नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

भारतीय सिनेमा का इतिहास


सात जुलाई अठारह सौ छियासी भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अमर दिन है| उस रोज मुंबई (पूर्व नाम बंबई) के वाटकिंस हॉटल में ल्युमेरे ब्रदर्स ने छः लघु चलचित्रों का प्रदर्शन किया था। इन छोटी-छोटी फिल्मों ने ध्वनिरहित होने बावजूद भी दर्शकों का मनोरंजन किया था।
इन लघु चलचित्रों से प्रभावित होकर श्री एच.एस. भटवडेकर और श्री हीरालाल सेन नामक व्यक्तियों ने ल्युमेरे ब्रदर्स की तरह क्रमशः मुंबई (पूर्व नाम बंबई) और कोलकाता (पूर्व नाम कलकत्ता) में लघु चलचित्रों का निर्माण प्रारंभ कर दिया। सन् 1899 मे श्री भटवडेकर ने भारत के प्रथम लघु चलचित्र बनाने में सफलता प्राप्त की।
दादा साहेब फालके ने अपने लंदन प्रवास के दौरान ईसा मसीह के जीवन पर आधारित एक चलचित्र देखा। वह फिल्म ल्युमेरे ब्रदर्स की फिल्मों की तरह लघु चलचित्र न होकर लंबी फिल्म थी। उस फिल्म को देख कर दादा साहेब फालके के मन में पौराणिक कथाओं पर आधारित चलचित्रों के निर्माण करने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। स्वदेश आकर उन्होंने राजा हरिश्चंद्र बनाई जो कि भारत की पहली लंबी फिल्म थी और सन् 1913 में प्रदर्शित हुई। उस चलचित्र ने (ध्वनिरहित होने के बावजूद भी) लोगों का भरपूर मनोरंजन किया और दर्शकों ने उसकी खूब तारीफ की।
फिर तो चलचित्र निर्माण ने भारत के एक उद्योग का रूप धारण कर लिया और तीव्रता पूर्वक उसका विकास होने लगा। उन दिनों हिमांशु राय जर्मनी के यू.एफ.ए. स्टुडिओ में निर्माता के रूप में कार्यरत थे। वे अपनी पत्नी देविका रानी के साथ स्वदेश वापस आ गये और अपने देश में चलचित्रों का निर्माण करने लगे। उनकी पत्नी देविका रानी स्वयं उनकी फिल्मों में नायिका (हीरोइन) का कार्य करती थी। पति-पत्नी दोनों को खूब सफलता मिली और दोनों ने मिलकर बांबे टाकीज स्टुडिओ की स्थापना की।

अब तक केवल मूक फिल्में ही बना करती थीं पर 1930 के आसपास चलचित्रों में ध्वनि के समावेश करने का तकनीक विकसित हो जाने से सवाक् (बोलती) फिल्में बनने लगीं। आलम आरा भारत की पहली सवाक् फिल्म थी जो कि सन् 1931 में प्रदर्शित हुई। 1933 में प्रदर्शित फिल्म कर्मा इतनी अधिक लोकप्रिय हुई कि उस फिल्म की नायिका देविका रानी को लोग फिल्म स्टार के नाम से संबोधित करने लगे और वे भारत की प्रथम महिला फिल्म स्टार बनीं।
मूक फिल्मों के जमाने तक मुंबई (पूर्व नाम बंबई) देश में चलचित्र निर्माण का केन्द्र बना रहा परंतु सवाक् फिल्मों का निर्माण शुरू हो जाने से और हमारे देश में विभिन्न भाषाओं का चलन होने के कारण
चेन्नई (पूर्व नाम मद्रास) में दक्षिण भारतीय भाषाओं वाली चलचित्रों का निर्माण होने लगा। इस तरह भारत का चलचित्र उद्योग दो भागों में विभक्त हो गया।
उन दिनों प्रभात, बांबे टाकीज और न्यू थियेटर्स भारत के प्रमुख स्टुडिओ थे और ये प्रायः गंभीर किंतु मनोरंजक फिल्में बना कर दर्शकों का मनोरंजन किया करती थीं। ये तीनों स्टुडिओ देश के बड़े बैनर्स कहलाते था। उन दिनों सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाली, धार्मिक तथा पौराणिक, ऐतिहासिक, देशप्रेम से सम्बंधित चलचित्रों का निर्माण हुआ करता था और उन्हें बहुत अधिक पसंद भी किया जाता था। उस समय के कुछ प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय फिल्में हैं -
वी. शांताराम की फिल्म "दुनिया ना माने", फ्रैंज ओस्टन की फिल्म "अछूत कन्या", दामले और फतेहलाल की फिल्म "संत तुकाराम", मेहबूब खान की फिल्में "वतन", "एक ही रास्ता" और "औरत", अर्देशीर ईरानी की फिल्म "किसान कन्या" आदि।
व्ही. शांताराम की "डा. कोटनीस की अमर कहानी", मेहबूब ख़ान की "रोटी", चेतन आनंद की "नीचा नगर", उदय शंकर की "कल्पना", ख्वाज़ा अहमद अब्बास की "धरती के लाल", सोहराब मोदी की "सिकंदर", "पुकार" और "पृथ्वी वल्लभ", जे.बी.एच. वाडिया की "कोर्ट डांसर", एस.एस. वासन की "चंद्रलेखा", विजय भट्ट की "भरत मिलाप" और "राम राज्य", राज कपूर की "बरसात" और "आग" उन दिनों की अविस्मरणीय फिल्में हैं|
आरंभ में स्टुडिओ पद्धति का प्रचलन रहा। हरेक स्टुडिओ के अपने वेतनभोगी निर्माता, निर्देशक, संगीतकार, नायक, नायिका तथा अन्य कलाकार हुआ करते थे। पर बाद चलचित्र निर्माण में रुचि रखने वाले लोग स्वतंत्र निर्माता के रूप में फिल्म बनाने लगे। इन स्वतंत्र निर्माताओं ने स्टुडिओं को किराये पर लेना तथा कलाकारों से ठेके पर काम करवाना शुरू कर दिया. चूँकि ठेके में काम करने में अधिक आमदनी होती थी, कलाकारों ने वेतन लेकर काम करना लगभग बंद कर दिया। इस प्रकार स्टुडिओ पद्धति का चलन समाप्त हो गया और स्टुडिओं को केवल किराये पर दिया जाने लगा।
[स्रोत-विकिपीडिया]

विशाखापत्तनम समुद्र तट












दुनिया का सबसे बड़ा

प्र. दुनिया की सबसे लम्बी नदी है ?
उ. नील नदी.


प्र. दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान है ?
उ. सहारा.

प्र. दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है ?
उ. ग्रीनलैंड.


प्र. दुनिया का सबसे बड़ा हीरा उत्पादक देश है?
उ. दक्षिण अफ्रीका.

प्र. रबड़ का सबसे बड़ा उत्पादक देश है?
उ. मलेशिया.


प्र. जो दुनिया में टिन का सबसे बड़ा उत्पादक है?
उ. चीन

प्र. दुनिया में मैंगनीज का सबसे बड़ा उत्पादक  देश है?
उ. चीन और दक्षिण अफ्रीका. 

प्र. दुनिया में सबसे ऊंचा पर्वत है?
उ. माउन्ट एवरेस्ट.

प्र. दुनिया का सबसे बड़ा काफी उत्पादक देश?
उ. ब्राजील.

प्र. सबसे बड़ा महासागर?
उ. प्रशांत महासागर.

प्र. दुनिया की सबसे छोटी महिला?
उ. नागपुर निवासी 'ज्योति अमेगा.
  



बुधवार, 17 अगस्त 2011

सरदार वल्लभ भाई पटेल




सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म ३१ अक्टूबर १९७५ में नडियाद, गुजरात में एक कृषक परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम झवेरभाई पटेल एवं माता का नाम लदबा था. भारत के स्वतंत्रता संग्राम मे उनका मह्त्वपूर्ण योगदान है। भारत की आजादी के बाद वे प्रथम गृह मंत्री और उपप्रधानमंत्री बने। उन्हे भारत का लौह पुरूष भी कहा जाता है.  सोमभाई, नरसीभाई और विट्टलभाई उनके भाई थे। उनकी शिक्षा मुख्यतः स्वाध्याय से ही हुई। लन्दन जाकर उन्होने बैरिस्टर की पढाई पूरी की और वापस आकर गुजरात के अहमदाबाद में वकालत करने लगे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होने भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया। स्वतन्त्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला और बडा योगदान खेडा संघर्ष में हुआ। गुजरात का खेडा खण्ड  उन दिनो भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से भारी कर में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो सरदार पटेल, गांधीजी एवं अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हे कर न देने के लिये प्रेरित किया। अन्त में सरकार झुकी औअर उस वर्ष करों में राहत दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिये ही उन्हे पहले बारडोली का सरदार और बाद में केवल सरदार कहा जाने लगा। सरदार पटेल १९२० के दशक में गांधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन के समय कांग्रेस् में भर्ती हुए। १९३७ तक उन्हे दो बार कांग्रेस के सभापति बनने का गौरव प्राप्त हुआ। वे पार्टी के अन्दर और जनता में बहुत लोकप्रिय थे। कांग्रेस के अन्दर उन्हे जवाहरलाल नेहरू का प्रतिद्वन्दी माना जाता था।
           यद्यपि अधिकांश प्रान्तीय कांग्रेस समितियाँ पटेल के पक्ष में थीं, गांधी जी की इच्छा का आदर करते हुए पटेल जी ने प्रधानमंत्री पद की दौड से अपने को दूर रखा और इसके लिये नेहरू का समर्थन किया। उन्हे उपप्रधान मंत्री एवं गृह मंत्री का कार्य सौंपा गया। किन्तु इसके बाद भी नेहरू और पटेल के सम्बन्ध तनावपूर्ण ही रहे। इसके चलते कई अवसरों पर दोनो ने ही अपने पद का त्याग करने की धमकी दे दी थी। गृह मंत्री के रूप में उनकी पहली प्राथमिकता देसी रियासतों(राज्यों) को भारत में मिलाना था। इस कार्य को  उन्होने बिना कोई खून बहाये कर दिखाया। केवल हैदराबाद के आपरेशन पोलो के लिये उनको सेना भेजनी पडी। भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिये उन्हे भारत का लौह पुरूष के रूप में जाना जाता है। १५ दिसंबर  १९५० में उनका देहान्त हो गया।
           सरदार पटेल ने आजादी के ठीक पूर्व (संक्रमण काल में) ही पीवी मेनन के साथ मिलकर कई देसी राज्यों को भारत में मिलाने के लिये कार्य आरम्भ कर दिया था। पटेल और मेनन ने देसी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हे स्वायत्तता देना सम्भव नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप तीन को छोडकर शेष सभी राजवाडों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। केवल जम्मू एवं काश्मीर, जूनागढ तथा हैदराबाद के राजाओं ने ऐसा करना नहीं स्वीकारा। जूनागढ के नवाब के विरुद्ध जब बहुत विरोध हुआ तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और जूनागढ भी भारत में मिल गया। जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहाँ सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया। किन्तु नेहरू ने काश्मीर को यह कहकर अपने पास रख लिया कि यह समस्या एक अन्तराष्ट्रीय समस्या है। अगर काश्मीर का निर्णय नेहरू के बजाय पटेल के हाथ मे होता तो आज भारत में काश्मीर समस्या नाम की कोई समस्या नहीं होती।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण


  
लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्म ११ अक्टूबर १९०२ में बिहार के छपरा जिले के सिताबदियारा नामक गाँव हुआ था. इनके बाबा का नाम श्री देवकी बाबू था तथा पिताश्री हरसू दयाल थे। जयप्रकाश जी की माता फूलरानी देवी धर्म परायण महिला थी। तीन भाई और तीन बहनों में जयप्रकाश जी चौथे स्थान पर थे। इनके बड़े भाई और एक बहन की बचपन में ही मृत्यु हो गई थी। पाँच साल की उम्र में उनको  गाँव के प्राथमिक विद्यालय में  भर्ती कराया गया। गाँव की पढ़ाई समाप्त करने के बाद बालक जयप्रकाश को पटना कालेजिएट स्कूल के चौथी कक्षा में भर्ती कराया गया।  वे भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता थे। लोग उनको प्यार से  जेपी कहकर बुलाते थे। 1970 में उन्होंने  इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ ज़बर्दस्त आवाज उठाई और देश में सपूर्ण क्रांति का शंखनाद किया।  पटना मे अपने विद्यार्थी जीवन में जयप्रकाश नारायण ने स्वतंत्रता संग्राम मे हिस्सा लिया। जयप्रकाश नारायण बिहार विद्यापीठ में शामिल हो गए, युवा प्रतिभाशाली युवाओं को प्रेरित करने के लिए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और सुप्रसिद्ध गांधीवादी अनुग्रह नारायण सिन्हा,जो गांधी जी के एक निकट सहयोगी रहे और बाद मे बिहार के पहले उप मुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री रह चुके है द्वारा स्थापित किया गया था। 1922 मे वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए, जहाँ उन्होंने 1922-1929 के बीच कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय-बरकली, विसकांसन विश्वविद्यालय में समाज-शास्त्र का अध्यन किया। पढ़ाई के महंगे खर्चे को वहन करने के लिए उन्होंने खेतों, कंपनियों, रेस्टोरेन्टों मे काम किया। वे मार्क्स के समाजवाद से प्रभावित हुए। उन्होने एम.ए. की डिग्री हासिल की। उनकी माताजी की तबियत ठीक न होने की वजह से वे भारत वापस आ गए और पी.एच.डी पूरी न कर सके।
उनका विवाह बिहार के मशहूर गांधीवादी बृज किशोर प्रसाद की पुत्री प्रभावती के साथ अक्टोबर १९२० मे हुआ। प्रभावती विवाह के उपरांत कस्तुरबा गांधी के साथ गांधी आश्रम मे रहीं।
१९२९ में जब वे अमेरिका से लौटे, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तेज़ी पर था। उनका संपर्क गाधी जी के साथ काम कर रहे जवाहर लाल नेहरु से हुआ। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बने। १९३२  मे गांधी, नेहरु और अन्य महत्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओ के जेल जाने के बाद, उन्होने भारत मे अलग-अलग हिस्सों मे संग्राम का नेतृत्व किया। अन्ततः उन्हें भी मद्रास में सितंबर १९३२ मे गिरफ्तार कर लिया गया और नासिक के जेल में भेज दिया गया। यहाँ उनकी मुलाकात एम. आर. मासानी, अच्युत पटवर्धन, एन. सी. गोरे, अशोक मेहता, एम. एच. दांतवाला, चार्ल्स मास्कारेन्हास और सी. के. नारायणस्वामी जैसे उत्साही कांग्रेसी नेताओं से हुई। जेल मे इनके द्वारा की गई चर्चाओं ने कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी (सी.एस.पी) को जन्म दिया। सी.एस.पी समाजवाद में विश्वास रखती थी। जब कांग्रेस ने १९३४  मे चुनाव मे हिस्सा लेने का फैसला किया तो जेपी और सी.एस.पी ने इसका विरोध किया।
१९३९  मे उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज सरकार के खिलाफ लोक आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने सरकार को किराया और राजस्व रोकने के अभियान चलाए। टाटा स्टील कंपनी में हड़ताल करा के यह प्रयास किया कि अंग्रेज़ों को इस्पात न पहुंचे। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और ९ महिने की कैद की सज़ा सुनाई गई। जेल से छूटने के बाद उन्होने गांधी और सुभाष चंद्र बोस के बीच सुलह का प्रयास किया। उन्हे बंदी बना कर मुंबई की आर्थर जेल और दिल्ली की कैंप जेल मे रखा गया। १९४२  भारत छोडो आंदोलन के दौरान वे आर्थर जेल से फरार हो गए।
उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हथियारों के उपयोग को सही समझा। उन्होंने नेपाल जा कर आज़ाद दस्ते का गठन किया और उसे प्रशिक्षण दिया। उन्हें एक बार फिर पंजाब में चलती ट्रेन में सितंबर १९४३  मे गिरफ्तार कर लिया गया। १६ महिने बाद जनवरी १९४५  में उन्हें आगरा जेल मे स्थांतरित कर दिया गया। इसके उपरांत गांधी जी ने यह साफ कर दिया था कि डा. लोहिया और जेपी की रिहाई के बिना अंग्रेज सरकार से कोई समझौता नामुमकिन है। दोनो को अप्रेल १९४६  को आजाद कर दिया गया।
१९४८  मे उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी दल का नेतृत्व किया, और बाद में गांधीवादी दल के साथ मिल कर समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। 19 अप्रेल, 1954 में गया, बिहार मे उन्होंने विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन के लिए जीवन समर्पित करने की घोषणा की। 1957 में उन्होंने लोकनिति के पक्ष मे राजनिति छोड़ने का निर्णय लिया।
1960 के दशक के अंतिम भाग में वे राजनिति में पुनः सक्रिय रहे। 1974 में किसानों के बिहार आंदोलन में उन्होंने तत्कालीन राज्य सरकार से इस्तीफे की मांग की।
वे इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के विरुद्ध थे। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन किया। उनके नेतृत्व में पीपुल्स फ्रंट ने गुजरात राज्य का चुनाव जीता। 1975 में इंदिरा गांधी ने आपात्काल की घोषणा की जिसके अंतर्गत जेपी सहित ६०० से भी अधिक विरोधी नेताओं को बंदी बनाया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई। जेल मे जेपी की तबीयत और भी खराब हुई। ७ महिने बाद उनको मुक्त कर दिया गया। 1977 जेपी के प्रयासों से एकजुट विरोध पक्ष ने इंदिरा गांधी को चुनाव में हरा दिया।
जयप्रकाश नारायण का निधन उनके निवास स्थान पटना मे 8 अक्टूबर 1979 को हृदय की बीमारी और मधुमेह के कारण हुआ। उनके सम्मान मे तत्कालीन प्रधानमंत्री चरण सिंह ने ७ दिन के राष्ट्रीय शोक का ऐलान किया, उनके सम्मान मे कई हजार लोग उनकी शोक यात्रा मे शामिल हुए।


नाव जर्जर ही सही

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।
निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

- दुष्यंत कुमार
अक्ल का अंधा : मूर्ख, बेवकूफ.
जैसा तुम समझतो हो वह अक्ल का अँधा नहीं.

अक्ल चरने जाना : समय पर बुद्धि का काम न करना.
मगरूर लड़की ! तेरी अक्ल कहीं घास चरने तो नहीं गई।

अक्ल ठिकाने लगना : होश ठीक होना.
फिर देखो कैसे चार दिन में सबकी अक्ल ठिकाने लगती है।

अपनी खिचड़ी अलग पकाना : सबसे अलग रहना.
आप लोग किसी के साथ मिलकर काम करना नहीं जानते, अपनी खिचड़ी अलग पकाते हैं।

आग-बबूला होना : गुस्सा होना.
लड़के को नकल करते देखकर गुरुजी आग बबूला हो गए.

आना - कानी करना : न करने के लिए बहाना करना.
मैं उससे जब पुस्तक माँगने लगा तो वह आना-कानी करने लगा।

आँख लगना : सो जाना.
मैं रात को पुस्तक लेकर बैठा था कि आँख लग गई.

अंक देना : आलिंगन करना.
प्रेम से वशीभूत वह बहुत देर तक अंक दिये रहा.

अंग - अंग ढीले होना : थका होना.
शाम को घर पहुंचते पहुंचते अंग-अंग ढीले हो चुके होते हैं.

अंग - अंग मुस्काना : रोम रोम से प्रसन्नता छलकना.
लक्ष्य प्राप्ति पर उसके अंग – अंग मुस्काने लगे.

अंग धरना : पहनना/धारण करना.
ऋत के अनुसार वस्त्र अंग धरने चाहिए.

अंग टूटना : शरीर में दर्द होना.
आज मेरा अंग-अंग टूट रहा है.

अंग लगना : हजम हो जाना/काम में आना.
रोज रोज के पकवान उसके अंग लग गये हैं.

अंग लगाना : लिपटना.
दिनों बाद मिले मित्र को उसने अंग लगा लिया.

अंग से अंग चुराना : संकुचित होना.
आज कल बाज़ारों में इतनी भीड़ होती है की चलते समय अंग से अंग चुराने पड़ते है.

अंगार सिर पर रखना : कष्ट सहना.
कर्महीन व्यक्ति के सिर पर अंगार रहते है.

अंगारे उगलना : कठोर बात कहना.
वह बातें क्या कर रहा था, मानो अँगारे उगल रहा था।

अंगारे बरसना : तेज धूप पड़ना.
जयेष्ठ माह में अंगारे बरसते हैं.

अंगारों पर लोटना : ईष्या से जलना.
सौतन को सामने देख वह अंगारों पर लोटने लगी.

अंगुठा चुसना : खुशामद करना / धीन होना.
स्वाभिमानी कभी किसीका अंगुठा नहीं चुसते.

अंचल पसारना : नम्रता से मांगना.
जरूरतमंद हर किसी के आगे अंचल पसारता है.

अंजर पंजर ढीले होना : पुर्जो का बिगड़ जाना/अभिमान नष्ट होना/ अंग अंग ढीले होना.
दस किलोमिटर चलते ही उसके तो अंजर पंजर ढीले हो गए.

अंटी बाज : दगाबाज.
सावधान रहना, वह अंटीबाज है.

अंटी में रखना : छिपाकर रखना.
सत्य कभी अंटी में नहीं रखा रहता.
अंधा बनना : जान-बूझकर किसी बात पर ध्यान न देना.
भाई, तुम्हारी मर्जी है, तुम जान-बूझकर अँधे बन रहे हो.

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इज्जत बेचना : पैसा लेकर अपनी इज्जत लुटाना.
आप क्या समझते हैं कि मजदूर इस तरह अपनी इज्जत बेचते फिरते हैं?

ईंट का जवाब पत्थर से देना : दुष्ट के साथ दुष्टता का कठोर के साथ कठोरता का व्यवहार करना.
ईंट का जवाब पत्थर से देना अहिंसा सिद्धान्त के विरुद्ध है.

ईंट से ईंट बज जाना : सर्वनाश हो जाना.
आग लगे ऐसी कमाई में! आग लगे ऐसे लालच में! इन लोगों की ईंट से ईंट बज जाए।

ईद का चाँद होना : बहुत कम दिखाई देना, बहुत अरसे बाद दिखाई देना.
आप तो ईद के चाँद हो गए.

ईमान बेचना : झूठा व्यवहार करना, बेईमानी करना.
दुनिया में अनेक आदमी एक-एक कौड़ी के लिए ईमान बेचते हैं.
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उगल देना : रहस्य/भेद प्रकट कर देना.
पुलिस का डंडा पड़ते ही उसने सारा भेद उगल दिया.

उठते-बैठते : हर समय, सरलता से.
उठते-बैठते मैं चार-छ: रुपये पैदा कर लेता हूँ.

उड़ती चिड़िया पकड़ना : रहस्य की बात तत्काल जानना.
मैं उड़ती चिड़िया पहचानूं, उस चींटी की क्या हस्ती है? मुझे से ही भेद छिपाती है, देखो तो कैसी मस्ती है.

उड़न-छू हो जाना : चला जाना, गायब हो जाना.
एक दिन जो भी हाथ लगा वही लेकर वह उड़न-छू हो गई.

उधेड़बुन में रहना : फिक्र में रहना, चिन्ता करना.
खाँ साहेब सदैव इसी उधेड़बुन में रहते थे कि इस शैतान को कैसे पंजे में लाऊँ.

उम्र ढलना : यौवनावस्था का उतार.
उम्र ढलने के साथ बहुत से व्यक्ति गंभीर होने लगते हैं.

उलटी-सीधी सुनाना : खरी खोटी सुनाना, डांटना-फटकारना.
लो, तुमने अब अकारण मुझे उलटी-सीधी सुनाना आरम्भ कर दिया है.

उलटे छुरे से मूड़ना : किसी को उल्लू बनाकर उससे धन ऐंठना या अपना काम निकालना.
प्रयागराज में अगर मुंडन कराना है तो संगम तक जाने की जरूरत नहीं है, स्टेशन पर ही पंडे और मुस्तण्डे पुलिस वाले गरीब गाँव वालों को उलटे उस्तरे से मूंड देते हैं.

उलटे पाँव लौटना : तुरन्त बिना ठहरे हुए लौट जाना.
टीटू की अम्मा की बात सुनकर उसका मन हुआ था कि उलटे पैरों लौट जाए.

उल्लू का पट्ठा : निपट मूर्ख.
क्या उपयोगिता है बच्चो की? बुढ़ापे का सहारा? अंधे की लकड़ी? कौन बाप ऐसा उल्लू का पट्ठा है जो यह समझकर अपने बच्चे को प्यार करता है?

उंगली उठना : निन्दा होना, बदनामी होना.
आपको कोई ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए जिससे असहाय अबला की ओर उंगली उठे.

उंगली पकड़कर पौंहचा पकड़ना : थोड़ा-सा सहारा पाकर विशेष की प्राप्ति के लिए प्रयास करना.

उंगलियों पर गिने जा सकना : संख्या में बहुत कम होना.
अब उनके नामलेवा उंगलियों पर गिने जा सकते हैं.

उंगलियों पर नचाना : इच्छानुसार काम कराना.
मैं इन दोनों को उंगलियों पर नचाऊंगा.

ऊँच-नीच समझाना : भलाई-बुराई, लाभ-हानि समझाना.
गज़नवी ने बहुत ऊँच-नीच सुझाया, लेकिन सलीम पर कोई असर नहीं हुआ.

ऊँट के मुँह में जीरा : अधिक आवश्यकता वाले के लिए थोड़ा सामान.
एक लड्डू का तो मुझे कुछ पता ही नहीं चला. अच्छा लगने की वजह से वह बिल्कुल वैसे ही लगा जैसे ऊँच के मुँह में जीरा.

ऊपर की आमदनी : इधर-उधर से फटकारी हुई नाजायज रकम.
उन्होंने परिश्रम करके कोई 250 रुपए ऊपर से कमाये थे.

ऊपरी मन से कुछ कहना : केवल दिखावे के लिए कुछ कहना. सच्चे हृदय से न कहना.
महेन्द्र कुमार ने ऊपरी मन से कहा- आपके आने की जरूरत नहीं है, मैं स्वयं भेज दूँगा.

ऊलजलूल बकना : अंट-शंट बोलना, बातें करना.
मनोहर, तुम सठिया गए हो, तभी तो ऐसी ऊल-जलूल बातें करते हो.


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एक आँख न भाना : तनिक भी अच्छा न लगना.
भाभी को अपनी देवरानी का यों रानी बने बैठे रहना एक आँख न भाता था.

एक कान सुनना, दूसरे से निकालना : किसी बात पर ध्यान न देना.
विभाग के अध्यापकों ने यह सूचना एक कान से सुनी और दूसरे से निकाल दी.

एक की दो कहना : थोड़ी बात के लिए बहुत अधिक भला-बुरा कहना.
कड़ी बात तक चिन्ता नहीं, कोई एक की दो कह ले.

एकटक देखना : बिना पलक गिराए देखते रहना.
मग्गी उसे मुग्ध होकर, एकटक देखती रहती है।

एक तीर से दो शिकार करना : एक युक्ति या साधन से दो काम करना.
इस बार उसने ऐसी बुद्धिमानी से काम किया कि उसके शत्रु पराजित हो गए और उसके मित्रों तथा संबंधियों को अच्छे-अच्छे पद प्राप्त हो गए.इस प्रकार उसने एक तीर से दो शिकार कर लिए.

एक न चलना : कोई युक्ति सफल न होना.
भगवती ने बहुत तर्क-कुतर्क किया, पर प्रवीण के आगे उसकी एक न चली.

एक न चलने देना : जज ने तो पुलिस का पक्ष करना चाहा था, पर डॉक्टर इर्फान अली ने उसकी एक न चलने दी.

एक मुट्ठी अन्न को तरसना : गरीब होना.
बंगाल के अकाल में लोग एक मुट्ठी अन्न को तरस गए.

एक लाठी से हाँकना : सबके साथ समान व्यवहार करना.
आप सबको एक लाठी से हाँकना चाहते हैं. यह अनुचित है. आपको मित्र-शत्रु, योग्य-अयोग्य तथा बुद्धिमान-मूर्ख का विचार करके व्यवहार करना चाहिए.

एक ही थैली के चट्टे-बट्टे : एक ही प्रकार के लोग.
भगवती ने ज़रा व्यंग्य से कहा, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं.

एहसान उतारना : जिसने उपकार किया हो उसका प्रत्युपकार करना.
अगर हमारे उन पर कुछ एहसान थे भी, तो आज उन्होंने सब उतार दिए.
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औंधी खोपड़ी : उलटी बुद्धि, बुद्धिहीनता.
मिट गए पर ऐंठ है अब भी बनी, है अज़ब औंधी हमारी खोपड़ी।

औने - पौने निकालना : कम दाम पर या घाटा उठाकर बेचना.
मैंने तो यही सोचा है कि कोई गाहक लग जाय तो एक्के को औने-पौने  निकाल दूँ।

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कंघी - चोटी करना : श्रृंगार करना, बनाव-सिंगार करना.
आज सबेरे से मेरी ही सेवा में लगी रही। नहलाया-धुलाया, कंघी-चोटी की, कपड़े-बपड़े पहनाये, सभी उसी ने किया।

कंचन बरसना : बहुत अधिक लाभ होना.
सुजान की खेती में कई साल से कंचन बरस रहा था।

कच्चा चबाना : कठोर दण्ड देना.
नारायणी भी तो आने वाली थी, कब आएगी? उसे भी तो तेरी भाभी कच्चा ही चबा जाएगी।

कच्ची गोली खेलना : अनाड़ीपन, ऐसा काम करना जिससे विफलता हाथ लगे.
आप शायद चाहते होंगे, जब आपको राजा साहब से रुपये मिल जाते तो आप मुझे दो हजार रुपये दे देते तो मैं ऐसी कच्ची गोली नहीं खेलता।

कट जाना : बहुत लज्जित होना.
जब मैं स्त्रियों के ऊपर दया दिखाने का उत्साह पुरुषों में देखती हूँ तो जैसे कट जाती हूँ।

कठपुतली की तरह नचाना : दूसरों से अपनी इच्छा के अनुसार काम कराना.
यही लोग उन बेचारों को कठपुतली की तरह नचा रहे हैं।

कढ़ी का - सा उबाल : शीघ्र ही समाप्त हो जाने वाला जोश.
मैं उस पर विश्वास नहीं कर सकता, क्योंकि उसमें कढ़ी का-सा उबाल आता है।

कतरब्योंत से : हिसाब से, समझ-बूझकर.
वह ऐसी कतरब्योंत से चलते हैं कि थोड़ी आमदनी में अपनी प्रतिष्ठा बनाए हुए हैं।

कन्नी काटना : कतराकर, बचकर किनारे से निकल जाना.

कब्र में पाँव लटकाना : मौत के निकट आना.
अब मुझे अम्मा कब्र में पैर लटकाए दीख पड़ती थीं।

कबाब में हड्डी : सुखोपभोग में बाधक होना.
एक बार तो मेरे जी में आया कि चलो लौट चलो, क्यों खामखाह किसी के कबाब में हड्डी बन रहे हो।

करम फूटना : अभागा होना, भाग्य बिगड़ना.
मेरे तो करम फूटे हैं ही।

कमर कसना : तैयार होना.
उसने निश्चय किया कि वह कमर कसकर नए सिरे से अपना जीवन-संघर्ष आरम्भ करेगा।

कलई खुलना : रहस्य प्रकट होना, वास्तविक बात ज्ञात होना.
उन्हें सबसे विषम वेदना यही थी कि मेरे मनोभावों की कलई खुल गई।

कलेजा बैठना : घोर दु:ख या ग्लानि होना, उत्साह मंद पड़ना.
यह याद करके मेरा कलेजा बैठा जा रहा है कि अब मैं आप लोगों के लिए कुछ भी न कर सकूँगा।

कलेजे पर पत्थर रखना : जी कड़ा करना.
यह सशंकिता विधवा अपने कलेजे पर पत्थर रखकर अपनी इस प्यारी संतान को त्याग देने के लिए बाध्य हुई।

कलेजा पसीजना : दया आना.
उसका करुण क्रन्दन सुनकर सबका कलेजा पसीज गया।

कलेजे का टुकड़ा : पुत्र.
वे अपने ही कलेजे के टुकड़े हैं।

कलेजे में आग लगना : दु:ख देना.
यह शब्द उसके कलेजे में चुभ गए थे।

कसौटी पर कसना : अच्छी तरह जाँच करना, परीक्षा लेना.
निस्सन्देह कृष्ण भगवान ने मुझे प्रेम-कसौटी पर कसा और मैं खोटी निकली.

कहा-सुनी हो जाना : झगड़ा, वाद-विवाद होना.
प्राय: बच्चों के पीछे पति-पत्नी में कहा-सुनी हो जाती थी.

कहानी समाप्त होना : मृत्यु हो जाना.
जिस समय उसने जबरदस्ती मुझे अपनी विशाल भुजाओं में घेर लिया उस समय मैंने सोचा कि कहानी समाप्त हो गई.

कहीं का न रखना : किसी काम का न छोड़ना, निराश्रय कर देना.
आपने सारी जायदाद चौपट कर दी, हम लोगों को कहीं का न रखा.

काँटा निकालना : बाधा या खटका दूर करना.
यह न समझो कि मैं अपने लिए, अपने पहलू का काँटा निकालने के लिए तुमसे ये बातें कर रही हूँ.

काँटा बोना : अनिष्ट, बुराई करना.
मैं ऐसा पागल नहीं हूँ कि जो मुझे काँटे बोये, मैं उसके लिए फूल बोता फिरूँ.

काँटों में घसीटना : बहुत दुख देना.
वह हाथ में आ जाता तो काँटों में ऐसा घसीटता कि उसे होश आ जाता.

काँव-काँव करना : शोरगुल, हल्ला मचाना.
बिरादरी का झंझट जो है, सारा गाँव काँव-काँव करने लगेगा.

काग़ज की नाव : अस्थायी, क्षणिक, न टिकने वाली वस्तु.
हमारा शरीर काग़ज की नाव है, अतएव इस पर गर्व नहीं करना चाहिए.

काग़जी घोड़े दौड़ाना : लिखा-पढ़ी करना, केवल काग़जी कार्रवाई करना.
आप क्या करते हैं, सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाते हैं.

काटो तो खून नहीं : स्तब्ध हो जाना, सन्न हो जाना.
मुझे काटो तो खून नहीं, तब क्या बात सचमुच ही यहाँ तक बढ़ गई थी?

कान का कच्चा : बिना सोचे-बिचारे दूसरों की बातों पर विश्वास कर
लेने वाला.
पन्तजी ऐसे पहले महाकवि नहीं थे जो ऐसे मामलों में कान के कच्चे थे.

कान काटना : चालाकी, धूर्तता आदि में किसी से बढ़कर होना.
मान गया बहू जी तुम्हें, वाह, क्या हिकमत निकाली है. हम सबके कान काट लिए.

कान पर जूँ न रेंगना : बार-बार कहने पर भी बात को ध्यान में न
बच्चे लाख चीखें, रोएँ-चिल्लाएँ, उस सहिष्णु जननी के कान पर कभी जूँ नहीं रेंगती.

कान भरना : शिकायत करना.
वह मेरे विरुद्ध गुरुजी के कान भरता है.

काना-फूँसी करना : चुपके-चुपके, बहुत धीरे-धीरे बात करना
कुछ लोग आपस में काना-फूँसी कर रहे थे, माया शंकर कितना भाग्यवान लड़का है.

कानून छाँटना : व्यर्थ की दलीलें देना, निरर्थक तर्क उपस्थित करना

कानों में अंगुली डालना : किसी बात को न सुनने का प्रयास करना, सुनने की इच्छा न होना.

काफूर हो जाना : एकाएक गायब हो जाना
द्वारकादास की नैराश्य उत्पादक दशा से तारा की कठोरता काफूर हो गई.

काया पलट होना : रूप, गुण, दशा, स्थिति आदि का पूर्णतया बदल जाना, और का और हो जाना
अभी यह मेरे साथ बैठा हुआ कैसी-कैसी बातें कर रहा था. इतनी ही देर में इसकी ऐसी कायापलट हो गई कि मेरी जड़ खोदने पर तुला हुआ है.

कारूँ का खजाना : कुबेर का कोष अतुल धनराशि.

काला धन : बेईमानी और तस्करी आदि से पैदा किया हुआ धन.
मैं उनके काले धन का हिसाब रखा करता था.

काला बाजार : वह बाजार जहाँ चोरी और तस्करी आदि की चीजों का क्रय-विक्रय होता है.
आजादी के बाद आया फूट, असंगठन, विलास,व्यभिचार, लूट, डाके, खून और काले बाजार काजमाना.

कालिख पोतना : कलंकित करना.
अब मेरी जान बख्शो, क्यों मेरे मुँह में कालिख पोत रहीहो?

काले कोसों : बहुत दूर.
सुबह दस बजे इसे तरकारी लाने के वास्ते भेजा था और वह भी काले कोसों नहीं.

काले पानी भेजना : देश निकाले का दंड देना, अंडमान द्वीप मेंभेजना जहाँ पहले आजीवन कैद का दंड पाने वालेअपराधी भेजे जाते थे.

किताबी कीड़ा : जो मनुष्य केवल पुस्तक पढ़ता रहता हो,जिसके पास केवल किताबों का ज्ञान हो, बुद्धि तथा अनुभव न हो.
मेरे जैसे किताब के कीड़े को कौन औरत पसन्द करेगी?

किला फतह करना : अत्यन्त कठिना काम करना.
यह कहकर मानों उन्होंने किला फतह कर लिया.

किस मुँह से : अपनी हीनता, अयोग्यता आदि का विचारकरके, अपने को दीन-हीन समझते हुए.
बहू से अब वह कहती भी तो किस मुँह से?

किसी के आगे पानी भरना : किसी की तुलना में अति तुच्छहोना, फीका पड़ना.
उन पाँच दिनों क्या ठाट रहते हैं वोटर के, बारात कादूल्हा भी उसके आगे पानी भरे.

किसी के घर में आग लगाकर अपना हाथ सेंकना : अपने काम केलिए दूसरों को भारी हानि पहुँचाना.
डॉक्टर साहब उन लोगों में हैं जो दूसरों के घर में आग लगाकरअपना हाथ सेकते हैं.

किसी के साथ मुँह काला करना : किसी के साथ व्यभिचार करना.
सारा दोष बुढ़िया का है, अरे दिन-दहाड़े जो यह डॉक्टरनीउसके बेटे के साथ मुँह काला किए फिर रही है, उससे अच्छायह नहीं है कि इसे बहू बना ले?

किसी को न गिनना : सबको तुच्छ, नगण्य समझना.
इस सफलता से मनीराम का सिर फिर गया था, वह किसी कोन गिनता था.

किसी खूंटे से बाँधना : किसी के साथ विवाह करना.
तेरी दीदी तो ऐसी गऊ है जिसे हमें ही किसी खूंटे से बाँधना
होगा.

किसी पर बरस पड़ना : एकाएक किसी से क्रोधपूर्ण बातें करना.
उनके जाते ही वह अपनी माँ पर बरस पड़ी.

किसी पर हाथ छोड़ देना : किसी को मारना-पीटना.
कभी-कभी हरसिंह अपनी बीवी पर हाथ छोड़ देता था.

किस्मत का फेर : अभाग्य, दुर्भाग्य, जमाने का उलट-फेर.
किस्मत का फेर देखिए, जो राजा थे वे रंक हो गए और जो रंक थे वे राजा हो गए.

कीड़े काटना : बेचैनी होना, जी उकताना.
दस मिनट पढ़ने के बाद उसे कीड़े काटने लगते हैं.

कुएँ का मेढ़क : बहुत अल्पज्ञ या कम अनुभव का व्यक्ति.

कुएँ में बाँस डालना : बहुत खोज करना.
उसके लिए कुओं में बाँस डाले गए, पर उसका पता नहीं चला.

कुएँ में भाँग पड़ना : सबकी बुद्धि मारी जाना, सबका पागल, मूर्खजैसा व्यवहार करना.

कुत्ता काटना : पागल होना.
क्या हमें कुत्ते ने काटा है जो हम इतनी रात को वहाँजाएँगे?

कुप्पा होना : फूल जाना, अत्यंत प्रसन्न होना.
जिस समय वह परीक्षा में पास होने की बात सुनेगाफूलकर कुप्पा हो जाएगा.

कुरसी देना : सम्मान करना.
बड़े-बड़े हाकिम उसे कुरसी देते हैं.

कोढ़ में खाज : दुख पर दुख, संकट पर संकट.

कोर-कसर न रखना : हर संभव प्रयास करना.
वह भिन्न-भिन्न प्रकृति और संस्कृति की इन युक्तियों को संघर्ष से बचाने और प्रेम से रखने में कुछ कोर-कसर न रखती थी.

कोरा जवाब देना : साफ इन्कार करना.
अगर सोफिया को क्लर्क से प्रेम न था, तो क्या वह उन्हें कोरा जवाब न दे सकती थी?

कोल्हू का बैल : बहुत अधिक परिश्रम करना वाला व्यक्ति.
कोल्हू के बैल की तरह खटकर सारी उम्र काट दी इसके यहाँ, कभी एक पैसे की जलेबी भी लाकर दी है इसके खसम ने?

कौड़ियों के मोल बिकना : बहुत ही सस्ते या कम दाम पर बिकना.

 
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खटाई में पड़ना : काम रुक जाना, टल जाना.
दुल्हन यदि बैलगाड़ी से जाती तो कहारों का पैसा खटाई में पड़ जाता.

खड़ी पछाड़ें खाना : खड़े हो-होकर गिर पड़ना.
पति की मृत्यु का समाचार पाते ही विमला खड़ी पछाड़ें खाने लगी.

खरी-खरी सुनाना : सच्ची बात कहना चाहे किसी को भला लगे या बुरा लगे.

खाक फाँकना : इधर-उधर मारा-मारा फिरना.
वह नौकरी की तलाश में चारों तरफ खाक फाँकता था.

खाट से लगना : इतना बीमार पड़ना कि चारपाई से उठ न सके. अत्यन्त दुर्बल हो जाना.

खीस निपोरना : दीनभाव से कृपा अथवा अनुग्रह की प्रार्थना करना.

खुदा की पनाह : ईश्वर बचाए.
बीबी की जूती पैजार से खुदा की पनाह.

खून के आँसू रुलाना : बहुत अधिक सताना.
स्वर्ग का रास्ता बन्द पाकर राजा साहब अपनी रियासत को ही खून के आँसू रुलाना चाहते थे.

खून-खच्चर होना : लड़ाई-झगड़ा, मार-पीट होना.
तुमने बहुत अच्छा किया जो उनके साथ न हुए, नहीं तो खून-खच्चर हो जाता.

खून लगाकर शहीद होना : थोड़ा-सा दिखावटी काम करके बड़े आदमियों में शामिल होने का प्रयत्न.

खेलने खाने के दिन : बचपन या जवानी का समय जब मनुष्य चिन्तामुक्त जीवन व्यतीत करता है.

खोद-खोदकर पूछना : तर्क, शंका में अनेक सवाल पूछना.
उसने खोद-खोद कर पूछने की चेष्टा तो बहुत की परन्तु उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ा.

खोपड़ी भिनभिनाना : तंग आना.
बच्चों का शोर सुनकर मेरी खोपड़ी भिनभिना उठी।


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गच्चा खाना : किसी फेर में पड़ धोखा खाना.
चौधरी उसे धक्का देकर, नारी जाति पर बल का प्रयोग करके गच्चा खा चुका था.

गज भर की छाती होना : बहुत अधिक उत्साह होना.
जब राणा प्रताप ने देखा कि शक्तिसिंह उनकी सहायता को आ रहा है तब उनकी गजभर की छाती हो गई.
गंगा नहाना : कर्तव्य और दायित्व पूरा करके निश्चिंत होना, सब झंझटों से छुटकारा पाना.

गाँठ बाँधना : याद रखना.
अच्छे लड़के अपने बड़ों की शिक्षा को गाँठ बाँध लेते हैं.


दाँत खट्टे करना : हराना.
शिवाजी ने औरंगजेब के दाँत खट्टे कर दिए.

हाथ मलना : पछताना.
अवसर चूक जाने पर हाथ मलना पड़ता है.

चूड़ियाँ पहनना : कायर बनना.
यदि वीरों की तरह युद्धभूमि में नहीं लड़ सकते तो चूड़ियाँ पहनकर बैठ जाओ.

डींग मारना : अपने मुँह अपनी बड़ाई करना.
मोहन जितनी डींग मारता है उतना काम नहीं करता.

नाक रखना : मान रखना.
परीक्षा में प्रथम श्रेणी लेकर कैलाश ने स्कूल कीनाक रख ली.

सिर चढ़ाना : अधिक लाड़ लड़ाना.
सिर चढ़ाने का परिणाम यह होता है कि लड़के बिगड़ जाते हैं.

दाँत फाड़ना : हँसना.
हर समय दाँत फाड़ना उचित नहीं।

पीठ दिखाना : भाग जाना.
सच्चा वीर युद्धभूमि में अपनी पीठ नहीं दिखाता।

मुँह में पानी भर आना : खाने को जी करना.
हलवाई की दुकान पर गुलाबजामुन देख मोहन के मुँह में पानी भर आया।

पैर चूमना : खुशामद करना.
हर समय किसी के पैर चूमना ठीक नहीं।

नौ-दो-ग्यारह होना : भागना.
पुलिस को आते देख चोर नौ-दो ग्यारह हो गए।

मन हारना : हिम्मत हारना.
मन हारना कायरता की निशानी है।

ऋण उतारना : कर्ज अदा करना.
यह अपने घरवाले से लड़-झगड़ कर अपना ऋण उतारने आई है.

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

किसन बाबूराव हज़ारे उर्फ़ 'अन्ना हजारे' की मुहिम- भ्रष्टाचार रहित भारत


किसन बाबूराव हज़ारे उर्फ़ 'अन्ना हजारे' प्रसिद्ध गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हैं। साफ-सुथरी छबि वाले हज़ारे भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करने के लिये प्रसिद्ध हैं। जन लोकपाल बिल  पारित कराने के लिये उन्होने आमरण अनशन आरम्भ किया जिसे अपार समर्थन मिला जिससे घबराकर सरकार को उनकी मांगे मानने को विवश हुई।

15 जनवरी 1940 को महाराष्ट्र के अहमद नगर  के भिंगर कस्बे में जन्मे अन्ना का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पिता मजदूर थे। दादा फौज में। दादा की पोस्टिंग भिंगनगर में थी। वैसे अन्ना के पुरखों का गांव अहमद नगर जिले में ही स्थित रालेगन सिद्धि में था। दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया। अन्ना के छह भाई हैं। परिवार में तंगी का आलम देखकर अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं। वहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की। परिवार पर कष्टों का बोझ देखकर वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रुपये की पगार में काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने फूलों की अपनी दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिया।
छठे दशक के आसपास वह फौज में शामिल हो गए। उनकी पहली पोस्टिंग बतौर ड्राइवर पंजाब में हुई। यहीं पाकिस्तानी हमले में वह मौत को धता बता कर बचे थे। इसी दौरान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से उन्होंने विवेकानंद की एक बुकलेट 'कॉल टु दि यूथ फॉर नेशन' खरीदी और उसको पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी समाज को समर्पित कर दी। उन्होंने गांधी और विनोबा को भी पढ़ा। 1970 में उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प किया। मुम्बई पोस्टिंग के दौरान वह अपने गांव रालेगन आते-जाते रहे। चट्टान पर बैठकर गांव को सुधारने की बात सोचते रहते।
जम्मू पोस्टिंग के दौरान 15 साल फौज में पूरे होने पर 1975 में उन्होंने वीआरएस ले लिया और गांव में आकर डट गए। उन्होंने गांव की तस्वीर ही बदल दी। उन्होंने अपनी ज़मीन बच्चों के हॉस्टल के लिए दान कर दी। आज उनकी पेंशन का सारा पैसा गांव के विकास में खर्च होता है। वह गांव के मंदिर में रहते हैं और हॉस्टल में रहने वाले बच्चों के लिए बनने वाला खाना ही खाते हैं। आज गांव का हर शख्स आत्मनिर्भर है। आस-पड़ोस के गांवों के लिए भी यहां से चारा, दूध आदि जाता है। गांव में एक तरह का राम राज है। गांव में तो उन्होंने राम राज स्थापित कर दिया है। अब वह अपने दल-बल के साथ देश में रामराज की स्थापना की मुहिम में निकले हैं : भ्रष्टाचार रहित भारत।


 

अन्ना की शख्सियत बडे अनगढ़ तरीके से गढ़ी हुई है। 15 जून 1938 को महाराष्ट्र के अहमद नगर के भिंगर कस्बे में जन्मे अन्ना का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पिता मजदूर थे। दादा फौज में। दादा की पोस्टिंग भिंगनगर में थी। वैसे अन्ना के पुरखों का गांव अहमद नगर जिले में ही स्थित रालेगन सिद्धि में था। दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया। अन्ना के छह भाई हैं। परिवार में तंगी का आलम देखकर अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं। वहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की। परिवार पर कष्टों का बोझ देखकर वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रुपये की पगार में काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने फूलों की अपनी दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिया।
छठे दशक के आसपास वह फौज में शामिल हो गए। उनकी पहली पोस्टिंग बतौर ड्राइवर पंजाब में हुई। यहीं पाकिस्तानी हमले में वह मौत को धता बता कर बचे थे। इसी दौरान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से उन्होंने विवेकानंद की एक बुकलेट 'कॉल टु दि यूथ फॉर नेशन' खरीदी और उसको पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी समाज को समर्पित कर दी। उन्होंने गांधी और विनोबा को भी पढ़ा। 1970 में उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प किया। मुम्बई पोस्टिंग के दौरान वह अपने गांव रालेगन आते-जाते रहे। चट्टान पर बैठकर गांव को सुधारने की बात सोचते रहते।
जम्मू पोस्टिंग के दौरान 15 साल फौज में पूरे होने पर 1975 में उन्होंने वीआरएस ले लिया और गांव में आकर डट गए। उन्होंने गांव की तस्वीर ही बदल दी। उन्होंने अपनी जमीन बच्चों के हॉस्टल के लिए दान कर दी। आज उनकी पेंशन का सारा पैसा गांव के विकास में खर्च होता है। वह गांव के मंदिर में रहते हैं और हॉस्टल में रहने वाले बच्चों के लिए बनने वाला खाना ही खाते हैं। आज गांव का हर शख्स आत्मनिर्भर है। आस-पड़ोस के गांवों के लिए भी यहां से चारा, दूध आदि जाता है। गांव में एक तरह का रामराज है। गांव में तो उन्होंने रामराज स्थापित कर दिया है। अब वह अपने दल-बल के साथ देश में रामराज की स्थापना की मुहिम में निकले हैं.

गांधी की विरासत उनकी थाथी है। कद-काठी में वह साधारण ही हैं। सिर पर गांधी टोपी और बदन पर खादी है। आंखों पर मोटा चश्मा है, लेकिन उनको दूर तक दिखता है। इरादे फौलादी और अटल हैं। भारत-पाक युद्ध के दौरान उन्होंने मौत को भी धता दे दी थी। उनकी प्लाटून के सारे सदस्य मारे गए थे। ऐसी शख्सियत है किसन बाबूराव हजारे की। प्यार से लोग उन्हें अन्ना हजारे बुलाते हैं। उन्हें छोटा गांधी भी कहा जा सकता है।
अन्ना आजकल भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। वह गुस्से में हैं। उन्होंने धमकी दी है कि लोकपाल विधेयक की तर्ज पर भ्रष्टाचार विरोधी कानून लागू नहीं किया तो वह 5 अप्रैल 2011 से आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे। उनकी चेतावनी से फिलहाल केंद्र सरकार हिल गई है। पहले भी वह महाराष्ट्र सरकार के पांच मंत्रियों की बलि ले चुके हैं। प्रधानमंत्री ने अन्ना से इस बारे में बातचीत की है। आश्वासन भी दिया है, लेकिन अन्ना तो अन्ना हैं। कहा है कि ठोस कुछ नहीं हुआ तो वह दिल्ली को हिला देंगे। अन्ना ने आज तक जो सोचा है, उसे कर दिखाया है। उन्होंने शराब में डूबे अपने पथरीले गांव रालेगन सिद्धि को दुनिया के सामने एक मॉडल बनाकर पेश किया। रामराज के दर्शन करने हैं तो उसे देखा जा सकता है। इस काम के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से भी सम्मानित किया। सूचना के अधिकार की लड़ाई में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सख्त लोकपाल विधेयक बनाने और उसमें जनता की हिस्सेदारी की मांग को लेकर अनशन पर बैठे अन्ना हजारे देश के भीतर ईमानदारी और इंसाफ की लड़ाई लड़ने से पहले सीमा पर देश के दुश्मनों के भी दांत खट्टे कर चुके हैं। 1962 में चीन से युद्ध के बाद भारत सरकार की युवाओं से सेना में शामिल होने की अपील के बाद अन्ना सेना में बतौर ड्राइवर भर्ती हुए थे। 1965 की लड़ाई में खेमकरण सेक्टर में अपनी चौकी पर हुई बमबारी के बाद अन्ना की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई। पाकिस्तानी हमले में उनकी चौकी पर तैनात सारे सैनिक शहीद हो गए। अन्ना इस हमले में सुरक्षित रहे। अपने साथियों की मौत से दुखी अन्ना ने अपना जीवन समाज के हित में लगाने का संकल्प ले लिया।
समाजसेवी अन्ना हजारे का मूल नाम डॉ. किशन बाबूराव हजारे है। उनका जन्म 15 जनवरी 1940 को महाराष्ट्र के भिंगारी गांव में हुआ था। उन्होंने 1975 में अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत की थी। अन्ना की राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार के धुर विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर पहचान 1995 में बनी थी जब उन्होंने शिवसेना-बीजेपी की सरकार के कुछ 'भ्रष्ट' मंत्रियों को हटाए जाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे थे। 1990 तक हजारे की पहचान एक ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता की थी, जिसने अहमदनगर जिले के रालेगांव सिद्धि नाम के गांव की कायापलट कर दी थी। पहले इस गांव में बिजली और पानी की जबर्दस्त किल्लत थी। हजारे ने गांव वालों को नहर बनाने और गड्ढे खोदकर बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए प्रेरित किया। उनके ही कहने पर गांव में जगह-जगह पेड़ लगाए गए। गांव में सौर ऊर्जा और गोबर गैस के जरिए बिजली की सप्लाई भी मिली। इसके बाद हजारे की लोकप्रियता में तेजी से इजाफा हुआ।
1995 में महाराष्ट्र के तीन 'भ्रष्ट' मंत्रियों-शशिकांत सुतार, महादेव शिवंकर और बबन घोलाप के खिलाफ वे अनशन पर बैठे थे। सरकार को झुकना पड़ा और सुतार और शिवंकर को कैबिनेट से बाहर कर दिया गया। घोलाप ने हज़ारे के खिलाफ अवमानना का मुकदमा कर दिया। हजारे ने दावा किया था घोलाप ने ज्ञात स्रोतों से अपनी कमाई के अनुपात में बहुत ज़्यादा रकम इकट्ठा कर ली है। हालांकि, हजारे अदालत में इन दावों के समर्थन में सबूत पेश नहीं कर पाए, जिसके बाद अदालत ने उन्हें तीन महीने की जेल की सज़ा सुनाई। तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने एक दिन की सज़ा के बाद ही उन्हें जेल से बाहर कर दिया। इसके बाद अन्ना ने मनोहर जोशी, गोपीनाथ मुंडे और नितिन गडकरी के खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। हालांकि, बाद में उन्होंने अपने आरोप वापस ले लिए।
अन्ना के गाँधीवादी विरोध का सामना महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी की सरकारों को भी करना पड़ा है। अन्ना 2003 में कांग्रेस और एनसीपी सरकार के चार भ्रष्ट मंत्रियों-सुरेश दादा जैन, नवाब मलिक, विजय कुमार गावित और पद्मसिंह पाटिल के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठ गए। हजारे का विरोध काम आया और सरकार को झुकना पड़ा। तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने इसके बाद एक जांच आयोग का गठन किया। मलिक ने इस्तीफे दे दिया। आयोग ने जैन के खिलाफ आरोप तय किए तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया। अन्ना हजारे को 1990 में सरकार ने 'पद्मश्री' सम्मान से नवाजा था।

  • अन्ना हजारे ने 1975 से सूखा प्रभावित रालेगांव सिद्धि में काम शुरू किया। वर्षा जल संग्रह, सौर ऊर्जा, बायो गैस का प्रयोग और पवन ऊर्जा के उपयोग से गांव को स्वावलंबी और समृद्ध बना दिया। यह गांव विश्व के अन्य समुदायों के लिए आदर्श बन गया है।
महात्मा गांधी के बाद अन्ना हजारे ने ही भूख हड़ताल और आमरण अनशन को सबसे ज्यादा बार बतौर हथियार इस्तेमाल किया है। भ्रष्ट प्रशासन की खिलाफत हो या सूचना के अधिकार का इस्तेमाल, हजारे हमेशा आम आदमी की आवाज उठाने के लिए आगे आते रहे हैं। अन्ना हजारे ने 1997 में मुंबई के आजाद मैदान से सूचना के अधिकार की लड़ाई शुरू की थी।
9 अगस्त, 2003 को मुंबई के आजाद मैदान में ही अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैठ गए। 12 दिन तक चले आमरण अनशन के दौरान अन्ना हजारे और सूचना के अधिकार आंदोलन को देशव्यापी समर्थन मिलने के बाद महाराष्ट्र सरकार को मजबूरन इस बिल को पास करना पड़ा। 12 अक्टूबर 2005 को केंद्र सरकार ने भी इस कानून को लागू कर दिया। अगस्त, 2006 में सूचना के अधिकार में संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ अन्ना ने 11 दिन तक आमरण अनशन किया, जिसे देशभर में समर्थन मिला। नतीजन, सरकार ने संशोधन से हाथ खींच लिए।आमरण अनशन को बनाया हथियार महात्मा गांधी के बाद सबसे ज्यादा बार आमरण अनशन और भूख हड़ताल पर बैठने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हैं हजारे। 1991 में अन्ना हजारे ने पुणो के अलांडी में सरकार की भ्रष्ट मशीनरी के खिलाफ आमरण अनशन शुरू किया। 6 मंत्रियों और 400 अधिकारियों को उनको पदों से हटा दिया गया। 1995 में अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र के 2 भ्रष्ट कैबिनेट मंत्रियों के खिलाफ अनशन का बिगुल फूंका। अन्ना को व्यापक समर्थन मिलने के बाद शिव सेना - भाजपा सरकार को दोनों मंत्रियों को हटाना पड़ा। 2003 में महाराष्ट्र में कांग्रेस - एनसीपी गठबंधन सरकार के चार मंत्री सुरेश दादा जैन, नवाब मलिक. विजय कुमार गवित और पद्म सिंह पाटिलअन्ना हजारे के अनशन के शिकार हुए।
सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के विरोध और जन लोकपाल बिल के लिए अपने कई सहयोगियों के साथ जंतर - मंतर पर आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। अन्ना हजारे चाहते हैं कि सरकार जन लोकपाल बिल तुरंत लाए , लोकपाल की सिफारिशें अनिवार्य तौर पर लागू हों और लोकपाल को जजों , सांसदों , विधायकों आदि पर भी मुकदमा चलाने का अधिकार हो। लेकिन सरकार इन खास मुद्दों पर बहस और चर्चा की जरूरत मान रही है।
72 वर्षीय हजारे ने 5 अप्रैल सुबह 9 बजे राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने के बाद एक मार्च निकाला और जंतर - मंतर पर अनशन पर बैठ गए। हजारे ने यहां कहा , ' जब तक सरकार हमारे देश में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए जन लोकपाल बिल को प्रभाव में नहीं लाती तब तक वह आमरण अनशन पर रहेंगे। इस दौरान सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश , पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी और संदीप पांडेय भी मौजूद थे।
सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में हजारे ने आमरण अनशन पर बैठने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था , ' उन्हें इस बात से काफी दुख हुआ कि प्रधानमंत्री ने जन लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वाली संयुक्त समिति में वरिष्ठ मंत्रियों के साथ समाज के जाने माने लोगों को शामिल करने के उनके प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इसलिए पूर्व में की गई घोषणा के अनुसार मैं आमरण अनशन पर बैठूंगा। यदि इस दौरान मेरी जिंदगी भी कुर्बान हो जाए तो मुझे इसका अफसोस नहीं होगा। मेरा जीवन राष्ट्र को समर्पित है। '
हजारे ने कहा कि न्यायमूर्ति ( रिटायर्ड ) संतोष हेगड़े , वकील प्रशांत भूषण और स्वामी अग्निवेश जैसे जानेमाने लोगों के विचारों को सरकार ने महत्वपूर्ण नहीं समझा और शरद पवार सरीखे एक मंत्री बिल का मसौदा तैयार करने वाली समिति के प्रमुख हैं , जो महाराष्ट्र में बड़े स्तर पर जमीन रखने के लिए जाने जाते हैं।

अन्ना हजारे जी को देश के कई महत्वपूर्ण पुरस्कार भी मिले हैं एक नजर:-



  • पदम् भूषण अवार्ड (१९९२)


  • पदम श्री अवार्ड (११९०)


  • इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार (१९८६)


  • महाराष्ट्र सरकार का कृषि भूषण पुरस्कार (१९८९)


  • यंग इंडिया अवार्ड


  • मैन ऑफ़ द ईयर अवार्ड (१९८८)


  • पॉल मित्तल नेशनल अवार्ड (२०००)


  • ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंटेग्रीटि अवार्ड (२००३)


  • विवेकानंद सेवा पुरुस्कार (१९९६)


  • शिरोमणि अवार्ड (१९९७)


  • महावीर पुरुस्कार (१९९७)


  • दिवालीबेन मेहता अवार्ड (१९९९)


  • केयर इन्टरनेशनल (१९९८)


  • BASAVSHRI PRASHASTI 2000 AWARD (२०००)


  • GIANTS INTERNATIONAL AWARD (२०००)


  • नेशनलइंटरग्रेसन अवार्ड (१९९९)


  • VISHWA-VATSALYA & SANTBAL AWARD


  • जनसेवा अवार्ड (१९९९)


  • ROTARY INTERNATIONAL MANAV SEVA PURASKAR (१९९८)


  • विश्व बैंक का 'जित गिल स्मारक पुरस्कार (२००८)


  • जानकारी स्रोत- विकिपीडिया व अन्य

    शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

    दुनिया का कूड़ाघर बनता भारत

    गुजरात के अलंग तट पर विश्व का सबसे बड़ा कबाड़खाना है। फ्रांस के विमानवाही पोत क्लिमेंचू को यहां पहियों पर चढ़कर गोदी तक लाया जाना था जहां गैस कटर से लैस सैकड़ों मजदूर इसके टुकड़े-टुकड़े करते।
    लेकिन पर्यावरण समूह ग्रीनपीस ने यह चेतावनी दी थी कि इस युध्द विमानवाही पोत में सैकड़ों टन एस्बेस्टम भरा पड़ा है, जो पर्यावरण के लिए घातक है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और इस जहाज को तट पर ही रोक दिया गय। बाद में फ्र्रांस के राष्ट्रपति ने जहाज को वापस अपने देश भेजने का आदेश दिया। इसी तरह एक अन्य विषैले निर्यात से भरे नार्वे के यात्री हाज लेडी 2006 की तुड़ाई पर भी सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। 15 नवंबर 2009 को कोटा (राजस्थान) के कबाड़ में एक बहुत भीषण विस्फोट हुआ जिसमें तीन व्यक्ति मारे गए व अनेक घायल हुए। आसपास की इमारतें भी क्षतिग्रस्त हुईं। यह विस्फोट कबाड़ में से धातु निकालने के प्रयास के दौरान हुआ। यह हादसा इकलौता हादसा नहीं था। कबाड़ में विस्फोट की अनेक वारदातें हाल में हो चुकी हैं। पश्चिम के औद्योगिक देशों के सामने अपने औद्योगिक कचरे के निपटान की समस्या बहुत भयानक है। इसलिए पहले वे अपना कचरा जमा करते हैं। फिर उस कचरे को किसी कल्याणकारी योजना के साथ जोड़कर रीसाइक्लिंग प्रौद्योगिकी सहित किसी गरीब या विकासशील देश को बतौर मदद पेश कर देते हैं या बेहद सस्ते दामों पर उसे बेच देते हैं । गरीब या विकासशील देशों की सरकारें या वहां की जनता यह सोचती है कि उन्हें सस्ते में काम चलने की एक प्रौद्योगिकी मिल गई। लेकिन लंबे समय में यह रीसाइक्लिंग एक ऐसे खतरनाक प्रदूषण को जन्म देता है, जिसका अंदाजा हम नहीं लगा सकते। इराक युध्द के समय यहां अमरीकी सेना ने बहुत भीषण बमबारी की थी जिसमें बहुत विनाश हुआ था । उसके बाद की घरेलू हिंसा और हमलों से भी बहुत विनाश हुआ। इस विनाश का मलबा बहुत  सस्ती कीमत पर उपलब्ध होने लगा और व्यापारी इसे भारत जैसे देशों में पहुंचाने लगे क्योंकि यहां उसकी प्रोसेसिंग लुहार या छोटी इकाइयों सस्ते में कर देती हैं। पर उन्हें यह नहीं बताया जाता है कि युध्द के समय के ऐसे विस्फोटक भी इस मलबे में छिपे हो सकते हैं और कभी भी फट सकते हैं। इन विस्फोटकों की उपस्थिति के कारण ही हाल के वर्षों में कबाड़ के कार्य व विशेषकर लोहे के कबाड़ को गलाने के कार्य में बहुत-सी दुर्घटनाएं हो रही हैं। अब तो कबाड़ के नाम पर रॉकेट और मिसाइलें भी देश में आने लगी हैं। इससे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक नया खतरा पैदा हो गया है। यह हैरत की बात है कि ईरान से लोड होने के बाद भारत के कई राज्यों से गुजरते दिल्ली पहुंचने और फिर साहिबाबाद स्थित भूषण स्टील फैक्टरी में विस्फोट होने तक किसी ने ट्रकों में भरे कबाड़ की जांच करने की जहमत नहीं उठाई। दिल्ली में तुगलकाबाद स्थित जिस कंटेनर डिपो में ये ट्रक पहुंचे थे, वह खुद 1991, 1993 और 2002 के कबाड़ में आई ऐसी विस्फोटक सामग्री की मार झेल चुका है। तभी यह सामग्री पश्चिम शिया से आई थी और हर बार वहीं से माल लाया जा रहा है। कस्टम विभाग द्वारा बिना जांच के आयातित सामग्री को स्वीकार करने का चलन इसमें सहायक की भूमिका निभा रहा है। कुछ  पहले उत्तर प्रदेश के साहिबाबाद स्थित भूषण स्टील कारखाने में विस्फोट की घटना ने देश की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश में सक्रिय आतंकवादी संगठन यदि चाहें तो विदेशों से मनमाफिक ढंग से हथियार और आयुध ला सकते हैं। जब गैर इरादतन यहां विस्फोटक सामग्री पहुंच सकती है, तो इरादतन और पूरी तैयारी करके यहां कुछ भी मंगवाया जा सकता है।
    भारत दुनिया का सबसे पसंदीदा डंपिंग ग्राउंड (कबाड़गाह) है। हम सस्ते मलबे के सबसे बड़े आयातक हैं। प्लास्टिक, लोहा या अन्य धातुओं का कबाड़, ल्यूब्रिकेंट के तौर पर अनेक रासायनिक द्रव और अनेक जहरीले रसायन, पुरानी बैटरियां और मशीनें हमारी चालू पसंदीदा खरीददारी सूची में हैं। जब इन्हें इस्तेमाल के लिए दोबारा गलाया जाता है तो इससे निकलने वाले प्रदूषण न केवल यहां की हवा बल्कि मिट्टी और पानी तक में जहर घोल देता है। उस मिट्टी में उपजा हुआ अनाज दूसरी तीसरी पीढ़ी में आनुवांशिक समस्याएं पैदा कर सकता है। लेकिन इतनी दूर तक जांच-परख करने की सतर्कता भारत सरकार में नहीं है। बढ़ते ई-कचरे ने पर्यावरणविदों के कान खड़े कर दिए हैं। यह कबाड़ लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा है। देश में अनुपयोगी और णचलन से बाहर हो रहे खराब कम्प्यूटर व अन्य उपकरणों के कबाड़ से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। कबाड़ी इस कचरे के खरीदकर बड़े कबाड़ियों को बेच देते हैं। वे इसे बड़े-बड़े गोदामों में भर देते है। इस प्रकार जगह-जगह से एकत्र किए गए आउटडेटेड कम्प्यूटर आदि कबाड़ बड़ी संख्या में गोदामों में जमा हो जाते हैं। इसके अलावा विदेशों से भी भारत में भारी मात्रा में कभी दान के रूप में तो कभी कबाड़ के रूप में बेकार कम्प्यूटर आयात किए जा रहे हैं। यह ई-कचरा प्राय: गैर कानूनी ढंग से मगाया जाता है। आसानी से धन कमाने के फेर में ऐसा किया जाता है। कंप्यूटर व्यवसाय से जुड़े लोगों का मानना है कि हमें अपने देश में बेकार हो रहे कम्प्यूटर की अपेक्षा विदेशों से आ रहे ढेरों कम्प्यूटरों से अधिक खतरा है। भारत में कमाई के लालच में भारी मात्रा में वैध-अवैध तरीकों से बेकार कम्प्यूटर और अन्य उपकरणों का कबाड़ के रूप मे आयात  खूब हो रहा है। भारत की राजधानी दिल्ली में ही ऐसे कबाड़ को कई स्थानों पर जलाया जाता है और इससे सोना, प्लेटिनम जैसी काफी मूल्यवान धातुएं प्राप्त की जाती हैं हालांकि सोने और प्लेटिनम का इस्तेमाल कम्प्यूटर निर्माण में काफी कम मात्रा में किया जाता है। इस ई-कचरे को जलाने के दौरान मर्करी, लेड, कैडमियम, ब्रोमीन, क्रोमियम आदि अनेक कैंसरकारी रासायनिक अवयव वातावरण में मुक्त होते हैं। ये पदार्थ स्वास्थ्य के लिए अनेक दृष्टियों से घातक होते हैं। साथ ही पर्यावरण के लिए खतरनाक होते हैं। कम्प्यूटर व अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में प्रयुक्त होने वाला प्लास्टिक अपनी उच्च गुणवत्ता के चलते जमीन में वर्षों यूं ही पड़ा रहता है और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। बड़े कबाड़ी अकुशल कर्मियों से यह कार्य संपन्न कराते हैं। उनको स्वयं नहीं मालूम कि वे कितना खतरनाक और नुकसानदेह कार्य कर रहे हैं। हानिकारक गैसों व अन्य रासायनिक अवयवों से युक्त धुआं चारों ओर फैलकर वातावरण को प्रदूषित करता है जो मनुष्यों, वनस्पतियों और जीव-जंतुओं को प्रभावित करता है। वहां काम करने वाले कामगार ही सर्वप्रथम इस प्रदूषण की चपेट में आते हैं। आयातित कचरे के प्रबंधन के बारे में गठित उच्चाधिकार प्राप्त प्रो. मेनन समिति ने ऐसे जहरीले कचरे के आयात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी। इस समिति का गठन भी सरकार ने अपने आप नहीं किया था बल्कि एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में अंतर्राष्ट्रीय बेसल कन्वेंशन में सूचीबध्द कचरों का भारत में प्रवेश प्रतिबंधित किया था। इसके बाद सरकार ने खतरनाक कचरे के प्रबंधन के अलग-अलग पहलुओं की जांच करने के लिए मेनन समिति का गठन किया था। मेनन समिति ने न सिर्फ कई कचरों के आयात पर रोक लगाने की सिफारिश की थी बल्कि जो औद्योगिक कचरा देश में है उसके भंडारण के सुझाव दिए। लेकिन सरकार ने मात्र 11 वस्तुओं का आयात ही प्रतिबंधित किया, बाकी 19 वस्तुओं को विचारार्थ छोड़ दिया गया। यह उदासीनता तो आयातित कचरे से निकलने वाले जहर से भी खतरनाक है।
    इराक युध्द में अमरीका ने जो बमबारी की थी, उसमें क्षरित युरेनियम का भी उपयोग हुआ था। इस बात को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अब सामन्यत: स्वीकार किया जाता है कि पूरे विश्व में क्षरित युरेनियम युक्त हथियारों का सबसे अधिक उपयोग अभी तक इराक में ही हुआ है। क्षरित युरेनियम से हथियारों की मारक क्षमता बढ़ जाती है तथा वे बहुत मजबूत धातु को भी भेद सकते हैं और भूमिगत बंकरों को भी नष्ट कर सकते हैं। इनके दीर्घकालिक परिणाम भी बहुत खतरनाक होते हैं। जो लोग क्षरित युरेनियम की चपेट में आते हैं वे कैंसर सहित कई दीर्घकालिक बीमारियों व गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त हो सकते हैं। क्षरित युरेनियम वाले बमों से क्षतिग्रस्त टैंक के मलबे में भी क्षरित युरेनियम के अवशेष होते हैं। यदि हमारे देश में बड़े पैमाने पर इस मलबे का आयात होगा तो क्षरित युरेनियम से युक्त धातु हमारे देश में दूर-दूर तक इसके खतरे से अनभिज्ञ लोगों के पास पहुंच जाएगी और वे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं। जाहिर है विकसित देश भारत को जिस तरह अपना कूड़ाघर बनाने का प्रयास कर रहे हैं उससे इसकी छवि दुनिया में सबसे बड़े कबाड़ी के रूप में भी उभर रही है। इसे रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है, तो इसकी वजह यह है कि इस समस्या के प्रति सरकारें उदासीन रही हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। सरकारें यह मानकर चलती हैं कि विकासशील देशों को इतना नुकसान तो भुगतना ही है। आयातित कचरे के खतरे को बहुत मामूली करके आंकता है।
    नरेन्द्र देवांगन [साभार-देशबंधु]

    बुधवार, 10 अगस्त 2011

    दवा की शीशी

    महिला रोगी- डाक्टर साहब आप दवा की शीशियों पर पर्ची चिपका दिया करें
    डॉक्टर-इस की क्या जरूरत है?
    महिला रोगी-दर असल इस से मुझे पता रहेगा की कौन सी दवा मेरे पति की है और कौन सी मेरे कुत्ते की. मै नहीं चाहती कि दवा की शीशी बदल जाए और मेरे कुत्ते को कुछ हो जाए!

    इंटरवल(मध्यांतर)

    मतदान समाप्त हो चुका था, मतगणना शुरू थी सभी की निगाहें मतगणना पर पर टिकी थीं, सभी यह जानने को उत्सुक थे कि देश को कौन प्रगति-पथ पर आगे ले जायेगा? वही जिसे हमनें वोट दिया है! या फिर कोई दूसरा! या फिर किसी को भी पूर्ण बहुमत ना मिल पाने की सिथति में मिली-जुली, गठबंधन सरकार बनेगी जो कि पूर्णत: सौदेबाजी पर आधारित होगी व जो कभी भी गिर जाने वाली एक कमजोर सरकार होगी! तब क्या होगा! क्या फिर से चुनाव होंगे! जैसे फिल्मों में इंटरवल होते हैं क्या उसी तरह से हम भी एक छोटे से इंटरवल के बाद फिर से वोट डालने जायेंगे! ..(कृष्ण धर शर्मा,2005)

    ट्रक ड्राइवर

    जब फैक्ट्री से उसकी  ट्रक माल भरकर बाहर निकली तो खुशी उसके चेहरे पर साफ-साफ झलक रही थी. इसका कारण भी साफ था कि उसका नंबर लग जाने से ट्रक आज ही लोड हो गई जिसका फायदा यह हुआ कि होली का त्योहार मनाने वह अपने घर पहुंच सकता था. वह था तो ट्रक ड्राइवर मगर स्वाभाव से काफी सात्विक  था यानी कि ड्राइवरों की आम बुराई जैसे कि नशाखोरी वगैरह से काफी दूर था और गाड़ी भी बहुत संभाल कर चलाता था.
           वह फैक्ट्री से अपनी ट्रक लेकर निकला. आगे एक भीड़-भाड़ वाले इलाके से वह गुजर रहा था कि पीछे से एक मोटरसाइकल सवार आ रहा था जो कि जगह काफी कम होने के बाद भी आगे निकलना चाहता था मगर अनियंत्रित हो जाने के कारण वह गिर पड़ा जिससे उसे कुछ चोट लग गई. इसमें हालांकि ट्रक ड्राइवर की कोई गलती नहीं थी मगर मोटरसाइकल सवार के चीखने-चिल्लाने से भीड़ ने ट्रक को घेर लिया. उसमें से कुछ लोग चिल्लाने लगे कि मारो साले को, ये ट्रक ड्राइवर ऐसे ही होते हैं साले शराब पीकर गाड़ी चलाते हैं और ट्रक ड्राइवर के बहुत सफाई देने के बाद भी भीड़ ने उसे ट्रक के बाहर खींच लिया और मार-मार कर अधमरा कर दिया. ट्रक ड्राइवर अब होली मनाने घर पहुंचने के बजाय हॉस्पिटल  पहुंच गया....(कृष्ण धर शर्मा,2007)

    सेठ जी का ड्राइवर

    गांव की बेकारी से तंग आकर उसने पास के शहर में एक सेठजी के यहां ड्राइवर का काम पकड़ लिया. सेठजी ने उसे रहने के लिये एक कमरा भी दे दिया मगर वह ड्राइवर की सुविधा के लिये नहीं वह तो अपनी सुविधा के लिये था कि रात-दिन जब भी चाहें ड्राइवर उपलब्ध रहे.
     एक दिन तड़के ही सेठजी ने ड्राइवर को जगाया और कहा कि पांच मिनट में जल्दी से तैयार हो जाओ एक जगह चलना है. वह अभी फ्रेश होकर निकला ही था कि सेठजी ने उसे फिर आवाज दी 'अरे जल्दी करो अभी तक तुम तैयार नहीं हुए, कितनी देर हो रही है'. यह सुनकर वह जल्दी से बिना ब्रश वगैरह किये ही निकल पड़ा. करीब एक घंटे के सफर के बाद वह लोग एक फार्महाउस पहुंचे जहां पर शहर के उदयोगपतियों की गुप्त मीटिंग रखी गई थी जो कि इन दिनों आयकर विभाग दवारा की जा रही लगातार छापामार कार्रवाई से परेशान थे. मीटिंग 4-5 घंटे चली, फार्महाउस के अंदर ही खाने-पीने की पूरी व्यवस्था की गई थी मगर बाहर दूर-दूर तक खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं थी और ड्राइवरों को बाहर ही रहने की सख्त हिदायत दी गई थी, अत: वह भूखा-प्यासा ही रह गया. मीटिंग खत्म हुई और वह वापस घर पहुंचे जहां पर सेठानी जी अपनी बहू के साथ पहले से ही शापिंग करने जाने के लिये तैयार बैठी थीं. वह फिर उनको लेकर शापिंग माल पहुंचा, सेठानी जी अपनी बहू के साथ शापिंग करने चली गईं और वह बाहर ही गाड़ी के पास खड़ा हो गया, वहीं पर एक और ड्राइवर मिल गया. दूसरे ड्राइवर के दवारा हाल-चाल पूछे जाने पर उसने रूआंसा होकर बताया कि कैसे वह सुबह से भूखा-प्यासा है. दूसरा ड्राइवर हंसते हुए बोला 'अरे पगले अभी तू नया-नया है ना इसलिये परेशान हो जाता है तुझे  भी धीरे-धीरे इस सबकी आदत पड़ जायेगी. वह हैरान होकर दूसरे ड्राइवर का मुंह देखने लगा कि यह कैसी फालतू बातें कर रहा है कि भला भूखे-प्यासे रहने की भी आदत हो सकती है क्या? ..(कृष्ण धर शर्मा,2005)

    हीरो टाइप

    गर्मी की छुट्टियाँ  चल रही थीं इसलिये ट्रेन में भीड़ होना स्वाभाविक ही था, किसी तरह मुझे  बैठने के लिये जगह मिल गयी. मेरे सामने की सीट पर तीन 'हीरो टाइप' लड़के बैठे हुये थे जिन्होने 4-5 लोगों की जगह घेर रखी थी, मेरे पीछे ही दो बुजुर्ग महिला-पुरूष भी ट्रेन में चढ़े और उन लड़कों के बीच जगह खाली देखकर उन्होंने अनुरोध किया कि 'बेटा हमको भी बैठने के लिये थोड़ी सी जगह दे दो, लड़के हंसकर बोले 'अंकल आप जैसे लोग सफर में बहुत मिलते हैं आप को बैठाकर हमें खड़े होने का शौक नहीं चढा़ है. यह सुनकर आसपास बैठे कुछ बेशर्म लोग हंसने लगे तो बुजुर्ग थोड़ा झेंपकर आगे जगह ढूढ़ने निकल गये. अगले स्टेशन पर एक युवती अपनी मां के साथ ट्रेन में चढी़ और लड़कों के पास कुछ जगह देखकर बोली 'प्लीज मेंरी मां के लिये थोड़ी सी जगह दे दीजिये'. लड़कों में से एक हीरो टाइप उठा और बोला जरूर मैडम, पहले आप यहां मेरी सीट पर बैठिये मैं आपकी मां को भी बैठाता हूं' यह कहते हुये उसने लड़की को अपनी जगह बैठा दिया और सामने की सीट पर बैठे हुए लड़के को हाथ पकड़कर उठाते हुये बोला 'अबे शरम नहीं आती तेरी मां जैसी औरत खड़ी है और तू आराम से सीट पर बैठा है'. लड़का चाहकर भी विरोध नहीं कर पाया और उठ गया. युवती की मां को बैठाकर 'हीरो टाइप' युवती के पास आया और बोला 'यदि आपको कष्ट ना हो तो मैं भी बैठ जाऊं और 'हीरो टाइप' युवती के बगल में बैठ गया. अब तीनों लड़कों ने मिलकर युवती से बैठने की जगह देने की कीमत वसूलने का अभियान शुरू कर दिया और उनके बीच में बैठी युवती कसमसाने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रही थी..(कृष्ण धर शर्मा,2005)

    मन और आत्मा

    वह आफिस जाने के लिये समय पर तैयार होकर निकला. गली पार करने के बाद वह अभी पहले चौक पर ही पहुंचा ही था कि एक कार ट्रैफिक सिग्नल तोड़ती हुई एक व¤द्ध साइकिल सवार को ठोकर मारती हुई निकल गई. व¤द्ध साइकिल सहित दूर तक घिसट गया, उसे जानलेवा चोट तो नहीं लगी पर शायद उसके हाथ और पैर में चोट ज्यादा आ गई थी क्योंकि वह उठ कर बैठ भी नहीं पा रहा था, यह द¤श्य देखकर उसकी आात्मा ने कहा 'इस व¤द्ध की मदद करनी चाहिये इसे कम से कम हासिपटल तक तो पहुंचाना ही चाहिए. तभी उसके मन ने टोकते हुये कहा 'तु÷ो इस ÷ामेले में पड़ने की क्या जरूरत है तू आफिस जा इस व¤द्ध को कोई ना कोई तो हासिपटल पहुंचा ही देगा, वह मन की बात मानकर आफिस के लिये निकल गया.
        इस घटना के एक सप्ताह बाद ही वह एक दिन आफिस जा रहा था कि चौक के पास ही सिग्नल छूटते समय जल्दी से आगे निकलने के चक्कर मेें एक स्कूटी सवार लड़की दूसरे वाहनों में उल÷ा कर गिर गई, हालांकि उस लड़की को कोई चोट नहीं लगी पर उसके मन ने कहा कि 'हीरो बनने का मौका अच्छा है जा उस लड़की को उठा. वह फौरन अपनी बाइक को स्टैंड पर लगा कर लड़की को उठाते हुये बोला 'अरे मैंडम आपको लगी तो नहीं ! ये साले गाड़ी वाले तो अंधे होकर चलाते हैं . लड़की उठकर स्कूटी में बैठते हुये बोली 'नहीं मु÷ो कुछ नहीं हुआ, हेल्प करने के लिये थैक्यू!.आसपास जमा कुछ लोग बोले 'कितना अच्छा लड़का है जो किसी की मदद करने के लिये अपना काम छोड़कर रूक गया. यह सब देख-सुनकर उसका मन आज बहुत खुश हो रहा था पर उसकी आत्मा पिछले सप्ताह की बात याद करके आज काफी उदास लग रही थी.....(कृष्ण धर शर्मा,2005)

    गरीबी की परिभाषा में

    गरीबी!
    कहने के लिए एक छोटा सा शब्द
    उनके लिए जो गरीब नहीं हैं
    परिभाषित कर देते हैं
    दो-चार लाइनों में जो गरीब की गरीबी को
    "कि जिसके पास रहने-खाने
    व पहनने के लिए नहीं होता पर्याप्त "
    मगर, गरीबी की यह परिभाषा
    नहीं बयान कर पाती
    एक गरीब की गरीबी को
    गरीबी की इस परिभाषा में
    नहीं शामिल है
    एक बेबस और लाचार बाप का दर्द
    जो नहीं कर पाता इस महंगाई में
    अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए
    दो जून के भरपेट खाने का जुगाड़
    फिर उनकी पढाई-लिखी की तो
    बात करना ही बेमानी है
    गरीबी की इस परिभाषा में
    नहीं शामिल है एक बेटे का दर्द
    जो अपने माँ-बाप का
    नहीं करवा पाता इलाज
    एक अच्छे अस्पताल में
    और अनसुना करता रहता है
    मजबूरी में
    उनकी कराहों और आहों को
    गरीबी की इस परिभाषा में
    नहीं शामिल है उस भाई की लाचारी
    जो अपनी जवान हो चुकी बहन के लिए
    नहीं ढूंढ पाता है एक अच्छा वर और घर
    क्योंकि अपना सब कुछ बेचने पर भी
    हो सकता है इंतजाम सिर्फ सगाई के खर्चे का
    और इस परिभाषा में नहीं शामिल है
    एक औरत की बेबसी
    जो तय नहीं कर पाती है कई बार
    की घर में उपलब्ध खाने को किसे परोसे!
    दिन भर मेहनत करके घर आने वाले पति को
    या अपने छोट-छोटे बच्चों को
    जो देख रहे हैं टुकुर-टुकुर
    पके हुए भात की देगची को! [कृष्ण धर शर्मा] अगस्त,२०११

    मंगलवार, 9 अगस्त 2011

    कवि का जीवन

    एक कवि
    जो समर्पित कर देता है
    अपना सारा जीवन
    समाज के लिये
    कुछ सार्थक
    और प्रेरणास्पद
    रचनाओं के सृजन में
    जो बनती हैं मार्गदर्शक
    द्वंद के समय
    समाज के लिये
    लेकिन कभी-कभी
    इन सब के बीच में
    कवि रह जाता है पीछे
    इस भागदौड़ भरी जिंदगी में
    कि कभी भी अपने
    या अपने परिवार के लिये
    नहीं जुटा पाता है
    जीवन के लिये आवश्यक
    कुछ सुविधायें तक
    और कोसने लगते हैं
    कभी-कभी अपने ही
    तब कवि सोचता है
    मैंने तो समर्पित कर दिया
    अपना संपूर्ण जीवन
    समाज की भलाई के लिये
    पर क्या समाज भी
    सोच पाया है कभी
    कि कैसे चलता है
    एक कवि का घर!
    उसकी गृहस्थी
    उसका परिवार
    इस दिनों-दिन
    बढ़ती महगाई में
    खैर !
    समाज हमारे बारे में
    सोचे या ना सोचे
    हमें तो बनना होगा
    वही पेड़
    जो पत्थर मारने पर
    चोट खाकर भी
    बदले में फल ही देता है.(कृष्ण धर शर्मा,2011)

    बंद खिड़की

    मैंने जब से अपने
    बंद कमरे की दीवार में
    एक खिड़की बनवाई है
    मेरे कमरे में चांद और सूरज
    आने लगे हैं
    तारे भी जगमगाने लगे हैं
    पहले क्यों नहीं आते थे!
    यह मेरी समझ में
    अब आ रहा है
    कि किसी के आने के लिये
    किसी रास्ते का
    होना भी जरूरी है
    और उससे भी जरूरी है
    उस रास्ते का खुला होना
    क्योंकि
    कोई आना भी चाहे तो
    हमनें ही बंद कर रखे है
    सारे रास्ते
    ऐसे में दरवाजे तक आकर
    लौट जाने वालों की 
    गलती कहां से मानी जाये! .(कृष्ण धर शर्मा,2008)

    अपने हिस्से का जीवन

    जब कभी मैं परेशान होता हूं
    मेरा मन मुझे  समझाता है
    जब कभी मैं उदास होता हूं
     मेरा मन मुझे बहलाता है
     जब कभी मुझे हर तरफ
    अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है
     मेरा मन ही मुझे रास्ता दिखाता है
    जब कभी मैं लगता हूं डूबने
    बीच मझधार में
     तब मेरा मन ही मुझे पार लगाता है
    जब कभी मैं हो जाता हूं निराश
    मेरा मन मुझमें आशायें जगाता है
    और कहता है मेरा मन मुझसे
    कि जीवन मिला है कुछ करने के लिये
    अगर ज्यादा कुछ ना कर सके
    तो तू दिखा दे जीकर ही
    अपने हिस्से का जीवन.(कृष्ण धर शर्मा,2007)

    कल्पना लोक की सैर

    कमाना, खाना, जागना, सोना
    हंसना, रोना, पाना, खोना
    इन्हीं सब बातों में
    जीवन गुजार देना
    लगता नहीं अच्छा
    पर ना चाहते हुये भी
    करना पड़ता है यह सब
    रहते हुये इस समाज में
    कभी-कभी भूल कर यह सब
    निकल जाता हूं
    कल्पनालोक की सैर करने
    जो है इस बनावटी दुनिया से
    बिलकुल ही अलग
    कि जहां पर जीने का
    अंदाज ही निराला है.(कृष्ण धर शर्मा,2007)