बेटा, पर तू कभी ऐसी आदतें मत डालना!

चिंटू: नहीं मां, मैं खुद पर संयम रखना जानता हूं। कभी किसी चीज की आदत नहीं डालता।
मां: अच्छा, वेरी गुड!
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चिंटू: हां, अब देखो न, मैं बचपन से पढ़ाई कर रहा हूं, पर आज तक इसकी आदत नहीं डाली। इसे कहते हैं खुद पर संयम रखना!