नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

प्रेम दो प्रेमियों के बीच पारदर्शी परदा है

प्रेम-  महापुरुषों की नजर से :-

प्रेम रीति से जो मिले,
तेसो मिलिए धाय।
अन्तर राखे जो मिले,
तासों मिलै बलाय॥ - कबीरदास 

प्रेम असीम विश्वास है, असीम धैर्य है और असीम बल है।
-प्रेमचंद

प्रेम आत्मा से होता है, शरीर से नहीं।
-भगवतीचरण वर्मा 

प्रेम और संशय कभी साथ-साथ नहीं चलते। 
-खलील जिब्रान 

प्रेम का एक ही मूलमंत्र है और वह है सेवा।
- प्रेमचंद 

प्रेम का नाता संसार के सभी संबंधो से पवित्र और श्रेष्ठ है।
- प्रेमचंद 

प्रेम की पवित्रता का इतिहास ही मनुष्य की सभ्यता का इतिहास है, उसका जीवन है।
-शरतचंद्र चटर्जी 

प्रेम क्रय नहीं किया जाता, वह अपने आप को अर्पित करता है। 
-लांग फेलो 

प्रेम की शक्ति दंड की शक्ति से हजार गुनी प्रभावशाली और स्थायी होती है। 
-महात्मा गाँधी 

प्रेम दो प्रेमियों के बीच पारदर्शी परदा है। 
-खलील जिब्रान 

प्रेम मृत्यु से अधिक शक्तिशाली है, मृत्यु जीवन से अधिक शक्तिशाली है। यह जानते हुए भी मानव-मानव के मध्य कितनी संकुचित सीमा खिंची है।
-खलील जिब्रान 

प्रेम व्यथा तन में बसे, सब तन जर्जर होय। 
राम वियोगी जिए, जिए तो बौरा होय॥ -कबीरदास 

प्रेम हमें अपने पड़ोसी अथवा मित्र पर ही नहीं, अपितु जो हमारे शत्रु हैं, उन पर भी रखना है। -महात्मा गाँधी 

मनुष्य की समस्त दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करने वाली अमोघ वस्तु प्रेम मेरे विचार से परमात्मा की सबसे बड़ी देन है।
-डॉ० राधाकृष्णन

सच्चा प्रेम स्तुति से प्रकट नहीं होता, सेवा से प्रकट होता है।
-महात्मा गाँधी 

सच्चे प्रेम में मनुष्य अपने आपको भूल जाता है। 
 
-स्वामी रामतीर्थ 

केवल प्रेम को ही नियम भंग करने का अधिकार है।
-स्वामी रामतीर्थ 

प्रेम के स्पर्श से हर व्यक्ति कवि बन जाता है।
-प्लेटो 

हमारे अन्तर में यदि प्रेम जाग्रत हो, तो विश्व हमारे लिए कारागार ही है।
-रविंद्रनाथ ठाकुर 

प्रेम पियाला जो पिये, शीश दक्षिणा देय  
लोभी सीस दे सके, नाम प्रेम का लेय॥ -कबीरदास 

स्वामी हम तुम एक हैं, कहन-सुनन को दोय। 
मन से मन को तौलिये, कबहुं दो मन होय॥ -रसनिधि

जब आप किसी के बारे में फ़ैसला लेने लगते हैं तो प्यार करना भूल जाते हैं।
- मदर टेरेसा

प्यार करना, स्नेह लुटाना मनुष्य का सबसे कर्तव्य है। जो कुछ तुम सहर्ष उदारतापूर्वक दोगे, वह अप्रत्याशित तरीकों से तुम्हारे जीवन को समृद्ध कर जाएगा।
-ईसा मसीह 
सच्चा इश्क मिलन में नही, तड़पन में है।
-रहीम कवि
इश्क ने हमें निकम्मा बना दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के।
-मिर्जा गालिब 
जहाँ प्रेम और भक्ति नहीं, वहां परमात्मा नहीं।
- गुरु रामदास

सूचना तकनीक अधिनियम

सूचना तकनीक अधिनियम (Information Technology Act 2000) भारतीय संसद द्वारा पारित एक अधिनियम है जो 17 अक्टूबर, 2000 को पारित हुआ। 27 अक्टूबर, 2009 को एक घोषणा द्वारा इसे संशोधित किया गया।
सूचना तकनीक क़ानून 9 जनवरी, 2000 को पेश किया गया था. 30 जनवरी, 1997 को संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली में प्रस्ताव संख्या 51/162 द्वारा सूचना तकनीक की आदर्श नियमावली (जिसे यूनाइटेड नेशंस कमीशन ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड लॉ के नाम से जाना जाता है) पेश किए जाने के बाद सूचना तकनीक क़ानून, 2000 को पेश करना अनिवार्य हो गया था. संयुक्त राष्ट्र की इस नियमावली में संवाद के आदान-प्रदान के लिए सूचना तकनीक या काग़ज़ के इस्तेमाल को एक समान महत्व दिया गया है और सभी देशों से इसे मानने की अपील की गई है. सूचना तकनीक क़ानून, 2000 की प्रस्तावना में ही हर ऐसे लेनदेन को क़ानूनी मान्यता देने की बात उल्लिखित है, जो इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स के दायरे में आता है और जिसमें सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए सूचना तकनीक का इस्तेमाल हुआ हो. इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स सूचना के आदान-प्रदान और उसके संग्रहण के लिए काग़ज़ आधारित माध्यमों के विकल्प के रूप में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का इस्तेमाल करता है. इससे सरकारी संस्थानों में भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दस्तावेज़ों का आदान-प्रदान संभव हो सकता है और इंडियन पेनल कोड, इंडियन एविडेंस एक्ट 1872, बैंकर्स बुक्स एविडेंस एक्ट 1891 और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट 1934 अथवा इससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े किसी भी क़ानून में संशोधन में भी इन दस्तावेज़ों का उपयोग हो सकता है.
संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली ने 30 जनवरी, 1997 को प्रस्ताव संख्या ए/आरइएस/51/162 के तहत यूनाइटेड नेशंस कमीशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड लॉ द्वारा अनुमोदित मॉडल लॉ ऑन इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स (इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स से संबंधित आदर्श कानून) को अपनी मान्यता दे दी. इस क़ानून में सभी देशों से यह अपेक्षा की जाती है कि सूचना के आदान-प्रदान और उसके संग्रहण के लिए काग़ज़ आधारित माध्यमों के विकल्प के रूप में इस्तेमाल की जा रहीं तकनीकों से संबंधित कोई भी क़ानून बनाने या उसे संशोधित करते समय वे इसके प्रावधानों का ध्यान रखेंगे, ताकि सभी देशों के क़ानूनों में एकरूपता बनी रहे. सूचना तकनीक क़ानून 2000 17 अक्टूबर, 2000 को अस्तित्व में आया. इसमें 13 अध्यायों में विभक्त कुल 94 धाराएं हैं. 27 अक्टूबर, 2009 को इस क़ानून को एक घोषणा द्वारा संशोधित किया गया. इसे 5 फरवरी, 2009 को फिर से संशोधित किया गया, जिसके तहत अध्याय 2 की धारा 3 में इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर की जगह डिजिटल हस्ताक्षर को जगह दी गई. इसके लिए धारा 2 में उपखंड (एच) के साथ उपखंड (एचए) को जोड़ा गया, जो सूचना के माध्यम की व्याख्या करता है. इसके अनुसार, सूचना के माध्यम से तात्पर्य मोबाइल फोन, किसी भी तरह का व्यक्तिगत डिजिटल माध्यम या फिर दोनों हो सकते हैं, जिनके माध्यम से किसी भी तरह की लिखित सामग्री, वीडियो, ऑडियो या तस्वीरों को प्रचारित, प्रसारित या एक से दूसरे स्थान तक भेजा जा सकता है.

आधुनिक क़ानून की शब्दावली में साइबर क़ानून का संबंध कंप्यूटर और इंटरनेट से है. विस्तृत संदर्भ में कहा जाए तो यह कंप्यूटर आधारित सभी तकनीकों से संबद्ध है. साइबर आतंकवाद के मामलों में दंड विधान के लिए सूचना तकनीक क़ानून, 2000 में धारा 66-एफ को जगह दी गई है।

66-एफ : साइबर आतंकवाद के लिए दंड का प्रावधान

1. यदि कोई-
(ए) भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा या संप्रभुता को भंग करने या इसके निवासियों को आतंकित करने के लिए-
. किसी अधिकृत व्यक्ति को कंप्यूटर के इस्तेमाल से रोकता है या रोकने का कारण बनता है.
. बिना अधिकार के या अपने अधिकार का अतिक्रमण कर जबरन किसी कंप्यूटर के इस्तेमाल की कोशिश करता है.
. कंप्यूटर में वायरस जैसी कोई ऐसी चीज डालता है या डालने की कोशिश करता है, जिससे लोगों की जान को खतरा पैदा होने की आशंका हो या संपत्ति के नुक़सान का ख़तरा हो या जीवन के लिए आवश्यक सेवाओं में जानबूझ कर खलल डालने की कोशिश करता हो या धारा 70 के तहत संवेदनशील जानकारियों पर बुरा असर पड़ने की आशंका हो या-
(बी) अनाधिकार या अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए जानबूझ कर किसी कंप्यूटर से ऐसी सूचनाएं हासिल करने में कामयाब होता है, जो देश की सुरक्षा या अन्य देशों के साथ उसके संबंधों के नज़रिए से संवेदनशील हैं या कोई भी गोपनीय सूचना इस इरादे के साथ हासिल करता है, जिससे भारत की सुरक्षा, एकता, अखंडता एवं संप्रभुता, अन्य देशों के साथ इसके संबंध, सार्वजनिक जीवन या नैतिकता पर बुरा असर पड़ता हो या ऐसा होने की आशंका हो, देश की अदालतों की अवमानना अथवा मानहानि होती हो या ऐसा होने की आशंका हो, किसी अपराध को बढ़ावा मिलता हो या इसकी आशंका हो, किसी विदेशी राष्ट्र अथवा व्यक्तियों के समूह अथवा किसी अन्य को ऐसी सूचना से फायदा पहुंचता हो, तो उसे साइबर आतंकवाद का आरोपी माना जा सकता है.
2. यदि कोई व्यक्ति साइबर आतंकवाद फैलाता है या ऐसा करने की किसी साजिश में शामिल होता है तो उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा सकती है.
2005 में प्रकाशित एडवांस्ड लॉ लेक्सिकॉन के तीसरे संस्करण में साइबरस्पेस शब्द को भी इसी तर्ज पर परिभाषित किया गया है. इसमें इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में फ्लोटिंग शब्द पर खासा जोर दिया गया है, क्योंकि दुनिया के किसी भी हिस्से से इस तक पहुंच बनाई जा सकती है. लेखक ने आगे इसमें साइबर थेफ्ट (साइबर चोरी) शब्द को ऑनलाइन कंप्यूटर सेवाओं के इस्तेमाल के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित किया है. इस शब्दकोष में साइबर क़ानून की इस तरह व्याख्या की है, क़ानून का वह क्षेत्र, जो कंप्यूटर और इंटरनेट से संबंधित है और उसके दायरे में इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्‌स, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचनाओं तक निर्बाध पहुंच आदि आते हैं.
सूचना तकनीक क़ानून में कुछ और चीज़ों को परिभाषित किया गया है, जो इस प्रकार हैं, कंप्यूटर से तात्पर्य किसी भी ऐसे इलेक्ट्रॉनिक, मैग्नेटिक, ऑप्टिकल या तेज़ गति से डाटा का आदान-प्रदान करने वाले किसी भी ऐसे यंत्र से है, जो विभिन्न तकनीकों की मदद से गणितीय, तार्किक या संग्रहणीय कार्य करने में सक्षम है. इसमें किसी कंप्यूटर तंत्र से जुड़ा या संबंधित हर प्रोग्राम और सॉफ्टवेयर शामिल है.
सूचना तकनीक क़ानून, 2000 की धारा 1 (2) के अनुसार, उल्लिखित अपवादों को छोड़कर इस क़ानून के प्रावधान पूरे देश में प्रभावी हैं. साथ ही उपरोक्त उल्लिखित प्रावधानों के अंतर्गत देश की सीमा से बाहर किए गए किसी अपराध की हालत में भी उक्त प्रावधान प्रभावी होंगे.

सूचना तकनीक क़ानून, 2000 के अंतर्गत साइबरस्पेस में क्षेत्राधिकार संबंधी प्रावधान

मानव समाज के विकास के नज़रिए से सूचना और संचार तकनीकों की खोज को बीसवीं शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण अविष्कार माना जा सकता है. सामाजिक विकास के विभिन्न क्षेत्रों, ख़ासकर न्यायिक प्रक्रिया में इसके इस्तेमाल की महत्ता को कम करके नहीं आंका जा सकता, क्योंकि इसकी तेज़ गति, कई छोटी-मोटी द़िक्क़तों से छुटकारा, मानवीय ग़लतियों की कमी, कम ख़र्चीला होना जैसे गुणों के चलते यह न्यायिक प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है. इतना ही नहीं, ऐसे मामलों के निष्पादन में, जहां सभी संबद्ध पक्षों की शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य न हो, यह सर्वश्रेष्ठ विकल्प सिद्ध हो सकता है. सूचना तकनीक क़ानून के अंतर्गत उल्लिखित आरोपों की सूची निम्नवत हैः
1. कंप्यूटर संसाधनों से छेड़छाड़ की कोशिश-धारा 65
2. कंप्यूटर में संग्रहित डाटा के साथ छेड़छाड़ कर उसे हैक करने की कोशिश-धारा 66
3. संवाद सेवाओं के माध्यम से प्रतिबंधित सूचनाएं भेजने के लिए दंड का प्रावधान-धारा 66 ए
4. कंप्यूटर या अन्य किसी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट से चोरी की गई सूचनाओं को ग़लत तरीक़े से हासिल करने के लिए दंड का प्रावधान-धारा 66 बी
5. किसी की पहचान चोरी करने के लिए दंड का प्रावधान-धारा 66 सी
6. अपनी पहचान छुपाकर कंप्यूटर की मदद से किसी के व्यक्तिगत डाटा तक पहुंच बनाने के लिए दंड का प्रावधान- धारा 66 डी
7. किसी की निजता भंग करने के लिए दंड का प्रावधान-धारा 66 इ
8. साइबर आतंकवाद के लिए दंड का प्रावधान-धारा 66 एफ
9. आपत्तिजनक सूचनाओं के प्रकाशन से जुड़े प्रावधान-धारा 67
10. इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से सेक्स या अश्लील सूचनाओं को प्रकाशित या प्रसारित करने के लिए दंड का प्रावधान-धारा 67 ए
11. इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से ऐसी आपत्तिजनक सामग्री का प्रकाशन या प्रसारण, जिसमें बच्चों को अश्लील अवस्था में दिखाया गया हो-धारा 67 बी
12. मध्यस्थों द्वारा सूचनाओं को बाधित करने या रोकने के लिए दंड का प्रावधान-धारा 67 सी
13. सुरक्षित कंप्यूटर तक अनाधिकार पहुंच बनाने से संबंधित प्रावधान-धारा 70
14. डाटा या आंकड़ों को ग़लत तरीक़े से पेश करना-धारा 71
15. आपसी विश्वास और निजता को भंग करने से संबंधित प्रावधान-धारा 72 ए
16. कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों का उल्लंघन कर सूचनाओं को सार्वजनिक करने से संबंधित प्रावधान-धारा 72 ए
17. फर्ज़ी डिजिटल हस्ताक्षर का प्रकाशन-धारा 73
सूचना तकनीक क़ानून की धारा 78 में इंस्पेक्टर स्तर के पुलिस अधिकारी को इन मामलों में जांच का अधिकार हासिल है।

भारतीय दण्ड संहिता (आईपीसी) में साइबर अपराधों से संबंधित प्रावधान

1. ईमेल के माध्यम से धमकी भरे संदेश भेजना-आईपीसी की धारा 503
2. ईमेल के माध्यम से ऐसे संदेश भेजना, जिससे मानहानि होती हो-आईपीसी की धारा 499
3. फर्ज़ी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉड्‌र्स का इस्तेमाल-आईपीसी की धारा 463
4. फर्ज़ी वेबसाइट्‌स या साइबर फ्रॉड-आईपीसी की धारा 420
5. चोरी-छुपे किसी के ईमेल पर नज़र रखना-आईपीसी की धारा 463
6. वेब जैकिंग-आईपीसी की धारा 383
7. ईमेल का ग़लत इस्तेमाल-आईपीसी की धारा 500
8. दवाओं को ऑनलाइन बेचना-एनडीपीएस एक्ट
9. हथियारों की ऑनलाइन ख़रीद-बिक्री-आर्म्स एक्ट

(स्रोत-विकीपीडिया)

सूचना प्रौद्योगिकी का महत्त्व

सूचना प्रौद्योगिकी (en:information technology) आंकड़ों की प्राप्ति, सूचना (इंफार्मेशन) संग्रह, सुरक्षा, परिवर्तन, आदान-प्रदान, अध्ययन, डिजाइन आदि कार्यों तथा इन कार्यों के निष्पादन के लिये आवश्यक कंप्यूटर हार्डवेयर एवं साफ्टवेयर अनुप्रयोगों से सम्बन्धित है। सूचना प्रौद्योगिकी कंप्यूटर पर आधारित सूचना-प्रणाली का आधार है। सूचना प्रौद्योगिकी, वर्तमान समय में वाणिज्य और व्यापार का अभिन्न अंग बन गयी है। संचार क्रान्ति के फलस्वरूप अब इलेक्ट्रानिक संचार को भी सूचना प्रौद्योगिकी का एक प्रमुख घटक माना जाने लगा है, और इसे सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (Information and Communication Technology, ICT) भी कहा जाता है। एक उद्योग के तौर पर यह एक उभरता हुआ क्षेत्र है।
 

सूचना प्रौद्योगिकी का महत्त्व

  • सूचना प्रौद्योगिकी, सेवा अर्थतंत्र (Service Economy) का आधार है।
  • पिछड़े देशों के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए सूचना प्रौद्योगिकी एक सम्यक तकनीकी (appropriate technology) है।
  • गरीब जनता को सूचना-सम्पन्न बनाकर ही निर्धनता का उन्मूलन किया जा सकता है।
  • सूचना-संपन्नता से सशक्तिकरण (empowerment) होता है।
  • सूचना तकनीकी, प्रशासन और सरकार में पारदर्शिता लाती है, इससे भ्रष्टाचार को कम करने में सहायता मिलती है।
  • सूचना तकनीक का प्रयोग योजना बनाने, नीति निर्धारण तथा निर्णय लेने में होता है।
  • यह नये रोजगारों का सृजन करती है।

सूचना प्रौद्योगिकी के विभिन्न घटक

कंप्यूटर हार्डवेयर प्रौद्योगिकी
इसके अन्तर्गत माइक्रो-कम्प्यूटर, सर्वर, बड़े मेनफ्रेम कम्प्यूटर के साथ-साथ इनपुट, आउटपुट एवं संग्रह (storage) करने वाली युक्तियाँ (devices) आतीं हैं।
कंप्यूटर साफ्टवेयर प्रौद्योगिकी
इसके अन्तर्गत प्रचालन प्रणाली (Operating System), वेब ब्राउजर, डेटाबेस प्रबन्धन प्रणाली (DBMS), सर्वर तथा व्यापारिक/वाणिज्यिक साफ्टवेयर आते हैं।
दूरसंचार व नेटवर्क प्रौद्योगिकी
इसके अन्तर्गत दूरसंचार के माध्यम, प्रक्रमक (Processor) तथा इंटरनेट से जुडने के लिये तार या बेतार पर आधारित साफ्टवेयर, नेटवर्क-सुरक्षा, सूचना का कूटन (क्रिप्टोग्राफी) आदि हैं।
मानव संसाधन
तंत्र प्रशासक (System Administrator), नेटवर्क प्रशासक (Network Administrator) आदि

सूचना प्रौद्योगिकी का प्रभाव

सूचना प्रौद्योगिकी ने पूरी धरती को एक गाँव बना दिया है। इसने विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं को जोड़कर एक वैश्विक अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है। यह नवीन अर्थव्यवस्था अधिकाधिक रूप से सूचना के रचनात्मक व्यवस्था व वितरण पर निर्भर है। इसके कारण व्यापार और वाणिज्य में सूचना का महत्व अत्यधिक बढ गया है। इसीलिए इस अर्थव्यवस्था को सूचना अर्थव्यवस्था (Information Economy) या ज्ञान अर्थव्यवस्था (Knowledge Economy) भी कहने लगे हैं। वस्तुओं के उत्पादन (manufacturing) पर आधारित परम्परागत अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती जा रही है और सूचना पर आधारित सेवा अर्थव्यवस्था (service economy) निरन्तर आगे बढती जा रही है।
सूचना क्रान्ति से समाज के सम्पूर्ण कार्यकलाप प्रभावित हुए हैं - धर्म, शिक्षा (e-learning), स्वास्थ्य (e-health), व्यापार (e-commerce), प्रशासन, सरकार (e-govermance), उद्योग, अनुसंधान व विकास, संगठन, प्रचार आदि सब के सब क्षेत्रों में कायापलट हो गया है । आज का समाज सूचना समाज कहलाने लगा है।

सूचना प्रौद्योगिकी का भविष्य

सूचना के महत्व के साथ सूचना की सुरक्षा का महत्व भी बढ़ेगा। सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े कार्यों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, विशेष रूप से सूचना सुरक्षा एवं सर्वर के विशेषज्ञों की मांग बढ़ेगी ।

इतिहास

सूचना प्रौद्योगिकी विभिन्न कालखण्डों में अपने समय की सूचना से सम्बन्धित समस्याओं (इन्पुट, प्रसंस्करण, आउटपुट, संचार आदि) को हल करने की जिम्मेदारी सम्भालती है। अतः इसके इतिहास को चार मूल कालखण्डों में बांटा जा सकता है-
(१) यांत्रिक युग के पूर्व ( Premechanical)
(२) यांत्रिक युग (Mechanical)
(३) विद्युतयांत्रिक युग (Electromechanical), तथा
(४) ।एलेक्ट्रॉनिक युग (Electronic)

(स्रोत-विकिपीडिआ)

भारतीय रंगमंच का इतिहास

भारत में रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना है। ऐसा समझा जाता है कि नाट्यकला का विकास सर्वप्रथम भारत में ही हुआ। ऋग्वेद के कतिपय सूत्रों में यम और यमी, पुरुरवा और उर्वशी आदि के कुछ संवाद हैं। इन संवादों में लोग नाटक के विकास का चिह्न पाते हैं। अनुमान किया जाता है कि इन्हीं संवादों से प्रेरणा ग्रहण कर लागों ने नाटक की रचना की और नाट्यकला का विकास हुआ। यथासमय भरतमुनि ने उसे शास्त्रीय रूप दिया।




भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में नाटकों के विकास की प्रक्रिया को इस प्रकार व्यक्त किया है:
नाट्यकला की उत्पत्ति दैवी है, अर्थात् दु:खरहित सत्ययुग बीत जाने पर त्रेतायुग के आरंभ में देवताओं ने स्रष्टा ब्रह्मा से मनोरंजन का कोई ऐसा साधन उत्पन्न करने की प्रार्थना की जिससे देवता लोग अपना दु:ख भूल सकें और आनंद प्राप्त कर सकें। फलत: उन्होंने ऋग्वेद से कथोपकथन, सामवेद से गायन, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस लेकर, नाटक का निर्माण किया। विश्वकर्मा ने रंगमंच बनाया आदि आदि।
नाटकों का विकास चाहे जिस प्रकार हुआ हो, संस्कृत साहित्य में नाट्य ग्रंथ और तत्संबंधी अनेक शास्त्रीय ग्रंथ लिखे गए और साहित्य में नाटक लिखने की परिपाटी संस्कृत आदि से होती हुई हिंदी को भी प्राप्त हुई। संस्कृत नाटक उत्कृष्ट कोटि के हैं और वे अधिकतर अभिनय करने के उद्देश्य से लिखे जाते थे। अभिनीत भी होते थे, बल्कि नाट्यकला प्राचीन भारतीयों के जीवन का अभिन्न अंग थी, ऐसा संस्कृत तथा पानी ग्रंथों के अन्वेषण से ज्ञात होता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र से तो ऐसा ज्ञात होता है कि नागरिक जीवन के इस अंग पर राज्य को नियंत्रण करने की आवश्यकता पड़ गई थी। उसमें नाट्यगृह का एक प्राचीन वर्णन प्राप्त होता है। अग्निपुराण, शिल्परत्न, काव्यमीमांसा तथा संगीतमार्तंड में भी राजप्रसाद के नाट्यमंडपों के विवरण प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार महाभारत में रंगशाला का उल्लेख है और हरिवंश पुराण तथा रामायण में नाटक खेले जाने का वर्णन है।
इतना सब होते हुए भी यह निश्चित रूप से पता नहीं लगता कि वे नाटक किस प्रकार के नाट्यमंडपों में खेले जाते थे तथा उन मंडपों के क्या रूप थे। अभी तक की खोज के फलस्वरूप सीतावंगा गुफा को छोड़कर कोई ऐसा गृह नहीं मिला जिसे साधिकार नाट्यमंडप कहा जा सके।


भारत के आदिकालीन रंगमंच

सीतावंगा की गुफा के देखने से पुराने नाट्यमंडपों के स्वरूप का कुछ अनुमान हो जाता है। यह गुफा १३.८ मीटर लंबी तथा ७.२ मीटर चौड़ी है। भीतर प्रवेश करने के लिए बाईं ओर से सीढ़ियाँ हैं, जिनसे कदाचित अभिनेता प्रवेश करते थे। भीतरी भाग में रंगमंच की व्यवस्था है। यह २.३ मीटर चौड़ी तीन सीढ़ियों (चबूतरों) से बना है, जो एक दूसरे से ७५ सेंमी. ऊँची हैं। चबूतरों के समने दो छेद हैं, जिनमें शायद बाँस या लकड़ी के खंभे लगाकर पर्दें लगाए जाया करते थे। दर्शकों के लिए जो स्थान है, वह ग्रीक ऐंफीथिएटर की भाँति सीढ़ीनुमा है। यहाँ ५० व्यक्ति बैठ सकते हैं। यह आदिकालीन रंगमंच का स्वरूप भी ऊपर वर्णित विकसित स्वरूप से मेल खाता है। भरत नाट्यशास्त्र से भी हमें नाट्यमंडप के प्राचीन स्वरूप का संकेत मिलता है। आदिवासियों के मंडप गुफारूपी (शैलगुहाकारी) हुआ करते थे, किंतु आर्य लोग अपनी आश्रम सभ्यता के अनुरूप अस्थायी तंबूनुमा नाट्यमंडपों से ही काम चलाया करते थे।
भरत नाट्यशास्त्र पहली अथवा दूसरी शती ई. में संकलित हुआ समझा जाता है। भरत ने आदिवासियों तथा आर्यों दोनों के नाट्यमंडपों के आकार को अपनाया है। इन दोनों के सम्मिश्रण से इन्होंने नाट्यमंडपों के जो रूप निर्धारित किए, वे सर्वथा भारतीय हैं। प्राचीन यूनानी और रोमन स्वरूपों से इनका कोई संबंध नहीं प्रतीत होता। पाश्चात्य नाट्यमंडप खुले मैदानों में बनते थे और उनमें दर्शकों के हेतु सीढ़ीनुमा अर्धचंद्राकार प्रेक्षास्थान बनते थे। इसके विपरीत भारत में नाट्यमंडप की व्यवस्था एक गृह के भीतर होती थी।

भरत के रंगमंच

भरत ने तीन प्रकार के नाट्यमंडपों का विधान बताया है : विकृष्ट (अर्थात् आयताकार), चतुरस्र (वर्गाकार) तथा त्रयस्र (त्रिभुजाकार)। उन्होंने इन तीनों के फिर तीन तीन भेद किए हैं : ज्येष्ठ (देवताओं के लिए), मध्यम (राजाओं के लिए), तथा अवर (औरों के लिए)। इनकी माप के विषय के दिए गए निर्देशों के अनुसार ज्येष्ठ की लंबाई लगभग ५१ मीटर, मध्यम की लगभग २९ मीटर और अवर की लगभग श्मीटर होगी। चतुरस्र मंडप की चौड़ाई लंबाइ के बराबर, और विकृष्ट की लंबाई से आधी होगी।
भरत नाट्यशास्त्र के अनुसार नाट्यमंडप की नाप के आधार अणु, रज (=८ अणु), बाल (=८ रज), लिक्षा (=८ बाल), यूका (=८ लिक्षा), यव (=८ यूका), अँगुली (=८ यव), हस्त (=२४ अंगुली), और दंड (=४ हस्त) हुआ करते थे। इस प्रकार एक हस्त ४५६ मिलीमीटर का होता है। कौटिल्य और पाणिनि ने माप के जो आधार दिए हैं, वे भी इनसे मिलते हैं। विद्वानों का मत है कि ये आधार सिंधु सभ्यता के बाद इस देश में चालू हुए होंगे, क्योंकि उस प्राचीन सभ्यता में जो मापें मिली हैं, उनका आधार दशमलव प्रणाली है।
नाट्यशाला का प्राय: आधार भाग दर्शकों के लिए होता था, जिसे प्रेक्षागृह कहते थे; शेष आधे में रंगमंडप होता था। रंगमंडप के पिछले आधे भाग में नेपथ्य होता था। शेष के आधे में सामने रंगशीर्ष और पीछे, नेपथ्य की ओर, रगंपीठ होता था। नेपथ्य से रंगपीठ में आने जाने के लिए किनारों पर दो दरवाजे होते थे, जिनमें संभवत: किवाड़े नहीं लगा करते थे। रंगपीठ के ऊपर ही, चार खंभों पर छत रखकर, मत्तवारणी बनाई जाती थी। मत्तवारणी संभवत: अटारी का द्योतक है। खंभों पर प्राय: हाथी के सिर के सदृश बनी घोड़ियों के ऊपर यह छत रहती थी, इसी से (शायद) इसे मत्तवारणी कहते थे। प्रेक्षागृह सीढ़ीनुमा बनाया जाता था। इन सीढ़ियों में से प्रत्येक १ हाथ ऊँची होती थी, और उसपर लकड़ी के पटरे भी लगा करते थे, शायद उसी प्रकार के जैसे रोमन थिएटरों में होते थे।
दीवारों को भीतर की ओर सजाने का भी विधान है। भरत के अनुसार भीत पर अच्छा भित्तिलेप (प्लास्टर) चढ़ाना चाहिए। विद्वानों का मत है कि मिट्टी तथा भूसी को मिलाकर लेवा चढ़ाया जाता था। इसे पीटकर समतल किया जाता था। फिर एक परत चूने की चढ़ाई जाती थी, जिसे घिस घिसकर चिकना किया जाता था। इसके ऊपर शंख पीसकर चढ़ाते थे, और पालिश करते थे। इन भीतों पर सुंदर चित्रकारी की जाती थी।
नाट्यमंडप में दीवारों के साथ खंभे बनाकर ऊपर छत बनाई जाती थी। रात्रि के समय प्रकाश के लिए दीपक व्यवहार में आते थे। बहुत से दीपकों के अतिरिक्त शायद मशाल से भी काम लिया जाता रहा होगा। ध्वनि नियंत्रण तथा विस्तार का कोई प्रबंध शायद न था; इसलिए भी नाट्यशालाएँ कुछ छोटी ही हुआ करती थीं। भारतीय प्रेक्षागृह आकार में ग्रीक प्रेक्षागृहों की अपेक्षा, जो बहुधा खुले हुआ करते थे, बहुत छोटे होते थे।
भरत नाट्यशास्त्र में दिए हुए नाट्यमंडप के आकार प्रकार तथा सजावट से ऐसा ज्ञात होता है कि उस समय तक भारत के आदिवासियों के नाट्यमंडपों का प्राथमिक रूप, जो हमें सीतावंगा गुफा, हाथीगुंफा, तथा नासिक के पास फुलुमई गुफा में प्राप्त होता है, आर्यों के प्राचीनतम लकड़ी के मकानों के रूप में समन्वित होकर तथा दोनों के सम्मिश्रण से एक नया ढाँचा खड़ा हो चुका था। यही नहीं, नाट्यमंडप के रूप के विषय में नियम भी बन चुके थे तथा उनपर धर्म का नियंत्रण भी प्रारंभ हो चुका था। ये नियम इतने कड़े थे कि मापने की रस्सी टूट जाना तथा एक भी स्तंभ का दोषयुक्त होना, नाट्यमंडप के स्वामी के मरण का सूचक समझा जाने लगा था। भरत के समय तक भारतीय रंगमंच इस महान् संसार का द्योतक माना जाने लगा था, जहाँ स्त्री-पुरुष प्रविष्ट होकर अपनी पूर्वनिश्चित लीला करते हैं तथा उसकी समाप्ति पर यहाँ से विदा लेते हैं।

वर्तमान भारतीय रंगमंच

आधुनिक भारतीय नाट्य साहित्य का इतिहास एक शताब्दी से अधिक पुराना नहीं है। इस्लाम धर्म की कट्टरता के कारण नाटक को मुगल काल में उस प्रकार का प्रोत्साहन नहीं मिला जिस प्रकार का प्रोत्साहन अन्य कलाओं को मुगल शासकों से प्राप्त हुआ था। इस कारण मुगल काल में के दो ढाई सौ वर्षों में भारतीय परंपरा की अभिनयशालाओं अथवा प्रेक्षागारों का सर्वथा लोप हो गया। परन्तु राम लीला आदि की तरह लोक कला के माध्यम से भारतीय थिएटर जीवित रही अंग्रेजों का प्रभुत्व देश में व्याप्त होने पर उनके देश की अनेक वस्तुओं ने हमारे देश में प्रवेश किया। उनके मनोरंजन के निमित्त पाश्चात्य नाटकों का भी प्रवेश हुआ। उन लोगों ने अपने नाटकों के अभिनय के लिए यहाँ अभिनयशालाओं का संयोजन किया, जो थिएटर के नाम से अधिक विख्यात हैं। इस ढंग का पहला थिएटर, कहा जाता है, पलासी के युद्ध के बहुत पहले, कलकत्ता में बन गया था। एक दूसरा थिएटर १७९५ ई. में खुला। इसका नाम 'लेफेड फेयर' था। इसके बाद १८१२ ई. में 'एथीनियम' और दूसरे वर्ष 'चौरंगी' थिएटर खुले।
इस प्रकार पाश्चात्य रंगमंच के संपर्क में सबसे पहले बंगाल आया और उसने पाश्चात्य थिएटरों के अनुकरण पर अपने नाटकों के लिए रंगमंच को नया रूप दिया। दूसरी ओर बंबई में पारसी लोगों ने इन विदेशी अभिनयशालाओं के अनुकरण पर भारतीय नाटकों के लिए, एक नए ढंग की अभिनयशाला को जन्म दिया। पारसी नाटक कंपनियों ने रंगमंच को आकर्षक और मनोरंजक बनाकर अपने नाटक उपस्थित किए।
सीतावंगा की गुफा के देखने से पुराने नाट्यमंडपों के स्वरूप का कुछ अनुमान हो जाता है। यह गुफा १३.८ मीटर लंबी तथा ७.२ मीटर चौड़ी है। भीतर प्रवेश करने के लिए बाईं ओर से सीढ़ियाँ हैं, जिनसे कदाचित अभिनेता प्रवेश करते थे। भीतरी भाग में रंगमंच की व्यवस्था है। यह २.३ मीटर चौड़ी तीन सीढ़ियों (चबूतरों) से बना है, जो एक दूसरे से ७५ सेंमी. ऊँची हैं। चबूतरों के समने दो छेद हैं, जिनमें शायद बाँस या लकड़ी के खंभे लगाकर पर्दें लगाए जाया करते थे। दर्शकों के लिए जो स्थान है, वह ग्रीक ऐंफीथिएटर की भाँति सीढ़ीनुमा है। यहाँ ५० व्यक्ति बैठ सकते हैं। यह आदिकालीन रंगमंच का स्वरूप भी ऊपर वर्णित विकसित स्वरूप से मेल खाता है। भरत नाट्यशास्त्र से भी हमें नाट्यमंडप के प्राचीन स्वरूप का संकेत मिलता है। आदिवासियों के मंडप गुफारूपी (शैलगुहाकारी) हुआ करते थे, किंतु आर्य लोग अपनी आश्रम सभ्यता के अनुरूप अस्थायी तंबूनुमा नाट्यमंडपों से ही काम चलाया करते थे।
भरत नाट्यशास्त्र पहली अथवा दूसरी शती ई. में संकलित हुआ समझा जाता है। भरत ने आदिवासियों तथा आर्यों दोनों के नाट्यमंडपों के आकार को अपनाया है। इन दोनों के सम्मिश्रण से इन्होंने नाट्यमंडपों के जो रूप निर्धारित किए, वे सर्वथा भारतीय हैं। प्राचीन यूनानी और रोमन स्वरूपों से इनका कोई संबंध नहीं प्रतीत होता। पाश्चात्य नाट्यमंडप खुले मैदानों में बनते थे और उनमें दर्शकों के हेतु सीढ़ीनुमा अर्धचंद्राकार प्रेक्षास्थान बनते थे। इसके विपरीत भारत में नाट्यमंडप की व्यवस्था एक गृह के भीतर होती थी।

दिलीप कुमार (यूसुफ़ ख़ान)

 दिलीप कुमार (जन्म 11 दिसंबर, 1922; जन्म का नाम: यूसुफ़ ख़ान), हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय अभिनेता और भारतीय संसद के उच्च सदन राज्य सभा के सदस्य है। दिलीप कुमार को उनके दौर का बेहतरीन अभिनेता माना जाता है, त्रासद या दु:खद भूमिकाओं के लिए मशहूर होने के कारण उन्हे 'ट्रेजिडी किंग' भी कहा जाता था। उन्हें भारतीय फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, इसके अलावा दिलीप कुमार को पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ से भी सम्मानित किया गया है।



दिलीप कुमार के जन्म का नाम मुहम्मद युसुफ़ खान है। उनका जन्म पेशावर (अब पाकिस्तान मे) मे हुआ था। उनके पिता मुंबई आ बसे थे, जहाँ उन्होने हिन्दी फिल्मों मे काम करना शुरू किया। उन्होने अपना नाम बदल कर दिलीप कुमार कर दिया ताकि उन्हे हिन्दी फिल्मो मे ज्यादा पहचान और सफलता मिले।
दिलीप कुमार ने अभिनेत्री सायरा बानो से 1966 मे विवाह किया। विवाह के समय दिलीप कुमार 44 वर्ष और सायरा बानो की 22 वर्ष की थीं। 1980 मे कुछ समय के लिए आसमां से दूसरी शादी भी की थी।
वर्ष 2000 से वे राज्य सभा के सदस्य है।
1980 मे उन्हें सम्मानित करने के लिए मुंबई का शेरिफ घोषित किया गया। 1995 मे उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1998 मे उन्हे पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ भी प्रदान किया गया।

उनकी पहली फिल्म 'ज्वार भाटा' थी, जो 1944 मे आई। 1949 मे बनी फिल्म अंदाज़ की सफलता ने उन्हे प्रसिद्धी दिलाई, इस फिल्म मे उन्होने राज कपूर के साथ काम किया। दिदार (1951) और देवदास(1955) जैसी फिल्मो मे दुखद भूमिकाओं के मशहूर होने के कारण उन्हे ट्रेजिडी किंग कहा गया। मुगले-ए-आज़म (1960) मे उन्होने मुग़ल राजकुमार जहांगीर की भूमिका निभाई। यह फिल्म पहले श्वेत और श्याम थी, और 2004 मे रंगीन बनाई गई। उन्होने 1961 मे गंगा-जमुना फिल्म का निर्माण भी किया, जिसमे उनके साथ उनके छोटे भाई नासीर खान ने काम किया।
1970, 1980 और 1990 के दशक मे उन्होने कम फिल्मो मे काम किया। इस समय की उनकी प्रमुख फिल्मे थी: विधाता (1982), दुनिया (1984), कर्मा (1986), इज्जतदार(1990) और सौदागर(1991)। 1998 मे बनी फिल्म किला उनकी आखरी फिल्म थी।
उन्होने रमेश सिप्पी की फिल्म शक्ति मे अमिताभ बच्चन के साथ काम किया। इस फिल्म के लिए उन्हे फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला।
वे आज भी प्रमुख अभिनेताओ जैसे शाहरूख खा़न के प्रेरणास्रोत्र है।

फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार

  • 1983 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - शक्ति
  • 1968 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - राम और श्याम
  • 1965 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - लीडर
  • 1961 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - कोहिनूर
  • 1958 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - नया दौर
  • 1957 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - देवदास
  • 1956 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - आज़ाद
  • 1954 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - दाग



सापेक्षता का सिद्धांत (अल्बर्ट आइंस्टीन)

आपेक्षिकता सिद्धांत अथवा सापेक्षिकता का सिद्धांत (अंग्रेज़ी: थ़िओरी ऑफ़ रॅलेटिविटि), या केवल आपेक्षिकता, आधुनिक भौतिकी का एक बुनियादी सिद्धांत है जिसे अल्बर्ट आइंस्टीन ने विकसित किया और जिसके दो बड़े अंग हैं - विशिष्ट आपेक्षिकता (स्पॅशल रॅलॅटिविटि) और सामान्य आपेक्षिकता (जॅनॅरल रॅलॅटिविटि)। फिर भी कई बार आपेक्षिकता या रिलेटिविटी शब्द को गैलीलियन इन्वैरियन्स के संदर्भ में भी प्रयोग किया जाता है। थ्योरी ऑफ् रिलेटिविटी नामक इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले सन १९०६ में मैक्स प्लैंक ने किया था। यह अंग्रेज़ी शब्द समूह "रिलेटिव थ्योरी" (जर्मन : Relativtheorie) से लिया गया था जिसमें यह बताया गया है कि कैसे यह सिद्धांत प्रिंसिपल ऑफ रिलेटिविटी का प्रयोग करता है। इसी पेपर के चर्चा संभाग में अल्फ्रेड बुकरर ने प्रथम बार "थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी" (जर्मन : Relativitätstheorie) का प्रयोग किया था।

इसका प्रतिपादन सन १९०५ में आइंस्टीन ने अपने एक शोधपत्र ऑन द एलेक्ट्रोडाइनेमिक्स ऑफ् मूविंग बॉडीज में की थी। विशिष्ट सापेक्षता दो परिकल्पनाओं (पॉस्चुलेट्स) पर आधारित है जो शास्त्रीय यांत्रिकी (क्लासिकल मेकैनिक्स) के संकल्पनाओं के विरुद्ध (उलटे) हैं:
१) भौतिकी के नियम एक दूसरे के सापेक्ष एकसमान (यूनिफार्म) गति कर रहे सभी निरिक्षकों के लिए समान होते हैं। (गैलिलियो का सापेक्षिकता का सिद्धान्त)
२) निर्वात में प्रकाश का वेग सभी निरिक्षकों के लिए समान होता है चाहे उन सबकी सापेक्ष गति कुछ भी हो , चाहे प्रकाश के स्रोत
की गति कुछ भी हो ।

इस सिद्धान्त से निकलने वाले परिणाम आश्चर्यजनक हैं; इनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
  • किसी स्थिर घडी की अपेक्षा एक गतिशील घडी धीमी चलती है। (टाइम डिलेशन्) (Time dilation)
  • किसी निरीक्षक के सापेक्ष किसी दिशा में गतिशील वस्तुओं की लम्बाई उस दिशा में घट जाती है। ( Length contraction )
  • दो घटनायें जिन्हें कोई निरीक्षक 'क' एक साथ ( simultaneous ) घटित होता हुआ देखता है , किसी दूसरे निरीक्षक 'ख' को वे एक साथ घटित होती हुई नहीं दिखेंगी यदि दूसरा निरीक्षक पहले के सापेक्ष गतिशील है। ( Relativity of simultaneity )
  • द्रव्य और उर्जा तुल्य हैं; एक को दूसरे के रूप में बदला जा सकता है। इस परिवर्तन में E = mc2 का सम्बन्ध लागू होता है।
शास्त्रीय यांत्रिकी में प्रयुक्त गैलिलियो का रूपान्तरण (Galilean transformations) प्रयुक्त होता है जबकि विशिष्ट सापेक्षता में लारेंज रूपानतरण (Lorentz transformations) ।

सन १९०७ से १९११ के बीच आइन्स्टीन द्वारा विकसित आपेक्षिकता सिद्धान्त ही 'सामान्य आपेक्षिकता' के नाम से जाना जाता है। विशेष आपेक्षिकता मुख्य लेख: विशेष आपेक्षिकता सोवियत संघ स्टांप अल्बर्ट आइंस्टीन के लिए समर्पित
अन्तरिक्ष समय की संरचना के विशेष सापेक्षता सिद्धांत है। यह आइंस्टीन "चलती निकायों के विद्युत में" 1905 कागज में पेश (कई अन्य भौतिकविदों के योगदान के लिए विशेष सापेक्षता का इतिहास देखें). विशेष सापेक्षता दो पर आधारित है तत्वों जो शास्त्रीय यांत्रिकी में विरोधाभासी हैं:
भौतिकी के नियम के नियमानुसार (आपेक्षिकता सिद्धांत) किसी जड़त्वीय निर्देश तंत्र के सापेक्ष गति कर रहे सभी पर्यवेक्षकों के लिए सभी भौतिक नियम समान होंगे।
समष्टि में सभी पर्यवेक्षकों के लिए प्रकाश का वेग समान रहता है, चाहे प्रकाश स्रोत उनके सापेक्ष गतिशील हो अथवा नहीं।

परिणामी सिद्धांत शास्त्रीय यांत्रिकी, जैसे की तुलना में बेहतर प्रयोग के साथ सहमत में Michelson मॉर्ले के प्रयोग है कि 2 मांगना का समर्थन करता है, लेकिन यह भी कई आश्चर्य की बात परिणाम है। इनमें से कुछ हैं:
समकालीनता के सापेक्षता: दो घटनाओं, एक पर्यवेक्षक के लिए एक साथ, एक और पर्यवेक्षक के लिए एक साथ नहीं हो सकता है अगर पर्यवेक्षकों सापेक्ष गति में हो सकता है।
चलती घड़ियों समय फैलाव: एक है पर्यवेक्षक "स्थिर" घड़ी से अधिक धीरे - धीरे टिकटिक मापा जाता है। लंबाई संकुचन: ऑब्जेक्ट्स कि वे पर्यवेक्षक करने के लिए सम्मान के साथ आगे बढ़ रहे हैं दिशा में छोटा किया जा मापा जाता है। मास - ऊर्जा तुल्यता: E=mc2 ऊर्जा, और जन के बराबर है और जिसकी काया पलट हो सके हैं। गति अधिकतम परिमित है: कोई भौतिक वस्तु, संदेश, या फ़ील्ड पंक्ति एक शून्य में प्रकाश की गति से तेजी से यात्रा कर सकते हैं।
विशेष सापेक्षता के परिभाषित सुविधा Lorentz परिवर्तनों द्वारा शास्त्रीय यांत्रिकी के गलीली परिवर्तनों के प्रतिस्थापन है। (विशेष सापेक्षता विद्युत चुंबकत्व और परिचय के माक्सवेल 's समीकरण देखें).

 

रविवार, 22 दिसंबर 2013

मौन का महत्त्व


मौन शब्द मुनि से उत्पन्न हुआ।अर्थात वह तप जो मुनि करते है।

अधिक वाचालता से कुटिलता उत्पन्न होती है।
घर परिवार में कई बार मौन रहने से सम्बन्ध बिगड़ने और टूटने से बच जाते है।
भोजन के समय मौन रहने से खाना अच्छे से पचेगा , भोजन का पूर्ण आनंद मिलेगा और वात का प्रकोप नहीं होगा।
सुबह के समय मौन रह कर ध्यान करने से परमात्मा के दिव्य विचार हमारे मस्तिष्क में आते है।
मौन यानी आत्मा से वार्तालाप , वह आत्मा जो चिरंतन है और सम्पूर्ण ज्ञानी है और शांत स्वरूप, प्रेम स्वरूप है।
एक घंटे के मौन से ही शक्ति में वृद्धि होती है।
मौन एक महान तप है।

क्रोध में आने पर मौन उत्तम उपाय है।
कुछ भी अधर्म होते देख मौन रहना पाप है।

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

आविष्कार और आविष्कारक









आविष्कार और आविष्कारक
आविष्कार / खोज आविष्कारक / खोजकर्ता देश वर्ष
आर्कीमिडीज सिद्धान्त आर्कीमिडीज यूनान 287 ईसा पूर्व-212 ईसा पूर्व
बीजगणित अल-ख्वारिज्मी फारस 750-850 ई.
अर्गाण्ड लैम्प अमी अर्गाण्ड फ्रान्स 1750-1803
थर्मामीटर गैलेलियो गैलिली इटली 1593
खगोलीय दूरदर्शक गैलेलियो गैलिली इटली 1609
बैरोमीटर इव्हांगेलिस्टा टोर्रिसेली इटली 1643
पेण्डुलम घड़ी क्रिश्चन हाइजेन्स नीदरलैण्ड 1656
गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त सर आइजेक न्यूटन इंग्लैण्ड 1665
प्रकाश का वेग ओलाउस रोमर डेनमार्क 1675
गति के नियम सर आइजेक न्यूटन इंग्लैण्ड 1687
मशीन गन जेम्स पक्ले इंग्लैण्ड 1718
एफ एम रेडियो एड्विन एच आर्मस्ट्रांग संयुक्त राज्य अमेरिका
हाइडालिक क्रेन विलियम जार्ज आर्मस्ट्रांग यू. के.
पोर्टलैण्ड सिमेन्ट जोसेफ आस्पदिन इंग्लैण्ड
विश्लेषी इंजन चार्ल्स बाबेज इंग्लैण्ड
आवर्धक लेंस रोजर बेकन इंग्लैण्ड
बैकेलाइट लिओ बेकलैण्ड संयुक्त राज्य अमेरिका
बाइफोकल लेंस बेंजामिन फ्रेंकलिन संयुक्त राज्य अमेरिका 1760
पैराशूट लुइस एस. लेनोर्मांड फ्रांस 1783
लोकोमोटिव रिचार्ड ट्रेव्हिथिक इंग्लैण्ड 1804
साईकल कार्ल डी. वॉन सौरब्रोन जर्मनी 1816
इलेक्ट्रिक मोटर माइकल फैराडे इंग्लैण्ड 1822
माइक्रोफोन चार्ल्स व्हीटस्टोन इंग्लैण्ड 1827
ओम का नियम जॉर्ज एस. ओम जर्मनी 1827
एसी डॉयनेमो माइकल फैराडे इंग्लैण्ड 1832
तार (टेलीग्रॉफ) सैमुएल एफ. बी. मोर्स संयुक्त राज्य अमेरिका 1837
सिलाई मशीन एलियास होवे संयुक्त राज्य अमेरिका 1846
सेफ्टी पिन वाल्टर हण्ट संयुक्त राज्य अमेरिका 1849
एलिवेटर एलिशा जी. ओटिस संयुक्त राज्य अमेरिका 1852
प्लास्टिक अलैक्जेण्डर पार्क्स इंग्लैण्ड 1855
बारूद (डाइनामाइट) अल्फ्रेड नोबल स्वीडन 1867
इलेक्ट्रिक लैम्प ए. ई. बेक्वेरेल फ्रांस 1867
टाइपराइटर क्रस्टोफर शोलेज और कार्लोस ग्लिडन संयुक्त राज्य अमेरिका 1867
डीएनए फ्रिडरिक मेशर जर्मनी 1869
मोटरसाईकल एडवर्ड बटलर इंग्लैण्ड 1884
फाउण्टेन पेन लेविस ई. वाटरमैन संयुक्त राज्य अमेरिका 1884
इलेक्ट्रिक ट्रांसफार्मर विलियम स्टेनले संयुक्त राज्य अमेरिका 1885
कोका-कोला जॉन पेम्बर्टन संयुक्त राज्य अमेरिका 1886
इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राफी आगस्तुस वाल्टर ब्रिटेन 1887
डॉयनेमो निकोला टेस्ला संयुक्त राज्य अमेरिका 1892
डीजल इञ्जन रुडोल्फ डीजल जर्मनी 1892
स्टोव हडावे संयुक्त राज्य अमेरिका 1896
इलेक्ट्रॉन सर जोसेफ जे. थॉम्पसन इंग्लैण्ड 1897
रेडियोधर्मिता (एक्स रे) मैडम क्यूरी और पियरे क्यूरी फ्रांस 1898
एस्पिरिन डॉ. फेलिक्स होफमेन जर्मनी 1899
टेप रेकॉर्डर वाल्डेमर पौल्सेन डेनमार्क 1899
क्वाण्टम सिद्धान्त मैक्स प्लैंक जर्मनी 1900
रेज़र किंग जिलेट संयुक्त राज्य अमेरिका 1901
मनोविश्लेषण सिगमण्ड फ्रॉयड ऑस्ट्रिया 1904
धुलाई मशीन एल्वा फिशर संयुक्त राज्य अमेरिका 1906
E=mc अलबर्ट आइंस्टाइन स्विटज़रलैण्ड 1907
एयरकण्डीशनिंग विलिस कैरियर संयुक्त राज्य अमेरिका 1911
अणु अर्नेस्ट रदरफोर्ड इंग्लैण्ड 1911
अभिकलित्र (कम्प्यूटर) वानेवर बुश संयुक्त राज्य अमेरिका 1928
कार रेडियो विलियम लीर और एल्मर वैवरिंग संयुक्त राज्य अमेरिका 1929
बॉल पाइण्ट पेन लाज़्लो बिरो अर्जेण्टीना 1944
माइक्रोवेव ओवन पर्सी स्पेन्सर संयुक्त राज्य अमेरिका 1947
एकीकृत सर्किट जी.डब्लू.ए. डमर इंग्लैण्ड 1952
एलसीडी होफमन-ला रोश स्विटज़रलैण्ड 1970
कॉम्पैक्ट डिस्क (सीडी) आरसीए संयुक्त राज्य अमेरिका 1972
सापेक्षता का सिद्धांत अल्बर्ट आइंस्टाइन स्विटज़रलैण्ड 1905-1953

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

शवयात्रा

 

चमारों के गाँव में बल्हारों का एक परिवार था, जो जोहड़ के पार रहता था। चमारों और बल्हारों के बीच एक सीमा रेखा की तरह था जोहड़। बरसात के दिनों में जब जोहड़ पानी से भर जाता था तब बल्हारों का संपर्क गाँव से एकदम कट जाता था। बाक़ी समय में पानी कम हो जाने से किसी तरह वे पार करके गाँव पहुँचते थे। यानी बल्हारों के गाँव तक जाने का कोई रास्ता नहीं था। रास्ता बनाने की ज़रूरत कभी किसी ने महसूस ही नहीं की थी।

जब किसी चमार को उनकी ज़रूरत पड़ती, तो जोहड़ के किनारे खड़े होकर आवाज़ लगा देता। जोहड़ इतना बड़ा भी नहीं था, कि बल्हारों तक आवाज़ ही न पहुँचे। आवाज़ सुनकर वे बाहर आ जाते थे।

 

परिवार में सिर्फ़ दो जन ही रह गए थे—सुरजा, जिसकी उम्र ढल चुकी थी; और उसकी बेटी संतों, जो शादी के तीसरे साल में ही विधवा होकर मायके लौट आई थी। सुरजा की घरवाली को मरे भी तीन साल हो गए थे। घर-बाहर की तमाम ज़िम्मेदारियाँ संतों ने सँभाल रखी थी। सुरजा वैसे भी काफ़ी कमज़ोर हो चला था। उसे सूझता भी कम था। लेकिन फिर भी गाँव के छोटे-मोटे काम वह कर ही देता था।

सुरजा का एक बेटा भी था, जो दस-बारह साल की उम्र में ही घर छोड़कर भाग गया था। कुछ साल इधर-उधर भटकने के बाद उसे रेलवे में नौकरी मिल गई थी। इस नौकरी ने ही उसे पढ़ने-लिखने की ओर आकर्षित किया था। इसी तरह उसने हाईस्कूल करके तकनीकी प्रशिक्षण लिया और रेलवे में ही फिटर हो गया था। नाम था कल्लू, जो अब कल्लन हो गया था।

 

जब संतों की शादी हुई थी, सारा ख़र्च कल्लन ने ही उठाया था। सुरजा के पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं थी। कल्लन की शादी भी रेलवे कॉलोनी में ही हो गई थी। उसके ससुर भी रेलवे में ही थे। उसे पढ़ी-लिखी पत्नी मिली थी, जिसके कारण उसके रहने-सहन में फ़र्क़ आ गया था। उसके जीवन का ढर्रा ही बदल गया था।

गाँव वह यदाकदा ही आता था। लेकिन जब भी वह गाँव आता, चमार उसे अजीब-सी नज़रों से देखते थे। कल्लू से कल्लन हो जाने को वे स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। उनकी दृष्टि में वह अभी भी बल्हार ही था, समाज-व्यवस्था में सबसे नीचे यानी अछूतों में भी अछूत।

 

गाँव में वह अपने आपको अकेला महसूस करता था। परिवार के बाहर एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं था, जिससे वह दो घड़ी बतिया सके। गाँव के पढ़े-लिखे लोग भी उससे कटे-कटे रहते थे। आख़िर वह था तो बल्हार ही, जोहड़ पार रहने वाला। गाँव वाले उसे कल्लू बल्हार ही कहकर बुलाते थे। उसे यह संबोधन अच्छा नहीं लगता था। नश्तर की तरह उसे बाँधकर हीन भावना से भर देता था।

इस बार वह काफ़ी दिन बाद गाँव आया था। उसने आते ही सुरजा से कहा, “बापू, मेरे साथ दिल्ली चलो। सरकारी मकान में सब एक साथ रह लेंगे।”

 

“ना बेट्टे, इब आख़री बख़त में यो गाँव क्यूँ छुड़वावे... पुरखों ने यहाँ आक्के किसी जमान्ने में डेरा डाल्ला था। यहीं मर-खप्प गए, इसी माट्टी में। इस जोहड़ की ढैंग पे रहके जिनगी काट दी। इब कहाँ जांगे,” सुरजा ने आँखें मिचमिचाकर अपने मन की बात कही थी, जैसे अतीत में वह कुछ ढूँढ़ रहा था।

कल्लन ने संतों की ओर देखा। वह तो चाहती थी, इस जहालत से छुटकारा मिले। लेकिन बापू की बात काटने का उसमें न कभी पहले हौसला था, न अब है, बस चुपचाप बैठकर पैरे के अंगूठे से मिट्टी कुरेदने लगी थी। जैसे उसका सोच उसे कहीं बहुत दूर ले जा रहा था, जहाँ दूर-दूर तक भी कोई किनारा दिखाई नहीं पड़ता था। कल्लन ने ज़ोर देकर कहा, “बापू, यहाँ न तो इज़्ज़त है, ना रोटी, चमारों की नज़र में भी हम सिर्फ़ बल्हार हैं... यहाँ तुम्हारी वजह से आना पड़ता है... मेरे बच्चे यहाँ आना नहीं चाहते... उन्हें यहाँ अच्छा ही नहीं लगता...”

 

उसकी बात बीच में ही काटकर सुरजा बोला, “तो बेट्टे, हियाँ मत आया कर... म्हारी तो कट जागी इसी तरह। बस, संतों की फ़िकर है। यो अकेल्ली रह जागी... यो टूटा-फूटा घर भी शायद अगली बारिश ना देख पावे। तुझे जो म्हारी चिंता है, तो तू इस घर कू पक्का बणवादे...” सुरजा के मन में यह बात कई बार आई थी। लेकिन कह नहीं पाया था। आज मौक़ा पाकर कह दिया।

“बापू, मेरे पास जो दो-चार पैसे हैं, उन्हें यहाँ लगाकर क्या होगा। आपके बाद मैं तो यहाँ रहूँगा नहीं... संतों मेरे साथ दिल्ली चली जाएगी,” कल्लन ने साफ़-साफ़ कह दिया।

 

सुनते ही सुरजा भड़क गया। उसके मुँह से गालियाँ फूटने लगीं। चिल्लाकर बोला, “तू! मेरे मरने का इंतिज़ार भी क्यूँ करै है... इसे आज ही ले जा। और हाँ, अपणे पैसों की धौंस मुझे ना दिखा... अपने धौरे रख... जहाँ इतनी कटगी है, आगे बी कट ही जागी।”

उन दोनों के बीच जैसे अचानक संवाद सूत्र बिखर गए थे। ख़ामोशी उनके इर्द-गिर्द फैल गई थी।

 

सुबह होते ही कल्लन दिल्ली चला गया था। पैसों का बंदोबस्त करके वह हफ़्ते भर में लौट आया था। साथ में पत्नी सरोज और दस साल की बेटी सलोनी भी आई थी। बेटे को वे उसकी ननिहाल में छोड़कर आ गए थे। कल्लन ने आते ही बापू से कहा, “किसी मिस्तरी से बात करो। कल ईंटों का ट्रक आ जाएगा।”

सुनते ही सुरजा की आँखों में चमक आ गई थी। उसे कल्लन की बात पर विश्वास ही नहीं हुआ था। लेकिन कल्लन ने उसे विश्वास दिला दिया था। वह उसी वक़्त मिस्तरी की तलाश में निकल पड़ा था।

 

गाँव में ज़्यादातर मकान सूरतराम ठेकेदार ने बनाए थे। सुरजा उसी के पास पहुँचा, “ठेकेदारजी, म्हारा भी एक मकान बणा दो।”

सूरतराम ने पहले तो सूरजा को ऊपर से नीचे तक देखा। तन पर ढंग का कपड़ा नहीं और चला है पक्का मकान बनवाने। सूरतराम जल्दी में था। उसे कहीं जाना था। उसने हँसकर सुरजा को टाल दिया, “आज तो टेम ना है, फिर बात करेंगे।”

 

सुरजा ने हार नहीं मानी। सुबह ही वह मुँहअँधेरे निकल पड़ा था। पास के गाँव में साबिर मिस्तरी था। पुराना कारीगर। सुरजा ने उसे अपने आने का मक़सद बताया। साबिर मान गया था, “ठीक है, मैं कल आके देख लूँगा। अपना मेहनताना पेशगी लूँगा।

“ठीक है मिस्तरीजी। कल आ जाओ... जोहड़ पे ही म्हारा घर है,” सुरजा अपनी ख़ुशी छिपा नहीं पा रहा था। लौटते समय उसके पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। कमज़ोर शरीर में भी जैसे स्फूर्ति भर गई थी।

 

जब तक वह लौटकर घर पहुँचा, ईंटें आ चुकी थीं। लाल-लाल ईंटों को देखकर सुरजा अपनी थकावट भूल गया था। वह उल्लास से भर उठा था। उसने ऐसी ख़ुशी इससे पहले कभी महसूस ही नहीं की थी।

जोहड़ पार ईंटे उतरती देखना गाँव के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था। पूरे गाँव में जैसे भूचाल आ गया था। गाँव के कई लोग जोहड़ के किनारे खड़े थे।

 

रामजीलाल कीर्तन सभा का प्रधान था। रविदास जयंती पर रात-भर कीर्तन चलता था। भीड़ में वह भी खड़ा था। जब उससे रहा नहीं गया तो चिल्लाकर बोला, “अबे ओ! सुरजा... यो इन्टे कोण लाया है?”

सुरजा ने उत्साहित होकर कहा, “अजी बस, म्हारा कल्लण पक्का घर बणवा रिया है।”

 

रामजीलाल की आँखें फटी की फटी रह गईं। अपने भीतर उठते ईर्ष्या-द्वेष को दबाकर उसने कहा, “यो तो चोखी बात है सुरजा... पर पक्का मकान बणवाने से पहले परधानजी से तो पूछ लिया था या नहीं?”

रामजीलाल की बात तीर की तरह सुरजा के सीने में उतर गई। उसे लगा, जैसे कोई सूदखोर साहूकार सामने खड़ा धमकी दे रहा है। ग़ुस्से पर काबू पाने का असफल प्रयास करते हुए सुरजा ग़ुर्राया, “परधान से क्या पूछणा...?”

 

“फेर भी पूछ तो लेणा चाहिए था,” कहकर रामजीलाल तो चला गया लेकिन सुरजा को संशय में डाल गया था।

रामजीलाल सीधा प्रधान के पहुँचा। जोहड़ पार के हालात नमक-मिर्च लगाकर उसने प्रधान बलराम सिंह के सामने रखे। बलराम सिंह ने उस वक़्त कोई प्रतिक्रिया ज़ाहिर नहीं की। सिर्फ़ सिर हिलाकर मूँछों पर हाथ फेरता रहा। प्रधान भी घाघ था। वह रामजीलाल की फ़ितरत से वाक़िफ़ था। उसके चले जाने के बाद वह कुछ ग़मगीन-सा हो गया था। सुरजा बल्हार पक्का मकान बनवा रहा है, यह बात उसे बैचेन करने के लिए काफ़ी थी। वैसे भी सुरजा गाँव के लिए अब उतना उपयोगी नहीं था।

 

यह ख़बर पूरे गाँव में फैल गई थी, जोहड़ पार बल्हारों का पक्का मकान बन रहा है। रेलवे की कमाई है, ईंटों का ट्रक आ गया है। सीमेंट, रेत, बजरी, सरिये आ रहे हैं। बात फैलते-फैलते इतनी फैल गई कि मकान नहीं गाँव की छाती पर हवेली बनेगी। खिड़की-दरवाज़ों के लिए सागौन की लकड़ी आ रही है, सुना है रंगीन संगमरमर के टाइल भी आ रहे हैं। जितने मुँह उतनी बातें।

अगले दिन सुबह ही प्रधान का आदमी आ धमका था जोहड़ के किनारे। सुरजा को मन मार के उसके साथ जाना पड़ा।

 

सुरजा को देखते ही बलराम सिंह चीखा, “अंटी में चार पैसे आ गए तो अपनी औक़ात भूल गया। बल्हारों को यहाँ इसलिए नहीं बसाया था कि हमारी छाती पर हवेली खड़ी करेंगे... वह ज़मीन जिस पर तुम रहते हो, हमारे बाप-दादों की है। जिस हाल में हो... रहते रहो... किसी को एतिराज़ नहीं होगा। सिर उठा के खड़ा होने की कोशिश करोगे तो गाँव से बाहर कर देंगे।”

बलराम सिंह का एक-एक शब्द बुझे तीर की तरह सुरजा के जिस्म को छलनी छलनी कर गया था। सुरजा की आँखों के सामने ज़िंदगी के खट्टे-मीठे दिन नाचने लगे। जैसे कल ही की बात हो। क्या नहीं किया सुरजा ने इस गाँव के लिए, और बलराम चुनाव के दिनों में एक-एक वोट के लिए कैसे मिन्नतें करता था, तब सुरजा बल्हार नहीं, सुरजा ताऊ हो जाता था। सुरजा ने एक सर्द साँस छोड़ी। बिना कोई जवाब दिए वापस चल दिया। बलराम सिंह ने आवाज़ देकर रोकना चाहा। लेकिन वह रुका नहीं। बलराम सिंह की चींख़ अब गालियों में बदल गई, जो बाहर तक सुनाई पड़ रही थी।

 

घर पहुँचते ही सुरजा ने कल्लन से कहा, “तू सच कहवे था कल्लू... यो गाँव रहणे लायक़ ना है।” उसकी लंबी मूँछे ग़ुस्से में फड़फड़ा रही थीं। आँखों के कोर भीगे हुए थे।

“बापू, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा... ये ईंटें तो कोई भी ख़रीद लेगा, ये मकान बनने नहीं देंगे,” कल्लन ने सुरजा को समझाने की कोशिश की। लेकिन सुरजा ने भी ज़िद पकड़ ली थी, वह झुकेगा नहीं। जो होगा देखा जाएगा। उसने मन ही मन दोहराया।

 

“ना, बेट्टे, मकान तो ईब बणके रहवेगा... जान दे दूँगा, पर यो गाँव छोड़के ना जाऊँगा,” सुरजा ने गहरे आत्मविश्वास से कहा।

कल्लन अजीब-सी दुविधा में फँस गया था। भावावेश में आकर वह ईंटें तो ले आया था, पर गाँव के हालात देखकर उसे डर लग रहा था। कहीं कोई बावेला न उठ खड़ा हो। पत्नी सरोज और बेटी सलोनी साथ आ गए थे। लेकिन सलोनी को यहाँ आते ही बुख़ार हो गया था। सरोज के पास जो दो-चार गोलियाँ थीं, वे दे दी थीं सलोनी को। लेकिन बुख़ार कम नहीं हुआ था। सरोज का मन घबरा रहा था। वह लगातार कल्लन से जाने की जिद कर रही थी, “बेकार यहाँ मकान पर पैसा लगा रहे हो। संतों हमारे संग रहेगी। बापू को समझाओ।” लेकिन कल्लन सुरजा को समझाने में असमर्थ था। उसने सरोज से कहा, “अब, आख़िरी बखत में बापू का जी दुखाना क्या ठीक होगा?” सरोज चुप हो गई थी।

 

सुरजा ने रात-भर जागकर ईंटों की रखवाली की थी। एक पल के लिए भी आँखें नहीं झपकी थीं सुबह होते ही वह साबिर मिस्तरी को बुलाने चल दिया था। सुरजा को डर था, कहीं कोई उसे उलटी-सीधी पट्टी न पढ़ा दे, उसे अब किसी पर भी विश्वास नहीं था।

सलोनी का बुख़ार कम नहीं हो रहा था। सरोज ने कल्लन से किसी डॉक्टर को बुलाने के लिए कहा। गाँव-भर में सिर्फ़ एक डॉक्टर था। कल्लन उसे ही बुलाने के लिए चल दिया।

 

कल्लन को देखते ही डॉक्टर ने मना कर दिया। सामान्य पूछताछ करके कुछ गोलियाँ पुड़िया में बाँधकर दे दी। कल्लन ने बहुत मिन्नतें कीं, “डॉक्टर साहब, एक बार चल के तो देख लो?” डॉक्टर टस से मस नहीं हुआ। कल्लन ने कहा, “मरीज़ को यहीं आपके क्लीनिक में लेकर आ जाता हूँ।”

“नहीं... यहाँ मत लाना... कल से मेरी दुकान ही बंद हो जाएगी। यह मत भूलो तुम बल्हार हो,” डॉक्टर ने साफ़-साफ़ चेतावनी दी, “ये दवा उसे खिला दो, ठीक हो जाएगी।”

 

कल्लन निराश लौट आया था। डॉक्टर ने जो गोलियाँ दी थीं, वे भी असरहीन थीं। बुख़ार से बदन तप रहा था। तेज़ बुख़ार के कारण वह लगातार बड़बड़ा रही थी। संतों उसकी सेवा-टहल में लगी थी। एक मिनट के लिए भी वहाँ से नहीं हटी थी। सरोज की चिंता बढ़ रही थी। उसके मन में तरह-तरह की शंकाएँ उठ रही थीं।

सुरजा सुबह का गया दोपहर बाद लौटा था। थका-हारा, हताशा उसे इस हाल में देखकर कल्लन ने पूछा “क्या हुआ बापू?” सुरजा ने निढाल स्वर में कहा, 'होणा क्या था? मिस्तरी कहीं दूर रिश्तेदारी में गया है। दस-पंद्रह दिन बाद आवेगा... बेट्टे! मुझे ना लगे इब वो आवेगा।” सुरजा ने अपने मन की हताशा ज़ाहिर की।

 

“क्यों, बापू, हम तो उसकी मेहनत का पैसा उसे पेशगी दे रहे थे, फिर भी वह मुकर गया,” कल्लन ने तअज्जुब ज़ाहिर किया।

“गाँव के ही किसी ने उसे रोका होगा... साबिर ऐसा आदमी ना है... वह भी इनसे डर गिया दिक्खे,” सुरजा ने गहरे अवसाद में डूबकर कहा। दोनों गहरी चिंता में डूब गए थे।

 

“सलोनी का जी कैसा है?” सुरजा ने पूछा।

“उसकी तबीयत ज़्यादा ही बिगड़ गई है। अस्तपाल ले जाना पड़ेगा,” कल्लन ने चिंता व्यक्त की।

 

'किसी झाड़-फूँक वाले कू बुलाऊँ...” कहीं कुछ ओपरा ना हो?” सुरजा ने मन की शंका जताई।

“नहीं, बापू... मैं कल सुबह ही उसे लेकर शहर जाऊँगा। बस, आज की रात ठीक-ठाक कट जाए,” कल्लन के स्वर में गहरी पीड़ा भरी हुई थी। सुरजा ने उसे ढाढ़स बँधाया।

 

पूरी रात जागते हुए कटी थी। सलोनी की तबीयत बहुत ज़्यादा बिगड़ गई थी। सुबह होते ही कल्लन ने सलोनी को पीठ पर लादा। उसके इर्द-गिर्द ठीक से कपड़ा लपेटा। सरोज साथ थी। वे धूप चढ़ने से पहले शहर पहुँच जाना चाहते थे।

शहर गाँव से लगभग आठ-दस किलोमीटर दूर था। आने-जाने का कोई साधन नहीं था। कल्लन ने गाँव के संपन्न चमारों से बैलगाड़ी माँगी थी, लेकिन बल्हारों को वे गाड़ी देने को तैयार नहीं थे।

 

पीठ पर लादकर सलोनी को ले चलना कठिन हो रहा था। वह बार-बार पीठ से नीचे की ओर लुढ़क रही थी। कल्लन की पत्नी सहारा देते हुए उसके पीछे-पीछे चल रही थी। वे जल्दी से जल्दी शहर पहुँचना चाहते थे। लेकिन रास्ता काटे नहीं कट रहा था।

जैसे-जैसे धूप चढ़ रही थी, सलोनी का जिस्म निढाल हो रहा था। उसकी साँसे धीमी पड़ गई थीं। शहर लगभग आधा किलोमीटर दूर रह गया था। अचानक कल्लन को लगा जैसे सलोनी का भार कुछ बढ़ गया है। बुख़ार से तपता जिस्म ठंडा पड़ गया था। उसने सरोज से कहा, “देखो तो सलोनी ठीक तो है।”

 

सलोनी के शरीर में कोई स्पंदन ही नहीं था। सरोज दहाड़ मारकर चीख़ पड़ी थी, “मेरी बेटी को क्या हो गया... देखो तो यह हिल क्यों नहीं रही।” उसने रोते हुए कहा।

कल्लन ने सलोनी को पीठ से उतारकर सड़क के किनारे लिटा दिया था। वह हताश ठगा सा खड़ा था। उसके अंतस में एक हड़कंप सी मच गई थी। दस वर्ष की जीती-जागती सलोनी उसके हाथों में ही मुर्दा जिस्म में बदल गई थी। सब कुछ आँखों के सामने घटा था। वे ज़ोर-ज़ोर से चीख़कर रो रहे थे। रास्ता सुनसान था। उनकी चीख़ें सुनने वाला भी कोई दूर-दूर तक नहीं था। वे काफ़ी देर इसी तरह बैठे रोते रहे। उन्हें सूझ ही नहीं रहा था—क्या करें। सड़क किनारे कच्चे रास्ते पर सलोनी के शव को लिए वे तड़प रहे थे। काफ़ी देर बाद एक व्यक्ति शहर की ओर से आता दिखाई पड़ा। उन्हें उम्मीद की एक झलक दिखाई दी। शायद आने वाला उनकी कोई मदद करे।

 

राहगीर क्षण-भर उनके पास रुका। लेकिन बिना कुछ कहे, आगे बढ़ गया। शायद उसने उन्हें पहचान लिया था। उसी गाँव का था। कल्लन को लगा इंसान की 'ज़ात' ही सब कुछ है।

आख़िर वे उठे और बेटी का शव कंधों पर रखकर गाँव की ओर लौट चले। कंधों पर जितना बोझ था, उससे कहीं ज़्यादा बोझ उनके भीतर समाया हुआ था। सलोनी के बचपन की किलकारियाँ रह-रहकर उनकी स्मृतियों में कुलाँचे भर रही थीं। भारी मन से वे सलोनी का शव उठाए गाँव की ओर बढ़ रहे थे। रास्ता जैसे ख़त्म ही नहीं हो रहा था। जितना समय शहर के पास पहुँचने में लगा था, उससे ज़्यादा गाँव पहुँचने में लग रहा था। सरोज का हाल बहुत ही चिंताजनक था। वह सिर्फ़ घिसट रही थी। टूट तो कल्लन भी गया था लेकिन किसी तरह स्वयं को सँभाले हुए था। सरोज अधमरी-सी हो गई थी। उससे चला नहीं जा रहा था।

 

सुरजा ने उन्हें दूर से ही देख लिया था। पहचाना तो उन्हें पास आने पर ही। लेकिन दूर से आती आकृतियों को देखकर उसने अंदाज़ा लगा लिया था। वे जिस तरह सलोनी को ला रहे थे, देखकर उसका माथा ठनका। वह घर से निकलकर सड़क तक आ गया था। सलोनी का शव देखकर वह स्वयं को नहीं सँभाल पा रहा था। वह तड़प उठा था। ज़मीन पर दोहत्थड़ मार-मारकर वह रोने लगा था। कल्लन की आँखों से भी बेतहाशा आँसू बह रहे थे। उनका रोना-धोना सुनकर संतों भी आ गई थी। उन्हें ढाढ़स बँधाने वाला कोई नहीं था।

शहर से लौटने में उन्हें वैसे ही समय ज़्यादा हो गया था। किसी को बुलाने के लिए भी समय नहीं था। रात-भर इंतिज़ार करने की स्थिति में नहीं थे। कल्लन चाहता था कि शाम होने से पहले ही दाह-संस्कार हो जाए। सलोनी के शव को देखकर सरोज बार-बार बेहोश हो रही थी।

 

समस्या थी लकड़ियों की। दाह-संस्कार के लिए लकड़ियाँ उनके पास नहीं थीं। सुरजा और संतों लकड़ियों का इंतिज़ाम करने के लिए निकल पड़े थे। उन्होंने चमारों के दरवाज़ों पर जाकर गुहार लगाई थी। लेकिन कोई भी मदद करने को तैयार नहीं था। घंटा-भर भटकने के बाद भी वे इतनी लकड़ी नहीं जुटा पाए थे कि ठीक से दाह-संस्कार हो सके। घर में उपले थे। संतों ने कहा, “लकड़ियों की जगह उपले ही ले जाओ।”

चमारों का शमशान गाँव के निकट था। लेकिन उसमें बल्हारों को अपने मुर्दे फूँकने की इजाज़त नहीं थी। कल्लन की माँ के समय भी ऐसी ही समस्या आई थी। चमारों ने साफ़ मना कर दिया था। गाँव से बाहर तीन-चार किलोमीटर दूर ले जाकर फूँकना पड़ा था। इतनी दूर सलोनी के शव को ले जाना... लकड़ी, उपले भी ले जाने थे। सुरजा और कल्लन के अलावा कोई नहीं था, जो इस कार्य में हाथ बँटा सकता था।

 

बल्हारों के मुर्दे को हाथ लगाने या शवयात्रा में शामिल होने गाँव का कोई भी व्यक्ति नहीं आया था। 'ज़ात' उनका रास्ता रोक रही थी। कल्लन ने काफ़ी कोशिश की थी। वह रविदास मंडल, डॉक्टर अम्बेडकर युवक सभा के लोगों से जाकर मिला था। लेकिन कोई भी साथ आने को तैयार नहीं था। किसी न किसी बहाने वे सब कन्नी काट गए थे।

रेलवे कॉलोनी में ‘अंबेडकर जयंती’ के भाषण उसे याद आने लगे थे। उसने उन तमाम विचारों को झटक दिया था। गहरी वितृष्णा उसके भीतर उठ रही थी। उसे लगा, वे तमाम भाषण खोखले और बेहद बनावटी थे।

 

कल्लन ने सुरजा से कहा, “बापू! और देर मत करो...” उन दोनों ने कपड़े में लिपटे सलोनी के शव को उठा लिया था। स्त्रियों के शमशान जाने का रिवाज बल्हारों में नहीं था। लेकिन संतों और सरोज के लिए इस रिवाज को तोड़ देने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था। संतों ने लकड़ियों का गट्ठर सिर पर रखकर हाथ में आग और हाँडी उठा लिए थे। पीछे-पीछे सरोज उपलों भरा टोकरा लिए चल पड़ी थी।

इस शवयात्रा को देखने के लिए चमारिनें अपनी छतों पर चढ़ गई थीं। उनकी आँखों के कोर भीगे हुए थे। लेकिन बेबस थीं, अपने-अपने दायरे में क़ैद। बल्हार तो आख़िर बल्हार ही थे। अपने ही नहीं, उन्हें तो दूसरों के मुर्दे भी ढोने की आदत थी...

चमारों का गाँव और उसमें एक बल्हार परिवार।

 

ओमप्रकाश वाल्मीकि

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