नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

मुठभेड़

 

इज़ ही ए भैया?

ट्रेन की रफ़्तार तेज़ होती जा रही थी। दरवाज़े से लटके रामदेव के लिए धूल भरी तेज़ हवा में आँख खुली रखना मुश्किल था। कब तक लटका रहेगा बंद दरवाज़े पर? रामदेव ने दरवाज़े पर ज़ोर से थाप मारी। उसके कंधे से लटकता झोला गिरते-गिरते बचा।

 

कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला। वह सँभलता हुआ अंदर घुसा और दरवाज़ा भिड़ाकर डिब्बे के गलियारे में गमछे से मूँगफली के छिलके और सिगरेट के टोंटों को हटाने लगा। दरवाज़ा खोलने वाले फ़ौजी ने घृणा से मुँह बिचकाया ‘भैणचो..मरने चले आते हैं! ये रिज़र्वेशन का डिब्बा है। तेरा रिज़र्वेशन है?’

रामदेव चुप! अठारह साल के साँवले, पतले रामदेव के लिए यह पहली लंबी यात्रा थी। अब तक उसने तिलरथ के अगले स्टेशन बरौनी तक ही रेल यात्रा की थी। रिज़र्वेशन से उसका पाला ही नहीं पड़ा था। पहली दफ़ा वह बिहार तो क्या, अपने जिले से भी बाहर निकला था। अपने भाई विशुनदेव से उसने ज़रूर सुन रखा था कि पंजाब जाने में क्या-क्या परेशानी होती है। दिल्ली होकर पंजाब जाने में सुविधा होती है। और, आसाम मेल दिल्ली जाती है। बरौनी स्टेशन पर डिब्बे में लोग बोरे में सूखी मिर्च की तरह ढूंसे जाते थे। आख़िर ट्रेन खुल गई तो जो डिब्बा सामने आया, उसी में दौड़कर लटक गया था।

 

टिकट है!’ रामदेव ने बमुश्किल कहा।

टिकट होने से क्या होता है? यह रिज़र्वेशन का डिब्बा है, समझे?’

 

अब रामदेव क्या करे, चुप, डरी आँखों से फ़ौजी को देखता रहा। पुरानी बेडौल पैंट और हैंडलूम की बेरंग शर्ट पहनकर रामदेव अपने मोहल्ले में ही आधुनिक होने का स्वांग कर सकता था। इस नई दुनिया में सारी चीज़ें अचंभे से भरी थीं।

कुर्ते और शलवार में लिपटी, सामने के बर्थ पर लेटी औरत ने अँग्रेज़ी उपन्यास को आँखों के सामने से हटाया और उस फ़ौजी से पूछा, ‘सिविल कंपार्टमेंट इज़ लाइक धर्मशाला...इज़ ही ए भैया?’

 

हाँ लगता तो है!’ फ़ौजी भुनभुनाकर रामदेव की ओर मुख़ातिब हो गया, ‘तुमको कहाँ जाना है?’

पंजाब।’

 

रामदेव को लगा कि वह यहाँ बैठा रहा तो इन बड़े लोगों की नज़र में चढ़ा रहेगा। वह उठा और बाथरूम के सामने वाले गलियारे में अँगोछा बिछाकर झोले का तकिया बनाकर लेट गया। ट्रेन में घुसने से लेकर पिछले एक सप्ताह तक के दृश्य उसकी आँखों के सामने घूम गए।

दसवीं का इम्तिहान ख़त्म होते ही माई पंजाब जाने-आने के लिए पैसे का इंतिज़ाम करने लगी थी। गाँव का कोई आदमी मार-काट की वजह से पंजाब जाकर उसके भैया विशुनदेव को ढूँढ़ने को तैयार नहीं था। कई लोगों से मिन्नत करने के बाद, माई रामदेव को ही पंजाब भेजने पर तैयार हो गई। पैसों की समस्या साँप की तरह फ़न काढ़े फुकार रही थी। पुश्तैनी पेशा-अनाज भूनने में क्या रखा है? कनसार में अनाज भुनवाने लोग आते नहीं। मकई की रोटी अशराफ़ लोग खाते नहीं। दाल इतनी महँगी है कि लोग चने की दाल बनवाएँगे कि कनसार में चना भुनवाकर सत्तू बनवाएँगे? उस पर इतनी मेहनत-गाँव के बग़ीचों, बंसवाड़ियों में सूखे पत्ते बटोरकर जमा करो, उन्हें जलाकर अनाज भूनकर पेट की आग ठंडी करो। किसी तरह एक शाम का भोजन जुट पाता। आख़िर माई उपले थापकर, गुल बनाकर बेचने लगी थी। तब किसी तरह भोजन चलने लगा। लेकिन कोई काम आ पड़ता तो क़र्ज़ लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता था। इस बार भी पंडितजी ने ही पैसों की मदद की। भैया की शादी में क़र्ज़ बढ़ा तो मुश्किल हो गई। मूल तो मूल, सूद सुरसा की भाँति बढ़ने लगा। आख़िर भैया को थाली-लोटा, कंबल, वंशी लेकर कमाने पंजाब जाना पड़ा। वहाँ से वह पैसा भेजता तो माई सीधा पंडितजी को जाकर देती। क़र्ज़ चुकने को ही था कि अचानक सब कुछ बंद।

 

पंजाब में ख़ून-ख़राबे की ख़बर मिलती तो माई के साथ-साथ रामदेव का भी दिल डूबता। माई को पड़ोसी ताने मारते। इतना ही दुख था तो ख़ून-ख़राबे में बेटे को कमाने पंजाब काहे भेजा? अगर विशुनदेव पंजाब नहीं जाता तो वे सब बेघर हो जाते। जनार्दन उनके घर की ज़मीन ख़रीदने की ताक में था। पंडितजी का तक़ाज़ा तेज़ हो रहा था। घर ही बचाने-बसाने विशुनदेव को पंजाब जाना पड़ा था। बहू आती तो कहाँ रहती, क्या खाती? नई ज़िंदगी के कोंपल को माई कैसे मसलने देती? भरे मन से माई ने विशुनदेव को पंजाब जाने दिया था। सब ठीक-ठाक होता जा रहा था कि अचानक सब कुछ बंद।

लेटे-लेटे रामदेव ने क़मीज़ की चोर जेब में हाथ डाला। जेब में रेलवे टिकट, भाई के पते वाला पोस्टकार्ड और पैसों को छूकर उसे इत्मीनान हो आया। झोले का तकिया ठीक से जमाकर आँख बंद कर सोने की कोशिश की। ट्रेन की खटर-पटर, गलियारे में फैली बदबू थी ही। डर भी था और इतना था कि नींद में भी पंजाब-सी उथल-पुथल थी। विशुनदेव! ऐ विशुनदेव!

 

भैया पंजाब से पिछली दफ़ा लौटा तो वहाँ के क़िस्से ख़ूब सुनाता था। माई भी रोज़ रात उससे पंजाब के बारे में पूछती थी।

रोटी खाने? भात नई मिलै छौ?’

 

माई, ऊ लोग सब खाना के रोटी कहै छै! इ बड़का गिलास में चाह! ओह चाह हिया कहाँ?’

मर सरधुआ! चाह तो हिमैं बनबे करेई छै!’

 

नइगे माई, ऊ सब बनिहारवाला चाह में अफ़ीम के पानी मिलाए दै छै, वैइसे थकनी हेठ भे जाइछै! अ बनिहार लोग ख़ूब काम कइलक।’

कत्ते देर काम करै छहि?’

 

सात बजे भोर सै छ बजे साँझ तक! बीच में रोटी खाइके छुट्टी-एक घंटा।’

सब ताश खेललकर, हम्में अपनी बँसुरी-बंजइलौं। हमर मलकिनी ठीक छौ। हाँक पारतौ-ए विशुनदेव! ऐ विशुनदेव! मलकिनी कै हमरी बाँसुरी बजेनाई ख़ूब नीक लगैइछै! विद्यापति, चैतावर सुने लेल पागल। पढ़लो छे गे माई बी.ए.पास!’

 

ख़ूब सुखितगर मालिक छौ?’

ख़ूब कि फटफटिया, ट्रैक्टर, जीप महल सन घर। दूगो बेटा। दिल्ली में नौकरी में लागल, टीभी से हो छै!’

 

उ कथी?’

जेना रेडियो में ख़ाली गाने बोलई छै ने, टीभी में गाना के साथ-साथ सिनेमा एहन फोटूओ देखेवई छै!’

 

मालिक मारै-पीटे त नईं न छौ!’

कखनो-कखनो, गाली हरदम भैनचो...भैनचो बकै छ।’

 

की करभी, पैसा कमेनाइ खेल नईं छै। मन त नईं लागै होतौ?’

ग़रीब नईं रहने माई, पंजाब कहियो नईं जैति अइ र इ पैसा...’

 

विशुनदेव का गौना सामने था। ख़र्चा जुटाने उसे दूसरी बार भी पंजाब जाना पड़ा। अपने इलाक़े में न साल भर मज़दूरी का उपाय, और मज़दूरी भी पंजाब से आधी। विशुनदेव पंजाब से थोड़ा भविष्य लाने गया था।

रात में कोई गाड़ी पंजाब नहीं जाती।

 

नियॉन लाइट से जगमगाती नई दिल्ली स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर उतरते ही उसे लगा कि इतने लोगों के समुद्र में वह खो जाएगा। भीड़, धक्कम-मुक्का, अजनबी लोग और इतनी रौशनी! उसने अपने सीने को कसकर दबा लिया ताकि टिकट, पैसा और पते वाला पोस्टकार्ड कोई मार न ले। वह ठिठक गया, पता नहीं गेट किधर है। आख़िर भीड़ में वह घुस गया। ओवर ब्रिज पारकर स्टेशन के बाहर आ गया।

बाहर टैक्सरी, कार और थ्री व्हीलर की क़तारें। रात का समय। सब कुछ स्वप्न-लोक-सा था जैसा उसने हिंदी फ़िल्मों में देखा था। आसाम मेल रास्ते में ही पाँच घंटे लेट हो गई थी। उसे मालूम था कि दिल्ली से ट्रेन या बस से उसे अमृतसर जाना पड़ेगा। वह मुसाफ़िरख़ाने की ओर बढ़ा। पंजाब जाने वाली गाड़ी के बारे में किससे पूछे, सब तो अफ़सर की तरह लग रहे थे। मुसाफ़िरख़ाने के एक कोने में कुछ साधारण मैले-कुचैले कपड़ों में थकी-बुझी आँखों वाले लोग टिन की बदरंग पेटियों के पास बैठे थे। उन्हीं की तरफ़ बढ़ा।

 

ऊ सामने वाली खिड़की पर जाकर पूछो!’

खिड़की पर कई लोग जमे थे। जब लोग हटे तो उसने बाबू से पूछा।

 

बाबू, अमृतसरवाली चली गई?’

हाँ!’

 

अब दूसरी गाड़ी कब जाएगी!’

अब तो भैया, कल जाएगी!’

 

इ तो बड़ा स्टेशन है?’

आजकल रात में कोई गाड़ी पंजाब नहीं जाती।’

 

वह मुड़ा, तो बाबू भी अपने दोस्त से बात करने लगा।

सारे हिंदुस्तान को पता है, रात में कोई ट्रेन पंजाब नहीं जाती फिर भी पूछ रहा था!’ बाबू के दोस्त के स्वर में उपहास था।

 

बिहारी भैया था!’ बाबू फिस्स से हँस पड़ा।

जलंधर, लुधियाने, सारे पंजाब में ये लोग भरे हैं।’

 

अरे बिहार से आने वाली गाड़ी को पंजाब में भैया एक्सप्रेस कहते हैं! उस तरफ़ हर गाड़ी में ये लोग ठूँसे रहेंगे।’

वहाँ इन्हें काम नहीं मिलता?’

 

काम मिलता तो पंजाब थोड़े ही मरने जाते! भूख थोड़े ही रुकती है, इसलिए भैया एक्सप्रेस चलती रहेगी...सरकार की पटरी, सरकार की गाड़ी सब है ही!’

घर पंजाब हो गया है

 

आजकल’ रामदेव के लिए बड़ा शब्द है।

पिछले चार महीने-सोते-जागते पहाड़ की तरह गुज़रे। भैया कैसा होगा? पंजाब में बहा ख़ून का हर क़तरा, वहाँ चली हर गोली माई को लगती। रेडियो विशुनदेव का हाल-चाल थोड़े ही बोलेगा। माई फिर भी पंडित जी के यहाँ रेडियो सुन आती। वह भी चाय की दुकान पर अख़बार पढ़ आता। रजिस्ट्री चिट्ठी लौट आई तो माई रात-भर रोती रही। बेगूसराय जाकर उसी पते पर तार भिजवाया लेकिन कुछ नहीं पता चला। माई मन्नतें माँगती, पंडित जी के पंचाँग से शगुन निकलवाती, रो-धोकर उपले-गुल बेचने फूटलाइज़र टाउनशिप निकल जाती। इतनी मेहनत पर मौसी टोकती तो माई का एक ही जवाब होता, ‘एगो बेटा पंजाब में, इ रमुआ पढ़ लिए जे एकरा पंजाब नईं जाए पड़ैय।’

 

भौजी के यहाँ से अक्सर पूछवाया जाता—कोई ख़बर मिली? माई को लगता—शादी टूट जाएगी। कोई कब तक जवान बेटी को घर बिठाए रखेगा। माई को लगता, बेटे का पता नहीं, पतोहू छूट रही है। कोशिश करती कि किसी तरह बिखरते घर को आँचल में समेटे रहे।

रमुआ से पुतोहू के बियाह के देबैई’, माई से यह सुनते ही रामदेव शर्म से काठ हो गया था। भौजी की साँवली, निर्दोष, बड़ी-बड़ी आँखों वाला चेहरा उसके सामने घूम गया था। अशराफ़ के घर में ऐसा होगा? शादी के बाद भैया पंजाब से लौट आया तो? माई पागल है!

 

लेकिन माई ने हारना नहीं सीखा था। जो कुछ बचा था, उसे छाती से चिपकाए रहना चाहती थी। एक चक्कर डाक बाबू के यहाँ लगा लेती। लोभ में बेटे को पंजाब भेज दिया, अब काहे को रोज़ चिट्ठी के लिए पूछती हो?’ पोस्टमैन उसे झिड़क देता।

माई का सूखा शरीर, पंडित जी का सूद, जनार्दन का मंसूबा, भौजी की उदासी, भाई के जीवन का संशय, रोज़ की किचकिच, माई का रुदन...रामदेव को लगता—घर पंजाब हो गया है। रात-रातभर सो नहीं पाता। पढ़ता-लिखता क्या ख़ाक! बस एक चीज़ क़ाबिज़ थी— पंजाब!

 

ख़ून की तरह जमा शहर।

अमृतसर आते-आते बस में यात्रियों की बातचीत सुनते-सुनते मन में ऐसा डर बैठ गया कि वह बस से भी डरने लगा।

 

बस से उतरते-उतरते फ़ैसला ले लिया—जो भी हो, जैसे-तैसे रात अमृतसर के बस अड्डे पर काट लेगा लेकिन बस से अटारी नहीं जाएगा। साढ़े छह बजे शाम से ही बस अड्डे पर हड़बोंग मची थी। सबको ऐसी जल्दी थी कि जैसे बाढ़ में बाँध टूट गया हो और सब जान बचाने के लिए भाग रहे हों। दुकानें फटाफट बंद हो रही थीं। ठेलेवाले अपनी दुकानें बढ़ा रहे थे। ख़ाली बसों के ड्राइवर-ख़लासी पास के ढाबों में जल्दी-जल्दी खाना खा रहे थे। ढाबे के मालिकों को भी जल्दी थी। इसलिए उनके नौकर भी रेस के घोड़ों की तरह हाँफ़ रहे थे। सबको एक ही डर था...सात बजे कर्फ़्यू लगने वाला था।

रामदेव ने मूँगफली वाले का अक्षरश: अनुसरण किया। अपना सत्तू घोलकर पी गया और उसी के साथ लेट गया। मूँगफली वाला राँची का ईसाई आदिवासी था। तीन साल पहले घर से भागकर यहाँ आया था। चेहरे पर बढ़ी दाढ़ी और सिर पर गमछे के मुरैठा से उसके सरदार होने का भ्रम होता था। हँसता तो चमकीले दाँत मोतियों की तरह जगमगा उठते। निष्पाप आँखें छलछला आतीं। जेम्स ‘अपने देस’ के रामदेव जैसे आदमी से मिलकर ख़ुश हो गया था। दोनों गठरी की तरह कोने में दुबके थे। और भी बहुत गठरियाँ थीं। गुमसुम!

 

कर्फ़्यू लग चुका था।

चादर की ओट में रामदेव ने झाँककर देखा। बाहर सब कुछ थमा था। इंजन की तरह दहाड़ता बस अड्डा लाश की तरह ख़ामोश था। न पंछी, न हवा, न कोई पत्ता हरकत कर रहा था। चीख़ भी निकलती तो डर से बर्फ़ हो जाती। चलती गोली हवा में थम जाती। पृथ्वी का घूमना जैसे बंद हो गया था। साँसें बे-आवाज़ चल रही थीं। मच्छर थे कि ग़लीज़ में बेफ़िक्री से भिनभिना रहे थे।

 

सन्नाटे में ही वर्दीवालों से भरी एक जीप गुज़र गई। रामदेव को लगा कि गर्दन पर से कोई धारदार चाकू गुज़र गया। इधर में ऐसा ही होता है। ‘जेम्स फुसफुसाया, ‘चुप सो जाओ, पेशाब करने भी मत जाना।’ रामदेव सोने की कोशिश करने लगा। दिन-भर की थकान के बावजूद उसे नींद नहीं आ रही थी।

रात के कोई ग्यारह बजे बस अड्डे पर जैसे कहर टूट पड़ा। वर्दी वाले सबों को बूट की ठोकरों से जगा रहे थे। पचास सवाल। कहाँ से आए हो? क्या मतलब है? डर से कोई हकलाया तो लात, घूसे, बंदूक़ के कुंदे से ठुकाई। तीन नौजवान सरदारों को घसीटते हुए ले गए। बिहार का नाम सुनकर वे आगे बढ़ गए थे। रामदेव फिर भी थर-थर काँपता रहा। जेम्स फिर सो गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। लेकिन रामदेव के कानों में उन तीन नौजवानों की चीख़ ज़िद्दी मधुमक्खी की तरह भनभनाती रही। रफ़्ता-रफ़्ता सब चीज़ो की आदत हो जाती है। सो धीरे-धीरे शहर भी ख़ून की तरह जम गया।

 

अग्गे पाकिस्तान है!

स्टेशन पर टिकट लेकर बैठा तो उसे इत्मीनान आया। उसने अपनी जेब से मुड़ा-तुड़ा, बदरंग पोस्टकार्ड निकाला, और पता पढ़ने लगा—विशुनदेव, इंदर सिंह का फ़ार्म, गाँव रानीके, भाया अटारी, जिला अमृतसर (पंजाब)। पढ़कर उसने सामने बैठे बुज़ुर्ग सरदार की ओर बढ़ा दिया ताकि वे रानीके जाने का रास्ता बता दें।

 

सरदार जी ने अफ़सोस में सिर हिलाया और कहने लगे, ‘मैं हिंदी पढ़ना नहीं जानता। सारी उम्र उर्दू पढ़ी है। बस हिंदी समझ लेता हूँ। बता क्या है?’

मुझे रानी के अटारी गाँव जाना है। अनजान आदमी हूँ। बिहार से आया हूँ।’ रामदेव का संकोच सरदार जी की आत्मीयता से घुल गया और उसने पूरा पता पढ़ लिया।

 

संतोख सिंह वाला रानी के? अग्गे अटारी स्टेशन आऊँगा, तू उत्थे उतर जाणा। बाहर टाँगेवाले नूँ पुच्छ लईं। तू तो मुंडा-खुंडा है, पजदा-पजदा दो मील चला जाएगा। अच्छा सुण, अंबरसर दे बाहर बुर्जावालियाँ दी बस जांदी ए, तू सीधा रानीके उतर जाणा सी। गां दे बाहर की संतोख सिंह दी दो मंज़िली कोठी नज़र आउगी। उत्थे पुच्छ लेणा। सामने इंदर सिंह दा फ़ार्म है।’

रामदेव इतना ही समझ पाया कि अटारी स्टेशन से दो मील पर रानीके गाँव है। गाँव के बाहर संतोख सिंह की दो मंज़िली कोठी है। उसके सामने इंदर सिंह का फ़ार्म है।

 

एन्नी दुरो कल्ला किंदा आ गया? बिहार के हो कि यू.पी. के?’

बिहार। रानी के गाँव भाई को खोजने जा रहा हूँ।’

 

तेरी तो मूँछे भी नहीं फूटी हैं? पुत्तर हिम्मत ही इंसान दा नाम है।’

गाड़ी रुकते ही ‘अच्छा’ कहकर बुज़ुर्ग उतर गए। रामदेव उन्हें जाते, खिड़की से देखता रहा। गाड़ी खिसकी तो टिकट-चेकर सामने था।

 

टिकट?’ चेकर ने यांत्रिक लहजे में पूछा।

अटारी कितने स्टेशन है?’ रामदेव टिकट थमाते हुए पूछ बैठा।

 

पहली बाराँ आया तू?’ अगला स्टेशन है। उत्थे उतर जाणा, अग्गे पाकिस्तान है! चेकर टिकट पंच कर आगे बढ़ गया।

रामदेव सन्न! कहाँ आ गया? पाकिस्तान!

 

स्वेरे देखेंगे

क्रीच...क्री...च। गाड़ी रुक गई। उतरकर स्टेशन के गेट की तरफ़ बढ़ा। बाहर निकलते ही ताँगेवाले ने उससे पूछा, ‘पाकिस्तानी गाड़ी है जी? टेम तो उसी का है।’ उसने भी पलटकर पूछ लिया, ‘रानी के गाँव कौन-सी सड़क जाती है?’

 

सीधी सड़क जाती है...आगे भी पुच्छ लेणा।’

सूरज सर पर चढ़ गया था। तेज़ चलने की वजह से वह पसीने-पसीने हो रहा था। पर मंज़िल पर पहुँचने की ख़ुशी ने उसे बेफ़िक्र कर दिया था। सड़क के किनारे गेहूँ के कटे, नंगे खेत थे। उसके गाँव की तरह ही थोड़ा तिरछा, औंधा, साफ़ आसमान था। हवा सोई हुई थी, गर्म बगूले सीधा उड़ते और सूखे पत्तों, धूल को ले उड़ते। सुनसान सड़क पर दूर-दूर तक कोई राही नहीं था। चारों तरफ़ तापमान का राज था। रामदेव का ध्यान भाई विशुनदेव की तरफ़ था। रोज़-रोज़ के कर्फ़्यू में चिट्ठी कैसे पहुँचती। भैया भी चिट्ठी का इंतिज़ार करता होगा। भैया उसे देखते ही लिपट जाएगा। वह भी आँसू नहीं रोक सकेगा। भैया तिल का लड्डू देखते ही खिल जाएगा। लेकिन भैया...उससे पहले खाने-पीने को पूछेगा। भैया घुमा-फिराकर भौजी के बारे में भी पूछेगा। वह भाई से जनार्दन से बदला लेने के लिए ज़रूर कहेगा...

 

उसे सामने सड़क के किनारे दो मंज़िला मकान दिख गया। एक सरदार जी आगे-आगे जा रहे थे। उसने अपनी चाल तेज़ कर दी।

भाई साहब, इंदर सिंह का फ़ार्म किधर है?’ उसने पास पहुँचकर पूछा।

 

किसनू मिलना? तू आया कित्थों?’ सरदार जी ने ख़ुलासा ही पूछ लिया। पर रामदेव की समझ में ठीक से न आ पाया।

बिशुनदेव, बिहारी।’ रामदेव अटपटाकर बोला।

 

बात तो पल्ले पैंदी नई, चल सरपंच सरूप को चल, उत्थे जाके गल करी?’ सरदार जी ने उसे पीछे-पीछे आने का इशारा किया।

परेशान रामदेव उनके पीछे-पीछे बढ़ता गया। कुछ दूर जाकर, पुरानी ईंटों वाले महलनुमा घर के सामने जाकर दोनों रुक गए। रास्ते में सरदार जी ने उसका नाम पूछ लिया, अपना नाम भी बता दिया—किरपाल सिंह। किरपाल सिंह ने आवाज़ दी।

 

सरपंच जी, सरपंच जी, थल्ले आओ! एक परदेशी बंदा आया सी!’ कुर्ता-पजामा पहने एक लंबा-तगड़ा गोरा-चिट्टा आदमी बाहर आया। उसके चेहरे पर हल्की नुकीली काली पूँछे सज रही थीं। किरपाल सिंह को देखकर मुस्कुराया और उसका हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचने लगा।

किरपाल्या, ऐ बंदा कोनी? इनु कित्थों फड़के ले आया?’

 

सरपंच जी, मैं कित्थों ले आऊगा?’ ए बंदा किसी दी खोज विच आया सी। हिंदी बोल्दा सी, तुसी समझ लो! गल-बात कर लो!’

सरपंच सरूप रामदेव की ओर मुड़ा, उसे गहरी नज़रों से देखा।

 

काका, क्या बात है?’

मेरा भाई विशुनदेव इंदर सिंह के फ़ार्म पर काम करता है, बहुत दूर बिहार से आया हूँ। ये चिट्ठी है।’ रामदेव ने कार्ड सरपंच सरूप के हाथ में थमा दिया। सरपंच सरूप ने पोस्टकार्ड उलट-पुलटकर पढ़ा और रामदेव को वापस थमाते हुए बोला, ‘पता तो ठीक है।’

 

किरपाल्या, देख पाई दी खिंच एन्नी दूर ले आई...अरे याद आया सी। एक बिहारी मुडा इंदर दे फ़ार्म ते देख्या सी...चल तुझे इंदर सिंह के पास ले चलता हूँ।’ सरपंच सरूप आगे बढ़ा।

रामदेव उसके पीछे चला। किरपाल सिंह ‘अच्छा’ कहकर अपनी राह चला गया। तेज़ धूप में चलते दोनों पास ही इंदर सिंह के फ़ार्म पर पहुँचे।

 

स-सिरी अकाल जी!’ एक महिला ने शालीनता से कहा।

सरपंच ने सिर हिलाया।

 

स-सिरी अकाल! इंदर सिंह कहाँ गया?’

वो तो कल सवेरे आएँगे जी। अंबरसर में कुछ काम था।’

 

ये मुंडा अपने भाई से मिलने आया है। इसका भाई तेरे फ़ार्म दा काम करता है...क्या नाम बताया?’

विशुनदेव’, रामदेव ने साफ़-साफ़ लहज़े में कहा। उसके चेहरे से उत्सुकता का लावा जैसे फूट पड़ना चाहता था। महिला ने उसे ग़ौर से देखा।

 

विशुनदेव! इस नाम का एक भैया तो था जी, तीन महीने पहले कपूरथले लौट गया। पिछले साल उसे हम अपने मामा जी के पास से लाए थे...इस साल भी बिहार से आया, पर बोलता था—दिल नईं लगता, तीन महीने पहले कपूरथले लौट गया।’

सरपंच सरूप ने रामदेव की ओर देखा। उसे लगा कि अब रामदेव रो देगा।

 

देख मनजीत कौर!’ सरपंच सरूप ने आजिजी से कहा, ‘लड़का बिहार से आया है, परेशान है...इसके पास तेरा ही पता है।’

सरदार जी के आने पर बात कर लेणा जी, ज़्यादा वही बतलाएँगे!’ कहकर मनजीत कौर मुड़ गई।

 

चल मुंड्या! मेरे यहाँ ही रोटी-पानी कर लेना। स्वेरे देखेंगे!’ बाँसुरी क्या बोलती है?

रात धमक आई थी। दालान में किरपाल सिंह और सरपंच सरूप बातें कर रहे थे। घूम-फिरकर बात पंजाब के हालात पर ही चलती। अख़बार, रेडियो के हवाले अफ़वाहों का विश्लेषण चल रहा था।

 

दालान के किनारे वाले तख़्त पर चादर से मुँह ढंके लेटा, रामदेव के सामने विशुनदेव का चेहरा बार-बार कौंध रहा था। उसे रह-रहकर रुलाई आ रही थी। सरदारनी पहले तो अच्छे से बोली पर विशुनदेव का ज़िक्र आते ही साफ़ मुकर गई—सरदार जी से बात कर लेना। अगर विशुनदेव तीन महीने पहले कपूरथले चला गया तो वहाँ से चिट्ठी ज़रूर लिखता। जेल में भी होता तो वहीं से लिखता। दो सौ रुपए में वह अपने भाई को कहाँ-कहाँ खोज पाएगा? कहीं भैया...आख़िर रुलाई फूट पड़ी। हिचकियाँ, नाक से बहते पानी और खाँसी ने भेद खोल दिया।

किरपाल सिंह लपका और रामदेव को झकझोरकर पूछने लगा, ‘ए मुंड्या, ए मुंड्या...सरपंच जी देखो!

 

सरपंच सरूप भाँप गया। वह उठकर रामदेव के पास आया और दिलासा देने लगा, देख भाई, कल इंदर सिंह से साफ़-साफ़ तेरे भाई का पता पूछ लेंगे। रुपए-पैसे की ज़रूरत हुई तो दे देंगे! तू कपूरथले जाकर भाई से मिल लेना। क्यों किरपाल सिंह?’

हंजी, मुंडे नू मदद ज़रूर करनी चाहिए। जे ग्रीब लोग हैं...’

 

कब रात गुज़र गई, सोचते-सोचते रामदेव को पता ही नहीं चला।

सरपंच सरूप को देखते ही इंदर सिंह चिल्लाया, ‘आओ महाराज! मनजीत कौर कह रही थी उस बिहारी मुंडे के बारे में। मैं अंबरसर चला गया था। दोनों पुत्तरों पर दिल लगा रहता है। रात जाकर टेलीफ़ोन से बात हुई। जी को चैन आया। स्वेरे वहाँ से चला। बस समझो अभी आ ही रहा हूँ...मैं भी मूरख! चलो अंदर बैठते हैं...कुछ चाय-साय भिजवाना, कह कर इंदर सिंह शुरू हो गया, ‘हंजी, लड़का बड़ा भला था। पिछले साल भी मेरे पास था। इस साल आया तो उखड़ा-उखड़ा रहता था। दिल नहीं लगता था। टिक नहीं पाया। चल दिया। कपूरथले मनजीत के मामा के यहाँ गया होगा। ऐसा ही बोल रहा था। दो महीने हो गए...अब आप कहो तो इस मुंडे को ख़र्चा-पानी दे दूँ।’

 

इंदर सिंह की वाचालता से सरपंच सरूप शक में पड़ गया। कल मनजीत कौर कह रही थी, लड़के को गए तीन महीने हुए। यह कहता है दो महीने हुए। और यह ख़र्चा-पानी क्यों देना चाहता है?

इंदर सिंह, लड़का ज़िंदा है या नहीं?’ सरपंच ने सधी आवाज़ में पूछा।

 

इंदर सिंह के चेहरे पर जैसे स्याही पुत गई। रामदेव का जी धक्क! इंदर सिंह जबरन अपने चेहरे पर कांइयाँ मुस्कुराहट लाता बोला, ‘मरने की बात कहाँ से आ गई?’

...लड़का ज़रूर ज़िंदा होगा जी। कपूरथले होगा या और कहीं चला गया होगा! भैया लोगों का क्या ठिकाना? आज यहाँ काम किया, कल वहाँ...’

 

सरपंच सरूप के पीछे खड़ा रामदेव सिसकियाँ लेने लगा। मनजीत कौर चाय की ट्रे लेकर कमरे में घुसी। रामदेव को रोता देखकर, पल-भर के लिए ठिठक गई। मनजीत कौर ने गहरी नजरों से पति को देखा और उसके होंठ भिंच गए। यंत्रवत ट्रे को सेंटर टेबल पर रख, तेज़ी से मुड़कर अंदर चली गई।

सरपंच को साफ़ लगा कि इंदर सिंह झूठ बोल रहा है। मनजीत कौर भी छिपा रही थी। ऐसे झूठ बोलने की ज़रूरत क्या है? विशुनदेव ज़िंदा नहीं है। सरपंच की आत्मा पर ठक से हथौड़े जैसी चोट लगी, वह ग़ुस्से से तिलमिला उठा।

 

साफ़ बता इंदर सिंह, विशुनदेव ज़िंदा है या नहीं? ज़िंदा है तो उसका पता दे!’

कह तो दिया, वह यहाँ से चला गया। ज़िंदा ही होगा।’

 

इस लड़के पर रहम कर। इतनी दूर से आया है। झूठ बोलने से क्या फ़ायदा?’

ओय सरूपे, तू मुझे झूठा कहेगा?’ इंदर सिंह भड़क उठा, ‘सरपंच से हार गया तब भी अकड़ नहीं गई। तू होता कौन है जो मुझसे पूछने चला आया? मैं तुझे कुछ नहीं बताऊँगा! बड़ा आया है लड़के की तरफ़दारी करने वाला!’

 

सरूप अवाक! रामदेव बुक्का मारकर रो पड़ा। अचानक रामदेव उठा और इंदर सिंह के पाँव पर गिर पड़ा!

मालिक!’ रोता रामदेव चीख़ने लगा, ‘बता दीजिए मालिक, मेरा भैया कहाँ हैं?...बहुत उपकार होगा मालिक! बता दीजिए मालिक...मालिक...’

 

तू पत्थर है...इंदर सिंह!’ सरपंच सरूप घृणा से उफन उठा, लंबा-चौड़ा फ़ार्म, इतना पैसा, पर इंसानियत ज़रा भी नहीं...परदेशी की तू मदद नहीं कर सकता...ख़ैर चल मुंडे!’

सरपंच सरूप उठ खड़ा आगे बढ़कर रामदेव को झकझोरकर उठाया।

 

भाई साहब, रुकना!’

अंदर से मनजीत कौर की तेज़ आवाज़ आई। दरवाज़े से ही मनजीत कौर ने एक झोला सपरंच के पाँव के पास फेंका! उफनती मनजीत कौर पर जैसे दौरा पड़ गया हो!

 

ये विशुनदेव का सामान है...वह दुनिया में नहीं है!’ कहते-कहते मनजीत कौर फूट-फूटकर रोने लगी। हिचकियों के बीच उसने कहा, ‘मुझसे बोलकर गया था कि अंबरसर से घरवालों के लिए कपड़े लेने जा रहा हूँ, देस जाना है। अंबरसर से लौटकर आता तो यहाँ से पैसे लेकर जाता...तीन बजे दिन में गया। बस बिगड़ने से शाम हो गई। छेड़हट्टा के पास रोककर मार-काट हुई...उसी में...’

गूँगे रामदेव की आँखों से आँसू लुढ़क रहे थे। सरपंच सरूप मनजीत कौर की बात सुनकर स्तब्ध था और अपराधी की तरह इंदर सिंह की आँखें फ़र्श में गड़ी हुई थीं।

 

मैं तीन दिनों तक रोती रही...मेरे भी बेटे हैं...ये फँस जाने के डर से बात छिपा रहे थे। कल रात-भर हम दोनों झगड़ते रहे—छिपाना क्या, वह भी किसी का बेटा है, भाई है...कल मैं भी झूठ बोली...हमें माफ़ करो सरपंच जी!’ मनजीत कौर के अंदर बैठी माँ ने उफान मारा। उसने आगे बढ़कर रामदेव को छाती से लगा लिया। अपनी ओढ़नी से उसके आँसू पोंछने लगी।

बीच में पड़े विशुनदेव के झोले से उसकी बाँसुरी झाँक रही थी। सब चुप थे। आँसू की तरह बाँसुरी भी जैसे कुछ बोल रही थी। बाँसुरी क्या बोल रही थी, कोई समझ नहीं पाया...

 

तू यहाँ कब तक भुगतता रहेगा?

देर तक उस दिन नहर के किनारे बैठा रहा। नहर का कलकल पानी, आज़ाद हवा...सब बेकार! सरपंच के घर की तरफ़ चल पड़ा। कल उसे रुपए मिल जाएँगे— दो हज़ार। सरपंच साहब उसे अमृतसर में दिल्ली वाली बस में बिठा देंगे। अमृतसर के लिए आज उनको याद दिला देनी चाहिए। वह सोचता आगे बढ़ा जा रहा था कि फ़ौज की तीन जीपें गुज़रीं। लाउड स्पीकर से पंजाबी में कुछ घोषणा की जा रही थी। थोड़ी दूर और गया कि और तीन जीपें गुज़री। रामदेव घबरा गया। जल्दी-जल्दी सरपंच के घर की ओर बढ़ने लगा।

 

सरपंच के घर के पास पहुँचकर वह हाँफ़ रहा था।

सरपंच साहब, पाकिस्तानी फ़ौज घुस आई क्या?’

 

नहीं, काका,’ सरपंच सरूप ने लंबी साँस ली, ‘अपनी फ़ौज है...यह बहुत बुरा हुआ!’

क्यों?’ रामदेव ने हौले से पूछा।

 

तुम क्या समझो? हम बॉर्डर के लोग समझते हैं! फ़ौज आती है, जाती है...पर जो ख़लिश छोड़ जाती है, उसका कोई इलाज नहीं,...चल इंदर सिंह के पास चलते हैं!’

फँसे रामदेव के लिए कोई उपाय नहीं था। टी.वी. पर जालंधर, लाहौर की ख़बरें सुनते-देखते रहो। कुछ मालूम नहीं, कहाँ क्या हो रहा है। पूरे पंजाब को जैसे सुनबहरी हो गया हो। वाघा, अटारी जैसे फ़ौजी छावनी बनी थीं। घरों में चीख़ डर से दुबकी पड़ी थी। हवा की भी तलाशी चल रही थी। घृणा के अंधड़ में मौन ही पत्तियों की भाषा थी। परिंदे की तरह अफ़वाहें उड़तीं। मौत की ख़बर चीख़ भी नहीं बन सकती थी। लोग कबूतरों की तरह दुबके रहते। रात भी जगी रहती। हरी वर्दी में लोग सन्नाटे को कुचलते रहते।

 

तलाशियों ने मालकिन को तोड़ दिया था। इंदर सिंह टी.वी. के पास बैठे रहते। बीच-बीच में रेडियो पर भी ख़बरें सुनते। रामदेव रसोई में जाकर मालकिन की मदद कर देता। रोना एक सिलसिला बन गया था। सरपंच जी ढांढ़स देने आए।

किरपाल का भाई अंबरसर में सेवादार था...किरपाल सब्र कर सकता है! दिल्ली में सब ठीक-ठाक है, आख़िर राजधानी है। तू नाहक़ परेशान है, मनजीत कौर! हिम्मत रख!’

 

कैसे चुप हो जाऊँ! एक फूल टूटता है तो हर पत्ता रोएगा...उस पार के गोले दगते थे तो हमारे में जोश होता था। अब तो इधर से ही...कोई इस बार उन्हें बेटों की तरह कलेजे में क्यों नहीं लगाता?... जिनको देख हिम्मत होती थी, वही हमें डराते हैं। बस अब तो वाहे गुरु का आसरा है!’ रामदेव को रोती-कलपती मनजीत कौर माई की तरह लगी। दिल्ली में बसे उनके दोनों बेटों का क्या हुआ होगा?

तूफ़ान की तरह गुज़रे वे दिन। बारह दिन बाद कर्फ़्यू खुला तो आशंका की तेज़ बयार थी। किसका, कौन मरा, कहाँ चला गया? आख़िर इंदर सिंह ने कहा, ‘अंबरसर जाना है, तू यहाँ कब तक भुगतता रहेगा?’

 

सफ़र तमाम नहीं...

मलवे के शहर अमृतसर में आतंक का तना हुआ छाता था। आँखों के दिए बुझे-बुझे थे। मरघट-सा सन्नाटा। बस की आरामदेह सीट पर बैठा रामदेव खिड़की से चेहरा सटाए देख रहा था। इंदर सिंह और सरपंच सरूप नीचे खड़े थे। हचके के साथ बस आगे बढ़ी। रामदेव ने झट हाथ जोड़ दिए।

 

उनके ओझल होते ही उसने लंबी साँस ली। आँखें बंद करते ही जैसे माई सामने खड़ी हो गई। वह झूठ बोलना चाहता है—भैया का पता नहीं चला। पर दो हज़ार का रुपए क्या करेगा! गोद में पड़ा विशुनदेव का झोला भारी लगने लगा। बाँसुरी झोले से बाहर झाँक रही थी। विशुनदेव का चेहरा उसके सामने घूम गया। अचानक उसका माथा घूमने लगा—आँसुओं में तब मनजीत कौर का चेहरा, किरपाल सिंह, इंदर सिंह का झुर्रियों की तरह लटकता चेहरा सामने आता और ओझल हो जाता...फिर दहाड़ मारकर रोती माई...बिस्तर पर मुँह देकर रोती भौजी...

उसे ज़ोर से कंपकंपी आई। रोम-रोम खरखरा उठा। ‘नहीं!’ वह धीरे से बुदबुदाया। आगे की सीट का हैंडिल उसने मज़बूती से पकड़ लिया। गुर्राती बस आगे बढ़ती गई। आगे बढ़ना ही था, भैया एक्सप्रेस का सफ़र तमाम नहीं हुआ था।

 

अरुण प्रकाश

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सोमवार, 8 अप्रैल 2024

इस तरह से एक रिश्ते को

 

कुछ तुमने मिलना कम किया कुछ हमने मिलना कम किया

इस तरह से एक रिश्ते को हमने मिलजुल कर खतम किया

                                कृष्णधर शर्मा 07.04.24

रविवार, 7 अप्रैल 2024

रोज नए दुश्मन बनाता हूँ

दूसरों के दुःख देखकर मैं भी दुखी हो जाता हूँ

दूसरों को रोते देखकर अक्सर मैं भी रो देता हूँ

यूँ तो कमजोर नहीं मानता अपने को मगर 

अपनों से लड़ते वक्त कमजोर पड़ जाता हूँ

कोशिश तो करता हूँ कि न दुखाऊँ दिल किसी का

मगर अनुशासनहीनता नहीं सह पाता हूँ

कई लोग नाराज रहा करते हैं मुझसे

मगर नाराजगी कि वजह नहीं बताते हैं

अपनी कमियों को स्वीकार नहीं करते

सारा दोष मुझपर ही लगा जाते हैं 

समय का बड़ा पाबन्द हूँ मैं

औरों से भी यही चाहता हूँ

इसी चक्कर में अक्सर

रोज नए दुश्मन बनाता हूँ...

                कृष्णधर शर्मा 7.4.24 

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Samajkibaat समाज की बात

गुरुवार, 28 मार्च 2024

विश्वास का फल

 

बड़े-बड़े मकानों, बड़ी-बड़ी दूकानों, लंबी-चौड़ी सड़कों, एक से एक बढ़ के कारख़ानों और रोज़गारियों की बहुतायत ही के सबब से नहीं, बल्कि अंग्रेज़ो की कृपा से सैर तमाशे का घर बने रहने और समुद्र का पड़ोसी होने तथा जहाज़ी तिजारत की बदौलत आला दरजे की तरक़्क़ी पाते रहने के कारण इस समय कलकत्ता शहर जितना मशहूर और लक्ष्मी के कृपापात्रों का घर हो रहा है उतना बंबई के सिवा और कोई दूसरा शहर नहीं। साथ ही इसके इस शहर में जैसे अमीरों और बड़ी-बड़ी सड़कों और मकानों की भरमार है उसी तरह मज़दूरी पेशे वाले, दीन-लाचार तथा और तरह से औक़ात गुज़ारी करने वाले ग़रीबों और उनके रहने वाले छोटे-छोटे तंग, गंदे और पुराने मकानों तथा उसी ढब की गंदी गलियों की भी कमी नहीं है। अस्तु इस समय हम कलकत्ते की ख़ूबी और ख़राबी का बयान करने के लिए तैयार नहीं हैं जो यहाँ का ख़ुलासा हाल लिखकर पाठकों का अमूल्य समय नष्ट करें, बल्कि वहाँ के एक छोटे से फैक्ट को लिखकर पाठकों को एक अनूठा रहस्य दिखाना चाहते हैं।

कलकत्ते की एक तंग, अँधेरी और गंदी गली के अंदर पुराने और छोटे से मकान की नीचे वाली कोठड़ी में एक औरत को फटे-पुराने आसन पर बैठे हुए परमात्मा के ध्यान में निमग्न देख रहे हैं। इस मकान में यद्यपि इसी की तरह और भी कई ग़रीब किराएदार रहते हैं और उनकी बातचीत तथा आपस में झगड़े तकरार के कारण इस समय मकान में कोलाहल-सा हो रहा है मगर उस औरत का चित्त किसी तरह हिलता हुआ दिखाई नहीं देता और वह आँखें बंद किए माला जपती अपने ध्यान में लगी हुई है और उस कोठड़ी का दरवाज़ा अधखुला-सा दिखाई दे रहा है।

 

जब हम उसके सामान की तरफ़ ध्यान देते हैं तब उस औरत की ग़रीबी और लाचारी का अंदाज़ा सहज ही में मिल जाता है। एक कोने में फटे-पुराने कपड़े की छोटी अधखुली-सी गठड़ी, दूसरे कोने में पानी की एक ठिलिया और उसके पास ही छोटा-सा पीतल का गिलास पड़ा है। ऊपर की तरफ़ एक किल्ली के सहारे काली पेंदी की हाँडी टँगी हुई है जिससे मालूम होता था कि यही हाँडी नित्य चूल्हे पर चढ़ा करती है। पानी वाले घड़े के दाहिनी तरफ़ चूल्हा और उसके सहारे छोटी-छोटी दो रिकाबियाँ रखी हैं, वे भी साबुत नहीं है। बाईं तरफ़ (जहाँ औरत बैठी है) मिट्टी का छोटा-सा चौकूठा चबूतरा बना है जिस पर तुलसी जी का एक पेड़ है जिसके सामने वह औरत बैठी हुई इस कंगाली की अवस्था में भी बे-फ़िक्री के साथ उपासना कर रही है और उसके पास ही एक चक्की भी गड़ी हुई है।

इतना होने पर भी उस कोठड़ी में किसी तरह की गंदगी या मैलापन नहीं है, गोबर से लीपकर तमाम ज़मीन साफ़ और सुथरी बनाई हुई है।

 

स्त्री का जप पूरा हुआ और वह तुलसी जी को प्रणाम कर हाथ की माला रक्खा ही चाहती थी कि कोठड़ी का दरवाज़ा खुला और एक आठ या नौ वर्ष का बालक अंदर आता हुआ दिखाई दिया।

बालक, “माँ! तू पूजा कर चुकी?”

 

स्त्री, “हाँ बेटा कर चुकी।”

बालक, “बाहर हरी खड़ा है। कहता है, पाठशाला में जाने का समय हो गया। मुझे भूख लगी है; बिना खाए मैं पाठशाला में कैसे जाऊँ?”

 

स्त्री, “(लंबी साँस लेकर और माला रखकर) बेटा आज तो कुछ खाने को नहीं है, मैं दो-तीन जगह गई थी, कहीं से गेहूँ भी नहीं मिला जो पीसकर दे आती और मजूरी के दो पैसे लेकर तेरे खाने का इंतिज़ाम करती। नवीन की माँ ने गेहूँ देने के लिए दस बजे बुलाया था सो अब मैं जाती हूँ।”

बालक, “तो मैं पाठशाला में न जाऊँगा। मुझे बड़ी भूख लगी है। तू तो दिन-रात पूजा ही किया करती है, खाने को तो लाती नहीं।”

 

स्त्री, “बेटा क्या करूँ! तेरे ही लिए तो दिन-रात पूजा किया करती हूँ। ठाकुरजी से तेरे खाने के लिए माँगती हूँ।”

बालक, “क्या तेरे माँगने से ठाकुरजी खाने को दे देंगे?”

 

स्त्री, “क्यों न देंगे? तमाम दुनिया को देते हैं तो क्या मुझी को न देंगे?”

बालक, “तो देते क्यों नहीं? मुझे बता ठाकुर जी कहाँ हैं, मैं भी उनसे माँगूँ।”

 

स्त्री, “(डबडबाई आँखों से) ठाकुरजी बड़ी दूर रहते हैं, इसी से मेरी आवाज़ अभी तक उन्होंने नहीं सुनी।”

बालक, “तो दूसरों की आवाज़ कैसे सुनते हैं जिन्हें खाने को देते हैं?”

 

स्त्री, “(कुछ सोचकर) रोज़-रोज़ के पुकारने से सुन ही लेते हैं और जब सुन लेते हैं तो सब कुछ देते हैं।”

बालक, “हलुआ, जलेबी, लड्डू पेड़ा सब कुछ देते हैं?”

 

स्त्री, “हाँ बेटा, सब कुछ देते हैं।” इतना कहकर स्त्री ने पूजा समाप्त की और लड़के को गोद में लेकर आँचल से उसका मुँह पोंछने लगी और लड़के ने पुनः उससे पूछना शुरू किया।

बालक, “हाँ माँ, तो तू ठाकुरजी का ठिकाना तो बता दे।”

 

स्त्री, “बेटा! ठाकुर जी बैकुंठ में रहते हैं। वह सब राजों के राजा हैं, उनका ठिकाना क्या?”

बालक, “बैकुंठ कैसा है?”

 

स्त्री, “बैकुंठ बड़ा भारी मकान है। चारों तरफ़ हीरा-पन्ना, जवाहिरात जड़े हैं। वहाँ बड़ा आनंद रहता है।”

बालक, “हमेलटीन कंपनी की दुकान से भी ज़ियादा सजा हुआ है? वहाँ मैं नवीन भैया के साथ गया था। ख़ूब देखा, मगर चपरासी ने भीतर जाने नहीं दिया। कान पकड़ के निकाल दिया।”

 

स्त्री, “बेटा, मैं क्या जानूँ हमेलटीन कौन है और उसकी दुकान कहाँ है, पर ठाकुर जी के बराबर दुनिया में किसी का मकान न होगा।”

बालक, “ठाकुरजी का नाम ‘ठाकुरजी’ ही है या कोई और भी है? जैसे मेरा नाम गोपाल भी है, लल्लो भी है।”

 

स्त्री, “हाँ बेटा, तुम्हारे तो दो ही नाम हैं मगर उनके हज़ारों नाम हैं।”

बालक, “सबसे बड़ा नाम उनका कौन है?”

 

स्त्री, “लक्ष्मीनाथ। अच्छा बेटा, अब तू ज़रा यहाँ बैठ, मैं नवीन की माँ के पास से जा के पीसने के लिए गेहूँ ले आऊँ, तब तेरे खाने-पीने का भी बंद-ओ-बस्त करूँ। आज तू पाठशाले मत जा, कल जाइओ।”

बालक, “अच्छा माँ, तू जा, मैं यहाँ बैठा-बैठा लिखूँगा-पढ़ूँगा। मगर मुझे पानी पिलाती जा, कुछ तो पेट भर जाएगा।”

 

स्त्री की आँखें अच्छी तरह डबडबा आई। मगर उसने जल्दी से आँखें पोंछ डाली जिससे गोपाल को मालूम न हो और पानी पिलाकर घर के बाहर निकल गर्इ।

संध्या होने में अभी दो घंटे की देर है। कलकत्ते के बाज़ारों की रौनक़ पल-पल में बढ़ती जाती है। और बाज़ारों को छोड़कर हम अपने पाठकों को उस बाज़ार में ले चलते हैं जिसकी दोनों मंज़िलें सैर-तमाशे के शौक़ीनों के दिल में ठंढक देने और मनचलों की झुकी हुई गरदने ऊपर की तरफ़ उठा देने वाली हैं। इसी बाज़ार में हम एक दोहरे टपवाली (लैंडो) फिटिन, जिसके आगे बैलों की जोड़ी जुती हुई है, धीरे-धीरे जाते देखते हैं।

 

इस गाड़ी में एक अधेड़ उम्र का रईस बैठा हुआ है और उसके सामने की तरफ़ दो आदमी (जो उसके आश्रित होंगे) भी बैठे कभी-कभी कुछ बातें करते जाते हैं, रईस की निगाह दोनों तरफ़ की दुकानों और कोठों पर पड़कर उसके दिल में तरह-तरह के भाव पैदा करते जाते थे। अकस्मात् उस रईस की निगाह एक बालक के ऊपर जा पड़ी, जो सड़क के किनारे पर रखे हुए एक लेटर बक्स के अंदर चीठी डालने का उद्योग कर रहा था, मगर उसके मुँह तक हाथ न जाने के कारण वह बहुत ही दु:खी होकर तरह-तरह की तरकीबें कर रहा था। धीरे-धीरे यह फिटिन भी उसके पास तक जा पहुँची और उस लड़के की सूरत-शक्ल तथा इस समय की अवस्था पर रईस को बड़ी दया आई। उसने समझा कि यह ग़रीब लड़का, जिसके बदन पर साबुत कपड़ा तक नहीं है, शायद किसी दुकानदार का शागिर्द या नौकर है और उसी ने इस बेचारे को इसकी सामर्थ्य से बाहर काम करने की आज्ञा दी है और यह बेचारा डर के मारे अपना काम पूरा किए बिना यहाँ से टलना नहीं चाहता। रईस ने अपने एक मुसाहब को जो उसके सामने की तरफ़ बैठा हुआ था, गाड़ी से नीचे उतरकर उस लड़के की कठिनाई को दूर करने का इशारा किया। गाड़ी खड़ी की गई और वह मुसाहब नीचे उतरकर लड़के के पास गया। बोला, “ला तेरी चीठी मैं इस बम्बे में डाल दूँ।” इसके जवाब में लड़के ने सलाम करके चीठी उसके हाथ में दे दी। मुसाहब की निगाह जब लिफ़ाफ़े पर पड़ी तो चौंक पड़ा और वह लिफ़ाफ़ा रईस के पास नाम दिखाने के लिए ले आया। लड़के को यह बात कुछ बुरी मालूम हुई क्योंकि उसे अपनी चीठी के छिन जाने का भय हुआ। इसलिए वह भी उस मुसाहब के पीछे-पीछे गाड़ी के पास तक चला आया और रोनी सूरत से उस रईस के मुँह की तरफ़ देखने लगा। उसकी इस अवस्था पर रईस का दिल और भी हिल गया। उसने लिफ़ाफ़े पर एक नज़र डालने के बाद उस लड़के से कहा, “डरो मत, हम तुम्हारी चीठी ले न लेंगे, इस पर पता ठीक-ठीक नहीं लिखा है इसी से यह आदमी मुझे दिखाने के लिए ले आया है। कहो तो मैं इस पर अंग्रेज़ी में पता लिख दूँ जिसमें चीठी जल्द ठाकुर जी के पास पहुँच जाए।” लड़के ने ख़ुश होकर कहा, “हाँ, लिख दीजिए।”

उस चीठी पर यह लिखा हुआ था—श्री ठाकुरजी महाराज लक्ष्मीनाथ के पास चीठी पहुँचे।

 

स्थान—बैकुंठ।

रईस ने अंग्रेज़ी में उस पर यह लिख दिया- M. PRATAP NARAIN HARRISON ROAD, Calcutta,

 

लड़का अंग्रेज़ी नहीं जानता था इसलिए वह इस बात को कुछ समझ न सका। इसके बाद रईस ने उस लड़के से, जो बातचीत करने में बहुत तेज़ और ढीठ भी था, पूछा, “तुम्हारा मकान कहाँ पर है?”

लड़का, “(हाथ का इशारा करके) उस तरफ़, बड़ी दूर है।”

 

रईस, “(प्यार से उसका हाथ पकड़ के) आओ हमारी गाड़ी पर बैठ जाओ, हम तुम्हें तुम्हारे घर तक पहुँचा देंगे।”

लड़का गाड़ी पर सवार हो गया। रईस ने उसे अपने बग़ल में बैठा लिया, गाड़ी पुनः धीरे-धीरे रवाना हुई और रईस तथा उस लड़के में यूँ बातचीत होने लगी—

 

रईस, “यह चीठी तुमने अपने हाथ से लिखी है?”

लड़का, “हाँ।”

 

रईस, “किसके कहने से लिखी है?”

लड़का, “अपनी ख़ुशी से।”

 

रईस, “तुमने कैसे जाना कि ठाकुर जी किसी का नाम है?”

लड़का, “मेरी माँ रोज़ उनकी पूजा किया करती है। उसी से मैंने सब कुछ पूछा था।”

 

रईस, “तुम्हारी माँ ने तुम्हें धोखा दिया।”

लड़का, “मेरी माँ कभी झूठ नहीं बोलती, सब कोई कहते हैं कि लल्लो की माँ झूठ नहीं बोलती।”

 

रईस, “तो क्या यह चीठी तुमने अपनी माँ से छिपा के लिखी है?”

लड़का, “हाँ (रोनी सूरत से) अगर मेरी माँ सुनेगी तो मुझे मारेगी... ”

 

रईस, “(लड़के की पीठ पर हाथ फेर के) नहीं-नहीं, तुम डरो मत। हम तुम्हारी माँ से यह हाल न कहेंगे। हमारा कोई आदमी भी ऐसा न करेगा। अच्छा यह तो बताओ कि चीठी में तुमने क्या लिखा है?”

इसका जवाब लड़के ने कुछ भी न दिया। रईस ने दो-तीन दफ़े यही बात पूछी मगर कुछ जवाब न पाया। आख़िर यह सोचकर चुप हो रहा कि आख़िर वह चीठी मेरे यहाँ पहुँचेगी क्योंकि मैंने उस पर अपना पता लिख दिया है, अस्तु जो कुछ उसमें होगा मालूम हो जाएगा।

 

इतने ही में लड़का चौंक पड़ा और गद्दी पर से कुछ उठकर बोला, “वह मेरी गली आ गई, मुझे उतार दो।”

रईस की आज्ञानुसार गाड़ी खड़ी की गई और वह लड़का उतरकर अपने उसी मकान में चला गया जिसका परिचय हम पहिले बयान में दे आए हैं। मगर रईस का इशारा पाकर उसका एक आदमी लड़के के पीछे-पीछे गया और उसका मकान अच्छी तरह देख-भाल आया। इसके बाद गाड़ी वहाँ से रवाना होकर तेज़ी के साथ एक तरफ़ को चली गई।

 

हमारे परिचित रईस महाराज कुमार प्रतापनारायण की अवस्था आज कुछ निराले ही ढंग की हो रही है। वह ऊँचे दर्जे का अमीर और ज़मींदार था, वह हर तरह की ख़ुशी का सामान अपने चारों तरफ़ देखता था और बिना औलाद के रहकर भी वह दिन-रात अपने को प्रसन्न रखता था। मगर आज मालूम होता है कि उसकी तमाम बनावटी ख़ुशियों का ख़ून हो गया है और उसके अंदर किसी सच्ची ख़ुशी का दरिया जोश मार रहा है, जिसके सबब से उसकी बड़ी-बड़ी आँखें प्रेम के आँसुओं का सोता बहा रही हैं। गोपाल लड़के के हाथ की लिखी हुई कल वाली चीठी जिस पर उसने अपना पता लिखकर डाक के बंबे में छुड़वा दिया था, उसके हाथ में थी और वह अपने कमरे में अकेला बैठा हुआ उसे बारबार पढ़कर भी अपने दिल को संतोष नहीं दे सकता था। उस चिट्ठी का यह मज़मून था—

‘श्रीठाकुरजी महाराज! लक्ष्मीनाथ!’

 

मैंने अपनी माँ से सुना है कि तमाम दुनिया को तुम खाने के लिए देते हो, जो कोई जो कुछ माँगता है, तुम वही देते हो, तुम्हारे भंडार में सब कुछ भरा रहता है तो फिर मुझे क्यों नहीं देते? दयानिधान! आज मैं दिन भर का भूखा हूँ, मेरी माँ न मालूम कै दिन की भूखी है, मेरे घर का रोज़ ही यही हाल रहता है, कब तक मैं लिखा करूँगा? कृपा कर मेरे लिए दो सेर लड्डू का बंद-ओ-बस्त कर दीजिए जिससे मैं, मेरी माँ और मेरे साथ खेलने वाले लड़के भी रोज़ खा लिया करें, मैंने आज तक कभी नहीं खाया, मैं उसका स्वाद नहीं जानता...।’

पुनः पढ़कर उसने अपने कलेजे पर हाथ रखा और लंबी साँस लेकर कहा, “हा!! व्यर्थ ही इतने दिन भूल-भुलैये में घूमते हुए नष्ट किए। हाँ! एक दिन भी ऐसा सरल विश्वास भगवान् पर न हुआ! आज मालूम हुआ कि मैं कौन हूँ और मुझे क्या करना चाहिए! हे ईश्वर तू धन्य है, निःसंदेह तुझ पर जो भरोसा और विश्वास रखता है, उसी का बेड़ा पार है। अच्छा, पतितपावन! अब मैं भी तेरे दरवाज़े की ख़ाक छानूँगा और देखूगा कि तेरी लंबी भुजा के सहारे मुझ अधर्म का क्योंकर उद्धार होता है?”

 

इतने ही में कमरे का दरवाज़ा खुला और विपिनविहारी बाबू वकील हाईकोर्ट की सूरत दिखाई दी, जो बड़े ही नेक, भोले-भाले तबीअत के आदमी थे और जिन्हें महाराज कुमार प्रतापनारायण ने एक वसीयतनामा लिखने के लिए बुलाया था।

आओ देखें तो सही इस समय हमारा गोपाल कहाँ है और क्या कर रहा है। देखो वह अपनी माँ के पास बैठा हुआ मीठी-मीठी बातें कर रहा है। वह डरता-डरता कह रहा है—“माँ, मैंने ठाकुरजी को चीठी लिखी है। वह आज ज़रूर पहुँच गई होगी। तू कहती थी कि वह पल-भर में तमाम दुनिया की ख़बर ले लेते हैं, अगर ऐसा है तो बस अब थोड़ी ही देर में मेरे पास भी लड्डू की हाँड़ी पहुँचा चाहती है। आज तू मेरे खाने की फ़िक्र न कर।” इत्यादि और उसकी माँ अपनी आँखों से आँसुओं की धारा बहा रही है। इतने ही में दरवाज़े के बाहर से किसी ने गोपाल कहकर पुकारा, जिसे सुनकर गोपाल दौड़ता हुआ घर के बाहर चला गया। थोड़ी ही देर के बाद जब लौटकर अपनी माँ के पास आया तो उसके एक हाथ में लड्डू से भरी हुई एक हाँडी थी और दूसरे हाथ में एक चीठी। गोपाल ने ख़ुशी-ख़ुशी अपनी माँ से कहा, “देख माँ, मैं कहता था न...कि ठाकुर जी का आदमी लड्डू लेकर आता होगा। देख, कैसा बढ़िया लड्डू है, अहाहा।”

 

एक चीठी भी ठाकुरजी ने भेजी है। देख यह चीठी है—

गोपाल की बात सुनकर उसकी माँ भौचक-सी हो गई और वह तअज्जुब भरी निगाहों से गोपाल का मुँह देखने लगी। दिल के अंदर से उठे हुए जोश ने उसका गला भर दिया था और वह कुछ बोल नहीं सकती थी। जब गोपाल ने चीठी उसके हाथ में दी, तब वह खोलकर पढ़ने लगी। जिसका मतलब यह था—

 

“ठाकुर जी ने दो सेर लड्डू रोज़ तुम्हारे पास भेजने की आज्ञा दी है सो आज से बराबर तुम्हारे पास पहुँचा करेगा। ठाकुर जी ने तुम्हारे लिए और भी बहुत कुछ प्रबंध किया है जिसका हाल कुछ दिन बाद मालूम होगा।”

गोपाल की माँ को बड़ा ही आश्चर्य हुआ! वह तअज्जुब-भरी निगाहों से कभी गोपाल का मुँह देखती और कभी लड्डू तथा चीठी की तरफ़ ध्यान देती। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आता था कि यह क्या हुआ और क्योंकर हुआ। मगर गोपाल को इन सब सोच-विचारों से क्या संबंध था, वह उसी समय थोड़ा-सा लड्डू लेकर घर के बाहर निकल गया और अपने हमजोली तथा साथ खेलने वाले लड़कों को ख़ुशी से बाँटकर घर चला आया। इसके बाद ख़ुद भी लड्डू खाए और अपनी माँ को भी ज़िद कर के खिलाया।

 

पंद्रह दिन तक नित्य एक आदमी आकर गोपाल के घर पर लड्डू दे जाया करता और उसकी माँ तरह-तरह के सोच-विचारों में अपना समय बिताया करती।

इसके बाद सोलहवें दिन जब महाराज कुमार प्रतापनारायण की चीठी एक वसीयतनामे के साथ सरकारी वकील की मार्फ़त उसके पास पहुँची, तब उसे मालूम हुआ कि गोपाल के सच्चे प्रेम, विश्वास और भोलेपन ने उसकी हुर्मत और औक़ात तथा ज़िंदगी के ढंग का कैसा काया पलट कर डाला है और उसके घर पर लड्डू पहुँचाने वाले महाराज कुमार प्रतापनारायण के दिल पर उसका कितना बड़ा असर पड़ा कि उसने अपनी तमाम जायदाद का मालिक गोपाल को बनाकर इसलिए ब्रज-यात्रा की कि उसी भक्तवत्सल, पतितपावन बैकुंठनाथ के प्रेम में अपना जीवन समाप्त करके सच्चे सुख का लाभ करे।

 

माधव प्रसाद मिश्र

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सोमवार, 18 मार्च 2024

जैनेन्द्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ- डॉ. निर्मला जैन

 सड़क पर से नर-नारियों का अविरत प्रवाह आ रहा था और जा रहा था। उसका न ओर था न छोर। यह प्रवाह कहां जा रहा था और कहां से आ रहा था, कौन बता सकता है ? सब उम्र के संब तरह के लोग उसमें थे। मानो मनुष्य के नमूनों का बाजार, सजकर, सामने से इठलाता निकला चला जा रहा हो। 

अधिकार-गर्व में तने अंग्रेज उसमें थे, और चिथड़ों से सजे, घोड़ों की बाग थामें वे पहाड़ी उसमें थे, जिन्होंने अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान को कुचल कर शून्य बना लिया है, और जो बड़ी तत्परता से दुम हिलाना सीख गये हैं। 

भागते-खेलते, हंसते शरारत करते, लाल-लाल अंग्रेज बच्चे थे और पीली-पीली आंखें फोड़े, पिता की ऊंगली पकड़कर चलते हुए अपने हिन्दुस्तानी नौनिहाल भी थे। 

अंग्रेज पिता थे जो अपने बच्चों के साथ भाग रहे थे, हंस रहे थे और खेल रहे थे। उधर भारतीय पितृदेव भी थे, जो बुजुर्गो को अपने चारों तरफ लपेटे धन-सम्पन्नता के लक्षणों का प्रदर्शन करते हुए चल रहे थे। 

अंग्रेज रमणियां थीं, जो धीरे नहीं चलती थीं, तेज चलती थीं। उन्हें न चलने में थकावट आती थी, न हंसने में लाज आती थी। कसरत के नाम पर भी बैठ सकती थीं, और घोड़े के साथ ही साथ जरा जी होते ही, किसी हिन्दुस्तानी पर भी कोड़े फटकार सकती थीं। वह दो-दो-तीन-तीन, चार-चार की टोलियों में निश्शक, निरापद, इस प्रवाह में मानो अपने स्थान को जानती हुई, सड़क पर से चली जा रही थीं। 

उधर हमारी भारत की कुललक्ष्मियां, सड़क के बिल्कुल किनारे-किनारे दामन बचाती और सम्हलाती हुई, साड़ी की कई तहों में सिमट सिमटकर, लोक-लाज, स्त्रीत्व और भारतीय गरिमा के आदर्श को अपने परिवेष्टनों में छिपाकर, सहमी सहमी धरती में आंखें गाड़े कदम-कदम बढ़ रही थीं। इसके साथ ही भारतीयता का एक और नमूना था। अपने कालेपन को खुरच-खुरच कर बहा देने की इच्छा करने वाले अंग्रेजीदा पुरुषोत्तम भी थे, जो नेटिव को देखकर मुंह फेर लेते थे और अंग्रेज को देखकर आंखे बिछा देते थे, और दुम हिलाने लगते थे। वैसे वह अकड़ कर चलते थे-मानो भारत भूमि को इसी अकड़ के साथ कुचल-कुचलकर चलने का उन्हें अधिकार मिला है। (जैनेन्द्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ- डॉ. निर्मला जैन)




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शनिवार, 9 मार्च 2024

रेत जैसे रंग वाली लड़की

रेत जैसे रंग वाली लड़की

रेत के घरौंदे बनाया करती थी

ताम्बई रंग वाला लड़का

उन घरौंदों को लात मारकर

अक्सर तोड़ जाया करता था

बहुत मजा आता था उसे

रेत जैसे रंग वाली लड़की के

रेत वाले घरौंदों को तोड़कर

बहुत खुश होता था

ताम्बई रंग वाला लड़का

रेत जैसे रंग वाली लकड़ी के

चेहरे पर उदासी देखकर

मगर रेत जैसे रंग वाली लड़की

ताम्बई रंग वाले लड़के से

नाराज न होकर

फिर-फिर रेत के घरौंदे

बनाती थी इस उम्मीद में

कि कभी तो ताम्बई रंग वाला लड़का

उसके बनाये घरौंदे की

करेगा तारीफ़ और कहेगा

कि ओ रेत जैसे रंग वाली लड़की

तुम रेत के घरौंदे कितना सुन्दर बनाती हो...

             कृष्णधर शर्मा  9.3.24 

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शनिवार, 2 मार्च 2024

सौदामिनी-विभूतिभूषण मुखोपाध्याय

 वास्तव में, दो दिन में ही, जैसा धैर्य-च्युत हो बैठा हूं-इससे भली-भांति समझा जा सकता है कि यह नौकरी रहेगी नहीं। एक तो इस अभिजात वातावरण में अपने को एडजस्ट नहीं कर पा रहा। दूसरे एक रहस्य भी है....इस कोठी में कहीं कोई एक गृहस्वामिनी भी है किन्तु उनके अस्तित्व का पक्की तरह निदर्शन नहीं मिल रहा। देखता हूं, मीरा ही सर्वमयी है। शायद मेरी नौकरी से उसका कोई साक्षात् सम्बन्ध नहीं फिर भी कुछ परेशानी का अनुभव कर रहा हूं। सबसे अधिक असह्य हो उठा है पत्थर जैसा खाली वक्त ! 

तरु प्रातः कहां जाती है ? ट्यूशन पढ़कर आती है ? दोपहर को कहां जाती है? स्कूल ?.... फिर मुझे इतना वेतन देकर क्यों रखा गया है ? काम के अभाव में कोठी के साथ किसी सम्पर्क सूत्र का अनुभव भी नहीं कर पा रहा हूं। अच्छी चाल है बड़े लोगों की ! आदमी रख लिया, पर उसका काम तक निश्चित नहीं कर देते। इसके बिल्कुल विपरीत पहले वाली सब जगहों पर गार्जियन-उपगार्जियनों का दल भागकर आता कि एक क्षण भी खाली तो नहीं बैठा हूं कहीं ! पर इससे तो सौ गुणा वही अच्छा था। 

रहस्य उस दिन कुछ खुला। 

चिट्ठी पोस्ट करके मन-ही-मन सोचता-विचारता बाग में एक लोहे के बेंच पर जा बैठा। बाहर से बाग जितना अधिक कृत्रिम और भद्दा लग रहा था अब उतना नहीं लग रहा। बल्कि कहूं कि अच्छा ही लग रहा है। साफ-सुथरे कटे-छटे बालों वाले व्यक्ति के शरीर पर जैसे ढीला-ढाला कोट अच्छा नहीं दीखता, बल्कि सुडौल कुरता सुन्दर लगता है। इस कोठी के ख्याल से यह बाग भी कुछ वैसा ही है। 

मेरे बेंच के पास गुलाब की एक क्यारी है। हाथ के पास वाले पौधे में पांच-छह गुलाब खिले हुए हैं। इन दिनों सोचते-सोचते कोठी के अन्दर की हवा मानो भाराक्रांत हो उठी थी....यहां अच्छा लगा। मैंने गन्ध लुब्ध हो एक फूल खींचकर अलग पकड़ लिया- पत्ते घास पर झर पड़े। मैं शंकित हो उठा। एक बार देखा-निःशब्द वहां से चले जाने की सोच ही रहा था कि बरामदे से बेयरा ने आवाज दी, "मास्टर साहब मेम साहब आपको बुला रही हैं।" 

(सौदामिनी-विभूतिभूषण मुखोपाध्याय)




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