नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

मधुशाला

 

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।

प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरूँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।

सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रुनझुन रुनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।

जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रुनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।

मेंहदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।

बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूँद मिले'
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
'और लिये जा, और पिये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।

बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।

बड़े बड़े परिवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,
जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।

सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला,
धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
जगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।

भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,
छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,
पटे कहाँ से, मधु औ' जग की जोड़ी ठीक नहीं,
जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।

बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुँह पर पड़ जाएगा ताला,
दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।

हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,
वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,
स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,
पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।

नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,
कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,
जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।

बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
बनी रहे वह मिट्टी जिससे बनता है मधु का प्याला,
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।

सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,
मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,
मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,
कहा करो 'जय राम' न मिलकर, कहा करो 'जय मधुशाला'।।२९।

सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।

तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,
सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,
मत्त समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।

अधरों पर हो कोई भी रस जिह्वा पर लगती हाला,
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।

पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,
माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,
झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।

प्रति रसाल तरु साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,
छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,
छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली
हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।

मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला
भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,
हरे हरे नव पल्लव, तरुगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,
छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।

साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,
तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,
अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,
प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।

उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,
जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते
सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।

अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।

किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
किसी ओर मैं देखूँ, मुझको दिखलाई देता साकी
किसी ओर देखूँ, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।

साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,
जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,
देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।

वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।

चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला,
जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला,
मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते,
चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२।

घन श्यामल अंगूर लता से खिंच खिंच यह आती हाला,
अरुण-कमल-कोमल कलियों की प्याली, फूलों का प्याला,
लोल हिलोरें साकी बन बन माणिक मधु से भर जातीं,
हंस मत्त होते पी पीकर मानसरोवर मधुशाला।।४३।

हिम श्रेणी अंगूर लता-सी फैली, हिम जल है हाला,
चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला,
कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं,
पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला।।४४।

धीर सुतों के हृदय रक्त की आज बना रक्तिम हाला,
वीर सुतों के वर शीशों का हाथों में लेकर प्याला,
अति उदार दानी साकी है आज बनी भारतमाता,
स्वतंत्रता है तृषित कालिका बलिवेदी है मधुशाला।।४५।

दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।४६।

पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलती हाला,
सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला,
मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।।४७।

सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।

बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।

कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!।५१।

और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,
इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,
कर लें पूजा शेख, पुजारी तब तक मस्जिद मन्दिर में
घूँघट का पट खोल न जब तक झाँक रही है मधुशाला।।५२।

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,
होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई, फिर
जहाँ अभी हैं मन्दिर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला।।५३।

यज्ञ अग्नि सी धधक रही है मधु की भटठी की ज्वाला,
ऋषि सा ध्यान लगा बैठा है हर मदिरा पीने वाला,
मुनि कन्याओं सी मधुघट ले फिरतीं साकीबालाएँ,
किसी तपोवन से क्या कम है मेरी पावन मधुशाला।।५४।

सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,
द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,
वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,
युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।५५।

वही वारुणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,
रंभा की संतान जगत में कहलाती 'साकीबाला',
देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!
किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।५६।

कभी न सुन पड़ता, 'इसने, हा, छू दी मेरी हाला',
कभी न कोई कहता, 'उसने जूठा कर डाला प्याला',
सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,
सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।

श्रम, संकट, संताप, सभी तुम भूला करते पी हाला,
सबक बड़ा तुम सीख चुके यदि सीखा रहना मतवाला,
व्यर्थ बने जाते हो हरिजन, तुम तो मधुजन ही अच्छे,
ठुकराते हैं मंदिरवाले, पलक बिछाती मधुशाला।।५८।

एक तरह से सबका स्वागत करती है साकीबाला,
अज्ञ विज्ञ में है क्या अंतर हो जाने पर मतवाला,
रंक राव में भेद हुआ है कभी नहीं मदिरालय में,
साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है यह मेरी मधुशाला।।५९।

बार बार मैंने आगे बढ़ आज नहीं माँगी हाला,
समझ न लेना इससे मुझको साधारण पीने वाला,
हो तो लेने दो ऐ साकी दूर प्रथम संकोचों को,
मेरे ही स्वर से फिर सारी गूँज उठेगी मधुशाला।।६०।

कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला
हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,
आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है,
कल की हो न मुझे मधुशाला काल कुटिल की मधुशाला।।६१।

आज मिला अवसर, तब फिर क्यों मैं न छकूँ जी-भर हाला
आज मिला मौका, तब फिर क्यों ढाल न लूँ जी-भर प्याला,
छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी-भर कर लूँ,
एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला।।६२।

आज सजीव बना लो, प्रेयसी, अपने अधरों का प्याला,
भर लो, भर लो, भर लो इसमें, यौवन मधुरस की हाला,
और लगा मेरे होठों से भूल हटाना तुम जाओ,
अथक बनू मैं पीनेवाला, खुले प्रणय की मधुशाला।।६३।

सुमुखी तुम्हारा, सुन्दर मुख ही, मुझको कन्चन का प्याला
छलक रही है जिसमें माणिक रूप मधुर मादक हाला,
मैं ही साकी बनता, मैं ही पीने वाला बनता हूँ
जहाँ कहीं मिल बैठे हम तुम़ वहीं गयी हो मधुशाला।।६४।

दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला,
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला,
नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ,
अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ - अदाई मधुशाला।।६५।

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करूँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।६६।

क्या पीना, निर्द्वन्द न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला,
क्या जीना, निश्चिंत न जब तक साथ रहे साकीबाला,
खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे,
मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला।।६७।

मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी-सी हाला!
मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!
इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरूँ,
सिंधु-तृषा दी किसने रचकर बिंदु-बराबर मधुशाला।।६८।

क्या कहता है, रह न गई अब तेरे भाजन में हाला,
क्या कहता है, अब न चलेगी मादक प्यालों की माला,
थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी तो शेष नहीं कुछ पीने को,
प्यास बुझाने को बुलवाकर प्यास बढ़ाती मधुशाला।।६९।

लिखी भाग्य में जितनी बस उतनी ही पाएगा हाला,
लिखा भाग्य में जैसा बस वैसा ही पाएगा प्याला,
लाख पटक तू हाथ पाँव, पर इससे कब कुछ होने का,
लिखी भाग्य में जो तेरे बस वही मिलेगी मधुशाला।।७०।

कर ले, कर ले कंजूसी तू मुझको देने में हाला,
दे ले, दे ले तू मुझको बस यह टूटा फूटा प्याला,
मैं तो सब्र इसी पर करता, तू पीछे पछताएगी,
जब न रहूँगा मैं, तब मेरी याद करेगी मधुशाला।।७१।

ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला,
गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला,
साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा,
दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला।।७२।

क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुर्बल मानव मिटटी का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर कटु-मधु जीवन की हाला,
मृत्यु बनी है निर्दय साकी अपने शत-शत कर फैला,
काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला।।७३।

प्याले सा गढ़ हमें किसी ने भर दी जीवन की हाला,
नशा न भाया, ढाला हमने ले लेकर मधु का प्याला,
जब जीवन का दर्द उभरता उसे दबाते प्याले से,
जगती के पहले साकी से जूझ रही है मधुशाला।।७४।

अपने अंगूरों से तन में हमने भर ली है हाला,
क्या कहते हो, शेख, नरक में हमें तपाएगी ज्वाला,
तब तो मदिरा खूब खिंचेगी और पिएगा भी कोई,
हमें नमक की ज्वाला में भी दीख पड़ेगी मधुशाला।।७५।

यम आएगा लेने जब, तब खूब चलूँगा पी हाला,
पीड़ा, संकट, कष्ट नरक के क्या समझेगा मतवाला,
क्रूर, कठोर, कुटिल, कुविचारी, अन्यायी यमराजों के
डंडों की जब मार पड़ेगी, आड़ करेगी मधुशाला।।७६।

यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला,
यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला,
हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर,
मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला।।७७।

याद न आए दुखमय जीवन इससे पी लेता हाला,
जग चिंताओं से रहने को मुक्त, उठा लेता प्याला,
शौक, साध के और स्वाद के हेतु पिया जग करता है,
पर मै वह रोगी हूँ जिसकी एक दवा है मधुशाला।।७८।

गिरती जाती है दिन प्रतिदिन प्रणयनी प्राणों की हाला
भग्न हुआ जाता दिन प्रतिदिन सुभगे मेरा तन प्याला,
रूठ रहा है मुझसे रूपसी, दिन दिन यौवन का साकी
सूख रही है दिन दिन सुन्दरी, मेरी जीवन मधुशाला।।७९।

यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला,
पी न होश में फिर आएगा सुरा-विसुध यह मतवाला,
यह अंतिम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है,
पथिक, प्यार से पीना इसको फिर न मिलेगी मधुशाला।८०।

ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला
पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला,
हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जिह्वा भूले
कानो में तुम कहती रहना, मधु का प्याला मधुशाला।।८१।

मेरे अधरों पर हो अंतिम वस्तु न तुलसीदल प्याला
मेरी जिह्वा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२।

मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आँसू में हाला
आह भरे वो, जो हो सुरभित मदिरा पी कर मतवाला,
दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों
और जलूँ उस ठौर जहाँ पर कभी रही हो मधुशाला।।८३।

और चिता पर जाये उँड़ेला पात्र न घृत का, पर प्याला
कंठ बँधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
प्राण प्रिये यदि श्राद्ध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालों को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।।८४।

नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५।

ज्ञात हुआ यम आने को है ले अपनी काली हाला,
पंडित अपनी पोथी भूला, साधु भूल गया माला,
और पुजारी भूला पूजा, ज्ञान सभी ज्ञानी भूला,
किन्तु न भूला मरकर के भी पीनेवाला मधुशाला।।८६।

यम ले चलता है मुझको तो, चलने दे लेकर हाला,
चलने दे साकी को मेरे साथ लिए कर में प्याला,
स्वर्ग, नरक या जहाँ कहीं भी तेरा जी हो लेकर चल,
ठौर सभी हैं एक तरह के साथ रहे यदि मधुशाला।।८७।

पाप अगर पीना, समदोषी तो तीनों - साकी बाला,
नित्य पिलानेवाला प्याला, पी जानेवाली हाला,
साथ इन्हें भी ले चल मेरे न्याय यही बतलाता है,
कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८।

शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,
'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।।८९।

जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,
जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,
जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,
जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!।९०।

देख रहा हूँ अपने आगे कब से माणिक-सी हाला,
देख रहा हूँ अपने आगे कब से कंचन का प्याला,
'बस अब पाया!'- कह-कह कब से दौड़ रहा इसके पीछे,
किंतु रही है दूर क्षितिज-सी मुझसे मेरी मधुशाला।।९१।

कभी निराशा का तम घिरता, छिप जाता मधु का प्याला,
छिप जाती मदिरा की आभा, छिप जाती साकीबाला,
कभी उजाला आशा करके प्याला फिर चमका जाती,
आँख मिचौली खेल रही है मुझसे मेरी मधुशाला।।९२।

'आ आगे' कहकर कर पीछे कर लेती साकीबाला,
होंठ लगाने को कहकर हर बार हटा लेती प्याला,
नहीं मुझे मालूम कहाँ तक यह मुझको ले जाएगी,
बढ़ा बढ़ाकर मुझको आगे, पीछे हटती मधुशाला।।९३।

हाथों में आने-आने में, हाय, फिसल जाता प्याला,
अधरों पर आने-आने में हाय, ढुलक जाती हाला,
दुनियावालो, आकर मेरी किस्मत की ख़ूबी देखो,
रह-रह जाती है बस मुझको मिलते-मिलते मधुशाला।।९४।

प्राप्य नही है तो, हो जाती लुप्त नहीं फिर क्यों हाला,
प्राप्य नही है तो, हो जाता लुप्त नहीं फिर क्यों प्याला,
दूर न इतनी हिम्मत हारूँ, पास न इतनी पा जाऊँ,
व्यर्थ मुझे दौड़ाती मरु में मृगजल बनकर मधुशाला।।९५।

मिले न, पर, ललचा ललचा क्यों आकुल करती है हाला,
मिले न, पर, तरसा तरसाकर क्यों तड़पाता है प्याला,
हाय, नियति की विषम लेखनी मस्तक पर यह खोद गई
'दूर रहेगी मधु की धारा, पास रहेगी मधुशाला!'।९६।

मदिरालय में कब से बैठा, पी न सका अब तक हाला,
यत्न सहित भरता हूँ, कोई किंतु उलट देता प्याला,
मानव-बल के आगे निर्बल भाग्य, सुना विद्यालय में,
'भाग्य प्रबल, मानव निर्बल' का पाठ पढ़ाती मधुशाला।।९७।

किस्मत में था खाली खप्पर, खोज रहा था मैं प्याला,
ढूँढ़ रहा था मैं मृगनयनी, किस्मत में थी मृगछाला,
किसने अपना भाग्य समझने में मुझसा धोखा खाया,
किस्मत में था अवघट मरघट, ढूँढ़ रहा था मधुशाला।।९८।

उस प्याले से प्यार मुझे जो दूर हथेली से प्याला,
उस हाला से चाव मुझे जो दूर अधर से है हाला,
प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला।।९९।

साकी के पास है तनिक सी श्री, सुख, संपित की हाला,
सब जग है पीने को आतुर ले ले किस्मत का प्याला,
रेल ठेल कुछ आगे बढ़ते, बहुतेरे दबकर मरते,
जीवन का संघर्ष नहीं है, भीड़ भरी है मधुशाला।।१००।

साकी, जब है पास तुम्हारे इतनी थोड़ी सी हाला,
क्यों पीने की अभिलषा से, करते सबको मतवाला,
हम पिस पिसकर मरते हैं, तुम छिप छिपकर मुसकाते हो,
हाय, हमारी पीड़ा से है क्रीड़ा करती मधुशाला।।१०१।

साकी, मर खपकर यदि कोई आगे कर पाया प्याला,
पी पाया केवल दो बूँदों से न अधिक तेरी हाला,
जीवन भर का, हाय, परिरश्रम लूट लिया दो बूँदों ने,
भोले मानव को ठगने के हेतु बनी है मधुशाला।।१०२।

जिसने मुझको प्यासा रक्खा बनी रहे वह भी हाला,
जिसने जीवन भर दौड़ाया बना रहे वह भी प्याला,
मतवालों की जिह्वा से हैं कभी निकलते शाप नहीं,
दुखी बनाया जिसने मुझको सुखी रहे वह मधुशाला!।१०३।

नहीं चाहता, आगे बढ़कर छीनूँ औरों की हाला,
नहीं चाहता, धक्के देकर, छीनूँ औरों का प्याला,
साकी, मेरी ओर न देखो मुझको तनिक मलाल नहीं,
इतना ही क्या कम आँखों से देख रहा हूँ मधुशाला।।१०४।

मद, मदिरा, मधु, हाला सुन-सुन कर ही जब हूँ मतवाला,
क्या गति होगी अधरों के जब नीचे आएगा प्याला,
साकी, मेरे पास न आना मैं पागल हो जाऊँगा,
प्यासा ही मैं मस्त, मुबारक हो तुमको ही मधुशाला।।१०५।

क्या मुझको आवश्यकता है साकी से माँगूँ हाला,
क्या मुझको आवश्यकता है साकी से चाहूँ प्याला,
पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से!
मैं तो पागल हो उठता हूँ सुन लेता यदि मधुशाला।।१०६।

देने को जो मुझे कहा था दे न सकी मुझको हाला,
देने को जो मुझे कहा था दे न सका मुझको प्याला,
समझ मनुज की दुर्बलता मैं कहा नहीं कुछ भी करता,
किन्तु स्वयं ही देख मुझे अब शरमा जाती मधुशाला।।१०७।

एक समय संतुष्ट बहुत था पा मैं थोड़ी-सी हाला,
भोला-सा था मेरा साकी, छोटा-सा मेरा प्याला,
छोटे-से इस जग की मेरे स्वर्ग बलाएँ लेता था,
विस्तृत जग में, हाय, गई खो मेरी नन्ही मधुशाला!।१०८।

बहुतेरे मदिरालय देखे, बहुतेरी देखी हाला,
भाँति भाँति का आया मेरे हाथों में मधु का प्याला,
एक एक से बढ़कर, सुन्दर साकी ने सत्कार किया,
जँची न आँखों में, पर, कोई पहली जैसी मधुशाला।।१०९।

एक समय छलका करती थी मेरे अधरों पर हाला,
एक समय झूमा करता था मेरे हाथों पर प्याला,
एक समय पीनेवाले, साकी आलिंगन करते थे,
आज बनी हूँ निर्जन मरघट, एक समय थी मधुशाला।।११०।

जला हृदय की भट्टी खींची मैंने आँसू की हाला,
छलछल छलका करता इससे पल पल पलकों का प्याला,
आँखें आज बनी हैं साकी, गाल गुलाबी पी होते,
कहो न विरही मुझको, मैं हूँ चलती फिरती मधुशाला!।१११।

कितनी जल्दी रंग बदलती है अपना चंचल हाला,
कितनी जल्दी घिसने लगता हाथों में आकर प्याला,
कितनी जल्दी साकी का आकर्षण घटने लगता है,
प्रात नहीं थी वैसी, जैसी रात लगी थी मधुशाला।।११२।

बूँद बूँद के हेतु कभी तुझको तरसाएगी हाला,
कभी हाथ से छिन जाएगा तेरा यह मादक प्याला,
पीनेवाले, साकी की मीठी बातों में मत आना,
मेरे भी गुण यों ही गाती एक दिवस थी मधुशाला।।११३।

छोड़ा मैंने पथ मतों को तब कहलाया मतवाला,
चली सुरा मेरा पग धोने तोड़ा जब मैंने प्याला,
अब मानी मधुशाला मेरे पीछे पीछे फिरती है,
क्या कारण? अब छोड़ दिया है मैंने जाना मधुशाला।।११४।

यह न समझना, पिया हलाहल मैंने, जब न मिली हाला,
तब मैंने खप्पर अपनाया ले सकता था जब प्याला,
जले हृदय को और जलाना सूझा, मैंने मरघट को
अपनाया जब इन चरणों में लोट रही थी मधुशाला।।११५।

कितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,
टूट चुकी अब तक कितने ही मादक प्यालों की माला,
कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गए,
कितने पीनेवाले आए, किन्तु वही है मधुशाला।।११६।

कितने होठों को रक्खेगी याद भला मादक हाला,
कितने हाथों को रक्खेगा याद भला पागल प्याला,
कितनी शक्लों को रक्खेगा याद भला भोला साकी,
कितने पीनेवालों में है एक अकेली मधुशाला।।११७।

दर दर घूम रहा था जब मैं चिल्लाता - हाला! हाला!
मुझे न मिलता था मदिरालय, मुझे न मिलता था प्याला,
मिलन हुआ, पर नहीं मिलनसुख लिखा हुआ था किस्मत में,
मैं अब जमकर बैठ गया हूँ, घूम रही है मधुशाला।।११८।

मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,
प्याले में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला,
इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!।११९।

किसे नहीं पीने से नाता, किसे नहीं भाता प्याला,
इस जगती के मदिरालय में तरह-तरह की है हाला,
अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार सभी पी मदमाते,
एक सभी का मादक साकी, एक सभी की मधुशाला।।१२०।

वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला,
जिसमें मैं बिंबित-प्रतिबिंबित प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।

मतवालापन हाला से ले मैंने तज दी है हाला,
पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला,
साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया,
मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।

मदिरालय के द्वार ठोंकता किस्मत का छूंछा प्याला,
गहरी, ठंडी सांसें भर भर कहता था हर मतवाला,
कितनी थोड़ी सी यौवन की हाला, हा, मैं पी पाया!
बंद हो गई कितनी जल्दी मेरी जीवन मधुशाला।।१२३।

कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गयी सुरिभत हाला,
कहाँ गया स्वपिनल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!
पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।

अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया -
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।

'मय' को करके शुद्ध दिया अब नाम गया उसको, 'हाला'
'मीना' को 'मधुपात्र' दिया 'सागर' को नाम गया 'प्याला',
क्यों न मौलवी चौंकें, बिचकें तिलक-त्रिपुंडी पंडित जी
'मय-महिफल' अब अपना ली है मैंने करके 'मधुशाला'।।१२६।

कितने मर्म जता जाती है बार-बार आकर हाला,
कितने भेद बता जाता है बार-बार आकर प्याला,
कितने अर्थों को संकेतों से बतला जाता साकी,
फिर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला।।१२७।

जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।१२८।

जिन अधरों को छुए, बना दे मस्त उन्हें मेरी हाला,
जिस कर को छू दे, कर दे विक्षिप्त उसे मेरा प्याला,
आँख चार हों जिसकी मेरे साकी से दीवाना हो,
पागल बनकर नाचे वह जो आए मेरी मधुशाला।।१२९।

हर जिह्वा पर देखी जाएगी मेरी मादक हाला
हर कर में देखा जाएगा मेरे साकी का प्याला
हर घर में चर्चा अब होगी मेरे मधुविक्रेता की
हर आंगन में गमक उठेगी मेरी सुरभित मधुशाला।।१३०।

मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
जिसकी जैसी रुचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला।।१३१।

यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,
नहीं-नहीं कवि का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।।१३२।

कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!।१३३।

विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
यदि थोड़ी-सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला,
शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई,
जन्म सफल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला।।१३४।

बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,
कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,
मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।।१३५।

स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।

मैं कायस्थ कुलोद्भव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,
मेरे तन के लोहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला,
पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,
मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।

बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,
बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,
पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही
और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।

पितृ पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिट्टी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।

हरिवंशराय बच्चन

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शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

रात का फूल

 

एक फूल

रात की किसी अंधी गाँठ में

घाव की तरह खुला है

किसी बंजर प्रदेश में

और उसके रंग में जादू है

टूटती हुई गृहस्थी,

छूटती हुई नौकरी, अपमान और असुरक्षा

के तनाव में टूटते हुए मस्तिष्क से

निकली है कोई कविता

जिसके क्रोध और दुख और घृणा में

कला है

ख़ाली बरतनों, दवाइयों की शीशियों

और मृत्यु की गहरी गंध से भरे

कमरे में

हँसता है वह ढाई साल का बच्चा

और उसके दूधिया दाँतों में

ग़ज़ब की चमक है!

 

उदय प्रकाश

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शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

तुम मेरे जनाजे में

 

न खुलकर मैं तुम्हें मोहब्बत कर पाया

न खुलकर तुम मेरे जनाजे में रो पाए

                       कृष्णधर शर्मा 20.10.16

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

एक सियार का दर्द


जैसा कि रोज का नियम था आज सुबह भी मैं घूमने निकला तो मुख्या सड़क छोड़कर पगडंडियों कि तरफ निकल गया. सुबह कि ताज़ी खुशगवार हवा का आनंद लेते हुए कुछ कदम ही चला था कि अचानक एक सियार से मेरा साक्षात हो गया, कुछ पल के लिए तो मैं भयभीत सा हो गया क्योंकि मैने सुन रखा था कि दो-चार सियार एक साथ मिलकर एक अकेले आदमी का तीया-पांचा कर सकते हैं, तो कुच्छ पल के लिए मैं घबराया मगर एक बात ने मुझे काफी राहत पहुंचाई, वह यह कि सियार बिलकुल अकेला था.
कुछ पल तो हम दोनों एक-दूसरे को देखते ही रह गए. मेरी तन्द्रा सियार ने ही भंग की. पहले तो उसने इधर-उधर निगाह दौड़ाई फिर उत्सुकतावश मेरी तरफ देखने लगा. उसकी भाव-भंगिमा से ऐसा आभास हो रहा था मानो वह अपनी व्यथा-कथा मुझे सुनाना चाहता हो.
होता आमतौर पर यह था कि सियार पहले भी मुझे आते-जाते कहीं ना कहीं मिलते थे पर ऐसा पहली बार हो रहा था कि सियार मेरे सामने जरा भी डरे या विचलित हुए उत्सुक नजरों से देखता खड़ा था.

अब मेरे मन में भी उत्सुकता पैदा हुई कि पहले तो सियार सामना होते ही डरकर अगल-बगल हो जाया करते थे पर इस सियार को आज यह क्या हो गया है कि मुझसे किनारा करने कए बजाय मुझसे कुछ कहने को उत्सुक दिख रहा है. मैंने मन ही मन सोचा कि चलो देखा जाए बात क्या है.
मै सियार कि तरफ बढ़ा. सियार जैसे अचानक नींद से जगा हो, मुझे अपनी तरफ बढ़ते देख वह घबराया और अपनी आदत के मुताबिक भागने कि मुद्रा बनाता दिखा तो मैंने उसे रोकते हुए कहा “अरे सियार भाई जरा रुको तो सही मुझे तुमसे कुछ बात करनी है. यह सुनकर सियार जरा ठिठका लेकिन फिर भागते हुए बोला
“नहीं आदमी भाई मैं आपसे बात नहीं कर सकता क्योंकि मेरी जान को खतरा हो सकता है".
 मैंने विस्मित होते हुए पूछा कि
“क्यों भाई तुम्हारी जान को किससे खतरा हो सकता है"
यह सुनकर सियार बोला
“मुझे आदमियों से ही खतरा है और चूंकि तुम भी एक आदमी ही हो इसलिए मैं कह सकता हूँ कि मुझे तुमसे भी खतरा है!"
 मुझे तो अभी तक मालूम ही नहीं था कि सियारों को आदमी से भी कोई खतरा हो सकता है! इसलिए मैनें सियार से पूछा कि
“हम आदमियों से तुम्हें क्या खतरा है? जरा खुलकर बताओ! फ़िलहाल मैं तुम्हें आश्वस्त करता हूँ कि तुम्हे मुझसे कोई खतरा नहीं है इसलिए जरा रुको और बताओ कि तुम्हारी परेशानी क्या है?"
 "और मुझे यह भी लग रहा है कि तुम मुझसे कुछ कहना चाहते थे! तो सारी बातें खुलकर कहो."
मेरी तरफ से ऐसा आश्वासन पाकर सियार कुछ आश्वस्त होता नजर आया. वह मेरे थोडा और नजदीक आकर रुक गया, फिर एक गहरी सांस लेकर बोला,
"क्या बताऊँ! कुछ समझ ही नहीं आता कि तुमसे क्या कहूं?" सियार कि बातें सुनकर मुझे लगा कि जरूर यह अपनी कोई पीड़ा या दुःख मुझे बताना चाहता है पर शायद मुझ पर विश्वास नहीं कर पा रहा है फिर भी मैंने कहा कि
"तुम मुझे अक्सर इन पगडंडियों में मिलते रहे हो और मेरा सामना न करके इधर-उधर हो जाते थे. फिर आज क्यूँ खड़े रहे और मुझे ऐसा क्यों लगा कि तुम मुझसे कुछ कहना चाहते हो!"
मेरी बात सुनकर सियार कुछ सोचता हुआ बोला
“हाँ आदमी भाई, मै सचमुच तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ और मैं सिर्फ तुमसे ही कहना चाहता हूँ क्योंकि मैं बहुत दिनों से तुम्हें देखकर महसूस कर रहा था कि तुम दयावान और प्रकृतिप्रेमी लगते हो इसलिए आज तुमसे बात करने कि हिम्मत जुटा पाया हूँ वरना हमारे सियार समाज में तो मनुष्यों से दूर ही रहने कि हिदायत दी हुई है"

सियार कि बातें सुनकर मैनें कहा
“सियार भाई, तुम मुझे ठीक समझ रहे हो अतः तुम मुझ पर विश्वास करके अपनी व्यथा-कथा कह सकते हो"
तब सियार ने कहना शुरू किया
“आदमी भाई, बुरा मत मानना! क्योंकि मैं जो कुछ कहने जा रहा हूँ वह तुम्हारी मानव बिरादरी के खिलाफ ही है. तुम मुझे भले आदमी लगे इसलिए तुमसे कहने की हिम्मत जुटा पाया हूँ"
मैने कहा
“खुलकर कहो, तुम्हे डरने की कोई जरूरत नहीं है"
 सियार ने कहा
“तुम्हें भी मालुम होगा कि हम सियार लोग तुम इंसानों की बस्ती के आस-पास भी रहना पसंद करते हैं और तुम्हें मालूम हो न हो मगर हमने तुम लोगों को कभी भी नुकसान नहीं पहुंचाया है, हाँ फायदा जरूर पहुंचाया है. तुम इंसानों की बस्ती के आस-पास जो भी गन्दगी रहती है उसे साफ़ करने में कुछ हद तक हम तुम्हारी मदद ही करते हैं फिर भी तुम आदमी लोग हमें कोई फायदा तो पहुंचा नहीं सकते उलटे हमारा ही सफाया करने पर तुले हुए हो. सियार कि बात सुनकर मैनें कहा कि तुम ऐसा कैसे कह सकते हो कि हम तुम्हारा सफाया करने में लगे हुए हैं? बताओ! क्या तुम्हें कोई आदमी मरना चाहता है या अभी तक किसी को मारा है? सियार ने कहा, नहीं ऐसी बात नहीं है, प्रत्यक्षतः तो ऐसा कुछ भी नहीं है पर अप्रत्यक्ष रूप से तुम आदमी लोग हम वन्य जीवों का बहुत नुकसान कर रहे हो. सबसे पहले तो तुम हमारे निवास स्थान जंगलों को ही काट-काट कर ख़त्म कर रहे हो जिससे हमारे रहने के लिए कोई सुरक्षित स्थान ही नहीं बच रहा है जहाँ पर हम स्वतंत्र रूप से विचर सकें. इसके बाद दूसरी सबसे बड़ी गलती तुम लोगों ने की है वह ए है कि सारे वातावरण में तुमने जहर घोल दिया है. जिन फैक्ट्रियों, कारखानों को तुम विकास का नाम दे रहे हो वाही हमारे विनाश का कारण बन रहे हैं. तुमने खेतों में उर्वरक और कीटनाशक रुपी जहर फैला दिया है जिसके दुष्प्रभाव से हम लोगों का जीवन बहुत कठिन होता जा रहा है और हमारी सियार जाति सहित कई और वन्य प्राणियों के विलुप्त हो जाने का खतरा पैदा हो गया है. यही सब बातें कहने के लिए मैं काफी दिनों से बेचैन था मगर कोई भला आदमी ना मिलने कि वजह से किसी से कुछ न कह सका. तुमको देखकर पता नहीं ऐसा क्यों लगा कि तुमसे ये सब बातें कही जा सकती हैं.  इसलिए हे भले आदमी, हमारी विनती सुनो और हमें ख़त्म होने से बचने में हमारी मदद करो इतना कहते-कहते ही सियार अचानक रूक गया और बोला “आदमी भाई कोई और आदमी तुम्हारे पीछे तरफ से आ रहा है इसलिए मैं चलता हूँ मगर हमारी समस्यायों पर ध्यान जरूर देना" यह कहकर सियार जंगल की तरफ निकल गया और मैं उसकी कही बातों के बारे में सोचता हुआ अपनी जगह पर ही खडा रह गया.
कृष्ण धर शर्मा

रेलवे स्टेशन


नारायण जी शासकीय स्कूल से हेडमास्टर की नौकरी से रिटायर होकर इसी छोटे से कस्बे राजनगर में बस गए थे क्योंकि उनके गाँव में पुश्तैनी संपत्ति के नाम पर मात्र एक कच्चा घर था जिसमें उनके दो भाई अपने बड़े परिवार के साथ रहते थे. उस मकान में अब और लोगों के रहने की वैसे भी गुंजाइश नहीं थी.
नारायण जी के पिताजी उत्तरप्रदेश के एक गाँव से बेहद ही गरीब परिवार से थे और भीख मांगकर गुजारा करते थे. बाद में उडीसा के किसी गाँव में उन्हें पुरोहित का काम मिल गया और गाँव वालों ने रहने के लिए एक कच्चा मकान भी दे दिया. पुरोहिती के काम से इन लोगों का गुजारा चल जाता था. नारायणजी तीन भाई और एक बहन थे जिनमे नारायणजी सबसे छोटे थे.
समय बीतता रहा. उस ज़माने में पढाई-लिखाई को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था और आर्थिक स्थित भी कुछ हद तक इसके लिए जिम्मेवार मानी जाती थी इसलिए नारायण जी के भाई-बहनों ने शासकीय स्कूल में चौथी-पांचवी तक पढ़ कर छोड़ दिया मगर नारायण जी की पढाई में विशेष रूचि को देखकर गाँव के ही एक धनाढ्य एवं सज्जन व्यक्ति ने उन्हें आगे पढ़ने में सहयोग किया और इस तरह से नारायणजी की पढाई जारी रही और उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अच्छे अंको से उत्तीर्ण कर ली. अब तक उनके बड़े भाइयों और बहन का भी शादी-ब्याह हो चुका था और उनके लिए भी रिश्ते आने शुरू हो गए थे मगर नारायणजी का कहना था कि अपने पैरों पर खड़े होने के बाद ही विवाह करना उचित होगा. उस समय मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करना ही बड़ी बात थी अतः उन्हें बड़े आराम से शासकीय शिक्षक की नौकरी मिल गई मगर उन्हें अध्यापन हेतु राजनगर जाना पडा जो वहां से सैकडों मील दूर था. नौकरी तो करनी ही थी इसलिए नारायणजी को वहीँ पर किराये का घर लेकर रहना पड़ा. विवाह न करने के लिए भी अब उनके पास कोई बहाना न था इसलिए जल्दी ही उनका विवाह कर दिया गया. नारायणजी अपने परिवार से मिलने कभी-कभार छुट्टियों में ही जा पाते थे क्योंकि उन दिनों आने-जाने के साधन भी बहुत कम हुआ करते थे. छोटे परिवार का महत्व नारायणजी को पता था इसलिए उन्होंने हम दो हमारे दो के नारे पर अमल किया. बड़ी बेटी थी और छोटा बेटा था. नारायणजी ने बच्चों की पढाई-लिखाई पर विशेष ध्यान दिया जिसके परिणाम स्वरूप उनकी बेटी आगे चलकर डाक्टर बन गई और एक बहुत ही संपन्न परिवार में उसका ब्याह हो गया. बेटा भी पढाई-लिखाई में ठीक ही था. कद-काठी ठीक-ठाक थी अतः वह भी पुलिस में भर्ती हो गया और ट्रेनिंग के बाद पोस्टिंग भी इसी कस्बे में मिल गई. बेटे का ब्याह भी पास के ही शहर में हो गया. नारायणजी भी प्रोन्नत होकर अब हेडमास्टर बन चुके थे और इसी वर्ष वह भी रिटायर हुए.
नारायणजी ने काफी पहले से राजनगर में ही बसने का मन बना लिया था क्योंकि यह छोटा सा क़स्बा हरियाली से भी भरपूर था और प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित था. राजनगर में रेलवे स्टेशन भी था जहाँ पर कई पैसेंजर गाड़ियाँ रूकती थीं और आगे चलकर बड़ा स्टेशन बनने की पूरी सम्भावना थी. रिटायर्मेंट में मिले रुपयों से उन्होंने एक तीन कमरों का एक बढ़िया मकान बनाया. मकान के लिए जमीन उन्होंने पहले ही ले रखी थी. नारायणजी के यहाँ अब तक एक पोते और एक पोती का जन्म हो चुका था. बहू का स्वाभाव थोड़ा चिडचिडा था मगर नारायणजी और उनकी धर्मपत्नी सज्जन स्वाभाव के होने की वजह से उसे भी झेल जाते थे. समय बीतता रहा. नारायणजी के पोते-पोती अब बड़े हो गए थे और स्कूल भी जाने लगे थे नारायणजी के यहाँ सब ठीक ही चल रहा था कि उनकी धर्मपत्नी का टीबी की बीमारी से अचानक ही देहांत हो गया जिसके बाद नारायणजी एकदम टूट से गए और काफी अकेलापन महसूस करने लगे. टी.वी., कम्यूटर और मोबाईल के ज़माने में बूढों के पास बैठने का समय आजकल किसके पास है. उन्हें तब और झटका लगा जब बेटे के स्वभाव में भी कुछ परिवर्तन आना शुरू हुआ जिसे नारायणजी ने यह सोचकर टाल दिया कि नौकरी की वजह से थकावट हो जाती होगी इसलिए थोडा चिडचिडा हो गया है मगर जब बच्चों का भी उनके कमरे में आना-जाना बंद हो गया तब उन्हें लगा कि यह सब जानबूझकर किया जा रहा है! हो सकता है पत्नी की मृत्यु टीबी की बीमारी की वजह से हुई है शायद इसलिए उन्हें छुआछूत का डर लगता हो!.

नारायणजी समय बिताने के लिए सुबह-शाम टहलने जाने लगे. सुबह तो पास के बागीचे में चले जाते थे जहाँ पर लोगों की चहल-पहल देखकर ही समय कट जाता था और शाम के समय रेलवे स्टेशन जाने लगे जहाँ पर आठ-दस बूढ़े लोग एकत्रित होकर अपना सुख-दुःख साझा करते थे. बूढों की इस गोष्ठी में ग्राम पंचायत से लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा तक और नुक्कड़ नाटक से लेकर हालीवुड फिल्मों तक की समीक्षा होती थी कई छोटी-बड़ी असहमतियों के बावजूद डेढ़-दो घंटे की गोष्ठी आख़िरकार आपसी संधि पर आकर ख़त्म होती थी और अगले दिन मिलने के वादे के साथ गोष्ठी का समापन होता था.

एक दिन दोपहर के बाद नारायण जी काफी उदास और अकेलापन महसूस कर रहे थे तो उन्होंने सोचा क्यों न बच्चों के कमरे में चलकर बच्चों से कुछ बातें की जाएँ. वह बच्चों के कमरे में पहुंचे तो किताबें फैलाकर पढने का बहाना किये बच्चे मोबाईल पर गेम खेल रहे थे. दादाजी के अनपेक्षित आगमन पर बच्चे अचानक हडबड़ा गए और मोबाईल छुपाने लगे तो नारायण जी हँसते हुए कहने लगे
“तुम लोग पढने के बजाय मोबाईल पर गेम खेलते हो! मैनें तो देख लिया है अब छुपाने से भला क्या फायदा!”.
बच्चे एकदम से घबरा गए तभी बहू भी कमरे में आ गई और पूछने लगी
“क्या हो रहा है यहाँ पर?”.
नारायण जी कुछ कह पाते उसके पहले ही बच्चे बोल पड़े
“हम लोग तो चुपचाप पढाई कर रहे थे दादाजी ही आकर हमें डिस्टर्ब कर रहे हैं.”
नारायणजी कुछ सफाई दे पाते इसके पहले ही बहु शुरू हो गई “आपसे अपने कमरे में नहीं रहा जाता क्या? बच्चों को क्यों परेशान कर रहे हैं.”
नारायणजी का संयोग इतना ख़राब था की उसी समय उनका बेटा भी ड्यूटी से घर आ गया था और शोर-शराबा सुनकर वह भी पत्नी की बातों में आकर नारायणजी को भला-बुरा कहने लगा.
नारायणजी को इतना सब सुनने के बाद कुछ भी न सूझा तो वह अपने कमरे में आकर निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़े. क्या-क्या सपने नहीं देखे थे उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर. हमारे दो ही तो बच्चे हैं, बेटी तो शादी के बाद अपने घर चली जाएगी और हमारा बेटा इतना संस्कारी है की लोगबाग भी इसकी तारीफ़ करते नहीं थकते, कहते हैं कि नारायणजी आपने अपने बच्चों को इतनी अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए हैं. आपका बुढ़ापा तो अच्छे से कटेगा. बच्चों की तारीफ सुनकर नारायणजी गदगद हो जाते और एक सुन्दर और सुखद भविष्य (बुढ़ापे) की तस्वीर उनकी आँखों के सामने आकार लेने लगती. आज नारायणजी की आँखों में आंसू थे और मन बहुत भारी हो चुका था. उन्होंने घडी की तरफ देखा मगर अभी शाम होने में काफी समय था फिर भी उन्होंने अपने आंसू पोछे और छड़ी उठाकर रेलवे स्टेशन की तरफ चल पड़े.
 कृष्ण धर शर्मा

गंदे बालों वाली लड़की

महीनों तक सुबह की सैर के दौरान नियमित रूप से रोज अपने समय पर दिख जाने वाली उस गंदे और मैले-कुचैले कपडे पहने हाथ में प्लास्टिक की बोरी लिये कचरा बीनती हुई लड़की से आज बात करने की हिम्मत आखिरकार जुटाकर उसके पास पहुंचकर रुका ही था की अचानक मुझे अपने सामने पा कर वह गंदे बालों वाली लड़की घबरा सी गई और इधर-उधर देखने लगी. उसकी घबराहट देखकर थोड़ी देर के लिए तो मैं भी घबरा गया मगर फिर थोडा संयत होकर मैंने उसे आश्वासन देते हुए कहा “घबराओ मत, अगर तुम्हें परेशानी न हो तो मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ!” मेरी बात सुनकर उसने जैसे पीछा छुड़ाने की नीयत से कहा “मुझे कुछ भी नहीं मालुम साहब” और मुड़कर जाने को हुई तब मैंने उसे फिर टोका “मुझे गलत मत समझो मैं एक शरीफ इंसान हूँ”. “तुम्हें महीनों से देख रहा हूँ और तुम्हारे बारे में मेरे मन में कई सवाल आ रहे हैं जिनका जवाब सिर्फ तुम्ही दे सकती हो, अगर तुम्हें कोई विशेष परेशानी न हो तो!”.
मेरी बात सुनकर वह ज़रा ठिठकी और बोली “मुझे देखकर तो लोग नाक-भौं सिकोड़कर निकल जाते हैं और आप कह रहे हैं कि मुझे देखकर आप के मन में कुछ सवाल आते हैं! मैं भी जानना चाहूंगी कि  मुझे देखकर आपके मन में क्या सवाल आते हैं?” उसकी ऐसी सपाट बातें सुनकर मैं सकपका गया फिर थोडा सम्हलकर बोला “मेरा कोई भी ऐसा मतलब नहीं था जो कि तुम्हें गलत लगे, मैं तो बस इतना जानना चाह रहा था कि तुम्हें तो और भी कई काम मिल सकते हैं फिर तुम यह कचरा बीनने का काम ही क्यों कर रही हो? क्या तुम्हारा मन नहीं होता कि तुम भी अच्छे कपडे पहनो, साफ-सफाई से रहो!”.
“ख़ुशी से कौन करता है यह सब साहब?”
“तब फिर क्यों करती हो यह सब!”.
“मजबूरी में करना पड़ता है”.
इस काम को करने की भी मजबूरी हो सकती है क्या!”.
“आप ठीक कहते हैं साहब, काम तो मुझे बहुत मिल जायेगा मगर इस काम में मैं अपने को सुरक्षित महसूस करती हूँ”.
“क्या बात कर रही हो! तुम अपने को इतना असुरक्षित क्यों महसूस करती हो? और कौन-कौन हैं तुम्हारे परिवार में?”.
“मैं और मेरी माँ बस इतना ही है मेरा परिवार”.
“तुम्हारे पिता!”.
“लगता है आप मेरी पूरी कहानी सुनना चाहते हैं!”.
मैंने थोडा असहज होते हुए कहा “ऐसी बात नहीं है फिर भी तुम अपनी कहानी मुझे बता सको और मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूँ तो मुझे अच्छा लगेगा”.
“मेरी मदद आप क्या कर पाएंगे! फिर भी मैं सुनाती हूँ आपको अपनी कहानी”.
एक गहरी सांस लेकर उदासी भरे शब्दों में उसने कहना शुरू किया “हम लोग उड़ीसा के रहने वाले हैं. मेरे पिता पहले तो मजदूरी करते थे फिर बाद में ठेकेदारी करने लगे. मेरी बड़ी बहन और मैं हम दोनों ही माँ –बाप के दुलारे थे. हमारे पिता भी हमें बेटों से कम नहीं समझते थे और हमें इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाते थे. हम लोगों का अपना घर नहीं था हम किराये से रहते थे. पिताजी इतना कमा लेते थे जिससे हमारा गुजारा आसानी से हो जाता था. मेरी बड़ी बहन १०वी और मैं १२वी में पढ़ रहे थे, सब ठीक-ठाक  चल रहा था कि अचानक एक दिन घर में खबर आई की पिताजी की हत्या हो गई है. हमारे ऊपर तो जैसे दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा यह खबर सुनकर. इस स्थिति की तो कल्पना तक नहीं की थी किसी ने भी. पुलिस की खोजबीन में पता चला कि किसी अन्य ठेकेदार से पिताजी का मामूली विवाद था जिसके कारण उस ठेकेदार ने पिताजी की हत्या करवा दी. वह ठेकेदार पकड़ा भी गया मगर पुलिस की लापरवाही और सबूतों के अभाव में उसे छोड़ भी दिया गया. उस ठेकेदार की बुरी नजर मेरी बड़ी बहन पर पड़ चुकी थी और जेल से छूट जाने के कारण उसका हौसला भी काफी बढ़ चुका था अब वह हमारे घर पर आकर हमें परेशान करने लगा. हमारा घर के बाहर निकलना मुश्किल हो गया था. एक दिन दीदी ने हिम्मत की और थाने पहुँच गई ठेकेदार के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने. रिपोर्ट तो क्या लिखते पुलिसवाले उलटे उन्होंने ठेकेदार को ही थाने बुलवा लिया और फिर ठेकेदार और कुछ पुलिसवालों ने दीदी के साथ बलात्कार किया और बेहोशी की हालत में सड़क के किनारे फेक कर चले गए. होश आने पर दीदी किसी तरह रोती-बिलखती हुई रात में घर पहुंची. अगले दिन सुबह जब हम मोहल्ले के नेता को लेकर फिर थाने पहुंचे तो हमें धमकाया गया कि हम किसी के सामने अपनी जबान न खोलें वरना अंजाम ठीक नहीं होगा चुप रहने में ही तुम लोगों की भलाई है. मगर दीदी चुप रहने वालों में से नहीं थी वह थाने के सामने ही धरने पर बैठ गई. शाम होते-होते दीदी को पुलिसवालों से मारपीट और दुर्व्यवहार करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और हवालात में डाल दिया गया. अगले दिन कोर्ट से जमानत का आदेश लेकर हम थाने पहुंचे तब तक काफी देर हो चुकी थी, इतनी बेइज्जती और जुल्म दीदी बर्दाश्त नहीं कर पाई थी और दुपट्टे से अपना गला घोट कर उसने अपनी जान दे दी थी. इस पूरी घटना के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई सिर्फ दो पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया गया और पूरा मामला दबा दिया गया.

अब ठेकेदार और पुलिसवाले हमारे घर आकर हमें परेशान करने लगे कि तुम लोग भी अपना मुह बंद रखना नहीं तो तुम्हारा भी यही अंजाम होगा. अपने पति और एक बेटी को खो चुकी मेरी माँ ठेकेदार की मुझ पर गन्दी नजर को पहचान गई थीं और उन्होंने एक बेहद ही कठोर फैसला लिया कि अब हम इस शहर को छोड़ देंगे. मैं अपना शहर छोड़ना नहीं चाहती थी मगर माँ की चिंता भी सही थी इसलिए हमें अपने शहर को छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा. घर से कुछ सामान समेटकर रात में हमने बिना किसी को बताये घर छोड़ दिया और रेलवे स्टेशन पहुंचे जहाँ रायपुर जाने वाली ट्रेन खड़ी थी हम उसमें बैठ गए और अगले दिन रायपुर पहुँच गए. स्टेशन से बाहर निकलकर तो हमें कुछ सूझ ही नहीं रहा था की हम कहाँ जाएँ और क्या करें, इस शहर में हमारा अपना कोई भी नहीं था जो कि हमें शरण दे सके या हमारी कोई मदद कर सके. पूरा दिन इसी उधेड़बुन में गुजर गया और रात हो गई. मजबूरन रात हमें स्टेशन के बाहर ही गुजारनी पड़ी मगर यहाँ पर भी कई जोड़ी हैवानी नजरें हमें रात भर घूरती रहीं. हम काफी निराश हो चुके थे कि स्टेशन में भीख मांगनेवाली एक बूढी माँ ने हमारी तकलीफ देखी और हमें सहारा दिया.वह हमें अपनी झोपडी में लेकर गई, हमें खाना खिलाया, आराम करने को कहा, हमारी दुखभरी कहानी  सुनी और हमें सांत्वना देते हुए कहा कि “तुम लोग घबराओ मत, मैं यहाँ अकेले ही रहती हूँ अब तुम लोग यहीं पर रहो.

हम तो ऐसा महसूस कर रहे थे जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो. अगले दिन मेरी माँ ने बूढ़ी माँ से कहा कि “मुझे भी कुछ काम करना चाहिए आखिर कब तक खाली बैठी रहूंगी!”. बूढी माँ ने कहा कि मैं तो रेलवे स्टेशन में भीख मांगकर अपना गुजारा करती हूँ तुमको भी यही करना हो तो मेरे साथ चल सकती हो या फिर ये काम पसंद न हो किसी के यहाँ झाड़ू-पोछा और बर्तन मांजने का काम भी मिल सकता है. “नहीं मेरी माँ यह सब नहीं करेगी” मैंने बीच में टोकते हुए कहा. “मैं इंग्लिश स्कूल में  दसवीं तक पढ़ी हूँ, मैं ट्यूशन पढ़ा कर गुजारा कर लूंगी”.  बूढी माँ थोड़ी सी दर्द भरी मुस्कराहट के साथ बोली “मेरे कहने का मतलब ये नहीं था बेटी कि तुम्हारी माँ भीख मांगे या किसी दुसरे के यहाँ झाड़ू-पोछा का काम करे. मैंने तो वही कहा जितनी मेरी सोच थी. तुम तो बहुत पढ़ी-लिखी हो बेटी जो करोगी ठीक ही करोगी” कहकर बूढी माँ चुप हो गई. मैं समझ गई थी कि बूढी माँ को मेरी बात का बुरा लगा था इसलिए मैंने बात को सम्हालते हुए कहा “नहीं माँ मेरा मतलब कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे आपको दुःख पहुंचे, मैं तो बस ये कहना चाह रही थी मेरी माँ की हालत अभी इतनी अच्छी नहीं है कि  वह कोई मेहनत का काम कर सकें, वैसे आपने अपने परिवार के बारे में कुछ नहीं बताया माँ?” मैंने बूढी माँ को थोडा कुरेदते हुए कहा. बूढी माँ ने कहा “मेरे पति तो १० साल पहले ही मुझे छोड़कर चले गए थे और दो बेटों में मुझे अपने पास रखने को लेकर आये दिन झगडा होता रहता था और मुझे भी दोनों बेटे और बहु ताने मरते थे की पिताजी के साथ ही तुम क्यों नहीं मर गई. इन बातों से मुझे काफी दुःख होता था. एक दिन मैंने फैसला किया कि मेरी वजह से मेरे बेटों के परिवार में अशांति रहे इससे अच्छा है कि मैं मर ही जाऊं. मैं घर से अपनी जान देने के लिए ही निकली थी, कई दिन तक भटकती रही मगर मरने की हिम्मत न जुटा पाई और भटकते-भटकते रेलवे स्टेशन पहुँच गई और इसी बस्ती की एक बुढ़िया के साथ भीख मांगने लगी. उस बुढ़िया ने यहीं पर मेरी भी झोपडी बनवा दी और फिर मैं यहीं की होकर रह गई.“आपके बेटों ने आपको ढूँढने की कोशिश नहीं की?”. “उनको क्या गरज पड़ी थी बेटी! वह तो मुझसे छुटकारा ही पाना चाहते थे.”
फिर मेरे कहने पर बूढी माँ मुझे कई बड़े घरों में लेकर गई मगर ट्यूशन पढ़ाने के लिए किसी को जरूरत न थी आजकल सब के बच्चे कोचिंग क्लास जाने लगे हैं. घरेलु कामकाज के लिए नौकरानी के रूप में रखने को कई लोग तैयार थे. कोई चारा न देख मैनें घरेलु नौकरानी का काम करना स्वीकार कर लिया. वहां पर मुझे झाड़ू-पोछा, बर्तन मांजना, साफ़-सफाई और कपडे धोने, प्रेस करने का काम करना पड़ता था. मुझे काम करते हुए १ महीने ही हुए थे कि एक दिन मैं काम पर पहुंची तो पता चला कि मालकिन घर में नहीं हैं वह एक दिन के लिए बाहर गई थी. मैं लौटने ही वाली थी कि मालिक ने कहा “कोई बात नहीं है तुम झाड़ू-पोछा कर दो और बर्तन धुल दो बाकी काम कल आकर कर लेना जब मालकिन आ जाएगी. अभी तक ऐसी कोई हरकत मालिक या मालकिन ने नहीं की थी जिससे मुझे किसी भी तरह की शंका हो इसलिए मैं भी संकोचवश मना न कर सकी और काम करने लगी. काम होने के बाद मालिक ने कहा “कल आफिस जाने के लिए मेरे पास प्रेस किये हुए कपडे नहीं है १ जोड़ी कपडे प्रेस कर दोगी क्या!” मैनें कपडे प्रेस कर दिए और जाने के लिए निकली तब तक वह किचन से चाय बनाकर लाया था और मेरे सामने खडा हो गया. उसने कहा तुम काम करके बहुत थक गई होगी थोड़ी सी चाय पी लो” मुझे मालिक की आँखों में कुछ अजीब सा दिखा और मैं घबरा कर बहार की तरफ जाने लगी तो उसने मेरा रास्ता रोक लिया अब मैं बुरी तरह से घबरा गई और चिल्लाने लगी. मुझे चिल्लाते देख मालिक के होश उड़ गए, चाय का कप फेंक कर उसने जल्दी से मेरा मुह दबाया और बोला “चिल्लाना बंद करो पागल लड़की. तुमको जाना है तो जाओ कहकर उसने दरवाजा खोल दिया और मैं वहां से भागती हुई आकर सीधे माँ की गोद में गिर पड़ी. माँ भी एकदम से घबरा गई और रोते हुए पूछने लगी “क्या हुआ बेटी? तेरे साथ क्या हो गया?”. माँ को रोते हुए देख मैंने अपने आपको सम्हाला और पूरी बात बताई कि भगवान की कृपा से मेरे साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ. मगर आगे भी कुछ गलत नहीं होगा इस बात की तसल्ली न माँ को थी न ही मुझे. रात में बूढी माँ के आने पर मैंने उन्हें जब पूरी बात बताई और मालिक के खिलाफ रिपोर्ट करने की बात कही तो बूढी माँ ने समझाते हुए कहा “किस-किस के खिलाफ रिपोर्ट करेगी बेटी! और तेरी रिपोर्ट लिखने वाले भी तो वैसे ही इंसान हैं न!.” अब मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ! फिर बूढी माँ ने कहा अगर तू बुरा ना माने तो एक काम है जिसे तू कर सकती है!”. “आप बताओ क्या काम है”. बूढी माँ ने कहा “बेटी हमारे मोहल्ले की कुछ लड़कियां कचरा बीनने जाती हैं, दिखने में जरूर थोडा गन्दा लगता है मगर बेटी आमदनी भी अच्छी हो जाती उसमें. और अपना हुलिया थोडा बिगाड़ ले, घर के बाहर गंदे और मैले-कुचैले कपडे पहना कर और वैसी ही दिखा कर, इससे लोगों की गन्दी निगाहों से भी बची रहेगी.”

पहले तो मैनें बूढी माँ को साफ़ मना कर दिया ये काम करने के लिए मगर १-२ दिन में मुझे समझ में आ गया कि घर खर्च के लिए रुपया कमाने के साथ-साथ अपनी इज्जत बचाना भी जरूरी है, माँ को मैं भीख मांगते या किसी के घर बर्तन मांजते नहीं देखना चाहती थी इसलिए मैंने कचरा बीनने का काम करना शुरू कर दिया. शुरू में तो मुझे अजीब लगता था मगर अब कुछ भी बुरा नहीं लगता. गन्दी नाली और बदबूदार कचरे के ढेर से अपने काम की चीज उठाने में कोई संकोच नहीं लगता और सबसे अच्छी बात यह है कि मेरे मैले-कुचैले कपडे और मेरी जानबूझकर गन्दी बनाई हुई शक्ल देखकर अब लोगों की आंखों में अजीब से भाव नहीं दिखते बल्कि मुझे देखकर लोग नाक-भौं सिकोड़ते जल्दी से आगे निकल जाते हैं.
“मैं अब चलती हूँ साहब मेरी माँ मेरा इन्तजार कर रही होगी.” उसकी आवाज सुनकर जैसे मैं नींद से जागा, अभी तक मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई फिल्म चल रही हो मेरे सामने. मैं भी उसे रोक न  पाया और उस गंदे बालों वाली लड़की को आँखों से ओझल होने तक देखता खडा रह गया. कृष्ण धर शर्मा 2014

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

ड्रग मार्केट में प्रतिस्पर्धा बढ़ाइए

यूपीए सरकार द्वारा लगभग 400 दवाओं के दाम तय कर दिये गये थे। वर्तमान एनडीए सरकार 450 और दवाओं के दाम निर्धारित कर दिये हैं। 350 और दवाओं के दाम निर्धारित करने की प्रक्रिया चल रही है। सरकार का यह कदम सही दिशा में है।
 

दवाओं के बाजार के दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा जेनेरिक दवाओं का है। अकसर दवाओं में एक केमिकल होता है।
दवा को इस केमिकल के नाम से बेचा जा सकता है।  लेकिन कई कम्पनियां उस दवा को विशेष नाम से बेचती हैं। जैसे बुखार उतरने की दवा का मूल नाम पैरासिटामोल है। यह बाजार में पैरासिटामोल के नाम से भी उपलब्ध है। लेकिन दूसरी कम्पनियां इसी दवा को क्रोसिन अथवा सैरीडान के नाम से बेचती हैं।
जब किसी दवा को विशेष कंपनी द्वारा दिये गये नाम से बेचा जाता है तो उसे ‘‘ब्रैंडेड’’ कहा जाता है। इन दवाओं को बनाने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है। किसी भी कम्पनी द्वारा इसे बनाया और बेचा जा सकता है।
दवा कम्पनियां अकसर इन दवाओं को अत्यधिक उंचे दाम पर बेचती हैं। इनके द्वारा एडवरटाइजमेंट किये जाते हैं। सेल्स रिप्रेजेन्टेटिव की बड़ी फौज तैनात की जाती है। डाक्टरों को गिफ्ट एवं कमीशन दिये जाते हैं। जैसे किसी दवा को एक कम्पनी 10 रु. में बेच रही है। उसी दवा को दूसरी कम्पनी अपना ब्राण्ड लगाकर 50 रु. में बेचती है। इस 50 रु. में से वह 10 रु. का कमीशन डाक्टरों को दे देती है। डक्टर मरीजों को 50 रु. की महंगी दवा लिख देते हैं। मरीजों को इस बात का भान ही नहीं होता कि यही दवा कम दाम में उपलब्ध है।
इन दवा के दाम पर नियंत्रण करने का अधिकार सरकार के पास ड्रग प्राइस कंट्रोल आर्डर के अंतर्गत है। सरकार की मंशा है कि अधिक मात्रा में दवाओं को मरीजों को उचित दाम पर उपलब्ध कराया जाये। लेकिन प्रशासनिक स्तर पर मूल्य निर्धारण में कई समस्याएं हैं। पहली समस्या भ्रष्टाचार की है। ड्रग इन्सपेक्टर को घूस खाने के अवसर खुल जाते हैं। दूसरी समस्या है कि मूल्य को लेकर विवाद बना रहता है।

ड्रग कम्पनियों की शिकायत रहती है कि मूल्य नीचे निर्धारित किये गये हैं जबकि जनता की शिकायत रहती है कि ये ऊंचे हैं। तीसरी बड़ी समस्या यह है कि लगभग 900 दवाओं को बनाने वाली सैकड़ों कम्पनियों पर निगरानी रख पाना दुष्कर कार्य है। चौथी समस्या है कि दवा की गुणवत्ता की जांच करना कठिन होता है। सरकार द्वारा दाम कम निर्धारित करने पर कम्पनी द्वारा दवा की गुणवत्ता को गिराया जा सकता है। इसलिये मूल्य निर्धारण को जरूरी परन्तु अल्प कालिक उपाय मानना चाहिये। दवाओं के मूल्य न्यून बने रहें इसके लिये दूसरे कदम भी सरकार को उठाने चाहिये।
पहला कदम है कि सामान्य दवाओं पर ब्राण्ड लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाये। साथ-साथ डाक्टरों पर प्रतिबन्ध लगाया जाये कि वे जेनेरिक दवाओं के पर्चे लिखें व निर्माता कम्पनी का नाम पर्चे पर न लिखें। जैसे डाक्टर को बुखार कम करने के लिये पैरासिटामाल दवा लिखनी है। मरीज के प्रिस्कृप्शन पर पैरासिटामोल ही लिख दिया जाये न कि क्रोसिन अथवा सैरीडान। किसी कम्पनी का नाम भी न लिखा जाये। ऐसा करने से मरीज पर अपने विवेक से दुकान से किसी भी कम्पनी द्वारा निर्मित पैरासिटामाल दवा खरीदी जा सकती है। ड्रग कम्पनियों एवं डाक्टरों के अपवित्र गठबन्धन द्वारा मरीज को अनायास महंगी दवा खरीदने की मजबूरी नहीं रहेगी।
साथ-साथ सरकार को दवाओं का परीक्षण कराना चाहिये। तमाम अध्ययन बताते हैं कि अकसर गोलियों में बताई गई मात्रा से कम दवा होती है। सरकार को चाहिये कि तमाम कम्पनियों द्वारा बनाई गयी दवाओं का परीक्षण कराये। फिर परीक्षण के परिणामों को सरकारी बेबसाइट पर डाले। दुकानदारों को निर्देश दिया जाये कि परीक्षण रिपोर्ट को दुकान में टांगे। तब खरीदार देख सकेगा कि किस कम्पनी बनाई गयी दवा कितनी कारगर है और उसका क्या दाम है। वह अपने विवेक के अनुसार दवा खरीद सकेगा। इन कदमों का प्रभाव दीर्घ कालिक होगा। भ्रष्टाचार के अवसर भी नहीं खुलेंगे।
दवाओं का दूसरा हिस्सा पेटेंटीकृत दवाओं का है। ड्रग कम्पनियों द्वारा नई दवाओं का आविष्कार किया जाता है। इन दवाओं पर कम्पनी द्वारा पेटेंट हासिल किया जाता है। पेटेंट कानून के तहत इन दवाओं को बनाने एवं बेचने का एकाधिकार पेटेंट धारक कम्पनी के पास रहता है। पेटेंट  धारक कम्पनी द्वारा 20 वर्षों तक दवाओं को मनचाही कीमतों पर बेचा जाता है। ड्रग कम्पनियों का तर्क है कि दवा के अविष्कार में उनके द्वारा भारी निवेश किया गया है।

इस निवेश को वसूल करने के लिये उन्हें दवा के ऊंचे दाम रखना अनिवार्य है। यह छूट उन्हें मिलनी ही चाहिये चूंकि ऊंचे मूल्य पर बेचकर कमाये गये लाभान्श से ही वे आगे रिसर्च में निवेश कर सकेंगे और नई दवा का आविष्कार कर सकेंगे। ड्रग कम्पनियों की यह दलील सही भी है। दरअसल नई दवाओं की खोज ने मरीज को अपनी बीमारी के साथ जीने का तरीका दिया है। वे कई दशक तक दवाओं का सेवन करते हुये जी लेते हैं। तात्पर्य यह कि यदि नई दवाओं की खोज न हुयी होती तो यह उपचार सम्भव न हो पाता।
बावजूद इसके, पेटेंटीकृत दवाओं के दाम पर भी कुछ नियंत्रण जरूरी है। कारण कि ड्रग कम्पनियों द्वारा कमाये गये लाभ का एक अंश ही भविष्य की रिसर्च में निवेश किया जाता है। शेष लाभ मालिकों अथवा शेयर धारकों को वितरण किया जाता है। इन दवाओं के उंचे मूल्य से मरीज भी सीधे प्रभावित होते है। यहां प्रश्न संतुलन का है। एक ओर पूर्व में किये गये निवेश की वसूली तथा भविष्य में किया जाने वाला निवेश है। दूसरी ओर मरीज का हित है। दोनों तर्क मजबूत हैं और किसी वैज्ञानिक कसौटी पर दाम तय कर पाना कठिन है।

यह निर्णय राजनैतिक है। सरकार को अपने विवेक से इस संतुलन को स्थापित करना चाहिये। केन्द्र सरकार ने पेटेंटीकृत दवा के दाम निर्धारित करने को एक कमेटी सन् 2007 में बनाई थी। इस कमेटी ने पांच वर्षों के बाद अपनी रपट प्रस्तुत की। इस रपट पर निर्णय लेने के लिये दूसरी कमेटी वर्तमान में विचार कर रही है। सरकार को चाहिये कि इस प्रकार की ढिलाई पर सख्त कदम उठाये और पेटेंटीकृत दवाओं के मूल्य निर्धारण की पालिसी शीघ्र बनाकर देश की जनता को राहत दे।

डॉ. भरत झुनझुनवाला