नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

बुधवार, 15 मई 2019

माँ के लिए- हेमधर शर्मा

 "पर एक बात कहूँ माँ! 

तुम्हारा सहयोग अगर मिले न, 

तो जी मैं अब भी सकता हूँ। 

बस एक बार तुम मेरी दुश्चिंता छोड़ दो 

और फिर देखो कि मैं क्या नहीं कर सकता हूँ 

तुम मेरे घर में स्वर्ग देखना चाहती हो माँ 

पर मैं तो सारी दुनिया को स्वर्ग बना देना चाहता हूँ 

आखिर तुम्हारी करुणा ने ही तो मेरे अंदर 

विस्तार पाया है"

 (माँ के लिए- हेमधर शर्मा)




#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात

 


शनिवार, 11 मई 2019

दूसरी नाक

 लड़के पर जवानी आती देख जब्बार के बाप ने पड़ोस के गाँव में एक लड़की तजवीज़ कर ली। लेकिन जब्बार ने हस्बा की लड़की शब्बू को जो पानी भर कर लौटते देखा, तो उसकी सुध-बुध जाती रही।

जैसे कथा कहानी में कहा जाता है कि शाहज़ादा नदी में बहता हुआ सोने का एक बाल देख सोने के केशधारी सुंदरी के प्रेम से आहत महल की अटारी में उपवास कर लेट गया था; बहुत कुछ वैसा ही हाल जब्बार का भी हुआ। मुँह से तो कुछ कह न सका पर शिथिल शरीर, चेहरे का रंग उड़ा हुआ, कुछ खोया-खोया सा वह रहने लगा।

 

माँ-बाप ने उसकी हालत देखकर सलाह की। मुँह-दर-मुँह नहीं पर उसे सुना दिया कि ब्याह जल्दी ही उसका हो जाएगा। लड़की भी बच्चा नहीं, बिलकुल जवान है। शमसल की बड़ी बेटी जहुन्ना आस-पास के चार गावों में एक ही लड़की है। पानी का बड़ा मटका सिर पर उठाकर धमकती दो मील चली जाती है। घर भर का काम सँभालती है अभी से! यहाँ आ जाएगी तो जब्बार की माँ को भी चैन मिलेगा। बूढ़ी हो गई बेचारी। पर जब्बार को इससे कुछ तसल्ली न हुई। वह अक्सर लंबी-लंबी आहे खींचकर चुपचाप पड़ा रहता।

एक रोज़ माँ ने आँखों में आँसू भर अपनी क़सम धराकर पूछा—तो उसने सच कह दिया। जहुन्ना की बात सुनने से भी उसने इनकार करके कहा—”यातो हस्बा की बेटी शब्बू, नहीं तो बस!...कुछ नहीं।”

 

माँ-बाप ने बहुत समझाया। उसे सुनता देखते तो आपस में जहुन्ना की तारीफ़ और शब्बू की निंदा करने लगते। फिर जो लोग ऐसी बेशर्मी से ब्याह करते हैं उनकी कितनी निंदा होती है, यह सब वे लड़के को काकोक्ति, अलंकार और रूपक द्वारा समझाकर हार गए। पर धुन का पक्का जब्बार न माना तो न माना।

बेटे की ज़िद्द से हार मान बूढ़ा गफ़्फ़ार एक रोज़ हस्बा से बात करने गया। जब वह लौटकर आया तो क्रोध से उसकी आँखें लाल और ग्लानि से चेहरा विरूप हो रहा था। बंदूक़ कोने में रख, कंधे की चादर ज़मीन पर फेंक वह ज़मीन पर ही बैठ गया।

 

जब्बार की माँ ऊँटों को बेरी की पत्तियाँ खिला रही थी। तुरंत बूढ़े के समीप दौड़ी आई। जब्बार दूर से ही उत्सुक कान लगाए था। बूढ़ा मानो फट पड़ा—“ऐसे नालायक़ बेटे से बेऔलाद भला!”

जब्बार की माँ ने घबराकर बेटे की बलाएँ अपने सिर लेते हुए नाक पर हाथ रख कर पूछा—”हाय-हाय! हुआ क्या?”

 

बूढ़े ने कहा—“होगा क्या? ऐसे बे-शर्म बे-ग़ैरत लड़के से और होगा क्या? तमाम इज़्ज़त ख़ाक में मिल गई और घर मिट्टी में मिल जाएगा।”

माँ ने फिर बलाएँ लेकर पूछा—“हाय हुआ क्या? ऐसा क्यों कहते हो!”

 

बाप ने कहा—“अगर इसके ऐसे ही मिज़ाज थे तो यह क़लात के ख़ान के यहाँ पैदा क्यों नहीं हुआ? जानती है, हस्बा ने क्या कहा? सीधे मुँह से बात भी न की। कहती है, शब्बू की बात तुम मत सोचो। उसे वह ब्याहेगा जो अढ़ाई सौ रुपए की गठरी बाँधकर लाएगा।”

अढ़ाई सौ रुपए की बात सुन जब्बार की माँ की आँखें ऊपर चढ़ गई। बूढ़ा बोला—“तू भी बूढ़ी हो गई। तू ही बता-तूने कभी ऐसा तूफ़ान सुना है; उमर में?...अढ़ाई सौ रुपए!...कोई चीज़ ही नहीं होती?”

 

शमसल से मैंने जहुन्ना के लिए बात की थी। उसने लड़की के अस्सी माँगे थे, आख़िर साठ पर तैयार है। उसकी लड़की भी एक आदमी है। और वह बदज़ात माँगता है—अढ़ाई सौ। और फिर तू बूढ़ी हो गई; तू ही बता, रंग ज़रा मैला हुआ तो क्या, और ज़रा साफ़ हुआ तो क्या? औरत औरत सब एक। तुझे अपने काम से मतलब कि रंग से? अभी छः महीने नहीं हुए इसके लिए बंदूक़ ख़रीदी थी तो वह ऊँट बेचा था। अड़ाई सौ रुपए उमर भर में कमा तो पाएगा नहीं और शान यह है! अच्छा तू ही बता—इतनी बूढ़ी हुई, अढ़ाई सौ रुपए कभी औरत के दाम सुने हैं?...अढ़ाई सौ रुपए में तो फिरंगी की तोप ख़रीदी जाती है।”

जब्बार ने सुना और आह को सीने में दबाकर करवट बदल ली।

 

***

एकलौते बेटे का यूँ दिन-रात बिसूरना माँ-बाप से देखा न गया। बूढ़े ने कहा—“मेरा क्या है? पका फल हूँ! कब टपक पड़ूँ? जो कुछ है इसी के लिए है। रोज़ी का सहारा ये दो ऊँट हैं ये भी जाएँगे तो फिर ख़ुद ही फिरंगियों की सड़क पर रोड़ी कूटने की मज़दूरी करेगा। लोग यही कहेंगे कि गफ़्फ़ार का बेटा मज़दूरी करने लगा, सो इसकी क़िसमत! मैं क्या सदा बैठा रहूँगा?”

 

आख़िर दोनों ऊँट भी बन्नू के बाज़ार में बेच दिए गए और शब्बू जब्बार की बहू बन के घर आ गई।

शब्बू को इस बात का कम गर्व नहीं था कि उसकी क़ीमत गिन कर अढ़ाई सौ रुपए चुकाई गई है। पानी भरने जाती तो आधा ही घड़ा लेकर लौटती, वह भी लचकती, बलखाती। पड़ोस की मीरन ने समझाया—“ऐसा नख़रा ठीक नहीं। मर्दों को काम प्यारा होता है। किसी रोज़ ऐसी मार पड़ेगी कि कमर सदा को लचक जाएगी।”

 

अपनी कान तक फैली आँखें मटकाकर और हाथ का अँगूठा दिखाकर शब्बू ने कहा—“ओहो! मेरे बाप ने बारह बीसे और दस रुपए गिन कर मुझे मार खाने को ही तो यहाँ भेजा है? कोई मुझे हाथ तो लगाए? तेरा क्या है? तेरे मर्द ने तीन बीसे में तुझे लिया है।...लँगड़ी लूली हो जाएगी तो एक और सही।”

ग़ज़ब की शोख़ और शौक़ीन थी शब्बू! वह काले मख़मल की वास्कट पहरती जिसकी सिलाइयों पर सीप के तीन सौ बटन टँके थे। अपने बालों में मक्खन लगाती और बाहर जाने से पहले पानी का हाथ लगाकर उन्हें सवार लेती। महीने में दो-दो बेर अपने बाल धोती।

 

जब्बार की माँ यह सब देखती और नाक पर हाथ रख पढ़ोसिन से कहतीं—“देखो तो, अढ़ाई सौ रुपए देकर ब्याह किया पर मुझे क्या आराम मिला? इसे तो अपने नख़रों से ही छुट्टी नहीं।”

***

 

बूढ़े ने बेटे को समझाया “जवानी की तेरी उमर है। कुछ कमाई अब नहीं करेगा तो कैसे निबाह होगा। यूँ घर बैठा रहना क्या तुझे सोहाता है! रोज़ी का एक ज़रिया मेरे ऊँट थे, सो तेरे ब्याह में ख़तम हो गए। अब भी तू कुछ नहीं करेगा तो क्या मैं परदेस जाकर मज़दूरी करूँगा?

मन मार कर जब्बार को कमाई करने बन्नू जाना पड़ा, लेकिन मन उसका गाँव में ही रहता। पूरा सप्ताह जब्बार को बन्नू गए नहीं हुआ था कि वह शब्बू की याद से बेकल हो एक दिन आधी रात में उठ अपने गाँव को चल दिया।

 

सोलह मील चलकर जब उसे ऊषा की अस्पष्ट लाल आभा में पहाड़ी पर अपने गाँव की छतें दिखाई दीं तो वह ठिठक गया। अपने गाँव की क्रुद्ध मूर्ति और पड़ोसियों की लाँछना के विचार ने उसके पैरों में बेड़ियाँ डाल दीं। वह एक चट्टान पर बैठ अपने घर के दरवाज़े की ओर देखने लगा। उसने सोचा—पानी भरने शब्बू निकलेगी तब वह उसे एक आँख देख सकेगा। बावड़ी पर चलकर बैठूँ, शब्बू पानी भरने आएगी तो उससे दो बातें करके लौट जाऊँगा।

शब्बू पानी लेने आई तो दो सहेलियों के साथ। जब्बार तीस क़दम पर एक पत्थर की ओट में बैठ धड़कते हुए दिल से देखता रहा पर एक शब्द बोल न सका। बोलता कैसे? वह दोनों पड़ोसिने बदनाम कर देतीं। दिल पर पत्थर रखे जब्बार देखता रहा, शब्बू सहेलियों से चुहल करती, मटकती लौट गई। जब्बार आहें भरता बन्नू लौट गया।

 

जब्बार के विरह की आग में ईर्षा का घी पड़ गया। उसने सोचा देखो, मैं यहाँ परदेश में अकेला मर रहा हूँ और वह मौज करती है। उसे मेरा ज़रा भी ग़म नहीं। औरत की ज़ात में वफ़ा नहीं होती।

आठ दस दिन बाद यह फिर रातों रात सफ़र कर शब्बू को एक पलक देख सकने और एक चुंबन पा सकने की आशा में गाँव की बावली पर आकर बैठ गया। परंतु वह अकेली नहीं आई। पड़ोस की तीन सहेलियों के साथ अठखेलियाँ करती आई। जब्बार उनकी बात को कान लगाकर सुन रहा था।

 

मीरन ने शब्बू की ठोड़ी छूकर कहा—“हाय रे तेरा नख़रा। गाँव के छैले तुझ पर जान दे रहे हैं, क़सम तेरे सिर की!”

शब्बू के चेहरे पर गर्व से सुरूर छा गया। वे पानी लेकर लौट गई। जब्बार की छाती पर मानो सौ मन का पत्थर आ गिरा, पर बेबस था।

 

अब उसके मन में संदेह का अंकुर और जमा। संदेह मनुष्य के हृदय में आकाश बेल की तरह बढ़ता है। उसके लिए जड़ या बुनियाद की भी ज़रूरत नहीं। वह कल्पना के आकाश में ही पुष्ट होता है। संदेह को निश्चय का रूप लेते भी देर नहीं लगती।

गाँव में ऐसे कई लौंडे लुँगाड़े थे, जिन्हें फ़ितूर के अलावा कुछ काम न था। रहमान और अब्बास से हर एक बात की आशा रखी जा सकती थी। और फिर यदि कुछ दाल में काला नहीं है तो मीरन ऐसी चर्चा क्यों कर रहीं थी? और शब्बू की यह चटक-मटक किसके लिए है? देखो, उसे मेरा ज़रा भी ग़म नहीं! और मैं मरा जा रहा हूँ! जब्बार लहू के घूँट पी-पी कर रह जाता।

 

उसने सोचा, रुपया कमाने के लिए ही तो वह घर से दूर यहाँ पड़ा है। यूँ आठ आने-दस आने रोज़ में रुपया नहीं कमाया जा सकता। घर लौटने की आग ने उसे बावला कर दिया। एक दिन मौक़ा देख उसने एक हाथ मार ही दिया। क़िसमत अच्छी थी। वह पकड़ा भी नहीं गया और डेढ़ सौ रुपया कमाकर डेढ़ महीने में घर लौट आया। जब्बार के बाप को हौसला हो गया, बेटा भूखा नहीं मरेगा।

***

 

जैसे नील का दाग़ कपड़े को नहीं छोड़ता वैसे ही जिस मन में संदेह एक बार प्रवेश कर जाता है, उसे छोड़ता नहीं। जब्बार ने शब्बू से पूछा—“क्यों? जब मैं बन्नू में था तो ख़ूब मज़े उड़ते थे?।”

शब्बू भी निरी मज़दूरिन न थी। चमक कर उसने पूछा—“कैसे मज़े? किससे मज़े उड़ते थे”

 

जब्बार ने कहा—“क्यों गाँव में क्या कम आदमी हैं! रहमान है, अब्बास है। ख़ूब बनाव-सिंगार से पानी लेने जाना होता था, क्यों?”

शब्बू ने कहा—“मैंने कभी किसी मरे की तरफ़ आँख उठाकर देखा हो तो मैं मर जाऊँ, नहीं मुझ पर झूठा इल्ज़ाम लगाने वाला मर जाए!”

 

जब्बार ने तड़प कर पूछा—“तू बन ठनकर अपना हुस्न दिखाने नहीं जाती थी?”

शब्बू ने उत्तर दिया—“मैं क्यों जाऊँगी दिखाने किसी को?...कोई मरा घूरा करे तो मेरा क्या क़सूर?”

 

जब्बार ने चुटिया कर पूछा—“तो तू यूँ बन ठनकर दिखाने को निकलती क्यों है?”

अपने सौंदर्य के अभिमान में सिर ऊँचा कर शब्बू ने कहा—“मैं क्या करती हूँ?... क्या मुँह काला कर लूँ?...मैं जैसी हूँ वैसी हूँ।”

 

जब्बार बड़े यत्न से शब्बू की चौकसी करने लगा। वह शब्बू से सौ क़दम दूर पर भी आदमी देख पाता तो उसे यही संदेह होता कि वह उससे आँख लड़ा रहा है। कुछ दिन में उसका खाना-पीना हराम हो गया। किसी मुसाफ़िर को गाँव से गुज़रते देखकर भी उसे यह शंका होती कि संभव है शब्बू के रूप की ख्याति सुनकर ही यह आदमी बहाने से इधर आया है। सारा गाँव उसे शब्बू के पीछे पागल दिखाई पड़ने लगा।

एक रात जब्बार ने शब्बू से पूछा—“आज तू बाहर से लौट रही थी तब राह में मुस्कुरा क्यों रही थी?”

 

उत्तर में शब्बू ने पूछा—“मैं कहाँ मुस्कुरा रही थी?”

जब्बार ने कहा—“और वे सब आदमी खड़े हुए क्यों देख रहे थे?”

 

अपने रूप की महिमा के संकेत से पुलकित होकर शब्बू ने उपेक्षा से उत्तर दिया—“मैं क्या जानूँ?”

होंठ काटकर जब्बार ने कहा—“बहुत घमंड होगा हुस्न का!... नाक काट लूँगा?”

 

शब्बू का मन गुदगुदा उठा। उसने कह दिया—“बारह बीसे और दस रुपए की नाक है!” और मन-मन मुस्कुराने लगी।

शब्बू सो गई। परंतु जब्बार की आँखों में नींद कहाँ। उसने पुकारा—“सुन तो!” उत्तर नदारद।

 

जब्बार ने सोचा—देखो तो घमंड इसका!...“मैं बेचैन पड़ा हूँ और यह मज़े में सो रही है। यह सब घमंड हुस्न का है। इसी हुस्न के पीछे गाँव के बदमाश पागल हैं। मेरी क्या आबरू है? अगर यह हुस्न न होता तो क्या मेरी आबरू यूँ मिट्टी में मिलती?...ऐसे हुस्न से क्या फ़ायदा?

गंभीर होकर इस समस्या पर विचार कर उसने सोचा—आबरू नहीं तो कुछ नहीं। और यह हुस्न तो सब लोग देखते हैं। मेरा इस पर क्या क़ब्ज़ा? जब तक यह हुसन रहेगा तब तक मुझे आबरू और चैन कहाँ मिल सकता है?

 

रात के सन्नाटे में जो विचार उठते हैं वे बहुत उग्र होते हैं। दिन की तरह उस समय विचारों को बाधित करने वाली सैंकड़ों उलझनें नहीं रहती। इसीलिए भक्त समाधि रात में लगाते हैं, क़ातिल क़त्ल रात में करते हैं और चोर चोरी रात में करते हैं और विरही भी रात में ही पागल हो उठते हैं।

जब्बार अँधेरे में आँख खोले शब्बू के रूप के कारण होने वाले सब अनर्थ पर विचार कर रहा था। वह अनर्थ उसे अपरिमेय जान पड़ा। उसे सहन करना बिलकुल संभव न था।

 

उसने सिरहाने से पैना छुरा उठाया और अँधेरे में टटोल कर शब्बू की नाक पकड़ ली। एक ही झटके में नाक काटकर उसने फेंक दी।

शब्बू चीख़ उठी। जब्बार की माँ उठकर दौड़ी। रोशनी जलाई गई। पड़ोस के लोग दौड़ आए। जब्बार का बाप ग़ुस्से में गालियाँ दे रहा था और दूसरे लोग इलाज बता रहे थे। एक बुढ़िया ने चिल्ला कर कहा—“अरे जल्दी से कोई भेड़ बकरी का ताज़ा, गर्म-गर्म, ज़िंदा गोश्त का टुकड़ा काटकर नाक पर रखो नहीं तो लड़की मर जाएगी!”

 

जब्बार की माँ ने घबराकर कहा—“इस वक़्त भेड़-बकरी कहाँ?” बुढ़िया ने उत्तर दिया—“तो तुम जानो।”

जब्बार खड़ा सुन रहा था। शब्बू की नाक उसने इसलिए काटी थी कि वह केवल उसी की होकर रहे। दूसरों की आँख उस पर पड़ना भी उसे सह्य न था। वह शब्बू को केवल अपने ही लिए रखना चाहता था। दूसरे की आँख उस पर पड़ने से उसके दिल पर घाव लगता था। उसके मर जाने की संभावना सुन उसका दिल दहल गया।

 

ज़िंदा गरम गोश्त नहीं मिलेगा तो क्या...! उसने वही पैना छुरा उठाया और अपनी जाँघ से ज़िंदा गरम गोश्त का टुकड़ा काट कर शब्बू की नाक पर धर दिया। जब्बार के माँ और बाप बिलकुल पागल हो बैठे और दूसरे लोग हैरान रह गए।

***

 

शब्बू चेहरे पर घाव के दर्द के मारे खाट पर पड़ी कराहती रहती और जब्बार जाँघ में पट्टी बाँधे खाट की पटिया पर बैठा शब्बू के चेहरे पर से मक्खियाँ हाँका करता। ज़ख़्म के कारण शब्बू का तमाम चेहरा सूझ गया। पानी का घूँट तक निगलना उसके लिए दूभर हो गया, तिस पर बुख़ार! यह हालत देखी तो जब्बार ने उसका इलाज बन्नू के फिरंगी डाक्टर वाले अस्पताल में कराने का निश्चय किया। स्वयं बड़ी कठिनाई से वह चल पाता था परंतु एक रात जब सब लोग सो रहे थे, उसने शब्बू को कंधे पर उठा लिया और बग़ल में लाठी ले वह बन्नू के लिए चल पड़ा।

वह कुछ दूर चलता और सुस्ता लेता। कपड़ा भिगोकर पानी की बूंदें शब्बू के मुँह में टपकाता जाता। पाँचवें दिन वे लोग बन्नू के अस्पताल में पहुँच गए। बीस रोज़ में शब्बू का ज़ख़्म भर पाया और उसकी तबीअत ठिकाने पाई।

 

***

नाक न रहने पर हवा होटों की अपेक्षा नाक के छेद से अधिक निकल जाती है और स्वर बिलकुल नक्की (प्लुत अनुस्वार) हो जाता है। उसी स्वर में मिनमिना कर शब्बू ने कहा—“मेम साहब कहती हैं विलायत से रबड़ की नाक मँगवाई जा सकती है।”

 

जब्बार ने घबराकर उत्तर दिया—“बस रहने दे। हमें नाक नहीं चाहिए। मुझे तू बिना नाक के ही भली मालूम होती है। मुझे क्या नाक औरों को दिखानी है?”

शब्बू उदास हो गई। उसने खाना खाने से इनकार कर दिया। जब्बार के लिए बड़ी भयंकर समस्या आ पड़ी। उसने सोचा बुरा हो इस मेम का। मैंने एक नाक काटी थी, वह दूसरी बनाने को तैयार है।

 

जब दो दिन शब्बू ने खाना नहीं खाया तो जब्बार ने रबड़ की नाक की क़ीमत चालीस रुपए डाक्टर के यहाँ जमा करादी। पर शर्त एक रही कि शब्बू नाक लगाएगी ज़रूर लेकिन ग़ैर मर्द अगर उसे घूरने लगे तो झट नाक उतार कर जेब में डाल ले।

यशपाल

#समाजकीबात #samajkibaat #Sahitya #साहित्य

#कृष्णधरशर्मा #Krishnadharsharma 

 

मंगलवार, 7 मई 2019

मेजर संजय चतुर्वेदी -51 किताबें ग़ज़लों की- नीरज गोस्वामी

"घर के चौकीदार हुए दादा-दादी 

सब के पहरेदार हुए दादा-दादी 

कौन ख़रीदे नहीं रहे पढ़ने वाले 

उर्दू के अख़बार हुए दादा-दादी 

घर में उनका नहीं रहा हिस्सा कोई 

कपड़ों वाला तार हुए दादा-दादी"

मेजर संजय चतुर्वेदी  (51 किताबें ग़ज़लों की- नीरज गोस्वामी) 



#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात

 


शनिवार, 4 मई 2019

डाली मोगरे की- नीरज गोस्वामी

"तीर खंज़र की न अब तलवार की बातें करें 

ज़िन्दगी में आइये बस प्यार की बातें करें 

टूटते रिश्तों के कारण जो बिखरता जा रहा 

अब बचाने को उसी घर बार की बातें करें 

थक चुके हैं हम बढ़ाकर यार दिल की दूरियाँ 

छोड़कर तक़रार अब मनुहार की बातें करें 

काश 'नीरज' हो हमारा भी ज़िगर इतना बड़ा 

जेब ख़ाली हो मगर सत्कार की बातें करें 

(डाली मोगरे की- नीरज गोस्वामी)




#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात

 


शनिवार, 27 अप्रैल 2019

ये मन नम है- पुष्पेन्द्र फाल्गुन

"ईश्वर के होने, नहीं होने का जितना झगड़ा इस धरती पर होता आया है, उतना किसी और चीज के लिए नहीं हुआ। प्रेम के लिए भी नहीं। जबकि, जो चीज इंसान को सौ में से निन्यानवे दफा सुकून देती है, वह प्रेम ही है। पर लोग ईश्वर के अस्तित्व को लेकर न सिर्फ लड़ रहे हैं, बल्कि एक-दूसरे के अस्तित्व के लिए भी संकट बन गए हैं। इंसान ईश्वर के बिना रह सकता है, प्रेम के बिना नहीं। ईश्वर को मानने वाले हों या कि नकारने वाले सभी को प्रेम चाहिए। (ये मन नम है- पुष्पेन्द्र फाल्गुन)



#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात

 


बुधवार, 24 अप्रैल 2019

जो बीत गई सो बात गई


जीवन में एक सितारा था

माना वह बेहद प्यारा था

वह डूब गया तो डूब गया

अम्बर के आनन को देखो

कितने इसके तारे टूटे

कितने इसके प्यारे छूटे

जो छूट गए फिर कहाँ मिले

पर बोलो टूटे तारों पर

कब अम्बर शोक मनाता है

जो बीत गई सो बात गई



जीवन में वह था एक कुसुम

थे उसपर नित्य निछावर तुम

वह सूख गया तो सूख गया

मधुवन की छाती को देखो

सूखी कितनी इसकी कलियाँ

मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ

जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली

पर बोलो सूखे फूलों पर

कब मधुवन शोर मचाता है

जो बीत गई सो बात गई



जीवन में मधु का प्याला था

तुमने तन मन दे डाला था

वह टूट गया तो टूट गया

मदिरालय का आँगन देखो

कितने प्याले हिल जाते हैं

गिर मिट्टी में मिल जाते हैं

जो गिरते हैं कब उठतें हैं

पर बोलो टूटे प्यालों पर

कब मदिरालय पछताता है

जो बीत गई सो बात गई



मृदु मिटटी के हैं बने हुए

मधु घट फूटा ही करते हैं

लघु जीवन लेकर आए हैं

प्याले टूटा ही करते हैं

फिर भी मदिरालय के अन्दर

मधु के घट हैं मधु प्याले हैं

जो मादकता के मारे हैं

वे मधु लूटा ही करते हैं

वह कच्चा पीने वाला है

जिसकी ममता घट प्यालों पर

जो सच्चे मधु से जला हुआ

कब रोता है चिल्लाता है

जो बीत गई सो बात गई

 

हरिवंशराय बच्चन

#समाजकीबात #samajkibaat #Sahitya #साहित्य समाजकीबात samajkibaat Sahitya साहित्य

#कृष्णधरशर्मा #Krishnadharsharma कृष्णधरशर्मा Krishnadharsharma 

 

 

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

भटक जाते हैं वो लोग

 

एक ही चौखट पर सर झुके तो सुकून मिलता है

भटक जाते हैं वो लोग जिनके हजारों खुदा होते हैं

                       कृष्णधर शर्मा 16.4.19

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

राजा निरबंसिया

 ''एक राजा निरबंसिया थे”—माँ कहानी सुनाया करती थीं। उनके आसपास ही चार-पाँच बच्चे अपनी मुठ्ठियों में फूल दबाए कहानी समाप्त होने पर गौरों पर चढ़ाने के लिए उत्सुक-से बैठ जाते थे। आटे का सुंदर-सा चौक पुरा होता, उसी चौक पर मिट्टी की छः ग़ौरें रखी जातीं, जिनमें से ऊपरवाली के बिंदिया और सिंदूर लगता, बाक़ी पाँचों नीचे दबी पूजा ग्रहण करती रहतीं। एक ओर दीपक की बाती स्थिर-सी जलती रहती और मंगल-घट रखा रहता, जिस पर रोली से सथिया बनाया जाता। सभी बैठे बच्चों के मुख पर फूल चढ़ाने की उतावली की जगह कहानी सुनने की सहज स्थिरता उभर आती।

एक राजा निरबंसिया थे”, माँ सुनाया करती थीं, “उनके राज में बड़ी ख़ुशहाली थी। सब वरण के लोग अपना-अपना काम-काज देखते थे। कोई दुखी नहीं दिखाई पड़ता था। राजा के एक लक्ष्मी-सी रानी थी, चंद्रमा-सी सुंदर...और राजा को बहुत प्यारी। राजा राज-काज देखते और सुख-से रानी के महल में रहते...”

 

मेरे सामने मेरे ख़यालों का राजा था, राजा जगपती! तब जगपती से मेरी दाँतकाटी दोस्ती थी, दोनों मिडिल स्कूल में पढ़ने जाते। दोनों एक-से घर के थे, इसलिए बराबरी की निभती थी। मैं मैट्रिक पास करके एक स्कूल में नौकर हो गया और जगपती क़स्बे के ही वकील के यहाँ मुहर्रिर। जिस साल जगपती मुहर्रिर हुआ, उसी वर्ष पास के गाँव में उसकी शादी हुई, पर ऐसी हुई कि लोगों ने तमाशा बना देना चाहा। लड़कीवालों का कुछ विश्वास था कि शादी के बाद लड़की की विदा नहीं होगी। ब्याह हो जाएगा और सातवीं भाँवर तब पड़ेगी, जब पहली विदा की सायत होगी और तभी लड़की अपनी ससुराल जाएगी। जगपती की पत्नी थोड़ी-बहुत पढ़ी-लिखी थी, पर घर की लीक को कौन मेटे! बारात बिना बहू के वापस आ गई और लड़केवालों ने तय कर लिया कि अब जगपती की शादी कहीं और कर दी जाएगी, चाहें कानी-लूली से हो, पर वह लड़की अब घर में नहीं आएगी। लेकिन साल ख़त्म होते-होते सब ठीक-ठाक हो गया। लड़कीवालों ने माफ़ी माँग ली और जगपती की पत्नी अपनी ससुराल आ गई।

जगपती को जैसे सब-कुछ मिल गया और सास ने बहू की बलाइयाँ लेकर घर की सब चाबियाँ सौंप दीं, गृहस्थी का ढंग-बार समझा दिया। जगपती की माँ न जाने कब से आस लगाए बैठीं थीं। उन्होंने आराम की साँस ली। पूजा-पाठ में समय कटने लगा, दुपहरियाँ दूसरे घरों के आँगन में बीतने लगीं। पर साँस का रोग था उन्हें, सो एक दिन उन्होंने अपनी अंतिम घड़ियाँ गिनते हुए चंदा को पास बुलाकर समझाया था—“बेटा, जगपती बड़े लाड-प्यार का पला है। जब से तुम्हारे ससुर नहीं रहे, तब से इसके छोटे-छोटे हठ को पूरा करती रही हूँ…अब तुम ध्यान रखना।” फिर रुककर उन्होंने कहा था, “जगपती किसी लायक़ हुआ है, तो रिश्तेदारों की आँखों में करकने लगा है। तुम्हारे बाप ने ब्याह के वक़्त नादानी की, जो तुम्हें विदा नहीं किया। मेरे दुश्मन देवर-जेठों को मौक़ा मिल गया। तूमार खड़ा कर दिया कि अब विदा करवाना नाक कटवाना है।… जगपती का ब्याह क्या हुआ, उन लोगों की छाती पर साँप लोट गया। सोचा, घर की इज़्ज़त रखने की आड़ लेकर रंग में भंग कर दें।…अब बेटा, इस घर की लाज तुम्हारी लाज है।… आज को तुम्हारे ससुर होते, तो भला...” कहते कहते माँ की आँखों में आँसू आ गए, और वे जगपती की देखभाल उसे सौंपकर सदा के लिए मौन हो गई थीं।

 

एक अरमान उनके साथ ही चला गया कि जगपती की संतान को, चार बरस इंतज़ार करने के बाद भी वे गोद में न खिला पाईं। और चंदा ने मन में सब्र कर लिया था, यही सोचकर कि कुल-देवता का अंश तो उसे जीवन-भर पूजने को मिल गया था। घर में चारों तरफ़ जैसे उदारता बिखरी रहती, अपनापा बरसता रहता। उसे लगता, जैसे घर की अँधेरी, एकांत कोठरियों में यह शांत शीतलता है जो उसे भरमा लेती है। घर की सब कुंडियों की खनक उसके कानों में बस गई थी, हर दरवाज़े की चरमराहट पहचान बन गई थीं।…

एक रोज़ राजा आखेट को गए”, माँ सुनाती थीं, ''राजा आखेट को जाते थे, तो सातवें रोज़ ज़रूर महल में लौट आते थे। पर उस दफ़ा जब गए, तो सातवाँ दिन निकल गया, पर राजा नहीं लौटे। रानी को बड़ी चिंता हुई। रानी एक मंत्री को साथ लेकर खोज में निकलीं…”

 

और इसी बीच जगपती को रिश्तेदारी की एक शादी में जाना पड़ा। उसके दूर रिश्ते के भाई दयाराम की शादी थी। कह गया था कि दसवें दिन ज़रूर वापस आ जाएगा। पर छठे दिन ही ख़बर मिली कि बारात घर लौटने पर दयाराम के घर डाका पड़ गया। किसी मुख़बिर ने सारी ख़बरें पहुँचा दी थीं कि लड़कीवालों ने दयाराम का घर सोने-चाँदी से पाट दिया है…आख़िर पुश्तैनी ज़मींदार की इकलौती लड़की थी। घर आए मेहमान लगभग विदा हो चुके थे। दूसरे रोज़ जगपती भी चलनेवाला था, पर उसी रात डाका पड़ा। जवान आदमी, भला ख़ून मानता है! डाकेवालों ने जब बंदूक़ें चलाई, तो सबकी घिग्घी बंध गई पर जगपती और दयाराम ने छाती ठोककर लाठियाँ उठा लीं। घर में कोहराम मच गया।...फिर सन्नाटा छा गया। डाकेवाले बराबर गोलियाँ दाग़ रहे थे। बाहर का दरवाज़ा टूट चुका था। पर जगपती ने हिम्मत बढ़ाते हुए हाँक लगाई, ''ये हवाई बंदूक़ें इन ठेल-पिलाई लाठियों का मुक़ाबला नहीं कर पाएँगी, जवानो!”

पर दरवाज़े तड़-तड़ टूटते रहे, और अंत में एक गोली जगपती की जाँघ को पार करती निकल गई, दूसरी उसकी जाँघ के ऊपर कूल्हे में समा कर रह गई।

 

चंदा रोती-कलपती और मनौतियाँ मानती जब वहाँ पहुँची, तो जगपती अस्पताल में था। दयाराम के थोड़ी चोट आई थी। उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई थीं। जगपती की देखभाल के लिए वहीं अस्पताल में मरीज़ों के रिश्तेदारों के लिए जो कोठरियाँ बनीं थीं, उन्हीं में चंदा को रुकना पड़ा। क़स्बे के अस्पताल से दयाराम का गाँव चार कोस पड़ता था। दूसरे-तीसरे वहाँ से आदमी आते-जाते रहते, जिस सामान की ज़रूरत होती, पहुँचा जाते।

पर धीरे-धीरे उन लोगों ने भी ख़बर लेना छोड़ दिया। एक दिन में ठीक होनेवाला घाव तो था नहीं। जाँघ की हड्डी चटख गई थी और कूल्हे में ऑपरेशन से छः इंच गहरा घाव था।

 

क़स्बे का अस्पताल था। कंपाउंडर ही मरीज़ों की देखभाल रखते। बड़ा डॉक्टर तो नाम के लिए था या क़स्बे के बड़े आदमियों के लिए। छोटे लोगों के लिए तो कम्पोटर साहब ही ईश्वर के अवतार थे। मरीज़ों की देखभाल करने वाले रिश्तेदारों की खाने-पीने की मुश्किलों से लेकर मरीज़ की नब्ज़ तक संभालते थे। छोटी-सी इमारत में अस्पताल आबाद था। रोगियों को सिर्फ़ छः-सात खाटें थी। मरीज़ों के कमरे से लगा दवा बनाने का कमरा था, उसी में एक ओर एक आरामकुर्सी थी और एक नीची-सी मेज़। उसी कुर्सी पर बड़ा डॉक्टर आकर कभी-कभार बैठता था, नहीं तो बचनसिंह कंपाउंडर ही जमे रहते। अस्पताल में या तो फ़ौजदारी के शहीद आते या गिर-गिरा के हाथ-पैर तोड़ लेने वाले एक-आध लोग। छठे-छमासे कोई औरत दिख गई तो दीख गई, जैसे उन्हें कभी रोग घेरता ही नहीं था। कभी कोई बीमार पड़ती तो घरवाले हाल बता के आठ-दस रोज़ क़ी दवा एक साथ ले जाते और फिर उसके जीने-मरने की ख़बर तक न मिलती।

उस दिन बचनसिंह जगपती के घाव की पट्टी बदलने आया। उसके आने में और पट्टी खोलने में कुछ ऐसी लापरवाही थी, जैसे ग़लत बंधी पगड़ी को ठीक से बाँधने के लिए खोल रहा हो। चंदा उसकी कुर्सी के पास ही साँस रोके खड़ी थी। वह और रोगियों से बात करता जा रहा था। इधर मिनट-भर को देखता, फिर जैसे अभ्यस्त-से उसके हाथ अपना काम करने लगते। पट्टी एक जगह ख़ून से चिपक गई थी, जगपती बुरी तरह कराह उठा। चंदा के मुँह से चीख़ निकल गई। बचनसिंह ने सतर्क होकर देखा तो चंदा मुख में धोती का पल्ला खोंसे अपनी भयातुर आवाज़ दबाने की चेष्टा कर रही थी। जगपती एकबारगी मछली-सा तड़पकर रह गया। बचनसिंह की उँगलियाँ थोड़ी-सी थरथराई कि उसकी बाँह पर टप-से चंदा का आँसू चू पड़ा।

 

बचनसिंह सिहर-सा गया और उसके हाथों की अभ्यस्त निठुराई को जैसे किसी मानवीय कोमलता ने धीरे-से छू दिया। आहों, कराहों, दर्द-भरी चीख़ों और चटखते शरीर के जिस वातावरण में रहते हुए भी वह बिल्कुल अलग रहता था, फोड़ों को पके आम-सा दबा देता था, खाल को आलू-सा छील देता था...उसके मन से जिस दर्द का अहसास उठ गया था, वह उसे आज फिर हुआ और वह बच्चे की तरह फूँक-फूँककर पट्टी को नम करके खोलने लगा। चंदा की ओर धीरे-से निगाह उठाकर देखते हुए फुसफुसाया, “च्…च्...रोगी की हिम्मत टूट जाती है ऐसे।”

पर जैसे यह कहते-कहते उसका मन ख़ुद अपनी बात से उचंट गया। यह बेपरवाही तो चीख़ और कराहों की एकरसता से उसे मिली थी, रोगी की हिम्मत बढ़ाने की कर्तव्यनिष्ठा से नहीं। जब तक वह घाव की मरहम-पट्टी करता रहा, तब तक किन्हीं दो आँखों की करूणा उसे घेरे रही।

 

और हाथ धोते समय वह चंदा की उन चूड़ियों से भरी कलाइयों को बेझिझक देखता रहा, जो अपनी ख़ुशी उससे माँग रही थीं। चंदा पानी डालती जा रही थी और बचनसिंह हाथ धोते-धोते उसकी कलाइयों, हथेलियों और पैरों को देखता जा रहा था। दवाख़ाने की ओर जाते हुए उसने चंदा को हाथ के इशारे से बुलाकर कहा, “दिल छोटा मत करना जाँघ का घाव तो दस रोज़ में भर जाएगा, कूल्हे का घाव कुछ दिन ज़रूर लेगा। अच्छी से अच्छी दवाई दूँगा। दवाइयाँ तो ऐसी हैं कि मुर्दे को चंगा कर दें। पर हमारे अस्पताल में नहीं आतीं, फिर भी...”

तो किसी दूसरे अस्पताल से नहीं आ सकतीं वो दवाइयाँ?” चंदा ने पूछा।

 

आ तो सकती हैं, पर मरीज़ को अपना पैसा खरचना पड़ता है उनमें…” बचनसिंह ने कहा।

चंदा चुप रह गई तो बचनसिंह के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा, “किसी चीज़ क़ी ज़रूरत हो तो मुझे बताना। रही दवाइयाँ, सो कहीं न कहीं से इंतज़ाम करके ला दूँगा। महकमे से मँगाएँगे, तो आते-अवाते महीनों लग जाएँगे। शहर के डॉक्टर से मँगवा दूँगा। ताक़त की दवाइयों की बड़ी ज़रूरत है उन्हें। अच्छा, देखा जाएगा…” कहते-कहते वह रुक गया।

 

चंदा से कृतज्ञता भरी नज़रों से उसे देखा और उसे लगा जैसे आँधी में उड़ते पत्ते को कोई अटकाव मिल गया हो। आकर वह जगपती की खाट से लगकर बैठ गई। उसकी हथेली लेकर वह सहलाती रही। नाख़ूनों को अपने पोरों से दबाती रही।

धीरे-धीरे बाहर अँधेरा बढ़ चला। बचनसिंह तेल की एक लालटेन लाकर मरीज़ों के कमरे के एक कोने में रख गया। चंदा ने जगपती की कलाई दबाते-दबाते धीरे से कहा, “कंपाउंडर साहब कह रहे थे…” और इतना कहकर वह जगपती का ध्यान आकृष्ट करने के लिए चुप हो गई।

 

क्या कह रहे थे?” जगपती ने अनमने स्वर में बोला।

कुछ ताक़त की दवाइयाँ तुम्हारे लिए ज़रूरी हैं!”

 

मैं जानता हूँ।”

पर...”

 

देखो चंदा, चादर के बराबर ही पैर फैलाए जा सकते हैं। हमारी औक़ात इन दवाइयों की नहीं है ।”

औक़ात आदमी की देखी जाती है कि पैसे की, तुम तो...”

 

देखा जाएगा।”

कंपाउंडर साहब इंतज़ाम कर देंगे, उनसे कहूँगी मैं।”

 

नहीं चंदा, उधारखाते से मेरा इलाज नहीं होगा…चाहे एक के चार दिन लग जाएँ।”

इसमें तो…”

 

तुम नहीं जानतीं, क़र्ज़ कोढ का रोग होता है, एक बार लगने से तन तो गलता ही है, मन भी रोगी हो जाता है।”

लेकिन... ” कहते-कहते वह रुक गई।

 

जगपती अपनी बात की टेक रखने के लिए दूसरी ओर मुँह घुमाकर लेटा रहा।

और तीसरे रोज़ जगपती के सिरहाने कई ताक़त की दवाइयाँ रखी थीं, और चंदा की ठहरने वाली कोठरी में उसके लेटने के लिए एक खाट भी पहुँच गई थी। चंदा जब आई, तो जगपती के चेहरे पर मानसिक पीड़ा की असंख्य रेखाएँ उभरी थीं, जैसे वह अपनी बीमारी से लड़ने के अलावा स्वयं अपनी आत्मा से भी लड़ रहा हो। चंदा की नादानी और स्नेह से भी उलझ रहा हो और सबसे ऊपर सहायता करने वाले की दया से जूझ रहा हो।

 

चंदा ने देखा तो यह सब सह न पाई। उसके जी में आया कि कह दे, क्या आज तक तुमने कभी किसी से उधार पैसे नहीं लिए? पर वह तो ख़ुद तुमने लिए थे और तुम्हें मेरे सामने स्वीकार नहीं करना पड़ा था। इसीलिए लेते झिझक नहीं लगी, पर आज मेरे सामने उसे स्वीकार करते तुम्हारा झूठा पौरूष तिलमिलाकर जाग पड़ा है। पर जगपती के मुख पर बिखरी हुई पीड़ा में जिस आदर्श की गहराई थी, वह चंदा के मन में चोर की तरह घुस गई, और बड़ी स्वाभाविकता से उसने माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ''ये दवाइयाँ किसी की मेहरबानी नहीं हैं। मैंने हाथ का कड़ा बेचने को दे दिया था, उसी में आई हैं।”

मुझसे पूछा तक नहीं और... ” जगपती ने कहा और जैसे ख़ुद मन की कमज़ोरी को दबा गया—कड़ा बेचने से तो अच्छा था कि बचनसिंह की दया ही ओढ ली जाती। और उसे हल्का-सा पछतावा भी था कि नाहक वह रौ में बड़ी-बड़ी बातें कह जाता है, ज्ञानियों की तरह सीख दे देता है।

 

और जब चंदा अँधेरा होते उठकर अपनी कोठरी में सोने के लिए जाने को हुई, तो कहते-कहते यह बात दबा गई कि बचनसिंह ने उसके लिए एक खाट का इंतज़ाम भी कर दिया है। कमरे से निकली, तो सीधी कोठरी में गई और हाथ का कड़ा लेकर सीधे दवाख़ाने की ओर चली गई, जहाँ बचनसिंह अकेला डॉक्टर की कुर्सी पर आराम से टाँगें फैलाए लैम्प की पीली रौशनी में लेटा था। जगपती का व्यवहार चंदा को लग गया था, और यह भी कि वह क्यों बचनसिंह का अहसान अभी से लाद ले, पति के लिए ज़ेवर की कितनी औक़ात है। वह बेधड़क-सी दवाख़ाने में घुस गई। दिन की पहचान के कारण उसे कमरे की मेज़-कुर्सी और दवाओं की अलमारी की स्थिति का अनुमान था, वैसे कमरा अँधेरा ही पड़ा था, क्योंकि लैम्प की रौशनी केवल अपने वृत्त में अधिक प्रकाशवान होकर कोनों के अँधेरे को और भी घनीभूत कर रही थी। बचनसिंह ने चंदा को घुसते ही पहचान लिया। वह उठकर खड़ा हो गया। चंदा ने भीतर क़दम तो रख दिया पर सहसा सहम गई, जैसे वह किसी अँधेरे कुएँ में अपने-आप कूद पड़ी हो, ऐसा कुआँ, जो निरंतर पतला होता गया है और जिसमें पानी की गहराई पाताल की पर्तों तक चली गई हो, जिसमें पड़कर वह नीचे धँसती चली जा रही हो, नीचे...अँधेरा...एकांत घुटन...पाप!

बचनसिंह अवाक ताकता रह गया और चंदा ऐसे वापस लौट पड़ी, जैसे किसी काले पिशाच के पंजों से मुक्ति मिली हो। बचनसिंह के सामने क्षण-भर में सारी परिस्थिति कौंध गई और उसने वहीं से बहुत संयत आवाज़ में ज़बान को दबाते हुए जैसे वायु में स्पष्ट ध्वनित कर दिया—‘चंदा!’ वह आवाज़ इतनी बे-आवाज़ थी और निरर्थक होते हुए भी इतनी सार्थक थी कि उस ख़ामोशी में अर्थ भर गया।

 

चंदा रुक गई।

बचनसिंह उसके पास जाकर रुक गया।

 

सामने का घना पेड़ स्तब्ध खड़ा था, उसकी काली परछाई की परिधि जैसे एक बार फैलकर उन्हें अपने वृत्त में समेट लेती और दूसरे ही क्षण मुक्त कर देती। दवाख़ाने का लैम्प सहसा भभककर रुक गया और मरीज़ों के कमरे से एक कराह की आवाज़ दूर मैदान के छो तक जाकर डूब गई।

चंदा ने वैसे ही नीचे ताकते हुए अपने को संयत करते हुए कहा, “यह कड़ा तुम्हें देने आई थी।

 

''तो वापस क्यों चली जा रही थीं?”

चंदा चुप। और दो क्षण रुककर उसने अपने हाथ का सोने का कड़ा धीरे-से उसकी ओर बढ़ा दिया, जैसे देने का साहस न होते हुए भी यह काम आवश्यक था।

 

बचनसिंह ने उसकी सारी काया को एक बार देखते हुए अपनी आँखें उसके सिर पर जमा दीं, उसके ऊपर पड़े कपड़े के पार नरम चिकनाई से भरे लंबे-लंबे बाल थे, जिनकी भाप-सी महक फैलती जा रही थी। वह धीरे-धीरे से बोला, “लाओ।”

चंदा ने कड़ा उसकी ओर बढ़ा दिया। कड़ा हाथ में लेकर वह बोला, “सुनो।”

 

चंदा ने प्रश्न-भरी नज़रें उसकी ओर उठा दीं।

उनमें झाँकते हुए, अपने हाथ से उसकी कलाई पकड़ते हुए उसने वह कड़ा उसकी कलाई में पहना दिया।

 

चंदा चुपचाप कोठरी की ओर चल दी और बचनसिंह दवाख़ाने की ओर।

कालिख बुरी तरह बढ़ गई थी और सामने खड़े पेड़ की काली परछाई गहरी पड़ गई थी। दोनों लौट गए थे। पर जैसे उस कालिख में कुछ रह गया था, छूट गया था। दवाख़ाने का लैम्प जो जलते-जलते एक बार भभका था, उसमें तेल न रह जाने के कारण बत्ती की लौ बीच से फट गई थी, उसके ऊपर धुएँ की लकीरें बल खाती, साँप की तरह अँधेरे में विलीन हो जाती थीं।

 

सुबह जब चंदा जगपती के पास पहुँची और बिस्तर ठीक करने लगी तो जगपती को लगा कि चंदा बहुत उदास थी। क्षण-क्षण में चंदा के मुख पर अनगिनत भाव आ-जा रहे थे, जिनमें असमंजस था, पीड़ा थी और निरीहता थी। कोई अदृश्य पाप कर चुकने के बाद हृदय की गहराई से किए गए पश्चाताप जैसी धूमिल चमक!...

रानी मंत्री के साथ जब निराश होकर लौटीं, तो देखा, राजा महल में उपस्थित थे। उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा।” माँ सुनाया करती थीं, “पर राजा को रानी का इस तरह मंत्री के साथ जाना अच्छा नहीं लगा। रानी ने राजा को समझाया कि वह तो केवल राजा के प्रति अटूट प्रेम के कारण अपने को न रोक सकी। राजा-रानी एक-दूसरे को बहुत चाहते थे। दोनों के दिलो में एक बात शूल-सी गड़ती रहती कि उनके कोई संतान न थी…राजवंश का दीपक बुझने जा रहा था। संतान के अभाव में उनका लोक-परलोक बिगड़ा जा रहा था और कुल की मर्यादा नष्ट होने की शंका बढ़ती जा रही थी।…”

 

दूसरे दिन बचनसिंह ने मरीज़ों की मरहम-पट्टी करते वक़्त बताया था कि उसका तबादला मैनपुरी के सदर अस्पताल में हो गया है और वह परसों यहाँ से चला जाएगा। जगपती ने सुना, तो उसे भला ही लगा।…आए दिन रोग घेरे रहते हैं, बचनसिंह उसके शहर के अस्पताल में पहुँचा जा रहा है, तो कुछ मदद मिलती ही रहेगी। आख़िर वह ठीक तो होगा ही और फिर मैनपुरी के सिवा कहाँ जाएगा? पर दूसरे ही क्षण उसका दिल अकथ भारीपन से भर गया। पता नहीं क्यों, चंदा के अस्तित्व का ध्यान आते ही उसे इस सूचना में कुछ ऐसे नुकीले काँटे दिखाई देने लगे, जो उसके शरीर में किसी भी समय चुभ सकते थे, ज़रा-सा बेख़बर होने पर बींध सकते थे। और तब उसके सामने आदमी के अधिकार की लक्ष्मण-रेखाएँ धुएँ की लकीर की तरह काँपकर मिटने लगीं और मन में छुपे संदेह के राक्षस बाना बदल योगी के रूप में घूमने लगे।

और पंद्रह-बीस रोज़ बाद जब जगपती की हालत सुधर गई, तो चंदा उसे लेकर घर लौट आई। जगपती चलने-फिरने लायक़ हो गया था। घर का ताला जब खोला, तब रात झुक आई थी। और फिर उनकी गली में तो शाम से ही अँधेरा झरना शुरू हो जाता था। पर गली में आते ही उन्हें लगा, जैसे कि वनवास काटकर राजधानी लौटे हों। नुक्कड़ पर ही जमुना सुनार की कोठरी में सुरही फिंक रही थी, जिसके दराज़दार दरवाज़ों से लालटेन की रौशनी की लकीर झाँक रही थी और कच्ची तंबाकू का धुआँ रूँधी गली के मुहाने पर बुरी तरह भर गया था। सामने ही मुंशीजी अपनी जिंगला खटिया के गड्ढे में, कुप्पी के मद्धिम प्रकाश में ख़सरा-खतौनी बिछाए मीज़ान लगाने में मशग़ूल थे। जब जगपती के घर का दरवाज़ा खड़का, तो अँधेरे में उसकी चाची ने अपने जंगले से देखा और वहीं से बैठे-बैठे अपने घर के भीतर ऐलान कर दिया—“राजा निरबंसिया अस्पताल से लौट आए...कुलमा भी आई हैं!”

 

ये शब्द सुनकर घर के अँधेरे बरोठे में घुसते ही जगपती हाँफ़कर बैठ गया, झुँझलाकर चंदा से बोला, “अँधेरे में क्या मेरे हाथ-पैर तुड़वाओगी? भीतर जाकर लालटेन जला लाओ न।”

तेल नहीं होगा, इस वक़्त ज़रा ऐसे ही काम...”

 

तुम्हारे कभी कुछ नहीं होगा…न तेल न... ” कहते-कहते जगपती एकदम चुप रह गया। चंदा को लगा कि आज पहली बार जगपती ने उसके व्यर्थ मातृत्व पर इतनी गहरी चोट कर दी, जिसकी गहराई की उसने कभी कल्पना नहीं की थी। दोनों ख़ामोश, बिना एक बात किए अंदर चले गए।

रात के बढ़ते सन्नाटे में दोनों के सामने दो बातें थीं…

 

जगपती के कानों में जैसे कोई व्यंग्य से कह रहा था—राजा निरबंसिया अस्पताल से आ गए!

और चंदा के दिल में यह बात चुभ रही थी—तुम्हारे कभी कुछ नहीं होगा…

 

और सिसकती-सिसकती चंदा न जाने कब सो गई। पर जगपती की आँखों में नींद न आई। खाट पर पड़े-पड़े उसके चारों ओर एक मोहक, भयावना-सा जाल फैल गया। लेटे-लेटे उसे लगा, जैसे उसका स्वयं का आकार बहुत क्षीण होता-होता बिंदु-सा रह गया, पर बिंदु के हाथ थे, पैर थे और दिल की धड़कन भी। कोठरी का घुटा-घुटा-सा अँधियारा, मटमैली दीवारें और गहन गुफ़ाओं-सी अलमारियाँ, जिनमें से बार-बार झाँककर देखता था...और वह सिहए उठता था...फिर जैसे सब कुछ तब्दील हो गया हो।...उसे लगा कि उसका आकार बढ़ता जा रहा है, बढ़ता जा रहा है। वह मनुष्य हुआ, लंबा-तगड़ा-तंदुरुस्त पुरुष हुआ, उसकी शिराओं में कुछ फूट पड़ने के लिए व्याकुलता से खौल उठा। उसके हाथ शरीर के अनुपात से बहुत बड़े, डरावने और भयानक हो गए, उनके लंबे-लंबे नाख़ून निकल आए...वह राक्षस हुआ, दैत्य हुआ...आदिम, बर्बर!

और बड़ी तेज़ी से सारा कमरा एकबारगी चक्कर काट गया…। फिर सब धीरे-धीरे स्थिर होने लगा और उसकी साँसें ठीक होती जान पड़ीं। फिर जैसे बहुत कोशिश करने पर घिग्घी बंध जाने के बाद उसकी आवाज़ फूटी, “चंदा!”

 

चंदा की नर्म साँसों की हल्की सरसराहट कमरे में जान डालने लगी। जगपती अपनी पाटी का सहारा लेकर झुका। काँपते पैर उसने ज़मीन पर रखे और चंदा की खाट के पाए से सिर टिकाकर बैठ गया। उसे लगा, जैसे चंदा की इन साँसों की आवाज़ में जीवन का संगीत गूँज रहा है। वह उठा और चंदा के मुख पर झुक गया।...उस अँधेरे में आँखें गड़ाए-गड़ाए जैसे बहुत देर बाद स्वयं चंदा के मुख पर आभा फूटकर अपने-आप बिखरने लगी…उसके नक़्श उज्ज्वल हो उठे और जगपती की आँखों को ज्योति मिल गई। वह मुग्ध-सा ताकता रहा।

चंदा के बिखरे बाल, जिनमें हाल के जन्मे बच्चे के गभुआरे बालों की-सी महक...दूध की कचाइंध...शरीर के रस की-सी मिठास और स्नेह-सी चिकनाहट और वह माथा जिस पर बालों के पास तमाम छोटे-छोटे, नर्म-नर्म-नर्म-से रोएँ...रेशम से...और उसपर कभी लगाई गई सेंदूर की बिंदी का हल्का मिटा हुआ सा आभास…नन्हें-नन्हें निर्द्वंर्द्व सोए पलक! और उनकी मासूम-सी काँटों की तरह बरौनियाँ और साँस में घुलकर आती हुई वह आत्मा की निष्कपट आवाज़ की लय फूल की पँखुरी-से पतले-पतले ओंठ, उन पर पड़ी अछूती रेखाएँ, जिनमें सिर्फ़ दूध सी महक!

 

उसकी आँखों के सामने ममता-सी छा गई, केवल ममता, और उसके मुख से अस्फुट शब्द निकल गया, “बच्ची!”

डरते-डरते उसके बालों की एक लट को बड़े जतन से उसने हथेली पर रखा और उँगली से उस पर जैसे लकीरें खींचने लगा। उसे लगा, जैसे कोई शिशु उसके अंक में आने के लिए छटपटाकर, निराश होकर सो गया हो। उसने दोनों हथेलियों को पसारकर उसके सिर को अपनी सीमा में भर लेना चाहा कि कोई कठोर चीज़ उसकी उँगलियों से टकराई।

 

वह जैसे होश में आया।

बड़े सहारे से उसने चंदा के सिर के नीचे टटोला। एक रूमाल में बंधा कुछ उसके हाथ में आ गया। अपने को संयत करता वह वहीं ज़मीन पर बैठ गया, उसी अँधेरे में उस रूमाल को खोला, तो जैसे साँप सूँघ गया, चंदा के हाथों के दोनों सोने के कड़े उसमें लिपटे थे!

 

और तब उसके सामने सब सृष्टि धीरे-धीरे टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरने लगी। ये कड़े तो चंदा बेचकर उसका इलाज कर रही थी। वे सब दवाइयाँ और ताक़त के टॉनिक...उसने तो कहा था, ये दवाइयाँ किसी की मेहरबानी नहीं हैं, मैंने हाथ के कड़े बेचने को दे दिए थे...पर...उसका गला बुरी तरह सूख गया। ज़बान जैसे तालु से चिपककर रह गई। उसने चाहा कि चंदा को झकाझोरकर उठाए, पर शरीर की शक्ति बह-सी गई थी, रक्त पानी हो गया था।

थोड़ा संयत हुआ, उसने वे कड़े उसी रूमाल में लपेटकर उसकी खाट के कोने पर रख दिए और बड़ी मुश्किल से अपनी खाट की पाटी पकड़कर लुढ़क गया।

 

चंदा झूठ बोली! पर क्यों? कड़े आज तक छुपाए रही। उसने इतना बड़ा दुराव क्यों किया? आख़िर क्यों? किसलिए? और जगपती का दिल भारी हो गया। उसे फिर लगा कि उसका शरीर सिमटता जा रहा है और वह एक सींक का बना ढाँचा रह गया...नितांत हल्का, तिनके-सा, हवा में उड़कर भटकने वाले तिनके-सा।

उस रात के बाद रोज़ जगपती सोचता रहा कि चंदा से कड़े माँगकर बेच ले और कोई छोटा-मोटा कारोबार ही शुरू कर दे, क्योंकि नौकरी छूट चुकी थी। इतने दिन की ग़ैरहाज़िरी के बाद वकील साहब ने दूसरा मुहर्रिर रख लिया था। वह रोज़ यही सोचता पर जब चंदा सामने आती, तो न जाने कैसी असहाय-सी उसकी अवस्था हो जाती। उसे लगता, जैसे कड़े माँगकर वह चंदा से पत्नीत्व का पद भी छीन लेगा। मातृत्व तो भगवान ने छीन ही लिया...वह सोचता आख़िर चंदा क्या रह जाएगी? एक स्त्री से यदि पत्नीत्व और मातृत्व छीन लिया गया, तो उसके जीवन की सार्थकता ही क्या? चंदा के साथ वह यह अन्याय कैसे करे? उससे दूसरी आँख की रौशनी कैसे माँग ले? फिर तो वह नितांत अंधी हो जाएगी और उन कड़ों को माँगने के पीछे जिस इतिहास की आत्मा नंगी हो जाएगी, कैसे वह उस लज्जा को स्वयं ही उघारकर ढाँपेगा?

 

और वह उन्हीं ख़यालों में डूबा सुबह से शाम तक इधर-उधर काम की टोह में घूमता रहता। किसी से उधार ले ले? पर किस संपत्ति पर? क्या है उसके पास, जिसके आधार पर कोई उसे कुछ देगा? और मुहल्ले के लोग...जो एक-एक पाई पर जान देते हैं, कोई चीज़ ख़रीदते वक़्त भाव में एक पैसा कम मिलने पर मीलों पैदल जाकर एक पैसा बचाते हैं, एक-एक पैसे की मसाले की पुड़िया बँधवाकर ग्यारह मर्तबा पैसों का हिसाब जोड़कर एकाध पैसा उधारकर, मिन्नतें करते सौदा घर लाते हैं। गली में कोई खोंचेवाला फँस गया, तो दो पैसे की चीज़ को लड़-झगड़कर—चार दाने ज़्यादा पाने की नीयत से—दो जगह बँधवाते हैं। भाव के ज़रा-से फ़र्क़ पर घंटों बहस करते हैं, शाम को सड़ी-गली तरकारियों को किफ़ायत के कारण लाते हैं, ऐसे लोगों से किस मुँह से माँगकर वह उनकी ग़रीबी के अहसास पर ठोकर लगाए!

पर उस दिन शाम को जब वह घर पहुँचा, तो बरोठे में ही एक साइकिल रखी नज़र आई। दिमाग़ पर बहुत ज़ोर डालने के बाद भी वह आगंतुक की कल्पना न कर पाया। भीतरवाले दरवाज़े पर जब पहुँचा, तो सहसा हँसी की आवाज़ सुनकर ठिठक गया। उस हँसी में एक अजीब-सा उन्माद था। और उसके बाद चंदा का स्वर—

 

अब आते ही होंगे, बैठिए न दो मिनट और!...अपनी आँख से देख लीजिए और उन्हें समझाते जाइए कि अभी तंदरुस्ती इस लायक़ नहीं, जो दिन-दिन-भर घूमना बर्दाश्त कर सकें।”

हाँ…भई, कमज़ोरी इतनी जल्दी नहीं मिट सकती, ख़याल नहीं करेंगे तो नुक़सान उठाएँगे!” कोई पुरुष-स्वर था यह।

 

जगपती असमंजस में पड़ गया। वह एकदम भीतर घुस जाए? इसमें क्या हर्ज है? पर जब उसने पैर उठाए, तो वे बाहर जा रहे थे। बाहर बरोठे में साइकिल को पकड़ते ही उसे सूझ आई, वहीं से जैसे अनजान बनता बड़े प्रयत्न से आवाज़ क़ो खोलता चिल्लाया, “अरे चंदा! यह साइकिल किसकी है? कौन मेहरबान...”

चंदा उसकी आवाज़ सुनकर कमरे से बाहर निकलकर जैसे ख़ुश-ख़बरी सुना रही थी, “अपने कंपाउंडर साहब आए हैं। खोजते-खोजते आज घर का पता पाए हैं, तुम्हारे इंतज़ार में बैठे हैं!”

 

कौन बचनसिंह?...अच्छा, अच्छा…वही तो मैं कहूँ, भला कौन...” कहता जगपती पास पहुँचा, और बातों में इस तरह उलझ गया, जैसे सारी परिस्थिति उसने स्वीकार कर ली हो।

बचनसिंह जब फिर आने की बात कहकर चला गया, तो चंदा ने बहुत अपनेपन से जगपती के सामने बात शुरू की, “जाने कैसे-कैसे आदमी होते हैं...”

 

क्यों, क्या हुआ? कैसे होते हैं आदमी?” जगपती ने पूछा।

इतनी छोटी जान-पहचान में तुम मर्दों के घर में न रहते घुसकर बैठ सकते हो? तुम तो उल्टे पैरों लौट आओगे।” चंदा कहकर जगपती के मुख पर कुछ इच्छित प्रतिक्रिया देख सकने के लिए गहरी निगाहों से ताकने लगी।

 

जगपती ने चंदा की ओर ऐसे देखा, जैसे यह बात भी कहने की या पूछने की है! फिर बोला, “बचनसिंह अपनी तरह का आदमी है, अपनी तरह का अकेला...”

होगा...पर...” कहते-कहते चंदा रुक गई।

 

आड़े वक़्त काम आने वाला आदमी है, लेकिन उससे फ़ायदा उठा सकना जितना आसान है...उतना...मेरा मतलब है कि जिससे कुछ लिया जाएगा, उसे दिया भी जाएगा।” जगपती ने आँखें दीवार पर गड़ाते हुए कहा।

और चंदा उठकर चली गई।

 

उस दिन के बाद बचनसिंह लगभग रोज़ ही आने-जाने लगा। जगपती उसके साथ इधर-उधर घूमता भी रहता। बचनसिंह के साथ वह जब तक रहता, अजीब-सी घुटन उसके दिल को बाँध लेती, और तभी जीवन की तमाम विषमताएँ भी उसकी निगाहों के सामने उभरने लगतीं, आख़िर वह स्वयं एक आदमी है, बेकार...यह माना कि उसके सामने पेट पालने की कोई इतनी विकराल समस्या नहीं, वह भूखों नहीं मर रहा है, जाड़े में काँप नहीं रहा है, पर उसके दो हाथ-पैर हैं…शरीर का पिंजरा है, जो कुछ माँगता है, कुछ! और वह सोचता, यह कुछ क्या है? सुख? शायद हाँ, शायद नहीं। वह तो दुःख में भी जी सकने का आदी है, अभावों में जीवित रह सकने वाला आश्चर्यजनक कीड़ा है। तो फिर वासना? शायद हाँ, शायद नहीं। चंदा का शरीर लेकर उसने उस क्षणिकता को भी देखा है। तो फिर धन...शायद हाँ, शायद नहीं। उसने धन के लिए अपने को खपाया है।

पर वह भी तो उस अदृश्य प्यास को बुझा नहीं पाया। तो फिर?...तो फिर क्या?...वह कुछ क्या है, जो उसकी आत्मा में नासूर-सा रिसता रहता है, अपना उपचार माँगता है? शायद काम! हाँ, यही, बिल्कुल यही, जो उसके जीवन की घड़ियों को निपट सूना न छोड़े, जिसमें वह अपनी शक्ति लगा सके, अपना मन डुबो सके, अपने को सार्थक अनुभव कर सके, चाहे उसमें सुख हो या दुःख, अरक्षा हो या सुरक्षा, शोषण हो या पोषण...उसे सिर्फ़ काम चाहिए! करने के लिए कुछ चाहिए। यही तो उसकी प्रकृत आवश्यकता है, पहली और आख़िरी माँग है, क्योंकि वह उस घर में नहीं पैदा हुआ, जहाँ सिर्फ़ ज़बान हिलाकर शासन करने वाले होते हैं। वह उस घर में भी नहीं पैदा हुआ, जहाँ सिर्फ़ माँगकर जीने वाले होते हैं। वह उस घर का है, जो सिर्फ़ काम करना जानता है, काम ही जिसकी आस है। सिर्फ़ वह काम चाहता है, काम।

 

और एक दिन उसकी काम-धाम की समस्या भी हल हो गई। तालाब वाले ऊँचे मैदान के दक्षिण ओर जगपती की लकड़ी की टाल खुल गई। बोर्ड तक टंग गया। टाल की ज़मीन पर लक्ष्मी-पूजन भी हो गया और हवन भी हुआ। लकड़ी की कोई कमी नहीं थी। गाँव से आने वाली गाड़ियों को, इस कारोबार में पैरे हुए आदमियों की मदद से मोल-तोल करवा के वहाँ गिरवा दिया गया। गाँठें एक ओर रखी गईं, चैलों का चट्टा क़रीने से लग गया और गुद्दे चीरने के लिए डाल दिए गए। दो-तीन गाड़ियों का सौदा करके टाल चालू कर दी गई। भविष्य में स्वयं पेड़ ख़रीदकर कटाने का तय किया गया। बड़ी-बड़ी स्कीमें बनीं कि किस तरह जलाने की लकड़ी से बढ़ाते-बढ़ाते एक दिन इमारती लकड़ी की कोठी बनेगी। चीरने की नई मशीन लगेगी। कारोबार बढ़ जाने पर बचनसिंह भी नौकरी छोड़कर उसी में लग जाएगा, और उसने महसूस किया कि वह काम में लग गया है, अब चौबीसों घंटे उसके सामने काम है...उसके समय का उपयोग है। दिन-भर में वह एक घंटे के लिए किसी का मित्र हो सकता है, कुछ देर के लिए वह पति हो सकता है, पर बाक़ी समय? दिन और रात के बाक़ी घंटे...उन घंटों के अभाव को सिर्फ़ उसका अपना काम ही भर सकता है...और अब वह कामदार था...

वह कामदार तो था, लेकिन जब टाल की उस ऊँची ज़मीन पर पड़े छप्पर के नीचे तख़्त पर वह गल्ला रखकर बैठता, सामने लगे लकड़ियों के ढेर, कटे हुए पेड़ के तने, जड़ों को लुढ़का हुआ देखता, तो एक निरीहता बरबस उसके दिल को बाँधने लगती। उसे लगता, एक व्यर्थ पिशाच का शरीर टुकड़े-टुकड़े करके उसके सामने डाल दिया गया है।...फिर इन पर कुल्हाड़ी चलेगी और इनके रेशे-रेशे अलग हो जाएँगे और तब इनकी ठठरियों को सुखाकर किसी पैसेवाले के हाथ तक पर तौलकर बेच दिया जाएगा।

 

और तब उसकी निगाहें सामने खड़े ताड़ पर अटक जातीं, जिसके बड़े-बड़े पत्तों पर सुर्ख़ गर्दनवाले गिद्ध पर फड़फड़ाकर देर तक ख़ामोश बैठे रहते। ताड़ का काला गड़रेदार तना...और उसके सामने ठहरी हुई वायु में निस्सहाय काँपती, भारहीन नीम की पत्तियाँ चकराती झड़ती रहतीं...धूल-भरी धरती पर लकड़ी की गाड़ियों के पहियों की पड़ी हुई लीक धुँधली-सी चमक उठती और बग़लवाले मूँगफल्ली के पेंच की एकरस खरखराती आवाज़ कानों में भरने लगती। बग़लवाली कच्ची पगडंडी से कोई गुज़रकर, टीले के ढलान से तालाब की निचाई में उतर जाता, जिसके गंदले पानी में कूड़ा तैरता रहता और सूअर कीचड़ में मुँह डालकर उस कूड़े को रौंदते रहते...

दुपहर सिमटती और शाम की धुँध छाने लगती, तो वह लालटेन जलाकर छप्पर के खंभे की कील में टाँग देता और उसके थोड़ी ही देर बाद अस्पताल वाली सड़क से बचनसिंह एक काले धब्बे की तरह आता दिखाई पड़ता।

 

गहरे पड़ते अँधेरे में उसका आकार धीरे-धीरे बढ़ता जाता और जगपती के सामने जब वह आकर खड़ा होता, तो वह उसे बहुत विशाल-सा लगने लगता, जिसके सामने उसे अपना अस्तित्व डूबता महसूस होता।

एक-आध बिक्री की बातें होतीं और तब दोनों घर की ओर चल देते। घर पहुँचकर बचनसिंह कुछ देर ज़रूर रुकता, बैठता, इधर-उधर की बातें करता। कभी मौक़ा पड़ जाता, तो जगपती और बचनसिंह की थाली भी साथ लग जाती। चंदा सामने बैठकर दोनों को खिलाती।

 

बचनसिंह बोलता जाता, “क्या तरकारी बनी है। मसाला ऐसा पड़ा है कि उसकी भी बहार है और तरकारी का स्वाद भी न मरा। होटलों में या तो मसाला ही मसाला रहेगा या सिर्फ़ तरकारी ही तरकारी। वाह! वाह! क्या बात है अंदाज़ की”

और चंदा बीच-बीच में टोककर बोलती जाती, “इन्हें तो जब तक दाल में प्याज़ का भुना घी न मिले, तब तक पेट ही नहीं भरता।”

 

या—“सिरका अगर इन्हें मिल जाए, तो समझो, सब कुछ मिल गया। पहले मुझे सिरका न जाने कैसा लगता था, पर अब ऐसा ज़बान पर चढ़ा है कि…”

या—“इन्हें काग़ज़-सी पतली रोटी पसंद ही नहीं आती। अब मुझसे कोई पतली रोटी बनाने को कहे, तो बनती ही नहीं, आदत पड़ गई है, और फिर मन ही नहीं करता…”

 

पर चंदा की आँखें बचनसिंह की थाली पर ही जमीं रहतीं। रोटी निबटी, तो रोटी परोस दी, दाल ख़त्म नहीं हुई, तो भी एक चमचा और परोस दी।

और जगपती सिर झुकाए खाता रहता। सिर्फ़ एक गिलास पानी माँगता और चंदा चौंककर पानी देने से पहले कहती, “अरे तुमने तो कुछ लिया भी नहीं!” कहते-कहते वह पानी दे देती और तब उसके दिल पर गहरी-सी चोट लगती, न जाने क्यों वह ख़ामोशी की चोट उसे बड़ी पीड़ा दे जाती…पर वह अपने को समझा लेती, कोई मेहमान तो नहीं हैं…माँग सकते थे। भूख नहीं होगी।

 

जगपती खाना खाकर टाल पर लेटने चला जाता, क्योंकि अभी तक कोई चौकीदार नहीं मिला था। छप्पर के नीचे तख़्त पर जब वह लेटता, तो अनायास ही उसका दिल भर-भर आता। पता नहीं कौन-कौन-से दर्द एक-दूसरे से मिलकर तरह-तरह की टीस, चटखन और ऐंठन पैदा करने लगते। कोई एक रग दुखती तो वह सहलाता भी, जब सभी नसें चटखती हों तो कहाँ-कहाँ राहत का अकेला हाथ सहलाए!

लेटे-लेटे उसकी निगाह ताड़ के उस ओर बनी पुख़्ता क़ब्र पर जम जाती, जिसके सिराहने कंटीला बबूल का एकाकी पेड़ सुन्न-सा खड़ा रहता। जिस क़ब्र पर एक पर्दानशीन औरत बड़े लिहाज़ से आकर सवेरे-सवेरे बेला और चमेली के फूल चढ़ा जाती…घूम-घूमकर उसके फेरे लेती और माथा टेककर कुछ क़दम उदास-उदास-सी चलकर एकदम तेज़ी से मुड़कर बिसातियों के मुहल्ले में खो जाती। शाम होते फिर आती। एक दीया बारती और अगर की बत्तियाँ जलाती। फिर मुड़ते हुए ओढ़नी का पल्ला कंधों पर डालती, तो दीए की लौ काँपती, कभी काँपकर बुझ जाती, पर उसके क़दम बढ़ चुके होते, पहले धीमे, थके, उदास-से और फिर तेज़ सधे सामान्य-से। और वह फिर उसी मुहल्ले में खो जाती और तब रात की तनहाइयों में...बबूल के काँटों के बीच, उस साँय-साँय करते ऊँचे-नीचे मैदान में जैसे उस क़ब्र से कोई रूह निकलकर निपट अकेली भटकती रहती।...

 

तभी ताड़ पर बैठे सुर्ख़ गर्दनवाले गिद्ध मनहूस-सी आवाज़ में किलबिला उठते और ताड़ के पत्ते भयानकता से खड़बड़ा उठते। जगपती का बदन काँप जाता और वह भटकती रूह ज़िंदा रह सकने के लिए जैसे क़ब्र की ईंटों में, बबूल के साया-तले दुबक जाती। जगपती अपनी टाँगों को पेट से भींचकर, कंबल से मुँह छुपा औंधा लेट जाता।

तड़के ही ठेके पर लगे लकड़हारे लकड़ी चीरने आ जाते। तब जगपती कंबल लपेट, घर की ओर चला जाता…

 

राजा रोज़ सबेरे टहलने जाते थे,” माँ सुनाया करती थीं, “एक दिन जैसे ही महल के बाहर निकलकर आए कि सड़क पर झाड़ू लगाने वाली मेहतरानी उन्हें देखते ही अपना झाडूपंजा पटककर माथा पीटने लगी और कहने लगी, “हाय राम! आज राजा निरबंसिया का मुँह देखा है, न जाने रोटी भी नसीब होगी कि नहीं…न जाने कौन-सी बिपत टूट पड़े!” राजा को इतना दुःख हुआ कि उल्टे पैरों महल को लौट गए। मंत्री को हुक्म दिया कि उस मेहतरानी का घर नाज़ से भर दें। और सब राजसी वस्त्र उतार, राजा उसी क्षण जंगल की ओर चले गए। उसी रात रानी को सपना हुआ कि कल की रात तेरी मनोकामना पूरी होने वाली है। रानी बहुत पछता रही थी। पर फ़ौरन ही रानी राजा को खोजती-खोजती उस सराय में पहुँच गई, जहाँ वह टिके हुए थे। रानी भेस बदलकर सेवा करने वाली भटियारिन बनकर राजा के पास रात में पहुँची। रातभर उनके साथ रही और सुबह राजा के जगने से पहले सराय छोड़ महल में लौट गई। राजा सुबह उठकर दूसरे देश की ओर चले गए। दो ही दिनों में राजा के निकल जाने की ख़बर राज-भर में फैल गई, राजा निकल गए, चारों तरफ़ यही ख़बर थी...”

और उस दिन टोले-मुहल्ले के हर आँगन में बरसात के मेह की तरह यह ख़बर बरसकर फैल गई कि चंदा के बाल-बच्चा होने वाला है।

 

नुक्कड़ पर जमुना सुनार की कोठरी में फिंकती सुरही रुक गई। मुंशीजी ने अपना मीज़ान लगाना छोड़ विस्फारित नेत्रों से ताककर ख़बर सुनी। बंसी किरानेवाले ने कुएँ में से आधी गईं रस्सी खींच, डोल मन पर पटककर सुना। सुदर्शन दर्जी ने मशीन के पहिए को हथेली से रगड़कर रोककर सुना। और हंसराज पंजाबी ने अपनी नील-लगी मलगुजी क़मीज़ की आस्तीनें चढ़ाते हुए सुना। और जगपती की बेवा चाची ने औरतों के जमघट में बड़े विश्वास, पर भेद-भरे स्वर में सुनाया—“आज छः साल हो गए शादी को न बाल, न बच्चा, न जाने किसका पाप है उसके पेट में।…और किसका होगा सिवा उस मुसटंडे कंपोटर के! न जाने कहाँ से कुलच्छनी इस मुहल्ले में आ गई!...इस गली की तो पुश्तों से ऐसी मरजाद रही है कि ग़ैर, मरद औरत की परछाईं तब नहीं देख पाए। यहाँ के मरद तो बस अपने घर की औरतों को जानते हैं, उन्हें तो पड़ोसी के घर की ज़नानियों की गिनती तक नहीं मालूम।” यह कहते-कहते उनका चेहरा तमतमा आया और सब औरतें देवलोक की देवियाँ की तरह गंभीर बनीं, अपनी पवित्रता की महानता के बोझ से दबी धीरे-धीरे खिसक गईं।

सुबह यह ख़बर फैलने से पहले जगपती टाल पर चला गया था। पर सुनी उसने भी आज ही थी। दिन-भर वह तख़्त पर कोने की ओर मुँह किए पड़ा रहा। न ठेके की लकड़ियाँ चिरवाईं, न बिक्री की ओर ध्यान दिया, न दुपहर का खाना खाने ही घर गया। जब रात अच्छी तरह फैल गई, वह हिंसक पशु की भाँति उठा। उसने अपनी अँगुलियाँ चटकाईं, मुठ्ठी बाँधकर बाँह का ज़ोर देखा, तो नसें तनीं और बाह में कठोर कंपन-सा हुआ। उसने तीन-चार पूरी साँसें खींचीं और मज़बूत क़दमों से घर की ओर चल पड़ा। मैदान ख़त्म हुआ, कंकड़ की सड़क आई...सड़क ख़त्म हुई, गली आई। पर गली के अँधेरे में घुसते वह सहम गया, जैसे किसी ने अदृश्य हाथों से उसे पकड़कर सारा रक्त निचोड़ लिया, उसकी फटी हुई शक्ति की नस पर हिम-शीतल होंठ रखकर सारा रस चूस लिया। और गली के अँधेरे की हिकारत-भरी कालिख और भी भारी हो गई, जिसमें घुसने से उसकी साँस रुक जाएगी...घुट जाएगी।

 

वह पीछे मुड़ा, पर रुक गया। फिर कुछ संयत होकर वह चोरों की तरह निःशब्द क़दमों से किसी तरह घर की भीतरी देहरी तक पहुँच गया।

दाईं ओर की रसोईवाली दहलीज़ में कुप्पी टिमटिमा रही थीं और चंदा अस्त-व्यस्त-सी दीवार से सिर टेके शायद आसमान निहारते-निहारते सो गई थी। कुप्पी का प्रकाश उसके आधे चेहरे को उजागर किए था और आधा चेहरा गहन कालिमा में डूबा अदृश्य था।

 

वह ख़ामोशी से खड़ा ताकता रहा। चंदा के चेहरे पर नारीत्व की प्रौढ़ता आज उसे दिखाई दी। चेहरे की सारी कमनीयता न जाने कहाँ खो गई थी, उसका अछूतापन न जाने कहाँ लुप्त हो गया था। फूला-फूला मुख। जैसे टहनी से तोड़े फूल को पानी में डालकर ताज़ा किया गया हो, जिसकी पंखुरियों में टूटन की सुरमई रेखाएँ पड़ गई हों, पर भीगने से भारीपन आ गया हो।

उसके खुले पैर पर उसकी निगाह पड़ी, तो सूजा-सा लगा। एड़ियाँ भरी, सूजी-सी और नाख़ूनों के पास अजब-सा सूखापन। जगपती का दिल एक बार मसोस उठा। उसने चाहा कि बढ़कर उसे उठा ले। अपने हाथों से उसका पूरा शरीर छू-छूकर सारा कलुष पोंछ दे, उसे अपनी साँसों की अग्नि में तपाकर एक बार फिर पवित्र कर ले, और उसकी आँखों की गहराई में झाँककर कहे—देवलोक से किस शापवश निर्वासित हो तुम इधर आ गईं, चंदा? यह शाप तो अमिट था।

 

तभी चंदा ने हड़बड़ाकर आँखें खोलीं। जगपती को सामने देख उसे लगा कि वह एकदम नंगी हो गई हो। अतिशय लज्जित हो उसने अपने पैर समेट लिए। घुटनों से धोती नीचे सरकाई और बहुत संयत-सी उठकर रसोई के अँधेरे में खो गई।

जगपती एकदम हताश हो, वहीं कमरे की देहरी पर चौखट से सिर टिका बैठ गया। नज़र कमरे में गई तो लगा कि पराए स्वर यहाँ गूँज रहे हैं, जिनमें चंदा का भी एक है। एक तरफ़ घर के हर कोने से, अँधेरा सैलाब की तरह बढ़ता आ रहा था...एक अजीब निस्तब्धता...असमंजस! गति, पर पथभ्रष्ट! शक्लें, पर आकारहीन।

 

खाना खा लेते,” चंदा का स्वर कानों में पड़ा। वह अनजाने ऐसे उठ बैठा, जैसे तैयार बैठा हो। उसकी बात की आज तक उसने अवज्ञा न की थी। खाने तो बैठ गया, पर कौर नीचे नहीं सरक रहा था। तभी चंदा ने बड़े सधे शब्दों में कहा, “कल मैं गाँव जाना चाहती हूँ।”

जैसे वह इस सूचना से परिचित था, बोला, “अच्छा।”

 

चंदा फिर बोली, “मैंने बहुत पहले घर चिठ्ठी डाल दी थी, भैया कल लेने आ रहे हैं।”

तो ठीक है।” जगपती वैसे ही डूबा-डूबा बोला।

 

चंदा का बाँध टूट गया और वह वहीं घुटनों में मुँह दबाकर कातर-सी फफक-फफककर रो पड़ी। न उठ सकी, न हिल सकी।

जगपती क्षण-भर को विचलित हुआ, पर जैसे जम जाने के लिए। उसके होंठ फड़के और क्रोध के ज्वालामुखी को जबरन दबाते हुए भी वह फूट पड़ा, “यह सब मुझे क्या दिखा रही है? बेशर्म! बेग़ैरत!...उस वक़्त नहीं सोचा था, जब…जब…मेरी लाश तले…”

 

तब…तब की बात झूठ है।”, सिसकियों के बीच चंदा का स्वर फूटा, “लेकिन जब तुमने मुझे बेच दिया...”

एक भरपूर हाथ चंदा की कनपटी पर आग सुलगाता पड़ा। और जगपती अपनी हथेली दूसरी से दबाता, खाना छोड़कर कोठरी में घुस गया और रात-भर कुंडी चढ़ाए उसी कालिख में घुटता रहा।

 

दूसरे दिन चंदा घर छोड़कर अपने गाँव चली गई।

जगपती पूरा दिन और रात टाल पर ही काट देता, उसी बीराने में, तालाब के बग़ल, क़ब्र, बबूल और ताड़ के पड़ोस में। पर मन मुर्दा हो गया था। ज़बरदस्ती वह अपने को वहीं रोके रहता।...उसका दिल होता, कहीं निकल जाए। पर ऐसी कमज़ोरी उसके तन और मन को खोखला कर गई थी कि चाहने पर भी वह जा न पाता। हिकारत-भरी नज़रें सहता, पर वहीं पड़ा रहता। काफ़ी दिनों बाद जब नहीं रह गया, तो एक दिन जगपती घर पर ताला लगा, नज़दीक के गाँव में लकड़ी कटाने चला गया। उसे लग रहा था कि अब वह पंगु हो गया है, बिलकुल लँगड़ा, एक रेंगता कीड़ा, जिसके न आँख है, न कान, न मन, न इच्छा।

 

वह उस बाग़ में पहुँच गया, जहाँ ख़रीदे पेड़ कटने थे। दो आरेवालों ने पतले पेड़ के तने पर आरा रखा और कर्र-कर्र का अबाध शोर शुरू हो गया। दूसरे पेड़ पर बन्ने और शकूरे की कुल्हाड़ी बज उठी। और गाँव से दूर उस बाग़ में एक लयपूर्ण शोर शुरू हो गया। जड़ पर कुल्हाड़ी पड़ती तो पूरा पेड़ थर्रा जाता।

क़रीब के खेत की मेढ पर बैठे जगपती का शरीर भी जैसे काँप-काँप उठता। चंदा ने कहा था, “लेकिन जब तुमने मुझे बेच दिया…” क्या वह ठीक कहती थी! क्या बचनसिंह ने टाल के लिए जो रुपए दिए थे, उसका ब्याज़ इधर चुकता हुआ? क्या सिर्फ़ वही रुपए आग बन गए, जिसकी आँच में उसकी सहनशीलता, विश्वास और आदर्श मोम-से पिघल गए?

 

शकूरे!” बाग़ से लगे दड़े पर से किसी ने आवाज़ लगाई। शकूरे ने कुल्हाड़ी रोककर वहीं से हाँक लगाई, “कोने के खेत से लीक बनी है, ज़रा मेड़ मारकर नंघा ला गाड़ी।”

जगपती का ध्यान भंग हुआ। उसने मुड़कर दड़े पर आँखें गड़ाईं। दो भैंसा गाड़ियाँ लकड़ी भरने के लिए आ पहुँची थीं। शकूरे ने जगपती के पास आकर कहा, “एक गाड़ी का भुर्त तो हो गया, बल्कि डेढ़ का…अब इस पतरिया पेड़ को न छाँट दें?”

 

जगपती ने उस पेड़ की ओर देखा, जिसे काटने के लिए शकूरे ने इशारा किया था। पेड़ की शाख़ हरी पत्तियों से भरी थी। वह बोला, “अरे, यह तो हरा है अभी इसे छोड़ दो।”

हरा होने से क्या, उखट तो गया है। न फूल का, न फल का। अब कौन इसमें फल-फूल आएँगे, चार दिन में पत्ती झुरा जाएँगी।” शकूरे ने पेड़ की ओर देखते हुए उस्तादी अंदाज़ से कहा।

 

जैसा ठीक समझो तुम,” जगपती ने कहा, और उठकर मेड़-मेड़ पक्के कुएँ पर पानी पीने चला गया।

दुपहर ढलते गाड़ियाँ भरकर तैयार हुईं और शहर की ओर रवाना हो गईं। जगपती को उनके साथ आना पड़ा। गाड़ियाँ लकड़ी से लदीं शहर की ओर चली जा रही थीं और जगपती गर्दन झुकाए कच्ची सड़क की धूल में डूबा, भारी क़दमों से धीरे-धीरे उन्हीं की बजती घंटियों के साथ निर्जीव-सा बढ़ता जा रहा था...

 

कई बरस बाद राजा परदेस से बहुत-सा धन कमाकर गाड़ी में लादकर अपने देश की ओर लौटे,” माँ सुनाया करती थीं, “राजा की गाड़ी का पहिया महल से कुछ दूर पतेल की झाड़ी में उलझ गया। हर तरह कोशिश की, पर पहिया न निकला। तब एक पंडित ने बताया कि सकट के दिन का जनमा बालक अगर अपने घर की सुपारी लाकर इसमें छुआ दे, तो पहिया निकल जाएगा। वहीं दो बालक खेल रहे थे। उन्होंने यह सुना तो कूदकर पहुँचे और कहने लगे कि हमारी पैदाइश सकट की है, पर सुपारी तब लाएँगे, जब तुम आधा धन देने का वादा करो। राजा ने बात मान ली। बालक दौड़े-दौड़े घर गए। सुपारी लाकर छुआ दी, फिर घर का रास्ता बताते आगे-आगे चले। आख़िर गाड़ी महल के सामने उन्होंने रोक ली।

राजा को बड़ा अचरज हुआ कि हमारे ही महल में ये बालक कहाँ से आ गए? भीतर पहुँचे, तो रानी ख़ुशी से बेहाल हो गई।

 

पर राजा ने पहले उन बालकों के बारे में पूछा, तो रानी ने कहा कि ये दोनों बालक उन्हीं के राजकुमार हैं। राजा को विश्वास नहीं हुआ। रानी बहुत दुखी हुई।”

गाड़ियाँ जब टाल पर आकर लगीं और जगपती तख़्त पर हाथ-पैर ढीले करके बैठ गया, तो पगडंडी से गुज़रते मुंशीजी ने उसके पास आकर बताया, “अभी उस दिन वसूली में तुम्हारी ससुराल के नज़दीक एक गाँव में जाना हुआ, तो पता लगा कि पंद्रह-बीस दिन हुए, चंदा के लड़का हुआ है।” और फिर जैसे मुहल्ले में सुनी-सुनाई बातों पर पर्दा डालते हुए बोले, “भगवान के राज में देर है, अँधेर नहीं, जगपती भैया!”

 

जगपती ने सुना तो पहले उसने गहरी नज़रों से मुंशीजी को ताका, पर वह उनके तीर का निशाना ठीक-ठीक नहीं खोज पाया। पर सब-कुछ सहन करते हुए बोला, “देर और अँधेर दोनों हैं!”

अँधेर तो सरासर है…तिरिया चरित्तर है सब! बड़े-बड़े हार गए…” कहते-कहते मुंशीजी रुक गए, पर कुछ इस तरह, जैसे कोई बड़ी भेद-भरी बात है, जिसे उनकी गोल होती हुई आँखें समझा देंगी।

 

जगपती मुंशीजी की तरफ़ ताकता रह गया। मिनट-भर मनहूस-सा मौन छाया रहा, उसे तोड़ते हुए मुंशीजी बड़ी दर्द-भरी आवाज़ में बोले, “सुन तो लिया होगा, तुमने?”

क्या?” कहने को जगपती कह गया, पर उसे लगा कि अभी मुंशीजी उस गाँव में फैली बातों को ही बड़ी बेदर्दी से कह डालेंगे, उसने नाहक़ पूछा।

 

तभी मुंशीजी ने उसकी नाक के पास मुँह ले जाते हुए कहा, “चंदा दूसरे के घर बैठ रही है…कोई मदसूदन है वहीं का। पर बच्चा दीवार बन गया है, चाहते तो वो यही हैं कि मर जाए, तो रास्ता खुले, पर रामजी की मरजी...सुना है, बच्चा रहते भी वह चंदा को बैठाने को तैयार है।”

जगपती की साँस गले में अटककर रह गई। बस, आँखें मुंशीजी के चेहरे पर पथराई-सी जड़ी थीं।

 

मुंशीजी बोले, “अदालत से बच्चा तुम्हें मिल सकता है।…अब काहे का शरम-लिहाज!”

अपना कहकर किस मुँह से माँगूँ, बाबा? हर तरफ़ तो कर्ज से दबा हूँ, तन से, मन से, पैसे से, इज़्ज़त से, किसके बल पर दुनिया संजोने की कोशिश करूँ?” कहते-कहते वह अपने में खो गया।

 

मुंशीजी वहीं बैठ गए। जब रात झुक आई तो जगपती के साथ ही मुंशीजी भी उठे। उसके कंधे पर हाथ रखे वे उसे गली तक लाए। अपनी कोठरी आने पर पीठ सहलाकर उन्होंने उसे छोड़ दिया। वह गर्दन झुकाए गली के अँधेरे में उन्हीं ख़यालों में डूबा ऐसे चलता चला आया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर कुछ ऐसा बोझ था, जो न सोचने देता था और न समझने। जब चाची की बैठक के पास से गुज़रने लगा, तो सहसा उसके कानों में भनक पड़ी—“आ गए सत्यानासी! कुलबोरन!”

उसने ज़रा नज़र उठाकर देखा, तो गली की चाची-भौजाइयाँ बैठक में जमा थीं और चंदा की चर्चा छिड़ी थी। पर वह चुपचाप निकल गया।

 

इतने दिनों बाद ताला खोला और बरोठे के अँधेरे में कुछ सूझ न पड़ा, तो एकाएक वह रात उसकी आँखों के सामने घूम गई, जब वह अस्पताल से चंदा के साथ लौटा था। बेवा चाची का वह ज़हरबुझा तीर, ‘राजा निरबंसिया अस्पताल से लौट आए।’ और आज सत्यानासी! कुलबोरन! और स्वयं उसका वह वाक्य, जो चंदा को छेद गया था, ‘तुम्हारे कभी कुछ न होगा…!’ और उस रात की शिशु चंदा!

चंदा का लड़का हुआ है।…वह कुछ और जनती, आदमी का बच्चा न जनती! ...वह और कुछ भी जनती, कंकड़-पत्थर! वह नारी न बनती, बच्ची ही बनी रहती, उस रात की शिशु चंदा। पर चंदा यह सब क्या करने जा रही है? उसके जीते-जी वह दूसरे के घर बैठने जा रही है? कितने बड़े पाप में धकेल दिया चंदा को…पर उसे भी तो कुछ सोचना चाहिए! आख़िर क्या? पर मेरे जीते-जी तो यह सब अच्छा नहीं। वह इतनी घृणा बर्दाश्त करके भी जीने को तैयार है! या मुझे जलाने को? वह मुझे नीच समझती है, कायर…नहीं तो एक बार ख़बर तो लेती। बच्चा हुआ, तो पता लगता। पर नहीं, वह उसका कौन है? कोई भी नहीं! औलाद ही तो वह स्नेह की धुरी है, जो आदमी-औरत के पहियों को साधकर तन के दलदल से पार ले जाती है…नहीं तो हर औरत वेश्या है और हर आदमी वासना का कीड़ा। तो क्या चंदा औरत नहीं रही? वह ज़रूर औरत थी, पर स्वयं मैंने उसे नरक में डाल दिया। वह बच्चा मेरा कोई नहीं, पर चंदा तो मेरी है। एक बार उसे ले आता फिर यहाँ…रात के मोहक अँधेरे में उसके फूल-से अधरों को देखता…निर्द्वंद्व सोई पलकों को निहारता...साँसों की दूध-सी अछूती महक को समेट लेता...

 

आज का अँधेरा! घर में तेल भी नहीं जो दीया जला ले। और फिर किसके लिए कौन जलाए? चंदा के लिए...पर उसे तो बेच दिया था। सिवा चंदा के कौन-सी सम्पत्ति उसके पास थी, जिसके आधार पर कोई क़र्ज़ देता? क़र्ज़ न मिलता तो यह सब कैसे चलता? काम...पेड़ कहाँ से कटते? और तब शकूरे के वे शब्द उसके कानों में गूँज गए, ‘हरा होने से क्या, उखट तो गया है…’ वह स्वयं भी तो एक उखटा हुआ पेड़ है, न फल का, न फूल का, सब व्यर्थ ही तो है। जो कुछ सोचा, उस पर कभी विश्वास न कर पाया। चंदा को चाहता रहा, पर उसके दिल में चाहत न जगा पाया। उसे कहीं से एक पैसा माँगने पर डाँटता रहा, पर ख़ुद लेता रहा और आज…वह दूसरे के घर बैठ रही है…उसे छोड़कर…वह अकेला है…हर तरफ़ बोझ है, जिसमें उसकी नस-नस कुचली जा रही हैं, रग-रग फट गई है।…और वह किसी तरह टटोल-टटोलकर भीतर घर में पहुँचा…

रानी अपने कुल-देवता के मंदिर में पहुँचीं,” माँ सुनाया करती थीं, “अपने सतीत्व को सिद्ध करने के लिए उन्होंने घोर तपस्या की। राजा देखते रहे! कुल-देवता प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी दैवी शक्ति से दोनों बालकों को तत्काल जन्मे शिशुओं में बदल दिया। रानी की छातियों में दूध भर आया और उनमें से धार फूट पड़ी, जो शिशुओं के मुँह में गिरने लगी। राजा को रानी के सतीत्व का सबूत मिल गया। उन्होंने रानी के चरण पकड़ लिए और कहा कि तुम देवी हो! ये मेरे पुत्र हैं! और उस दिन से राजा ने फिर से राज-काज संभाल लिया।”

 

पर उसी रात जगपती अपना सारा कारोबार त्याग, अफ़ीम और तेल पीकर मर गया क्योंकि चंदा के पास कोई दैवी शक्ति नहीं थी और जगपती राजा नहीं, बचनसिंह कंपाउंडर का क़र्ज़दार था।…

राजा ने दो बातें कीं,” माँ सुनाती थीं, “एक तो रानी के नाम से उन्होंने बहुत बड़ा मंदिर बनवाया और दूसरे, राज के नए सिक्कों पर बड़े राजकुमार का नाम खुदवाकर चालू किया, जिससे राज-भर में अपने उत्तराधिकारी की ख़बर हो जाए…”

 

जगपती ने मरते वक़्त दो परचे छोड़े, एक चंदा के नाम, दूसरा क़ानून के नाम।

चंदा को उसने लिखा था—“चंदा, मेरी अंतिम चाह यही है कि तुम बच्चे को लेकर चली आना…अभी एक-दो दिन मेरी लाश की दुर्गति होगी, तब तक तुम आ सकोगी। चंदा आदमी को पाप नहीं, पश्चाताप मारता है, मैं बहुत पहले मर चुका था। बच्चे को लेकर ज़रूर चली आना।”

 

क़ानून को उसने लिखा था—“किसी ने मुझे मारा नहीं है, किसी आदमी ने नहीं। मैं जानता हूँ कि मेरे ज़हर की पहचान करने के लिए मेरा सीना चीरा जाएगा। उसमें ज़हर है। मैंने अफ़ीम नहीं, रुपए खाए हैं। उन रुपयों में क़र्ज़ का ज़हर था, उसी ने मुझे मारा है। मेरी लाश तब तक न जलाई जाए, जब तक चंदा बच्चे को लेकर न आ जाए। आग बच्चे से दिलवाई जाए। बस।”

माँ जब कहानी समाप्त करती थीं, तो आसपास बैठे बच्चे फूल चढ़ाते थे। मेरी कहानी भी ख़त्म हो गई, पर...

कमलेश्वर

#समाजकीबात #samajkibaat #Sahitya #साहित्य

#कृष्णधरशर्मा #Krishnadharsharma