नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

बस्तर दशहरा


दुनिया के किसी भी आदिवासी इलाके की तरह बस्तर के आदिम समाज में भी काल्पनिक देवी-देवताओं का मानसिक साम्राज्य पूरी दृढ़ता से अपनी जड़ें जमाये हुये है। यह और बात है कि यहाँ के आदिवासी अपने व्यक्तित्व और व्यवहार में स्वंय उन देवी देवताओं से भी अधिक शक्तिशाली हैंजिन्हें वे स्वयं से भी अधिक शक्तिशाली मानते आ रहे हैं। दरअसल दिल को दहला देने वाली घोर गरीबी में जैसे-तैसेगुजर-बसर कर रहे बस्तर के आदिम समाज को अपनी शक्ति का अहसास नहीं है।
धर्म थके हारे मनुष्यों की लाचारी का ही दूसरा नाम है। बस्तर का आदिम लोक जीवन अपनी ऐतिहासिक शक्ति को भूलकर इस वैज्ञानिक युग में भी अगर अदृश्य देवी-देवताओं के सम्मोहन में बंधा हुआ है तोउसके पीछे भी उसकी यह लाचारी ही है। धर्म पर आधारित यह सम्मोहन ही उसे भरोसा दिलाता है कि अगला जन्म इससे भी बेहतर होगा।
उसे न तो अतीत की स्मृतियाँ कुरेदती है और न ही भविष्य की चिंता सताती है। किसी भी अंचल या धरती के लिये किसी टुकड़े की लोक संस्कृति तत्कालिन लोक मानस और परिस्थितियों पर निर्भर करती है। युग की बदली हुई परिस्थितियों से अन्र्तक्रिया करते हुये जब लोक मानस और लोक बदलता है तबलोक संस्कृति का परिवर्तन सहज स्वाभाविक हैयह बात अलग है कि यह परिवर्तन लोक की प्रकृति के अनुसार होने से उतना प्रभावी न प्रतीत होता हो जितना कि उच्चवर्गीय संस्कृति में संभव होता है। यही है आदिवासियों के उल्लासमयसादगीपूर्ण नृत्य संगीत से पूर्ण जीवन का रहस्य। प्राकृतिक और पारिवारिक सुख को दैवीय प्रकोप मानकर पूरी भक्ति और श्रद्धा के साथ अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हुये अराधना के स्वर में झूम उठता हैयहीं से प्रारंभ होती है आदिवासियों के त्योहारों और मेलों की श्रंृखलाजो कि उनके संघर्षशील और श्रमसाध्य जीवन में वर्ष भर उल्लास और मधुरता घोले रहती है।
बस्तर के आदिवासियों की अभूतपूर्व भागीदारी का ही प्रतिफल है कि बस्तर दशहरा की राष्ट्रीय पहचान स्थापित हुई है। छ.ग. के जगदलपुर नगर में दशहरा अत्यन्त गरिमा और सांस्कृतिक वैभव के साथ मनाया जाता रहा है। भूतपूर्व बस्तर रियासत में टेम्पल व्यवस्था के तहत पूर्णतः सार्वजनिक दशहरा पर्व मनाया जाता था। समय बदलाव्यवस्थापरिस्थितियाँ बदलीसमाज बदला और इसके साथ मनुष्य का जीवन भी बदला। शासन ने जन भावनाओं का सम्मान करते हुए इसमें अपनी रचनात्मक भूमिका निर्धारित की। ऐसी भूमिका कि यह परम्परा लगातार विकसित होती रहे।
यहाँ रावण नहीं मारा जाता 
बस्तर दशहरा की अपनी विशिष्ट पहचान है। दशहरे का वैभव ही कुछ ऐसा है कि सबको आकर्षित करता है। असत्य पर सत्य के विजय के प्रतीकमहापर्व दशहरे को पूरे देश में राम का रावण से युद्ध में विजय के रूप में विजयादशमी के दिन मनाया जाता हैकिन्तु बस्तर दशहरा देश का ही नहींवरन् पूरे विश्व का अनूठा महापर्व हैजो असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक तो हैमगर बस्तर दशहरा में रावण नहीं मारा जातारामायण से इसका कोई संबंध नहींअपितु बस्तर की आराध्या देवी माँ दन्तेश्वरी सहित अनेक देवी-देवताओं की 75 दिनों तक पूजा-अर्चना होती है।
बस्तर का अद्धितीय दशहरा चालुक्य वंशीय राजपरिवार की इष्ट देवी तथा बस्तर अंचल के समस्त लोक जीवन की ईष्ट व राज्य की आराध्या देवी दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा-भक्ति की सामूहिक अभिव्यक्ति का पर्व है। बस्तरांचल में धार्मिक दृष्टि से सर्वत्र शिव और शक्ति का वर्चस्व है। बस्तर में देवी पूजा सर्वोपरि है। यहांँ के लोकजीवन में वामाचारी शक्ति परंपरा का प्रभाव हैलोगों में पंच मकार का प्रचलन पाया जाता है इसलिए यहाँ शांतिअहिंसा और सद्भाव के प्रतीक बस्तर दशहरा पर्व में रावण वध नहीं किया जाता। विजयादशमी के अवसर पर रावण वध की परंपरा को न मानते हुए देवी पूजा पर आधारित है।
किसी भी राष्ट्र की सैन्य ,शक्ति का पर्व हैदशहरा। बस्तर अंचल में आदिवासी वैष्णव नहीं वरन् शाक्त हैंइसलिए मांई दन्तेश्वरी जी जो शक्ति की देवी मानी जाती हैंइस महापर्व में विशेष महत्व पाती हैं।
इतिहास 
बस्तर के दशहरा पर्व कीरथयात्रा की शुरूआत सन् 1408 ई. के बाद चालुक्य वंशानुक्रम के चैथे शासक राजा पुरूषोत्तम देव ने की थी। अंचल के आदिवासियों में धार्मिक भावना को सही दिशा प्रदान करने का उद्वेश्य लिये राजा पुरूषोत्तमदेव ने जगन्नाथपुरी की यात्रा और अपनी प्रजा को साथ ले जाने का निश्चय किया। राजा के इस प्रस्ताव से व्यापक प्रभाव पड़ा। लोगों के मन में मुफ्त यात्रावह भी राजा के साथ जाने का उमंग के भाव के साथ अंचल के मुरियाभतरागोंडधाकड़़माहरा तथा अन्य जातियों के मुखियाओं ने राजा के साथ जाने की मनः स्थिति बनाई। एक शुभ मुहुर्त देख कर राजायह ऐतिहासिक यात्रा के लिये रवाना हुए। इस कष्ट-साध्य यात्रा में पैदल ही जाना थाराजा स्वयं सवारियों का प्रयोग नहीं किया।           
एक जनश्रुति के अनुसार राजा पुरूषोत्तमदेव ने अपनी प्रजा एवं सैन्यदल के साथ जगन्नाथपुरी पहुंचे। पुरी के राजा को जगन्नाथ स्वामी नें स्वप्न में यह आदेश दिया कि बस्तर नरेश की अगवानी व उनका सम्मान करेंवे भक्तिमित्रता के भाव से पुरी पहुंच रहे है। पुरी के नरेश ने बस्तर नरेश का राज्योचित स्वागत किया। बस्तर के राजा ने पुरी के मंदिरों में एक लाख स्वर्ण मुद्राएँबहुमूल्य रत्न आभूषण और बेशकीमती हीरे-जवाहरात जगन्नाथ स्वामी के श्रीचरणों में अर्पित किया। जगन्नाथ स्वामी ने प्रसन्न होकर सोलह चक्कों का रथ राजा को प्रदान करने का आदेश प्रमुख पुजारी को दिया। इसी रथ पर चढ़कर बस्तर नरेश और उनके वंशज दशहरा पर्व मनायें साथ ही ‘लहुरी रथपति’ की उपाधि देने का निर्देश दिया। राजा पुरूषोत्तमदेव को लहुरी रथपति की उपाधि से विभूषित किया गया।
पुरी नरेश से स्थायी मैत्री संधि कर बस्तर नरेश वापस लौटेसाथ में भगवान जगन्नाथबलभद्र सुभद्रा की काष्ठ प्रतिमा अपने साथ लाए और भगवान की पूजा अर्चना के लिए कुछ आरण्यक ब्राह्मण परिवारों को भी अपने साथ लेकर आयेजो आगे चलकर बस्तर राज्य में ही बस गए। राजा पुरूषोत्तम देव ने जगन्नाथपुरी से वरदान स्वरूप मिले सोलह चक्कों के रथ का विभाजन करते हुए रथ के चार चक्कों को भगवान जगन्नाथ को समर्पित कर दिया और शेष 12 पहियों का विशाल काष्ठ रथ माँ दन्तेश्वरी को अर्पित कर दियातब से दशहरा में दन्तेश्वरी के छत्र के साथ राजा स्वयं भी रथारूढ़ होने लगे। मधोता ग्राम में पहली बार दशहरा रथ यात्रा संवत् 1468-69 (1411-12 ई.) के लगभग प्रारंभ हुई। कई वर्षों के बाद 12 चक्कों के रथ संचालन में असुविधा होने के कारण आठवें क्रम के शासक राजा वीरसिंह ने संवत् 1610 के पश्चात् आठ पहियों का विजय रथ और चार पहियों का फूल रथ प्रयोग में लाया। तब से लेकर यह परम्परा आज भी निर्बाध रूप से जारी है।

रियासत काल में राजा मांई दन्तेश्वरी का छत्र लेकर स्वयं रथों पर विराजमान होते थेइन रथों पर राजपिवार की कुल देवीमांँ दुर्गा के एक रूपमां दन्तेश्वरी के छत्र को रथयात्रा के दौरान रथ पर आरूढ़ किया जाता है। इसलिए बस्तर दशहरा में फूल रथ चार चक्कों वाला रथ होता है तथा भीतर रैनी और बाहर रैनी के लिए आठ चक्कों के रथ परिक्रमा का विधान है। प्रतिवर्ष एक नया रथ निर्माण किया जाता है। एक वर्ष चार चक्कों का होता हैवहीं दूसरे वर्ष आठ चक्कों का रथ निर्माण किया जाता है। प्रतिवर्ष आयोजन होने वाले दशहरा पर्व में मूल रूप से दो विशालकाय रथ परिक्रमा के लिए उपयोग में लाए जाते है। प्रत्येक रथ निर्माण के लिए लगभग 55 से 60 घनमीटर विशेष प्रजाति की लकड़ियों की आवश्यकता होती है जिसका मूल्य समय के अनुसार लाखों रूपये का आंका गया है। कोई भी रथ दो वर्षों के परिक्रमा बाद चलन से बाहर कर दिया जाता है।  
बस्तर के जनजातीय समाज में पशु-पक्षियों की बलिप्रथा बहुतायत में पाई जाती है। कई मामलों में देवी-देवताओं के पसंद के अनुरूप तथा रंग के आधार बलि दी जाती है। कई बार संबंधित देवी-देवताओं को खुश करने के उद्धेश्य से रंग विशेष का बकरा अर्पित करने का मन्नत मांगता है जो पूर्ण हो जाने के बाद उसे पूरा करता हैअपने आप में महत्व रखता है।
पाठ जात्रा 
विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा का विधिवत् शुभारंभ श्रावण मास के अमावस्या से अर्थात् हरियाली अमावस्या से प्रारंभ होता है। दशहरा पर्व विधान के तहत प्रतिवर्ष रथ यात्रा के लिए रथ निर्माण किया जाता है। अमावस्या के दिन नवीन रथ निर्माण के लिए लकड़ी का एक बड़ा टुकड़ा लाया जाता है जिसे ‘टुरलु खोटला’ कहा जाता है। इस लकड़ी के टुकड़े को स्थानीय दन्तेश्वरी मांई मंदिर के सामने रखा जाता है और रथ निर्माण में लगने वाले औजारों के साथ पूजा अर्चना की जाती है। जिसे ‘पाठ जात्रा’ कहा जाता है। मांझीमुखियाचालकीमेम्बरिनजनप्रतिनिधियोंविधायकऔर गणमान्य नागरिकों के समक्ष पुजारी के द्वारा विधिवत् टुरलु खोटला पूजा का उद्धेश्य यह होता है कि जिस निमित्त लकड़ी का तना लाया गया हैउसकी तथा अन्य स्थानीय देवी-देवताओं के साथ-साथ राज्य की देवी अर्थात् दन्तेश्वरी देवी की आराधना की जाती है। लोक-विश्वास है कि जिन देवी-देवताओं को पर्व विशेष के लिए आव्हान किया हैवे देवी-देवता पर्व समाप्ति तक कहीं अन्यत्र न जायें और पर्व निर्विघ्न सम्पन्न होलकड़ी के मोटे कुंदे पर कीलों को गाड़कर अपने विश्वास को दृढ़ करते आज भी देखा जा सकता है।

डेरी गड़ाई पूजा विधान
पाठ-जात्रा से प्रारंभ हुई पर्व की दूसरी रस्म को ‘डेरी गड़ाई’ कहा जाता है। साल प्रजाति की दो शाखा युक्त डेरी, (स्तम्भनुमा लकड़ी का लगभग 10 फुट का ऊँचा लकड़ी) होता हैजिसे परम्परा के अनुसार दशहरा पर्व के प्रारंभ होने के पूर्व स्थानीय सिरहासार भवन में स्थापित की जाती है। 15 से 20 फीट की दूरियों पर दो गढ्ढे किए जाते हैंइन गढ्ढों में जनप्रतिनिधियों और दशहरा समिति के सदस्यों की उपस्थिति में पुजारी के द्वारा डेरी में हल्दीकुमकुमचंदन का लेप लगाकर दो सफेद कपड़े बाँधकर पूजा सम्पन्न करता है। इन गढ्ढों पर डेरी स्थापित करने के पूर्व जीवित मोंगरी मछली और अण्डा छोड़ी जाती है तथा फूला लाई डालकर डेरी स्थापित की जाती है। इस शाखा-युक्त डेरी के गड़ाई को एक तरह से मण्डापाच्छादन का स्वरूप माना जाता है। इस डेरी की पूजा-पाठ के साथ स्थापना करके दशहरा पर्व निर्विघ्न सम्पन्न करने की कामना की जाती है। इस डेरी गड़ाई के पश्चात् रथ निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ की जाती है। यह रस्म भादों शुक्लपक्ष द्वादश अथवा तेरस के दिन पूर्ण कर ली जाती हैडेरी गड़ाई के साथ ही जंगलों से लकड़ी और निर्धारित गाँवों से कारीगरों का आना प्रारंभ हो जाता है। डेरी गड़ाई अर्थात् स्तम्भारोहण के पश्चात् रथ निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी जाती है।
व्यवस्था के तहत रथ निर्माण हेतु जंगल से लकड़ी लाने  से रथ खींचने तक का कार्य विभाजित है। रथ की विभिन्न भागों की लकड़ियां उन्ही गाँवों के लोग प्रतिवर्ष लाते हैंजिन्हें पूर्व में जिम्मेदारी सौंपी गई थी और तब से लेकर आज तक अपनी परम्परा का निर्वहन करते आ रहे हैं। लकड़ी लाने का कार्य भी एक उत्सव की तरह होता था। ग्रामीणों का जत्था जंगलों से लकड़ी लेकर सिरहासार तक आता था तो उनका जोश और उत्साह देखते ही बनता था। रथ निर्माण के लिए लकड़ी की आपूर्ति बस्तर अंचल के जंगलों से होती है। रथ निर्माण के लिए वन-विभाग के स्वीकृति से ही जंगल की साल और तिनसा जाति के लकड़ियों का चयन करके काटा जाता है। परम्पराओं के अनुसार अलग-अलग हिस्सों के लिए अलग-अलग गाँव के ग्रामीण जहाँ अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। बदलते परिवेश तथा मूल्यों के बाद भी दशहरा जन-जन को जोड़े हुए है। रथ निर्माण में साल और तिनसा प्रजाति की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। तिनसा प्रजाति की लकड़ी से एक्सल (अचाँड या अच्छांड) बनता है तथा शेष रथ निर्माण के लिये अन्य सारे काम साल व धामन प्रजाति की लकड़ियों से पूरी की जाती है।
आज के इस आधुनिक युग में जहाँ चंद मिनटों में लकड़ी के बड़े-बड़े लठ्ठों को टुकड़े-टुकड़े करने की बड़ी से बड़ी मशीनें बाजार में सहज उपलब्ध हैं वहीं इस मशीनी युग के बावजूद शताब्दियों से चली आ रही पारम्परिक औजारों से विशालकाय 40 फीट ऊंचा काष्ठ रथों का निर्माण अनूठा नज़रआता है। शायद इस अनूठेपन की कारीगरी भी आम जनता के लिए कौतुहल का विषय हो सकता हैजब सैकड़ों कारीगर शहर के हदय स्थल ऐतिहासिक सिरहासार के सामने हाथों में बसूलाकुल्हाड़ीबिंधना लिए तन और मन से जुट जाते हैं। रथ बनाने वाले ग्रामीण रथ निर्माण में देशी अस्त्रों का प्रयोग करते हैं। मुख्यतः बिधंनामुटलाबसूलाटंगियाकुढ़ार और बढ़ई के द्वारा उपयोग हथियार ही प्रयोग में लातें हैं।
काछिनगादी पूजा विधान 
बस्तर अंचल में काछिन देवीरण की देवी कहलातीं हैं। बस्तर दशहरा का शुभारंभ इतना सहृदयइतना प्रेरकभावमर्मस्पर्शी और श्लांघनीय लगता है कि चिंतक उसमें खो जाता है। ‘काछिन गादी’ का अर्थ होता हैकाछिन की देवी को गादी अर्थात् गद्दी या आसन प्रदान करनाजो काँटों की होती है। काले रंग के कपड़े पहनकर काँटेदार झूले की गद्दी पर आसीन होकर जीवन में कंटकजयी होने का सीने में हाथ रखकर सांकेतिक संदेश देती हैं। काछिन देवी बस्तर दशहरा में प्रतिवर्ष निर्विघ्न आयोजन हेतु स्वीकृति और आशीर्वाद प्रदान किया करतीं हैं। मान्यता के अनुसार ‘काछिन देवी’ पशुधन और अन्न-धन की रक्षा करती है। प्रतिवर्ष माहरा जाति की एक नाबालिक बालिका पर काछिन देवी आरूढ़ होती हैं। राजपरिवार के सदस्यबस्तर दशहरा समिति के सदस्यमांझीचालकीनाईकपाईक के साथ मांई दन्तेश्वरी के मंदिर सेे निकलकर बाजे-गाजे के साथ कार्यक्रम स्थल अर्थात् भंगाराम चैक स्थित काछिनगुड़ी एक जुलुस की शक्ल में पहुँचते हैंकार्यक्रम के तहत भैरम-भक्त ‘सिरहा’ देवी का आव्हान करता है और स्थल पर उपस्थित कँुवारी बालिका पर काछिन देवी का प्रभाव गहराने लगता है। देवी की पूजा-अर्चना के पश्चात् बस्तर के ऐतिहासिक विश्व प्रसिद्ध दशहरा मनाने की एवं निर्विघ्न सम्पन्न कराने हेतु अनुमति माँगी जाती है। काछिन देवी से स्वीकृति सूचक प्रसाद मिलने के पश्चात् बस्तर का दशहरा पर्व धूमधाम से प्रारंभ हो जाता है। हरिजनों की देवी को बस्तर के भूतपूर्व राजाओं द्वारा इस प्रकार प्राथमिक सम्मान दिया जाना इस बात की पुष्टि करता है कि चालुक्यों की दृष्टि में हरिजन अश्पृश्य नहीं थे। काछिन देवीबस्तर में मिरगानचंडार और तिकड़ा (अनुसूचित) जातियों की कुल देवी मानी जातीं हैं।
रैला देवी से अनुमति
काछिन गुड़ी में काछिन गादी के रस्म अदायगी के पश्चात् जगदलपुर नगर के गोलबाजार में संध्या ‘‘रैला पूजा’’ होती है। रैला पूजा मिरगान जाति की  पूजा है। रैला पूजा के अन्तर्गत मिरगान महिलाएँ अपनी मिरगानी बोली में एक गीत-कथा को गा-गाकर कर प्रस्तुत करती हैंजिसमें ‘रैला देवी’ का बड़ा ही हृदय-स्पर्शी एवं कारूणिक चित्रण मिलता है। राजकुमारी रैला देवी का वही श्राद्धकर्म बस्तर के दशहरा पर्व में रैला-पूजा के नाम से जाना जाता है। इस देवी का अब तक कोई मंदिर नहीं है। गोलबाजार के अंदर एक स्थल पर प्रतिवर्ष काछिन देवी के पूजा के बाद संध्या के समय चिन्हित स्थल पर रैला देवी के आयोजन के लिए मिरगान जाति का पुजारी तथा इस जाति की महिलाएँ एकत्रित होती हैं। ग्राम तेलीमारेंगा की अनुसूचित जाति की कुवाँरी कन्या जो कि रियासत काल से उसी ग्राम से निभाती चली आ रहीं हैंउन्हें परम्परा के अनुसार प्रतिवर्ष अवसर दिया जाता है। इस रैला पूजा में भी राज परिवार तथा पुजारी रैला देवी से पर्व निर्विघ्न सम्पन्न होने की कामना करता है।
कलश स्थापना
भारतीय संस्कृति में कलश को विविध सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जीवन के हर क्षेत्र में धार्मिक कार्य का शुभारंभ मंगल कलश स्थापित करके ही किया जाता है। छोटे अनुष्ठानों से लेकर बड़े-बड़े धार्मिक कार्यों में कलश का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार कलश भारतीय संस्कृति का वो प्रतीक है जिसमें समस्त मांगलिक भावनाएं निहित होती हैं। शारदीय नवरात्र उत्सव परशहर में आस्था के ज्योति जगमगाते देखे जा सकते हैं। मांई दन्तेश्वरी मंदिर सहित सार्वजनिक दुर्गा पण्डालों में तथा शहर के अन्यान्य मंदिरों में मनोकामना दीप जलते हैं। बस्तर की आराध्य देवी मां दन्तेश्वरी के मंदिरों में भी आस्था के ज्योति जलती हैं। हजारों भक्त श्रद्धा भक्ति के साथ मनोकामना ज्योति कलश स्थापित करते हैं। यहाँ बस्तर नहीं देश भर के अनेक राज्यों के अलावा विदेशों से भी भक्त तेल व घी के ज्योति जलाते हैं।
जोगी बिठाई
बस्तर के दशहरा के संदर्भ में योगी हीजोगी की संज्ञा पाता हैजो दशहरा दर्शन में प्रमुख भूमिका तो निभाता है किन्तु रथ चालन का साक्षी और दशहरा समारोह का दर्शक नहीं होता बल्कि इसकी आराधनासाधना और संकल्प को सम्मान देते स्थानीय सिरहासार में लोग जोगी का दर्शन करते हैं।
आश्विन शुक्लपक्ष को स्थानीय सिरहासार में जोगी बिठाई की रस्म अदा की जाती है। एक गढ्ढे में हल्बा जाति का एक व्यक्ति लगातार 9 दिनों तक योगासन की मुद्रा में बैठा रहता हैइस बीच जोगी फलाहार तथा दूध का सेवन करता है। रियासत काल से ही हल्बा जनजाति का जोगी इस परम्परा का निर्वहन करता आ रहा है। बड़े आमाबाल निवासी जोगी परिवार का जो व्यक्ति 9 दिनों तक उपवास करता हैवह निर्धारित गढ्ढे में बैठने के पूर्व अर्थात् नवरात्र के पहले पितृमोक्ष अमावस्या के दिन ही सिरहासार पहुँच जाता है। निर्धारित स्थल पर वह अपने परिवार जनों के साथ अमावस्या के दिन पितरों का श्राद्ध करता है। पितरों के श्राद्ध के बाद से ही वह जोगी के रूप में बैठने के लिए तैयार माना जाता है। जोगी उपवास प्रारंभ करने के पूर्व श्राद्धकर्म करते हुए पितरों का सम्मान करता है तथा अपने पितरों के प्रति आस्था प्रदर्शित करते हुए दूसरे दिन से पर्व निर्विघ्न सम्पन्न होइस कामना के साथ 9 दिनों तक उपवास पर बैठता है।
फूल रथ परिक्रमा
परम्परा के अनुसार आश्विन शुक्लपक्ष द्धितीया से लेकर सप्तमी तिथि तक चलने वाले फूलरथ की परिक्रमा का चरण प्रारंभ हो जाता है। इन तिथियों में प्रतिदिन रथ परिक्रमा होती है। ग्रामीण क्षेत्रों से आए हुए हजारों ग्रामीणों के द्वारा फूल रथ का खींचा जाना एक विहंगम दृश्य उत्पन्न करता हैजो यह बताता है कि भक्ति में कितना आनंद और सुख छिपा हुआ है। शक्ति परम्परा का यह ऐतिहासिक पर्व बस्तर दशहरा अपने शान और विलक्षणता के लिए न केवल भारत में प्रसिद्ध है वरन् इसका अवलोकन करने के लिए विदेशियों की भी आमद बस्तर में होती है। पहियों वाले फूलरथ अपने आकर्षणजिसमें फूलों का बाहुल्य होता थापुष्प प्रधान होने के कारण ‘फूलरथ‘ की संज्ञा दी गई। रियासत काल में देवी की डोलीरथछत्र से लेकर राजा का पगड़ी भी पुष्प प्रधान हुआ करता था। यद्वपि अब कागज के फूलों और फुग्गों से सजा यह रथ परम्परा का पालन भले ही करता होकिन्तु उन दिनों की शोभा ही कुछ और थीजो अब परम्परा के नाम पर दिखाई नहीं देती। रथ परिक्रमा निर्विघ्न सम्पन्न हो इस आशय को लेकर राउरीन तथा पनारा समाज की महिलाओं के द्वारा नज़र उतारी जाती है। रथ की नज़र उतार कर उसे निर्विघ्न सिंह-ड्योढ़ी तक पहुँचाने की मन्नत मांगी जाती है। इस रस्म में पनारा समाज की महिलाओं के द्वारा रथ के उपर भाव-विभोर होकर रथ पर विराजित मांई जी के उपर पुष्प वर्षा करके नज़र उतारतीं हैं तथा केवटा जिसे समरथ भी कहा जाता हैउस समाज की महिलाओं के द्वारा चनालाईपान-बीड़ा तथा गुड़िया खाजा अर्पित करते हुए इस विधान को सम्पन्न करतीं हैं। यह परम्परा आज तक निर्बाध रूप से चली आ रही है।
महाष्टमी पूजा विधान
नवरात्र के अष्टमी तिथि के अवसर पर सुबह से ही मंदिरों में भक्तों  का तांता लगना शुरू हो जाता है। हजारों की संख्या में भक्तसपरिवार मंदिर में देवी दर्शन कर यज्ञ अनुष्ठान पर शामिल होते हैं। नवरात्र के आठवें दिन महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है। अष्टमी के दिन नगर का पूरा माहौल धार्मिक रहता है। देवी दरबारों में आस्था और भक्ति का संगम दिखाई देता है। बताया जाता है कि दुर्गा जी के इस रूप की पूजा करने से भक्तों को सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैंऔर इससे भक्तों के मन को शांति मिलती है। शहर के दन्तेश्वरी मंदिर के साथ हिंग्लाजीन मंदिरशीतला मंदिरकाली कंकालिन मंदिरविभिन्न दुर्गा मंदिरगायत्री मंदिर तथा शहर के अन्य देवी मंदिरों में सुबह से शाम तक भक्तों की भारी भीड़ रहती है। सार्वजनिक दुर्गा मण्डपों में भी यज्ञ-हवन सम्पन्न किया जाता है।
निशा जात्रा
बस्तर दशहरा के रस्मों में आश्विन माह के अष्टमी तिथि तथा नवमी तिथि को रथ परिक्रमा नहीं होती। इस दिन आँचलिक देवी-देवताओं के सम्मान में बलि देकर प्रसन्न करने का दिन होता है। यह कार्य आधी रात को सम्पन्न किया जाता है। आधी रात को निशा-जात्रा रस्म पर बकरों के अलावा कुम्हड़ा और मछली की बलि दी जाती है। लोगों का मानना है कि इससे अंचल में देवी की कृपा बनी रहती है। यह परम्परा रियासत काल से चली आ रही है। रियासत कालीन बलि की परम्परा में परिवर्तन अवश्य हुए हैं किन्तु पशु बलि आज भी जारी है। इस रहस्यमयी निशा जात्रा में कालान्तर में परिवर्तन करते हुए अब यहाँ 12 बकरों की बलि देने का रस्म बन कर रह गया है। 
अष्टमी की आधी रात दन्तेश्वरी मंदिर में पूजा-अनुष्ठान के बाद मांई जी की डोली को लेकर बाजे-गाजे के साथ पुजारीराजगुरू व अन्य भक्त निशा-जात्रा मंदिर पहुँचते हैंयहाँ पूजा-अनुष्ठान के बाद दोनों देवियों को बकरों की बलि दी जाती है। इस मंदिर में खमेश्वरी देवी का वास माना जाता है। यह मंदिर वर्ष में एक बार खुलता है। मंदिर के मध्य भाग में तिरछा एक खंडित मूर्ति आज भी स्थापित है। मंदिर के भीतर सभी पूजा-पाठ होते हैं किन्तु इस मंदिर में बाह्यबलि की प्रथा है। माना जाता है कि इस मंदिर में माता दन्तेश्वरी तथा माता माणिकेश्वरी देवी का निवास है। जहाँ दन्तेश्वरी और माणिकेश्वरी देवी का वास हो तो फिर राज्य की सभी देवी-देवताओं का वास होना लाजिमी है। रस्म के अनुसार देवी-देवताओं को अर्पित होने वाले 12 काँवड़ अर्थात् 24 मटकियों में बने भोग प्रसाद को बाघनपाल के राजपुरोहित परिवार के लोग आज भी तैयार करते आ रहे हैंजिसे दन्तेश्वरी मंदिर से लेकर जतरा स्थल अर्थात् बलि देने के स्थान तक काँवड़ से पहुँचाया जाता है। परम्परा के अनुसार निशा-जात्रा मंदिर के अलावा स्थानीय अन्य मंदिरों में रस्मों के अनुसार बलि दिए जाने की प्रथा आज भी कायम है। कुछ मंदिरों में सात्विक और प्रतीकात्मक बलि के रूप में कुम्हड़ा बलि देने की प्रथा है। इस बलि को देखने भक्तगण अनेक मंदिरों में पहुँचते हैं।
कुंवारी पूजा विधान
महानवमी पूजन में कुवांरी पूजा के अन्तर्गत नौ कुवांरी कन्याओं एवं एक बालक की पूजा की जाती है। नवरात्र पूजन से जुड़ी कई परंपराएं हैं। जैसे कन्या पूजन। इसका धार्मिक कारण यह है कि कुंवारी कन्याएं माता के समान ही पवित्र और पूजनीय होती हैं। दो वर्ष से लेकर दस वर्ष की कन्याएं साक्षात माता का स्वरूप मानी जाती हैं। यही कारण है कि इसी उम्र की कन्याओं के विधिवत पूजन कर भोजन कराया जाता है। इसे कुंवारी पूजा भी कहा जाता है। नवरात्र में सभी तिथियों को एक-एक और अष्टमी या नवमी को नौ कन्याओं की पूजा होती है।
जोगी उठाई
नवें दिन जोगी के समक्ष इष्ट देवी की पूजा करके जोगी उठाने की रस्म पूरा किया जाता है। जोगी अपने स्थान से उठकर नौ दिनों के योग अनुष्ठान विधान से मुक्त हो जाता है। उसके पहले बिठाई के दिन मावली मंदिर से प्रदाय किए गए खांडा अर्थात् तलवार पूजा-विधान के साथ मूल मंदिर में पुनः स्थापित कर दी जाती है। नौ दिनों तक अनवरत बैठे जोगीनवमी तिथि को संध्या के समय उठकर स्थानीय काली कंकालिनराम मंदिर तथा मावली मंदिर में पूजा-अर्चना करता है। 9 दिनों तक योग की अवस्था में बैठा योगी को पूजा विधान के बाद निर्धारित स्थान से उठाया जाता है। उठाने का कार्य पर्व के पुजारीचालकीमांझीमेम्बरीनगणमान्य नागरिकों और दशहरा समिति के सदस्यों की उपस्थिति में सम्पन्न किया जाता है। जोगी बिठाई के दिन जिस क्रम से मंदिरों के देवी-देवताओं का दर्शन जोगी 9 दिनों के लिए स्थान ग्रहण करता है उसी क्रम में जोगी उठकर देवी-देवताओं का आभार मानते हुए पूजा करता है। मावली मंदिर के खांडा को पुनः स्थापित करता है। वहाँ से लौटकर अपने कुलदेवी की आराधना करता है तथा पर्व के निर्विघ्न सम्पन्न होने के लिए आभार प्रदर्शित करते हुए जोगी उपवास तोड़ता है।
मावली परघाव
दन्तेवाड़ा से मावली देवी आमंत्रण पाकर दशहरा में शामिल होने जगदलपुर डोली पर सवार होकर आती हैंजिन्हें इस खूबसूरत अवसर पर प्रमुख रूप से राज परिवार के सदस्यकुवंर परिवारराजगुरूजनप्रतिनिधिराजपुरोहित अगुवानी करते हैं। इस स्वागत को ही लोकभाषा में परघाव कहा जाता है। मावली देवी की अगुवानी  या स्वागत को ही मावली परघाव कहा जाता है। बस्तर अंचल में मावली देवी के कई स्थानों पर मंदिर है। प्रमख रूप से दन्तेवाड़ाजगदलपुरनारायणपुरमधोताछोटे देवड़ाकौड़ावंडनवागाँवसिवनी आदि गाँवों में मावली के मंदिर स्थापित हैं। नारायणपुर में मावली के नाम से विशाल मेला का आयोजन भी होता है। बस्तर में मावली को प्रमुख देवी के रूप में पूजा की जाती हैऔर कई नामों से भी पुकारा जाता हैउन रूपों में पूजा भी की जाती है। बस्तर अंचल में मावली के नाम से कई गाँव भी बसे हैं।
मावली परघाव का दृश्य आज भी उतना ही बड़ा भव्य होता हैजितना पुरातन काल में होता आया हैवह चाहे दन्तेवाड़ा से जगदलपुर पर्व में सम्मिलित होने के अवसर परविदाई का अवसर हो या फिर जगदलपुर नगर सीमा में आने के बाद परघाव अर्थात् स्वागत का हो यापुनः दशहरा के समापन की अंतिम कड़ी के रूप में  मावली देवी की विदाई और मावली देवी का दन्तेवाड़ा पहुँचने पर स्वागत का अवसर हो। आज भी दशहरा के समस्त कार्यक्रमों में ‘मावली परघाव’ का आकर्षण कुछ ज्यादा ही परिलक्षित होता है।
राजमहल से राजपरिवार देवी की अगुवानी के लिए राजगुरूराजपुरोहितजनप्रतिनिधितथा अन्य गणमान्य नागरिकों के साथ बाजे-गाजे के साथ एक जुलुस की शक्ल में आगे बढ़ते हैं। आतिशबाजी ढोल-नगाड़ों के बीच राज्य के देवी-देवता जुलुस के आगे-आगे होते हैं। कहना होगा की राजपरिवार की कुल देवी तथा राज्य की प्रमुख देवी की अगुवानी में राज्य के अन्य देवी-देवता भी अपने-अपने सेवादारों के साथ अपने-अपने प्रतीक चिन्हों के साथ पहुँचते हैं। लाटबैरकआंगातराशडोलीपालकीकुर्सी इन सभी प्रतीकों के माध्यम से मांई जी का भव्य स्वागत किया जाता है। मांई जी की पालकी तथा मांई दन्तेश्वरी जी का छत्र कुटरूबाड़ा के समीप पहुँचते ही मांई दन्तेश्वरी की पूजा-अर्चना व स्वागत की जाती है। कुटरूबाड़ा से राजपरिवार के सदस्य तथा प्रमुख पुजारी अपने काधों से डोली लेकर राजमहल पहुँचते हैं। मंदिर में पूजा-आराधना के बाद डोली व छत्र को यथोचित स्थान दिया जाता है।
भीतर रैनी 
विजयादशमी को अस्त्र-शस्त्र की पूजन का विधान सम्पन्न कर विजय रथ पर देवी छत्र और खड़्ग के साथ रथ पर सवार होकर मुख्य पुजारी पूर्ववत् मावली मंदिर की प्रदक्षिणा करते हुए परिक्रमा करता है। इस रथ परिक्रमा विधान में चार पहियों के स्थान पर आठ पहियों वाला विशालकाय रथ परिक्रमा के लिए उपयोग में लाया जाता है। इस रथ के आठ काष्ठ पहिए होते हैं। इसके निर्माण में फूलरथ की अपेक्षा अधिक लकड़ी उपयोग में लाया जाता हैतथा बनावट में भी अंतर होता है। विजय पर्व में चलायमान होने के कारण विजय रथ अथवा भीतर रैनी रथ कहा गया है। यह रथ विजयादशमी के दिन अपने पूर्व निर्धारित मार्ग पर ही परिक्रमा करता है। इसे खींचने के लिए कोड़ेनार-किलेपाल परगना के आदिवासियों का विशेष अधिकार होता है।
रथ की परिक्रमा पूर्ण हो जाने के बाद प्रथानुसार इसे देर रात चोरी करके नगर से लगभग 3 किलोमीटर दूर ‘कुमडाकोट’ नामक स्थान पर छुपा दिया जाता है। इस स्थल पर राज्य तथा राज्य के बाहर ओड़िसामध्यप्रदेशमहाराष्ट्र तथा आन्ध्रप्रदेश-तेंलगाना के लगभग तीन हजार से भी अधिक देवी-देवता जुटते हैं। इन सभी देवी-देवताओं के प्रतीकों को एक जगह पर स्थापित करके सम्मान दिया जाता है तथा मांईं जी के साथ-साथ सभी देवी-देवताओं की भी पूजा-आराधना के बाद नए अन्न से बने भोग-प्रसाद अर्पित किया जाता है।
दूसरे दिन राजपरिवार और बस्तर की जनता अपने-अपने देवी-देवताओं के साथ कुम्डाकोट पहुंचते है और राजा अपनी कुल देवी को नया अन्न अर्पित करते हुए जनता के साथ नयाखानी पर्व सम्पन्न करता है। बाहर रैनी के दिन कुम्हड़ाकोट वनक्षेत्र में जहाँ विभिन्न देवी-देवताओं का समारोह स्थल होता है।           
नवाखानी सम्पन्न हो जाने के बाद दन्तेश्वरी मंदिर का प्रमुख पुजारीमांई जी के छत्र के साथ सवार होकर तथा राजपरिवार के सदस्य रथ के सामने अपने वाहन पर सवार होकर आगे-आगे चलते हुए विभिन्न चैक-चैराहों तथा मुख्य मार्गों से होता हुआ राजमहल के सिंहद्धार के समीप पहुंचता है।
काछिन जात्रा 
यह रस्म काछनदेवी को विदाई देने का रस्म हैजहां विधि-विधान से काछिन देवी को पूजा-अर्चना के बाद यथाशक्ति बलि देकर कृतज्ञता भेंट की जाती है। भंगाराम चैक स्थित काछिनगुड़ी के अलावा काछिन जात्रा हेतु गुड़ी से कुछ ही दूरी पर स्थान निर्धारित है। यह स्थान भंगाराम चैक से पथरागुड़ा जाने के मार्ग पर बाँवस मुण्डा तालाब के समीप ही सड़क के किनारे है। जात्रा स्थल में बाजे-गाजे के साथ सिराहाकाछिन देवी अपने प्रतीक चिन्हों के साथ पहँुचते हैं और साथ में स्थानीय देवी-देवता भी अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं।
मुरिया दरबार 
मुर का अर्थहल्बी में प्रारंभ या मूल होता हैअर्थात् इस अंचल में प्राचीन समय से बसे हुए आदिवासी परिवारों के लिए मुर शब्द में साथ इया प्रत्यय लगाने के बाद मुरिया कहलाया। मुरिया अर्थात् मूल निवासी। रियासत काल में आदिवासी संबोधन प्रचलित नहीं था। इसी मूलिया शब्द के अतिशय प्रयोग से मुरिया परिवर्तित हो गया।
मुरिया दरबार का सूत्रपात 8 मार्च 1876 को पहली बार हुआ था। मुरिया दरबार में ग्रामीण और शहरी जनप्रतिनिधियों के बीच आवश्यक विषयों को लेकर चर्चा होती है। रियासत काल में जनता और राजा के मध्य वर्ष में एक बार दरबार के माध्यम से विभिन्न मुद्दों को लेकर विचार-विर्मश हुआ करता था। समस्याओं का समाधान भी त्वरित हुआ करता था। रियासत के मांझीमुखियाकोटवारचालकीनाईकपाईक आदि जनप्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्रों की समस्या दरबार में प्रस्तुत करते थे। इस दरबार पर जन-समस्याओं पर चर्चा की जाती थी। किसी तरह की कठिनाई आने पर उसका हल निकाला जाता था। यह शिकायत अपने क्षेत्र के अलावा राज्य के कर्मचारियों की भी होती थी। कहना होगा कि मुरिया दरबार रियासत काल में एकतंत्रिय न्याय-प्रणाली के रूप में स्थापित थी जो रियासत की जनता को स्वीकार्य होती थी। यह परम्परा आज भी निर्बाध रूप से जारी है।
 कुटुम जात्रा
दशहरा पर्व के अंतिम कड़ी दन्तेश्वरी मांई जी के छत्र तथा मावली की डोली के विदाई के पूर्व परम्परा के अनुसार दशहरा में शामिल होने आए विभिन्न स्थानों के देवी-देवताओं को कुटुम्ब जात्रा पूजा विधान के बाद बिदाई दी जाती है। इस दौरान ग्राम देवी-देवताओं को बिदाई देते हुए उनके पुजारियों को नवीन वस्त्र व भेंट देकर सम्मानित किया जाता है।
 
कुटुम जात्रा में ग्राम देवी-देवताओं के अलावा प्रत्यक्षअप्रत्यक्षज्ञात अज्ञात जितने भी देवी-देवता शामिल हुएउन्हें इस पावन अवसर पर ससम्मान विधिवत पूजा-अर्चना और शक्ति के अनुसार बलि दिया जाता है। आमंत्रित देवी-देवताओं को एक जगह कुटुम्ब जात्रा आयोजित करके एकत्र किया जाता है। पर्व के दौरान जानी-अनजानी गलतियों के लिए क्षमा-याचना भी की जाती है और राज्य की सुखसमृद्धि की कामना की जाती है। पुनः ग्राम देवी-देवताओं के प्रति आभार ज्ञापित करते हुए सार्वजनिक रूप से बलि देकर देवी-देवताओं की ससम्मान विदाई दी जाती है।                    
दन्तेश्वरी एवं मावली जी की विदाई 
अत्यन्त महत्वपूर्ण और पवित्र माने जाने वाले दन्तेश्वरी मांई और मावली मांई की विदाई पूजा विधान के अंतिम रस्म को भी पूरी भव्यता के साथ सम्मानपूर्वक ढंग से आयोजित किया जाता है। इस पवित्र रस्म में जिस तरह मावली परघाव के दिन मांई जी की छत्र और डोली की पूरी भव्यता के साथ स्वागत किया जाता हैउसी सम्मान और आदर के साथ भव्य रूप देकर एक शोभायात्रा के रूप में विदाई की जाती है।
लगभग एक सप्ताह तक जगदलपुर में रहने के पश्चात् दन्तेवाड़ा के लिए सम्मान पूर्वक विदाई दी जाती है। परम्परा के अनुसार जिस भव्यता के साथ मावली परघाव को मांई जी की स्वागत की जाती है उसी भव्यता के साथ ही विदाई भी दी जाती है। दशहरा के समापन की यह रस्म पूरी भव्यता के साथ सम्पन्न होती है। विशाल मंच को फूलों से सजाकर छत्र और डोली को मंच प्रदान किया जाता है। दन्तेवाड़ा तथा जगदलपुर के दन्तेश्वरी मंदिर के प्रमुख पुजारीराजपरिवारराजपुरोहितराजगुरूजनप्रतिनिधिप्रशानिक अधिकारीदशहरा समिति के पदाधिकारी,  समाज प्रमुख सहित अन्य बड़ी संख्या में लोग उपस्थित होते हैं। मांई जी के सम्मान में पुलिस बैंड के घ्वनि के बीच सशस्त्र बल के द्वारा सलामी दी जाती है।
श्रमसहकार का दुर्लभ प्रमाण 
बस्तर दशहरा रथ निर्माण के संदर्भ में उक्ताशय उल्लेखनीय है। 75 दिनों तक चलने वाले विश्व के इस विशिष्ट महापर्व बस्तर दशहरा में प्रयुक्त होने वाला विशालकाय काष्ठ रथ प्रतीक है। आंचलिक श्रम साधकों के कला प्रेम और बस्तर की अराध्या मांँ दन्तेश्वरी के प्रति उनकी समर्पित शक्ति भावना का दुमंजिले भवन की भांति आँचलिक सौन्दर्य बोध के अनुरूप माटी पुत्रों की महिमा बखानती यह काष्ठ कृति अपनी रचना वैशिष्ट्य के कारण शताब्दियों से विश्व के कलाधर्मियों के लिए आश्चर्य का विषय है।
इस विशालकाय रथ की परिकल्पना किसी मानद विश्वविद्यालय से उपाधि प्राप्तकिसी यंत्री विशेष के द्वारा नहीं की गई है वरन् प्रकृति की गोद में साहचर्य का धर्म जीवन पर्यन्त निभाने वाले उन धरती पुत्रों के द्वारा की गई हैजिनके अन्तस में कोई कालजयी आकार आराधना और अनाशक्ति के बल पर रूपायित होता है।
सहयोगश्रम सहकार और सामाजिक सरोकार की अनुभूति से ओतप्रोत बस्तर दशहरा रथ का निर्माण वास्तव में एक कर्मयज्ञ हैजिसमें 75 दिनों तक श्रम के स्वेद बिन्दुओं की अहर्निश समिधा पड़ती रहती हैगीता का यह श्लोक वस्तुतः इस हेतु भी तो है -
‘‘कर्मण्ये वाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन्’’
विश्व में सबसे अधिक 75 दिनों तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध दशहरा पर्व अपनी उत्सव धर्मिता एवं पर्व वैशिष्ट्य के कारण राष्ट्रीयअन्तर्राष्ट्रीय पर्वों के मध्य अलग से पहचाना जाता रहा है।
रथ निर्माण से लेकर उसके संचालन तक का प्रत्येक कार्य आदिवासियों में बंटा हुआ है। अपने-अपने रचना कौशल में पारंगत ग्राम निवासी इस विशालकाय रथ के विभिन्न अंगों को आकार देते चलते हैं। रथ निर्माण की पूरी प्रक्रिया तकनीक के दृष्टि से भी अपने आप में संपूर्ण है।
रथ निर्माण पश्चात् सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य होता हैरथ की सुरक्षित परिक्रमा। यूं तो 6 दिनों तक चलने वाले फूल रथ को सियाड़ी के छाल से बने मोटे रस्से से बांधकर विभिन्न ग्रामों के मांझियों के निर्देशानुसार ग्रामीण खींचते हैं। कभी-कभी उन्हें निर्देशित करने के कार्य में पटवारी तथा राजस्व निरीक्षक को भी अवसर दिया जाता है। भीतर रैनी व बाहर रैनी के दिन विजय रथ जो कि आठ चक्कों का विशालकाय रथ होता हैइसे खींचने की जिम्मेदारी ग्राम किलेपाल परगना के माड़िया आदिवासी का होता है जिसे अपना परम्परागत अधिकार मानते आ रहे हैं। वैसे भी भीतर रैनी के दिन विशालकाय रथ को राजमहल के सामने से नगर परिक्रमा कर लेने के पश्चात् दो किलोमीटर दूर खींचकर कुम्हड़ाकोट ले जाना होता हैजहाँ से बाहर रैनी के दिन रथ पुनः वापस खींचकर मूल स्थान में लाया जाता है। इस दरमियान लगने वाले श्रम शक्ति सहयोग में अनिवार्य एक रूपताअनुशासन की आवश्यकता होती हैजिसे माड़िया आदिवासी बड़ी कुशलता से अंजाम देते हैं।
कहना होगा कि दशहरा पर्व के सम्पूर्ण संचालन में ग्रामीणों की सम्मानजनक भागीदारी होती है। पर्व की सम्पूर्ण अवधि के दौरान बस्तर का एक आम आदिवासी यह अनुभव करता है कि वह सम्पूर्ण आयोजन का अविभाज्य अंग है। इस दूरदृष्टि का महत्व कुछ कम नहीं है।


रूद्र नारायण पाणिग्रही

(सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी, जगदलपुर, छत्तीसगढ़ शासन
लेखक, रंगकर्मी एवं कवि)
साभार- sahapedia.org
#बस्तर दशहरा
#बस्तर की बात
#कृष्णधरशर्मा
#समाज की बात
#samajkibaat
#samaj ki baat


गुरुवार, 19 मार्च 2020

क्यों और कैसे शुरू हुआ भूमकाल विद्रोह


मुरिया विद्रोह के अंत होने के बाद राजा भैरमदेव ने बस्तर पर राज किया, बस्तर की जनता को भैरमदेव पसंद नही थे, कुछ विद्रोहो के बाद बिल्कुल भी नही, उन्हें भैरमदेव के भाई कालेन्द्र सिंह पसंद थे। सम्पूर्ण बस्तर भैरमदेव  से ज्यादा कालेन्द्र सिंह का सम्मान करती थी, वे उस समय बस्तर के दीवान थे और आदिवासिओ पर प्रेम प्राप्त करने वाले वे एक मात्र सफल दीवान थे।
राजा भैरमदेव की 2 पत्नियां थी, किन्तु राजा का कोई पुत्र प्राप्त नही हुआ था, तो कालेन्द्र सिंह अपने आप को भावी  राजा के रूप में देखते थे। राजा भैरमदेव के अंतिम दिनों में उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई, जो कालेन्द्र सिंह को राजा बनने में एक बाधा प्रतीत हुई तो उन्होंने कुछ आदिवासी नेताओ को बुला कर यह अफवाह फैला दी कि कुंवर रुद्र प्रताप सिंह में राजा के अंश नही है और वे राजा बनने के योग्य नही है, जिसका समर्थन राजा की दूसरी पत्नी ने किया। इस बात से आदिवासिओ में रुद्र कुंवर के प्रति नफरत पैदा कर दी गई। राजा के अंतिम दिनों और परिस्तिथियों को देखते हुए किशोर रुद्र प्रताप को राजा घोषित कर दिया गया और इस बात से आहत होकर कालेन्द्र सिंह ने राजा के खिलाफ षड्यंत्र रचना चालू कर दिया।
राजा होने में बावजूद रुद्र प्रताप, कालेन्द्र सिंह से डरते थे। इस डर को मिटाने में लिए उन्होंने अपने पिता की तरह अंग्रेजों से हाथ मिला लिया और कालेन्द्र सिंह को दीवान पद से हटा दिया और पंडा बैजनाथ को नया दीवान बना दिया जो अंग्रेजों के चापलूस थे। इस फैसले ने आदिवासिओ को राजा के विरुद्ध जाने पर मजबूर कर दिया और विद्रोह को चिंगारी दी। इन परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए कालेन्द्र सिंह ने भूमकाल की भूमिका रची और उन्होंने नेतानार गांव के एक उत्साह से भरे युवक जिसे बाहरी लोगों से नफरत थी , गुण्डाधुर को युद्ध के नेतृत्व की लिए चुना। और आगे की रणनीति तैयार की।
एक उम्दा रणनीतिकार  नेतानार का युवा गुण्डाधुर,
राजा और अंग्रेज के खिलाफ गुण्डाधुर ने अलग-अलग जनजातियों से नेता चुन कर पूरे बस्तर को एक धागे में बांध दिया। इन नेताओं ने संगठन बनाये जो सभी जगह से विद्रोह का नेतृत्व कर सके, जिसमे डेब्रिधुर, सोनू माझी, मुंडी कलार, मुसमी हड़मा, धानु धाकड़, बुधरु और बुटुल थे जो गुण्डाधुर के विश्वसनीय थे। इन्होंने गांव-गांव जा कर लोगो को एकत्रित किया। विरोध चिन्ह के रूप में डारा-मिरी को उपयोग किया गया, जिसमें आम की टहनी पर लाल मिर्च को बांध दिया जाता था।
जनवरी 1910 में ये सारे संगठन सक्रिय हो चुके थे। 2 फरवरी 1910 को पुसपल के बड़े बाजार में बाहरी व्यपारियो को मारा गया, 5 फरवरी को पूरा बाजार लूट लिया गया और आदिवासियों में बटवा दिया गया। गुण्डाधुर ने ऐसे बहुत बाजार को लुटवा कर बटवा दिया। 13 फरवरी तक लगभग दक्षिण-पश्चिम बस्तर गुण्डाधुर के समर्थकों के कब्जे में थी। नेतानार का एक साधारण युवा अद्भुत संगठन करता सिद्ध हुआ। ये बात अंग्रेजो तक पहुच चुकी थी, अंग्रजो में सैन्य टुकड़ी के साथ कप्तान गेयर को राजा और दीवान की मदत के लिए भेजा। राजा, पंडा बैजनाथ और गेयर ने सभी आदिवासिओ को शांत करने की नीतियां बनाई।
22 फरवरी को एक विरोध में 15 मुख्य क्रांतिकारी नेता गिरफ्तार किये गए, परंतु अंग्रेज सैनिक गुण्डाधुर को पकड़ना छोड़ उनका चेहरा भी नही देख पाए। कप्तान गेयर को गुण्डाधुर के साहस का अनुमान हो गया था। गेयर ने बस्तर की माटी की कसम कहते हुए सारे अत्याचार को खत्म करने की घोषणा की, जो अंत मे एक छलावा निकला ताकि वे गुण्डाधुर और उनके समर्थक को पकड़ सके। इसके बाद विद्रोह और बढ़ गया, महीनों तक गुण्डाधुर ने हर छोटी- बड़ी लड़ाइयों का नेतृत्व खुद किया, गेयर ने गुण्डाधुर को पकड़ने के कड़े निर्देश दिए। यह लड़ाइयों का क्रम काफी दिनों तक यूँ ही चलता रहा। करीब 14-15 लड़ाइयों में विजयी होने के बाद गुण्डाधुर ने कप्तान गेयर पर हमला कर दिया पर गेयर छिप कर भाग निकला
राजाअंग्रेजदीवान और अंग्रेजी सैनिक गुण्डाधुर के नाम से कांप उठते थे। पहली बार महीनों तक किसी आदिवासी ने अंग्रेजी रणनीतियों को भेदते हुए अपना परचम लहराया था।
24 मार्च 1910 को गुण्डाधुर और उनके समर्थक नेतानार में सारे लड़ाइयों का उत्साह मनाने के लिए एकत्रित हुए।  सोनू मांझी जो गुण्डाधुर के विश्वनीय थे, उसे अंग्रजो ने पैसे और सत्ता के लालच में खरीद लिया था। सभी आदिवासी युद्ध से थक चुके थे, भर पेट भोजन और महुवे के नशे में अपना संयम खो चुके थे। तब सोनू मांझी ने मौके का फायदा उठाते हुए, सारी जानकारी गेयर को दे दी। 25 मार्च को सुबह बहुत मात्रा में अंग्रेज सैनिक बदुको के साथ नेतानार के तरफ बढ़ गए , और शुरुवाती कस्बो में आदिवासियों पर गोली चलाना चालू कर दिया, गोलियों के आवाज़ ने गुण्डाधुर को सचेत कर दिया और वे बाकी लोगों को सचेत करने लग गए परंतु कोई धनुष-बाण छोड़ खुद खड़े होने लायक नही थे। गुण्डाधुर ने अपनी तलवार उठायी और घने जंगलों की ओर बढ़ गए , वे जानते थे कि उनके पकड़े जाने से महान भूमकाल का पूर्ण अंत हो जाएगा।
गेयर ने सभी आदिवासिओ पर देखते ही गोली चलाने और प्रमुख नेताओं को बंदी बनाने का हुक्म दिया। 21 माटी पुत्र शहीद हो गए,  डेब्रिधुर और उनके प्रमुख 7 क्रांतिकारी को बंदी बना लिया गया जिसमें माड़िया मांझी भी शामिल थे , जिन्हें कुछ दिन बाद नगर के बीच इमली के पेड़ पर फांसी दे दी गयी। जिससे भूमकाल शांत हो चुका था।
क्या हुआ भूमकाल की शांति के बाद ?
इन सारी घटनाओ के बाद कालेन्द्र सिंह के मित्रो ने आदिवासियों के साथ मिलकर अंग्रेजो के साथ संधि की जिसमे अवेध घुसपैठ, आदिवासिओ पर अत्याचार का अंत और बस्तर की भूमि पर शांति की स्थापना थी। जो गुण्डाधुर का स्वप्न्न था।
1910 के इस महान घटना में न गुण्डाधुर मारे गए न पकड़े गए, अंग्रेजी फाइल यह कह कर बन्द कर दी गयी कि कोई बताने के समर्थ नही है कि गुंडाघुर कौंन और कहां है। बस्तर के जंगल के चीखते सन्नाटे आज भी अपने पुत्र गुण्डाधुर का इंतज़ार कर रही है।
वर्तमान के छत्तीसगढ़ में गुण्डाधुर स्मृति में साहसिक कार्य एवं खेल क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए गुण्डाधुर सम्मान स्थापित किया गया है।
 साभार- कोसल कथा 
बस्तर 
बस्तर का इतिहास
बस्तर की बात 


बस्तर की अर्थव्यवस्था


अर्थव्यवस्था
बस्तर जिले की मुख्य फसल धान है| खरीफ सीजन के दौरान धान मुख्य रूप से उगाया जाता है क्योंकि बारिश वाली फसल में 2.39 लाख हेक्टेयर क्षेत्र होता है लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में इस फसल की उत्पादकता 08.53 क्विंटल / हेक्टेयर है। बस्तर जिले में सिंचित क्षेत्र (1.67%) और उर्वरक उपयोग (4.6 किलोग्राम / हेक्टेयर) बहुत कम है, जो फसल को पर्याप्त पोषक तत्व प्रदान करने के लिए अपर्याप्त है| मक्का दलहन मुख्यतः रबी फसल है |
बस्तर में आजीविका का पैटर्न परंपरा द्वारा निर्धारित किया जा रहा है। आज भी, कृषि प्रथा पारंपरिक हैं। लकड़ी के हल का उपयोग अधिक  है जबकि लोहे के हल की संख्या नगण्य है। 
ट्रैक्टरों की संख्या नगण्य है जबकि बैल गाड़ियां सभी व्यापक हैं। पारंपरिक कृषि उपकरणों के उपयोग ने कृषि के उत्पादन को कम कर दिया है। यहां उगाई गई खरीफ फसलें  धान, उड़द, अरहर, ज्वार और मक्का हैं। रबी फसलों में  तिल, अलसी , मूंग, सरसों और चना  शामिल हैं। वन उत्पादन और अन्य वन-संबंधित कार्यों की संग्रह और बिक्री कम कृषि आय की पूरक है।
अपने जल संसाधनों में असाधारण रूप से भाग्यशाली, इस क्षेत्र में अच्छी बारिश होती है और अपर्याप्त इलाके के कारण तेजी से चलती है। वर्षा जल संचयन की संभावना है|
बस्तर जिले की अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधारकृषि और वनोपज संग्रहण है । कृषि में प्रमुख रूप से धान ,मक्का की फसल का और गेहूज्वारकोदो कुटकीचनातुअरउड़दतिलराम तिलसरसों सहायक रूप से उत्पादन किया जाता है । कृषि के अलावा पशुपालन, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन भी सहायक भूमिका निभाते हैं ।
वनोपज संग्रहण यहाँ के ग्रामीणों के जीवन उपार्जन के प्रमुख श्रोतों में से एक है । वनोपज संग्रहण में कोषा (तसर), तेंदू पत्ता, लाख, धुपसाल बीज, इमली, अमचूर, कंद, मूल ,औषधियां, प्रमुख हैं। पत्थर, गिट्टी, मुरुम, फर्शी पत्थर, रेत का खनन भी अर्थ्वाव्स्था के सहयोगी तत्त्व हैं।
साभार- bastar.gov.in

बस्तर का इतिहास

बस्तर, भारत के छत्तीसगढ़ प्रदेश के दक्षिण दिशा में स्थित जिला है। बस्तर जिले एवं बस्तर संभाग का मुख्यालय जगदलपुर शहर है। यह पहले दक्षिण कौशल नाम से जाना जाता था। ख़ूबसूरत जंगलों और आदिवासी संस्कृति में रंगा ज़िला बस्तर, प्रदेश‌ की सांस्कृतिक राजधानी के तौर पर जाना जाता है। 6596.90 वर्ग किलोमीटर में फैला ये ज़िला एक समय केरल जैसे राज्य और बेल्जियम, इज़राइल जैसे देशॊ से बड़ा था। ज़िले का संचालन व्यवस्थित रूप से हो सके इसके लिए 1999 में इसमें से दो अलग ज़िले कांकेर और दंतेवाड़ा बनाए गए। बस्तर जिला छत्तीसगढ़ प्रदेश के कोंडागांव, दन्तेवाडा ,सुकमा, बीजापुर जिलों से घिरा हुआ है।  बस्तर का ज़िला मुख्यालय जगदलपुर, राजधानी रायपुर से 305 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 
बस्तर जिले की जनसंख्या वर्ष 2011 में 14,13,199 ,वर्तमान कोंडागांव जिले को सम्मिलित करते हुए थी। जिसमे 6,98,487 पुरुष एवं 7,14,712 महिलाएं थी । बस्तर की जनसन्ख्या मे 70 प्रतिशत जनजातीय समुदाय जैसे गोंड, मारिया, मुरिया, भतरा, हल्बा, धुरुवा समुदाय हैं। बस्तर जिला को सात विकासखण्ड / तहसील जगदलपुर, बस्तर, बकावंड, लोहंडीगुडा, तोकापाल, दरभा और बास्तानार में विभाजित किया गया है। बस्तर जिला सरल स्वाभाव जनजातीय समुदाय और प्राकृतिक सम्पदा संपन्न हुए प्राकृतिक सौन्दर्य एवं सुखद वातावरण का भी धनी है।
उड़ीसा से शुरू होकर दंतेवाड़ा की भद्रकाली नदी में समाहित होने वाली करीब 240 किलोमीटर लंबी इंद्रावती नदी बस्तर के लोगों के लिए आस्था और भक्ति की प्रतीक है। इंद्रावती नदी के मुहाने पर बसा जगदलपुर एक प्रमुख सांस्कृतिक एवं हस्तशिल्प केन्द्र है। यहां मौजूद मानव विज्ञान संग्रहालय में बस्तर के आदिवासियों की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं मनोरंजन से संबंधित वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। डांसिंग कैक्टस कला केन्द्र, बस्तर के विख्यात कला संसार की अनुपम भेंट है। बस्तर जिले के लोग दुर्लभ कलाकृति, उदार संस्कृति एवं सहज सरल स्वभाव के धनी हैं।
बस्तर जिला घने जंगलों, ऊँची, पहाड़ियों, झरनों, गुफाओ एवं वन्य प्राणियों से भरा हुआ है। बस्तर महलबस्तर दशहरादलपत सागर, चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़ जलप्रपात, कुटुमसर और कैलाश‌ गुफ़ा आदि पर्यटन के मुख्य केंद्र हैं|
ऐतिहासिक रूप से क्षेत्र महाकाव्य रामायण में दंडकारण्य और महाभारत में कोसाला साम्राज्य का हिस्सा है।
बस्तर  रियासत  1324 ईस्वी के आसपास स्थापित हुई थी, जब अंतिम काकातिया राजा, प्रताप रुद्र देव (12 9 0-1325) के भाई अन्नाम देव ने वारंगल को छोड़ दिया और बस्तर में अपना शाही साम्रज्य स्थापित किया | महाराजा अन्नम देव के बाद महाराजा हमीर देव, बैताल देव, महाराजा पुरुषोत्तम देव, महाराज प्रताप देव ,दिकपाल देव ,राजपाल देव ने शासन किया |बस्तर शासन की प्रारंभिक राजधानी बस्तर शहर में बसाई गयी, फिर जगदलपुर शहर में स्थान्तरित की गयी। बस्तर में अंतिम शासन महाराजा प्रवीर चन्द्र भंज देव (1936-1948) ने किया। महाराजा प्रवीर चन्द्र भंज देव बस्तर के सभी समुदायमुख्यतः आदिवासियों के बीच बेहद लोकप्रिय थे। दंतेश्वरी, जो अभी भी बस्तर क्षेत्र  की आराध्य देवी है, प्रसिद्ध दांतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा में उनके नाम पर रखा गया है।
1948 में भारत के राजनीतिक एकीकरण के दौरान बस्तर रियासत को भारत में विलय कर दिया गया 
साभार- bastar.gov.in

रविवार, 15 मार्च 2020

मंगलवार, 3 मार्च 2020

गांधी के सपनों का भारत-महेश प्रसाद सिंह

 "गांधी महराज के धनि औ दीन शिष्य अनेक  

पर एक ऐसी बात है जिसमें सभी हैं एक    

हम पेट के हित दीन-पीड़न में नहीं अभ्यस्त   

झुकते न धनियों से कभी न होते भय से त्रस्त" 

-रवींद्रनाथ टैगोर (गांधी के सपनों का भारत-महेश प्रसाद सिंह)



#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात

 


शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

बैंकों के विलय का औचित्य


वर्तमान में ही रिजर्व बैंक ने व्यवस्था कर रखी है कि निजी और सरकारी बैंकों को प्राथमिकता वाले क्षेत्र को ऋण देना अनिवार्य होता है। इस अनिवार्यता को ग्रामीण क्षेत्र में विकास आदि पर लागू किया जा सकता था। क्योंकि रिजर्व बैंक इस कार्य को करने में असफल रहा इसलिए सरकार ने इन बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और हम कुएं से निकलकर खाई में जा गिरे। कुएं से निकले इसलिए कि ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाओं का विकास हुआ लेकिन खाई में गिरे इसलिए कि सरकारी बैंकों में लगाई गई आम आदमी की पूंजी का भक्षण सरकारी कर्मियों ने कर लिया। इसलिए सरकार को चाहिए की विलय जैसे दिखावा करने के स्थान पर सभी सरकारी बैंकों का पूर्ण निजीकरण कर दें और रिजर्व बैंक इन्हें मजबूर करे कि यह ग्रामीण एवं प्राथमिकता वाले क्षेत्र में पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराए।
दिवर्ष 1969 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। उनका मानना था कि इन बैंकों पर निजी उद्यमियों का वर्चस्व है और ये जनता के पैसे को अपने व्यक्तिगत काम में ले रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तथा गरीब लोगों को बैंक की सुविधा उपलब्ध कराने में इनकी रुचि नहीं है। इसमें कोई संशय नहीं कि राष्ट्रीयकरण के बाद सरकारी बैंकों की शाखाओं का ग्रामीण क्षेत्रों में भारी विस्तार हुआ है और आम आदमी के लिए बैंक तक पहुंचना आसान हो गया है। इस दृष्टि से राष्ट्रीयकरण को सफल मानना चाहिए। लेकिन राष्ट्रीयकरण के बीते 50 सालों में दूसरी समस्या उत्पन्न हो गई है।
इस लम्बी अवधि में सरकार ने इन बैंकों में जो भी पूंजी का निवेश किया है उसका पूरी तरह क्षरण हो चुका है। वर्ष 2014 से 2019 के बीच केंद्र सरकार ने लगभग 250 करोड़ रुपए का निवेश इन बैंकों में किया है। आज के दिन इन सभी सरकारी बैंकों की सम्मिलित मार्केट कैपिटलाइजेशन यानि इनके समस्त शेयरों की शेयर बाजार में कुल मूल्य लगभग 300 करोड़ रुपए है। अर्थ हुआ कि पिछले 50 वर्षों में देश ने इन बैंकों में जो विशाल पूंजी निवेश किया है वह उसमें से कुल 50 करोड़ रुपए आज बचा है और शेष का क्षरण हो चुका है। यह क्षरण मूलत: इसलिए हुआ है कि इनके द्वारा भारी घाटा खाया जा रहा है।
सरकार इनमें लगातार पूंजी डाल रही है और इनके द्वारा लगातार खाए जा रहे घाटे में यह यह पूंजी समाप्त होती जा रही है। यह घाटा मूलत: इसलिए हो रहा है कि सरकारी बैंक के कर्मियों के व्यक्तिगत स्वार्थ हो और बैंक के स्वार्थों में समन्वय नहीं है। ये अलग-अलग दिशा में चलते हैं। सरकारी बैंक के मुख्य अधिकारी के लिए लाभप्रद होता है कि वह घूस लेकर अथवा राजनीतिक दबाव में ऐसे लोगों को लोन दे जो कि बाद में खटाई में पड़ जाए। ऐसा करने से मुख्य अधिकारी को स्वयं लाभ होता है जबकि बैंक को घाटा होता है। निजी बैंकों में यह समस्या उत्पन नहीं होती है क्योंकि बैंक के मुख्य अधिकारी द्वारा घटिया लोन देने से बैंक को जो घाटा लगता है वह भी उसी मुख्य अधिकारी का होता है। ये एक दिशा में चलते हैं। सरकारी बैंकों के मालिक यानि सरकार और मुख्य अधिकारी के उद्देश्यों में समन्वय नहीं होता है जबकि निजी बैंकों के मालिक और मुख्य अधिकारी एक ही व्यक्ति होते हैं इसलिए उनके उद्देश्यों में समन्वय रहता है। इसलिए निजी बैंकों द्वारा घटिया लोन कम दिए जाते हैं।
इस समस्या का हल सरकारी दायरे में नहीं दिखता है। प्रमाण यह है कि बीते छ: वर्षों में एनडीए सरकार ने सरकारी बैंकों के कार्य में हस्तक्षेप करना कम कर दिया है परन्तु इनकी स्थिति पूर्ववत बिगड़ती ही जा रही है। अर्थ हुआ कि राजनीतिक दखल को इन बैंकों की खस्ता हालत का कारण नहीं कहा जा सकता है। इनके घाटे अपनी संरचना के कारण है जिसमें मुख्य अधिकारी के लिए बैंक को घाटे में डालकर अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को सिद्ध करना संभव होता है। इसी दृष्टि से सरकार द्वारा गठित पी.जे. नायक समिति ने 2014 में संस्तुति की थी कि बैंकों का निजीकरण कर दिया जाए।
वित्त मंत्री ने बजट में इन बैंकों के निजीकरण करने के स्थान पर 10 बड़े सरकारी बैंकों का आपस में विलय करके इन्हें 4 बड़े बैंकों में बनाने का निर्णय लिया है। लेकिन यदि सरकारी बैंक के मुख्य अधिकारी के व्यक्तिगत उद्देश्य बैंक को घाटे में डालकर सिद्ध होते हैं तो विलय से इस समस्या का हल नहीं हो सकता है। विलय से सिर्फ इतना ही हो सकता है कि जो मुख्य अधिकारी ज्यादा घटिया था उसकी तुलना में अब कम घटिया मुख्य अधिकारी उस बैंक का संचालन करेगा। सभी मुख्य अधिकारी मूलरूप से एक से हैं जैसे सभी पॉकेटमार मूलरूप से एक से होते हैं। प्रमाण यह है कि सभी बैंकों की सम्मिलित पूंजियां शून्य हो गई है। यही कारण है कि बीते 50 वर्षों में जनता की गाड़ी कमाई से किया गया निवेश आज शून्य हो गया है। इसमें लाभ और घाटे में चलने वाले सभी बैंक सम्मिलित है।
जानकार बताते हैं कि विलय के पीछे सरकार की मंशा है कि जो पूंजी निवेश किया जाए वह बजट में न दिखे। यदि लाभ में चल रहे सरकारी बैंक द्वारा सरकार को डिविडेंड दिया जाए और उस डिविडेंड की रकम से सरकार घाटे में चलने वाली सरकारी बैंक में निवेश करे तो यह लेन-देन सरकार के बजट में दीखता है। तुलना में यदि घाटे में चलने वाले बैंक का लाभ में चलने वाले बैंक से विलय कर दिया जाए तो वही रकम हस्तांतरित होती है लेकिन वह रकम बजट के बाहर हो जाती है। लाभ में चलने वाले बैंक द्वारा कमाई गई रकम घाटे में चलने वाले बैंक की शाखाओं को जीवित रखने में लग जाती है। यह लेन-देन बजट से बाहर रहता है। अत: विलय से सरकारी बैंकों के कार्य में न कोई सुधार होगा और न ही अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।
इस परिप्रेक्ष्य में हमें 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के निर्णय पर पुन: विचार करना चाहिए। उस समय उद्देश्य था कि बैंकों द्वारा छोटे उद्योगों और ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं उपलब्ध कराई जाए। प्रश्न यह है कि इस कार्य को रिजर्व बैंक द्वारा निजी बैंकों से क्यों नहीं कराया जा सका था? रिजर्व बैंक के पास पर्याप्त अधिकार है। वह निजी बैंकों को मजबूर कर सकता है कि वे विशेष ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी शाखाएं खोले। वर्तमान में ही रिजर्व बैंक ने व्यवस्था कर रखी है कि निजी और सरकारी बैंकों को प्राथमिकता वाले क्षेत्र को ऋण देना अनिवार्य होता है। इस अनिवार्यता को ग्रामीण क्षेत्र में विकास आदि पर लागू किया जा सकता था।
क्योंकि रिजर्व बैंक इस कार्य को करने में असफल रहा इसलिए सरकार ने इन बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और हम कुएं से निकलकर खाई में जा गिरे। कुएं से निकले इसलिए कि ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाओं का विकास हुआ लेकिन खाई में गिरे इसलिए कि सरकारी बैंकों में लगाई गई आम आदमी की पूंजी का भक्षण सरकारी कर्मियों ने कर लिया। इसलिए सरकार को चाहिए की विलय जैसे दिखावा करने के स्थान पर सभी सरकारी बैंकों का पूर्ण निजीकरण कर दें और रिजर्व बैंक इन्हें मजबूर करे कि यह ग्रामीण एवं प्राथमिकता वाले क्षेत्र में पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराए।
 डॉ. भरत झुनझुनवाला (साभार-देशबंधु)



बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

इस राह से गुजरते हुए- दिवाकर मुक्तिबोध

 "इसमें दो राय नहीं कि राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में घी-दूध की नदियां बहने लगी हैं। धन का अपार सैलाब उमड़ रहा है। लेकिन, यह कुछ हजार लोगों की मुट्ठियों में कैद है। हजारों करोड़ रुपये के निर्माण एवं विकास कार्यों में मलाई खाने का अवसर इन्हीं लोगों को मिल रहा है। स्व. राजीव गांधी की वह ऐतिहासिक स्वीकारोक्ति राज्य के संदर्भ में अभी भी एकदम सटीक है कि विकास के मद में राज्य (उन्होंने केंद्र कहा था) से चला एक रुपया गरीब गांव के किसी गरीब की कुटिया तक पहुंचते पहुंचते मात्र 15 पैसे रह जाता है। भ्रष्टाचार की ऐसी कथा शायद ही किसी और राज्य में सुनाई दें।" (इस राह से गुजरते हुए- दिवाकर मुक्तिबोध)




#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात