नमस्कार,आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757
शनिवार, 23 जून 2018
बहुत काम के होते हैं बूढ़े लोग
भस्मासुर
शुक्रवार, 22 जून 2018
लोकसत्ता कहीं गहरा अन्याय कर बैठे तो सत्याग्रह ही रास्ता है
हमारा यह सौभाग्य है कि देश के कालानुसार गांधी के विचार हमारे सामने कभी पुस्तक, कभी फिल्म और कभी सत्याग्रह के रुप में सामने आते रहते हैं। दक्षिण अफ्रीका, चम्पारण और भारत छोड़ो आन्दोलन तक गांधी हमें बहुत सारी 'स्पेस' देते हैं हम कभी भी, कहीं भी गांधी विचारों, जुलूस में शामिल हो सकते हैं।
गांधी-150 के अवसर पर सुपरिचित लेखक-चिंतक नन्दकिशोर आचार्य विनोबा भावे की अक्षरदेह ''साम्ययोग के आयाम-विनोबा दृष्टि का पुनर्पाठ'' पुस्तक के रुप में देश के सामने लेकर आये हैं। इस पुस्तक के प्रकाशक ''प्राकृत-भारती अकादमी''जयपुर स्वयं अपने मूल्य आधारित प्रकाशनों के लिए जाने जाते हैं। सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरुरी है कि यह विनोबा पर उपदेशात्मक पुस्तक नहीं है। इसमें श्री अरविंद, एम. एन. राय, पं. सुन्दरलाल, धीरेन्द्र मजूमदार, डॉ. राधाकृष्णन, कार्ल मार्क्स, तोलस्तोय, बट्रेंड रसल, जॉन राल्स, डार्विन, ल्योजार जां, लुडविग विटगेंस्टाइन और ई. एफ. शुमाकर जैसे विद्वानों को विचारों के बरक्स विनोबा के चिन्तन का समसामयिक अनुशीलन है।
हम कह सकते हैं कि यह पुस्तक विनोबा चिन्तन के पांच अध्यायों में बंधी एक मुठ्ठी है। इस पुस्तक में साम्ययोग का तत्वचिन्तन आर्थिक साम्य की प्रक्रिया, अहिंसकसत्ता का स्वप्न, साहित्य: साम्ययोग की प्रक्रिया और परिशिष्ट में अध्यात्म की वैज्ञानिकता का अर्थ अध्यायों में यह यात्रा पूर्ण होती है।
गांधी-150 की राष्ट्रीय समिति के अनुसार देश का वह अंतिम आदमी कैसा है जिसे गांधी ने देश के विकास का एकमात्र पैमाना माना था और आजाद हिन्दुस्तान की पहली सरकार से कहा था-हमें हर आंख के आंसू पोंछने हैं क्योंकि उसके बिना आजादी का कोई मतलब नहीं है ?
गांधी के इस गहरे प्रश्न का उत्तर विनोबा स्वयं देते हैं। वे कहते हैं कि 'लोकसत्ता कहीं गहरा अन्याय कर बैठे और सत्पुरुषों को लगे कि उसमें अन्याय हो रहा है, तो सत्याग्रह की आवश्यकता होगी। और मैं कहना चाहता हूं कि ऐसे सत्याग्रह का निषेध कोई भी मनुष्य नहीं कर सकता।
इसी तरह महात्मा गांधी ने कहा था कि यदि मैं स्वतंत्रता के बाद जीवित रहा तो मुझे उतनी ही मुस्तैदी से अनेक लड़ाईयां लड़नी पडेंगी जिस मुस्तैदी से मुझे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना पड़ रहा था। क्या यह गांधीजी द्वारा हमें दिया गया संदेश नहीं है ? हमें गांधी के संदेश को गांधी के आदेश के रुप में भी ग्रहण करना होगा।
नन्दकिशोर आचार्य विनोबा के साम्ययोग के आयाम को स्पष्ट करने के लिए भी अरविंद का उल्लेख करते हैं। श्री अरविंद के दर्शन में यह प्रतिपादित किया गया है कि जड़ जगत या पदार्थ से प्रसूत होकर जीवन वनस्पति, प्राण और मन के स्तर पर क्रमश: विकसित होता गया है क्योंकि विकास की यह प्रक्रिया एक वैज्ञानिक अवधारणा या कहें कि प्रकृति का नियम है।विनोबा भी स्वीकार करते हैं कि जीवन अन्न अर्थात् वनस्पति, प्राण अर्थात पशु स्तर तथा मन अर्थात् मनुष्य के वर्तमान स्तर से बढ़कर विज्ञानमय कोष की ओर अग्रसर है। विनोबा के विचारों में जीवन एक निरन्तर विकासमान प्रक्रिया है और उसकी मंजिल 'साम्ययोग' है।
विनोबा मानते हैं कि मानव स्वभाव कोई नियमित और स्थिर वस्तु हैं, ऐसा नहीं। वह सतत विकसित होता चला आया है और आगे भी होता चला जायेगा। आजकल हमारे देश में मानव स्वभाव के सतत विकसित होने की प्रक्रिया में एक विचलन सा आया है। राज का धर्म से विचलन पूरे समाज की चेतना को जड़भूत बना रहा है।
हमारे देश के समकालीन राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में पुस्तक में उल्लेखित कीन्ज का वक्तव्य महत्वपूर्ण और सामयिक हो उठता है। कीन्ज कहते हैं कि अभी तो आने वाले कम से कम सौ सालों तक हमें अपने आपको और प्रत्येक व्यक्ति को इस भुलावे में रखना होगा कि जो उचित है, वह गलत है और जो गलत है वह उचित है क्योंकि जो गलत है वह उपयोगी है-जो उचित है वह नहीं।
हमारा देश इस समय उपयोगितावाद की लहरों पर सवार है। लहरों पर सवार लोगों को यह आभास नहीं हो रहा है कि इस देश के करोड़ों लोगों की नाक के ऊपर तक पानी आ गया है। आज के आर्थिक-युग के संदर्भ में विनोबा के विचार बहुत ही सम-सामयिक हैं। इस संदर्भ में विनोबा कहते हैं कि सर्वोदय की दृष्टि से अमीरी और गरीबी दोनों पाप हैं। पुण्य का परिणाम सम्पत्ति नहीं, सद्बुद्धि है और पाप का परिणाम कुबुद्धि है। विनोबा मानते हैं कि 'प्रापर्टी वही है तो 'उपयुक्त' तरीेके से कमाई गई हो।
आजकल प्रतिदिन केवल सम्पत्ति ही नहीं सत्ताएं भी अनैतिक तरीकों से कमाई जा रही हैं। इस समय अनैतिक तरीकों से सत्ता प्राप्त करना ही देश का सबसे बड़ा संकट बन गया है। राजसत्ता जब स्वयं ही देश का संकट बन जाए तो देश के नागरिकों का क्या कर्तव्य है ?
नन्दकिशोर आचार्य प्रतिपादित करते हैं कि विनोबा अन्य अराजकतावादी विचारों की तरह केवल राज्यसत्ता के लोप पर ही नहीं, सम्पत्ति के लोप पर भी बल देते हैं। अराजकतावादी प्रूदो का मानना है कि 'सम्पत्ति चोरी है।' आज पूरा देश इस बात का प्रत्यक्षदर्शी बना हुआ देख रहा है कि राजकीय और सामाजिक सम्पत्ति का किस तरह अपहरण हो रहा है।
इस संदर्भ में भी विनोबा भावे के विचार बहुत ही क्रान्तिकारी हैं। विनोबा मानते हैं कि बहुसंख्यागत वाला शासन भी अल्पसंख्यक वर्ग पर अन्याय कर सकता है। विनोबा का यह मानना है कि औपचारिक लोकतंत्र में व्यक्ति एक मतदाता मात्र होकर रह जाता है।
विनोबा एकदम इतने समकालीन हैं वे मानों आज और अब की बात कर रहे हों। वे कहते हैं कि वास्तविक सत्ता प्रतिनिधि सभा में बहुमत प्राप्त दल के माध्यम से उनका नेतृत्व करने वाले कुछ लोगों में तथा अन्तत: किसी एक प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति में केन्द्रित हो जाती है। इसीलिए महात्मा गांधी संसद संस्था को 'वेश्या' और 'बांझ' बताते हैं, क्योंकि वह स्वयं अपनी मालिक नहीं होती और न वह किसी समस्या को पूर्णत: सुलझाने में सफल हो पाती है।
विनोबा केन्द्रीय शासन प्रणाली के संबंध में प्रश्न ही नहीं उठाते परन्तु उसके विकल्प भी प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि जहां शासन केन्द्रित किया, वहां सेना लगेगी ही। इसलिए हम सर्वोदय वाले कहते हैं कि शोषण विहीन ही नहीं, बल्कि शासन-मुक्त समाज की रचना करनी है। यानी गांव-गांव में सत्ता रहेगी। आज केन्द्रित सरकार चलती है, इसके बजाय गांव-गांव में 'नो पार्टी गवर्नमेन्ट'(दलविहीन-सरकार) चलेगी। विनोबा ग्राम सभा के निर्णयों को भी बहुमत के आधार पर नहीं बल्कि सर्वानुमति-कन्सेंसस के आधार पर लागू करने के पक्षधर हैं।
आज साम्प्रदायिक विद्वेश और उससे उत्पन्न हिंसा देश की सर्वाधिक गंभीर समस्या है। मंदिर-मस्जिद विवाद या ऐसे अन्य मसलों से साम्प्रदायिकता पैदा नहीं होती बल्कि साम्प्रदायिक भावना के कारण ये मसले पैदा होते हैं। विनोबा के शब्दों में भिन्न-भिन्न धर्मों की जगह अध्यात्म आना चाहिए और राजनीति की जगह विज्ञान आना चाहिए। एक अन्य प्रसंग में विनोबा ने अध्यात्म और विज्ञान के योग को ही सर्वोदय कहा है। पुस्तक का अन्त विनोबा के इस वक्तत्व से होता है कि जीवन के अभेद का स्वीकार ही धार्मिकता है और वही वैज्ञानिकता भी।
कश्मीर उप्पल (साभार-देशबंधु)
गुरुवार, 21 जून 2018
डॉ. बलराम अग्रवाल, सम्पादक-मधुदीप
"समकालीन लघुकथा : सामान्य अनुशासन" ’लघुकथा’ शब्द बोलते ही जो पहली प्रतिक्रिया लोगों से आमतौर पर सुनने को मिल जाती है, वह लगभग यह होती है कि ’लघुकथा-लेखक’ माने कथ्य, भाषा, शिल्प और शैली सभी के स्तर पर लगभग अधकचरी रचना देनेवाला लेखक। इस स्थिति में यह बहुत आवश्यक है कि लघुकथा से जुड़नेवाले नए लेखक कुछ विशेष अनुशासनों और तत्सम्बन्धी कथा-धैर्य से परिचित हों और सावधानियाँ बरतें। लघुकथा के कुछ महत्वपूर्ण अनुशासन:-
1. कथा-धैर्य
2. लघुकथा और सामान्य-जन
3. क्लिष्ट बिम्ब-प्रतीक-संकेत-योजना
4. नेपथ्य
5. लाघव
6. यथार्थ घटना और कथा-घटना
7. कल्पना की उड़ान
8. कथा-भाषा, परिवेश
9. शिल्प और शैली
10. वाक्य संयोजन एवं शब्द-प्रयोग
11. दृश्य-संयोजन एवं संवाद-योजना
12. शीर्षक
13. लेखकविहीनता
14. सम्पूर्णता (पड़ाव और पड़ताल-डॉ. बलराम अग्रवाल, सम्पादक-मधुदीप)
शनिवार, 16 जून 2018
शरतचन्द्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ-शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय
"कोलकाता मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगा, इतनी दहशत में भला कोई चीज अच्छी लग सकती है? आगे कभी लगेगी, इसका भी भरोसा नहीं कर सका। कहां गया हमारा वह नदी का किनारा, बांसों के झुरमुट, बेल की झाड़ी, मित्र-परिवार के बगीचे के कोने का वह अमरुद का पेड़, कुछ भी तो नहीं है ! यहां तो सिर्फ बड़े-बड़े ऊंचे मकान, गाड़ी-घोड़े, आदमियों का भीड़-भड़क्का, लंबी-चौड़ी सड़कें ही दिखाई देती हैं। मकान के पीछे ऐसा एक बाग़-बगीचा भी तो नहीं, जहां छिपकर एक चिलम तंबाकू पी सकूं।" (शरतचन्द्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ-शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय)
शुक्रवार, 25 मई 2018
मंत्री को जुकाम- गिरीश पंकज
"नेता ने ठहाका लगाया, " बस इत्ती सी बात ! अभी वापस लेते हैं अपील। पागल हैं हमारे कार्यकर्ता। अरे, हमारी जो करतूतें हैं, वह सिर्फ हमारे लिए हैं। हम चाहते हैं कि हमारे कार्यकर्ता मौलिक करतूतें विकसित करें। अब जैसा हमने देश को बताया कि तंदूर जो है वो सिर्फ रोटी बनाने के काम में नहीं आता, उसमें औरत की बोटी-बोटी काट कर भी डाला जा सकता है। हत्या के क्षेत्र में यह अभिनव प्रयोग है। नयी पीढ़ी इसी तरह का कुछ नया करे। हमारे आदर्शों पर न चलकर वह खुद अपने आदर्श गढ़े।" (मंत्री को जुकाम- गिरीश पंकज)
गुरुवार, 17 मई 2018
मोहिनीअट्टम नृत्य
मोहिनीअट्टम की शाब्दिक
व्याख्या ‘‘मोहिनी’’ के नृत्य के रूप में की जाती है, हिन्दू पौराणिक गाथा की दिव्य मोहिनी, केरल का शास्त्रीय एकल नृत्य-रूप है ।
पौराणिक गाथा के अनुसार
भगवान विष्णु ने समुद्र मन्थन के सम्बंध में और भस्मासुर के वध की घटना के सम्बंध
में लोगों का मनोरंजन करने के लिए ‘‘मोहिनी’’ का वेष धारण किया था ।
यह केवल स्त्रियों द्वारा
निष्पादित किया जाता है ।
मोहिनीअट्टम का उल्लेख
मज्हमंगलम नारायणन नम्बुतिरि द्वारा 1709 में लिखित ‘‘व्यवहारमाला’’ पाठों और बाद में महान कवि कुंजन नम्बियार द्वारा
लिखित ‘‘घोषयात्रा’’ में पाया जाता है ।
केरल के इस नृत्य रूप की
संरचना त्रावणकोर राजाओं महाराजा कार्तिक तिरुनल और उसके उत्तराधिकारी महाराजा
स्वाति तिरुनल (18वीं-19वीं शताब्दी ईसवी) द्वारा आजकल के शास्त्रीय स्वरूप में की
गई थी ।
‘‘मोहिनीअट्टम’’ की लोकप्रियता 20वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में आजकल के त्रिचुर और
पालघाट जिलों को मिलाकर क्षेत्र तक सीमित थी ।
उसका उद्भव केरल के
मन्दिरों में हुआ । यद्यपि इसके उद्भव की सही-सही अवधि ज्ञात नहीं है तथापि स्त्री
मन्दिर नृतकियों के समुदाय की विद्यमानता को सिद्ध करने के लिए साक्ष्य मौजूद हैं
। जिन्होंने मन्दिर पुजारियों द्वारा उच्चारित मंत्रों की अभिव्यक्ति मुद्राएं शामिल
करके मन्दिर रीति-रिवाजों में सहायता प्रदान की ।
भिन्न-भिन्न काल अवधियों के
दौरान नृतकियों को भिन्न–भिन्न नामों से पुकारा जाता था ।
तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के
लगभग लिखित ‘‘कौटिल्य के अर्थशास्त्र’’ में देवदासियों और नृत्य में उनके
प्रशिक्षण का उल्लेख मिलता है ।
उन्हें ‘‘ताली नंगई अथवा
ननगाची’’ (सुन्दर हाथवाली) ‘‘दासी’’ (सेविका) ‘‘तेवितिचि’’ अथवा ‘‘देवा अडि-अची’’
(जो भगवान के पैरों में सेवा करती है), ‘‘कुथाचि’’ (जो कुथु अथवा नृत्य निष्पादित करती थी) ।
उनके नृत्यों को ‘‘नंगल
नाटकम’’ ‘’दासियाट्टम’’, ‘’तेवितिचियाट्टम’’
आदि के नाम से जाना जाता था । ‘’ननगीअर्स’’, जो नम्बियार
समुदाय की स्त्रियाँ होती हैं, अभी भी एकमात्र
रूप से मन्दिर रीति-रिवाजों के लिए निर्धारित नृत्य की कठोर संहिता का पालन करती
हैं ।
ननगिआर कुथु के निष्पादन के
पहले दिन, नृत (विशुद्ध नृत्य) को अभिनय की तुलना में अधिक
महत्व दिया जाता है ।
भरतनाट्यम, ओडिसी और मोहिनीअट्टम की एक समान प्रवृत्ति है और उन सभी का
उद्भव ‘’देवदासी’’ नृत्य से हुआ ।
कुछ विद्वानों का मत है कि 19वीं शताब्दी ईसवी के आस-पास, तमिलनाडु के शासक पेरूमालों ने तिरुवनचिकुलम (वर्तमान में कोडुगंल्लुर, केरल) में अपनी राजधानी के साथ चेरा साम्राज्य पर शासन किया
।
ये शासक अपने साथ उत्तम
नृतकों को लाए जो मन्दिरों में बस गए, जिनका निर्माण
राजधानी के विभिन्न भागों में किया गया था ।
उनके नृत्य को
‘’दासियाट्टम’’ कहा जाता था ।
‘’दासियाट्टम’’ की विद्यमानता की
‘’सिलाप्पनटीकरम’’ महाकाव्य से भी पुष्टि होती है जिसे 5वीं शताब्दी ईसवी में चेरा राजकुमार इल्लंगों अडिक्कदल
द्वारा लिखा गया था ।
चेरा साम्राज्य अथवा
पेरुमाल शासन के पतन और बाद में समाजार्थिक परिवर्तनों के साथ इन ‘’दासियों’’ को
मन्दिर परिसरों से बाहर जाने के लिए बाध्य किया गया ।
कुछेक ननगिअर्स के साथ जुड
गईं, जो केरल के अन्य क्षेत्रों के मन्दिरों में रहते
और निष्पादन करते थे तथा उन्होंने ननगिआर कुथु को बढ़ावा दिया ।
कुछेक अन्य थे जिन्होंने
समृद्व सामन्त प्रमुखों और योद्धाओं का मनोरंजन करते थे । इससे ‘’रसियाट्टम’’ का
गम्भीर अवनयन हुआ जिसकी वजह से इसका पतन और अन्तंत: लुप्त हो गया ।
‘’दासियाट्टम’’ को तन्जोर चतुष्कों (पोन्नाया, चिन्नाया, शिवानन्दन और
वडीवेलु) द्वारा पुनसज्जिवित किया गया । वे नन्तुवन्स (संगीत शिक्षक) थे जिन्होंने
आजकल के ‘’भरतनाट्यम’’ और ‘’मोहिनीअट्टम’’ की संरचना की ।
तन्जोर भाइयों में से एक
‘’वडीवेलु ने देवदासी ‘’सुगन्धावल्ली’’ के साथ ‘’महाराजा स्वाति तिरुनल’’ की
शरण ली ।
स्वाति तिरुनल गद्दी पर
आसीन हुआ जबकि वह 1829 में केवल 16 वर्ष की आयु का था । उसने ललित कलाओं को विशेष रूप से
संगीत और नृत्य को प्रोत्साहित किया ।
उसके शासन के दौरान भारत के
सभी भागों से अनेक कलाकार और विद्वान तिरुवनन्तपुरम आए । उसी समय, स्वाति, अपने दरबारी
संगीतकारों के साथ (किलिमनूर, विद्वान
कोथीतमपुरम और इरायीम्मन टम्पी) ‘’मोहिनीअट्टम’’ के विकास कार्य में लगे थे ।
वडीवेलु ने एक उचित रंगपटल
के साथ ‘’मोहिनीअट्टम’’ की पुनसंरचना की जिसमें कोलकेतु (मोहिनीअट्टम में पहली मद)
जातिस्वरम, पदावर्णम, पदम और तिलाना
सम्मिलित था । सुगन्धावल्ली ने उनका निष्पादन किया ।
स्वाति ने स्वयं मलयालम, तेलुगु और संस्कृत में पद्मों की रचना की जिन्हें नृतकों
ने बड़ी खुशी से अपनाया ।
तथापि, इस शाही सरंक्षक ‘महाराजा स्वाति तिरुनल’ को जल्द और असमय
मृत्यु से इस नृत्य की एक अन्य निराशापूर्ण अवधि शुरू हुई, जिसका मुख्य कारण शाही संरक्षण का अभाव था ।
‘मोहिनीअट्टम’ को ‘महाकवि वल्लाटोल’ के कठोर
प्रयासों से एक नया जीवन मिला, जो केरल के एक
कवि साहित्यकार थे, तथा कला के एक
अन्य कदरदान थे । कवि, इसे एक विशिष्ट
शास्त्रीय एकल शैली का सम्मान प्रदान करने में सफल हुए ।
वर्ष 1930 में ‘वल्लावटोल’ ने ‘केरल कलामण्डलम्’ की स्थापना की, जो नत्तुवनार, गुरू कृष्ण
पाणिकर और कल्याणी अम्मा के साथ, ‘मोहिनीअट्टम’
के पहले नियमित शिक्षक के रूप में, केरल के कला
स्वरूपों में प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए एक अग्रणी संस्थान था ।
उनकी शिष्या श्रीमती
तनकामणि गोपीनाथ (वहाँ पाठ्यक्रम शुरू किए जाने पर केरल कलामण्डलम में मोहिनीअट्टम
के लिए दाखिल प्रथम शिष्य, चिन्नामु अम्मा
और कल्याणी कुट्टी अम्मा, इस आकर्षक
नृत्य शैली के पथ-प्रदर्शक बन गए ।
कलामण्डलम् शिक्षण पद्धति
में ‘मोहिनीअट्टम’ की केवल शास्त्रीय पद्धति को स्वीकार किया जाता था ।
मोहिनीअट्टम नृत्य की
खास-खास बातें
‘मोहिनीअट्टम’ की विशेषता, बिना किसी अचानक झटके अथवा उछाल के लालित्यपूर्ण, ढलावदार शारीरिक अभिनय है ।
यह, ‘लस्प’ शैली से संबंधित है जो स्त्रीत्वपूर्ण, मुलायम और सुन्दर है । अभिनय में सर्पण द्वारा बल दिया जाता
है,
तथा पंजो पर ऊपर और नीचे अभिनय होता है, जो समुद्र की लहरों तथा कोकोनट पाम वृक्षों अथवा खेत में
धान पौधों के ढलान से मिलता-जुलता है ।
पाद कार्य संक्षिप्त नहीं
तथा कोमलता के साथ प्रस्तुत किया जाता है । हस्त भंगिमाओ को महत्व दिया जाता है
तथा मुखाभिनय विलक्षण मुखीय अभिव्यक्ति के साथ ।
बहुत से अभिनय स्त्री मंदिर
नृत्यों से नकल किए गए हैं जैसे कि ननगियर कुथु और लोक नृत्य जैसे कि
‘कईकोत्तीकली’ जिसे तिरुवतिराकली के नाम से भी जाना जाता है ।
‘तिरुवतिराकली’ एक विशुद्ध नृत्य है ।
दूसरी ओर ‘मोहिनीअट्टम’ के
अन्तर्गत अभिनय पर बल दिया जाता है ।
नृतक ‘पद्मों’ और
‘वर्नामों’ के विषय और भावों के साथ मेल खाता है ।
हस्त भंगिमाएं मुख्यत:
‘हस्तालक्षण दीपिका’ से अपनाई गई हैं, जो एक पाठ है
जिसका पालन कथकली द्वारा किया जाता है ।
कुछेक ‘नाट्य शास्त्र’ और
‘अभिनय दर्पण’ से भी अपनाए गए हैं । भंगिमाएं और मुखीय अभिव्यक्ति स्वाभाविक
(ग्राम्य) और वास्तविक (लोकधर्मी) के साथ मिलती-जुलती हैं, न कि नाट्य अथवा कठोर परम्परा (नाट्यधर्मी) के साथ ।
पारम्परिक रंगपटल के
अन्तर्गत ‘’चोल्लुकेत्तु’’ ‘‘पद्मावरणम’’, ‘’पैद्म तिलाना’’ ओर ‘’स्लोकम’’ सम्मिल्लित हैं । इसके अलावा, इन दो मदों के अन्तर्गत ‘पंडाट्टम’ और ‘ओमानातिंकल’
(लुल्लबी) भी, जिसे वलाटोल द्वारा प्रारम्भ किया गया था, लोकप्रिय है और उसे प्राय: गायन में शामिल किया जाता है ।
अधिकांश रचनाएं, जो रंगपटल में सम्मिलित हैं, स्वाति तिरूनल द्वारा रचित हैं जिनके अन्तर्गत ‘’साहित्य भाव’’ अर्थात
साहित्यिक सामग्री पर बल दिया जाता है ।
शैली के अन्तर्गत मुखीय
अभिव्यक्तियों को और हस्त मुद्राओं को, शुद्व नृत्य
अथवा पादकार्य और शारिरिक हाव-भाव के मुकाबले, अधिक महत्व
दिया जाता है ।
साभार- संस्कृति मंत्रालय भारत
सरकार
समाज की बात Samaj Ki Baat
कृष्णधर शर्मा Krishnadhar Sharma