नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

बैंक का लोन

 बैंक ने मेरा लोन पास कर दिया है

किसान ने जब घर पहुंचकर यह खुशखबरी सबको सुनाई तो सब घरवाले ख़ुशी से झूम उठे. पिछले वर्ष सूखे की मार से फसल ख़राब हो गई थी जिससे किसान की सारी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई थी. खाने तक के लिए अनाज कम पड़ गया था फिर बेचने की बात कौन करे. यहाँ तक कि अगले वर्ष की खेती के लिए वह बीज भी बचाकर नहीं रख पाया था. मानसून नजदीक था मगर खेत के पेपर गिरवी रखने की बात पर भी बैंकवाले लोन देने के लिए आना-कानी कर रहे थे तभी किसान के एक रिश्तेदार ने समझाया अरे लोन ऐसे ही नहीं मिल जायेगा. बैंकवाले बाबू को खुश करोगे तब जाकर तुम्हारा लोन पास होगा.

किसान बहुत ही सीधा-सादा और सज्जन आदमी था. वह बड़े ही भोलेपन से रिश्तेदार का मुंह देखने लगा तो रिश्तेदार ने कहा अरे भाई उसे कुछ रुपया देना पड़ेगा, रिश्वत खिलानी पड़ेगी समझे क्या!

पहले तो किसान ने रिश्तेदार की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया मगर जब मानसून की आहट सुनाई पड़ने लगी तो वह बेचैन हो उठा और अपनी औरत के पास जाकर बोला “अब क्या करें! बरसात भी समझो आ ही गई है और अभी तक खाद-बीज का कोई इंतजाम नहीं हो पाया है. बैंकवाला बाबू बिना कुछ लिए-दिए लोन नहीं पास करेगा.”

किसान की औरत ने अपने गले में पहना मंगलसूत्र निकालकर देते हुए कहा “इसे ले जाओ और कहीं गिरवी रखकर उस बाबू को रुपया दो ताकि लोन के रूपये से हमारी भरभराती हुई गृहस्थी को सम्हाला जा सके. अच्छी खेती होने के बाद हम बैंक का लोन भी जमा कर सकेंगे और मेरा मंगलसूत्र भी वापस आ जायेगा.”

किसान के दो बच्चे थे. बड़ी बेटी थी जिसका विवाह वह पांच साल पहले ही ग्राम प्रधान से कर्ज लेकर पड़ोस के ही गाँव में कर चुका था और पिछले वर्ष ही कर्जमुक्त हुआ था उससे  छोटा बेटा था जो बारहवीं फेल होकर दो साल से घर पर ही बैठा था मगर उसके सपने बड़े-बड़े थे. वह गाँव की ही एक लड़की से शादी करना चाहता था मगर लड़की उससे संपन्न घर की होने की वजह से और बारहवीं में फेल होकर घर में खाली बैठे रहने की कारण उससे कतराती थी. एक बार मेले में मिलने पर उसने अपनी सहेलियों के सामने लड़के से कह भी दिया था कि “शादी तो मैं तुमसे कर भी लूं मगर न तो तुम्हारे पास पक्का मकान है न घर में टीवी है और बाजार घूमने क्या मैं तुम्हारे साथ साईकल में जाऊँगी! अरे पहले इन सबका इंतजाम कर लो फिर शादी के बारे में सोचना.’’

  बदलते समय के साथ किसान के बेटे को भी आधुनिक ज़माने के साथ कदमताल करने का मन होता था मगर घरेलू अभाव व् परेशानियाँ उसके सपनों के आड़े आ जाते थे. माँ के डांटने-कहने पर बेमन से कभी-कभार पिता का छोटे-मोटे कामों में हाथ बंटाता था मगर उसका मन भटकता ही रहता था.

 आख़िरकार किसान ने बेमन से अपनी पत्नी का मंगलसूत्र गिरवी रखकर बैंक के बाबू को पांच हजार रूपये की रिश्वत दी तब जाकर उसका पचास हजार का लोन पास हुआ.

किसान ने लोन के रूपये से खेत की बढ़िया से जुताई करवाई और बाजार से बढ़िया खाद-बीज लाकर बुवाई कर दी. इस सबके बाद लोन के कुछ रूपये बच जाने से वह पत्नी का मंगलसूत्र छुड़वाना चाहता था मगर घर में भी राशन-पानी के लिए कोई व्यवस्था न थी अतः किसान की पत्नी ने ही रास्ता निकाला कि अभी कुछ दिन तक मंगलसूत्र और गिरवी रहने दो. फसल कटाई के बाद उसे ब्याज सहित रूपये देकर मुक्त करवा लेना. अब किसान को अगले 2-3 महीने राशन-पानी की भी कोई चिंता न थी और निराई-गोड़ाई, जंगली जानवरों से फसल की रखवाली करते कब फसल काटने का समय आया किसान को पता न चला. इस साल पूरे राज्य में सबकी फसल अच्छी हुई थी.   

किसान भी अपने खलिहान में अनाज का ढेर देखकर बहुत खुश था कि अब वह बैंक का लोन चुकाकर और अपनी पत्नी का मंगलसूत्र भी महाजन के यहाँ से छुडवा लेगा.

किसान ने खलिहान से सबसे पहले अगले साल की खेती के लिए बीज निकाला फिर सालभर के खाने के लिए अनाज अलग किया और बाकी अनाज गाँव के ही प्रधान के ट्रैक्टर में लोड करवाकर अन्य कई किसानों के साथ सहकारी समिति की तरफ निकल पड़ा. इस साल बम्पर पैदावार होने की वजह से फसल बेचने के लिए समितियों में ट्रैक्टरों की लम्बी कतार लगी थी. तीसरे दिन किसान का भी नंबर आया तो उसने भी अपनी फसल समिति के कांटे पर तुलवाई. उसकी फसल का दाम कुल मिलाकर पचपन हजार रूपये हुआ था. किसान ने हिसाब लगाया कि इससे वह बैंक का लोन भी दे सकेगा और पत्नी का मंगलसूत्र भी छुडवा सकेगा. अपनी फसल की कमाई लेकर वह शाम होते-होते घर पहुंचा और गमछे से पसीना पोछते हुए पत्नी से पानी माँगा. पत्नी भी उसकी आवाज सुनकर पानी लिए हुए आँगन में भागी चली आई. किसान का बेटा भी पिता को घर आते देख खेल के मैदान से भागता हुआ घर आ पहुंचा. किसान ने फसल बेचकर लाई हुई रकम सबके सामने रख दी और कहा कि “चलो फसल की कीमत ज्यादा तो नहीं मिली मगर बैंक का लोन जमा कर दूंगा तो एक बड़ी चिंता से मुक्ति मिल जाएगी. बाकी व्यवस्थाएं अगली फसल में देखी जायेंगी.”

इधर किसान और उसकी पत्नी कर्जमुक्त हो जाने की संभावना से राहत महसूस कर रहे थे उधर किसान के बेटे के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था. वह महीनों से प्लानिंग करके बैठा था अब उसे मूर्त रूप देने का समय आ चुका था. उसने पिता से कहा “पिताजी मैंने पिछले महीने गन्ना मिल में नौकरी के लिए आवेदन दिया था तो वहां मेरी सुपरवाईजर (मुंशी) की नौकरी पक्की हो गई है मगर रोज 6-7 किलोमीटर आने-जाने में काफी समय बर्बाद होगा और कई बार मैं समय से पहुँच भी नहीं पाउँगा! तो मैं सोच रहा था क्यों न मैं इस रूपये की एक मोटरसाईकिल ले लूँ! बैंक का कर्ज मैं अपनी तनख्वाह से चुका दूंगा!

“मगर मुंशी की नौकरी में तुम्हें तनख्वाह ही कितनी मिलेगी बेटा कि तुम कर्ज चुका पाओगे!’

पिता के चेहरे पर उभरे परेशानी के भाव को देखते हुए बेटे ने कहा “पिताजी, वहां पर तनख्वाह के अलावा उपरी कमाई भी हो जाती है. अतः कर्ज चुकाने में कोई परेशानी नही आएगी. अब पिताजी को तुम ही समझाओ न माँ!”  

पहले तो माँ भी पशोपेश में पड़ गई मगर बेटे के दबाव बनाने पर उसने भी कहा “अब इतना कह रहा है तो दे दीजिये न रूपये! आपको कर्ज चुकाने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी. फिर हमारे बेटे ने इतने दिनों के बाद नौकरी करने की बात कही है जिससे हमें भी खुश होना चाहिए और उसका सहयोग करना चाहिए.”

किसान माँ-बेटे की बातें सुनकर अब मना न कर पाया और रूपये बेटे के हाथों में सौपते हुए बोला “यह लो बेटा रूपये, मन लगाकर काम करना. हमें इसी महीने से बैंक का लोन चुकाने के लिए बचत भी करनी होगी. हाँ एक बात और है बेटा! ऐसा कुछ भी मत करना जिससे हमारी सामजिक प्रतिष्ठा पर कोई आंच आये.”

“आप बिलकुल भी चिंता न करें पिताजी! मैं भी अब समझदार हो गया हूँ और अपनी जिम्मेवारी समझता हूँ.”

“ठीक है बेटा जैसा तुमको उचित लगे”

बेटे ने रूपये मिलते ही अगले दिन एक पुरानी मोटरसाइकिल और एक टीवी खरीद ली. माँ-बाप ने जब टीवी खरीदने पर आपत्ति जताई तो बेटे ने कहा “माँ! आजकल जमाना बदल रहा है और हमें भी नए ज़माने के हिसाब से चलना होगा नहीं तो हम पीछे रहा जायेंगे. जरा सोचो तो टीवी पर इतने अच्छे कार्यक्रम आते हैं, धार्मिक सीरियल और क्रिकेट का खेल भी आता है. पहले जब मैं किसी और के घर टीवी देखने जाता था तो कई बार मुझे अपमानित होना पड़ता था अब हम सब अपने कामों से फुर्सत होकर साथ बैठकर टीवी देख पाएंगे तो कितना अच्चा महसूस होगा न! और फिर पड़ोसियों और गांववालों में भी हमारी कितनी इज्जत बढ़ेगी न!”

माँ-बाप इस बार भी बेटे के तर्कों के आगे निरुत्तर रह गए. अब बेटा मोटरसाइकिल लेकर लड़की के घर की तरफ निकला जहाँ घर के सामने बने चबूतरे पर ही लड़की एक सहेली से बातें करते हुए दिख गई. लड़के ने आगे-पीछे देखकर मोटरसाइकिल रोकी और लड़की को मोटरसाइकिल और नई टीवी खरीदने के बारे में बताया. मगर लड़की के चेहरे पर ख़ुशी के भाव न देखकर लड़का घबराया और उससे पूछा “तुम खुश नहीं हो क्या! अब तो हमारी शादी में कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए न!” लड़की ने थोडा कठोर नजरों से देखते हुए कहा “तुम्हारे टीवी और मोटरसाइकिल खरीद लेने से हमारी शादी नहीं हो जाने वाली! मुझे अपने खंडहर जैसे दिखनेवाले मिटटी के कच्चे मकान में रखोगे क्या जिसमें कूलर तक नहीं है! और तुम ठहरे बेरोजगार और निठल्ले आदमी! मेरी जरूरतें और खर्च कैसे पूरा करोगे! जाओ पहले इस सबके बारे में सोचो फिर शादी की सोचना!” कहकर लड़की अपनी सहेली के साथ बातें करने लगी. लड़के को यह सब सुनकर बहुत दुःख हुआ और वह घर आकर टीवी चलाकर बिस्तर पर पड़ गया.

  जब कई दिनों तक बेटा दिनभर सिर्फ टीवी देखकर और सुबह-शाम मोटरसाइकिल लेकर घूमता रहा तो माँ-बाप का माथा ठनका और उन्होंने बेटे से कहा कि “बेटा! तुम 3-4 दिन से घर पर ही बैठे हो! नौकरी करने क्यों नहीं जा रहे हो?”

बेटे की भी अचानक जैसे नींद खुली हो. वह थोडा सिटपिटाया मगर बातें बनाते हुए बोला “अरे! आप लोग तो बेकार ही सोचकर परेशान हो रहे हैं मुझे दो दिन के बाद परसों के दिन  नौकरी पर आने को कहा गया है इसलिए मैं कहीं न जाकर घर पर ही आराम कर रहा था”

बेटे की बातें सुनकर माँ-बाप को कुछ तसल्ली हुई. लड़के ने भी सोचा कि अब टालमटोल करने से काम नहीं चलेगा. मुझे कुछ काम करना ही पड़ेगा तभी घर-गृहस्थी भी चलेगी और कुछ कमाकर पक्का घर बनाऊंगा तब जाकर मेरी शादी की बात भी बनेगी.

लड़का चिंतित होकर अगले दिन सचमुच काम की तलाश में गन्नामिल के दफ्तर पहुंच गया और वहां के मैनेजर से अपनी नौकरी के लिए निवेदन किया मगर मैनेजर ने उसे साफ़ जवाब दे दिया कि अभी तो वैसे भी हमारे यहाँ आदमी ज्यादा हैं. हमें अभी नए आदमी की कोई जरूरत नहीं है.”  लड़का वहां से निराश होकर और कई जगह काम की तलाश में गया मगर उसे कोई काम नही मिला. अगले दो-तीन दिनों तक कोई व्यवस्था नहीं हो पाने की वजह से उसका आत्मविश्वास चकनाचूर हो चुका था और वह मानसिक रूप से काफी तनावग्रस्त हो गया. अब वह अक्सर घर पर ही अपनी कोठारी में मुंह छुपाकर पड़ा रहता था. माँ-बाप को जब उसकी सच्चाई का पता चला तो उनके पैरों के नीचे से मानों धरती ही खिसक गई. पिता को तो जैसे सदमा सा लगा. वह अब अक्सर अपने खेत पर जाकर बैठे रहते और चुपचाप ही रहते. एक दिन बैंक से लोन वसूली का नोटिस आया जिसे देखकर वह काफी घबरा गया. नोटिस लाने वाले ने उसे बताया कि अगर तुमने जल्दी ही बैंक का लोन ब्याज सहित नहीं चुकाया तो तुम्हारे घर और खेत कुर्क कर लिए जायेंगे. किसान की आँखों के आगे अँधेरा सा छाने लगा और वह अपना सर पकड़कर बैठ गया.  शाम को उसने खाना भी नहीं खाया और अनमना सा अपने खेतों की तरफ निकल गया.

रात काफी हो जाने पर भी जब किसान घर नहीं लौटा तो उसकी पत्नी काफी परेशान हो गई और बेटे को बोली “बेटा! देख तो तेरे पिताजी कहाँ हैं! अभी तक घर नहीं आये, उन्होंने आज खाना भी नहीं खाया है और बिना कुछ कहे कहाँ चले गए हैं!”

बेटा इस समय अवसादग्रस्त होकर रात में खाना खाने के बाद नशीली दवाओं का सेवन करने लगा था. वह इस समय भी नशीली दवाओं का सेवन करके अपने कमरे में पड़ा हुआ था. उसने माँ की बातें तो सुनी मगर उसे कुछ खास समझ में नहीं आया. माँ ने काफी देर तक बेटे को उठाना चाहा मगर बेटे की हालत उस समय ऐसी थी कि वह उठकर कुछ दूर भी स्वयं नहीं चल पा रहा था. थककर वह खुद ही किसान को ढूँढने निकल पड़ी. आस-पड़ोस में कई लोगों से पूछने पर पता चला कि किसान को खेतों की तरफ जाते देखा गया था. चांदनी रात के हलके उजाले का सहारा लिए वह खेत की तरफ चल पड़ी. खेत पहुंचकर उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई और किसान को आवाज भी लगे मगर कहीं से कोई जवाब न आया. उसने भी आज उपवास रखने के कारण सुबह से कुछ नहीं खाया था और शाम को किसान के बिना बताये कहीं चले जाने की वजह से वह शाम को भी कुछ नहीं खा पाई. दिनभर की कमजोरी थकान और किसान की चिंता से बेहाल ही थी कि अचानक उसे पास के पेड़ पर कुछ लटकता हुआ सा दिखा. वह घबराकर पेड़ के पास पहुंची तो देखा कि किसान अपने गमछे का फंदा बनाकर पेड़ पर निर्जीव होकर लटक रहा था यह सब देखकर वह बेहोश होकर धम्म से खेत की मेड पर गिर पड़ी. अगली सुबह जब कई लोगों ने घर आकर बेटे को जगाया और उसे लेकर खेत पहुंचे तो बेटे ने देखा कि पिता पेड़ पर लटके हुए हैं और माँ जमीन पर निर्जीव पड़ी हुई है. उसकी आँखों में न आंसू आये और न ही उसने किसी से कुछ कहा. पथरायी आँखों से कभी पिता और कभी माँ को देखता वह भी खेत की मेड पर पड़े माँ के निर्जीव शरीर के पास बैठ गया.   कृष्णधरशर्मा


#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात      

मंगलवार, 9 सितंबर 2025

ओ बादल आते रहना

ओ बादल आते रहना हमेशा मेरे आंगन में

कभी सूरज के साथ आना तो कभी चन्दा के साथ

तुम आते हो तो जीवन में उमंग बनी रहती है

जीवन जीने की इच्छा मन में बची रहती है

ओ बादल तुम आते हो तो आते हैं तुम्हारे साथ

तुम्हारे ही भीतर छुपे हुए कई कई लोग

मैं देखता हूँ उनमें अपने जाने-पहचाने चेहरे

जो मिले होते हैं जीवन में किसी मोड़ पर कभी

फिर होती है आँख-मिचौली उनके साथ

बहुत अच्छा लगता है तुम्हारा आना

जैसे किसी प्रेमिका का आना

और मेरे सर को अपने गोद में रखकर

हौले-हौले से बालों को सहलाना

मेरे अन्दर बची हैं बहुत सारी बातें

जो करनी हैं तुमसे एक दिन खुलकर

एक तुम्ही तो हो मेरी उस प्रेमिका के बाद

जिससे की जा सकती हैं दुनिया जहान की

ढेर सारी बातें तुम्हारी गोद में सिर रखकर

कई-कई घंटे, दिन, महीने और सालों तक

जब तक ख़त्म न हो जाएँ सारी बातें

रीत न जाए मेरे मन में

भरी हुई बातों का खजाना...

      कृष्णधर शर्मा 8.9.25

दंगों के घाव

दंगों में कभी नहीं मारे जाते दंगाई

दंगों में मरते हैं हमेशा ही

बेकसूर और कमजोर लोग

जिन्हें शायद अपनी गलती भी

ठीक से नहीं होती पता

बुरे लोगों की बुराई की कीमत

हमेशा अच्छे लोग ही चुकाते हैं

दंगे करके निकल जाते हैं दंगाई

छोड़ जाते हैं अपने पीछे

कभी न भरने वाले घाव

जो रह-रहकर रिसते रहते हैं

जीवन भर किसी नासूर की तरह

          कृष्णधर शर्मा 8.9.25

#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात


शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

दुख ने मुझको जब-जब तोड़ा

 

दुख ने मुझको

जब-जब तोड़ा,

 

मैंने

अपने टूटेपन को

 

कविता की ममता से जोड़ा,

जहाँ गिरा मैं,

 

कविताओं ने मुझे उठाया,

हम दोनों ने

 

वहाँ प्रात का सूर्य उगाया।

 

केदारनाथ अग्रवाल

#समाजकीबात #samajkibaat #Sahitya #साहित्य समाजकीबात samajkibaat Sahitya साहित्य

#कृष्णधरशर्मा #Krishnadharsharma कृष्णधरशर्मा Krishnadharsharma 

 

 

शनिवार, 16 अगस्त 2025

चिड़िया


'' ने चिड़िया पर कविता लिखी।

उसे देख '' और '' ने चिड़िया पर कविता लिखी।

तब त, , , , , ने

फिर प, , , भ और म, ने

'' ने, '' ने, '' ने

इस तरह युवा कविता की बारहखड़ी के सारे सदस्यों ने

चिड़िया पर कविता लिखी।

चिड़िया बेचारी परेशान

उड़े तो कविता

न उड़े तो कविता।

तार पर बैठी हो या आँगन में

डाल पर बैठी हो या मुंडेर पर

कविता से बचना मुश्किल

मारे शरम मरी जाए।

एक तो नंगी,

ऊपर से कवियों की नज़र

क्या करे, कहाँ जाए

बेचारी अपनी जात भूल गई

घर भूल गई, घोंसला भूल गई

कविता का क्या करे

ओढ़े कि बिछाए, फेंके कि खाए

मरी जाए कविता के मारे

नासपीटे कवि घूरते रहें रात-दिन।

एक दिन सोचा चिड़िया ने

कविता में ज़िंदगी जीने से तो मौत अच्छी

मर गई चिड़िया

बच गई कविता।

कवियों का क्या,

वे दूसरी तरफ़ देखने लगे।

 

 शरद जोशी

#समाजकीबात #samajkibaat #Sahitya #साहित्य समाजकीबात samajkibaat Sahitya साहित्य

#कृष्णधरशर्मा #Krishnadharsharma कृष्णधरशर्मा Krishnadharsharma 

 

बुधवार, 13 अगस्त 2025

ऐ बेरहम कातिल

 

क़त्ल कर शौक से मेरा तू ऐ बेरहम कातिल

गुनाह बताकर मारता तो मरने में भी मज़ा आता

                    कृष्णधर शर्मा 12.8.25

शनिवार, 9 अगस्त 2025

वक्त से पहले ही

 

बचपन की यादें क्या बता पायेगा वह भला!

कि जो वक्त से पहले ही ज़िम्मेदार हो गया

                    कृष्णधर शर्मा 8.8.25

शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

छोड़ कर चले गए सब यार

 

जाकर भी क्या हासिल उस गली में अब बता

कि छोड़ कर चले गए सब यार जिस गली को

                       कृष्णधर शर्मा 7.8.25

छोड़ कर चले गए सब यार

 

जाकर भी क्या हासिल उस गली में अब बता

कि छोड़ कर चले गए सब यार जिस गली को

                     कृष्णधर शर्मा 7.8.25

बुधवार, 30 जुलाई 2025

मोपासां की संकलित कहानियाँ

 उन्नीसवीं शताब्दी वह शताब्दी थी जिसने क्रान्ति के अग्रदूत, प्रबोधनकाल के दार्शनिकों के "तर्कबुद्धि के राज्य" और "शाश्वत न्याय" के आदर्शों को बूर्जा राज्य और बूर्जा न्याय की नग्न निर्लज्जताओं में रूपान्तरित होते देखा। इसकी पहली प्रतिक्रिया, कला-साहित्य की दुनिया में, स्वच्छन्दतावाद के रूप में सामने आई। प्रतिक्रियावादी स्वच्छन्दतावाद की धारा बूर्जा-पूर्व सामाजिक प्रणाली का प्रशस्ति-गान करती थी, जबकि बायरन और शेली जैसे क्रान्तिकारी स्वच्छन्दतावादी कवि पूँजीवाद को ठुकराकर भविष्य की ओर देखते थे। स्वच्छन्दतावाद की यह धारा अठारहवीं शताब्दी के प्रबोधनकालीन यथार्थवाद की तुलना में अत्यधिक गहन-गम्भीर थी। इसने मनुष्य के आन्तरिक जगत का चित्रण करने तथा व्यक्तित्वों के अन्तरविरोधों- विसंगतियों और उनकी "मनोगत अनन्तता" को उद्घाटित करने के साथ ही कला में इतिहासपरतावाद (हिस्टॉरिसिज्म) के सिद्धान्तों को समाविष्ट करने और समान्यजन के जीवन से निकट सम्बन्ध स्थापित करने का भी काम किया। 

1830 के दशक में क्रान्तिकारी बूर्ध्वा यथार्थवाद का उत्कर्ष बाल्ज़ाक, स्टेण्ढाल, - डिकेन्स आदि की जिस आलोचनात्मक यथार्थवादी धारा के रूप में सामने आया, वह स्वच्छन्दतावाद के साथ जैविक रूप से जुड़ी हुई थी। बूर्जा क्रान्ति की परिणतियों से मोहभंग और पूँजीवादी व्यवस्था का नकार-ये प्रवृत्तियाँ दोनों ही धाराओं के मूल में थीं। कविता की विधा में स्वच्छन्दतावाद की धारा आगे तीन रूपों में विकसित हुई-(i) पुश्किन, लर्मन्तोव आदि रूसी कवियों और विभिन्न पूर्वी यूरोपीय कवियों की धारा (ii) वाल्ट व्हिटमैन की धारा तथा (iii) हाइने, वेयेर्थ, फैलिगराथ आदि प्रारम्भिक सर्वहारा कवियों की धारा। 

आलोचनात्मक यथार्थवाद मुख्यतः उपन्यास विधा को अपनाकर आगे बढ़ा। अपनी अलग-अलग विशिष्टताओं के साथ महान यथार्थवादी उपन्यासकारों ने सम्पत्ति-स्वामित्व की दुनिया में संघर्षरत व्यक्तित्वों के बहिर्जगत एवं अन्तर्जगत को, व्यापारियों की धूर्तताओं एवं तिकड़मों को, गरीबों के दुर्भाग्य एवं उजरती गुलामी के नर्क को तथा आने-पाई के ठण्डे पानी में डूबते रागात्मक सम्बन्धों को जीवन्त रूप से और निर्मम वस्तुपरकता के साथ चित्रित किया। (मोपासां की संकलित कहानियाँ)




#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात


शनिवार, 12 जुलाई 2025

बोलनेवाली औरत

 

यह झाडू सीधी किसने खड़ी की? बीजी ने त्योरी चढ़ाकर विकट मुद्रा में पूछा। जवाब न मिलने पर उन्होंने मीरा को धमकाया, इस तरह फिर कभी झाडू की तो...”

वे कहना चाहती थीं कि मीरा को काम से निकाल देंगी पर उन्हें पता था नौकरानी कितनी मुश्किल से मिलती है। फिर मीरा तो वैसे भी हमेशा छोडू-छोडूँ मुद्रा में रहती थी।

 

'मैंने नहीं रखी, मीरा ने ऐंठकर जवाब दिया।

'क्यों रखी थी! तुझे इतना नहीं मालूम कि झाडू खड़ी रखने से घर में दलिद्दर आता है, क़र्ज़ बढ़ता है, रोग जड़ पकड़ लेता है।

 

यह तो मैंने कभी नहीं सुना।

जाने कौन गाँव की है तू। माँ के घर से कुछ भी तो सीखकर नहीं आई। काके का काम वैसे ही ढीला चल रहा है, तू और झाडू खड़ी रख, यही सीख है तेरी!

 

मेरा ख़याल है झाडू ग़ुसलख़ाने के बीचोबीच भीगती हुई, पसरी हुई छोड़ देने से दलिद्दर आ सकता है। तीलियाँ गल जाती हैं, रस्सी ढीली पड़ जाती है और गंदी भी कितनी लगती है।

आज तो मैंने माफ़ कर दिया, फिर भी कभी झाडू खड़ी न मिले, समझी!

 

इस बात में कोई तुक नहीं है बीजी, झाडू कैसे भी रखी जा सकती है।

बीजी झुंझला गई। कैसी जाहिल और ज़िद्दी लड़की ले आया है काका। लाख बार कहा था इस कुदेसिन से ब्याह न कर, पर नहीं, उसके सिर पर तो भूत सवार था।

 

शिखा को हँसी आ गई। बीजी अपने को बहुत सही और समझदार मानती हैं, जबकि अकसर उनकी बातों में कोई तर्क नहीं होता।

उसे हँसते देखकर बीजी का ख़ून खौला गया।

 

इसे तो बिलकुल अक़ल नहीं, उन्होंने मीरा से कहा।

बीजी चाय पिएँगी? शिखा ने पूछा।

 

बीजी उसकी तरफ़ पीठ करके बैठी रहीं। शिखा की बात का जवाब देना वे ज़रूरी नहीं समझतीं। वैसे भी उनका ख़याल था कि शिखा के स्वर में ख़ुशामद की कमी रहती है।

शिखा ने चाय का गिलास उनके आगे रखा तो वे भड़क गईं, वैसे ही मेरा क़ब्ज़ के मारे बुरा हाल है, तू चाय पिला-पिलाकर मुझे मार डालना चाहती है।

 

शिखा ने और बहस करना स्थगित किया और चाय का गिलास लेकर कमरे में चली गई।

शिखा का शौहर, कपिल अपने घरवालों से इन अर्थों से भिन्न था कि आमतौर पर उसका सोचने का एक मौलिक तरीक़ा था। शादी के ख़याल से जब उसने अपने आस-पास देखा, तो कॉलेज में उसे अपने से दो साल जूनियर बीएससी में पढ़ती शिखा अच्छी लगी थी। सबसे पहली बात यह थी कि वह उन सब औरतों से एकदम अलग थी जो उसने परिवार और अपने परिवेश में देखी थीं। शिखा का पूरा नाम दीपशिखा था लेकिन कोई नाम पूछता तो वह महज नाम नहीं बताती, मेरे माता-पिता ने मेरा नाम ग़लत रखा है। मैं दीपशिखा नहीं, अग्निशिखा हूँ। वह कहती।

 

अग्निशिखा की तरह ही वह हमेशा प्रज्वलित रहती, कभी किसी बात पर, कभी किसी सवाल पर। तब उसकी तेज़ी देखने लायक़ होती। उसकी वक्तृता से प्रभावित होकर कपिल ने सोचा वह शिखा को पाकर रहेगा। पढ़ाई के साथ-साथ वह पिता के व्यवसाय में भी लगा था, इसलिए शादी से पहले नौकरी ढूँढ़ने की उसे कोई ज़रूरत नहीं थी। बिना किसी आडंबर, दहेज या नख़रे के एक सादे समारोह में वे विवाह-सूत्र में बंध गए। शिखा उसकी आत्मनिर्भरता, ख़ूबसूरती और स्वतंत्र सोच से प्रभावित हुई। तब उसे यह नहीं पता था कि प्रेम और विवाह दो अलग-अलग संसार हैं। एक में भावना और दूसरे में व्यवहार की ज़रूरत होती है। दुनिया भर में विवाहित औरतों का केवल एक स्वरूप होता है। उन्हें सहमति-प्रधान जीवन जीना होता है। अपने घर की कारा में वे क़ैद रहती हैं। हर एक की दिनचर्या में अपनी-अपनी तरह का समरसता रहती है। हरेक के चेहरे पर अपनी-अपनी तरह की ऊब। हर घर का एक ढर्रा है जिसमें आपको फिट होना है। कुछ औरतें इस ऊब पर श्रृंगार का मुलम्मा चढ़ा लेती हैं पर उनके श्रृंगार में भी एकरसता होती है। शिखा अंदाज़ लगाती, सामने वाले घर की नीता ने आज कौन-सी साड़ी पहनी होगी और प्रायः उसका अंदाज़ ठीक निकलता। यही हाल लिपिस्टक के रंग और बालों के स्टाइल का था। दुःख की बात यही थी कि अधिकांश औरतों को इस ऊब और क़ैद की कोई चेतना नहीं थी। वे रोज़ सुबह साढ़े नौ बजे सासों, नौकरों, नौकरानियों, बच्चों, माली और कुत्तों के साथ घरों में छोड़ दी जातीं, अपना दिन तमाम करने के लिए। वही लंच पर पति का इंतिज़ार, टी.वी. पर बेमतलब कार्यक्रमों का देखना और घर -भर के नाश्ते, खाने— नखरों की नोक पलक सँवारना। चिकनी महिला पत्रिकाओं के पन्ने पलटना, दोपहर को सोना, सजे हुए घर को कुछ और सजाना, सास की जी-हुज़ूरी करना और अंत में रात को एक जड़ नींद में लुढ़क जाना।

कपिल के घर आते ही बीजी ने उसके सामने शिकायत दर्ज की, तेरी बीवी तो अपने को बड़ी चतुर समझती है। अपने आगे किसी की चलने नहीं देती। खड़ी-खड़ी जबाब टिकाती है।”

 

कपिल को ग़ुस्सा आया। शिखा को एक अच्छी पत्नी की तरह चुप रहना चाहिए, ख़ासतौर पर माँ के आगे। इसने घर को कॉलेज का डिबेटिंग मंच समझ रखा है और माँ को प्रतिपक्ष का वक्ता। उसने कहा, मैं उसे समझा दूँगा, आगे से बहस नहीं करेगी।

उलटी खोपड़ी की है बिलकुल। वह समझ ही नहीं सकती'' माँ ने मुँह बिचकाया।

 

रात, उसने कमरे में शिखा से कहा, तुम माँ से क्यों उलझती रहती हो दिन-भर!

इस बात का विलोम भी उतना ही सच है।

 

हम विलोम-अनुलोम में बात नहीं कर रहे हैं, एक संबंध है जिसकी इज़्ज़त तुम्हें करनी होगी।

ग़लत बातों की भी!

 

माँ की कोई बात ग़लत नहीं होती।

कोई भी इंसान परफेक्ट नहीं हो सकता।”

 

कपिल तैश में आ गया, तुमने माँ को इम्परफ़ेक्ट कहा। तुम्हें शर्म आनी चाहिए। तुम हमेशा ज़ियादा बोल जाती हो और ग़लत भी।

तुम मेरी आवाज़ बंद करना चाहते हो।

 

मैं एक शांत और सुरुचिपूर्ण जीवन जीना चाहता हूँ।

शिखा अंदर तक जल गई इस उत्तर से क्योंकि यह उत्तर हज़ार नए प्रश्नों को जन्म दे रहा था। उसने प्रश्नों को होठों के क्लिप से दबाया और सोचा, अब वह बिलकुल नहीं बोलेगी, यहाँ तक कि ये सब उसकी आवाज़ को तरस जाएँगे।

 

लेकिन यह निश्चय उससे निभ न पाता। बहुत जल्द कोई-न-कोई ऐसा प्रसंग उपस्थित हो जाता कि ज्वालामुखी की तरह फट पड़ती और एक बार फिर बदतमीज़ और बदजुबान कहलाई जाती। तब शिखा बेहद तनाव में आ जाती। उसे लगता घर में जैसे टॉयलेट होता है ऐसे एक टॉकलेट भी होना चाहिए जहाँ खड़े होकर वह अपना ग़ुबार निकला ले, जंजीर खींचकर बातें बहा दे और एक सभ्य शांत मुद्रा से बाहर आ जाए। उसे यह भी बड़ा अजीब लगता है कि वह लगातार ऐसे लोगों से मुख़ातिब है जिन्हें इसके इस भारी-भरकम शब्दकोश की ज़रूरत ही नहीं है। घर को सुचारू रूप से चलाने के लिए सिर्फ़ दो शब्दों की दरकार थी-जी और हाँजी।

कल छोले बनेंगे?

 

जी छोले बनेंगे।

पाजामों के नाड़ें बदले जाने चाहिए।”

 

हाँ जी, पाजामों के नाड़े बदले जाने चाहिए।

उसने अपने जैसी कई स्त्रियों से बात करके देखा, सबमें अपने घरबार के लिए बेहद संतोष और गर्व था।

 

हमारे तो ये ऐसे हैं। हमारे तो ये वैसे हैं जैसा कोई नहीं हो सकता।

हमारे बच्चे तो बिलकुल लव-कुश की जोड़ी है। हमारा बेटा तो पढ़ने में इतना तेज़ है कि पूछो ही मत। शिखा को लगता उसी में शायद कोई कमी है जो वह इस तरह संतोष में लबालब भरकर मेरा परिवार महान के राग नहीं अलाप सकती।

 

रातों को बिस्तर में पड़े-पड़े वह देर तक सोती नहीं, सोचती रहती, उसकी नियति क्या है। न जाने कब कैसे एक फुलटाइम गृहिणी बनती गई जबकि उसने ज़िंदगी की एक बिलकुल अगल तस्वीर देखी थी। कितना अजीब होता है कि दो लोग बिलकुल अनोखे, अकेले अंदाज़ में इसलिए नज़दीक आएँ कि वे एक-दूसरे की मौलिकता की क़द्र करते हों, महज़ इसलिए टकराएँ क्योंकि अब उन्हें मौलिकता बरदाश्त नहीं।

दरअसल वे दोनों अपने-अपने खलनायक के हाथों मार खा रहे थे। यह खलनायक था रूटीन जो जीवन की ख़ूबसूरती को दीमक की तरह चाट रहा था। कपिल चाहता था कि शिखा एक अनुकूल पत्नी की तरह रूटीन का बड़ा हिस्सा अपने ऊपर ओढ़ ले और उसे अपने मौलिक सोच-विचार के लिए स्वतंत्र छोड़ दे। शिखा की भी यही उम्मीद थी। उनकी ज़िंदगी का रूटीन या ढर्रा उनसे कहीं ज़ियादा शक्तिशाली था। अलस्सुबह वह कॉलबेल की पहली कर्कश ध्वनि के साथ जग जाता और रात बारह के टन-टन घंटे के साथ सोता। बीजी घर में इस रूटीन की चौकीदार तैनात थीं। घर की दिनचर्या में ज़रा-सी भी देर-सबेर उन्हें बर्दाश्त नहीं थी। शिखा जैसे-तैसे रोज़ के काम निपटाती और जब समस्त घर सो जाता, हाथ-मुँह धो, कपड़े बदल एक बार फिर अपना दिन शुरू करने की कोशिश करती। उसे सोने में काफ़ी देर हो जाती और अगली सुबह उठने में भी। उसके सभी आगमी काम थोड़े पिछड़ जाते। बीजी का हिदायतनामा शुरू हो जाता, यह आधी-आधी रात तक बत्ती जलाकर क्या करती रहती है तू। ऐसे कहीं घर चलता है! ससुर 194 में सीखा हुआ मुहावरा टिका देते, “अर्ली टु बेड एंड अर्ली टु राइज़ वग़ैरह-वग़ैरह। हिदायतें सही होती पर शिखा को बुरी लगतीं। वह बेमन से झाडू-झाड़न पोचे का रोज़नामचा हाथ में उठा लेती जबकि उसका दिमाग़ किताब, काग़ज़ और कलम की माँग करता रहता। कभी-कभी छुट्टी के दिन कपिल घर के कामों में उसकी मदद करता। बीजी उसे टोक देतीं, ये औरतों वाले काम करता तू अच्छा लगता है। तू तो बिलकुल जोरू का ग़ुलाम हो गया है।'

 

घर में एक सहज और सघन संबंध को लगातार ठोंक-पीठकर यांत्रिक बनाया जा रहा था। एकांत में जो भी तन्मयता पति-पत्नी के बीच जन्म लेती, दिन के उजाले में उसकी गर्दन मरोड़ दी जाती। बीजी को संतोष था कि वे परिवार का संचालन बढ़िया कर रही हैं। वे बेटे से कहतीं, “तू फ़िकर मत कर। थोड़े दिनों में मैं इसे ऐन पटरी पर ले आऊँगी।”

पटरी पर शिखा तब भी नहीं आई अब दो बच्ची की माँ हो गई। बस इतना भर हुआ कि उसने अपने सभी सवालों का रुख़ अन्य लोगों से हटाकर कपिल और बच्चों की तरफ़ कर लिया। बच्चे अभी कई सवालों के जवाब देने लायक़ समझदार नहीं हुए थे, बल्कि लाड-प्यार में दोनों के अंदर एक तर्कातीत तुनकमिजाज़ी आ बैठी थी। स्कूल से आकर वे दिन-भर वीडियो देखते, गाने-सुनते, आपस में मार-पीट करते और जैसे-तैसे अपना होमवर्क पार लगाकर सो जाते। कपिल अपने व्यवसाय से बचा हुआ समय अख़बारों, पत्रिकाओं और दोस्तों में बिताता। अकेली शिखा घर की कारा में क़ैद घटनाहीन दिन बिताती रहती। वह जीवन के पिछले दस सालों और अगले बीस सालों पर नज़र डालती और घबरा जाती। क्या उसे वापस अग्नि शिखा की बजाय दीपशिखा बनकर ही रहना होगा, मद्धिम और मधुर-मधुर जलना होगा। वह क्या करे अगर उसके अंदर तेल की जगह लावा भरा पड़ा है।

 

उसे रोज़ लगता कि उन्हें अपना जीवन नए सिरे से शुरू करना चाहिए। इसी उद्देश्य से उसने कपिल से कहा, क्यों नहीं हम दो-चार दिन को कहीं घूमने चलें।

कहाँ?

 

कहीं भी। जैसे जयपुर या आगरा।”

वहाँ हमें कौन जानता है। फ़िज़ूल में एक नई जगह जाकर फँसना।

 

वहाँ देखने को बहुत कुछ है। हम घूमेंगे, कुछ नई और नायाब चीज़ें ख़रीदेंगे, देखना, एकदम फ़्रेश हो जाएँगे।

ऐसी सब चीज़ें यहाँ भी मिलती हैं, सारी दुनिया का दर्शन जब टी.वी. पर हो जाता है तो वहाँ जाने में क्या तुक है?

 

तुक के सहारे दिन कब तक बिताएँगे?

बच्चों ने इस बात का मज़ाक बना लिया “कल को तुम कहोगी, अंडमान चलो, घूमेंगे।”

 

इसका मतलब अब हम कहीं नहीं जाएँगे, यहीं पड़े-पड़े एक दिन दरख़्त बन जाएँगे।

तुम अपने दिमाग़ का इलाज कराओ, मुझे लगता है तुम्हारे हॉरमोन बदल रहे हैं।

 

मुझे लगता है, तुम्हारे भी हॉरमोन बदल रहे हैं।

तुम्हारे अंदर बराबरी का बोलना एक रोग बनता जा रहा है। इन ऊलजलूल बातों में क्या रखा है?

 

शिखा याद करती वे प्यार के दिन जब उसकी कोई बात बेतुकी नहीं थी। एक इंसान को प्रेमी की तरह जानना और पति की तरह पाना कितना अलग था। जिसे उसने निराला समझा वहीं कितना औसत निकला। वह नहीं चाहता जीवन के ढर्रे में कोई नयापन या प्रयोग। उसे एक परंपरा चाहिए जी-हुज़ूरी की। उसे एक गाँधारी चाहिए जो जानबूझकर न सिर्फ़ अंधी हो बल्कि गूँगी और बहरी भी।

बच्चों ने बात दादी तक पहुँचा दी। बीजी एकदम भड़क गईं, “अपना काम-धंधा छोड़ कर काका जयपुर जाएगा, क्यों, बीवी को सैर कराने। एक हम थे, कभी घर से बाहर पैर नहीं रखा।

 

और अब जो आप तीर्थ के बहाने घूमने जाती हैं वह? शिखा से नहीं रहा गया तीरथ को तू घूमना कहती है! इतनी ख़राब जुबान पाई है तूने, कैसे गुज़ारा होगा तेरी गृहस्थी का!

काश गोदरेज कम्पनी का कोई ताला होता मुँह पर लगानेवाला, तो ये लोग उसे मेरे मुँह पर जड़कर चाबी सेफ़ में डाल देते, शिखा ने सोचा, “सच ऐसे कब तक चलेगा जीवन।

 

बच्चे शहजादों की तरह बर्ताव करते। नाश्ता करने के बाद जूठी प्लेटें कमरे में पड़ी रहतीं मेज़ पर। शिखा चिल्लाती, यहाँ कोई रूम सर्विस नहीं चल रही है, जाओ, अपने जूठे बर्तन रसोई में रखकर आओ।

नहीं रखेंगे, क्या कर लोगी, बड़ा बेटा हिमाक़त से कहता।

 

न चाहते हुए भी शिखा मार बैठती उसे।

एक दिन बेटे ने पलटकर उसे मार दिया। हल्के हाथ से नहीं, भरपूर घूँसा मुँह पर। होठ के अंदर एक तरफ़ का माँस बिलकुल चिथड़ा हो गया। शिखा सन्न रह गई। न केवल उसके शब्द बंद हो गए, जबड़ा भी जाम हो गया। बर्तन बेटे ने फिर भी नहीं उठाए, वे दोपहर तक कमरे में पड़े रहे। घर भर में किसी ने बेटे को ग़लत नहीं कहा।

 

बीजी एक दर्शक की तरह वारदात देखती रहीं। उन्होंने कहा, हमेशा ग़लत बात बोलती हो, इसी से दूसरे का ख़ून खौलता है। शुरू से जैसी तूने ट्रेनिंग दी, वैसा वह बना है। ये तो बचपन से सिखानेवाली बातें हैं। फिर तू बर्तन उठा देती तो क्या घिस जाता।

उन्हीं के शब्द शिखा के मुँह से निकल गए, “अगर ये रख देता तो इसका क्या घिस जाता।

 

बदतमीज़ कहीं की, बड़ों से बात करने की अक़ल नहीं है। बीजी ने कहा।

ससुर ने सारी घटना सुनकर फिर 194 का एक मुहावरा टिका दिया, एज यू सो, सो शैल यू रीप

 

कपिल ने कहा, पहले सिर्फ़ मुझे सताती थीं, अब बच्चों का भी शिकार कर रही हो।

शिकार तो मैं हूँ, तुम सब शिकारी हो, शिखा कहना चाहती थी पर जबड़ा एकदम जाम था। होंठ अब तक सूज गया था। शिखा ने पाया, परिवार में परिवार की शर्तों पर रहते-रहते न सिर्फ़ वह अपनी शक्ल खो बैठी है वरन अभिव्यक्ति भी। उसे लगा वह ठूस ले अपने मुँह में कपड़ा या सी डाले इसे लोहे के तार से। उसके शरीर से कहीं कोई आवाज़ न निकले। बस, उसके हाथ-पाँव परिवार के काम आते रहें। न निकलें इस वक़्त मुँह से बोल लेकिन शब्द उसके अंदर खलबलाते रहेंगे। घर के लोग उसके समस्त रंध्र बंद कर दें फिर भी ये शब्द अंदर पड़े रहेंगे, खौलते और खदकते। जब मृत्यु के बाद उसकी चीर-फाड़ होगी, तो ये शब्द निकल भागेंगे शरीर से और जीती-जागती इबारत बन जाएँगे। उसके फेफड़ों से, गले की नली से, अंतड़ियों से चिपके हुए ये शब्द बाहर आकर तीखे, नुकीले, कँटीले, ज़हरीले असहमति के अग्रलेख बनकर छा जाएँगे घर भर पर। अगर वह इन्हें लिख दे तो एक बहुत तेज़ एसिड का आविष्कार हो जाए। फिलहाल उसका मुँह सूजा हुआ है, पर मुँह बंद रखना चुप रहने की शर्त नहीं है। ये शब्द उसकी लड़ाई लड़ते रहेंगे।

 

ममता कालिया

#समाजकीबात #samajkibaat #Sahitya #साहित्य समाजकीबात samajkibaat Sahitya साहित्य

#कृष्णधरशर्मा #Krishnadharsharma कृष्णधरशर्मा Krishnadharsharma