नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

गुरुवार, 14 मई 2020

बस्तर की संस्कृति और विरासत

बस्तर की कुछ परम्पराएं तो आपको एक रहस्यमय संसार में पंहुचा देती हैं। वह अचंभित किए बगैर नहीं छोड़ती। वनवासियों के तौर तरीके हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि चांद पर पहुंच चुकी इस दुनिया में और भी बहुत कुछ है, जो सदियों पुराना है, अपने उसी मौलिक रूप में जीवित है। बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक दशहरे को देशभर में उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस दिन भगवान राम ने लंकापति रावण का वध कर देवी सीता को उसके बंधन से मुक्त किया था. इस दिन रावण का पुतला जलाकार लोग जश्न मनाते हैं. लेकिन भारत में एक जगह ऐसी है जहां 75 दिनों तक दशहरा मनाया जाता है लेकिन रावण नहीं जलाया जाता है.
यह अनूठा दशहरा छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाके बस्तर में मनाया जाता है और बस्तर दशहराके नाम से चर्चित है. इस दशहरे की ख्याति इतनी अधिक है कि देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ-साथ विदेशों से भी सैलानी इसे देखने आते हैं. बस्तर दशहरे की शुरुआत श्रावण (सावन) के महीने में पड़ने वाली हरियाली अमावस्या से होती है. इस दिन रथ बनाने के लिए जंगल से पहली लकड़ी लाई जाती है. इस रस्म को पाट जात्रा कहा जाता है. यह त्योहार दशहरा के बाद तक चलता है और मुरिया दरबार की रस्म के साथ समाप्त होता है. इस रस्म में बस्तर के महाराज दरबार लगाकार जनता की समस्याएं सुनते हैं. यह त्योहार देश का सबसे ज्यादा दिनों तक मनाया जाने वाला त्योहार है.


मिस्त्र के पिरामिड़ तो पूरी दुनिया का ध्यान खींचते हैं, दुनिया के आठ आश्चर्य में शामिल हैं। लेकिन बस्तर में भी कुछ कम अजूबे नहीं है। यहां भी एक ऐसी ही अनोखी परंपरा है, जिसमें परिजन के मरने के बाद उसका स्मारक बनाया जाता है। भले ही वह मिस्त्र जैसा भव्य न हो, लेकिन अनोखा जरूर होता है। इस परंपरा को मृतक स्तंभ के नाम से जाना जाता है। दक्षिण बस्तर में मारिया और मुरिया जनजाति में मृतक स्तंभ बनाए बनाने की प्रथा अधिक प्रचलित है। स्थानीय भाषा में इन्हें गुड़ीकहा जाता है। प्राचीन काल में जनजातियों में पूर्वजों को जहां दफनाया जाता था वहां 6 से 7 फीट ऊंचा एक चौड़ा तथा नुकीला पत्थर रख दिया जाता था। पत्थर दूर पहाड़ी से लाए जाते थे और इन्हें लाने में गांव के अन्य लोग मदद करते थे.


छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों के माड़िया जाति में परंपरा घोटुल को मनाया जाता है, घोटुल में आने वाले लड़के-लड़कियों को अपना जीवनसाथी चुनने की छूट होती है। घोटुल को सामाजिक स्वीकृति भी मिली हुई है। घोटुल गांव के किनारे बनी एक मिट्टी की झोपड़ी होती है। कई बार घोटुल में दीवारों की जगह खुला मण्डप होता है.





साभार-  bastar.gov.in 
कृष्णधर शर्मा
krishnadhar Sharma
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शुक्रवार, 8 मई 2020

शरणागत

 

(एक)

रज्जब क़साई अपना रोज़गार करके ललितपुर लौट रहा था। साथ में स्त्री थी, और गाँठ में दो सौ-तीन सौ की बड़ी रक़म। मार्ग बीहड़ था, और सुनसान। ललितपुर काफ़ी दूर था, बसेरा कहीं न कहीं लेना ही था; इसलिए उसने मड़पुरा-नामक गाँव में ठहर जाने का निश्चय किया। उसकी पत्नी को बुख़ार हो आया था, रक़म पास में थी, और बैलगाड़ी किराए पर करने में ख़र्च ज़्यादा पड़ता, इसलिए रज्जब ने उस रात आराम कर लेना ही ठीक समझा।

 

परंतु ठहरता कहाँ? जात छिपाने से काम नहीं चल सकता था। उसकी पत्नी नाक और कानों में चाँदी की बालियाँ डाले थी, और पैजामा पहने थी। इसके सिवा गाँव के बहुत-से लोग उसको पहचानते भी थे। वह उस गाँव के बहुत-से कर्मण्य और अकर्मण्य ढोर ख़रीद कर ले जा चुका था।

अपने व्यवहारियों से उसने रात-भर के बसेरे के लायक़ स्थान की याचना की। किसी ने भी मंज़ूर न किया। उन लोगों ने अपने ढोर रज्जब को अलग-अलग और लुके-छिपे बेचे थे। ठहरने में तुरंत ही तरह-तरह की ख़बरें फैलतीं, इसलिए सबों ने इंकार कर दिया।

 

गाँव में एक ग़रीब ठाकुर रहता था। थोड़ी-सी ज़मीन थी, जिसको किसान जोते हुए थे। जिसका हल-बैल कुछ भी न था। लेकिन अपने किसानों से दो-तीन साल का पेशगी लगान वसूल कर लेने में ठाकुर को किसी विशेष बाधा का सामना नहीं करना पड़ता था। छोटा-सा मकान था, परंतु उसको गाँव वाले गढ़ी के आदरव्यंजक शब्द से पुकारा करते थे, और ठाकुर को डर के मारे ‘राजा’ शब्द संबोधन करते थे।

शामत का मारा रज्जब इसी ठाकुर के दरवाज़े पर अपनी ज्वरग्रस्त पत्नी को लेकर पहुँचा।

 

ठाकुर पौर में बैठा हुक़्क़ा पी रहा था। रज्जब ने बाहर से ही सलाम करके कहा— “दाऊजू, एक बिनती है।”

ठाकुर ने बिना एक रत्ती-भर इधर-उधर हिले-डुले पूछा— “क्या?”

 

रज्जब बोला- “मैं दूर से आ रहा हूँ। बहुत थका हुआ हूँ। मेरी औरत को ज़ोर से बुख़ार आ गया है। जाड़े में बाहर रहने से न जाने इसकी क्या हालत हो जाएगी, इसलिए रात-भर के लिए कहीं दो हाथ जगह दे दी जाए।”

“कौन लोग हो?” ठाकुर ने प्रश्न किया।

 

“हूँ तो क़साई।” रज्जब ने सीधा उत्तर दिया। चेहरे पर उसके बहुत गिड़गिड़ाहट थी।

ठाकुर की बड़ी-बड़ी आँखों में कठोरता छा गई। बोला— “जानता है यह किसका घर है? यहाँ तक आने की हिम्मत कैसे की तूने?”

 

रज्जब ने आशा-भरे स्वर में कहा- “यह राजा का घर है, इसलिए शरण में आया हुआ हूँ।”

तुरंत ठाकुर की आँखों की कठोरता ग़ायब हो गई। ज़रा नरम स्वर में बोला- “किसी ने तुम को बसेरा नहीं दिया है।”

 

“नहीं महाराज”, रज्जब ने उत्तर दिया- “बहुत कोशिश की, परंतु मेरे खोटे पेशे के कारण कोई सीधा नहीं हुआ।” और वह दरवाज़े के बाहर ही, एक कोने से चिपटकर बैठ गया। पीछे उसकी पत्नी कराहती, काँपती हुई गठरी-सी बनकर सिमट गई!

ठाकुर ने कहा- “तुम अपनी चिलम लिए हो?”

 

“हाँ, सरकार!” रज्जब ने उत्तर दिया।

ठाकुर बोला- “तब भीतर आ जाओ, और तमाखू अपनी चिलम से पी लो। अपनी औरत को भीतर कर लो। हमारी पौर के एक कोने में पड़े रहना।”

 

जब वे दोनों भीतर आ गए तो ठाकुर ने पूछा- “तुम कब यहाँ से उठकर चले जाओगे?” जवाब मिला- “अँधेरे में ही महाराज! खाने के लिए रोटियाँ बाँधे हैं, इसलिए पकाने की ज़रूरत न पड़ेगी।”

“तुम्हारा नाम?”

 

“रज्जब।”

(दो)

 

थोड़ी देर बाद ठाकुर ने रज्जब से पूछा- “कहाँ से आ रहे हो।” रज्जब ने स्थान का नाम बतलाया।

“वहाँ किस लिए गए थे?”

 

“अपने रोज़गार के लिए।”

“काम तो तुम्हारा बहुत बुरा है।“

 

“क्या करूँ, पेट के लिए करना ही पड़ता है। परमात्मा ने जिसके लिए जो रोज़गार नियत किया है, वही उसको करना पड़ता है।”

“क्या नफ़ा हुआ?” प्रश्न करने में ठाकुर को ज़रा संकोच हुआ, और प्रश्न का उत्तर देने में रज्जब को उससे बढ़कर।

 

रज्जब ने जवाब दिया- “महाराज, पेट के लायक़ कुछ मिल गया है। यों ही।” ठाकुर ने इस पर कोई ज़िद नहीं की।

रज्जब एक क्षण बाद बोला—“बड़े भोर उठकर चला जाऊँगा। तब तक घर के लोगों की तबियत भी अच्छी हो जाएगी।”

 

इसके बाद दिन-भर के थके हुए पति-पत्नी सो गये। काफ़ी रात गए कुछ लोगों ने एक बँधे इशारे से ठाकुर को बाहर बुलाया। एक फटी-सी रज़ाई ओढ़े ठाकुर बाहर निकल आया।

आगंतुकों में से एक ने धीरे से कहा- “दाऊजू, आज तो ख़ाली हाथ लौटे हैं। कल संध्या का सगुन बैठा है।”

 

ठाकुर ने कहा- “आज ज़रूरत थी। ख़ैर, कल देखा जाएगा।”

“क्या कोई उपाय किया था?”

 

“हाँ” आगंतुक बोला- “एक क़साई रुपए की मोट बाँधे इसी ओर आया है। परंतु हम लोग ज़रा देर में पहुँचे। वह खिसक गया। कल देखेंगे। ज़रा जल्दी।”

ठाकुर ने घृणा-सूचक स्वर में कहा- “क़साई का पैसा न छुएँगे।”

 

“क्यों?”

“बुरी कमाई है।”

 

“उसके रुपयों पर क़साई थोड़े ही लिखा है।”

“परंतु उसके व्यवसाय से वह रुपया दूषित हो गया है।”

 

“रुपया तो दूसरों का ही है। क़साई के हाथ आने से रुपया क़साई नहीं हुआ।”

“मेरा मन नहीं मानता, वह अशुद्ध है।”

 

“हम अपनी तलवार से उसको शुद्ध कर लेंगे।”

ज़्यादा बहस नहीं हुई। ठाकुर ने सोचकर अपने साथियों को बाहर का बाहर ही टाल दिया।

 

भीतर देखा, क़साई सो रहा था, और उसकी पत्नी भी।

ठाकुर भी सो गया।

 

(तीन)

सवेरा हो गया, परंतु रज्जब न जा सका। उसकी पत्नी का बुख़ार तो हल्का हो गया था, परंतु शरीर-भर में पीड़ा थी, और वह एक क़दम भी नहीं चल सकती थी।

 

ठाकुर उसे वहीं ठहरा हुआ देखकर कुपित हो गया। रज्जब से बोला— “मैंने ख़ूब मेहमान इकट्ठे किए हैं। गाँव-भर थोड़ी देर में तुम लोगों को मेरी पौर में टिका हुआ देखकर तरह-तरह की बकवास करेगा। तुम बाहर जाओ। इसी समय।”

रज्जब ने बहुत विनती की, परंतु ठाकुर न माना। यद्यपि गाँव-भर उसके दबदबे को मानता था, परंतु अन्य लोकमत दबदबा उसके भी मन पर था। इसलिए रज्जब गाँव के बाहर सपत्नीक एक पेड़ के नीचे जा बैठा, और हिंदू-मात्र को मन-ही-मन कोसने लगा।

 

उसे आशा थी कि पहर आध-पहर में उसकी पत्नी की तबियत इतनी स्वस्थ हो जाएगी कि वह पैदल यात्रा कर सकेगी। परंतु ऐसा न हुआ, तब उसने एक गाड़ी किराए पर कर लेने का निर्णय किया।

मुश्किल से एक चमार काफ़ी किराया लेकर ललितपुर गाड़ी ले जाने के लिए राज़ी हुआ। इतने में दुपहर हो गई! उसकी पत्नी को ज़ोर का बुख़ार हो आया। वह जाड़े के मारे थर-थर काँप रही थी, इतनी कि रज्जब की हिम्मत उसी समय ले जाने की न पड़ी। गाड़ी में अधिक हवा लगने के भय से रज्जब ने उस समय तक के लिए यात्रा को स्थगित कर दिया, जब तक कि उस बेचारी की कम-से-कम कँपकँपी बंद न हो जाए।

 

घंटे-डेढ-घंटे बाद उसकी कँपकँपी तो बंद हो गई, परंतु ज्वर बहुत तेज़ हो गया। रज्जब ने अपनी पत्नी को गाड़ी में डाल दिया और गाड़ीवान से जल्दी चलने को कहा।

गाड़ीवान बोला- “दिन-भर तो यही लगा दिया। अब जल्दी चलने को कहते हो!”

 

रज्जब ने मिठास के स्वर में उससे फिर जल्दी करने के लिए कहा। वह बोला- “इतने किराए में काम नहीं चलेगा। अपना रुपया वापस लो। मैं तो घर जाता हूँ।”

रज्जब ने दाँत पीसे। कुछ क्षण चुप रहा। सचेत होकर कहने लगा— “भाई, आफ़त सबके ऊपर आती है। मनुष्य मनुष्य को सहारा, देता है, जानवर तो देते नहीं। तुम्हारे भी बाल-बच्चे हैं। कुछ दया के साथ काम लो।”

 

क़साई को दया पर व्याख्यान देते सुनकर गाड़ीवान को हँसी आ गई।

उसको टस से मस न होता देखकर रज्जब ने और पैसे दिए। तब उसने गाड़ी हाँकी।

 

पाँच-छः मील चलने के बाद संध्या हो गई। गाँव कोई पास में न था। रज्जब की गाड़ी धीरे-धीरे चली जा रही थी। उसकी पत्नी बुख़ार में बेहोश-सी थी। रज्जब ने अपनी कमर टटोली, रक़म सुरक्षित बँधी पड़ी थी।

रज्जब को स्मरण हो आया कि पत्नी के बुख़ार के कारण अंटी का कुछ बोझ कम कर देना पड़ा है—और स्मरण हो आया गाड़ीवान का वह हठ, जिसके कारण उसको कुछ पैसे व्यर्थ ही दे देने पड़े थे। उसको गाड़ीवान पर क्रोध था, परंतु उसको प्रकट करने की उस समय उसके मन में इच्छा न थी।

 

बातचीत करके रास्ता काटने की कामना से उसने वार्तालाप आरंभ किया— “गाँव तो यहाँ से दूर मिलेगा।”

“बहुत दूर, वहीं ठहरेंगे।”

 

“किसके यहाँ?”

“किसी के यहाँ भी नहीं। पेड़ के नीचे। कल सवेरे ललितपुर चलेंगे।”

 

“कल को फिर पैसा माँग उठना।”

“कैसे माँग उठूँगा? किराया ले चुका हैं। अब फिर कैसे माँगूगा?”

 

“जैसे आज गाँव में हठ करके माँगा था। बेटा, ललितपुर होता, तो बतला देता!”

“क्या बतला देते? क्या सेंत-मेंत गाड़ी में बैठना चाहते थे?”

 

‘क्यों बे, क्या रुपए देकर भी सेंत-मेंत का बैठना कहाता है? जानता है, मेरा नाम रज्जब है। अगर बीच में गड़बड़ करेगा, तो नालायक़ को यहीं छुरे से काटकर कहीं फेंक दूँगा और गाड़ी लेकर ललितपुर चल दूँगा।”

रज्जब क्रोध को प्रकट नहीं करना चाहता था, परंतु शायद अकारण ही वह भली भाँति प्रकट हो गया।

 

गाड़ीवान ने इधर-उधर देखा। अँधेरा हो गया था। चारों ओर सुनसान था। आस-पास झाड़ी खड़ी थी। ऐसा जान पड़ता था, कहीं से कोई अब निकला और अब निकला। रज्जब की बात सुनकर उसकी हड्डी काँप गई। ऐसा जान पड़ा, मानों पसलियों को उसकी ठंडी छुरी छू रही हो।

गाड़ीवान चुपचाप बैल को हाँकने लगा। उसने सोचा—गाँव के आते ही गाड़ी छोड़कर नीचे खड़ा हो जाऊँगा, और हल्ला-गुल्ला करके गाँव वालों की मदद से अपना पीछा रज्जब से छुडाऊँगा। रुपए-पैसे भले ही वापस कर दूँगा, परंतु और आगे न जाऊँगा। कहीं सचमुच मार्ग में मार डाले!

 

गाड़ी थोड़ी दूर और चली होगी कि बैल ठिठककर खड़े हो गए। रज्जब सामने न देख रहा था, इसलिए ज़रा कड़ककर गाड़ीवान से बोला— “क्यों बे बदमाश, सो गया क्या?”

अधिक कड़क के साथ सामने रास्ते पर खड़ी हुई एक टुकड़ी में से किसी के कठोर कंठ से निकला... “ख़बरदार, जो आगे बढ़ा।”

 

रज्जब ने सामने देखा कि चार-पाँच आदमी बड़े-बड़े लठ बाँधकर न जाने कहाँ से आ गए हैं। उनमें तुरंत ही एक ने बैलों की जुआरी पर एक लठ पटका और दो दाएँ-बाएँ आकर रज्जब पर आक्रमण करने को तैयार हो गए।

गाड़ीवान गाड़ी छोड़कर नीचे जा खड़ा हुआ। बोला... “मालिक मैं तो गाड़ीवान हूँ। मुझसे कोई सरोकार नहीं।”

 

“यह कौन है?” एक ने गरजकर पूछा।

गाड़ीवान की घिग्घी बँध गई। कोई उत्तर न दे सका।

 

रज्जब ने कमर की गाँठ को एक हाथ से सँभालते हुए बहुत ही नम्र स्वर में कहा— “मैं बहुत ग़रीब आदमी हूँ। मेरे पास कुछ नहीं है। मेरी औरत गाड़ी में बीमार पड़ी है। मुझे जाने दीजिए।”

उन लोगों में से एक ने रज्जब के सिर पर लाठी उबारी। गाड़ीवान खिसकना चाहता था कि दूसरे ने उसको पकड़ लिया।

 

अब उसका मुँह खुला। बोला- “महाराज, मुझको छोड़ दो। मैं तो किराए से गाड़ी लिए जा रहा हूँ। गाँठ में खाने के लिए तीन-चार आने पैसे ही हैं।”

“और यह कौन है? बतला।” उन लोगों में से एक ने पूछा।

 

गाड़ीवान ने तुरंत उत्तर दिया- “ललितपुर का एक क़साई।

रज्जब के सिर पर जो लाठी उबारी गई थी, वह वहीं रह गई। लाठीवाले के मुँह से निकला- “तुम क़साई हो? सच बताओ!”

 

“हाँ, महाराज!' रज्जब ने सहसा उत्तर दिया- “मैं बहुत ग़रीब हूँ। हाथ जोड़ता हूँ मुझको मत सताओ। मेरी औरत बहुत बीमार है। औरत ज़ोर से कराही।

लाठीवाले उस आदमी ने अपने एक साथी से कान में कहा- “इसका नाम रज्जब है। छोड़ो। चलें यहाँ से।”

 

उसने न माना। बोला- “इसका खोपड़ा चकनाचूर करो दाऊजू, यदि वैसे न माने तो। असाई-क़साई हम कुछ नहीं मानते।”

“छोड़ना ही पड़ेगा, उसने कहा— “इस पर हाथ नहीं पसारेंगे और न इसका पैसा छुएँगे।”

 

दूसरा वोला- “क्या क़साई होने के डर से दाऊजू, आज तुम्हारी बुद्धि पर पत्थर पड़ गए हैं। मैं देखता हूँ।” और उसने तुरंत लाठी का एक सिरा रज्जब की छाती में अड़ाकर तुरंत रुपया-पैसा निकाल देने का हुक्म दिया। नीचे खड़े हुए उस व्यक्ति ने ज़रा तीव्र स्वर में कहा— “नीचे उतर आओ। उससे मत बोलो। उसकी औरत बीमार है।”

“हो, मेरी बला से”, गाड़ी में चढ़े हुए लठैत ने उत्तर दिया- “मैं क़साइयों की दवा हूँ।” और उसने रज्जब को फिर धमकी दी।

 

नीचे खड़े हुए उस व्यक्ति ने कहा— “ख़बरदार, जो उसे छुआ। नीचे उतरो, नहीं तो तुम्हारा सिर चकनाचूर किए देता हूँ। वह मेरी शरण आया था।”

गाड़ीवान लठैत झख-सी मारकर नीचे उतर आया।

 

नीचे वाले व्यक्ति ने कहा- “सब लोग अपने-अपने घर जाओ। राहगीरों को तंग मत करो।” फिर गाड़ीवान से बोला— “जा रे, हाँक ले जा गाड़ी। ठिकाने तक पहुँचा आना, तब लौटना। नहीं तो अपनी ख़ैर मत समझियो। और, तुम दोनों में से किसी ने भी कभी इस बात की चर्चा कहीं की, तो भूसी की आग में जलाकर ख़ाक कर दूँगा।”

गाड़ीवान गाड़ी लेकर बढ़ गया। उन लोगों में से जिस आदमी ने गाड़ी पर चढ़कर रज्जब के सिर पर लाठी तानी थी, उसने क्षुब्ध स्वर में कहा— “दाऊजू, आगे से कभी आपके साथ न आऊँगा।”

 

दाऊजू ने कहा— “न आना। मैं अकेले ही बहुत कर गुज़रता हूँ। परंतु बुंदेला शरणागत के साथ घात नहीं करता, इस बात को गाँठ बाँध लेना।”

 

वृंदावनलाल वर्मा

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गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

मरघट की शांति

 मूर्खों की मूर्खताओं से तो दुनिया आबाद है

बुद्धिमानों को तो मरघट की शांति ही जंचती है

                       कृष्णधर शर्मा 1.4.20

मंगलवार, 31 मार्च 2020

गन्दगी


दीनू ने अपनी माँ से कहा “माँ, मैंने अपने लिए एक लड़की पसंद की है. सरकारी नौकरी में है. इसी शहर की है.”
माँ ने परेशान होते हुए कहा “तूने अपने मन से लड़की पसंद कर ली और मुझे अब बता रहा है!”
दीनू ने कहा “अरे माँ! पहले लड़की की फोटो तो देख लो फिर बाद में गुस्सा करना.”
दीनू ने अपने मोबाईल फोन में लड़की की फोटो दिखाते हुए माँ से पूछा “अब बताओ माँ! कैसी लग रही है तुम्हारी होनेवाली बहू!”
माँ ने फोटो देखते हुए कहा “दिखने में तो बहुत सुन्दर और सुशील लग रही है बेटा, मगर उसके परिवार वाले कौन हैं क्या करते हैं और लड़की क्या नौकरी करती है!”
माँ के सवालों की बौछार से दीनू पहले तो हड़बड़ा गया मगर फिर संयत होते हुए बोला “लड़की के माँ-बाप नहीं हैं, बचपन में ही एक दुर्घटना में मारे गए थे. वह अनाथ आश्रम में ही पली-बढ़ी है. अभी नगर पंचायत में सफाई कर्मचारी का काम करती है”
माँ ने गुस्से मे दीनू को घूरते हुए कहा “क्या कहा! वह सफाई कर्मचारी है! तेरा दिमाग तो ठीक है न! तू एक नाली साफ़ करनेवाली लड़की से शादी करेगा!”
‘इससे क्या फर्क पड़ता है माँ कि वह एक सफाई कर्मचारी है”
“वाह बेटा! क्या फर्क पड़ता है! अरे समाज में हमारी भी कोई इज्जत है. तू सबके सामने हमारी नाक कटवाएगा क्या!”
“इसमें नाक कटवाने वाली क्या बात हुई माँ! मैं एक सफाई करने वाली से ही तो शादी करना चाहता हूँ न कि एक गन्दगी फ़ैलाने वाली से! इससे तो हमारी इज्जत और बढ़नी चाहिए न माँ!”
बेटे की बात सुनकर माँ ने नाराजगी से कहा “अब तो तू समझदार हो गया है बेटा, अब भला मेरी बात क्यों मानेगा. जा, तुझे जो करना है कर, मगर मुझसे कुछ उम्मीद मत रखना” कहकर गुस्से से पैर पटकती हुई माँ रसोई मे चली गई और दीनू वहीँ खड़ा सोचता रहा कि गंदगी नाली से ज्यादा तो लोगों के दिमाग में भरी हुई है.     
      कृष्ण धर शर्मा 08.03.2020   
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“आभिजात्य”


“वह” अब मध्यम वर्ग से धीरे-धीरे आभिजात्य वर्ग की ओर बढ़ रहे थे. इसलिए अब उन्होंने अपनी मध्यम वर्ग वाली आदतें धीरे-धीरे छोडनी शुरू कर दी थी. जैसे कि, फल-सब्जियां इत्यादि जो वह पहले सस्ता हो जाने का इन्तजार करते थे फिर उन्हें खरीदते थे. चावल, दाल और अन्य दैनिक वस्तुओं को कीमतों के आधार पर तय करते थे कि कम कीमत वाली वस्तुएं ही खरीदी जाएं. बच्चों के लिए स्कूल ड्रेस लेना हो या जूते खरीदने हों, बहुत मोलभाव करके खरीदते थे. ब्रांडेड कपड़ों और वस्तुओं की खरीदी से बचते थे. कभी फिल्म देखने जाना हो तो खुद और बीवी-बच्चों को घर से ही खाना-नास्ता खिलाकर निकलते थे ताकि बच्चे फिल्म देखने के समय थियेटर के मंहगे समोसे या पॉपकार्न खरीदने की जिद न करें.
मगर “वह” जबसे मध्यम वर्ग से कुछ आगे निकलकर आभिजात्य वर्ग में शामिल होने लगे तो उन्होंने उस वर्ग की आदतें अपनानी शुरू कर दीं, जैसे कि मंहगे, ब्रांडेड कपडे, जूते, परफ्यूम इत्यादि खरीदने शुरू कर दिए. किराने की दुकान पर पहुँचते ही (अभी तक उनके शहर में शापिंग माल जैसी व्यवस्था का उदय नहीं हुआ था) ज़रा ऊँची आवाज में दुकानवाले को सामान की लिस्ट पकड़ाकर उसे समझाते हुए बोलते “देख लो भाई, सारे सामन ज़रा अच्छे और ऊँचे ब्रांड के देना”.
दुकानदार भी समझदार किस्म का था. वह उन्हें चने के झाड में चढ़ाये रखता और चुन-चुनकर मंहगी और अनावश्यक वस्तुएं भी पकड़ा देता. बिल देखकर उनकी हार्टबीट तो ज़रा बढ़ जाती मगर अपनी अभिजात्यता का लिहाज करके वह उसे नियंत्रित कर लेते और कुछ बोल न पाते. बिल की रकम पकड़ाकर सामन जल्दी से घर भिजवाने की हिदायत देकर वह वहां से निकल लेते. सब्जी बाजार से सब्जियां या फल वही खरीदते जो बेमौसम और बाजार में सबसे मंहगा होता. एक दिन वह सब्जी खरीदने निकले तो चुन-चुनकर मंहगी और बे-मौसम की सब्जियां खरीद डाली मगर टमाटर न खरीद पाए क्योंकि उस दिन सारे बाजार में सस्ता और एक ही भाव में टमाटर बिक रहा था. उन्होंने काफी खोजा मगर उन्हें मंहगा टमाटर कहीं नहीं मिला. हारकर वह बिना टमाटर लिए ही बाजार से लौट आये.
पत्नी ने जब सब्जी का थैला देखा तो उन्हें टमाटर कहीं नजर न आया. उन्होंने पूछा कि टमाटर कहाँ है? तो वह अपनी दुविधा बताने लगे कि अच्छा और मंहगा टमाटर नहीं मिलने से उन्होंने नहीं खरीदा. यह सुनकर पत्नी ने अपना माथा पीट लिया और उन्हें घूरते हुए भारी और ठंडी आवाज में कहा कि “आपको पता है न कि आज शाम को मेरी कुछ सहेलियां डिनर पर आने वाली हैं”.... 
कृष्ण धर शर्मा 25.10.2019 
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“अ” और “ब” के चबूतरे


एक दिन “अ” और “ब” में लड़ाई हुई. लड़ाई घर के बाहर बने चबूतरे को लेकर थी. “ब” ने चबूतरे की मरम्मत करवाते समय उसके आकार में बित्ते भर का इजाफा कर लिया था इसलिए “अ” ने “ब” को पहले प्यार से समझाया फिर बहस करने पर धमकाया भी. मगर “ब” ने कहा “कि तुम मेरे चबूतरे से क्यों चिढ़ते हो! तुमको बहुत बुरा लग रहा है तो तुम भी अपना चबूतरा थोडा सा बढ़ा लो.”
“अ” ने भड़कते हुए कहा कि “पागल हो गए हो क्या! इससे इस रास्ते से आने-जाने वालों को परेशानी नहीं हो जाएगी क्या!”
“ब” ने कहा “कोई परेशानी नहीं होगी. थोड़े दिन के लिए असुविधा होगी मगर बाद में आदत पड़ जाएगी. फिर कोई कुछ नहीं बोलेगा.”
“अ” को “ब” कि बात जंच गई और उसने भी रास्ते की तरफ अपना चबूतरा बित्ता भर बढ़ा लिया. अब दोनों पड़ोसी अपने-अपने चबूतरे पर बैठ कर दुनिया-जहान की बातें करते हुए खुश रहते हैं और रास्ते से गुजरने वालों की परेशानियाँ को अनदेखा करते रहते हैं. 
कृष्ण धर शर्मा 7-9-2019  
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सच्चा पत्रकार

कालोनी के 2 बच्चों में खेलते-खेलते किसी बात पर लड़ाई हुई जो बाद में उनकी माओं तक पहुँच गई जिसमें दोनों तरफ से एक-दूसरे के खानदानों की दिलचस्प व्याख्या की गई. कालोनी में ही निवास करने वाले एक महान पत्रकार द्वारा इसकी रिपोर्टिंग भी कर ली गई. अगले दिन अख़बार के सिटी पेज पर इस लड़ाई की विस्तृत रिपोर्ट छपी थी जिसका शीर्षक था “सवर्णों द्वारा दलितों पर अत्याचार”. रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे आज के ज़माने में भी सवर्ण लोग दलितों पर अत्याचार करने से चूकते.
यह खबर पढ़कर दलित परिवार के मुखिया उन महान पत्रकार के पास पहुंचे और उन्हें लताड़ते हुए बोले “अरे पत्रकार महोदय! बच्चों के एक छोटे से आपसी झगडे को तुमने यह क्या रंग दे दिया!” 
पत्रकार महोदय बोले “आपको यह सिर्फ छोटा सा झगडा लगता है! अरे यह आप और आपके परिवार पर एक सवर्ण परिवार का जुल्म है, अन्याय है.”
दलित परिवार के मुखिया ने कहा “अरे भाई! तुमने बेवजह ही बच्चों के आपसी झगडे को सवर्ण-दलित झगडे में बदल दिया! हम दोनों परिवार पढ़े-लिखे और सुलझे हुए हैं. हम इन बेवकूफी भरी बातों पर यकीन नहीं करते हैं.”
महान पत्रकार ने कहा “आपको भले ही अपने परिवार और समाज की चिंता न हो, मगर हमें है. हम सच्चे पत्रकार हैं, हम आपके परिवार और आपके समाज के ऊपर यह जुल्म नहीं होने देंगे. हम यह बात सारी दुनिया तक पहुंचाएंगे.”
दलित परिवार के मुखिया उस महान और सच्चे पत्रकार का मुंह देखते खड़े रह गए....
     कृष्ण धर शर्मा 19.8.2019  

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गणित


मैंने नीलू से कहा कि “भाई क्यों नहीं तुम उज्ज्वला योजना में मिले गैस सिलेंडर को भरवा देते! कम से कम तुम्हारी माँ को दिनभर लकड़ी के लिए जंगल में तो नहीं भटकना पड़ेगा और तुम्हारी पत्नी को भी खाना बनाते समय धुएं में परेशान नहीं होना पड़ेगा!”
नीलू ने मेरी बात को टालना चाहा तो मैंने फिर उसे समझाते हुए कहा “देखो भाई, सीधा सा गणित है. अगर तुम्हारी माँ पूरे महीने में 10 दिन भी लकड़ी चुनने जंगल जाती हैं तो 10 दिन की मजदूरी कम से कम 2000 रूपये होती है न! और गैस सिलेंडर 750 रूपये में भी भरवाते हो तो वह कम से कम 45 दिन तो चलेगा ही न! फिर फायदा किस्में है!”
नीलू ने मुस्कुराते हुए कहा कि “घर काम के लिए तो बीवी है ही, फिर माँ दिनभर घर में बैठकर करेगी भी क्या! वह इस बुढ़ापे में कहीं मजदूरी तो कर नहीं सकती! और जंगल नहीं काटेंगे तो हमें नए खेत कैसे कब्ज़ा करने को मिलेंगे!
नीलू ने एक ही झटके में मेरे सारे गणित पर पानी फेर दिया और मैं उसका गणित समझने की कोशिश करता रह गया.      
    कृष्ण धर शर्मा 12.8.2019 
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सोमवार, 30 मार्च 2020

वैकल्पिक ईंधन की ओर भारत के बढ़ते कदम


बरसों से दुनिया जिन ऊर्जा स्रोतों को इंर्धन के रूप में उपयोग करती आ रही है, वे सीमित हैं। जहां एक ओर उनको बनने में लाखों साल लग जाते हैं, वहीं उनके अत्यधिक दोहन से समय के साथ-साथ वे चुक जाएंगे। ऐसे में आशा की एक नई किरण वैकल्पिक इंर्धन के रूप में सामने आई है। वैकल्पिक इंर्धन देश के कच्चे तेल के आयात बिल को कम करने में मदद कर सकते हैं। वर्तमान में भारत की अर्थव्यवस्था के मुख्य चालक डीज़ल और पेट्रोल हैं अर्थात भारत की अधिकतम ऊर्जा ज़रूरतें डीज़ल और पेट्रोल से पूरी होती हैं। अब स्थिति को बदलने की दिशा में काम हो रहा है। 
वैश्विक स्तर पर वैकल्पिक इंर्धन के रूप में मेथेनॉल का उत्पादन और उपयोग बढ़ रहा है। इसके मुख्य कारण हैं कोयले और प्राकृतिक गैस जैसे सस्ते माल की कमी, तेल की कीमतों में वृद्धि, तेल आयात बिल में कमी करने की ख्वाहिश और प्रदूषण तथा जलवायु परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय मुद्दे। 
इंर्धन के रूप में और रासायनिक उद्योग में मध्यवर्ती पदार्थ रूप में मेथेनॉल का उपयोग ऑटोमोबाइल और उपभोक्ता क्षेत्रों में तेज़ी से बढ़ रहा है। मेथेनॉल अपने उच्च ऑक्टेन नंबर के कारण एक कुशल इंर्धन माना जाता है और यह गैसोलीन की तुलना में सल्फर ऑक्साइड्स (एसओएक्स), नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (एनओक्स) और कणीय पदार्थ व गैसीय प्रदूषक तत्व कम उत्सर्जित करता है। 
'मेथेनॉल अर्थव्यवस्था' का शाब्दिक अर्थ ऐसी अर्थव्यवस्था से है जो डीज़ल और पेट्रोल की बजाय मेथेनॉल के बढ़ते प्रयोग पर आधारित हो। मेथेनॉल अर्थव्यवस्था की अवधारणा को सक्रिय रूप से चीन, इटली, स्वीडन, इस्राइल, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और कई अन्य यूरोपीय देशों द्वारा लागू किया गया है। वर्तमान में चीन में लगभग 9 प्रतिशत परिवहन इंर्धन के रूप में मेथेनॉल का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके अलावा इजराइल, इटली ने पेट्रोल के साथ मेथेनॉल के 15 प्रतिशत मिश्रण की योजना बनाई है। 
भारतीय इंर्धन में मेथेनॉल की शुरुआत अप्रत्यक्ष रूप से हुई थी, जब बॉयोडीज़ल, मेथेनॉल और गैर खाद्य पौधों से बने तेल जैसे रतनजोत तेल को 2009 में जैव इंर्धन हेतु राष्ट्रीय नीति में शामिल किया गया था। मेथेनॉल अर्थव्यवस्था बनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य देश की अर्थव्यवस्था के विकास को टिकाऊ बनाना है ताकि वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए भावी पीढ़ियों की जरूरतों के साथ कोई समझौता न हो। 
गैसोलीन में 15 प्रतिशत तक सम्मिश्रण के लिए मेथेनॉल अपेक्षाकृत एक आसान विकल्प है। यह वाहनों, स्वचालित यंत्रों या कृषि उपकरणों में कोई बदलाव किए बिना वायु गुणवत्ता सम्बंधी तत्काल लाभ प्रदान करता है। हालांकि दो अन्य अनिवार्यताओं, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और इंर्धन आयात से विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह में कमी के संदर्भ में भारत में अधिक मेथेनॉल क्षमता स्थापित करना आवश्यक होगा।
मोटे तौर पर देखा जाए तो मेथेनॉल इंर्धन हो या आजकल का मूल स्रोत हाइड्रोकार्बन हो इनमें वनस्पति जगत का मुख्य योगदान है। स्पष्ट है कि तमाम कार्बनिक पदार्थों के विश्लेषण से मेथेनॉल प्राप्त करना संभव है। जैव पदार्थ का बेहतरीन उपयोग कर 75 प्रतिशत तक मेथेनॉल प्राप्त किया जा सकता है। धरती की हरियाली से प्राप्त मेथेनॉल की उपयोगिता को भारतीय वैज्ञानिकों ने समझा और उसका उपयोग वाहनों को गति देने के लिए कर दिखाया। परीक्षणों में पाया गया है कि मेथेनॉल को 12 प्रतिशत की दर से मूल इंर्धन में मिलाकर वाहन चलाना संभव है। 
वर्ष 1989 में नई दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी में वैज्ञानिकों ने पेट्रोल में मेथेनॉल मिलाकर एक स्कूटर पहले आईआईटी कैम्पस में बतौर परीक्षण और फिर दिल्ली की सड़कों पर चलाया। इस सफलता से प्रेरित होकर भारतीय पेट्रोलियम संस्थान के वैज्ञानिकों ने मेथेनॉल-पेट्रोल के मिश्रण से पहली खेप में 15 स्कूटर और बाद में कई स्कूटर चलाए। इससे प्रभावित होकर कई निजी कंपनियां सामने आइंर्। वड़ोदरा में तो इनकी प्रायोगिक तौर पर बिक्री भी की गई। 
पेट्रोल के अलावा मेथेनॉल को डीज़ल में मिलाकर भी कुछ सफलता प्राप्त हुई है। डीज़ल-मेथेनॉल के इस रूप को च्डीज़ोहॉलज् नाम दिया गया है। भारतीय पेट्रोलियम संस्थान द्वारा डीजल में 15 से 20 प्रतिशत तक मेथेनॉल मिलाकर बसें भी चलाई जा चुकी हैं। भारत सहित कई अन्य देशों में डीज़ोहॉल को लेकर व्यावसायिक परीक्षण भी किए जा रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि डीज़ोहॉल अधिक ऊर्जा क्षमता वाला इंर्धन होने के अलावा प्रदूषण भी कम पैदा करता है। कहना न होगा कि यह आर्थिक रूप से बेहतर और पर्यावरण हितैषी भी है। 
वर्तमान में भारत को प्रति वर्ष 2900  करोड़ लीटर पेट्रोल और 9000 करोड़ लीटर डीज़ल की ज़रूरत होती है। भारत दुनिया में छठवां सबसे ज़्यादा तेल उपभोक्ता देश है। 2030 तक यह खपत दुगनी हो जाएगी और भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश बन जाएगा। 
इसके अलावा भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जक देश है। दिल्ली जैसे शहरों में लगभग 30 प्रतिशत प्रदूषण वाहनों से होता है और सड़क पर कारों और अन्य वाहनों की बढ़ती संख्या प्रदूषण की इस स्थिति को आने वाले दिनों में और भी विकट बनाएगी। इसलिए बढ़ते आयात बिल और प्रदूषण की समस्या के समाधान के लिए भारत का नीति आयोग देश की अर्थव्यवस्था को मेथेनॉल अर्थव्यवस्था में बदलने पर विचार कर रहा है। 
हमारे देश में मेथेनॉल अर्थव्यवस्था एक व्यावहारिक, आवश्यक और किफायती रूप लिए उभर रही है। गर्व की बात है कि हमने प्रति वर्ष दो मीट्रिक टन मेथेनॉल पैदा करने की क्षमता हासिल कर ली है। उम्मीद की जा रही है कि वर्ष 2030 तक भारत के इंर्धन बिल में 30 प्रतिशत तक की कटौती हो जाएगी, जो मेथेनॉल के दम पर ही संभव होगी। भारत द्वारा मूल इंर्धन में 15 प्रतिशत मेथेनॉल मिलाए जाने का कार्यक्रम बनाया जा रहा है। इसके लिए इजराइल जैसे देशों से मदद लेने की भी संभावना है। नीति आयोग द्वारा मेथेनॉल अर्थव्यवस्था फंड भी निर्धारित करने की योजना है जिसमें मेथेनॉल आधारित परियोजनाओं के लिए चार-पांच हजार करोड़ रुपए का प्रावधान है।
देश में बढ़ते प्रदूषण और कच्चे तेल के बढ़ते आयात बिल को देखते हुए भारत के लिए मेथेनॉल का उपयोग न सिर्फ जरूरी है बल्कि पर्यावरण की मांग भी है। यदि मेथेनॉल का उपयोग भारत में व्यापक पैमाने पर शुरू कर दिया जाता है तो भारत में होने वाला विकास टिकाऊ विकास हो जाएगा।
नरेन्द्र देवांगन (साभार-देशबंधु)
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