नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

गुरुवार, 13 जून 2013

हम तो हैं परदेश में देश में निकला होगा चाँद

हम तो हैं परदेश में देश में निकला होगा चाँद
अपनी रात की छत पे कितना तनहा होगा चाँद।

चाँद बिना हर शब यों बीती जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चाँद।

आ पिया मोरे नैनन में मैं पलक ढाँप तोहे लूँ
ना मैं देखूँ और को, ना तोहे देखन दूँ।

रात ने ऐसा पेंच लगाया टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चाँद।
                                                                   राही मासूम रजा 

रविवार, 9 जून 2013

प्रेरणा स्रोत महिलायें



नोरती बाई

10 साल की उम्र में पढ़ाई से छोड़ने वाली नोरती बाई ने 45 साल बाद कंप्यूटर सीखने का फैसला किया। कंप्यूटर सीखने के लिए कम ज्ञान और शिक्षा को कभी हावी नहीं होने दिया। शुरू में कंप्यूटर की बेसिक जानकारी लेने के बाद नोरती देवी जल्द ही कंप्यूटर चलाने में माहिर हो गईं। फिर उनकों समाज के लिए कंप्यूटर और इंटरनेट की उपयोगिता के बारे में एहसास हुआ।
पहली बार, नोरती बाई ने स्थानीय पंचायत योजनाओं से जुड़कर आसपास के गांवों में जलसंसाधनों की जानकारी सरकार को मुहैया कराई। इस प्रक्रिया में पानी, नलकूप और तालाब के स्थानों के लिए नक्शे शामिल थे, जो स्थानीय समुदाय के लिए काफी सहायक साबित हुआ। इसी के साथ नोरती ने कॉलेज में स्थानीय महिलाओं को कंप्यूटर सिखाना भी शुरू कर दिया। इस बात की खबर पूरे गांव में फैल गई और लोग नोरती से पढ़ने के लिए आने लगे। यहां तक कि गांव की 5 वीं, 6ठी पास लड़कियां भी कंप्यूटर सीखने के लिए नोरती के पास पहुंचने लगीं।
हालांकि, नोरती बाई को गाववालों के पूरा समर्थन मिला, जिससे वो स्थानीय चुनाव जीतकर हरमारा गांव की पहली दलित महिला सरपंच भी बन गई। आज गांव की दूसरी महिलाएं नोरती बाई को अपना आदर्श मानती हैं।
नोरती बाई देशभर की गिनी चुनी उन महिलाओं में से हैं जिन्होंने सीआईआई-भारती वुमेन एक्जेंमपलरी अवॉर्ड प्राप्त किया है। ये अवॉर्ड उन्हें 2007 में समाज में विकास के लिए सराहनीय योगदान के लिए दिया गया।

कृष्णा पुनिया

11 अक्टूबर 2010 को दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में डिस्कस थ्रो के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली महिला एथलीट बन गईं। हरियाणा के अग्रोहा गांव में एक जाट परिवार में जन्मी कृष्णा के सर से मां का साया बचपन में उठ गया। उसके दूसरे रिश्तेदारों ने उन्हें पाल पोष का बड़ा किया।
सीमित साधन और तंगहाली की वजह से कृष्णा ने बड़ी मुश्किल से हालात का मुकाबला किया। इन सबके बावजूद उसने कभी हिम्मत नहीं हारी औऱ एक सफल एथलीट बनने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत करती रही।
अपने बांह की मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए अपने पिता के डेयरी में भैंसों से दूध निकालती थी, यहीं उसके व्यायाम के लिए नया औजार था। परिवार का पूरा साथ मिलने पर अपनी पढ़ाई के साथ साथ कृष्णा ने खेल पर भी समय देना शुरू कर दिया। जल्द ही कृष्णा की शादी गगरवास गांव में विरेंदर सिंह पुनिया से हो गई, जहां पर्दा प्रथा का चलन था। हालांकि, अपने पति की वजह से कृष्णा को ज्यादा परेशानी नहीं आई। पूर्व एथलीट होने की वजह से पति ने अपनी पत्नी कृष्णा का भरपूर सहयोग दिया। 2012 में लंदन ओलंपिक्स में डिस्कस थ्रो कैटगरी में कृष्णा सातवीं पायदान पर रहीं।

राजकला देवी

राजस्थान, अलवर जिले के हिंगवाहेरा गांव में राजकला देवी सबसे पहली महिला सरपंच हैं। बिना किसी शिक्षा के एक साधारण परिवार में पली बढ़ी राजकला ने अबतक एक लंबा सफर तय कर लिया है। पहले पंचायत की बैठक में महिलाओं के शामिल होने पर अजीब नजर से देखते और हतोत्साहित करते थे। लेकिन जबसे राजकला सरपंच बनी, तब से उन्होंने समाज की रूढ़ीवादी सोच में सफलतापूर्वक बदलाव लाया है। इस भरोसे के साथ कि लड़कियों के लिए शिक्षा एक समाज को नई दिशा दे सकती है, उन्होंने इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया। राजकला के नेतृत्व में गांव की गरीब महिलाओं को बीपीएल कार्ड मिला और हर गांववाले को साफ पीने का पानी, सड़क, शौचालय मुहैया हो सका। दूसरी बार संरपंच चुनीं जाने पर राजकला ने गांव की कई महिलाओं को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वो भी पुरानी रुढ़ीवादी प्रथा का मुकाबला करें और जोरदार तरीके से अपनी बात पुरुषों के सामने भी रखें। इसके अलावा राजकला ने महिलाओं को स्थानीय राजनीति में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। ताकि समाज की कई समस्याओं का हल खुद ढूंढ़ सकें। आज राजकला समाज के लिए आदर्श के साथ-साथ प्रेरक भी बन गईं हैं।
फिलहाल, राजकला यूएन वुमेन और हंगर प्रोजेक्ट के साथ जुड़ीं हैं और वो महिला जागरुक मंच के साथ काम कर रही हैं।

सुषमा भादो

बचपन में ही स्कूल छोड़ चुकी 32 साल की सुषमा भादू हरियाणा में धानी मियां गांव के विश्नोई समुदाय से हैं। समुदाय में सदियों से प्रचलित घूंघट की प्रथा के जरिए महिलाएं बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करती हैं। लेकिन, सुषमा को ये कतई पसंद नहीं था। सदियों पुरानी इस प्रथा से वो छुटकारा पाना चाहती थी। इसलिए वो गांव की राजनीति में हिस्सा लेना चाहती थी और फिर जून 2010 में गांव की सरपंच चुन ली गई। महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए सुषमा ने गांव में ही उनके लिए इंडियन बैंक की मदद से एक टेलरिंग ट्रेनिंग सेंटर की स्थापना की। ये गांव के लिए सुषमा का क्रांतिकारी कदम साबित हुआ । इसके अलावा सुषमा ने गांव के हर बच्चे को स्कूल भेजने पर दिया और साथ ही राज्य सरकार से गांव में पीने का पानी के लिए फंड मंगाए। इस तरह सुषमा के आत्मविश्वास के साथ उसकी शख्सियत भी मशहूर होती गई। एक दिन आम बैठक में खुलेआम पर्दे का विरोध कर दिया और लोगों से भी ऐसा करने को कहा था। लेकिन, आज धानी मियां गांव की महिलाएं सुषमा को आदर्श मान चुकीं हैं। इस तरह सुषमा ने गांव में खुद को आइरन लेडी की तरह साबित किया है।

बिमला देवी

बिमला देवी का जन्म हरियाणा के रेवाड़ी में एक दलित परिवार में हआ था। भेदभाव से घिरा बिमला का बचपन काफी दिक्कतों में गुजरा, जहां उन्हें आम जगहों पर पाबंदी और सरेआम बेइज्जती भी झेलनी पड़ी। इस दर्द को लिए बिमला ने एक ऐसे समाज की कल्पना की जहां किसी तरह का भेदभाव न हो और सभी जाति के लोग एक साथ रहें। बड़ी होकर बिमला ने अपने गांव की महिलाओं को इकट्ठा कर स्वास्थ्य के कई मुद्दों पर शिक्षित करना शुरू किया। साथ ही उन्होंने चुनाव के दौरान वोट की अहमियत, आर्थिक विकास और समाज में समानता के बारे में बताया। इसके अलावा गांववालों को सभी प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं को बारे में खुलकर बताने के लिए प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे बिमला ने समाज में छूआछूत और भेदभाव जैसे मुद्दों को भी उठाना शुरू किया। इसी कोशिश के चलते आज गांव में उंची जाति और निचली जाति के लोग समाज में एक साथ एक ही नल का पानी पीते है।
सिर्फ आठवीं क्लास तक पढ़ी बिमला का आत्मविश्वास इतना बढ़ चुका है कि समाज में महिला के हक के लिए हमेशा खड़ी दिखती हैं। आजकल बिमला स्थांनीय एनजीओ के साथ मिलकर गांव की लड़कियों को स्वास्थ और जाति जैसे विषयों पर शिक्षा देती हैं। भविष्य में बिमला अपने किताब के जरिए अपनी जिंदगी की पहलूओं से अवगत कराते हुए महिलाओं के स्वास्थ्य की बातों से अवगत कराएंगी।
क्वोट- “समाज में महिलाओं को बराबर का अधिकार है। हमें भी समाज में पुरुषों की तरह आजाद और सुरक्षित महसूस करने का हक है। मुझे गर्व है कि मैने महिला के रूप में जन्म लिया और दूसरों की भलाई के लिए काम कर रही हूं।”

गीतांजलि बब्बर

पत्रकारिता में स्नातक और डेवलपमेंट कम्युनिकेशन में स्नाकोत्तर गीतांजलि बब्बर ने वेश्याओं की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए कई बड़ी-बड़ी नौकरियों को ठुकरा कर एक सेंटर की स्थापना की। गीतांजलि के दिल में वेश्याओं के लिए हमदर्दी तब पैदा हुई जब उन्हें नेशनल एड्स कंट्रोल सोसायटी के साथ एक छात्र के रूप में दिल्ली के जी बी रोड में किन्नरों के साथ काम करने का मौका मिला। इस दौरान गीतांजलि इलाके की कई वेश्याओं से रूबरू हुईं। वेश्याओं की जिंदगी को करीब से देखने के बाद गीतांजलि को कड़वी सच्चाई का पता चला,जिसमें उन्होंने पाया कि प्रत्येक वेश्या दिन भर में 20 से 40 ग्राहकों की सेवा करती हैं। गुमनामी की जिंदगी गुजार रही वेश्याओं को जरूरत थी कि कोई उनसे उनका दर्द बांटे, न कि सुरक्षित यौन संबंध की बात करे। और इसी कमी को पूरा करने के लिए गीतांजलि बब्बर ने कट-कथा नाम की संस्था की शुरुआत की। कट-कथा गीतांजलि द्रारा एक ऐसा प्रयास है जिससे वेश्याओं की जिंदगी में बदलाव और उन्हें रोजगार का दूसरा विकल्प मिल सके। इसमें एक बड़ी खासियत ये है कि ये संस्था वेश्यवृति के खिलाफ प्रचलित अभियानों के बजाय समुदाय की भागीदारी पर जोर देती है। गीतांजलि जी बी रोड की वेश्याओं को कई तरह के प्रशिक्षण के साथ-साथ जिंदगी की मुख्याधारा से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। आज कट-कथा के जरिए गीतांजलि करीब 3500 से 4000 वेश्याओं के साथ मिलकर समाज में बदलाव के लिए प्रेरक बन चुकी हैं।

सुनिता चौधरी

यूपी के बहादुरगढ़ में सुनिता चौधरी ऐसे रुढ़ीवादी समाज में पली बढ़ीं जहां महिलाओं, लड़कियों को पर्दे में रहना पड़ता है। स्कूल, कॉलेज में महिलाओं का जाना मुश्किल होता है, जिसकी वजह से उस गांव की महिलाएं कम पढ़ी लिखी हैं। दूसरी महिलाओं की तरह सुनिता भी पूरी जिंदगी भर की चार दिवारी के भीतर गुजार दिया और आज वो सिर्फ पढ़ना और गिनना जानती है। 14 साल की उम्र में एक ऐसे पुरुष से शादी हो गई थी जो हमेशा गाली-गलौच और झगड़ा करता, जिससे वो काफी दुखी रहती थी। इससे तंग आकर एक दिन भागकर दिल्ली चली गई।
एक अंजान शहर में अपनी जिंदगी चलाने के लिए सुनिता ने काफी दिक्कतें झेली। ऐसे ही एक दिन बस में सफर के दौरान उनकी नजर ड्राइवर पर गई और फिर फैसला किया कि वो भी एक दिन ड्राइविंग सीखकर ऑटो चलाएगी, ताकि उसकी कुछ कमाई हो सके। महिला होने के नाते पुरुष प्रधान समाज में ऑटो चलाना एक अजीबोगरीब फैसला था। लेकिन, सुनिता ने कभी हिम्मत नहीं हारी। सुनिता ने हर चुनौतियों का सामना किया और ठीक तीन साल बाद उसे ऑटो लाइसेंस केसाथ-साथ ऑटो खरीदने के लिए लोन भी मिल गए।
लोन चुकाने के लिए सुनिता दिल्ली और एनसीआर में रोजाना 2 शिफ्ट में ऑटो चलाने लगी। शांत स्वभाव और दृढ़ निश्चय वाली सुनिता आज दूसरी महिलाओं के आदर्श बन चुकी है। अब सुनिता अपनी ही तरह दूसरी महिलाओं की मदद करती है। आगे चलकर लड़कियों की शिक्षा पर काम करना चाहती है, जिसकी कमी से उसे जिंदगी में कई मुश्किलों का समना करना पड़ा।
क्वोट- “मुझे अपने महिला होने पर गर्व है क्योंकि महिला ही किसी को भी एक नई जिंदगी देती है। अगर महिला चाहे तो वो शक्तिशाली बन सकती है, उसके कई रूप होते हैं। वो अगर भगवान हो सकती है तो विध्वंसक भी बन सकती है।”

चांदरो तोमर

करीब 10 साल पहले, चांदरो तोमर अपनी पोती के साथ स्थानीय फायरिंग रेंज घूमने गईं। वहां पहुंचकर, अचानक उनको लगा उनमें भी शूटिंग करने की काबलियत है। यूपी के बागपत जिले की चांदरो तोमर ने 65 साल की उम्र में पहली बार राइफल को उठाया। उसी वक्त उनके कोच को भी तोमर की काबलियत का पता चला। इसे देखकर कोच इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने तोमर को प्रशिक्षण और प्रोत्साहन देने का फैसला किया।
हालांकि शूटिंग करियर के शुरूआत में, तोमर को काफी दिक्कते आईं। अपने रिश्तेदारों के अलावा समाज का पुरुष वर्ग भी तोमर के फैसले के खिलाफ था। लेकिन, तोमर ने इसका बिना कोई परवाह किए प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। तोमर की काबलियत को देखकर दूसरे प्रतियोगी भी उनसे हारने में भी बेइज्जती महसूस नहीं करते थे।
आज 78 साल की चांदरो तोमर दुनिया का सबसे बुजुर्ग शार्पशूटर बन गईं हैं जिन्होंने 25 से ज्यादा राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप जीत चुकी हैं। इसके अलावा, परिवार में 6 बच्चों और 15 नाती-पोतों की देखभाल करती हैं। अपने हौसले और काबलियत की बदौलत चांदरो तोमर आज की नई पीढ़ी के लिए एक आदर्श बन चुकी हैं।
चांदरों तोमर गांवों की दूसरी लड़कियों के लिए शूटिंग कैंप आयोजित करने से लेकर अबतक 27 से ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय शूटर्स को भी प्रशिक्षित कर चुकीं हैं।

थिनलास कारोल

थिनलास कारोल का जन्म लद्दाख के ताकमाचिक इलाके में हुआ था। बचपन में ही मां के साए से महरूम हो चुकी थिनलास, पिता की छत्रछाया में बड़ी हुई। कहीं पिता का भी साया सर से न उठ जाए, इस डर से थिनलास अपने पिता को अपनी नजरों से दूर नहीं होने देती थी। यहां तक कि पिता के साथ ही पहाड़ों में भेड़ बकरियां चराने जाती थी। पहाड़ों के बीच रहकर धीरे-धीरे थिलनास को बाहर घूमना, पहाड़ों पर चढ़ना अच्छा लगने लगा। अचानक एक दिन, एक दिन उसे बाहर से आए ट्रैक्रस के साथ जाने का मौका मिला। उसे ये काम इतना अच्छा लगा कि उसने फैसला कर लिया कि भविष्य में हो माउंटेन गाइड का करेंगी। और फिर, थिनलास ने पर्वतारोहण का कोर्स के साथ साथ पूरी तरह से प्रशिक्षण लेकर लद्दाख में ट्रेकिंग गाइड की भूमिका में उतरीं। इस क्षेत्र में थिलनास ने न सिर्फ खुद को स्थापित किया बल्कि और लड़कियों को भी इसमें नए आयाम दिए ।

हालांकि, 2004 से लेकर अब तक थिनलास को बहुत सी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। इन चुनौतियों के सीख लेकर थिलनास ने दूसरों को प्रशिक्षण देने के लिए महिलाओं द्वारा संचालित गाइड कंपनी खोलने का फैसला किया। इस प्रकार 2009 में लद्दाख वुमेंस ट्रेवल्स कंपनी की स्थापना कर दूसरी महिलाओं को भी आगे बढ़ने को प्रेरित कर रही हैं।
इसके लिए 2008 में उन्हें लद्दाख वुमेंस राइटर अवॉर्ड्स से भी नवाजा जा चुका है। फिलहाल, थिनलास एक स्वतंत्र गाइड के रूप में लद्दाख की दूसरी महिलाओं का मार्गदर्शन कर रही हैं।
क्वोट- मुझे खुशी है कि मैंने सिर्फ खुद को नहीं, बल्कि दूसरी लड़कियों को भी इस क्षेत्र में अपनी एक जगह बनाने के लिए प्रेरित किया। मैं खुश हूं कि पर्वतारोहण और ट्रैकिंग के सिक्लड वर्क में सफलता हासिल की और लोग मुझे जानते हैं, मुझे सराहते हैं।

रानी बेगम

मुजफ्फरपुर में चतुर्भुज स्थान की पार्षद रानी बेगम का बचपन काफी परेशानियों में बीता। 12 साल की उम्र से ही उनपर जुल्म होते रहे। उत्तरी बिहार का एक छोटा सा शहर यानी रेड लाइट एरिया जहां एक हजार से ज्यादा वेश्याएं रहती है। इस इलाके में रानी बेगम को अपनी बहनों के खिलाफ हो रहे अत्याचार ना काबिले बर्दाश्त थे। और फिर एक दिन, इन वेश्यायों के हमक औऱ जुल्म के खिलाफ लड़ने का फैसला कर लिया। हालांकि, रानी बेगम के लिए ये आसान नहीं था औऱ यहां तक कि इस कदम के लिए कई नेता, अपराधी औऱ पुलिस का विरोध झेलना पड़ा। बिना डरे और रुके, अपनी मांग पर ध्यान आकर्षित कराने के लिए रानी ने कई बार विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल किए। इनकी कोशिशों के चलते स्थानीय प्रशासन ने रेड लाइट इलाके में 6 राशन की दुकान के साथ शिविर भी लगवाए जहां महिलाओं और बेरोजगार युवाओं के लिए प्राथमिक चिकित्सा सुविधा उपल्ब्ध थी। धीरे-धीरे रानी बेगम को इलाके के लोगों का समर्थन मिलता गया और उनके काम ने समाज में एक पहचान दिलाई। और फिर एक दिन रानी बेगम ने राजनीति का हिस्सा बनने का फैसला कर मुजफ्फपुर स्थानीय निकाय चुनाव में कूद पड़ी और लोगों ने उन्हें अपना वॉर्ड काउंसिलर चुन लिया। रानी बेगम ने इलाके में अपने प्रति न सिर्फ लोगों की सोच को बदला, बल्कि समाज में हर तबके का ख्याल रखकर उनका विकास किया। आज वो एक गर्वान्वित दादी अपने 2 नाती-पोतों के साथ खुशहाल हैं।
क्वोट- “मुझे गर्व है कि मैंने इमानदारी और लगन से कई लोगों की जिंदगी में खुशी ला पाई हूं। दुनिया में आज जहां वेश्या और वेश्यालयों को हेय नजर से देखते हैं, मुझे खुशी है कि मेरी कोशिशों ने उनकी जिंदगी को आसान औऱ खुशहाल बनाया है। अगर मुझे मौका मिला तो पूरे शहर को और खूबसूरत बनाउंगी।“

फ़ाल्गुनी निवेतिया

गुजरात में जन्मीं और कलकत्ता के एक बड़े व्यवसायी की बेटी- फ़ाल्गुनी को काफी विरोध का सामना करना पड़ा जब उसने अरुण से शादी का फैसला किया। 10 साल की उम्र से कैंसर रोग से ग्रसित अरुण को कई और बिमारियों ने जकड़ रखा था। लेकिन, फिर भी परिवार के लाख विरोध के बावजूद फ़ाल्गुनी ने अपने प्यार अरुण से ही शादी रचाई। शादी के बाद अरुण की इलाज के लिए फ़ाल्गुनी उसे लेकर अकसर मुंबई आना जाना करती थी। इससे जाहिर होता है कि कलकत्ता में स्वास्थ्य चिकित्सा की बेहतर सुविधा न होने की वजह से लोगों को इलाज के लिए दूसरे शहर जाना पड़ता था। इस परेशानी से दो-चार होकर एक दिन दोनों ने फैसला किया कि कलकत्ता में चिक्तिसा सुविधा बेहतर करने के लिए वो हर संभव कोशिश करेंगे। इस प्रकार, 2009 में फ़ाल्गुनी ने अपने 20 साल पुरानी नौकरी छोड़ नादिया जिले में एक प्राइमरी हेल्थ केयर फाउंडेशन की स्थापना की हालांकि, फ़ाल्गुनी को हेल्थ केयर फाउंडेशन और परिवार की देखरेख करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। परिवार और अपने बीमार पति की देखरेख के अलावा हेल्थ केयर फाउंडेशन के प्रबंधन बखूबी करती हैं। अपनी लगन और समाज के प्रति समर्पण से आज फ़ाल्गुनी सभी औरतों के लिए आदर्श बन चुकी हैं।नादिया जिले के मायापुर में एक सेंटर के रूप में शुरू हुई प्राइमरी हेल्थ केयर फाउंडेशन की आज बंगाल के 4 जिलों में 5 सेंटर हैं। यहां गरीबों के लिए सस्ते इलाज के साथ साथ एक हफ्ते की फ्री दवाई भी मिलती है।
2012 में इस सामाजिक सेवा के लिए प्राइमरी हेल्थ केयर फाउंडेशन को सोशल इटरप्राइज ऑफ द ईयर अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। गरीबों की सेवा में समर्पित फ़ाल्गुनी और अरुण 2015 तक बंगाल के हर जिले में प्राइमरी हेल्थ केयर फाउंडेशन की इकाई खोलना चाहते हैं।
क्वोट-” मैं उस समुदाय से आती हूं जहां हमेशा से पुरुषों का बोलबाला रहा है, किसी भी फैसले में महिला की भागीदारी नहीं होती। लेकिन, मैंने कुछ अलग करने का फैसला किया। और आज मुझे अपने सभी फैसले पर गर्व है, चाहे वो एक कैंसर रोगी से शादी का मामला हो या शिक्षिका की नौकरी छोड़ समाज की सेवा का फैसला हो। ये सब किसी भी महिला के लिए तभी संभव हो सकता है जब वो खुद की क्षमताओं को पहचान कर अपने डर पर काबू पाए, जिससे उसे समाज में सही मुकाम मिल सकता है।”

अर्चना राजेंदर हेगड़े

उत्तर कन्नड़ जिले में अर्चना हेगड़े का गांव सुपारी के व्यवसाय के लिए जाना जात है। यहां ज्यादातर लोग गरीब हैं, जो साल के 6 महीने सुपारी के फॉर्म में मजदूरी कर अपना परिवार चलाते है। सुपारी फॉर्मिंग सीजन खत्म होने के बाद गांव के लोग अपना घर, परिवार छोड़ रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों में पलायन करते हैं। अर्चना ने इसी गरीबी और पलायन की समस्या से निजात दिलाने और गांव को लोगों की तकदीर बदलने की ठानी। एक बार मंदिर में दर्शन के दौरान अर्चना ने लोगों को सुपारी के पेड़ के पत्तों में खाना खाते देखा। इसी से प्रभावित होकर अर्चना को लगा कि गांव में बेकार पड़े कृषि के कचड़े को रिसाइकिल कर प्लास्टिक प्लेट्स, कप की जगह इस्तेमाल कर सकते हैं। काफी शोध के बाद अर्चना को लगा वो गांववालों के साथ मिलकर सुपारी के पत्तों से प्लेट्स, कप तैयार कर सकती हैं जिससे गांव में एक रोजगार का नया साधन पैदा हो सकता है। अपने नए आइडिया से उत्साहित अर्चना ने आखिरकार इसके लिए पैसा इकट्ठा करना शुरू किया। लेकिन, उसके लिए लोन लेना आसान नहीं था। कई कोशिशों के बाद आईआईएम बैंगलोर की ग्रामीण विकास शाखा ‘बी फंड!’ ने अर्चना की आइडिया पर पैसा लगाने का फैसला किया। अर्चना की इन कोशिशों की बदौलत राशिदा ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स मैन्यूफैक्चरिंग की स्थापना हुई। राशिदा ऑर्गेनिक की स्थापना के सिर्फ 2 महीने बाद ने जहां गांव की 85 महिलाओं को रोजगार दिया, वहीं 50 किसानों को आमदनी बढ़ाने में मददगार साबित हुई।
इस तरह सुपारी के पत्तों से रोजगार पैदा करने का अर्चना का आइडिया ने पूरे गांव की सूरत बदल दी। इससे पहले पूरे कर्नाटक में प्लास्टिक के प्लेट्स, कप काफी इस्तेमाल किए जाते थे। लेकिन, प्रदूषण के चलते प्लास्टिक की चीजों पर सरकारी पाबंदी अर्चना के लिए वरदान साबित हुई। प्लास्टिक पर पाबंदी के बाद अर्चना के लिए एक बड़ा और आसान बाजार मिल गया। राशिदा ऑर्गेनिक द्वारा निर्मित अब तक करीब 2 लाख प्लेट्स और कप ने कई घरों और दूकानों में जगह बना ली है। राशिदा ऑर्गेनिक में काम करने वालों में मजदूरों के अलावा, छात्र, महिलाएं भी शामिल हैं जो 500 रु. से 800 रु. प्रति माह कमा लेते हैं।
क्वोट- “महिला होने के नाते मुझे खुद पर गर्व है कि मैं आज अपने घर के साथ साथ एक सफल व्यवसायी भी हूं। साथ ही मुझे गर्व है कि बतौर सफल उद्यमी मैं दूसरी महिलाओं और बच्चों को भी प्रेरित करती हूं, जो मुझे रोल मॉडल के रूप में देखते हैं।“

बिरो बाला राभा

भारत के नॉर्थ-ईस्ट इलाके में जनजातीय समाज के बीच जादू-टोना एक सामाजिक अभिशाप बन चुका है। इस इलाके में अगर किसी बच्चे की तबीयत भी खराब होती है, तो लोग किसी अन्य महिला पर जादू-टोना का इल्जाम लगाकर उसे सरेआम बेइज्जत करते हैं। ऐसे अंधविश्वास, कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने की किसी की हिम्मत नहीं होती। इस प्रकार, हर साल अंधविश्वास की शिकार करीब 150 से 200 महिलाओं की मौत हो जाती है।
लेकिन, असम के एक छोटे से गांव गोलपारा में जन्मी बिरो बाला राभा की कहानी इन महिलाओं से अलग है। बिरो ने अपने समाज में फैले अंधविश्वास, कुरीतियों को जड़ से मिटाने का बीड़ा उठाया है। कई साल पहले, बिरो बाला के मानसिक रोगी बेटे को गांव के ही एक डॉक्टर ने जादू-टोना का शिकार बताया और फिर उसे डायन करार दिया गया था। अपने बच्चे के इलाज को लेकर परेशान बिरो बाला अंग्रेजी दवा कराना चाहती थी, लेकिन गांव वालों ने ऐसा करने से भी रोक दिया। इस हद तक गांव वालों ने प्रताड़ित किया कि उसे गांव छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। अंधविश्वास की शिकार बिरो बाला, अब अपने दृढ़ निश्चय के साथ समाज में फैले अंधविश्वास और कुरीतियों और शिक्षा के जरिए लोगों की सोच बदलने के लिए लगातार सक्रीय है। समाज के लिए बिरो का समर्पण और त्याग उसके लिए एक बड़ा हथियार है, जिससे गांव की दूसरी औरतों को भी एक सामान्य जिंदगी जीने की उम्मीद जगी है।

राशीदा बी

ठीक 28 साल पहले 2-3 दिसंबर 1984 की दरमियानी रात भोपाल में मौत का कहर बरसाने वाली रात थी। ये रात भोपालवासियों के लिए काल की रात बनकर सामने आई, जिसने हजारों लोगों को मौत का नींद सुला दी और सैंकड़ों को जानलेवा बीमारी के आगोश में छोड़ गई । दरअसल, इस दिन एक भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई थी, जिसे हम भोपाल गैस कांड, या भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जानते हैं। राशिदा बी भी उन बदनसीबों में शामिल थीं जिन्होंने इस गैस त्रासदी में अपनों को खोया था। 13 साल की उम्र में सुहागिन बनी राशिदा, अपने जख्मी पति और पिता को छोड़ परिवार को 6 लोगों को खोने का गम, आज भी नहीं भुला पाई हैं। ऐसे में उस वक्त राशिदा को मदद औऱ न्याय की सख्त दरकार थी, लेकिन उसे कहीं से कुछ नहीं मिला। फिर भी, अकेले पति और पिता की जिम्मेदारी का बोझ लिए राशिदा ने कभी हिम्मत नहीं हारी।
तब, राशिदा ने फैसला किया कि वो गैस त्रासदी से प्रभावित बच्चों की मदद करेंगी। अपनी ही तरह पति और बेटे को खोने वाली एक अन्य पीड़िता चम्पा देवी के साथ मिलकर राशिदा बी ने चिंगारी ट्रस्ट की स्थापना कर डाली। आज इस ट्रस्ट की अंतर्राष्ट्रीय पहचान है, जिसके लिए उन्हें गोल्डमैन पर्यावरण अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। फिलहाल, चिंगारी ट्रस्ट के अंतर्गत आज भी डाउ केमिकल और उसके सहयोगी यूनियन कार्बाइड के खिलाफ अभियान जारी है।
क्वोटः “जब तक मैं घर से बाहर नहीं निकली थी, मैं दुनिया से अनभिज्ञ थी। लेकिन, अब जबकि मैंनें लाखों लोगों के लिये आवाज उठाई है, महसूस करती हूँ कि एक नारी कितनी शक्तिशाली होती है।”

डॉ. पी भानुमति

केरल के त्रिसुर में जीवविज्ञान की प्रोफेसर, डॉ. पी भानुमति का बचपन अपने तीन मानसिक रूप से कमजोर भाई-बहनों के साथ बीता।अचानक एक दिन, उन्होंने गले में बीमारी से ग्रसित अपने भाई को खो दिया। इस दुखद घटना से भानुमति को लगा कि मानसिक बीमारी की वजह से डॉक्टरों ने उसके भाई पर कोई तवज्जू नहीं दी, जिससे उसकी मौत हो गई। साथ ही भानुमति को ये भी लगा कि शायद मानसिक रोगियों के लिए चिक्त्सा सुविधा दूसरे मरीजों के मुकाबले कम होती है।
जबकि ऐसे मरीजों की देखभाल के लिए विशेष सुविधाओं से लैस प्रशिक्षित डॉक्टरों की टीम की जरूरत होती है। इस सौतेला व्यवहार से आहत डॉ. पी भानुमति ने मानसिक रोगियों के लिए कुछ करने का फैसला किया। और इसप्रकार डॉ. भानुमति ने एशोसिएशन फॉर मेंटली हैंडीकैप्ड एडल्टस् (एएमएचए) इंस्टिच्यूच की स्थापना की। हालांकि भानुमति के लिये ये रास्ता आसान नहीं था जहां लोगों को सीखाना था कि कैसे मानसिक रोगियों की विशेष देखरेख की जाती है।
एक छोटे से गांव में सरकारी स्कूल के एक छोटे से कमरे में 3 विद्यार्थियों के साथ शुरू की गई, एएमएचए यानी एशोसिएशन फॉर मेंटली हैंडीकैप्ड एडल्टस् के पास आज कई सुविधाएँ हैं, जहां करीब 60 गरीब मानसिक रूप से बीमार लोगों की सेवा की जा रही है। अपने पति के सहयोग से स्कूल उन्होंने अपना सारा जीवन इस कार्य में लगा दिया है और उनकी देखभाल के लिए अब वो उन रोगियों के साथ स्कूल परिसर में ही रहते हैं।
अच्छे काम शायद ही कभी बिना विरोध के सम्पन्न होते हैं और भानुमति ने भी अपने ही अंदाज में कई बाधाओं को पार किया है। लंबे समय तक मतभेद और विरोध के बाद, भानुमति को आखिरकार स्थानीय प्रशासन के साथ साथ समुदाय का भी सहयोग मिला।
क्वोटः“ मैं अपने तीन मानसिक रूप से कमजोर भाई-बहनों के साथ बड़ी हुई हूँ औऱ एक को इलाज के अभाव में खो भी चुकी हूँ। मैं इन मरीजों का दर्द व तकलीफ जानती हूँ, जिनका अपना परिवार उनसे मुँह मोड़ लेता है। मुझे गर्व है कि मेरी छोटी सी कोशिश से इन चेहरों पर मुस्कुराहट आई है और उनमें सम्मान के साथ जीने की आस जगी है।”

सिंधुताई सपकाल

माई के रूप में पुकारे जाने वाली सिंधुताई का परिवार बहुत बड़ा है जिसमें उनके 200 से ज्यादा दामाद हैं, 40 से ज्यादा बहुएं हैं तो 1000 से भी ज्यादा नाती-नातिनें और पोते-पोतियां हैं। सिंधुताई के इस परिवार में हजार से भी ज्यादा ऐसे और भी बच्चें हैं जिन्हें समाज में ठुकरा दिया गया और सिंधुमाई के आंचल की छाया में पल रहे हैं। माई ने इन लोगों को हदपसर, पुणे में छत दी सनमति बाल निकेतन के नाम से। इतना ही नहीं माई ने इन अनाथों के लिए कुंभार्वलन, सस्वाद में ममता बाल सदन बनाया है तो अमरावती के चिखालदार में माई का आश्रम है। वहीं वर्धा में अभिमान बाल भवन है तो गुहा में गंधारबाबा छात्रालय है। पुणे में भी सिंधु माई ने महिलाओं और बच्चों के लिए सप्तसिंधु महिला आधारा के नाम से आश्रम बनाया है तो बच्चों के लिए बालसंग गोपन नाम से अपनी शिक्षा संस्था भी दी है।
माई को गर्व है कि उनके बहुत से बच्चे आज अनाथों का जीवन नहीं बल्कि सम्मान के साथ जी रहे हैं। कोई डाक्टर है तो कोई जाना माना वकील बन चुका है। इतना ही नहीं सिंधु माई के खुद की अपनी बेटी भी सिंधु माई की तरह अनाथ लोगों के जीवन को सेध देने की ओर अग्रसर हैं।
जिंदगी की शाम में भी माई के चेहरे पर सुबह की लाली और जुनून की रौशनी दमकती है। 80 सालों से अधिक उम्र की सिंधु माई कहती हैं मेरे पास बहुत से काम हैं जिन्हें पूरा करना है।
क्वोटः
“मैं भगवान का शुक्र मनाती हूं कि उसने मुझे औरत का जीवन दिया। क्योंकि एकमात्र मां का आंचल ही है जो हर बच्चे को छाया देने में सक्षम है। मां ही है जो खुद भूखी रहकर भी अपने कई बच्चों का एक साथ पेट भरने का माद्दा रखती है। दुनिया में सिर्फ भारत ही एक ऐसा देश है जिसे माता (भारतमाता) कहकर पुकारा जाता है। मुझे गर्व है कि मैं भी कई बच्चों की मां हूं। जब मैं घर से चली थी तो मैं भूखी थी और मेरी नन्ही सी बेटी भी। आज मुझे गर्व होता है कि मैंने अपनी भूख को जीता और हजारों बच्चों का पेट भरना सीखा। मुझे मान है, अभिमान है कि मैं मां हूं।

चंद्रलेखा

चंद्रलेखा उस गांव की हैं जहां बेटियों के जन्म पर कोई मायूस नहीं होता बल्कि खूब जश्न मनाया जाता है। बस दुख इस बात का है क यह जश्न बहुत ही गलत कारणों से मनाया जाता है। नटपुर्वा गांव जहां 300 सालों से आज भी एक निहायती बदनाम परंपरा जारी है, और ये है वेश्यावृति। इसलिए इस गांव में बेटी के जन्म पर परिवार में खुशी की छटा सी बिखर जाती है, क्योंकि इस घटिया परंपरा को आगे बढ़ाने वाली जो आ जाती है। इस कुप्रथा की बेड़ियों की पीड़ा झेल चुकी चंद्रलेखा जद्दोजहद कर रही है गांव की बेटियों को इस दलदल से निकालने के लिए। मात्र 15 साल की उम्र से इस पीड़ा का दंश झेलने वाली चंद्रलेखा को किसी और ने नहीं बल्कि उसकी अपनी दादी और मां ने ही उसे इस नर्क में धकेला था, चूंकि वो खुद भी इसी परंपरा की पैरोकार थीं।
हर रोज की यह पीड़ा, संघर्ष 20 सालों तक बदस्तूर जारी रहा। हद तो उस दिन हो गई जब एक शराबी ने नशे में धुत्त बंदूक के बल पर उससे शारीरिक संबंध बनाए। इस हैवानियत ने चंद्रलेखा को झिंझोड़ कर रख दिया और उसने फैसला कर लिया कि अब बस, बहुत हुआ इस कुप्रथा की जंजीरों को तोड़ना ही होगा। चाहे इसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़ी और उसने चुकाई भी। लोगों की गालियां, तिरस्कार, अपमान, मार और पत्थर भी खाए, मगर उसने हिम्मत नहीं हारी। इस दलदल में छह दशक बिता चुकी चंद्रलेखा चार बच्चों की मां ही नहीं बल्कि नट्पुर्वा गांव के लगभग 100 बच्चों की टीचर भी है। जो न सिर्फ उन्हें शिक्षा की रौशनी दे रही है बल्कि हर रोज उन्हें जीवन की मुख्यधारा से जुड़ने के लिए भी प्रेरित करती है। बिजली, पानी, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में भी वो बच्चों में अच्छे जीवन की ललक को जगाए रखने और इस दलदल से निकलने के लिए उनका मार्गदर्शन कर रही है। उसके इस साहसिक कदम में कुछ महिलाएं, कुछ युवतियां तो कुछ बच्चे जागृत हो रहे हैं, जो बेहतर भविष्य की तमन्ना लिए इस कुप्रथा को त्याग भी रहे हैं।
क्वोटः
“ मेरा बीता हुआ कल आज भी मुझे कचोटता है। मगर मुझे खुशी है कि मैं अपने गांव की बच्चियों को, औरतों को इस नरक भरी जिंदगी से निकलने के लिए जागृत कर पाई हूं। इस गांव में लड़कियां बिन ब्याही मां नहीं बल्कि उनके हाथों पर शगुन की मेहंदी भी सजदी है और उनके आंगन में शादी की शहनाई भी गूंजती है। मुझे सुकून है कि मेरी कोशिश रंग ला रही है। मगर हां उस दिन मेरा जीवन और सफल हो जाएगा जिस दिन इस गांव की हर बच्ची स्कूल फिर कालेज भी जाएगी। मेरी जीवन यात्रा ने आज मुझे मजबूत बना दिया है, मुझे गर्व होता है अपने औरत होने पर जब देखती हूं, मेरे गांव की बेटियां अब अपने हक के लिए आवाज उठाती हैं। मैं इनके लिए संघर्ष करती रहूंगी।”

सोनाली मुखर्जी

सोनाली मुखर्जी, ठीक अपने नाम की तरह चमकने और उसे साकार करती 17 साल की होनहार छात्रा थी। धनबाद की रहने वाली सोनाली समाजशास्त्र में ऑनर्स कर रही थी। सिर्फ पढ़ाई ही नहीं विद्यालय में होने वाली तमाम गतिविधियों के साथ एनसीसी की बेहतरीन कैडेट भी थी। मगर एक शाम उसके जीवन की चमक को स्याह अंधेरे में बदल दिया गया। उसके पड़ोस में रहने वाले एक शख्स ने एकतरफा प्यार के चलते सोनाली के साथ अपने दोस्तों के साथ मिलकर यह हैवानियत का नंगा नाच खेला, घर में सो रही सोनाली के चेहरे पर तेजाब फेंका गया। चेहरे पर तेजाब फेंके जाने से सोनाली न सिर्फ जल गई, बल्कि खूबसूरत सोनाली का चेहरा विकृत हो गया, सोनाली आंशिक रूप से दृष्टिहीन हो गई, सुनने की ताकत भी जाती रही। यहाँ तक कि उसे खाना खाने के लिए भी असहनीय दर्द से जूझना पड़ता है। एनसीसी की उमदा कैटेड आज भले शारीरिक रूप से कमजोर हो गई हो, एक वक्त पर मानसिक रूप से भी टूट चुकी सोनाली फिर से हिम्मत बटोर खड़ी है।
दर्द भरे 22 ऑपेरेशन झेल चुकी सोनाली आज अपने सम्मान और नामात्र सजा पाए उन चार शख्सों के खिलाफ खड़ी है जिन्होंने उसके जीवन के साथ खिलवाड़ किया। जबकि ऐसी स्थिति में लोग घर बैठ जाते हैं, टूट जाते हैं लेकिन सोनाली ने अलग रास्ता चुना। वो भारत के लोकप्रिय क्विज कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति में गई और 25 लाख रूपये जीते, जिसे सोनाली अपने होने वाले अगले ऑपरेशनों पर खर्च करेगी।
सहयोगः परिवार का पूरा समर्थन सोनाली को जिन्दगी में लड़ने की प्रेरणा देता रहा। उस घटना के बाद का जीवन मुश्किलों का पर्याय है। सोनाली के इलाज के लिए परिवार की पुश्तैनी जमीन, मां के गहने तक बेचने पड़े। इलाज के लिए धनबाद से दिल्ली आना, शारीरिक, मानसिक पीड़ा के साथ-साथ आर्थिक तंगी की गर्त में भी धंसना था।
सोनाली चाहती है कि तेजाब से हमला करने वालों के खिलाफ कानून सख्त हो। वो चाहती है लोग उन लोगों की लड़कियों की मदद के लिए आगे आएं जो ऐसे हमलों की शिकार हुई हैं। उसके साथ न्याय नहीं हुआ है, वो कहती है मुझे इंतजार है उस दिन का जब ऐसे अमानवीय व्यवहार करने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी, क्योंकि आज भी उसके हमावर बेबाक होकर घूमते हैं।
क्वोटः मेरे जैसी अमानवीय व्यहार की शिकार लड़कियों के लिए टूट जाना जाहिर है। मैंने खुद को मजबूत बनाया, भले शारीरिक रूप से मैं कमजोर हो चुकी हूं, मगर मैं उन लोगों को बता देना चाहती हूं कि मेरी हिम्मत आज भी ऐसे लोगों को चुनौती देती है। मैं आज भी खड़ी इस हिंसा के खिलाफ, बुलंद है मेरी आवाज इस हैवानियत के खिलाफ, जारी रखुंगी मैं अपना संघर्ष। मुझे गर्व है कि मैं हिम्मती नारी हूं।

जया देवी

बिहार के मुंगेर जिले में ग्रीन लेडी के नाम से मशहूर जया देवी की परवरिश ऐसे हालात में हुई जहां गरीबी, उत्पीड़न, भूख और बदहाली के सिवाय कुछ नहीं था। यहां तक कि इलाके के नक्सलियों की धमकी के बाद चौथी क्लास में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी और 12 साल की उम्र में ही सुहागिन बनने को मजबूर होना पड़ा।ऐसे में उनका बचपन संघर्ष और सामंतवादियों के रहमो-करम पर बीता। इन्हीं हालात ने जया को समाज में परिवर्तन के लिए प्रेरित किया। जिसके बाद करैली गांव में उपेक्षिक समुदाय के लिए स्वयं-सहायता समूह की नींव रखी, ताकि वहां के लोगों खासकर महिलाओं को सूद,ब्याज से मुक्ति मिले और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके। 9 पंचायतों में सक्रीय ग्रीन लेडी की महिम ने कई मुद्दों पर स्थानीय लोगों का ध्यान आकर्षित किया, जिसमें पर्यावरण की देखभाल, जल संरक्षण, वृक्षारोपण शामिल है।
लेकिन, इन सब के बावजूद ग्रीन लेडी ‘जया’ अपना मुख्य उद्देश्य नहीं भूलीं। अपनों की हिफाजत और नक्सली दमन से ग्रामीणों को आजादी, आज भी उनकी पहली प्राथमिकता है। हालांकि, वो बखूबी वाकिफ हैं कि नक्सलियों से मुकाबला और सामंतवादियों के खिलाफ परिवर्तन का बिगुल जीवन पर भारी पड़ सकता है, जया ने कभी हिम्मत नहीं हारी और संघर्ष जारी रखा। इतिहास से सबक लेकर, जया परिवर्तन के चक्र को घुमाने के लिये वचनबद्ध है। हम उनकी हिम्मत को सलाम करते हैं।
अगर, उनकी उपलब्धियों की बात करें तो,  उन्होंने अब तक करीब 2000 निरक्षर लोगों को हस्ताक्षर करना सिखाया है और महत्वपूर्ण दस्तावेजों जैसे राशन कार्ड, मतदाता परिचय पत्र, व पेंशन में भी मदद की है। वो अभी भी जनजातियो के यौन-उत्पीड़न के खिलाफ, अपने क्षेत्र को प्रदूषण रहित बनाने और आधारभूत सुविधाओं, शिक्षा व बच्चों के लिये पोषक तत्वों की व्यवस्था के लिये संषर्ष कर रही हैं।
“मुझे जो बात नारी होने पर गर्व कराती है कि मुझे अपनी देखभाल के लिये किसी मर्द की आवश्यकता नहीं है – मैं स्वावलंबी हूँ और अन्य महिलाओं को भी यही करने में सहायता की है। आज, हर एक महिला को समाज में अपनी स्थिति सुधारने की दिशा में काम करना चाहिये और इसके लिए उन्हें जानना चाहिये कि समान स्थिति की माँग कर वो सिर्फ अपने अधिकार की ही माँग कर रही हैं।”
बरथा जी डाखर
जन्मजात नेत्र रोग (रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा) से ग्रसित बरथा जी डाखर, की आँखों के सामने तब पूरी तरह अंधेरा छा गया, जब वो बैंगलोर में सोशल वर्क में पीजी कर रही थीं। इसके साथ ही उनका सोशल वर्क में साइकियाट्रिक बनने का भी सपना भी चूर-चूर हो गया।और फिर निराश होकर अपने पैतृक स्थान शिलॉंग वापस जाने का फैसला कर लिया।
हालांकि, घर वापसी के पहले उन्होंने एक शिक्षिका के पद के लिये आवेदन भी किया था, लेकिन उन्हें असफलता ही हाथ लगी। क्योंकि शिक्षण संस्था को डर था कि एक दृष्टिहीन काम को सफलतापूर्वक नहीं कर सकता।
ऐसे में बरथा को एक सामान्य जिंदगी जीना आसान नहीं था। अपनी जिंदगी को चलाने के लिए उन्होंने जैम और अचार भी बेचना पड़ा। असंवेदनहीन समाज में पली-बढ़ी बरथा ने फिर निश्चय किया कि आगे की जिंदगी वो दृष्टिहीनों के लिये गुजारेंगी। जिसकी वजह से उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी, उसी कमी को दूर करने के लिए यानी दृष्टिहीनों के लिए पढ़ाई की सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए संघर्ष शुरू किया। इस प्रकार उन्होंने मेघालय के एक प्रमुख जनजातीय भाषा, खासी, में ब्रेल कोड का आविष्कार कर डाला, जिसके लिए उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया।
वैसे तो जीवन में कोई सीमा नहीं होती, वो खुद इंसानों द्वारा तय की जाती हैं। जब जिंदगी जीने की उम्मीदों पर काला साया छाने लगा, तब बरथा ने खुद राह बनाने की ठान ली थी। सभी मुश्किलों को पार कर, आज बरथा दृष्टिहीनों के लिये ज्योति श्रोत नाम की फ्री-स्कूल चलाती हैं जो कि लैटुम ख्राह, शिलांग के बेथानी सोसाइटी की एक ईकाई है। इस स्कूल ने अबतक 100 से ऊपर दृष्टिहीनों विद्यार्थियों को एक नया जीवन भी दिया है।
“मुझे नारी होने पर गर्व है क्योंकि मेरे रचयिता का विश्वास है कि जो काम मैं कर रही हूँ वह सबसे अच्छे से एक नारी हृदय के द्वारा ही की जा सकती है और मुझे गर्व है कि मैं उस विश्वास को लिए काम कर रही हूँ।”
सुचेती काडेथंकर
51 दिन, 11 घंटे व 40 मिनट वो समय है जिसमें 33 वर्षीय सुचेती काडेथंकर ने 1000 मील (1623 किमी)  लंबे एशिया के सबसे बड़े रेगिस्तान को पार करने में लगाई। 45 डिग्री की तपती गर्मी और जख्मी कंधे ने भी सुचेता को एशिया के सबसे बड़े रेगिस्तान ‘गोबी’ को पार कर अपने सपनों को साकार करने से नहीं रोक पाई।
सुचेता उस 13 सदस्यीय टीम की सदस्य थीं जिसमें विश्व भर के कई देशों से लोग शामिल थे, जिसकी अगुआई रेगिस्तान के अन्वेषक रिपले डेवेनपोर्ट कर रहे थे। पुणे के कस्बापेठ में जन्मी सुचेता अब एक सॉफ्टवेयर कंपनी में बतौर प्रिंसिपल इंफोरमेशन डेवेलपर काम कर रही हैं। इतिहास में स्नातक, सुचेता ट्रेकिंग में कदम के क्षेत्र में रखने से पहले एक मराठी समाचार-पत्र के साथ बतौर पत्रकार जुड़ी थीं।
बिना किसी बाहरी प्रेरणा के, सुचेता ने न केवल चिलचिलाती गर्मी (45 डिग्री सेल्सियस) की गर्मी को सहा, बल्कि  उस  तपती बंजर भूमि में भी पैदल यात्रा की। उसके दल के अनेक सदस्य हटते रहे, लेकिन छोड़ना उसके लिए विकल्प नहीं था। अपनी परेशानियों को याद करते हुए, सुचेता कहती है, “हमें पानी प्रत्येक 5 दिन पर मिलता था। उसमें से अधिकांश पीने के लिये सुरक्षित रखा जाता था…हम अपने आपको गीले वाइप से पोछते थे।” रिपोर्ट के मुताबिक, उनमें से किसी ने लगभग 2 महीनों तक स्नान नहीं किया था। हालांकि, उसे पता था कि उसकी यात्रा पूरी करने की खुशी उन परेशानियों ज्यादा होगी जो रास्ते में झेलनी पड़ी। और इसी खुशी को पाने के लिए  हर परेशानियों का डटकर मुकाबला किया।
हीराबाई बेन लोबी
हीराबाईबेन वास्तव में एक शक्तिशाली नारी हैं। कम उम्र में सर से मां-बाप का साया उठ जाने के बाद  हीराबाईबेन का बचपन बड़ी कठिनाइयों के साथ बीता। लेकिन, उन्होंने कभी भी हिम्मत नहीं हारा। सीमित साधन के बावजूद लगातार चुनौतियों से मुकाबला करते हुए आजीविका के लिए खेती की नई तरीकों का सहारा लिया।  इस प्रकार बैंक से  लोन लेकर उन्होंने जैविक कम्पोस्ट फार्म शुरू करने का फैसला किया, जिसके लिए स्थानीय समुदाय ने आपत्ति भी जताई। लेकिन कडी मेहनत व दृढ निश्चय और गुजरात के सिद्दी समुदाय की महिलाओं की मदद से, उनकी कोशिशों ने रंग लाया। खेती की यह नई वैज्ञानिक विधि हीराबाई बेन कि लिये बहुत फायदेमंद साबित हुआ और जिससे एक लंबे समय तक चल सकने वाला उद्योग की स्थापना हुई। आज भी हीराबाई बेन की सफलता की कहानी जारी है और उनका वर्मीकम्पोस्ट उत्पादक समूह बडे-बडे ब्रांडों से टक्कर लेते हुए, सलाना करीब 700,000 रूपये का कम्पोस्ट की बिक्री करता है।
अतिरिक्त
हीराबाई बेन ने वृहद समाज के कई दूसरे मुद्दों को भी छुआ है और साथ ही कई महिलाओं को भी इसमें भागीदार बनने के लिये प्रेरित किया है। उनके काम का मुख्य केंद्र स्वास्थ्य, आर्थिक आजादी व खेतीबाडी में बेहतरी पर रहा है। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी आय व कृषि-व्यापार से मिले एवार्ड व फंड को भी स्थानीय स्कूल के विकास में लगाया है। और अब एक कॉलेज खोलने जा रही हैं।
60 साल की उम्र में हीराबाईबेन अपने तीन बच्चों के लिए ही नहीं, पूरे समाज के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
क्वोटः आपको क्या एक गर्वान्वित नारी बनाता है?
“मुझे गर्व है कि गाँव की एक नारी होने के बावजूद मैंने समुदाय के सदस्यों में आत्म-निर्भरता का भाव भरा है, जहाँ जागरूकता की कमी है व फंड जुटाना आसान काम नहीं है। वे सब मुझे एक प्रेरणास्रोत के रूप में देखते हैं ओर इससे मुझे हिम्मत मिलती है व मैं विनम्र रहती हूँ।”

साभार- रेड रिक्शा रेवलूशन

गुरुवार, 16 मई 2013

कौन आया रास्ते आइना खाना हो गए


कौन आया रास्ते आइना खाना हो गए
रात रोशन हो गयी दिन भी सुहाने हो गए

ये भी मुमकिन है कि उसने मुझको पहचाना ना हो
अब उसे देखे हुए कितने जमाने हो गए

जाओ उन कमरों के आईने उठाकर फ़ेंक दो
वे अगर ये कह रहे हों हम पुराने हो गए

मेरी पलकों पर ये आंसू प्यार की तौहीन हैं
उसकी आँखों से गिरे मोती के दाने हो गए
                                                            बशीर बद्र  

वो फ़िराक और विसाल कहाँ?


वो फ़िराक और विसाल कहाँ?
वो शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहाँ?

थी वो एक शख्स के तसव्वुर से
अब वो रानाई _ए-ख़याल कहाँ?

ऐसा आसां नहीं लहू रोना
दिल में ताक़त जिगर में हाल कहाँ?

फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ
मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ?
                                          मिर्ज़ा ग़ालिब 

एक परवाज़ दिखाई दी है


एक परवाज़ दिखाई दी है,
 तेरी आवाज़ सुनाई दी है

जिसकी आँखों में कटी थीं सदियाँ
उसने सदियों की जुदाई दी है

सिर्फ एक सफहा पलट कर उसने
सारी बातों की सफाई दी है

फिर वहीँ लौट के जाना होगा,
यार ने ऐसी रिहाई दी है

आग ने क्या-क्या जलाया है शब भर,
कितनी ख़ुश रंग दिखाई दी है.
                                           गुलज़ार 

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीँ जाता


बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीँ जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता

सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती है निगाहेँ
क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यूँ नहीं जाता

वो एक ही चेहरा तो नहीँ सारे जहाँ में
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते है जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता

वो नाम जो बरसों से ना चेहरा ना बदन है
वो ख्वाब नगर है तो बिखर क्यूँ नहीं जाता
                                                           निदा फाज़ली 

सोमवार, 13 मई 2013

फिर से अपने देश को हमको

आंधी हो या तूफ़ान हो भ्रष्ट हो या बेईमान हो चाहे वह रिश्वतखोर हो या फिर कोई चोर हो हमें बचाना है इनसे अपने प्यारे भारत को करनी है अब हमें सफाई मार भगाना है इनको बहुत हो गया जंगलराज अब तो लाना है स्वराज राजे-महराजों को भगाओ अब तो करेगी जनता राज बहुत चल चुके पीछे-पीछे अब तो चलेंगे हम आगे आओ मिलकर करें उपाय भारत से बेकारी भागे अब तो हमको भारत का खोया सम्मान लौटना है फिर से अपने देश को हमको नंबर वन पर लाना है. (कृष्ण धर शर्मा, २०१३)

रविवार, 21 अप्रैल 2013

ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो


धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो

पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो

फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो
                                                         निदा फाज़ली 

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको



अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने
ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको

ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको

वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ ‘क़तील’
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको
                                                           क़तील शिफ़ाई 

तमन्ना फिर मचल जाये


तमन्ना फिर मचल जाये अगर तुम मिलने आ जाओ,
ये मौसम ही बदल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ

मुझे ग़म है के मैंने ज़िन्दगी में कुछ नहीं पाया,
ये ग़म दिल से निकल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ

नहीं मिलते हो मुझसे तुम तो सब हमदर्द हैं मेरे
ज़माना मुझसे जल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ

ये दुनिया भर के झगड़े घर के किस्से काम की बातें
बला हर एक टल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ
                                                                         जावेद अख्तर 

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

तन्हा-तन्हा हम रो लेंगे


तन्हा-तन्हा हम रो लेंगे, महफ़िल-महफ़िल गायेंगे
जब तक आंसू साथ रहेंगे, तब तक गीत सुनायेंगे

तुम जो सोचो वो तुम जानो, हम तो अपनी कहते हैं
देर ना करना घर जाने में, वरना घर खो जायेंगे

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद-सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जायेंगे

किन राहों से दूर है मंजिल, कौन-सा रास्ता आसां है
हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे

अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर दिल हों, मुमकिन है
हम तो उस दिन रायें देंगे जिस दिन धोखा खाएँगे.
                                                                         निदा फाज़ली 

कभी-कभी यूँ भी हमने


कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को खुद नहीं समझे, औरों को समझाया है

हमसे पूछो इज्ज़तवालों की इज्ज़त का हाल यहाँ
हमने भी इस शहर में रहकर थोड़ा नाम कमाया है

उससे बिछड़े बरसों बीते, लेकिन आज ना जाने क्यूँ?
आँगन में हँसते बच्चों को बेकार धमकाया है

कोई मिला तो हाथ मिलाया, कहीं गए तो बातें की
घर से बाहर जब भी निकले, दिन भर बोझ उठाया है.
                                                                               निदा फाज़ली 

दोस्ती जुर्म नहीं दोस्त बनाते रहिये


आप भी आईये हमको भी बुलाते रहिये
दोस्ती जुर्म नहीं दोस्त बनाते रहिये

ज़हर पी जाइए और बांटिये अमृत सबको
ज़ख्म भी खाइए और गीत भी गाते रहिये

वक़्त ने लूट लीं लोगों की तम्मानाएं भी
ख्वाब जो देखिये औरों को दिखाते रहिये

शक्ल तो आपके भी ज़हेन में होगी कोई
कभी बन जायेगी तस्वीर बनाते रहिये
                                                       जावेद अख्तर 

1971 युद्ध: आँसू, चुटकुले और सरेंडर लंच


तेरह दिन का युद्ध और एक राष्ट्र का जन्म

1971 में पश्चिमी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना और मुक्ति बाहिनी सेना के बीच लड़ाई शुरू हुई. भारत ने मुक्ति बाहिनी का समर्थन किया और तेरह दिन चली लड़ाई के बाद पाकिस्तानी सेना ने हथियार डाल दिए. इस तरह बांग्लादेश का जन्म हुआ.

सात मार्च 1971 को जब बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख़ मुजीबुर्रहमान ढाका के मैदान में पाकिस्तानी शासन को ललकार रहे थे, तो उन्होंने क्या किसी ने भी यह कल्पना नहीं की थी कि ठीक नौ महीने और नौ दिन बाद बांग्लादेश एक वास्तविकता होगा.
पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याहिया ख़ाँ ने जब 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया और शेख़ मुजीब गिरफ़्तार कर लिए गए, वहाँ से शरणार्थियों के भारत आने का सिलसिला शुरू हो गया.
जैसे-जैसे पाकिस्तानी सेना के दुर्व्यवहार की ख़बरें फैलने लगीं, भारत पर दबाव पड़ने लगा कि वह वहाँ पर सैनिक हस्तक्षेप करे.

 

इंदिरा चाहती थीं कि अप्रैल में हमला हो

इंदिरा गांधी ने इस बारे में थलसेनाअध्यक्ष जनरल मानेकशॉ की राय माँगी.
उस समय पूर्वी कमान के स्टाफ़ ऑफ़िसर लेफ़्टिनेंट जनरल जेएफ़आर जैकब याद करते हैं, "जनरल मानेकशॉ ने एक अप्रैल को मुझे फ़ोन कर कहा कि पूर्वी कमान को बांग्लादेश की आज़ादी के लिए तुरंत कार्रवाई करनी है. मैंने उनसे कहा कि ऐसा तुरंत संभव नहीं है क्योंकि हमारे पास सिर्फ़ एक पर्वतीय डिवीजन है जिसके पास पुल बनाने की क्षमता नहीं है. कुछ नदियाँ पाँच पाँच मील चौड़ी हैं. हमारे पास युद्ध के लिए साज़ोसामान भी नहीं है और तुर्रा यह कि मॉनसून शुरू होने वाला है. अगर हम इस समय पूर्वी पाकिस्तान में घुसते हैं तो वहीं फँस कर रह जाएंगे."
मानेकशॉ राजनीतिक दबाव में नहीं झुके और उन्होंने इंदिरा गांधी से साफ़ कहा कि वह पूरी तैयारी के साथ ही लड़ाई में उतरना चाहेंगे.
तीन दिसंबर 1971...इंदिरा गांधी कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं. शाम के धुँधलके में ठीक पाँच बजकर चालीस मिनट पर पाकिस्तानी वायुसेना के सैबर जेट्स और स्टार फ़ाइटर्स विमानों ने भारतीय वायु सीमा पार कर पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर और आगरा के सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराने शुरू कर दिए.
इंदिरा गांधी ने उसी समय दिल्ली लौटने का फ़ैसला किया. दिल्ली में ब्लैक आउट होने के कारण पहले उनके विमान को लखनऊ मोड़ा गया. ग्यारह बजे के आसपास वह दिल्ली पहुँचीं. मंत्रिमंडल की आपात बैठक के बाद लगभग काँपती हुई आवाज़ में अटक-अटक कर उन्होंने देश को संबोधित किया.
पूर्व में तेज़ी से आगे बढ़ते हुए भारतीय सेनाओं ने जेसोर और खुलना पर कब्ज़ा कर लिया. भारतीय सेना की रणनीति थी महत्वपूर्ण ठिकानों को बाई पास करते हुए आगे बढ़ते रहना.

 

ढाका पर कब्ज़ा भारतीय सेना का लक्ष्य नहीं

आश्चर्य की बात है कि पूरे युद्ध में मानेकशॉ खुलना और चटगाँव पर ही कब्ज़ा करने पर ज़ोर देते रहे और ढ़ाका पर कब्ज़ा करने का लक्ष्य भारतीय सेना के सामने रखा ही नहीं गया.
इसकी पुष्टि करते हुए जनरल जैकब कहते हैं, "वास्तव में 13 दिसंबर को जब हमारे सैनिक ढाका के बाहर थे, हमारे पास कमान मुख्यालय पर संदेश आया कि अमुक-अमुक समय तक पहले वह उन सभी नगरों पर कब्ज़ा करे जिन्हें वह बाईपास कर आए थे. अभी भी ढाका का कोई ज़िक्र नहीं था. यह आदेश हमें उस समय मिला जब हमें ढाका की इमारतें साफ़ नज़र आ रही थीं."
पूरे युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी को कभी विचलित नहीं देखा गया. वह पौ फटने तक काम करतीं और जब दूसरे दिन दफ़्तर पहुँचतीं, तो कह नहीं सकता था कि वह सिर्फ़ दो घंटे की नींद लेकर आ रही हैं.
जाने-माने पत्रकार इंदर मल्होत्रा याद करते हैं, "आधी रात के समय जब रेडियो पर उन्होंने देश को संबोधित किया था तो उस समय उनकी आवाज़ में तनाव था और ऐसा लगा कि वह थोड़ी सी परेशान सी हैं. लेकिन उसके अगले रोज़ जब मैं उनसे मिलने गया तो ऐसा लगा कि उन्हें दुनिया में कोई फ़िक्र है ही नहीं. जब मैंने जंग के बारे में पूछा तो बोलीं अच्छी चल रही है. लेकिन यह देखो मैं नार्थ ईस्ट से यह बेड कवर लाई हूँ जिसे मैंने अपने सिटिंग रूम की सेटी पर बिछाया है. कैसा लग रहा है? मैंने कहा बहुत ही ख़ूबसूरत है. ऐसा लगा कि उनके दिमाग़ में कोई चिंता है ही नहीं."

 

गवर्नमेंट हाउस पर बमबारी

14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन के चोटी के अधिकारी भाग लेने वाले हैं.
भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए जाएं. बैठक के दौरान ही मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी. गवर्नर मलिक ने एयर रेड शेल्टर में शरण ली और नमाज़ पढ़ने लगे. वहीं पर काँपते हाथों से उन्होंने अपना इस्तीफ़ा लिखा.
दो दिन बाद ढाका के बाहर मीरपुर ब्रिज पर मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने अपनी जोंगा के बोनेट पर अपने स्टाफ़ ऑफ़िसर के नोट पैड पर पूर्वी पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल नियाज़ी के लिए एक नोट लिखा- प्रिय अब्दुल्लाह, मैं यहीँ पर हूँ. खेल ख़त्म हो चुका है. मैं सलाह देता हूँ कि तुम मुझे अपने आप को सौंप दो और मैं तुम्हारा ख़्याल रखूँगा.
मेजर जनरल गंधर्व नागरा अब इस दुनिया में नहीं हैं. कुछ वर्ष पहले उन्होंने बीबीसी को बताया था, "जब यह संदेश लेकर मेरे एडीसी कैप्टेन हरतोश मेहता नियाज़ी के पास गए तो उन्होंने उनके साथ जनरल जमशेद को भेजा, जो ढाका गैरिसन के जीओसी थे. मैंने जनरल जमशेद की गाड़ी में बैठ कर उनका झंडा उतारा और 2-माउंटेन डिव का झंडा लगा दिया. जब मैं नियाज़ी के पास पहुँचा तो उन्होंने बहुत तपाक से मुझे रिसीव किया."
16 दिसंबर की सुबह सवा नौ बजे जनरल जैकब को मानेकशॉ का संदेश मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुँचें. नियाज़ी ने जैकब को रिसीव करने के लिए एक कार ढाका हवाई अड्डे पर भेजी हुई थी.
जैकब कार से छोड़ी दूर ही आगे बढ़े थे कि मुक्ति बाहिनी के लोगों ने उन पर फ़ायरिंग शुरू कर दी. जैकब दोनों हाथ ऊपर उठा कर कार से नीचे कूदे और उन्हें बताया कि वह भारतीय सेना से हैं. बाहिनी के लोगों ने उन्हें आगे जाने दिया.

 

आँसू और चुटकुले

जब जैकब पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय पहुँचें. तो उन्होंने देखा जनरल नागरा नियाज़ी के गले में बाँहें डाले हुए एक सोफ़े पर बैठे हुए हैं और पंजाबी में उन्हें चुटकुले सुना रहे हैं.
जैकब ने नियाज़ी को आत्मसमर्पण की शर्तें पढ़ कर सुनाई. नियाज़ी की आँखों से आँसू बह निकले. उन्होंने कहा, "कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूँ."
जनरल राव फ़रमान अली ने इस बात पर ऐतराज़ किया कि पाकिस्तानी सेनाएं भारत और बांग्लादेश की संयुक्त कमान के सामने आत्मसमर्पण करें.
समय बीतता जा रहा था. जैकब नियाज़ी को कोने में ले गए. उन्होंने उनसे कहा कि अगर उन्होंने हथियार नहीं डाले तो वह उनके परिवारों की सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकते. लेकिन अगर वह समर्पण कर देते हैं, तो उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी होगी.
जैकब ने कहा- मैं आपको फ़ैसला लेने के लिए तीस मिनट का समय देता हूँ. अगर आप समर्पण नहीं करते तो मैं ढाका पर बमबारी दोबारा शुरू करने का आदेश दे दूँगा.
अंदर ही अंदर जैकब की हालत ख़राब हो रही थी. नियाज़ी के पास ढाका में 26400 सैनिक थे जबकि भारत के पास सिर्फ़ 3000 सैनिक और वह भी ढाका से तीस किलोमीटर दूर !
अरोड़ा अपने दलबदल समेत एक दो घंटे में ढाका लैंड करने वाले थे और युद्ध विराम भी जल्द ख़त्म होने वाला था. जैकब के हाथ में कुछ भी नहीं था.
30 मिनट बाद जैकब जब नियाज़ी के कमरे में घुसे तो वहाँ सन्नाटा छाया हुआ था. आत्म समर्पण का दस्तावेज़ मेज़ पर रखा हुआ था.
जैकब ने नियाज़ी से पूछा क्या वह समर्पण स्वीकार करते हैं? नियाज़ी ने कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने यह सवाल तीन बार दोहराया. नियाज़ी फिर भी चुप रहे. जैकब ने दस्तावेज़ को उठाया और हवा में हिला कर कहा, ‘आई टेक इट एज़ एक्सेप्टेड.’
नियाज़ी फिर रोने लगे. जैकब नियाज़ी को फिर कोने में ले गए और उन्हें बताया कि समर्पण रेस कोर्स मैदान में होगा. नियाज़ी ने इसका सख़्त विरोध किया. इस बात पर भी असमंजस था कि नियाज़ी समर्पण किस चीज़ का करेंगे.
मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने बताया था, "जैकब मुझसे कहने लगे कि इसको मनाओ कि यह कुछ तो सरेंडर करें. तो फिर मैंने नियाज़ी को एक साइड में ले जा कर कहा कि अब्दुल्ला तुम एक तलवार सरेंडर करो, तो वह कहने लगे पाकिस्तानी सेना में तलवार रखने का रिवाज नहीं है. तो फिर मैंने कहा कि तुम सरेंडर क्या करोगे? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है. लगता है तुम्हारी पेटी उतारनी पड़ेगी... या टोपी उतारनी पड़ेगी, जो ठीक नहीं लगेगा. फिर मैंने ही सलाह दी कि तुम एक पिस्टल लगाओ ओर पिस्टल उतार कर सरेंडर कर देना."

 

सरेंडर लंच

इसके बाद सब लोग खाने के लिए मेस की तरफ़ बढ़े. ऑब्ज़र्वर अख़बार के गाविन यंग बाहर खड़े हुए थे. उन्होंने जैकब से अनुरोध किया क्या वह भी खाना खा सकते हैं. जैकब ने उन्हें अंदर बुला लिया.
वहाँ पर करीने से टेबुल लगी हुई थी... काँटे और छुरी और पूरे ताम-झाम के साथ. जैकब का कुछ भी खाने का मन नहीं हुआ. वह मेज़ के एक कोने में अपने एडीसी के साथ खड़े हो गए. बाद में गाविन ने अपने अख़बार ऑब्ज़र्वर के लिए दो पन्ने का लेख लिखा ’सरेंडर लंच.’
चार बजे नियाज़ी और जैकब जनरल अरोड़ा को लेने ढाका हवाई अड्डे पहुँचे. रास्ते में जैकब को दो भारतीय पैराट्रूपर दिखाई दिए. उन्होंने कार रोक कर उन्हें अपने पीछे आने के लिए कहा.
जैतूनी हरे रंग की मेजर जनरल की वर्दी पहने हुए एक व्यक्ति उनका तरफ़ बढ़ा. जैकब समझ गए कि वह मुक्ति बाहिनी के टाइगर सिद्दीकी हैं. उन्हें कुछ ख़तरे की बू आई. उन्होंने वहाँ मौजूद पेराट्रूपर्स से कहा कि वह नियाज़ी को कवर करें और सिद्दीकी की तरफ़ अपनी राइफ़लें तान दें.
जैकब ने विनम्रता पूर्वक सिद्दीकी से कहा कि वह हवाई अड्डे से चले जाएं. टाइगर टस से मस नहीं हुए. जैकब ने अपना अनुरोध दोहराया. टाइगर ने तब भी कोई जवाब नहीं दिया. जैकब ने तब चिल्ला कर कहा कि वह फ़ौरन अपने समर्थकों के साथ हवाई अड्डा छोड़ कर चले जाएं. इस बार जैकब की डाँट का असर हुआ.
साढ़े चार बजे अरोड़ा अपने दल बल के साथ पाँच एम क्यू हेलिकॉप्टर्स से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे. रेसकोर्स मैदान पर पहले अरोड़ा ने गार्ड ऑफ़ ऑनर का निरीक्षण किया.
अरोडा और नियाज़ी एक मेज़ के सामने बैठे और दोनों ने आत्म समर्पण के दस्तवेज़ पर हस्ताक्षर किए. नियाज़ी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया. नियाज़ी की आँखें एक बार फिर नम हो आईं.
अँधेरा हो रहा था. वहाँ पर मौजूद भीड़ चिल्लाने लगी. वह लोग नियाज़ी के ख़ून के प्यासे हो रहे थे. भारतीय सेना के वरिष्ठ अफ़सरों ने नियाज़ी के चारों तरफ़ घेरा बना दिया और उनको एक जीप में बैठा कर एक सुरक्षित जगह ले गए.

1971 युद्ध

 

ढाका स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है

ठीक उसी समय इंदिरा गांधी संसद भवन के अपने दफ़्तर में स्वीडिश टेलीविज़न को एक इंटरव्यू दे रही थीं. तभी उनकी मेज़ पर रखा लाल टेलीफ़ोन बजा. रिसीवर पर उन्होंने सिर्फ़ चार शब्द कहे....यस...यस और थैंक यू. दूसरे छोर पर जनरल मानेक शॉ थे जो उन्हें बांग्लादेश में जीत की ख़बर दे रहे थे.
श्रीमती गांधी ने टेलीविज़न प्रोड्यूसर से माफ़ी माँगी और तेज़ क़दमों से लोक सभा की तरफ़ बढ़ीं. अभूतपूर्व शोर शराबे के बीच उन्होंने ऐलान किया- ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है. बाक़ी का उनका वक्तव्य तालियों की गड़गड़ाहट और नारेबाज़ी में डूब कर रह गया.

 

जब महेंद्रनाथ मुल्ला ने जल समाधि ली

1971 में हर जगह वाहवाही लूटने के बावजूद कम से कम एक मौक़ा ऐसा आया जब पाकिस्तानी नौसेना भारतीय नौसेना पर भारी पड़ी.
नौसेना को अंदाज़ा था कि युद्ध शुरू होने पर पाकिस्तानी पनडुब्बियाँ मुंबई बंदरगाह को अपना निशाना बनाएंगी. इसलिए उन्होंने तय किया कि लड़ाई शुरू होने से पहले सारे नौसेना फ़्लीट को मुंबई से बाहर ले जाया जाए.
जब दो और तीन दिसंबर की रात को नौसेना के पोत मुंबई छोड़ रहे थे तो उन्हें यह अंदाज़ा ही नहीं था कि एक पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस हंगोर ठीक उनके नीचे उन्होंने डुबा देने के लिए तैयार खड़ी थी.
उस पनडुब्बी में तैनात लेफ़्टिनेंट कमांडर और बाद मे रियर एडमिरल बने तसनीम अहमद याद करते हैं, "पूरा का पूरा भारतीय फ़्लीट हमारे सिर के ऊपर से गुज़रा और हम हाथ मलते रह गए क्योंकि हमारे पास हमला करने के आदेश नहीं थे क्योंकि युद्ध औपचारिक रूप से शुरू नहीं हुआ था. कंट्रोल रूम में कई लोगों ने टॉरपीडो फ़ायर करने के लिए बहुत ज़ोर डाला लेकिन हमने उनकी बात सुनी नहीं. हमला करना युद्ध शुरू करने जैसा होता. मैं उस समय मात्र लेफ़्टिनेंट कमांडर था. मैं अपनी तरफ़ से तो लड़ाई शुरू नहीं कर सकता था."
पाकिस्तानी पनडुब्बी उसी इलाक़े में घूमती रही. इस बीच उसकी एयरकंडीशनिंग में कुछ दिक्कत आ गई और उसे ठीक करने के लिए उसे समुद्र की सतह पर आना पड़ा.
36 घंटों की लगातार मशक्कत के बाद पनडुब्बी ठीक कर ली गई. लेकिन उसकी ओर से भेजे संदेशों से भारतीय नौसेना को यह अंदाज़ा हो गया कि एक पाकिस्तानी पनडुब्बी दीव के तट के आसपास घूम रही है.
नौसेना मुख्यालय ने आदेश दिया कि भारतीय जल सीमा में घूम रही इस पनडुब्बी को तुरंत नष्ट किया जाए और इसके लिए एंटी सबमरीन फ़्रिगेट आईएनएस खुखरी और कृपाण को लगाया गया.
दोनों पोत अपने मिशन पर आठ दिसंबर को मुंबई से चले और नौ दिसंबर की सुबह होने तक उस इलाक़े में पहुँच गए जहाँ पाकिस्तानी पनडुब्बी के होने का संदेह था.
टोह लेने की लंबी दूरी की अपनी क्षमता के कारण हंगोर को पहले ही खुखरी और कृपाण के होने का पता चल गया. यह दोनों पोत ज़िग ज़ैग तरीक़े से पाकिस्तानी पनडुब्बी की खोज कर रहे थे.
हंगोर ने उनके नज़दीक आने का इंतज़ार किया. पहला टॉरपीडो उसने कृपाण पर चलाया. लेकिन टॉरपीडो उसके नीचे से गुज़र गया और फटा ही नहीं.

 

3000 मीटर से निशाना

यह टॉरपीडो 3000 मीटर की दूरी से फ़ायर किया गया था. भारतीय पोतों को अब हंगोर की स्थिति का अंदाज़ा हो गया था.
हंगोर के पास विकल्प थे कि वह वहाँ से भागने की कोशिश करे या दूसरा टॉरपीडो फ़ायर करे. उसने दूसरा विकल्प चुना.
तसनीम अहमद याद करते हैं, "मैंने हाई स्पीड पर टर्न अराउंड करके खुखरी पर पीछे से फ़ायर किया. डेढ़ मिनट की रन थी और मेरा टॉरपीडो खुखरी की मैगज़ीन के नीचे जा कर एक्सप्लोड हुआ और दो या तीन मिनट के भीतर जहाज़ डूबना शुरू हो गया."
खुखरी में परंपरा थी कि रात आठ बजकर 45 मिनट के समाचार सभी इकट्ठा होकर एक साथ सुना करते थे ताकि उन्हें पता रहे कि बाहर की दुनिया में क्या हो रहा है.
समाचार शुरू हुए, 'यह आकाशवाणी है, अब आप अशोक बाजपेई से समाचार...' समाचार शब्द पूरा नहीं हुआ था कि पहले टारपीडो ने खुखरी को हिट किया. कैप्टेन मुल्ला अपनी कुर्सी से गिर गए और उनका सिर लोहे से टकराया और उनके सिर से ख़ून बहने लगा.
दूसरा धमाका होते ही पूरे पोत की बत्ती चली गई. कैप्टेन मुल्ला ने मनु शर्मा को आदेश दिया कि वह पता लगाएं कि क्या हो रहा है.
मनु ने देखा कि खुखरी में दो छेद हो चुके थे और उसमें तेज़ी से पानी भर रहा था. उसके फ़नेल से लपटें निकल रही थीं.
उधर सब लेफ़्टिनेंट समीर काँति बसु भाग कर ब्रिज पर पहुँचे. उस समय कैप्टेन मुल्ला चीफ़ योमेन से कह रहे थे कि वह पश्चिमी नौसेना कमान के प्रमुख को सिग्नल भेजें कि खुखरी पर हमला हुआ है.
बसु इससे पहले कि कुछ समझ पाते कि क्या हो रहा है पानी उनके घुटनों तक पहुँच गया था. लोग जान बचाने के लिए इधर उधर भाग रहे थे. खुखरी का ब्रिज समुद्री सतह से चौथी मंज़िल पर था. लेकिन मिनट भर से कम समय में ब्रिज और समुद्र का स्तर बराबर हो चुका था.
कैप्टेन मुल्ला ने बसु की तरफ़ देखा और कहा, 'बच्चू नीचे उतरो.' बसु पोत के फ़ौलाद की सुरक्षा छोड़ कर अरब सागर की भयानक लहरों के बीच कूद गए.
समुद्र का पानी बर्फ़ से भी ज़्यादा ठंडा था और समुद्र में पाँच-छह फ़ीट ऊँची लहरें उठ रही थीं.

 

मुल्ला ने जहाज़ छोड़ने से इनकार किया

उधर मनु शर्मा और लेफ़्टिनेंट कुंदनमल भी ब्रिज पर कैप्टेन मुल्ला के साथ थे. मुल्ला ने उनको ब्रिज से नीचे धक्का दिया. उन्होंने उनको भी साथ लाने की कोशिश की लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया.
जब मनु शर्मा ने समुद्र में छलांग लगाई तो पूरे पानी में आग लगी हुई थी और उन्हे सुरक्षित बचने के लिए आग के नीचे से तैरना पड़ा.
थोड़ी दूर जाकर मनु ने देखा कि खुखरी का अगला हिस्सा 80 डिग्री को कोण बनाते हुए लगभग सीधा हो गया है. पूरे पोत मे आग लगी हुई है और कैप्टेन मुल्ला अपनी सीट पर बैठे रेलिंग पकड़े हुए हैं और उनके हाथ में अब भी जली हुई सिगरेट है.
जब अंतत: खुखरी डूबा तो बहुत ज़बरदस्त सक्शन प्रभाव हुआ और वह अपने साथ कैप्टेन मुल्ला समेत सैकड़ों नाविकों और मलबे को नीचे ले गया.
चारों तरफ़ मदद के लिए शोर मचा हुआ था लेकिन जब खुखरी आँखों से ओझल हुआ तो शोर कुछ देर के लिए थम सा गया.
बचने वालों की आँखे जल रही थीं. समुद्र में तेल फैला होने के कारण लोग उल्टियाँ कर रहे थे.
खुखरी के डूबने के 40 मिनट बाद लेफ़्टिनेंट बसु को कुछ दूरी पर कुछ रोशनी दिखाई दी. उन्होंने उसकी तरफ़ तैरना शुरू कर दिया. जब वह उसके पास पहुँचे तो उन्होंनें पाया कि वह एक लाइफ़ राफ़्ट थी जिसमें 20 लोग बैठ सकते थे.
एक-एक कर 29 लोग उन 20 लोगों की क्षमता वाली राफ़्ट पर चढ़े. उस समय रात के दस बज चुके थे. अब उम्मीद थी कि शायद ज़िंदगी बच जाए.
राफ़्ट हवा और लहरों के साथ हिचकोले खाती रही. भाग्यवश राफ़्ट पर पीने का पानी और खाने के लिए चॉकलेट्स और बिस्कुट थे.
अगले दिन सुबह क़रीब 10 बजे उन्होंने अपने ऊपर एक हवाई जहाज़ को उड़ते देखा. उन्होंने अपनी कमीज़ें हिला कर और लाल रॉकेट फ़्लेयर्स फ़ायर कर उसका ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की. लेकिन जहाज़ वापस चला गया.
थोड़ी देर बाद दो और विमान आते दिखाई दिए. सब लेफ़्टिनेंट बसु और अहलुवालिया ने फिर वही ड्रिल दोहराई. इस बार विमान ने उनको देख लिया. लेकिन वह वापस चला गया.
थोड़ी देर बाद उन्हें क्षितिज पर पानी के जहाज़ के तीन मस्तूल दिखाई दिए. यह जहाज़ आईएनएस कछाल था जिसे कैप्टेन ज़ाडू कमांड कर रहे थे.
एक-एक कर सभी नाविकों को जहाज़ पर चढ़ाया गया. बचने वालों की संख्या थी 64. सभी को गर्म कंबल और गरमा-गरम चाय दी गई.
इन लोगों ने पूरे 14 घंटे खुले आसमान में समुद्री लहरों को बीच बिताए थे. लेकिन इस बीच एक घायल नाविक टॉमस की मौत हो गई. उसके पार्थिव शरीर के तिरंगे में लिपटा कर उसे समुद्र में ही दफ़ना दिया गया.
कुल मिला कर भारत के 174 नाविक और 18 अधिकारी इस ऑपरेशन में मारे गए.
अगले कई दिनों तक भारतीय नौसेना हंगोर की तलाश में जुटी रही. हंगोर पर सवार एक नाविक के अनुसार भारतीय नौसेना ने हंगोर पर 156 डेप्थ चार्ज हमले किए, लेकिन यह पनडुब्बी इन सबसे बचते हुए 16 दिसंबर को सुरक्षित कराची पहुँची.

 

दोनों कमांडरों को वीरता पदक

इस मुक़ाबले में दोनों कमांडरों को उनके देश का दूसरा सर्वोच्च वीरता पुरस्कार मिला.
कैप्टेन महेंद्रनाथ मुल्ला ने नौसेना की सर्वोच्च परंपरा का निर्वाह करते हुए अपना जहाज़ नहीं छोड़ा और जल समाधि ली. उनकी इस वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र दिया गया.
तसनीम अहमद को खुखरी को डुबाने के लिए पाकिस्तान की तरफ़ से सितार-ए-जुर्रत से सम्मानित किया गया. दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह पहला मौक़ा था, जब किसी पनडुब्बी ने किसी पोत को डुबोया था.
बाद में 1982 मे फ़ॉकलैंड युद्ध में ब्रिटेन ने 1982 में अर्जेंटीना के पोत एआरए जनरल बेग्रानो को परमाणु पनडुब्बी काँकरर के ज़रिए डुबोया था.

 

हिली की सबसे ख़ूनी लड़ाई

 मेजर जनरल लक्षमण सिंह दूसरे विश्व युद्ध मे भाग ले चुके हैं और अपने 40 साल के सैनिक करियर में उन्हे कई लड़ाइयों में भाग लेने का अनुभव है.
वह 1971 में 20वीं पर्वतीय डिवीजन के कमांडर थे जिन्होंने हिली की लड़ाई में हिस्सा लिया था.
इस लड़ाई को 1971 की सबसे ख़ूनी लड़ाई कहा जाता है. मानेक शॉ और जगजीत सिंह अरोड़ा चाहते थे कि भारतीय फ़ौज हिली पर कब्ज़ा करे ताकि पूर्वी पाकिस्तान में मौजूद पाकिस्तानी सेना को दो हिस्सों में बाँटा जा सके.
लक्ष्मण सिंह और उनके कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल थापन दोनों इस हमले के ख़िलाफ़ थे, क्योंकि उन्हें पता था कि पाकिस्तान ने वहाँ ज़बरदस्त मोर्चाबंदी कर रखी है. अगर भारत हमला करता है, तो ज़बरदस्त घमासान होगा और बहुत से लोग हताहत होंगे.
पाकिस्तानी बलों की कमान थी ब्रिगेडियर तजम्मुल हुसैन मलिक के हाथ में, जिन्होंने चार दिन पहले ही वहाँ का चार्ज लिया था. वह पश्चिमी पाकिस्तान में सेना मुख्यालय में तैनात थे और उन्होंने ख़ुद इच्छा प्रकट की थी कि वह पूर्वी पाकिस्तान में लड़ने जाना चाहेंगे.
इस लड़ाई की शुरुआत युद्ध की औपचारिक घोषणा से 10 दिन पहले 23 नवंबर को ही हो गई थी.
पाकिस्तानी ब्रिगेडियर तजम्मुल हुसैन मलिक ने पूरी भारतीय डिवीजन और मुक्ति बाहिनी के सैनिकों का सामना किया.
पहले ही हमले में भारत के 150 सैनिक मारे गए. कड़ा प्रतिरोध होता देख भारत ने अपनी रणनीति बदली और उन्होंने हिली को बाईपास कर पाकिस्तानी बलों के पीछे ठिकाना बना कर उनपर दोतरफ़ा हमला शुरू कर दिया.
इस लड़ाई में भारतीय सेना के इंजीनयरों ने ख़ासा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. फुलवारी की महत्वपूर्ण रेलवे लाइन के पास जब भारतीय सैनिक पहुँचे तो उन्होंने पाया कि पाकिस्तानियों ने पूरी की पूरी रेलवे लाइन उड़ा दी है और भारतीय सेना के भारी औज़ार ज़मीन में धंस रहे हैं.
सेना के इंजीनयरों ने स्थानीय लोगों की मदद से लगातार 48 घंटे काम कर रेलवे ट्रैक को एक मोटर चलने लायक़ सड़क में तब्दील कर दिया. जब उस सड़क से होकर भारतीय तोपें वहाँ पहुँचीं तो पाकिस्तानी सैनिक दंग रह गए.

 

भैंसों के सींग में तोपें

लक्ष्मण सिंह याद करते हैं, "मुझे याद है, हमने एक पाकिस्तानी सिपाही को वायरलेस पर अपने अफ़सर को कहते सुना कि भारतीय तोपों से हमला कर रहे हैं. अफ़सर ने कहा कि वह बकवास न करे. ऐसा कैसे हो सकता है? इतने बड़े दलदल और बारूदी सुरंगों के बीच भारतीय अपनी तोपें कैसे ला सकते हैं? वह भैंसे होंगीं. पाकिस्तानी जवान ने जवाब दिया, सर तब यह समझिए कि इन भैंसों के सींगों में 100 एमएम की तोपें लगी हुई हैं और वह एक-एक करके हमारे बंकरों को ध्वस्त कर रहे हैं."
ढाका में पाकिस्तानी सेना के हथियार डालने के बाद भी मलिक ने हार नहीं मानी. वह अपना जीप में घूम-घूम कर अपने सैनिकों को लड़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहे.
जब वह चारों तरफ़ से घेर लिए गए तो उन्होंने अपनी ब्रिगेड को आदेश दिया कि वह छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट कर नौगांव की तरफ़ बढ़ने की कोशिश करें, जहाँ अब भी कुछ पाकिस्तानी सैनिक प्रतिरोध कर रहे थे.
लेकिन रास्ते में मुक्ति बाहिनी के सैनिकों ने उनकी जीप पर गोलियाँ चलाईं, जिसमें मलिक बुरी तरह से घायल हो गए और उनका अर्दली मारा गया. मुक्ति बाहिनी ने उन्हे भारतीय सेना के हवाले करने से पहले काफ़ी यातनाएं दीं.
लक्षमण सिंह ने आदेश दिया कि घायल मलिक को उनके सामने पेश किया जाए. लक्ष्मण ने उनसे पूछा कि भागने का ख़याल आपके मन में कैसे आया. आपके गोरे रंग को देखते हुए लोगों को तो पता चल ही जाना था कि तुम पाकिस्तानी हो.
मलिक ने जवाब दिया, "आप ही जो सिखाते हैं कि किसी हालत में क़ैद नहीं होना चाहिए और भागने की कोशिश करनी चाहिए. आप सीनियर ऑफ़िसर हैं. आप ही बताओ मैं क्या करता."
लक्षमण ने जवाब दिया भागने का विकल्प तभी चुनना चाहिए जब सफलता की काफ़ी गुंजाइश हो.
मलिक को पकड़ भले ही लिया गया हो लेकिन उन्होंने ख़ुद हथियार नहीं डाले. ब्रिगेड का आत्मसमर्पण कराने के लिए मेजर जनरल नज़र अली शाह को ख़ास तौर से नटौर से हेलिकॉप्टर से लाया गया.
लक्ष्मण सिंह याद करते हैं कि जनरल शाह इतने मोटे थे कि हेलिकॉप्टर की सीट बेल्ट उन्हें फ़िट नहीं आई और उन्हें बैठाने के लिए दो सीट बेल्टों का इस्तेमाल करना पड़ा.
ब्रिगेडियर मलिक पाकिस्तानी सेना के अकेले अधिकारी थे जिन्हें बांग्लादेश से वापस आने के बाद पदोन्नति दे कर मेजर जनरल बनाया गया.

 

अद्वितीय बटालियन कमांडर

मैंने मेजर जनरल लक्ष्मण सिंह से पूछा कि आप ब्रिगेडियर मलिक को एक सैनिक कमांडर के रूप में किस तरह रेट करेंगे?
लक्ष्मण सिंह का जवाब था, "बटालियन कमांडर के रूप में वह अद्वितीय थे. उन्होंने न सिर्फ़ दूसरों को लड़ने के लिए प्रेरित किया बल्कि ख़ुद भी जी-जान से लड़े. लेकिन उनमें दूरदृष्टि नहीं थी. जैसे उन्होंने मुझसे कहा कि नवंबर में जो आपने हमला किया था उसके बाद तो आप डर ही गए. इधर उधर दौड़ते रहे और सड़कें काटने की कोशिश करते रहे. मैंने उनसे कहा तजम्मुल, सेना में प्लानिंग जैसी भी कोई चीज़ होती है. हमने हमला इसलिए किया कि तुम सब हिली में जमा हो जाओ और बाक़ी मोर्चे कमज़ोर हो जाएं. आप लोग हिली में बैठे रहे और हमने 50 मील पीछे जा कर मुख्य सड़क काट दी. इस सबके लिए एक अच्छा दिमाग़ चाहिए. अगर तुम्हारा डिवीजनल कमांडर अच्छा होता तो शायद तुम्हारा यह हश्र नहीं होता."
हिली की लड़ाई इसलिए भी महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इसमें दोनों पक्षों ने असीम निजी वीरता का परिचय दिया. लाँस नायक एल्बर्ट एक्का को मरणोपरांत भारत का सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र मिला.
पाकिस्तान की तरफ से मेजर मोहम्मद अकरम को उनकी बहादुरी के लिए सर्वोच्च वीरता पुरस्कार निशान-ए-हैदर दिया गया.



 रेहान फ़ज़ल-बीबीसी संवाददाता
(साभार-बीबीसी-हिन्दी)

1962 का युद्ध-जवानों की आपबीती और कुछ यादें

रिटायर्ड ब्रिगेडियर अमरजीत बहल 
वर्ष 1962 का जवान सेकेंड लेफ़्टिनेंट भारत-चीन युद्ध के 50 साल बाद रिटायर्ड ब्रिगेडियर अमरजीत बहल टेलिफ़ोन पर बात करते-करते फूट-फूटकर रो पड़ते हैं.
गहरी पीड़ा है, युद्धबंदी होने का ग़म भी है, लेकिन स्वाभिमान भी है कि चीनी सैनिकों से अच्छी तरह लोहा लिया.
चंडीगढ़ से बीबीसी के साथ टेलिफ़ोन पर बातचीत करते समय भारत-चीन युद्ध के 50 साल बाद भी ब्रिगेडियर बहल की आवाज़ का दम बताता है कि उस समय के जवान सेकेंड लेफ़्टिनेंट में कितना जोश रहा होगा.
अपने वरिष्ठ अधिकारियों से लड़ाई में जाने का अनुरोध स्वीकार किए जाने के बाद बहल ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे. 17 पैराशूट फ़ील्ड रेजिमेंट के साथ आगरा में कार्यरत वह 30 सितंबर 1962 को आगरा से नेफ़ा के लिए रवाना हुए.
कुछ उतार-चढ़ाव भरी यात्रा और तेज़पुर में रुकने के बाद जब सेकेंड लेफ्टिनेंट एजेएस बहल तंगधार पहुँचे, तो उन्हें शायद ही इसका अंदाज़ा था कि आने वाले समय उनके लिए इतनी मुश्किल लेकर आने वाले हैं.

वो सुबह

19 अक्तूबर की वो सुबह बहल अब भी नहीं भूले हैं, जब एकाएक चीनी सैनिकों की ओर से गोलाबारी शुरू हुई और फिर गोलियों की बौछार. चीनियों की रणनीति के आगे भारत पिछड़ चुका था.
सारे संपर्क सूत्र काटे जा चुके थे. लेकिन अपने चालीस साथियों के साथ सेकेंड लेफ़्टिनेंट एजेएस बहल ने जो बहादुरी दिखाई, उसे कई वरिष्ठ अधिकारी अपनी किताबों में जगह दे चुके हैं.
सीमा पर मौजूद भारतीय सैनिकों के लिए हथियार डकोटा विमान से भेजे जाते थे. लेकिन घने जंगलों के कारण हथियार तलाश करना काफ़ी मुश्किल होता था. फिर भी सेंकेंड लेफ्टिनेंट बहल और साथियों के पास हथियार अच्छी ख़ासी संख्या में थे.
19 अक्तूबर की सुबह चार बजे ही गोलाबारी शुरू हो गई थी. बहल बताते हैं कि नौ बजे तक तो ऐसा लगता था कि आसमान ही फट पड़ा हो.
इस गोलाबारी में बहल के दो साथी बुरी तरह घायल हुए. लेकिन युद्ध में विपरीत स्थितियों के लिए तैयार रहने वाले एक सैनिक की तरह सेकेंड लेफ़्टिनेंट बहल ने ब्रांडी डालकर घायलों की मरहम पट्टी की.
बहल और उनके साथी चीनियों के हमले का जवाब तो दे रहे थे, उन पर फ़ायरिंग भी कर रहे थे, लेकिन उनका संपर्क किसी से हो नहीं पा रहा था.

युद्धबंदी

और आख़िरकार वही हुआ, जिसका डर था. सेकेंड लेफ़्टिनेंट बहल और उनके साथियों की गोलियाँ ख़त्म होने लगी और फिर उन्हें न चाहते हुए भी युद्धबंदी बनना पड़ा.
किसी भी सैनिक के लिए ये दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होती है, लेकिन रिटायर्ड ब्रिगेडियर बहल के मुताबिक़ उन्हें इस बात का गर्व था कि उनके किसी भी साथी ने पीछे हटने की बात नहीं की. जबकि कई भारतीय अधिकारी और सैनिक वहाँ से हट रहे थे.
चीनी सैनिकों ने बट मारकर ब्रिगेडियर बहल का पिस्तौल छीन लिया. उनके साथियों के भी हथियार छीन लिए गए. चार दिन बाद सेकेंड लेफ़्टिनेंट बहल और उनके साथियों को शेन ई में युद्धबंदी शिविर में पहुँचाया गया.
इस कैंप में क़रीब 500 युद्धबंदी थे. उस समय सेकेंड लेफ़्टिनेंट रहे बहल बताते हैं, "हम कैप्टन और लेफ्टिनेंट साथ-साथ थे. हम आपस में बात करते थे. हम जब खाना खाने जाते थे. वहाँ हम अपने सिपाहियों से बातचीत कर सकते थे, क्योंकि वही हमारे लिए खाना बनाते थे. लेकिन मेजर और लेफ्टिनेंट कर्नल को अलग रखा गया था और उन्हें बाहर निकलने नहीं दिया जाता था. मेजर जॉन डालवी तो दूर कहीं अकेले रहते थे. उनका जीवन काफ़ी मुश्किल होता था."
भारतीय जवानों की रसोई में मौजूदगी का एक फ़ायदा बहल को ये हुआ कि उन्हें सुबह-सुबह फीकी ब्लैक टी (बिना दूध और चीनी की चाय) मिल जाती थी. लेकिन खाने में रोटी, चावल और मूली की सब्ज़ी ही दी जाती थी. चाहे वो दिन का खाना हो या फिर रात का.

सख़्ती और मार-पिटाई

एक ओर क़ैदी जैसी हालत और दूसरी ओर कैंप में बजता ये गाना- गूँज रहा है चारों ओर हिंदी-चीनी भाई-भाई.
एक समय भारत और चीन की दोस्ती का प्रतीक ये गाना उस समय बहल के लिए परेशानी का सबब बन गया था.
वे बताते हैं, "गूँज रहा है चारों ओर हिंदी-चीनी भाई-भाई, ये गाना हमेशा ही बजता रहता था. ये सुनकर हमारे कान पक गए थे. क्योंकि इससे रिश्ते में तो सुधार हो नहीं रहा था."
युद्धबंदी के तौर पर सैनिकों के साथ सख़्तियाँ भी होती हैं और मार-पिटाई भी. ब्रिगेडियर बहल और उनके साथियों के साथ भी ऐसा हुआ था. लेकिन वे उस समय जवान थे और उसे उन्होंने गंभीरता से नहीं लिया.
चीनी सैनिक अधिकारी अनुवादक की मदद से भारतीय युद्धबंदियों से बात करते थे और उन्हें ये जताने की कोशिश करते थे कि भारत अमरीका का पिट्ठू है. उन्हें ये बात मानने को कहा जाता था.
युद्धबंदी के रूप में एक सिपाही का फ़र्ज़ ये भी होता है कि वो जेल से भागने की कोशिश करे. बहल के दिमाग़ में भी ऐसी योजना थी. बहल और उनके दो साथी बीमारी का बहाना बनाकर दवाएँ इकट्ठा करते थे ताकि भागने के बाद वो उनके काम आए.
वे मौसम ठीक होने का इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन उससे पहले ही उन्हें छोड़ दिया गया.

परिजनों तक पहुँच

इस दौरान रेडक्रॉस की मदद से उनके परिजनों तक ये सूचना भेज दी गई थी कि वे युद्धबंदी हैं.
हालाँकि इससे पहले आर्मी हेडक्वार्टर से घर पर ये टेलिग्राम चला गया था कि सेकेंड लेफ्टिनेंट बहल लापता हैं और माना जा रहा है कि उनकी मौत हो गई है.
फिर वो दिन भी आया जब बहल और उनके साथियों को छोड़ने का ऐलान हुआ. बहल बताते हैं, "जब हमें छोड़ने का ऐलान हुआ था, तो इतनी खुशी हुई कि समय कटते नहीं कटता था. अगले 20 दिन 20 महीने के बराबर थे. हमें गुमला में छोड़ा गया. हमने भारत माता को चूमा और बोला- मातृभूमि ये देवतुल्य ये भारत भूमि हमारी."
बहल ये बताते-बताते काफ़ी भावुक हो गए और रोने लगे. शायद एक युद्धबंदी ही स्वदेश लौटने की ख़ुशी को समझ सकता है.

अमृत चाय

बहल के मुताबिक़ भारत में आने के बाद उन्हें दुनिया की सबसे अच्छी चाय मिली. इस चाय में दूध और चीनी भी थी और वो चाय उनके लिए अमृत की तरह थी.
इसके बाद बहल और उनके साथियों को डी-ब्रीफिंग (एक प्रक्रिया, जिसके तहत युद्धबंदी बनने के बाद लौटने पर सैनिकों से गहन पूछताछ होती है) के लिए राँची भेजा गया.
वहाँ बहल को तीन दिन रखा गया. लेकिन इसके बाद उन्हें ऑल क्लियर दिया गया. इसके बाद वे छुट्टी पर गए और फिर अपनी रेजिमेंट में गए.
रिटायर्ड ब्रिगेडियर बहल युद्धबंदी बनाए जाने से निराश नहीं, लेकिन उनका मानना है कि उनके लिए ये अनुभव मीठा भी रहा और कड़वा भी. मीठा इसलिए क्योंकि एक जवान अधिकारी होने के नाते वे युद्ध में शामिल हुए, घायल भी हुए और युद्धबंदी भी बनाए गए.
कड़वा इसलिए क्योंकि बहल मानते हैं कि अगर वे क़ैद न होते, तो एक लड़ाई और कर लेते.


बेवकूफ कर्नल, हिलोगे तो गोली खाओगे....

19 अक्तूबर की रात मैंने गोरखाओं के साथ बिताई. मेरा इरादा था कि 20 अक्तूबर की सुबह मैं राजपूतों के पास जाऊँ लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. इसके बाद तो जैसा चीनियों ने चाहा वैसा मुझे करना पड़ा.
अगली सुबह मैं राजपूतों के पास गया ज़रूर, लेकिन एक युद्ध बंदी के तौर पर. 20 अक्तूबर की सुबह ज़बरदस्त बमबारी की आवाज सुन कर गहरी नींद से मेरी आँख खुली.
मैं बंकर से बाहर आया और किसी तरह गिरते-पड़ते सिग्नल्स के बंकर तक पहुँचा जहाँ मेरी रेजिमेंट के दो सिग्नलमैन मुख्यालय से रेडियो संपर्क बरकरार रखने की कोशिश कर रहे थे.
टेलिफ़ोन लाइनें कट गई थीं. लेकिन किसी तरह ब्रिगेड मुख्यालय से रेडियो संपर्क स्थापित हो गया. मैंने उनको ज़बरदस्त गोलाबारी की सूचना दी.

सन्नाटा और फिर गोलीबारी

थोड़ी देर में गोलाबारी रुक गई और एक गहरा सन्नाटा छा गया. थोड़ी देर बाद पहाड़ की ऊँचाइयों से छोटे हथियारों से रह-रह कर फ़ायरिंग होने लगी और मैंने देखा कि लाल सितारे लगी खाकी वर्दी पहने चीनी सैनिक नीचे उतरते हुए कमर से स्वचालित हथियारों से फ़ायरिंग करते हुए हमारे बंकर की तरफ बढ़ रहे हैं.
तभी मुझे अहसास हुआ कि बटालियन के सभी लोग मुझे और मेरे दो सिग्नल मेन (जो उनके यहाँ मेहमान के तौर पर आए थे) को छोड़ कर कब के पीछे जा चुके थे.
मैंने किसी चीनी सैनिक को इतने पास से पहले कभी नहीं देखा था. मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा. चीनियों का पहला जत्था हमें पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गया.
हम अभी सोच ही रहे थे कि बंकर से बाहर निकलें और ब्रिगेड मुख्यालय की तरफ बढ़ना शुरू करे कि हमें चीनी सैनिकों का दूसरा झुंड नीचे उतरता हुआ दिखाई दिया.
वह भी पहले की तरह रह-रह कर फ़ायरिंग कर रहा था. लेकिन यह जत्था काफी व्यवस्थित ढंग से एक एक बंकर की तलाशी लेते हुए आगे बढ़ रहा था. वह बंकरों में ग्रेनेड्स फेंक रहे थे ताकि यह सुनिश्चत कर सकें कि उनमें कोई भारतीय सैनिक ज़िंदा न बच सके.

ज़ख्म, जो भरे नहीं

उस ज़माने में मैं अपने पास 9 एमएम की ब्राउनिंग ऑटोमेटिक पिस्टल रखता था. मेरे ज़हन में ख़्याल आया कि मेरे शव के पास ऐसी पिस्टल नहीं मिलनी चाहिए जिससे एक भी गोली न चलाई गई हो. इसका इस्तेमाल होना चाहिए चाहे हमारी हालत कितनी भी दयनीय क्यों न हो.
इसलिए जैसे ही दो चीनी सैनिक हमारे बंकर की तरफ बढ़े. मैंने पिस्टल की पूरी क्लिप उन पर खाली कर दी. पहले चीनी की बांई आँख के ऊपर गोली लगी और वह वहीं गिर गया और नीचे लुढ़कता चला गया.
वह मर ही गया होगा क्योंकि न तो वह चिल्लाया और न ही उसने कोई दूसरी आवाज निकाली. दूसरे चीनी के कंधे में गोली लगी और भी नीचे गिर गया.
इसके बाद तो जैसे आफ़त आ गई. गोलियां बरसाते और चिल्लाते हुए कई चीनी सैनिक हमारे बंकर की तरफ बढ़ आए. एक सिग्नल मैन तो गोलियों से बुरी तरह छलनी हो गया.
मुझे अब भी याद है कि उसके शरीर से इस तरह खून निकल रहा था जैसे किसी नल से दबाव के साथ पानी निकलता है.
इसके बाद दो चीनी सैनिक हमारे बंकर में कूदे थे, उन्होंने राइफ़ल की बट से मुझ पर प्रहार किया था और मुझे खींचते और धक्के मारते हुए बंकर से बाहर ले आए थे. मुझे मार्च करते हुए थोड़ी दूर ले जाया गया और मुझसे बैठने के लिए कहा गया.

बेइज्जती

थोड़ी देर बाद एक चीनी अफ़सर आया जो टूटी फूटी अंग्रेज़ी बोल सकता था. उसने मेरे कंधे पर लगे मेरे रैंक को देख लिया था और वह मुझसे बहुत बेइज़्जती से पेश आ रहा था.
मेरे पास ही एक गोरखा सैनिक पड़ा हुआ था जो बेहोश था. कुछ क्षणों के लिए जब उसे होश आया तो उसने मेरी तरफ देखा और शायद मुझे पहचान कर कहा- साब पानी.
मैं कूद कर उसकी मदद करने के लिए आगे बढ़ा, तभी चीनी कैप्टेन ने मुझे मारा और अपनी सीमित अंग्रेज़ी में मुझ पर चिल्लाया- बेवकूफ़ कर्नल. बैठ जाओ. तुम कैदी हो. जब तक मैं तुम से कहूँ नहीं, तुम हिल नहीं सकते. वर्ना मैं तुम्हें गोली मार दूँगा.
थोड़ी देर के बाद हमें नामका चू नदी के बगल में एक पतले रास्ते पर मार्च कराया गया.पहले तीन दिनों तक हमें कुछ भी खाने को नहीं दिया गया, फिर ले में हमें पहली बार उबले हुए नमकीन चावलों और सूखी तली हुई मूली का खाना दिया गया.

हृदयविदारक दृश्य

हम 26 अक्तूबर को चेन ये के युद्ध बंदी शिविर में पहुँचे. मुझे पहले दो दिनों तक एक अंधेरे और सीलन भरे कमरे में अकेले रखा गया. इसके बाद कर्नल रिख को मेरे कमरे में लाया गया जो बुरी तरह घायल थे.
शिविर में हमे चार हिस्सों में बांटा गया था. अफसरों और जवानों को अलग अलग रखा गया था. हर समूह की अपनी अलग रसोई थी जहाँ चीनियों द्वारा चुने गए भारतीय सैनिक सबके लिए खाना बनाते थे.
नाश्ता सुबह सात से साढ़े सात के बीच मिलता था. दोपहर के खाने का समय था साढ़े दस से ग्यारह बजे तक और रात का खाना तीन से साढ़े तीन बजे के बीच दिया जाता था.
जिन घरों में हमें ठहराया गया था, उनकी खिड़कियां और दरवाज़े गायब थे. शायद चीनियों ने उनका इस्तेमाल ईधन के तौर पर कर लिया था. मैं समय बिताने के लिए अपने कमरे में ही चारों तरफ घूमता था.

कड़कड़ाती सर्दी

पहली दो रातें तो हम ठंड में ठिठुरते रहे. हमें जब अंदर लाया जा रहा था तो हमने देखा कि वहाँ पर पुआल का ढेर लगा हुआ है. हमने चीनियों से पूछा कि क्या हम इनका इस्तेमाल कर सकते हैं. सौभाग्य से चीनियों ने हमारी यह गुज़ारिश मान ली. इसके बाद तो हमने इस पुआल को गद्दे के तौर पर भी इस्तेमाल किया और कंबल के तौर पर भी.
आठ नवंबर को जब चीनियों ने हमें बताया कि तवांग पर उनका कब्ज़ा हो गया है, हम बहुत ही ज्यादा विचलित हो गए. जब तक हमें कुछ भी अंदाज़ा नहीं था कि लड़ाई किस तरफ जा रही है.
उन्होंने कहीं से पता लगा लिया कि मुझे 4 नवंबर 1942 में भारतीय सेना में कमीशन मिला था. इसलिए 4 नवंबर 1962 को एक चीनी अधिकारी, भारतीय सेना में मेरे शामिल होने की बीसवीं वर्षगाँठ मनाने के लिए वाइन की एक छोटी बोतल लेकर मेरे पास आया.
भारतीय सैनिकों की भावनाओं पर असर डालने के लिए चीनी खास त्योहारों पर विशेष खाना देते थे और भारतीय फ़िल्में दिखाते थे.
हमारे शिविर में एक बहुत ही सुंदर चीनी लेडी डॉक्टर थी जो कभी कभी रिख को देखने आती थी. सच बताऊँ तो हम सब लोगों को उससे प्यार हो गया था.

रेडक्रॉस से पार्सल

दिसंबर के अंत तक रेड क्रॉस ने भारतीय युद्ध बंदियों के लिए दो पार्सल भेजे. एक पैकेट में गर्म कपड़े थे, जर्मन बैटिल ड्रेस, गर्म बनियान, मफ़लर, टोपी, गर्म कमीज़, जूते और तौलिया. दूसरे पैकेट में खाने का सामान था, साठे चॉकलेट, दूध के टिन्स, जैम, मक्खन, मछलियाँ, चीनी के पैकेट, आटा, दाल, सूखी मटर, नमक, चाय, बिस्किट, सिगरेट और विटामिन की गोलियाँ.
16 नवंबर को पहली बार हमें घर पत्र लिखने की इजाज़त दी गई. हम चार लेफ़्टिनेंट कर्नलों को घर तार भेजने की अनुमति भी दी गई. हमारे पत्र सेंसर होते थे इसलिए हम कोई ऐसी बात नहीं लिख सकते थे जो चीनियों को बुरी लगे.
एक पत्र के अंत में मैंने लिखा कि मुझे रेडक्रॉस के जरिए कुछ गर्म कपड़े और खाने की चीजें भेजो. मेरी चार साल की बेटी आभा ने इसका अर्थ यह लगाया और उसने अपनी माँ से कहा भी कि लगता है डैडी को ठंड लग रही है और वह भूखे भी हैं.
चीनी अक्सर पब्लिक ऐड्रेस सिस्टम पर भारतीय संगीत बजाते थे. एक गाना बार-बार बजाया जाता था और वह था लता मंगेशकर का गीत, आ जा रे मैं तो कब से खड़ी इस पार.....यह गाना सुन कर हमें घर की बुरी तरह से याद आने लगती थी.

बहादुर शाह जफर की गजलें

हमें उस समय बहुत आश्चर्य हुआ जब एक दिन एक चीनी महिला ने आ कर हमें बहादुर शाह ज़फ़र की कुछ गज़ले सुनाईं.
हमारे साथी रतन और इस महिला ने एक दूसरे को ज़फ़र के लिखे शेर सुनाए जो उन्होंने दिल्ली से निकाले जाने के बाद रंगून में लिखे थे. शायद यह उर्दू बोलने वाली महिला लखनऊ में कई सालों तक रही होगी.
हमने इस दौरान चीन के सुइयों से किए जाने वाले इलाज का कमाल भी देखा. हमारे दोस्त रिख की माइग्रेन की समस्या हमेशा के लिए जाती रही. इसमें उस खुबसूरत लेडी डॉक्टर की भूमिका थी या सुइयों की, आप अंदाज़ा लगा सकते है.
चीनियों ने तय किया कि भारत भेजने से पहले हमें चीन का दर्शन कराया जाए. वुहान में 10 और भारतीय अफसर युद्धबंदी हमसे आ कर मिल गए. इनमें मेजर धन सिंह थापा भी थे जिन्हें वीरता के लिए परमवीर चक्र दिया गया था.

बीबीसी सुनने की आजादी

यहाँ पर पहली बार हमें आज़ादी से रेडियो सुनने की अनुमति दी गई. और हमने चीन में रहते हुए पहली बार ऑल इंडिया रेडियो और बीबीसी को सुना.
चीन में घूमने के दौरान एक बेहतरीन कपड़े पहने हुए चीनी पूरे समय तक हमारे साथ रहा. हम उसको जनरल कह कर पुकारते थे. उनके पीछे हमेशा एक दूसरा चीनी चलता था जो उसके लिए कुर्सी खींचता था और चाय बनाता था. हम उसे जनरल का अर्दली कहा करते थे.
जब हमें भारत वापस भेजने का समारोह हो रहा था, तो चीन की तरफ से कागजों पर दस्तखत करने वाला व्यक्ति वह ‘अर्दली’ था और दस्तखत करने के उसे कलम पकड़ा रहा व्यक्ति ‘जनरल’ था.
सुबह 9 बजे हमने कुनमिंग से कलकत्ता के लिए उड़ान भरी. दोपहर 1 बज कर बीस मिनट पर हम वहाँ लैंड करने वाले थे. लेकिन हमारा जहाज बहुत देर तक ऊपर ही चक्कर लगाता रहा.
विमान चालक ने घोषणा की कि विमान के पहिए नहीं खुल पा रहे हैं और हो सकता है कि हमें क्रैश लैंड करना पड़े.
अंतत: हम दो बज कर तीस मिनट पर दमदम हवाई अड्डे पर उतरे. किसा भी स्थिति से निपटने के लिए वहाँ दमकलों की पूरी कतार खड़ी थी.
जब विमान हवा में था तो हम सोच रहे थे कि इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि चीन की इतनी मुसीबतों से बचने के बाद हम भारत में क्रैश लैंड करते हुए मरने जा रहे थे!
(बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल से बातचीत पर आधारित)

रेहान फ़ज़ल-बीबीसी संवाददाता
(साभार-बीबीसी हिन्दी)

1962 का युद्ध: विश्वासघात या कायरता


कोई भी व्यक्ति, जो मेरी तरह हिमालय की ऊँचाइयों में चीन के साथ अल्पकालिक लेकिन कटु सीमा युद्ध का साक्षी है, वो आधी सदी के बाद भी सदमा भूला नहीं है. इस युद्ध में भारत की सैन्य पराजय हुई थी और वो राजनीतिक विफलता भी थी.
इस युद्ध के इतिहास को इतनी बारीकी से लिखा गया है कि उस ज़मीन पर दोबारा चलने की आवश्यकता नहीं, जिस पर इतनी अच्छी तरह से काम हुआ है.
ये कहना पर्याप्त होगा जैसा जवाहर लाल नेहरू के आधिकारिक आत्मकथा लिखने वाले एस गोपाल ने लिखा था- चीज़ें इतनी बुरी तरह ग़लत हुईं कि अगर ऐसा वाक़ई में नहीं होता, तो उन पर यक़ीन करना मुश्किल होता.
लेकिन ये ग़लत चीज़ें इतनी हुईं कि भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन ने अपनी सरकार पर गंभीर आरोप तक लगा दिए. उन्होंने चीन पर आसानी से विश्वास करने और वास्तविकताओं की अनदेखी के लिए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया.

ग़लती

जवाहर लाल नेहरू ने भी ख़ुद संसद में खेदपूर्वक कहा था, "हम आधुनिक दुनिया की सच्चाई से दूर हो गए थे और हम एक बनावटी माहौल में रह रहे थे, जिसे हमने ही तैयार किया था."
इस तरह उन्होंने इस बात को लगभग स्वीकार कर लिया था कि उन्होंने ये भरोसा करने में बड़ी ग़लती की कि चीन सीमा पर झड़पों, गश्ती दल के स्तर पर मुठभेड़ और तू-तू मैं-मैं से ज़्यादा कुछ नहीं करेगा.
हालाँकि चीन के साथ लगातार चल रहा संघर्ष नवंबर 1959 के शुरू में हिंसक हो गया था, जब लद्दाख के कोंगकाला में पहली बार चीन ने ख़ून बहाया था.
इसके बाद ग़लतियाँ होती गईं. इसके लिए हमारे प्रतिष्ठित प्रधानमंत्री को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.
लेकिन उनके सलाहकार, अधिकारी और सेना भी बराबर के दोषी हैं, क्योंकि इनमें से किसी ने भी नेहरू से ये कहने की हिम्मत नहीं दिखाई कि वे ग़लत थे.
उनका बहाना वही पुराना था यानी नेहरू सबसे बेहतर जानते थे. चीन के एकतरफ़ा युद्धविराम के बाद सेना प्रमुख बने जनरल जेएन 'मुच्छू' चौधरी का विचार था- हमने ये सोचा थे कि हम चीनी शतरंज खेल रहे हैं, लेकिन वो रूसी रोले निकला.

ज़िम्मेदार लोग

जिन लोगों को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, उनकी सूची काफ़ी लंबी है. लेकिन शीर्ष पर जो दो नाम होने चाहिए, उनमें पहले हैं कृष्ण मेनन, जो 1957 से ही रक्षा मंत्री थे.
दूसरा नाम लेफ़्टिनेंट जनरल बीएम कौल का है, जिन पर कृष्ण मेनन की छत्रछाया थी. लेफ़्टिनेंट जनरल बीएम कौल को पूर्वोत्तर के पूरे युद्धक्षेत्र का कमांडर बनाया गया था. उस समय वो पूर्वोत्तर फ्रंटियर कहलाता था और अब इसे अरुणाचल प्रदेश कहा जाता है.
बीएम कौल पहले दर्जे के सैनिक नौकरशाह थे. साथ ही वे गजब के जोश के कारण भी जाने जाते थे, जो उनकी महत्वाकांक्षा के कारण और बढ़ गया था. लेकिन उन्हें युद्ध का कोई अनुभव नहीं था.
ऐसी ग़लत नियुक्ति कृष्ण मेनन के कारण संभव हो पाई. प्रधानमंत्री की अंध श्रद्धा के कारण वे जो भी चाहते थे, वो करने के लिए स्वतंत्र थे.
एक प्रतिभाशाली और चिड़चिड़े व्यक्ति के रूप में उन्हें सेना प्रमुखों को उनके जूनियरों के सामने अपमान करते मज़ा आता था. वे सैनिक नियुक्तियों और प्रोमोशंस में अपने चहेतों पर काफ़ी मेहरबान रहते थे.
निश्चित रूप से इन्हीं वजहों से एक अड़ियल मंत्री और चर्चित सेना प्रमुख जनरल केएस थिमैया के बीच बड़ी बकझक हुई. मामले ने इतना तूल पकड़ा कि उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन उन्हें अपना इस्तीफ़ा वापस लेने के लिए मना लिया गया.
लेकिन उसके बाद सेना वास्तविक रूप में मेनन की अर्दली बन गई. उन्होंने कौल को युद्ध कमांडर बनाने की अपनी नादानी को अपनी असाधारण सनक से और जटिल बना दिया.
हिमालय की ऊँचाइयों पर कौल गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और उन्हें दिल्ली लाया गया. मेनन ने आदेश दिया कि वे अपनी कमान बरकरार रखेंगे और दिल्ली के मोतीलाल नेहरू मार्ग के अपने घर से वे युद्ध का संचालन करेंगे.

टकराव से डर

सेना प्रमुख जनरल पीएन थापर इसके पूरी तरह खिलाफ थे, लेकिन वे मेनन से टकराव का रास्ता मोल लेने से डरते थे. ये जानते हुए कि कौल स्पष्ट रूप से कई मामलों में ग़लत थे, जनरल थापर उनके फ़ैसले को बदलने के लिए भी तैयार नहीं रहते थे.
इन परिस्थितियों में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि नेहरू के 19 नवंबर को राष्ट्रपति कैनेडी को लिखे उन भावनात्मक पत्रों से काफी पहले मेनन और कौल पूरे देश में नफरत के पात्र बन चुके थे.
इसका नतीजा स्पष्ट था. कांग्रेस पार्टी के ज़्यादातर लोगों और संसद ने अपना ज़्यादा समय और ऊर्जा आक्रमणकारियों को भगाने की बजाए मेनन को रक्षा मंत्रालय से हटाने में लगाया.
नेहरू पर काफ़ी दबाव पड़ा और उन्होंने मेनन को सात नवंबर को हटा दिया. कौल के मामले में राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने जैसे सब कुछ कह दिया.
19 नवंबर को दिल्ली आए अमरीकी सीनेटरों के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से मुलाकात की. इनमें से एक ने ये पूछा कि क्या जनरल कौल को बंदी बना लिया गया है. इस पर राष्ट्रपति राधाकृष्णन का जवाब था- दुर्भाग्य से ये सच नहीं है.
राष्ट्रीय सुरक्षा पर फ़ैसला लेना इतना अव्यवस्थित था कि मेनन और कौल के अलावा सिर्फ़ तीन लोग विदेश सचिव एमजे देसाई, ख़ुफ़िया ज़ार बीएन मलिक और रक्षा मंत्रालय के शक्तिशाली संयुक्त सचिव एचसी सरीन की नीति बनाने में चलती थी.

ख़ुफिया प्रमुख की नाकामी

इनमें से सभी मेनन के सहायक थे. मलिक की भूमिका बड़ी थी. मलिक नीतियाँ बनाने में अव्यवस्था फैलाते थे, जो एक खुफिया प्रमुख का काम नहीं था.
अगर मलिक अपने काम पर ध्यान देते और ये पता लगाते कि चीन वास्तव में क्या कर रहा है, तो हम उस शर्मनाक और अपमानजनक स्थिति से बच सकते थे.
लेकिन इसके लिए उन्हें चीन की रणनीतियों का पता लगाना होता. लेकिन भारत पूरी तरह संतुष्ट था कि चीन की ओर से कोई बड़ा हमला नहीं होगा.
लेकिन माओ, उनके शीर्ष सैनिक और राजनीतिक सलाहकार सतर्कतापूर्वक ये योजना बनाने में व्यस्त थे कि कैसे भारत के ख़िलाफ़ सावधानीपूर्वक प्रहार किया जाए, जो उन्होंने किया भी.
नेहरू ने ये सोचा था कि भारत-चीन संघर्ष के पीछे चीन-सोवियत फूट महत्वपूर्ण था और इससे चीन थोड़ा भयभीत रहेगा.

कायरता या विश्वासघात

लेकिन हम ये नहीं जानते थे कि क्यूबा के मिसाइल संकट की जानकारी का कुशलतापूर्वक इस्तेमाल करते हुए नेहरू को सबक सिखाने का माओ का संदेश निकिता ख्रुश्चेव के लिए भी था. और इसी कारण सोवियत नेता ने संयम बरता.
भारत को इस मिसाइल संकट के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. 25 अक्तूबर को रूसी समाचार पत्र प्रावदा ने ये कह दिया कि चीन हमारा भाई है और भारतीय हमारे दोस्त हैं. इससे भारतीय कैंप में निराशा की लहर दौड़ गई.
प्रावदा ने ये भी सलाह दी कि भारत को व्यावहारिक रूप से चीन की शर्तों पर चीन से बात करनी चाहिए. ये अलग बात है कि क्यूबा संकट का समाधान क़रीब आते ही रूस अपनी पुरानी नीति पर आ गया.
लेकिन माओ ने आक्रमण का समय इस हिसाब से ही तय किया था. आख़िर में माओ ने भारत में वो हासिल कर लिया, जो वो चाहते थे. वो ख्रुश्चेव को कैरेबियन में कायरता और हिमालय में विश्वासघात के लिए ताना भी मार सकते थे.
इंदर मल्होत्रा-वरिष्ठ पत्रकार
(साभार-बीबीसी हिन्दी )

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

वो दिल ही क्या तेरे मिलने की जो दुआ ना करे


वो दिल ही क्या तेरे मिलने की जो दुआ ना करे
मैं तुझको भूल के जिंदा रहूँ, खुदा ना करे.

रहेगा साथ तेरा प्यार ज़िन्दगी बनकर
ये और बात, मेरी ज़िन्दगी वफ़ा ना करे.

सुना है उसको मुहब्बत दुआए देती है
जो दिल पे चोट खाए मगर गिला ना करे.

ये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई में
खुदा किसी को किसी से मगर जुदा ना करे.

खुदा किसी को किसी पर फ़िदा ना करे
अगर करे तो क़यामत तलक जुदा ना करे.
                                                           कतील शिफ़ाई 

क्यूं डरें, ज़िन्दगी में क्या होगा


क्यूं डरें, ज़िन्दगी में क्या होगा
कुछ न होगा तो तजुर्बा होगा

हंसती आँखों में झाँक कर देखो
कोई आंसू कहीं छुपा होगा

इन दिनों न उम्मीद-सा हूँ मैं
शायद उसने भी ये सुना होगा

देखकर तुमको सोचता हूँ मैं
क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
                                           जावेद अख्तर 

रोते रोते बैठ गयी आवाज़ किसी सौदाई की


अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की

कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की

वस्ल की रात ना जाने क्यों इसरार था उनको जाने पर
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की

उड़ते उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते रोते बैठ गयी आवाज़ किसी सौदाई की.
                                                                 कतील शिफ़ाई 

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको


अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको

मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको।

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने

ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको।

ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन

कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको।

बादाह फिर बादाह है मैं ज़हर भी पी जाऊँ ‘क़तील’

शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको।
                                                            क़तील शिफ़ाई