नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

बुधवार, 19 जून 2019

पंडित और पंडितानी

 

पंडित जी की अवस्था क़रीब पैंतालीस वर्ष की है और उनकी पत्नी की बीस वर्ष की। पंडित जी अंग्रेज़ी और संस्कृत दोनों में विद्वान हैं और कई पुस्तकें लिख चुके हैं। सप्ताह में दो-एक दिन उन्होंने समाचार पत्र और मासिक पुस्तकों के लिए लेख लिखने को नियत कर लिया है, विशेषकर इन्हीं दिनों में, अर्थात् जब वे कुछ लिखते होते हैं, तब उनकी युवा पत्नी उनको बातचीत में लगाना चाहती हैं। पंडितानी स्वरूपवती हैं और कुछ पढ़ी-लिखी भी हैं। उम्र में बहुत कम हैं ही। इन सब कारणों से वाद-विवाद में पंडितजी उनसे हार मानना ही अकसर उचित समझते हैं। एक दिन का हाल सुनिए।

कमरे में एक कोने में, जहाँ मेज़-कुर्सी लगी हुई थी, पंडित जी बैठे हुए एक विश्व-विख्यात कवि के कविता चातुर्य पर कुछ लिख रहे थे। थोड़ी ही दूर पर पंडितानी भी बैठी हुई एक समाचार पत्र पढ़ रही थीं। कुछ देर सन्नाटे के बाद पंडितानी अपने पति का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए ज़रा खाँसीं। पंडित जी ने इसकी कुछ परवाह न की और अपने काम में वे लगे रहे।

 

“सुना!—सुना!!”

पंडित जी ने पहिले ‘सुना!’ को तो टाल दिया। परंतु बहरे तो थे ही नहीं; दूसरे पर उन्हें बोलना ही पड़ा।

 

“हाँ! आज्ञा।”

“क्या कुछ बड़े ज़रूरी काम में हो?”

 

“नहीं-नहीं, कुछ नहीं” करते हुए पंडित जी ने कहा, “हमको केवल पचास पन्ने का एक लेख लिखकर आज ही रात को भेजना है। लेकिन हम यह कुछ बहुत नहीं समझते; कहो तुम्हें क्या कहना है।”

“इस पत्र में एक बड़े अच्छे तोते का विज्ञापन है। यह तुम्हें मालूम ही है कि तोता पालने की बहुत दिनों से मेरी इच्छा है। अगर मैं यह विज्ञापन काटकर तुम्हें दे दूँ, तो तुम कर्नेलगंज में, बोस कंपनी की दूकान पर उसे देख आओगे?” पंडित जी ने क़लम तो रख दी और ज़रा ज़ोर से साँस खींचकर बोले, “प्रिये! क्या सचमुच ही तोता पालने का तुम्हारा इरादा है?”

 

“क्यों नहीं; और लोगों के पास भी तो तोते हैं। और यह तोता, जिसका मैं ज़िक्र करती हूँ, बोल सकता है। जब तुम बाहर होगे, वह मेरे लिए एक साथी होगा।”

“हाँ, यह तो ठीक है! मुझे विश्वास है कि मेरे न होने पर तुम तोते के साथ जी बहला सकती हो। परंतु वह तोता मेरे लिए किस काम का होगा, यह भी तुमने सोचा?”

 

“वह तुम्हें भी प्रसन्न करेगा; नए-नए ख़याल तुम उससे सीख सकोगे!”

“ज़रूर! मगर जब नए-नए ख़याल मेरे ध्यान में न आवेंगे तब मैं उनके लिए बोलते हुए तोते के पास नहीं जाने का।”

 

इतना कहकर पंडित जी फिर लिखने में लग गए। भौंह चढ़ाकर उन्होंने, अपने ध्यान को कालिदास की ओर खींचना चाहा। पंडित जी ने ‘कालिदास को काव्यरस का मानो’—यह वाक्य लिखकर सन्नाटे में आगे लिखा—‘तोता समझना चाहिए।’

ध्यान तो प्रिया के तोते की ओर था। इस कारण पंडित जी ‘सोता’ की जगह ‘तोता’ लिख गए! दुबारा पढ़ने पर यह ग़लती मालूम हुई; तब उन्होंने झुंझलाकर उसे काट दिया और पत्नी से आप बोले—

 

“जब मैं काम में हुआ करूँ तब तुम कृपा करके मुझसे मत बोला करो। तुमने मेरे विचारों का प्रवाह बंद कर दिया।”

पंडितानी, “हाँ! हम तुमसे कुछ भी बोलीं और तुम्हारे विचारों का प्रवाह बंद हुआ। मगर वह प्रवाह ही कैसा जिसे तोता बंद कर दे! मैं तो उसे टपकना भी नहीं कहने की। मगर अब मैं तुमसे कभी न बोलूँगी; और अपनी शेष ज़िंदगी चुपचाप रहकर काटूँगी। अगर तुम ब्याह के समय यह मुझसे कह देते कि मैं तुमको केवल देख सकूँगी; मगर तुमसे बोल न सकूँगी; तो मुझको यह तो मालूम रहता कि किस बात की तुमसे आशा रख सकती हूँ और किसकी नहीं। ओह, मैं मानो किसी काठ के पुतले को ब्याही गई!”

 

यह सुनकर पंडित जी मुस्कुराए और बोले, “यह जवाब तो कुछ बुरा नहीं। इसमें तो तुमने ख़ूब कविता छाँटी।”

“यदि तुम इतने चिरचिरे ने होते तो मैं तुम्हें ऐसी ही बातें सुनाया करती। उन्हें तुम अपने लेखों में शामिल कर लिया करते और वे तुम्हारे लेखों की शोभा बढ़ातीं। परंतु मुझे तो घंटों चुपचाप बैठा रहना पड़ता है। जैसे मैं किसी कालकोठरी की क़ैदी हूँ, जिसे अपनी परछाँही से भी बातचीत करना मना हो।”

 

“प्राणाधिके! मैं तुम्हें बोलने से केवल उस समय रोकता हूँ जब मैं किसी काम में लगा होता हूँ। भला तुम्हीं सोचो कि काम और बातचीत दोनों, साथ ही कैसे हो सकते हैं?”

“वाह! मैं तो उस समय भी काम कर सकती हूँ जब घर भर बातचीत करते हों; बीसियों आदमी बोलते हों। देखो न, मेरे साथ की सात-आठ सहेलियाँ बातचीत करती जाती थीं, जब मैंने तुम्हारे लिए वह मखमली जूती तैयार की। तुम्हीं कहो वह कैसी अच्छी है।”

 

पंडित जी हँसकर—“हम तुम्हारे ऐसे बुद्धिमान नहीं।”

“इसीलिए तो मैं तोता पालना चाहती हूँ कि जब तुम मुझसे न बोल सको और मुझसे भी चुपचाप बैठे न रहा जाए, तब मैं तोते से बोल सकूँ और तोता मुझसे बोल सके; और मुझे यह शंका न होने लगे कि मैं गूँगी या बहरी होती जाती हूँ, जैसा कि अब कभी-कभी होता है।”

 

“मैं कहे देता हूँ”—पंडित जी ने कुछ क्रोधित होकर कहा, “कि अब मैं कदापि और जीव घर में न लाने दूँगा। तुम्हारे पास एक कुत्ता है, एक बिल्ली है, रंगीन मछलियाँ हैं, और कितने ही लाल हैं। इतने जानवर, किसी स्त्री के लिए, जो नूह की नौका में न पली हो, बस हैं।”

पंडितानी ने बड़े मधुरस्वर से कहा, “देखो, इस मामले में बाइबिल को न घसीटो।”

 

पंडित जी ने अपने लेख को निराशा की निगाह से देखा और पंडितानी की ओर प्यार से देखकर वे बोले, “प्रिये, तनिक तो बुद्धि से काम लो। यह कमबख़्त तोता तुम्हारे सिर में कैसे घुसा?”

“मेरे घर में भी एक तोता था। फिर, जब मैं ऐसे घर से आई, जहाँ सदा तोता रहा, तो बिना उसके मुझसे कैसे रहा जाए?”

 

“जिसका ब्याह हो गया हो, उसके लिए तोता अच्छा साथी नहीं।”

“क्या ख़ूब! बापू तोते को बहुत प्यार करते थे।”

 

“तुम्हारे बापू को, शाम को अख़बारों के लिए लेख न लिखने पड़ते होंगे।”

“नहीं। वे अपना काम दिन ही को ख़त्म कर डालते थे, और सायंकाल भले आदमियों की तरह अपने बाल-बच्चों के साथ बिताते थे। मुझे इस प्रकार, कुल रात बापू की ओर घूरते हुए न बैठे रहना पड़ता था। एक शब्द तक मुँह से निकलने का मुझे कष्ट न था। हम लोग बहुत मज़े में मिलजुल कर रहते थे—हम, और बापू और तोता।”

 

इतना कहकर पंडितानी ने अपनी सूरत रोती-सी बनार्इ, जिससे पंडित जी आतुर होकर बोले—

“देखो, आँसू न निकालो। तुम अच्छी तरह रहो कि जो तुम इस मकान के नींव की ईंटें तक माँगो तो वे भी मैं तुम्हें देने को तैयार हूँ।”

 

“मैं ईंटें नहीं माँगती; तोता माँगती हूँ।” पंडित जी को रोककर वह फिर बोली, “तुम मेरे लिए तोता ज़रूर ला दो; मैं देखती रहूँगी कि वह तुम्हें दिक न करे।”

“परंतु वह दिक करेगा ही। देखो तुमने लाल पाले हैं; वे मुझे कितना दिक करते हैं।”

 

“वे बिचारे प्यारे-प्यारे लाल, कैसी मधुरी बानी बोलते हैं। क्या उनके गाने से तुम दिक होते हो?”

“प्रिये! उनके गाने से मेरा हर्ज़ नहीं। परंतु जब कभी पिंजड़े के किवाड़ खुले रह जाते हैं, तब मुझे रखवाली करनी पड़ती है कि कहीं तुम्हारी बिल्ली उनका नाश्ता न कर डाले। कल दो बार मैंने उधर जो देखा तो मालूम हुआ कि पुसी पिंजड़े के पास अपने होठ फड़का रही है। भला तुम्हीं कहो, कोई मनुष्य अपना ध्यान किसी बात में कैसे लगा सकता है यदि उसे एक बिल्ली की रखवाली करना पड़े, जो उसकी पत्नी के लालों की ताक में हो।”

 

“परंतु, तुम्हें तोते को न ताकना पड़ेगा। तुम जानते हो कि बिल्लियाँ तोते को नहीं खातीं। और जब तुम काम में न होगे, तब उसकी बोली सुनकर प्रसन्न होगे। मैं उसको बड़ी अच्छी-अच्छी बोलियाँ सिखाऊँगी।”

“जो कुछ तुम उसे सिखाओगी वह नहीं बोलेगा; बल्कि वह वही बोलेगा जो वह पहिले ही से जानता है।”

 

‘नहीं! नहीं! मुझे विश्वास है कि इस तोते की शिक्षा बुरी नहीं हुई है। विज्ञापन में लिखा है कि वह बच्चों से मिल गया है। इसके यह मानी हैं, कि वह गाली-गुफ़्ता नहीं बकता। मेरे घर का तोता पूरा भला मानस था। उससे मेरे घर के आदमियों पर बड़ा अच्छा असर पड़ा। मेरा भाई तोते के आने से पहले तो कभी गाली वग़ैरह तक भी देता था; परंतु जब से तोता आया, तब से उसने कभी वैसा नहीं किया। उसको भय था कि कहीं तोता भी न वही बोलने लगे। मुझे बहुधा ख़याल हुआ है कि बोलने वाले तोते के होने से शायद तुम्हारी भी कुछ आदतें सुधर जाएँ!”

अपना यह ख़याल तो तुम एकदम दूर कर दो। घर में तोते की मौजूदगी मुझे आपे से बाहर कर देगी। जब वह चीख़ने लगेगा तब न जाने मैं क्या-क्या बक जाऊँगा। इसके सिवा मेरे इज़्ज़तदार, भलेमानस, और सीधे-सादे पड़ोसियों को एक चीख़ते हुए तोते से बड़ी परेशानी होगी।

 

“हाँ! हाँ! तुम पड़ोसियों का ख़याल कर रहे हो? तुम्हें इस बात का ख़याल नहीं कि मुझे कितना दुःख है। तुम्हारा सब ध्यान ग़ैरों की तरफ़ है! अच्छा कल मैं अपने मकान के सामने वाली हवेली में कहला भेजूँगी कि वे कुत्ता न पालें क्योंकि वह घंटों दरवाज़े पर भौंका करता है। अगर मैं तोता न पाल सकूँगी तो वे कुत्ता भी न पाल सकेंगे। और, हाँ पड़ोस में अभी एक बच्चा हुआ है। वह क़रीब-क़रीब रात भर चिल्लाता रहता है। मैं उसके लिए भी वैसा ही कहला भेजूँगी। अगर मैं उनके कारण तोता न रख सकूँगी तो वे मेरे कारण बच्चा भी न रखने पावेंगे!” इतने पर पंडित जी ने कालिदास और उनके काव्य को हटाया और कुर्सी फेरकर वे अपनी अर्धांगिनी के सम्मुख हुए।

“प्रियतमे! यदि तुम बुद्धिमानी से बात करो तो मैं तुम्हारी बात सुनूँगा, वरना नहीं। भला पड़ोसी के बच्चे और तुम्हारे तोते से क्या संबंध?”

 

“संबंध क्यों नहीं! ख़ूब संबंध है। अगर मेरे कोई बच्चा हो, और वह रोए तो तुम कहोगे कि तुम्हारा ध्यान बँटता है। इसलिए दाई को उसे लेकर छत पर या बाहर बाज़ार में बैठना पड़ेगा, जिसमें उसका रोना तुम्हें न सुनाई दे। तुम्हारे लिए तो केवल एक स्थान अच्छा होगा। तुम एक कमरा किसी गूँगे-बहिरों के अस्पताल में ले लो, तो तुम बिना किसी विघ्न के लिख-पढ़ सकोगे। मैं कहती हूँ कि आख़िर और लोग कैसे किताबें लिखते हैं? तुम्हें कालिदास के बारे में दो सतरें लिखना है; और उतने के लिए अपनी पत्नी को सभ्यतापूर्वक जवाब देना तुम्हें कठिन हो गया है।”

“प्रिये! जवाब तो मैं दे चुका। क्या मैंने यह नहीं कहा कि मैं तोता रखने के विरुद्ध हूँ?”

 

“हाँ! परंतु तुमने मुझे समझाने तो नहीं दिया। तुम्हारा जो ख़याल तोतों के विषय में है, वह सर्वथा ग़लत है। तुमने जानवरों के अजायबघर के चीख़ते हुए तोते देखे हैं जो एक शब्द भी नहीं उच्चारण कर सकते। परंतु एक सिखाया हुआ तोता, एक शिक्षित तोता, एक पालतू तोता, जैसा विज्ञापन में लिखा है कुछ और ही चीज़ है। मेरे घर में जो तोता है, वह गा सकता है। लोग कोसों से उसके गीत सुनने आते हैं। उसके पिंजड़े के पास भीड़ लग जाती है।”

“अच्छा, वह क्या गाता है? ऋतुसंहार के श्लोक?”

 

“देखो ऐसी बे-लगाव बातें मत करो! ऋतुसंहार के श्लोक पढ़ेगा! वह काशी का कोई शास्त्री है न!”

“अच्छा फिर, यह बताओ, वह गाता क्या है। इसमें तो कोई संदेह ही नहीं कि तुम तोता ज़रूर पालोगी, चाहे हम माने या न मानें। अब हमें इतना तो मालूम हो जाए कि क्या बक-बककर सुबह, दोपहर और शाम, हर समय वह, हमारे कान फोड़ेगा?”

 

“उसमें कान फोड़ने की कोई बात नहीं। तुम तो ऐसा कहते हो, गोया मेरे घर के आदमी सब जंगली हैं; गान-विद्या जानते ही नहीं। याद रखिए, उनमें बुद्धि और सभ्यता तुमसे कुछ कम नहीं।”

“अच्छा, यह सब हमने माना। ज़रा बताइए तो सही आपका वह सभ्य तोता कहता क्या है?”

 

“वह कई बड़े ही मनोहर पद कहता है। नीचे का पद तो वह बड़ी ही सफ़ाई से गाता है, वह कहता है...”

“सत्त, गुरदत्त, शिवदत्त दाता।”

 

“आहा! क्या कहना है!” पंडित जी ने कुछ क्रोध और कुछ कटाक्ष से कहा, “मैंने अपने जीवन में इससे अधिक अच्छा गाना कभी नहीं सुना। अगर यही गाना है तो मैं इस ‘दत्तदत्त’ पर ‘धत्त’ कहता हूँ!”

“देखो मुझसे धत्त न कहना। कोई मैं कुँजड़िन-कबड़िन नहीं।”

 

“ख़फ़ा मत हो। मैं तुम्हें धत्त नहीं कहता; तुम्हारे सभ्य तोते को धत्त कहता हूँ। तुमने पूरा एक घंटा समय मेरा नष्ट किया। अब कृपा करके लिखने दो।”

किसी प्रकार पंडितजी ने अपना चित्त खींच कर फिर कालिदास पर उसे जमाया! लेकिन पंडितानी जी से चुपचाप कब रहा जाता है! थोड़ी ही देर में उस सन्नाटे ने उन्हें व्याकुल कर दिया। अपनी जगह से उठकर वे पंडित जी के पास आई और अपना हाथ मेज़ पर कई बार मारकर उन्होंने उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। वे बोली, “अच्छा, तो पूछती हूँ कि, अगर मैं एक तोता न पालूँ तो तुम छ: कुत्ते कैसे पालोगे? छ: कुत्ते और उसमें से ऐसा काटने वाला कि जिसके मारे धोबिन, नाइन, तेलिन-तमोलिन तक का आना मुश्किल! अहीर जब दूध दुहने आता है तब दो नौकर उस कुत्ते को पकड़ने को चाहिए। यह सब तुम जानते हो; तब भी उसे नहीं निकालते, अभी उस दिन तुम्हें मेहतर को दो रुपये देने पड़े। जिसमें वह उसके काटने की ख़बर पुलिस को न करे। जनकिया महरी को देख उस दिन वह ऐसा ग़ुर्राया कि वह गिर ही पड़ी! तुम तो ऐसा कुत्ता रखो और यदि मैं छोटा-सा, मिष्टभाषी, ख़ूबसूरत, निरुपम तोता पिंजड़े में पालना चाहूँ तो तुम मुझसे ऐसे लड़ो जैसे मैं कोई बाघ घर में लाना चाहती हूँ!!”

 

पंडित जी से अब आगे कुछ न बन पड़ी। उन्होंने पंडितानी के दोनों हाथ अपने हाथों में प्यार से लेकर दबाया और उनका मुख एक बार चुंबन करके कहा, “अच्छा तो हम तुम्हारे लिए एक नहीं, छ: तोते ला देंगे। अब तो प्रसन्न हो?”

इस पर पंडितानी जी प्रसन्नता से फूलकर चुपचाप बैठ गईं और पंडितजी ने जल्दी-जल्दी अपना लेख समाप्त कर डाला।

 

ईसाइयों की धर्मपुस्तक बाइबिल में लिखा है कि जब संसारी जीवों के पातकों के कारण आई हुई भयंकर बाढ़ से बचने के लिए, नूह ने ईश्वर के आज्ञानुसार एक बड़ी किश्ती बनाई और उसमें शरण ली तब उन्होंने अपने बाल बच्चों के अतिरिक्त सब जंतुओं का एक-एक जोड़ा भी साथ ले लिया।

गिरिजादत्त बाजपेयी

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रविवार, 16 जून 2019

मर्जों का दुभाषिया- झुम्पा लाहिड़ी

 "इससे मैं कुछ समझ नहीं पायी। मि. पीरज़ादा और मेरे मां-बाप एक ही भाषा बोलते हैं, एक ही तरह के चुटकुलों पर हंसते हैं, कमोबेश एक ही जैसे दिखायी पड़ते थे। वे अपने खाने में आम का अचार खाते हैं, अपने हाथों से रात के भोजन में चावल खाते हैं। मेरे मां-बाप की तरह कमरे में प्रवेश से पहले मि. पीरज़ादा जूते उतारते हैं, खाना खाने के बाद हाजमे के लिए सौंफ खाते हैं, शराब नहीं पीते हैं, भोजन के अंत में मीठे व्यंजन के तौर पर बिना किसी आडम्बर के चाय के कप में बिस्कुट डुबाकर खाते थे। तिस पर भी मेरे पिता आग्रह करते थे कि मैं अंतर समझूं और वे मुझे अपने डेस्क के ऊपर लगे दुनिया के नक्शे के सामने ले जाते हैं। वे चिंतित दिखते थे कि मि. पीरज़ादा उसे भारतीय के रूप में संबोधन से नाराज हो सकते हैं, हालांकि मैं वास्तव में कल्पना नहीं कर सकती थी कि मि. पीरज़ादा किसी चीज से खीज सकते थे "मि. पीरज़ादा बंगाली हैं मगर वह एक मुसलमान हैं" 

(मर्जों का दुभाषिया- झुम्पा लाहिड़ी)



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मंगलवार, 4 जून 2019

मुद्राराक्षस संकलित कहानियां-मुद्राराक्षस

 "कितना होता होगा पांच हजार रुपया? पांच हजार! शायद एक बड़े घड़े में भरा जाए तो भी न समाए या फिर उसके लिए बहुत ही बड़े लोहे के संदूक की जरूरत होती हो। हरी ने सोचा और उस जंगली पौधे के मुलायम पत्तों का गट्ठा घास की डोरी में बांध लिया जिसे वह कुकरौंधा कहता था और जिसके बारे में उसका खयाल था कि उसके रस से चोट ठीक हो जाती है।" 

(मुद्राराक्षस संकलित कहानियां-मुद्राराक्षस)



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रविवार, 2 जून 2019

एवरेस्ट पर ट्रैफिक जाम

 29 मई 1953 को सुबह साढ़े 11 बजे जब सर एडमंड हिलेरी और शेरपा तेनजिंग नोर्गे ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर कदम रखा था, तो इंसान के हौसले, दृढ़ इच्छाशक्ति और अदम्य जिजीविषा की एक नई इबारत लिखी गई थी। 
जो अब तक अबूझ है, उसे जानने की लालसा लेकर इंसान समुद्र की अतल गहराइयों तक भी पहुंचा है, अंतरिक्ष की असीम ऊंचाइयों को छूने निकला और अजेय माने जाने वाली पर्वत चोटियों पर विजय की पताका लहराई।   इन साहसी-दुस्साहसी कारनामों से इंसान ने अपनी क्षमताओं को तो जान लिया, लेकिन प्रकृति के मर्म को समझ नहीं पाया। यही कारण है कि मोती और रत्न सहेजने वाले सागर में कचरा जमा हो रहा है और उसका खामियाजा जीव-जंतुओं को भुगतना पड़ रहा है। अं
तरिक्ष भी प्रदूषण की चपेट में आ रहा है और अब एवरेस्ट से भी ऐसी ही चिंता उपजाने वाली खबर आई है।  इस साल अब तक 11 पर्वतारोहियों की मौत इस 8, 848 मीटर ऊंची चोटी पर चढ़ने के दौरान हो चुकी है। इसका कारण अत्यधिक ठंड, और आक्सीजन की कमी तो है ही, नौसिखिए पर्वतारोहियों का चढ़ना भी एक बड़ी समस्या है।   एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे से बहुत से पर्वतारोहियों ने प्रेरणा तो ली, लेकिन उनसे प्रकृति की उदात्तता के आगे समर्पण वाली भावना शायद नहीं ली गई। अब सब को एवरेस्ट पर झंडे गाड़ना है, वहां पहुंचकर सेल्फी लेना है कि देखो हम दुनिया में सबसे ऊंचे हो गए हैं। वैसे एवरेस्ट पर सेल्फी के शौकीनों को यह याद रखना चाहिए कि एडमंड हिलेरी ने यह कारनामा करने के बाद बर्फ काटने वाली कुल्हाड़ी के साथ तेनजिंग नोर्गे की फोटो ली, अपनी नहीं खिंचवाई।  तेनजिंग ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि हिलेरी ने अपनी फोटो खिंचवाने से मना कर दिया था। 
बहरहाल, ऊंचा होने का यह शौक ही अब जानलेवा साबित हो रहा है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि एवरेस्ट पर ट्रैफिक जाम जैसी स्थिति बनी हो। लेकिन अब पर्वतारोहियों की बढ़ती भीड़ के कारण चढ़ने और उतरने में अधिक वक्त लग रहा है, जिस कारण दुर्घटनाएं हो रही हैं। हाल ही में एक पर्वतारोही और एडवेंचर फिल्ममेकर एलिया साइक्ले ने इंस्टाग्राम पर डाली एक पोस्ट में कहा कि- मौत, लाशें, अराजकता, रास्तों पर लाशें और कैंप में और लाशें।  जिन लोगों को मैंने वापस भेजने की कोशिश की थी, उनकी भी यहां आते-आते मौत हो गई। लोगों को घसीटा जा रहा है। 
कुछ ऐसा ही अनुभव एक अन्य पर्वतारोही अमीषा चौहान का था, जिन्हें एवरेस्ट से उतरने के दौरान भीड़ के कारण लगभग 20 मिनट इंतजार करना पड़ा।   यह सब अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है, लेकिन यही कड़वी सच्चाई है। और अब लोगों की जान के साथ-साथ पर्यावरण का नुकसान न हो इसके लिए पहल करनी होगी। हाल ही में नेपाल ने एवरेस्ट पर सफाई अभियान चलाया और दशकों से इकठ्ठा हुए लगभग 11 टन कचरे को वहां से हटाया। इस पूरे काम में एक महीने से अधिक का वक्त लगा।  अनुमान लगाया जा सकता है कि एवरेस्ट पर चढ़ने की ललक कितनी हानिकारक साबित हो रही है। वैसे एवरेस्ट नेपाल के लिए आय का एक बड़ा जरिया है। इसके आरोहण के लिए नेपाल की ओर से जारी किए जाने वाले परमिट की कीमत करीब 11 हजार डॉलर है। इससे नेपाल के पास अच्छी खासी विदेशी मुद्रा आती है। इसलिए नेपाल फिलहाल पर्वतारोहियों की संख्या सीमित रखने का कोई विचार नहीं कर रहा है। लेकिन देर-अबेर इस संकट के बारे में सोचना ही होगा।       साभार- देशबंधु

बुधवार, 15 मई 2019

माँ के लिए- हेमधर शर्मा

 "पर एक बात कहूँ माँ! 

तुम्हारा सहयोग अगर मिले न, 

तो जी मैं अब भी सकता हूँ। 

बस एक बार तुम मेरी दुश्चिंता छोड़ दो 

और फिर देखो कि मैं क्या नहीं कर सकता हूँ 

तुम मेरे घर में स्वर्ग देखना चाहती हो माँ 

पर मैं तो सारी दुनिया को स्वर्ग बना देना चाहता हूँ 

आखिर तुम्हारी करुणा ने ही तो मेरे अंदर 

विस्तार पाया है"

 (माँ के लिए- हेमधर शर्मा)




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शनिवार, 11 मई 2019

दूसरी नाक

 लड़के पर जवानी आती देख जब्बार के बाप ने पड़ोस के गाँव में एक लड़की तजवीज़ कर ली। लेकिन जब्बार ने हस्बा की लड़की शब्बू को जो पानी भर कर लौटते देखा, तो उसकी सुध-बुध जाती रही।

जैसे कथा कहानी में कहा जाता है कि शाहज़ादा नदी में बहता हुआ सोने का एक बाल देख सोने के केशधारी सुंदरी के प्रेम से आहत महल की अटारी में उपवास कर लेट गया था; बहुत कुछ वैसा ही हाल जब्बार का भी हुआ। मुँह से तो कुछ कह न सका पर शिथिल शरीर, चेहरे का रंग उड़ा हुआ, कुछ खोया-खोया सा वह रहने लगा।

 

माँ-बाप ने उसकी हालत देखकर सलाह की। मुँह-दर-मुँह नहीं पर उसे सुना दिया कि ब्याह जल्दी ही उसका हो जाएगा। लड़की भी बच्चा नहीं, बिलकुल जवान है। शमसल की बड़ी बेटी जहुन्ना आस-पास के चार गावों में एक ही लड़की है। पानी का बड़ा मटका सिर पर उठाकर धमकती दो मील चली जाती है। घर भर का काम सँभालती है अभी से! यहाँ आ जाएगी तो जब्बार की माँ को भी चैन मिलेगा। बूढ़ी हो गई बेचारी। पर जब्बार को इससे कुछ तसल्ली न हुई। वह अक्सर लंबी-लंबी आहे खींचकर चुपचाप पड़ा रहता।

एक रोज़ माँ ने आँखों में आँसू भर अपनी क़सम धराकर पूछा—तो उसने सच कह दिया। जहुन्ना की बात सुनने से भी उसने इनकार करके कहा—”यातो हस्बा की बेटी शब्बू, नहीं तो बस!...कुछ नहीं।”

 

माँ-बाप ने बहुत समझाया। उसे सुनता देखते तो आपस में जहुन्ना की तारीफ़ और शब्बू की निंदा करने लगते। फिर जो लोग ऐसी बेशर्मी से ब्याह करते हैं उनकी कितनी निंदा होती है, यह सब वे लड़के को काकोक्ति, अलंकार और रूपक द्वारा समझाकर हार गए। पर धुन का पक्का जब्बार न माना तो न माना।

बेटे की ज़िद्द से हार मान बूढ़ा गफ़्फ़ार एक रोज़ हस्बा से बात करने गया। जब वह लौटकर आया तो क्रोध से उसकी आँखें लाल और ग्लानि से चेहरा विरूप हो रहा था। बंदूक़ कोने में रख, कंधे की चादर ज़मीन पर फेंक वह ज़मीन पर ही बैठ गया।

 

जब्बार की माँ ऊँटों को बेरी की पत्तियाँ खिला रही थी। तुरंत बूढ़े के समीप दौड़ी आई। जब्बार दूर से ही उत्सुक कान लगाए था। बूढ़ा मानो फट पड़ा—“ऐसे नालायक़ बेटे से बेऔलाद भला!”

जब्बार की माँ ने घबराकर बेटे की बलाएँ अपने सिर लेते हुए नाक पर हाथ रख कर पूछा—”हाय-हाय! हुआ क्या?”

 

बूढ़े ने कहा—“होगा क्या? ऐसे बे-शर्म बे-ग़ैरत लड़के से और होगा क्या? तमाम इज़्ज़त ख़ाक में मिल गई और घर मिट्टी में मिल जाएगा।”

माँ ने फिर बलाएँ लेकर पूछा—“हाय हुआ क्या? ऐसा क्यों कहते हो!”

 

बाप ने कहा—“अगर इसके ऐसे ही मिज़ाज थे तो यह क़लात के ख़ान के यहाँ पैदा क्यों नहीं हुआ? जानती है, हस्बा ने क्या कहा? सीधे मुँह से बात भी न की। कहती है, शब्बू की बात तुम मत सोचो। उसे वह ब्याहेगा जो अढ़ाई सौ रुपए की गठरी बाँधकर लाएगा।”

अढ़ाई सौ रुपए की बात सुन जब्बार की माँ की आँखें ऊपर चढ़ गई। बूढ़ा बोला—“तू भी बूढ़ी हो गई। तू ही बता-तूने कभी ऐसा तूफ़ान सुना है; उमर में?...अढ़ाई सौ रुपए!...कोई चीज़ ही नहीं होती?”

 

शमसल से मैंने जहुन्ना के लिए बात की थी। उसने लड़की के अस्सी माँगे थे, आख़िर साठ पर तैयार है। उसकी लड़की भी एक आदमी है। और वह बदज़ात माँगता है—अढ़ाई सौ। और फिर तू बूढ़ी हो गई; तू ही बता, रंग ज़रा मैला हुआ तो क्या, और ज़रा साफ़ हुआ तो क्या? औरत औरत सब एक। तुझे अपने काम से मतलब कि रंग से? अभी छः महीने नहीं हुए इसके लिए बंदूक़ ख़रीदी थी तो वह ऊँट बेचा था। अड़ाई सौ रुपए उमर भर में कमा तो पाएगा नहीं और शान यह है! अच्छा तू ही बता—इतनी बूढ़ी हुई, अढ़ाई सौ रुपए कभी औरत के दाम सुने हैं?...अढ़ाई सौ रुपए में तो फिरंगी की तोप ख़रीदी जाती है।”

जब्बार ने सुना और आह को सीने में दबाकर करवट बदल ली।

 

***

एकलौते बेटे का यूँ दिन-रात बिसूरना माँ-बाप से देखा न गया। बूढ़े ने कहा—“मेरा क्या है? पका फल हूँ! कब टपक पड़ूँ? जो कुछ है इसी के लिए है। रोज़ी का सहारा ये दो ऊँट हैं ये भी जाएँगे तो फिर ख़ुद ही फिरंगियों की सड़क पर रोड़ी कूटने की मज़दूरी करेगा। लोग यही कहेंगे कि गफ़्फ़ार का बेटा मज़दूरी करने लगा, सो इसकी क़िसमत! मैं क्या सदा बैठा रहूँगा?”

 

आख़िर दोनों ऊँट भी बन्नू के बाज़ार में बेच दिए गए और शब्बू जब्बार की बहू बन के घर आ गई।

शब्बू को इस बात का कम गर्व नहीं था कि उसकी क़ीमत गिन कर अढ़ाई सौ रुपए चुकाई गई है। पानी भरने जाती तो आधा ही घड़ा लेकर लौटती, वह भी लचकती, बलखाती। पड़ोस की मीरन ने समझाया—“ऐसा नख़रा ठीक नहीं। मर्दों को काम प्यारा होता है। किसी रोज़ ऐसी मार पड़ेगी कि कमर सदा को लचक जाएगी।”

 

अपनी कान तक फैली आँखें मटकाकर और हाथ का अँगूठा दिखाकर शब्बू ने कहा—“ओहो! मेरे बाप ने बारह बीसे और दस रुपए गिन कर मुझे मार खाने को ही तो यहाँ भेजा है? कोई मुझे हाथ तो लगाए? तेरा क्या है? तेरे मर्द ने तीन बीसे में तुझे लिया है।...लँगड़ी लूली हो जाएगी तो एक और सही।”

ग़ज़ब की शोख़ और शौक़ीन थी शब्बू! वह काले मख़मल की वास्कट पहरती जिसकी सिलाइयों पर सीप के तीन सौ बटन टँके थे। अपने बालों में मक्खन लगाती और बाहर जाने से पहले पानी का हाथ लगाकर उन्हें सवार लेती। महीने में दो-दो बेर अपने बाल धोती।

 

जब्बार की माँ यह सब देखती और नाक पर हाथ रख पढ़ोसिन से कहतीं—“देखो तो, अढ़ाई सौ रुपए देकर ब्याह किया पर मुझे क्या आराम मिला? इसे तो अपने नख़रों से ही छुट्टी नहीं।”

***

 

बूढ़े ने बेटे को समझाया “जवानी की तेरी उमर है। कुछ कमाई अब नहीं करेगा तो कैसे निबाह होगा। यूँ घर बैठा रहना क्या तुझे सोहाता है! रोज़ी का एक ज़रिया मेरे ऊँट थे, सो तेरे ब्याह में ख़तम हो गए। अब भी तू कुछ नहीं करेगा तो क्या मैं परदेस जाकर मज़दूरी करूँगा?

मन मार कर जब्बार को कमाई करने बन्नू जाना पड़ा, लेकिन मन उसका गाँव में ही रहता। पूरा सप्ताह जब्बार को बन्नू गए नहीं हुआ था कि वह शब्बू की याद से बेकल हो एक दिन आधी रात में उठ अपने गाँव को चल दिया।

 

सोलह मील चलकर जब उसे ऊषा की अस्पष्ट लाल आभा में पहाड़ी पर अपने गाँव की छतें दिखाई दीं तो वह ठिठक गया। अपने गाँव की क्रुद्ध मूर्ति और पड़ोसियों की लाँछना के विचार ने उसके पैरों में बेड़ियाँ डाल दीं। वह एक चट्टान पर बैठ अपने घर के दरवाज़े की ओर देखने लगा। उसने सोचा—पानी भरने शब्बू निकलेगी तब वह उसे एक आँख देख सकेगा। बावड़ी पर चलकर बैठूँ, शब्बू पानी भरने आएगी तो उससे दो बातें करके लौट जाऊँगा।

शब्बू पानी लेने आई तो दो सहेलियों के साथ। जब्बार तीस क़दम पर एक पत्थर की ओट में बैठ धड़कते हुए दिल से देखता रहा पर एक शब्द बोल न सका। बोलता कैसे? वह दोनों पड़ोसिने बदनाम कर देतीं। दिल पर पत्थर रखे जब्बार देखता रहा, शब्बू सहेलियों से चुहल करती, मटकती लौट गई। जब्बार आहें भरता बन्नू लौट गया।

 

जब्बार के विरह की आग में ईर्षा का घी पड़ गया। उसने सोचा देखो, मैं यहाँ परदेश में अकेला मर रहा हूँ और वह मौज करती है। उसे मेरा ज़रा भी ग़म नहीं। औरत की ज़ात में वफ़ा नहीं होती।

आठ दस दिन बाद यह फिर रातों रात सफ़र कर शब्बू को एक पलक देख सकने और एक चुंबन पा सकने की आशा में गाँव की बावली पर आकर बैठ गया। परंतु वह अकेली नहीं आई। पड़ोस की तीन सहेलियों के साथ अठखेलियाँ करती आई। जब्बार उनकी बात को कान लगाकर सुन रहा था।

 

मीरन ने शब्बू की ठोड़ी छूकर कहा—“हाय रे तेरा नख़रा। गाँव के छैले तुझ पर जान दे रहे हैं, क़सम तेरे सिर की!”

शब्बू के चेहरे पर गर्व से सुरूर छा गया। वे पानी लेकर लौट गई। जब्बार की छाती पर मानो सौ मन का पत्थर आ गिरा, पर बेबस था।

 

अब उसके मन में संदेह का अंकुर और जमा। संदेह मनुष्य के हृदय में आकाश बेल की तरह बढ़ता है। उसके लिए जड़ या बुनियाद की भी ज़रूरत नहीं। वह कल्पना के आकाश में ही पुष्ट होता है। संदेह को निश्चय का रूप लेते भी देर नहीं लगती।

गाँव में ऐसे कई लौंडे लुँगाड़े थे, जिन्हें फ़ितूर के अलावा कुछ काम न था। रहमान और अब्बास से हर एक बात की आशा रखी जा सकती थी। और फिर यदि कुछ दाल में काला नहीं है तो मीरन ऐसी चर्चा क्यों कर रहीं थी? और शब्बू की यह चटक-मटक किसके लिए है? देखो, उसे मेरा ज़रा भी ग़म नहीं! और मैं मरा जा रहा हूँ! जब्बार लहू के घूँट पी-पी कर रह जाता।

 

उसने सोचा, रुपया कमाने के लिए ही तो वह घर से दूर यहाँ पड़ा है। यूँ आठ आने-दस आने रोज़ में रुपया नहीं कमाया जा सकता। घर लौटने की आग ने उसे बावला कर दिया। एक दिन मौक़ा देख उसने एक हाथ मार ही दिया। क़िसमत अच्छी थी। वह पकड़ा भी नहीं गया और डेढ़ सौ रुपया कमाकर डेढ़ महीने में घर लौट आया। जब्बार के बाप को हौसला हो गया, बेटा भूखा नहीं मरेगा।

***

 

जैसे नील का दाग़ कपड़े को नहीं छोड़ता वैसे ही जिस मन में संदेह एक बार प्रवेश कर जाता है, उसे छोड़ता नहीं। जब्बार ने शब्बू से पूछा—“क्यों? जब मैं बन्नू में था तो ख़ूब मज़े उड़ते थे?।”

शब्बू भी निरी मज़दूरिन न थी। चमक कर उसने पूछा—“कैसे मज़े? किससे मज़े उड़ते थे”

 

जब्बार ने कहा—“क्यों गाँव में क्या कम आदमी हैं! रहमान है, अब्बास है। ख़ूब बनाव-सिंगार से पानी लेने जाना होता था, क्यों?”

शब्बू ने कहा—“मैंने कभी किसी मरे की तरफ़ आँख उठाकर देखा हो तो मैं मर जाऊँ, नहीं मुझ पर झूठा इल्ज़ाम लगाने वाला मर जाए!”

 

जब्बार ने तड़प कर पूछा—“तू बन ठनकर अपना हुस्न दिखाने नहीं जाती थी?”

शब्बू ने उत्तर दिया—“मैं क्यों जाऊँगी दिखाने किसी को?...कोई मरा घूरा करे तो मेरा क्या क़सूर?”

 

जब्बार ने चुटिया कर पूछा—“तो तू यूँ बन ठनकर दिखाने को निकलती क्यों है?”

अपने सौंदर्य के अभिमान में सिर ऊँचा कर शब्बू ने कहा—“मैं क्या करती हूँ?... क्या मुँह काला कर लूँ?...मैं जैसी हूँ वैसी हूँ।”

 

जब्बार बड़े यत्न से शब्बू की चौकसी करने लगा। वह शब्बू से सौ क़दम दूर पर भी आदमी देख पाता तो उसे यही संदेह होता कि वह उससे आँख लड़ा रहा है। कुछ दिन में उसका खाना-पीना हराम हो गया। किसी मुसाफ़िर को गाँव से गुज़रते देखकर भी उसे यह शंका होती कि संभव है शब्बू के रूप की ख्याति सुनकर ही यह आदमी बहाने से इधर आया है। सारा गाँव उसे शब्बू के पीछे पागल दिखाई पड़ने लगा।

एक रात जब्बार ने शब्बू से पूछा—“आज तू बाहर से लौट रही थी तब राह में मुस्कुरा क्यों रही थी?”

 

उत्तर में शब्बू ने पूछा—“मैं कहाँ मुस्कुरा रही थी?”

जब्बार ने कहा—“और वे सब आदमी खड़े हुए क्यों देख रहे थे?”

 

अपने रूप की महिमा के संकेत से पुलकित होकर शब्बू ने उपेक्षा से उत्तर दिया—“मैं क्या जानूँ?”

होंठ काटकर जब्बार ने कहा—“बहुत घमंड होगा हुस्न का!... नाक काट लूँगा?”

 

शब्बू का मन गुदगुदा उठा। उसने कह दिया—“बारह बीसे और दस रुपए की नाक है!” और मन-मन मुस्कुराने लगी।

शब्बू सो गई। परंतु जब्बार की आँखों में नींद कहाँ। उसने पुकारा—“सुन तो!” उत्तर नदारद।

 

जब्बार ने सोचा—देखो तो घमंड इसका!...“मैं बेचैन पड़ा हूँ और यह मज़े में सो रही है। यह सब घमंड हुस्न का है। इसी हुस्न के पीछे गाँव के बदमाश पागल हैं। मेरी क्या आबरू है? अगर यह हुस्न न होता तो क्या मेरी आबरू यूँ मिट्टी में मिलती?...ऐसे हुस्न से क्या फ़ायदा?

गंभीर होकर इस समस्या पर विचार कर उसने सोचा—आबरू नहीं तो कुछ नहीं। और यह हुस्न तो सब लोग देखते हैं। मेरा इस पर क्या क़ब्ज़ा? जब तक यह हुसन रहेगा तब तक मुझे आबरू और चैन कहाँ मिल सकता है?

 

रात के सन्नाटे में जो विचार उठते हैं वे बहुत उग्र होते हैं। दिन की तरह उस समय विचारों को बाधित करने वाली सैंकड़ों उलझनें नहीं रहती। इसीलिए भक्त समाधि रात में लगाते हैं, क़ातिल क़त्ल रात में करते हैं और चोर चोरी रात में करते हैं और विरही भी रात में ही पागल हो उठते हैं।

जब्बार अँधेरे में आँख खोले शब्बू के रूप के कारण होने वाले सब अनर्थ पर विचार कर रहा था। वह अनर्थ उसे अपरिमेय जान पड़ा। उसे सहन करना बिलकुल संभव न था।

 

उसने सिरहाने से पैना छुरा उठाया और अँधेरे में टटोल कर शब्बू की नाक पकड़ ली। एक ही झटके में नाक काटकर उसने फेंक दी।

शब्बू चीख़ उठी। जब्बार की माँ उठकर दौड़ी। रोशनी जलाई गई। पड़ोस के लोग दौड़ आए। जब्बार का बाप ग़ुस्से में गालियाँ दे रहा था और दूसरे लोग इलाज बता रहे थे। एक बुढ़िया ने चिल्ला कर कहा—“अरे जल्दी से कोई भेड़ बकरी का ताज़ा, गर्म-गर्म, ज़िंदा गोश्त का टुकड़ा काटकर नाक पर रखो नहीं तो लड़की मर जाएगी!”

 

जब्बार की माँ ने घबराकर कहा—“इस वक़्त भेड़-बकरी कहाँ?” बुढ़िया ने उत्तर दिया—“तो तुम जानो।”

जब्बार खड़ा सुन रहा था। शब्बू की नाक उसने इसलिए काटी थी कि वह केवल उसी की होकर रहे। दूसरों की आँख उस पर पड़ना भी उसे सह्य न था। वह शब्बू को केवल अपने ही लिए रखना चाहता था। दूसरे की आँख उस पर पड़ने से उसके दिल पर घाव लगता था। उसके मर जाने की संभावना सुन उसका दिल दहल गया।

 

ज़िंदा गरम गोश्त नहीं मिलेगा तो क्या...! उसने वही पैना छुरा उठाया और अपनी जाँघ से ज़िंदा गरम गोश्त का टुकड़ा काट कर शब्बू की नाक पर धर दिया। जब्बार के माँ और बाप बिलकुल पागल हो बैठे और दूसरे लोग हैरान रह गए।

***

 

शब्बू चेहरे पर घाव के दर्द के मारे खाट पर पड़ी कराहती रहती और जब्बार जाँघ में पट्टी बाँधे खाट की पटिया पर बैठा शब्बू के चेहरे पर से मक्खियाँ हाँका करता। ज़ख़्म के कारण शब्बू का तमाम चेहरा सूझ गया। पानी का घूँट तक निगलना उसके लिए दूभर हो गया, तिस पर बुख़ार! यह हालत देखी तो जब्बार ने उसका इलाज बन्नू के फिरंगी डाक्टर वाले अस्पताल में कराने का निश्चय किया। स्वयं बड़ी कठिनाई से वह चल पाता था परंतु एक रात जब सब लोग सो रहे थे, उसने शब्बू को कंधे पर उठा लिया और बग़ल में लाठी ले वह बन्नू के लिए चल पड़ा।

वह कुछ दूर चलता और सुस्ता लेता। कपड़ा भिगोकर पानी की बूंदें शब्बू के मुँह में टपकाता जाता। पाँचवें दिन वे लोग बन्नू के अस्पताल में पहुँच गए। बीस रोज़ में शब्बू का ज़ख़्म भर पाया और उसकी तबीअत ठिकाने पाई।

 

***

नाक न रहने पर हवा होटों की अपेक्षा नाक के छेद से अधिक निकल जाती है और स्वर बिलकुल नक्की (प्लुत अनुस्वार) हो जाता है। उसी स्वर में मिनमिना कर शब्बू ने कहा—“मेम साहब कहती हैं विलायत से रबड़ की नाक मँगवाई जा सकती है।”

 

जब्बार ने घबराकर उत्तर दिया—“बस रहने दे। हमें नाक नहीं चाहिए। मुझे तू बिना नाक के ही भली मालूम होती है। मुझे क्या नाक औरों को दिखानी है?”

शब्बू उदास हो गई। उसने खाना खाने से इनकार कर दिया। जब्बार के लिए बड़ी भयंकर समस्या आ पड़ी। उसने सोचा बुरा हो इस मेम का। मैंने एक नाक काटी थी, वह दूसरी बनाने को तैयार है।

 

जब दो दिन शब्बू ने खाना नहीं खाया तो जब्बार ने रबड़ की नाक की क़ीमत चालीस रुपए डाक्टर के यहाँ जमा करादी। पर शर्त एक रही कि शब्बू नाक लगाएगी ज़रूर लेकिन ग़ैर मर्द अगर उसे घूरने लगे तो झट नाक उतार कर जेब में डाल ले।

यशपाल

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मंगलवार, 7 मई 2019

मेजर संजय चतुर्वेदी -51 किताबें ग़ज़लों की- नीरज गोस्वामी

"घर के चौकीदार हुए दादा-दादी 

सब के पहरेदार हुए दादा-दादी 

कौन ख़रीदे नहीं रहे पढ़ने वाले 

उर्दू के अख़बार हुए दादा-दादी 

घर में उनका नहीं रहा हिस्सा कोई 

कपड़ों वाला तार हुए दादा-दादी"

मेजर संजय चतुर्वेदी  (51 किताबें ग़ज़लों की- नीरज गोस्वामी) 



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शनिवार, 4 मई 2019

डाली मोगरे की- नीरज गोस्वामी

"तीर खंज़र की न अब तलवार की बातें करें 

ज़िन्दगी में आइये बस प्यार की बातें करें 

टूटते रिश्तों के कारण जो बिखरता जा रहा 

अब बचाने को उसी घर बार की बातें करें 

थक चुके हैं हम बढ़ाकर यार दिल की दूरियाँ 

छोड़कर तक़रार अब मनुहार की बातें करें 

काश 'नीरज' हो हमारा भी ज़िगर इतना बड़ा 

जेब ख़ाली हो मगर सत्कार की बातें करें 

(डाली मोगरे की- नीरज गोस्वामी)




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शनिवार, 27 अप्रैल 2019

ये मन नम है- पुष्पेन्द्र फाल्गुन

"ईश्वर के होने, नहीं होने का जितना झगड़ा इस धरती पर होता आया है, उतना किसी और चीज के लिए नहीं हुआ। प्रेम के लिए भी नहीं। जबकि, जो चीज इंसान को सौ में से निन्यानवे दफा सुकून देती है, वह प्रेम ही है। पर लोग ईश्वर के अस्तित्व को लेकर न सिर्फ लड़ रहे हैं, बल्कि एक-दूसरे के अस्तित्व के लिए भी संकट बन गए हैं। इंसान ईश्वर के बिना रह सकता है, प्रेम के बिना नहीं। ईश्वर को मानने वाले हों या कि नकारने वाले सभी को प्रेम चाहिए। (ये मन नम है- पुष्पेन्द्र फाल्गुन)



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बुधवार, 24 अप्रैल 2019

जो बीत गई सो बात गई


जीवन में एक सितारा था

माना वह बेहद प्यारा था

वह डूब गया तो डूब गया

अम्बर के आनन को देखो

कितने इसके तारे टूटे

कितने इसके प्यारे छूटे

जो छूट गए फिर कहाँ मिले

पर बोलो टूटे तारों पर

कब अम्बर शोक मनाता है

जो बीत गई सो बात गई



जीवन में वह था एक कुसुम

थे उसपर नित्य निछावर तुम

वह सूख गया तो सूख गया

मधुवन की छाती को देखो

सूखी कितनी इसकी कलियाँ

मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ

जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली

पर बोलो सूखे फूलों पर

कब मधुवन शोर मचाता है

जो बीत गई सो बात गई



जीवन में मधु का प्याला था

तुमने तन मन दे डाला था

वह टूट गया तो टूट गया

मदिरालय का आँगन देखो

कितने प्याले हिल जाते हैं

गिर मिट्टी में मिल जाते हैं

जो गिरते हैं कब उठतें हैं

पर बोलो टूटे प्यालों पर

कब मदिरालय पछताता है

जो बीत गई सो बात गई



मृदु मिटटी के हैं बने हुए

मधु घट फूटा ही करते हैं

लघु जीवन लेकर आए हैं

प्याले टूटा ही करते हैं

फिर भी मदिरालय के अन्दर

मधु के घट हैं मधु प्याले हैं

जो मादकता के मारे हैं

वे मधु लूटा ही करते हैं

वह कच्चा पीने वाला है

जिसकी ममता घट प्यालों पर

जो सच्चे मधु से जला हुआ

कब रोता है चिल्लाता है

जो बीत गई सो बात गई

 

हरिवंशराय बच्चन

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गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

भटक जाते हैं वो लोग

 

एक ही चौखट पर सर झुके तो सुकून मिलता है

भटक जाते हैं वो लोग जिनके हजारों खुदा होते हैं

                       कृष्णधर शर्मा 16.4.19