नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

गंदे बालों वाली लड़की

महीनों तक सुबह की सैर के दौरान नियमित रूप से रोज अपने समय पर दिख जाने वाली उस गंदे और मैले-कुचैले कपडे पहने हाथ में प्लास्टिक की बोरी लिये कचरा बीनती हुई लड़की से आज बात करने की हिम्मत आखिरकार जुटाकर उसके पास पहुंचकर रुका ही था की अचानक मुझे अपने सामने पा कर वह गंदे बालों वाली लड़की घबरा सी गई और इधर-उधर देखने लगी. उसकी घबराहट देखकर थोड़ी देर के लिए तो मैं भी घबरा गया मगर फिर थोडा संयत होकर मैंने उसे आश्वासन देते हुए कहा “घबराओ मत, अगर तुम्हें परेशानी न हो तो मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ!” मेरी बात सुनकर उसने जैसे पीछा छुड़ाने की नीयत से कहा “मुझे कुछ भी नहीं मालुम साहब” और मुड़कर जाने को हुई तब मैंने उसे फिर टोका “मुझे गलत मत समझो मैं एक शरीफ इंसान हूँ”. “तुम्हें महीनों से देख रहा हूँ और तुम्हारे बारे में मेरे मन में कई सवाल आ रहे हैं जिनका जवाब सिर्फ तुम्ही दे सकती हो, अगर तुम्हें कोई विशेष परेशानी न हो तो!”.
मेरी बात सुनकर वह ज़रा ठिठकी और बोली “मुझे देखकर तो लोग नाक-भौं सिकोड़कर निकल जाते हैं और आप कह रहे हैं कि मुझे देखकर आप के मन में कुछ सवाल आते हैं! मैं भी जानना चाहूंगी कि  मुझे देखकर आपके मन में क्या सवाल आते हैं?” उसकी ऐसी सपाट बातें सुनकर मैं सकपका गया फिर थोडा सम्हलकर बोला “मेरा कोई भी ऐसा मतलब नहीं था जो कि तुम्हें गलत लगे, मैं तो बस इतना जानना चाह रहा था कि तुम्हें तो और भी कई काम मिल सकते हैं फिर तुम यह कचरा बीनने का काम ही क्यों कर रही हो? क्या तुम्हारा मन नहीं होता कि तुम भी अच्छे कपडे पहनो, साफ-सफाई से रहो!”.
“ख़ुशी से कौन करता है यह सब साहब?”
“तब फिर क्यों करती हो यह सब!”.
“मजबूरी में करना पड़ता है”.
इस काम को करने की भी मजबूरी हो सकती है क्या!”.
“आप ठीक कहते हैं साहब, काम तो मुझे बहुत मिल जायेगा मगर इस काम में मैं अपने को सुरक्षित महसूस करती हूँ”.
“क्या बात कर रही हो! तुम अपने को इतना असुरक्षित क्यों महसूस करती हो? और कौन-कौन हैं तुम्हारे परिवार में?”.
“मैं और मेरी माँ बस इतना ही है मेरा परिवार”.
“तुम्हारे पिता!”.
“लगता है आप मेरी पूरी कहानी सुनना चाहते हैं!”.
मैंने थोडा असहज होते हुए कहा “ऐसी बात नहीं है फिर भी तुम अपनी कहानी मुझे बता सको और मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूँ तो मुझे अच्छा लगेगा”.
“मेरी मदद आप क्या कर पाएंगे! फिर भी मैं सुनाती हूँ आपको अपनी कहानी”.
एक गहरी सांस लेकर उदासी भरे शब्दों में उसने कहना शुरू किया “हम लोग उड़ीसा के रहने वाले हैं. मेरे पिता पहले तो मजदूरी करते थे फिर बाद में ठेकेदारी करने लगे. मेरी बड़ी बहन और मैं हम दोनों ही माँ –बाप के दुलारे थे. हमारे पिता भी हमें बेटों से कम नहीं समझते थे और हमें इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाते थे. हम लोगों का अपना घर नहीं था हम किराये से रहते थे. पिताजी इतना कमा लेते थे जिससे हमारा गुजारा आसानी से हो जाता था. मेरी बड़ी बहन १०वी और मैं १२वी में पढ़ रहे थे, सब ठीक-ठाक  चल रहा था कि अचानक एक दिन घर में खबर आई की पिताजी की हत्या हो गई है. हमारे ऊपर तो जैसे दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा यह खबर सुनकर. इस स्थिति की तो कल्पना तक नहीं की थी किसी ने भी. पुलिस की खोजबीन में पता चला कि किसी अन्य ठेकेदार से पिताजी का मामूली विवाद था जिसके कारण उस ठेकेदार ने पिताजी की हत्या करवा दी. वह ठेकेदार पकड़ा भी गया मगर पुलिस की लापरवाही और सबूतों के अभाव में उसे छोड़ भी दिया गया. उस ठेकेदार की बुरी नजर मेरी बड़ी बहन पर पड़ चुकी थी और जेल से छूट जाने के कारण उसका हौसला भी काफी बढ़ चुका था अब वह हमारे घर पर आकर हमें परेशान करने लगा. हमारा घर के बाहर निकलना मुश्किल हो गया था. एक दिन दीदी ने हिम्मत की और थाने पहुँच गई ठेकेदार के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने. रिपोर्ट तो क्या लिखते पुलिसवाले उलटे उन्होंने ठेकेदार को ही थाने बुलवा लिया और फिर ठेकेदार और कुछ पुलिसवालों ने दीदी के साथ बलात्कार किया और बेहोशी की हालत में सड़क के किनारे फेक कर चले गए. होश आने पर दीदी किसी तरह रोती-बिलखती हुई रात में घर पहुंची. अगले दिन सुबह जब हम मोहल्ले के नेता को लेकर फिर थाने पहुंचे तो हमें धमकाया गया कि हम किसी के सामने अपनी जबान न खोलें वरना अंजाम ठीक नहीं होगा चुप रहने में ही तुम लोगों की भलाई है. मगर दीदी चुप रहने वालों में से नहीं थी वह थाने के सामने ही धरने पर बैठ गई. शाम होते-होते दीदी को पुलिसवालों से मारपीट और दुर्व्यवहार करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और हवालात में डाल दिया गया. अगले दिन कोर्ट से जमानत का आदेश लेकर हम थाने पहुंचे तब तक काफी देर हो चुकी थी, इतनी बेइज्जती और जुल्म दीदी बर्दाश्त नहीं कर पाई थी और दुपट्टे से अपना गला घोट कर उसने अपनी जान दे दी थी. इस पूरी घटना के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई सिर्फ दो पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया गया और पूरा मामला दबा दिया गया.

अब ठेकेदार और पुलिसवाले हमारे घर आकर हमें परेशान करने लगे कि तुम लोग भी अपना मुह बंद रखना नहीं तो तुम्हारा भी यही अंजाम होगा. अपने पति और एक बेटी को खो चुकी मेरी माँ ठेकेदार की मुझ पर गन्दी नजर को पहचान गई थीं और उन्होंने एक बेहद ही कठोर फैसला लिया कि अब हम इस शहर को छोड़ देंगे. मैं अपना शहर छोड़ना नहीं चाहती थी मगर माँ की चिंता भी सही थी इसलिए हमें अपने शहर को छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा. घर से कुछ सामान समेटकर रात में हमने बिना किसी को बताये घर छोड़ दिया और रेलवे स्टेशन पहुंचे जहाँ रायपुर जाने वाली ट्रेन खड़ी थी हम उसमें बैठ गए और अगले दिन रायपुर पहुँच गए. स्टेशन से बाहर निकलकर तो हमें कुछ सूझ ही नहीं रहा था की हम कहाँ जाएँ और क्या करें, इस शहर में हमारा अपना कोई भी नहीं था जो कि हमें शरण दे सके या हमारी कोई मदद कर सके. पूरा दिन इसी उधेड़बुन में गुजर गया और रात हो गई. मजबूरन रात हमें स्टेशन के बाहर ही गुजारनी पड़ी मगर यहाँ पर भी कई जोड़ी हैवानी नजरें हमें रात भर घूरती रहीं. हम काफी निराश हो चुके थे कि स्टेशन में भीख मांगनेवाली एक बूढी माँ ने हमारी तकलीफ देखी और हमें सहारा दिया.वह हमें अपनी झोपडी में लेकर गई, हमें खाना खिलाया, आराम करने को कहा, हमारी दुखभरी कहानी  सुनी और हमें सांत्वना देते हुए कहा कि “तुम लोग घबराओ मत, मैं यहाँ अकेले ही रहती हूँ अब तुम लोग यहीं पर रहो.

हम तो ऐसा महसूस कर रहे थे जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो. अगले दिन मेरी माँ ने बूढ़ी माँ से कहा कि “मुझे भी कुछ काम करना चाहिए आखिर कब तक खाली बैठी रहूंगी!”. बूढी माँ ने कहा कि मैं तो रेलवे स्टेशन में भीख मांगकर अपना गुजारा करती हूँ तुमको भी यही करना हो तो मेरे साथ चल सकती हो या फिर ये काम पसंद न हो किसी के यहाँ झाड़ू-पोछा और बर्तन मांजने का काम भी मिल सकता है. “नहीं मेरी माँ यह सब नहीं करेगी” मैंने बीच में टोकते हुए कहा. “मैं इंग्लिश स्कूल में  दसवीं तक पढ़ी हूँ, मैं ट्यूशन पढ़ा कर गुजारा कर लूंगी”.  बूढी माँ थोड़ी सी दर्द भरी मुस्कराहट के साथ बोली “मेरे कहने का मतलब ये नहीं था बेटी कि तुम्हारी माँ भीख मांगे या किसी दुसरे के यहाँ झाड़ू-पोछा का काम करे. मैंने तो वही कहा जितनी मेरी सोच थी. तुम तो बहुत पढ़ी-लिखी हो बेटी जो करोगी ठीक ही करोगी” कहकर बूढी माँ चुप हो गई. मैं समझ गई थी कि बूढी माँ को मेरी बात का बुरा लगा था इसलिए मैंने बात को सम्हालते हुए कहा “नहीं माँ मेरा मतलब कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे आपको दुःख पहुंचे, मैं तो बस ये कहना चाह रही थी मेरी माँ की हालत अभी इतनी अच्छी नहीं है कि  वह कोई मेहनत का काम कर सकें, वैसे आपने अपने परिवार के बारे में कुछ नहीं बताया माँ?” मैंने बूढी माँ को थोडा कुरेदते हुए कहा. बूढी माँ ने कहा “मेरे पति तो १० साल पहले ही मुझे छोड़कर चले गए थे और दो बेटों में मुझे अपने पास रखने को लेकर आये दिन झगडा होता रहता था और मुझे भी दोनों बेटे और बहु ताने मरते थे की पिताजी के साथ ही तुम क्यों नहीं मर गई. इन बातों से मुझे काफी दुःख होता था. एक दिन मैंने फैसला किया कि मेरी वजह से मेरे बेटों के परिवार में अशांति रहे इससे अच्छा है कि मैं मर ही जाऊं. मैं घर से अपनी जान देने के लिए ही निकली थी, कई दिन तक भटकती रही मगर मरने की हिम्मत न जुटा पाई और भटकते-भटकते रेलवे स्टेशन पहुँच गई और इसी बस्ती की एक बुढ़िया के साथ भीख मांगने लगी. उस बुढ़िया ने यहीं पर मेरी भी झोपडी बनवा दी और फिर मैं यहीं की होकर रह गई.” “आपके बेटों ने आपको ढूँढने की कोशिश नहीं की?”. “उनको क्या गरज पड़ी थी बेटी! वह तो मुझसे छुटकारा ही पाना चाहते थे.”
फिर मेरे कहने पर बूढी माँ मुझे कई बड़े घरों में लेकर गई मगर ट्यूशन पढ़ाने के लिए किसी को जरूरत न थी आजकल सब के बच्चे कोचिंग क्लास जाने लगे हैं. घरेलु कामकाज के लिए नौकरानी के रूप में रखने को कई लोग तैयार थे. कोई चारा न देख मैनें घरेलु नौकरानी का काम करना स्वीकार कर लिया. वहां पर मुझे झाड़ू-पोछा, बर्तन मांजना, साफ़-सफाई और कपडे धोने, प्रेस करने का काम करना पड़ता था. मुझे काम करते हुए १ महीने ही हुए थे कि एक दिन मैं काम पर पहुंची तो पता चला कि मालकिन घर में नहीं हैं वह एक दिन के लिए बाहर गई थी. मैं लौटने ही वाली थी कि मालिक ने कहा “कोई बात नहीं है तुम झाड़ू-पोछा कर दो और बर्तन धुल दो बाकी काम कल आकर कर लेना जब मालकिन आ जाएगी. अभी तक ऐसी कोई हरकत मालिक या मालकिन ने नहीं की थी जिससे मुझे किसी भी तरह की शंका हो इसलिए मैं भी संकोचवश मना न कर सकी और काम करने लगी. काम होने के बाद मालिक ने कहा “कल आफिस जाने के लिए मेरे पास प्रेस किये हुए कपडे नहीं है १ जोड़ी कपडे प्रेस कर दोगी क्या!” मैनें कपडे प्रेस कर दिए और जाने के लिए निकली तब तक वह किचन से चाय बनाकर लाया था और मेरे सामने खडा हो गया. उसने कहा तुम काम करके बहुत थक गई होगी थोड़ी सी चाय पी लो” मुझे मालिक की आँखों में कुछ अजीब सा दिखा और मैं घबरा कर बहार की तरफ जाने लगी तो उसने मेरा रास्ता रोक लिया अब मैं बुरी तरह से घबरा गई और चिल्लाने लगी. मुझे चिल्लाते देख मालिक के होश उड़ गए, चाय का कप फेंक कर उसने जल्दी से मेरा मुह दबाया और बोला “चिल्लाना बंद करो पागल लड़की. तुमको जाना है तो जाओ कहकर उसने दरवाजा खोल दिया और मैं वहां से भागती हुई आकर सीधे माँ की गोद में गिर पड़ी. माँ भी एकदम से घबरा गई और रोते हुए पूछने लगी “क्या हुआ बेटी? तेरे साथ क्या हो गया?”. माँ को रोते हुए देख मैंने अपने आपको सम्हाला और पूरी बात बताई कि भगवान की कृपा से मेरे साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ. मगर आगे भी कुछ गलत नहीं होगा इस बात की तसल्ली न माँ को थी न ही मुझे. रात में बूढी माँ के आने पर मैंने उन्हें जब पूरी बात बताई और मालिक के खिलाफ रिपोर्ट करने की बात कही तो बूढी माँ ने समझाते हुए कहा “किस-किस के खिलाफ रिपोर्ट करेगी बेटी! और तेरी रिपोर्ट लिखने वाले भी तो वैसे ही इंसान हैं न!.” अब मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ! फिर बूढी माँ ने कहा अगर तू बुरा ना माने तो एक काम है जिसे तू कर सकती है!”. “आप बताओ क्या काम है”. बूढी माँ ने कहा “बेटी हमारे मोहल्ले की कुछ लड़कियां कचरा बीनने जाती हैं, दिखने में जरूर थोडा गन्दा लगता है मगर बेटी आमदनी भी अच्छी हो जाती उसमें. और अपना हुलिया थोडा बिगाड़ ले, घर के बाहर गंदे और मैले-कुचैले कपडे पहना कर और वैसी ही दिखा कर, इससे लोगों की गन्दी निगाहों से भी बची रहेगी.”

पहले तो मैनें बूढी माँ को साफ़ मना कर दिया ये काम करने के लिए मगर १-२ दिन में मुझे समझ में आ गया कि घर खर्च के लिए रुपया कमाने के साथ-साथ अपनी इज्जत बचाना भी जरूरी है, माँ को मैं भीख मांगते या किसी के घर बर्तन मांजते नहीं देखना चाहती थी इसलिए मैंने कचरा बीनने का काम करना शुरू कर दिया. शुरू में तो मुझे अजीब लगता था मगर अब कुछ भी बुरा नहीं लगता. गन्दी नाली और बदबूदार कचरे के ढेर से अपने काम की चीज उठाने में कोई संकोच नहीं लगता और सबसे अच्छी बात यह है कि मेरे मैले-कुचैले कपडे और मेरी जानबूझकर गन्दी बनाई हुई शक्ल देखकर अब लोगों की आंखों में अजीब से भाव नहीं दिखते बल्कि मुझे देखकर लोग नाक-भौं सिकोड़ते जल्दी से आगे निकल जाते हैं.
“मैं अब चलती हूँ साहब मेरी माँ मेरा इन्तजार कर रही होगी.” उसकी आवाज सुनकर जैसे मैं नींद से जागा, अभी तक मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई फिल्म चल रही हो मेरे सामने. मैं भी उसे रोक न  पाया और उस गंदे बालों वाली लड़की को आँखों से ओझल होने तक देखता खडा रह गया. कृष्ण धर शर्मा 2014

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

ड्रग मार्केट में प्रतिस्पर्धा बढ़ाइए

यूपीए सरकार द्वारा लगभग 400 दवाओं के दाम तय कर दिये गये थे। वर्तमान एनडीए सरकार 450 और दवाओं के दाम निर्धारित कर दिये हैं। 350 और दवाओं के दाम निर्धारित करने की प्रक्रिया चल रही है। सरकार का यह कदम सही दिशा में है।
 

दवाओं के बाजार के दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा जेनेरिक दवाओं का है। अकसर दवाओं में एक केमिकल होता है।
दवा को इस केमिकल के नाम से बेचा जा सकता है।  लेकिन कई कम्पनियां उस दवा को विशेष नाम से बेचती हैं। जैसे बुखार उतरने की दवा का मूल नाम पैरासिटामोल है। यह बाजार में पैरासिटामोल के नाम से भी उपलब्ध है। लेकिन दूसरी कम्पनियां इसी दवा को क्रोसिन अथवा सैरीडान के नाम से बेचती हैं।
जब किसी दवा को विशेष कंपनी द्वारा दिये गये नाम से बेचा जाता है तो उसे ‘‘ब्रैंडेड’’ कहा जाता है। इन दवाओं को बनाने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है। किसी भी कम्पनी द्वारा इसे बनाया और बेचा जा सकता है।
दवा कम्पनियां अकसर इन दवाओं को अत्यधिक उंचे दाम पर बेचती हैं। इनके द्वारा एडवरटाइजमेंट किये जाते हैं। सेल्स रिप्रेजेन्टेटिव की बड़ी फौज तैनात की जाती है। डाक्टरों को गिफ्ट एवं कमीशन दिये जाते हैं। जैसे किसी दवा को एक कम्पनी 10 रु. में बेच रही है। उसी दवा को दूसरी कम्पनी अपना ब्राण्ड लगाकर 50 रु. में बेचती है। इस 50 रु. में से वह 10 रु. का कमीशन डाक्टरों को दे देती है। डक्टर मरीजों को 50 रु. की महंगी दवा लिख देते हैं। मरीजों को इस बात का भान ही नहीं होता कि यही दवा कम दाम में उपलब्ध है।
इन दवा के दाम पर नियंत्रण करने का अधिकार सरकार के पास ड्रग प्राइस कंट्रोल आर्डर के अंतर्गत है। सरकार की मंशा है कि अधिक मात्रा में दवाओं को मरीजों को उचित दाम पर उपलब्ध कराया जाये। लेकिन प्रशासनिक स्तर पर मूल्य निर्धारण में कई समस्याएं हैं। पहली समस्या भ्रष्टाचार की है। ड्रग इन्सपेक्टर को घूस खाने के अवसर खुल जाते हैं। दूसरी समस्या है कि मूल्य को लेकर विवाद बना रहता है।

ड्रग कम्पनियों की शिकायत रहती है कि मूल्य नीचे निर्धारित किये गये हैं जबकि जनता की शिकायत रहती है कि ये ऊंचे हैं। तीसरी बड़ी समस्या यह है कि लगभग 900 दवाओं को बनाने वाली सैकड़ों कम्पनियों पर निगरानी रख पाना दुष्कर कार्य है। चौथी समस्या है कि दवा की गुणवत्ता की जांच करना कठिन होता है। सरकार द्वारा दाम कम निर्धारित करने पर कम्पनी द्वारा दवा की गुणवत्ता को गिराया जा सकता है। इसलिये मूल्य निर्धारण को जरूरी परन्तु अल्प कालिक उपाय मानना चाहिये। दवाओं के मूल्य न्यून बने रहें इसके लिये दूसरे कदम भी सरकार को उठाने चाहिये।
पहला कदम है कि सामान्य दवाओं पर ब्राण्ड लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाये। साथ-साथ डाक्टरों पर प्रतिबन्ध लगाया जाये कि वे जेनेरिक दवाओं के पर्चे लिखें व निर्माता कम्पनी का नाम पर्चे पर न लिखें। जैसे डाक्टर को बुखार कम करने के लिये पैरासिटामाल दवा लिखनी है। मरीज के प्रिस्कृप्शन पर पैरासिटामोल ही लिख दिया जाये न कि क्रोसिन अथवा सैरीडान। किसी कम्पनी का नाम भी न लिखा जाये। ऐसा करने से मरीज पर अपने विवेक से दुकान से किसी भी कम्पनी द्वारा निर्मित पैरासिटामाल दवा खरीदी जा सकती है। ड्रग कम्पनियों एवं डाक्टरों के अपवित्र गठबन्धन द्वारा मरीज को अनायास महंगी दवा खरीदने की मजबूरी नहीं रहेगी।
साथ-साथ सरकार को दवाओं का परीक्षण कराना चाहिये। तमाम अध्ययन बताते हैं कि अकसर गोलियों में बताई गई मात्रा से कम दवा होती है। सरकार को चाहिये कि तमाम कम्पनियों द्वारा बनाई गयी दवाओं का परीक्षण कराये। फिर परीक्षण के परिणामों को सरकारी बेबसाइट पर डाले। दुकानदारों को निर्देश दिया जाये कि परीक्षण रिपोर्ट को दुकान में टांगे। तब खरीदार देख सकेगा कि किस कम्पनी बनाई गयी दवा कितनी कारगर है और उसका क्या दाम है। वह अपने विवेक के अनुसार दवा खरीद सकेगा। इन कदमों का प्रभाव दीर्घ कालिक होगा। भ्रष्टाचार के अवसर भी नहीं खुलेंगे।
दवाओं का दूसरा हिस्सा पेटेंटीकृत दवाओं का है। ड्रग कम्पनियों द्वारा नई दवाओं का आविष्कार किया जाता है। इन दवाओं पर कम्पनी द्वारा पेटेंट हासिल किया जाता है। पेटेंट कानून के तहत इन दवाओं को बनाने एवं बेचने का एकाधिकार पेटेंट धारक कम्पनी के पास रहता है। पेटेंट  धारक कम्पनी द्वारा 20 वर्षों तक दवाओं को मनचाही कीमतों पर बेचा जाता है। ड्रग कम्पनियों का तर्क है कि दवा के अविष्कार में उनके द्वारा भारी निवेश किया गया है।

इस निवेश को वसूल करने के लिये उन्हें दवा के ऊंचे दाम रखना अनिवार्य है। यह छूट उन्हें मिलनी ही चाहिये चूंकि ऊंचे मूल्य पर बेचकर कमाये गये लाभान्श से ही वे आगे रिसर्च में निवेश कर सकेंगे और नई दवा का आविष्कार कर सकेंगे। ड्रग कम्पनियों की यह दलील सही भी है। दरअसल नई दवाओं की खोज ने मरीज को अपनी बीमारी के साथ जीने का तरीका दिया है। वे कई दशक तक दवाओं का सेवन करते हुये जी लेते हैं। तात्पर्य यह कि यदि नई दवाओं की खोज न हुयी होती तो यह उपचार सम्भव न हो पाता।
बावजूद इसके, पेटेंटीकृत दवाओं के दाम पर भी कुछ नियंत्रण जरूरी है। कारण कि ड्रग कम्पनियों द्वारा कमाये गये लाभ का एक अंश ही भविष्य की रिसर्च में निवेश किया जाता है। शेष लाभ मालिकों अथवा शेयर धारकों को वितरण किया जाता है। इन दवाओं के उंचे मूल्य से मरीज भी सीधे प्रभावित होते है। यहां प्रश्न संतुलन का है। एक ओर पूर्व में किये गये निवेश की वसूली तथा भविष्य में किया जाने वाला निवेश है। दूसरी ओर मरीज का हित है। दोनों तर्क मजबूत हैं और किसी वैज्ञानिक कसौटी पर दाम तय कर पाना कठिन है।

यह निर्णय राजनैतिक है। सरकार को अपने विवेक से इस संतुलन को स्थापित करना चाहिये। केन्द्र सरकार ने पेटेंटीकृत दवा के दाम निर्धारित करने को एक कमेटी सन् 2007 में बनाई थी। इस कमेटी ने पांच वर्षों के बाद अपनी रपट प्रस्तुत की। इस रपट पर निर्णय लेने के लिये दूसरी कमेटी वर्तमान में विचार कर रही है। सरकार को चाहिये कि इस प्रकार की ढिलाई पर सख्त कदम उठाये और पेटेंटीकृत दवाओं के मूल्य निर्धारण की पालिसी शीघ्र बनाकर देश की जनता को राहत दे।

डॉ. भरत झुनझुनवाला

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

बस्तर हाट


दस का आलू दस का प्याज
दस की मिर्ची दस का तेल
दस रु. में हो जाता है
बस्तर हाट में सारा खेल
थैला भरकर महुआ लाते
मुट्ठी भर सामान वो पाते
शहरों से आकर व्यापारी
बस्तरियों को लूट ले जाते
उन्हीं का महुआ उन्हीं कि इमली
उन्हीं का धान उन्हीं कि लकड़ी
औने-पौने में खरीदकर
रातों-रात अमीर हो जाते
पुलिस-प्रशासन और व्यापारी
मिलकर रहते बस्तर में
लूटपाट का खेल खेलते
अपने-अपने स्तर में
लोहा, सोना, हीरे, मोती
छुपें हुए हैं इस धरती में
कैसे निकले माल ये सारा
लगे हुये हैं सब युक्ति में 
आवाज उठाता कोई भी तो
बर्दाश्त नहीं होता उनको
चुप न हुआ तो नक्सली बताकर
डरा दिया जाता सबको.

                  (कृष्ण धर शर्मा, ८.२०१६)

अग्निपरीक्षा


स्त्री तुमको ही हर युग में
क्यों देनी होती अग्निपरीक्षा
स्त्री तो होती है देवी
सदियों से मिली हमें यह शिक्षा
सीता, द्रोपदी या अहिल्या हो
छला तुम्हें पुरुषों ने सदा
तुमको ही दोषी ठहराया
पुरुष सदा निर्दोष रहा
कथनी-करनी में फर्क मगर
समझ नहीं आता हमको
गलती हो पुरुषों की अगर  
सजा मिली हरदम तुमको

              (कृष्ण धर शर्मा, ७.२०१६)

तुम्हारा भाग्य


युग बदले शासक बदले
बदला नहीं तुम्हारा भाग्य
हाय हिरण तुम छले गए
हर युग में स्त्री की तरह
न्याय की देवी की आँखों में
बांध दी गई काली पट्टी
सुन तो सके पर देख न पाये
साजिश हुई युगों से ऐसी
न्याय हुआ न रामराज में
और न होगा कलयुग में भी
समय भले ही बदल गया हो
सोच मगर बदली है नहीं
अत्याचार सहते रहना
शायद नियति तुम्हारी है
रामराज हो भले मगर
धोबी की सोच तो भारी है...

                 (कृष्ण धर शर्मा, ७.२०१६)

आम आदमी खास आदमी


आम आदमी देखता है आम सपने
खास आदमी देखता है खास सपने
कभी-कभी तो इन सपनों का
अंतर होता है इतना ज्यादा 
कि जैसे जमीन और आसमान का
जैसे नदी और समुद्र का अंतर
कुछ सपने समान भी होते हैं इनके
जैसे अपनों की खुशहाली के सपने
आम आदमी देखता है सपने 
कल और परसों के
ख़ास आदमी देखता है सपने
महीनों और बरसों के
आम आदमी करता है चिंता
अपने पडोसी की भी
कहीं कुछ परेशानी या
विपदा में तो नहीं है उसका पडोसी!
खास आदमी पडोसी की चिंता को
घुसने ही नहीं देता है घर में अपने
खिड़की, दरवाजों सहित
हर उस जगह पर बिठा देता है पहरे
कमरों को भी करवा देता है साउंडप्रूफ
ताकि न आ सकें किसी गरीब की
परेशान आहें या कराहें घर में उसके
मगर इस चक्कर में बंद कर लेता है वह
सकारात्मक भावनाओं और संभावनाओं का
आना जाना भी अपने घर में
फंसकर रह जाता है वह अपने ही बुने
कांक्रीट और सुविधाओं के जाल में
जबकि आम आदमी की झोपडी में
नहीं है कोई रोक-टोक
न पडोसी की चिंताओं के लिए
न चिड़िया के लिए न कुत्ते-बिल्ली के लिए
न ही किसी भूखे भिखारी के लिए
आम आदमी को क्या जरूरत
एयरकंडीशन कमरों की
वह तो गज़ब का सुख पाता है
भरी दोपहरी में भी
वटवृक्ष के नीचे बैठकर
जहाँ बैठकर कोई बुद्ध हुआ
तो कोई महावीर हो गया....

               (कृष्ण धर शर्मा, ७.२०१६)

नदी और औरत


किसी झरने का नदी बन जाना
ठीक वैसे ही तो
जैसे किसी लड़की का औरत बन जाना
जैसे एकवचन से बहुवचन हो जाना
जैसे अपने लिए जीना छोड़कर
दुनिया के लिए जीना
जैसे दूसरों को अमृत पिला
खुद जहर पीना
अद्भुत सी समानताएं हैं
नदी और औरत में
दोनों ही से मिलकर
धुल जाते हैं कलुष
तन और मन के
तृप्त हो जाती है आत्मा भी
मिलती है अद्भुत सी शांति
रेतीले, पथरीले, जंगल, पहाड़ से
गुजरती है नदी कितनी ही चोटें खाकर
खुशहाली पहुंचाती है मगर
नगर-नगर हर गाँव-घर जाकर
भले ही मिलता हो उसे बदले में
इंसानी गन्दगी का दलदल
पिता हो, पति हो, या पुत्र
औरत भी तो ले लेती है
सबकी थकान और चिंताएं अपने ही सर
फिर भी कोई गिला नहीं दोनों को ही
खुशियाँ बांटती जा मिलती हैं
दोनों ही अपने-अपने समंदर को

              (कृष्ण धर शर्मा, २०१६)

पागल का घर


शाम के धुंधलके में
जबकि चिडियां वापस जा रही थीं
अपने घोंसलों में बच्चों के पास
गायें भी रंभाती हुई भागती सी
अपने छौनों के लिए
आलस भरी अंगड़ाई लेकर
जागने की तैयारी में थे उल्लू भी
पेड़ की शाखों पर उल्टे लटके हुए
दिनभर खेतों में काम करके
किसान भी लौट रहे थे घरों को
अपने हल और बैलों के साथ
कुछ बैलगाड़ियाँ भी लौट रही थीं हाट-बाजार से
और इन सबका इंतजार करती हुई
कुछ जोड़ी आँखें भी झांक रही सी
घरों की चारदीवारी से
अँधेरा गहराने लगा था अब तक
पहुँच चुके थे तब तक लोग अपने घरों में
चिडियां अपने घोसलों में
गायें अपने छौनों के पास
और पहुँच चुका था पागल भी
चाय-पकौड़ी वाले होटल के
बाहर बिछे तख़्त पर
दिनभर यहां-वहां भटकने के बाद 

                   (कृष्ण धर शर्मा, २०१६)

सोमवार, 26 सितंबर 2016

गुंजाइश



थक तो बहुत जाता हूँ
इस 12 घंटे की
ईमानदारी कि नौकरी में मैं
मगर यह सोचकर
तसल्ली भी मिलती है मुझे
कि अब अच्छी और गहरी
नींद तो आएगी मुझको
जो लाखों बेईमानों की
किस्मत में नहीं है
कभी-कभी
अपनी ईमानदारी पर
पछतावा भी होता है मुझे
कि देखो तो जरा
कितने आगे निकल गए हैं
मेरे ही साथ चलने वाले
मगर तसल्ली भी होती है
जब कुछ दूर चलने पर
मिलते हैं वही लोग
थके-हारे से जीवन के
पथरीले पहाड़ों पर
यही सोचते हुए से
कि रास्ते में छोड़ आये हैं
जो जीवन के सुनहरे पल
कि अब वापस लौटने की
नहीं बची है गुंजाईश
रत्ती भर भी!
          (कृष्ण धर शर्मा, 9.2016)

बुधवार, 21 सितंबर 2016

ईमानदारी की नौकरी


थक तो बहुत जाता हूँ
इस 12 घंटे की
ईमानदारी की नौकरी में मैं
मगर यह सोचकर
तसल्ली भी मिलती है मुझे
कि अब अच्छी और गहरी
नींद तो आएगी मुझको
जो लाखों बेईमानों की
किस्मत में नहीं है
कभी-कभी
अपनी ईमानदारी पर
पछतावा भी होता है मुझे
कि देखो तो जरा
कितने आगे निकल गए हैं
मेरे ही साथ चलने वाले
मगर तसल्ली भी होती है
जब कुछ दूर चलने पर
मिलते हैं वाही लोग
थके-हारे से जीवन के
पथरीले पहाड़ों पर
यही सोचते हुए से
कि रास्ते में छोड़ आये हैं
जो जीवन के सुनहरे पल
कि अब वापस लौटने की
नहीं बची है गुंजाईश
रत्ती भर भी!
          (कृष्ण धर शर्मा, 9.2016)

रविवार, 11 सितंबर 2016

संगीत की कोई सरहद नहीं होती

गजल गायक गुलाम अली की बेहतरीन नज्मों और दिल को छू लेने वाली गजलों के दीवाने केवल पाकिस्तान में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में मौजूद हैं। गुलाम अली की गजल गायिकी का जादू सरहद पार भारतीय प्रशंसकों में सिर चढ़कर बोलता है, और उनका कहना भी है कि संगीत की कोई सीमा नहीं होती और न कभी हो सकती है। अपने बेटे आमिर अली के नए अलबम 'नहीं मिलना' की लॉन्चिंग के मौके पर दिल्ली आए गुलाम अली ने आईएएनएस के साथ विशेष बातचीत में आधुनिक संगीत में सुधार की बात पर जोर दिया। गुलाम अली से जब पूछा गया कि आपकी गजलों के भारत में बहुत प्रशंसक हैं, आपको क्या लगता है कि आपके बेटे को भी लोग उसी तरह से पसंद करेंगे, इस पर उन्होंने कहा, "यह आमिर के काम पर निर्भर करेगा। आमिर जितना अच्छा काम करेंगे, लोग उन्हें उतना पसंद करेंगे, फिर चाहे वह भारत हो या पाकिस्तान।" गुलाम अली बताते हैं, "मुझे संगीत की दुनिया में 60 साल से अधिक हो चुके हैं, लेकिन मैं अब भी खुद को शागिर्द समझता हूं। मैं ऐसे कई रागों, सुरों और शास्त्रीय संगीत को सीखने का प्रयास करता रहता हूं, जिसे मैंने पहले नहीं सुना होता है। मैं उस चीज के पीछे पड़ जाता हूं और उसे लगातार सीखने की कोशिश करता रहता हूं।" गुलाम अली से जब पूछा गया कि क्या आपके प्रसंशक भारत में पाकिस्तान से अधिक हैं, तो इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "मुझे भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में ही प्यार मिलता है। यहां लोग ज्यादा हैं, इसलिए यहां का प्यार भी ज्यादा है।" आधुनिक और पाश्चात्य संगीत के बीच गजलों के प्रशंसकों की घटती संख्या को स्वीकारते हुए गुलाम अली ने बताया, "जाहिर तौर पर गजलों के प्रशंसकों की संख्या कम हो रही है, लेकिन गजल-गायिकी और शास्त्रीय संगीत के माहौल में बढ़ने वाले बच्चे गजलों से अछूते नहीं हैं। भारत और पाकिस्तान में विदेशी संगीत का बोलबाला तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन विदेशों में भी गजलों के दीवाने मिल जाते हैं।" रैप, हिप-हॉप और तड़क-भड़क वाले संगीत से गुलाम अली इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि इन गीतों का सिरा ही गलत होता है। गुलाम अली बताते हैं, "इस तरह के गीत-संगीत के सिरे नहीं होते हैं और उनका कंपोजीशन भी अटपटा ही रहता है। शुद्ध संगीत दिल को छू लेने वाला होता है।" उन्होंने कहा, "गायक, गीतकार, संगीतकार और संगीत से जुड़े तमाम लोगों को अच्छा संगीत देने की कोशिश करनी चाहिए। आजकल गीत लिखते वक्त गीतकार का ध्यान अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं की ओर अधिक होता है। गीत लिखने के लिए बहुत ही समझदारी होनी चाहिए।" श्रोताओं तक कर्णप्रिय संगीत पहुंचाने और बनावट से भरे संगीत को दूर रखने के लिए गुलाम अली का क्या सुझाव है?, पूछने पर उन्होंने कहा, "फिल्मी गीतों को आसान बनाकर लोगों के बीच पेश किया जा रहा है, जिससे उन्हें सुनने वालों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन जो लोग गीतों को समझते हैं, वे इस तरह के संगीत को नहीं पसंद करते। हमेशा ही हल्की बात अधिक प्रसिद्ध होती है, लेकिन मेरे अनुसार वह शुद्ध संगीत नहीं है।" उन्होंने कहा, "संगीत को पेश करने से पहले उसे सीखना और समझना बहुत जरूरी है। मैं अपने स्तर से इस तरह के संगीत को रोकने की कोशिश करता हूं और अपनी हद तक हर कोई इसे रोक सकता है।" इस समय भारत-पाकिस्तान के संबंध उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहे हैं, लेकिन संगीत देशों की दूरियों को दूर कर रहा है। सरहदों को पार कर दोनों देशों में बह रही संगीत की बयार पर गुलाम अली कहते हैं, "आवाज की कोई सरहद नहीं होती और संगीत को किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता।" आपके भारत आने का बार-बार विरोध होता रहा है, इस पर आपका क्या कहना है?, इस सवाल पर गुलाम अली ने कहा, "किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि कौन गा रहा है, बल्कि यह सोचना चाहिए कि क्या गा रहा है। मैं जब टेलीविजन पर गाता हूं, तो मुझे पूरी दुनिया सुनती है। मुझे विरोधों की परवाह नहीं है।" (Interviewer :IANS)(साभार-देशबंधु)