नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

बुधवार, 15 नवंबर 2023

स्थानांतरण

स्थानांतरण मात्र स्थानांतरण नहीं होता है

वह तो होता है एक तरह का विस्थापन

सालों की जमी-जमाई गृहस्थी को

एक झटके में समेट कर अचानक से

चल देना होता है एक नई जगह के लिए

बिना कुछ सोचे-समझे देखे-भाले

अपनी जान-पहचान अपना कमाया सम्मान

सब वहीँ छोड़ कर बढ़ जाना होता है

एक अनजान दिशा में

जहाँ पर होता है सब कुछ नया-नया

अपरिचित, अनजान सा

जहाँ पर शुरू करना पड़ता है

सब कुछ शुरू से, नए सिरे से

जहाँ बनाने पड़ते हैं सारे रिश्ते नए

चाहे वह पड़ोसी हों या दूधवाला

या फिर सब्जी बेचनेवाला ही हो

मिटानी पड़ती हैं कुछ पुरानी यादें

नए रिश्तों को जगह देने के लिए...

            कृष्णधर शर्मा  15.11.23

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शनिवार, 4 नवंबर 2023

खाली जगह- गीतांजलि श्री

 कुछ टुकड़े, बाक़ी राख । कैफ़े के पंखें यों नरम पिघले लचके ज्यों नृत्यांगना की मुद्राएँ। बर्तन झाड़न यों लटके कतार में और बोतलें भी, जैसे काली अदाकारियों की नुमाइश । पूरा कैफ़े किसी कलाकार का स्याह सपना । टुकड़े टुकड़े। एब्स्ट्रेक्ट आर्ट । टुकड़े टुकड़े। जो कुर्सियाँ हो सकती थीं, मेज़, इडली, साम्भर, गुलाबजामुन, पाव भाजी, अब काले और चूर चूर । टुकड़े, जो लोग हो सकते थे, लड़के और लड़कियाँ, युनिवर्सिटी की इमारत में घुसने के पहले। टुकड़े, जो उन्नीस जन जुड़ते अगर जोड़ना आता तोड़नेवाले को। अगर होता वह ब्रह्मा विष्णु महेश सब !

 उन्नीस लोग। जिनकी पहचान होनी थी। टुटहे फुटहे टुकड़े जिनकी पहचान बाक़ी थी। पहचान में डालना ही टुकड़े में तोड़ना है। यहाँ कोशिश हो रही थी टुकड़ों को पहचानने की ! 

और एक मैं, साबुत टुकड़ा, जिसे चींटियाँ गोद रही थीं या गोद में लिये थीं ! उन्नीस जन के टुकड़े और तीन बरस का टुकड़ा जो किसी का भी हो सकता था, बम का भी, या बम ही, या दानव, या देव, जो आता है अभी भी रातों में खुरच खुरच चींटियों को लेकर कि मुझ पर पड़ी नींद का कवच उतार दें खुरच खुरच और फिर वही तीन बरस का पड़ा हो ख़ाली जगह में और फिर वही भकभक लपटें उससे दूर मगर एकदम पास उछलें और फिर वही अट्ठारह बरस के टुकड़े टुकड़े अँधेरे में भर जाएँ जिनके बीच से फिर सब गिरता ही गया गिरता ही गया और है किसी का दिल जो धड़के जा रहा है विस्फोट के पहले और है उसी की नींद जो उतर गई है खुरच खुरच और पूरी लम्बी रात है जिसे पार करना है किसी तरह किसी न किसी तरह ... | मेरे पूरे बदन पर लाल लाल रैश फट पड़ता है। (खाली जगह- गीतांजलि श्री)




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शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

हमारी बिसात ही फिर क्या

 

गिर जाते हैं भरभरा कर एक झटके में पुल बड़े-बड़े

नींव भी तो नहीं है हमारी बिसात ही फिर क्या

                         कृष्णधर शर्मा 02.11.23

शनिवार, 14 अक्टूबर 2023

कविता के बहाने

 

कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने

कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने

बाहर भीतर

इस घर, उस घर

 कविता के पंख लगा उड़ने के माने

चिड़िया क्या जाने?

कविता एक खिलना है फूलों के बहाने

कविता का खिलना भला फूल क्या जाने!

बाहर भीतर

इस घर, उस घर

बिना मुरझाए महकने के माने

फूल क्या जाने?

कविता एक खेल है बच्चों के बहाने

बाहर भीतर

यह घर, वह घर

सब घर एक कर देने के माने

बच्चा ही जाने।


कुँवर नारायण

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सोमवार, 18 सितंबर 2023

अतिथि-रवींद्रनाथ टैगोर

 अचानक उमस को चीरती हुई हू-हू करके हवा चलने लगी-देखते-देखते शुस्ता का स्थिर जल-तल अप्सरा के केश-पाश की भाँति कुंचित हो उठा एवं सन्ध्याछायाच्छन्न समस्त वनभूमि क्षणभर में एक साथ मर्मरव्वनि करके मानो दुःस्वप्न से जाग उठी। चाहे स्वप्न कहो या सत्य कहो, ढाई सौ वर्ष के अतीत क्षेत्र से प्रतिफलित होकर मेरे सामने जो एक अदृश्य मरीचिका अवतीर्ण हुई थी वह पलभर में अन्तर्धान हो गई। जो मायामयी मुझे फलांगती हुई देहहीन द्रुत-पदों से शब्दहीन उच्चकलहास्य से दौड़कर शुस्ता के जल में जाकर कूद पड़ी थीं, अपने सिक्त अंचला से बूंदें टपकात टपकात फिर मेरी बगल से होकर नहीं निकलीं। जिस प्रकार वायु गन्ध को उड़ाकर ले जाती है, उसी प्रकार वे वसन्त के एक निःश्वास में उड़कर चली गई। (अतिथि-रवींद्रनाथ टैगोर) 




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शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

झलमला

 

(एक)

मैं बरामदे में टहल रहा था। इतने में मैंने देखा कि विमला दासी अपने आँचल के नीचे एक प्रदीप लेकर बड़ी भाभी के कमरे की ओर जा रही है। मैंने पूछा—क्यों री! यह क्या है? वह बोली—झलमला। मैंने फिर पूछा—इससे क्या होगा? उसने उत्तर दिया—नहीं जानते हो वाबू, आज तुम्हारी बड़ी भाभी पंडितजी की बहू की सखी होकर आई हैं, इसीलिए मैं उन्हें झलमला दिखाने जा रही हूँ।

 

तब तो मैं भी किताब फेंककर घर के भीतर दौड़ गया। दीदी से जाकर मैं कहने लगा—दीदी, थोड़ा तेल तो दो।

दीदी ने कहा—जा, अभी मैं काम में लगी हूँ।

 

मैं निराश होकर अपने कमरे में लौट आया। फिर मैं सोचने लगा—यह अवसर जाने न देना चाहिए, अच्छी दिल्लगी होगी। मैं इधर-उधर देखने लगा। इतने में मेरी दृष्टि एक मोमबत्ती के टुकड़े पर पड़ी। मैंने उसे उठा लिया और दियासलाई का बक्स लेकर भाभी के कमरे की ओर गया। मुझे देखकर भाभी ने पूछा—कैसे आए बाबू; मैंने बिना उत्तर दिए ही मोमबत्ती के टुकड़े को जलाकर उनके सामने रख दिया। भाभी ने हँसकर पूछा—यह क्या है?

मैंने गंभीर स्वर में उत्तर दिया—झलमला।

 

भाभी ने कुछ न कहकर मेरे हाथ पर पाँच रुपये रख दिए। मैं कहने लगा—भाभी, क्या तुम्हारे प्रेम के आलोक का इतना ही मूल्य है?

भाभी ने हँसकर कहा—तो कितना चाहिए? मैंने कहा—कम से कम एक गिन्नी। भाभी कहने लगीं—अच्छा इस पर लिख दो; मैं अभी देती हूँ।

 

मैंने तुरंत ही चाकू से मोमबत्ती के टुकड़े पर लिख दिया—'मूल्य एक गिन्नी।' भाभी ने गिन्नी निकालकर मुझे दे दी और मैं अपने कमरे में चला आया। कुछ दिनों बाद गिन्नी के ख़र्च हो जाने पर मैं यह घटना बिलकुल भूल गया।

(दो)

 

8 वर्ष व्यतीत हो गए। मैं बी० ए०, एल०-एल० बी० होकर इलाहाबाद से घर लौटा। घर की वैसी दशा न थी जैसी आठ वर्ष पहले थी। न भाभी थी, न विमला दासी ही। भाभी हम लोगों को सदा के लिए छोड़कर स्वर्ग चली गई थी, और विमला कटगी में खेती करती थी।

संध्या का समय था। मैं अपने कमरे में बैठा न जाने क्या सोच रहा था। पास ही कमरे में पड़ोस की कुछ स्त्रियों के साथ दीदी बैठी थी। कुछ बातें हो रही थीं, इतने में मैंने सुना, दीदी किसी स्त्री से कह रही है—कुछ भी हो बहिन, मेरी बहू घर की लक्ष्मी थी। उस स्त्री ने कहा—हाँ बहिन, ख़ूब याद आई, मैं तुमसे पूछने वाली थी। उस दिन तुमने मेरे पास सखी का संदूक़ भेजा था न? दीदी ने उत्तर दिया—हाँ बहिन, बहू कह गई थी, उसे रोहिणी को दे देना। उस स्त्री ने कहा—उसमें सब तो ठीक था; पर एक विचित्र बात थी। दीदी ने पूछा—कैसी विचित्र बात? वह कहने लगी—उसे मैंने खोलकर एक दिन देखा तो उसमे एक जगह ख़ूब हिफ़ाज़त से रेशमी रूमाल में कुछ बँधा हुआ था। मैं सोचने लगी यह क्या है। कौतूहल-वश उसे खोलकर देखा। बहिन, कहो तो उसमें भला क्या रहा होगा? दीदी ने उत्तर दिया—गहना रहा होगा। उसने हँसकर कहा—नहीं, गहना न था। वह तो एक अधजली मोमबत्ती का टुकड़ा था और उसपर लिखा था—'मूल्य एक गिन्नी।' क्षण-भर के लिए मैं ज्ञान-शून्य हो गया, फिर अपने हृदय के आवेग को न रोककर मैं उस कमरे में घुस पड़ा और चिल्लाकर कहने लगा—वह मेरी है, मुझे दे दो। कुछ स्त्रियाँ मुझे देखकर भागने लगीं। कुछ इधर-उधर देखने लगीं। उस स्त्री ने अपना सिर ढाँपते-ढाँपते कहा—अच्छा बाबू, कल मैं उसे भेज दूँगी। पर मैंने रात को ही एक दासी भेजकर उस टुकड़े को मँगा लिया! उस दिन मुझसे कुछ नहीं खाया गया। पूछे जाने पर मैंने यह कहकर टाल दिया कि सिर में दर्द है। बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता रहा। जब सब सोने के लिए गए तब अपने कमरे में आया। मुझे उदास देखकर कमला पूछने लगी—सिर का दर्द कैसा है? पर मैंने कुछ उत्तर न दिया, चुपचाप जेब से मोमबत्ती को निकालकर उसे जलाया और उसे एक कोने में रख दिया।

 

कमला ने पूछा—यह क्या है?

मैंने उत्तर दिया—झलमला।

 

कमला कुछ न समझ सकी। मैंने देखा कि थोड़ी देर में मेरे झलमले का क्षुद्र आलोक रात्रि के अंधकार में विलीन हो गया।

 

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

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शनिवार, 9 सितंबर 2023

छत्रपति- मनु शर्मा

 "शिवाजी ज़ोर से हँस पड़े। बोले, 'सम्मान में बट्टा छिपकर आक्रमण करने से नहीं लगता, पराजित होने से लगता है। और यह तो युद्ध-नीति है कि जो जिस प्रकार लड़ना चाहे उसका उत्तर हमें वैसे ही देना चाहिए।" (छत्रपति- मनु शर्मा)



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रविवार, 27 अगस्त 2023

दुर्गा और लक्ष्मी

 साप्ताहिक बाजार से शराब पीकर लौटते हुए

रास्ते में कहीं पर भी गिर जाता है उसका पति

एक हाथ से दुधमुंहे बच्चे को, और

दूसरे हाथ में सब्जी-भाजी का थैला पकडे हुए

वह समझ नहीं पाती है कि

अपने गिरे हुए पति को अब

किस हाथ से उठाये और घर तक पहुंचाए

अपने घर-परिवार में औरतों को दुर्गा और लक्ष्मी

मानने की कहानियां सुनकर बड़ी हुई

बचपन से ही सुनहरे भविष्य के सपने देखती

आज इस मोड पर अपने को अकेला पाकर

रोना भी आता है उसको यह सब देखकर

मगर खुद रोये या रोते बच्चे को चुप कराये

बहुत ही बेबस और लाचार पाती है वह अपने को

इन बहुत ही कठिन परिस्थितियों के बीच में...

              कृष्णधर शर्मा  27.8.23


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रविवार, 20 अगस्त 2023

छोटे-छोटे ताजमहल

 

वह बात न मीरा ने उठाई, न ख़ुद उसने। मिलने से पहले ज़रूर लगा था कि कोई बहुत ही ज़रूरी बात है जिस पर दोनों को बातें कर ही लेनी हैं, लेकिन जैसे हर क्षण उसी की आशंका में उसे टालते रहे। बात गले तक आ-आकर रह गई कि एक बार फिर मीरा से पूछे—क्या इस परिचय को स्थायी रूप नहीं दिया जा सकता?—लेकिन कहीं पहले की तरह उसे बुरा लगा तो? उसके बाद दोनों में कितना खिंचाव और दुराव आ गया था!

पता नहीं क्यों, ताजमहल उसे कभी ख़ूबसूरत नहीं लगा। फिर धूप में सफ़ेद संगमरमर का चौंधा लगता था, इसलिए वह उधर पीठ किए बैठा था। लेकिन चौंधा मीरा को भी तो लग सकता है न? हो सकता है, उसे ताज सुंदर ही लगता हो। परछाईं उधर यमुना की तरफ़ होगी, इधर तो सपाट धूल में झलमल करता संगमरमर है, बस। इस तपते पत्थर पर चलने में तलुओं के झुलसने की कल्पना से उसके सारे शरीर में फुरहरी दौड़ गई।

 

तीन साल बाद एक-दूसरे को देखा था। देखकर सिर्फ़ मुस्कुराए थे, आश्वस्त भाव से—हाँ, दोनों हैं और वैसे ही हैं—मीरा कुछ निखर आई है और शायद वह...वह पता नहीं कैसा हो गया है! जाने कितने पूरे-के-पूरे वाक्य, सवाल-जवाब उसने मीरा को मन-ही-मन सामने बैठाकर बोले थे, प्रतिक्रियाओं की कल्पना की थी और अब बस, खिसियाने ढंग से मुस्कुराकर ही स्वागत किया था। उस क्षण से ही उसे अपने मिलने की व्यर्थता का अहसास होने लगा था, जाने क्यों। क्या ऐसी बातें करेंगे वे, जो अकसर नहीं कर चुके हैं? साल-छ: महीने में एक-दूसरे के कुशल समाचार जान ही लेते हैं।

उठे हुए घुटनों के पास लॉन की घास पर मीरा का हाथ चुपचाप रखा था। बस, उँगलियाँ इस तरह उठ-गिर रही थीं, जैसे किसी बहुत नाज़ुक बाजे पर हल्के-हल्के गूँजते संगीत की ताल को बाँध रही हों। मीरा ने लोहे का छल्ला डाल रखा था—शायद शनि का प्रभाव ठीक रखने के लिए। उसने धीरे से उसकी सबसे छोटी अँगुली में अपनी अँगुली हुक की तरह अटका ली थी, फिर हाथ उठाकर दोनों हथेलियों में दबा लिया था। फिर धीरे-धीरे बातों की धारा फूट पड़ी थी।

 

विजय का ध्यान गया—बड़ी-बड़ी मूँछोंवाला कोई छोटा-सा कीड़ा मीरा की खुली गर्दन और ब्लाउज़ के किनारे आ गया था। झिझक हुई, ख़ुद झाड़ दे या बता दे। उसने अपना मुँह दूसरी ओर घुमा लिया—प्रवेश-द्वार की सीढ़ियाँ झाड़ियों की ओट आ गई थीं, सिर्फ़ ऊपर का हिस्सा दीख रहा था। हिचकिचाते हुए कैरम का स्ट्राइकर मारने की तरह उसने कीड़ा उँगुलियों से परे छिटका दिया, नसों में सनसनाहट उतरती चली गई। उँगलियों से वह जगह यूँही झाड़ दी, मानो गंदी हो गई थी। मीरा उसी तन्मय भाव से अपनी सहेली के विवाह की पार्टी में आए लोगों का वर्णन देती रही—उसने कुछ नहीं कहा। न वहाँ रखा विजय का हाथ हटाया ही। विजय ने एक बार फिर सशंक निगाहों से इधर-उधर देखा और आगे बढ़कर उसको दोनों कनपटियों को हथेलियों से दबाकर अपने पास खींच लिया। नहीं, मीरा ने विरोध नहीं किया। मानो वह प्रत्याशा कर रही थी कि यह क्षण आएगा अवश्य। लेकिन पहले उसके माथे पर तीखी रेखाओं की परछाइयाँ उभरीं और फिर मुग्ध मुस्कुराहट की लहरों में बदल गईं...। एक अजीब, बिखरती-सी सिमटी, धूप छाँहीं मुस्कुराहट। विजय का मन हुआ, रेगिस्तान में भटकते प्यासे की तरह दोनों हाथों से सुराही को पकड़कर इस मुस्कुराहट की शराब को पागल आवेश में पीता चला जाए...पीता चला जाए...गट...गट और आख़िर लड़खड़ाकर गिर पड़े। पतले-पतले होंठों में एक नामालूम-सी फड़कन लरज़ रही थी। उस रूमानी बेहोशी में भी विजय को ख़याल आया कि पहले एक हाथ से मीरा चश्मा उतार ले—टूट न जाए। तब उसने देखा, हरियाले फव्वारों-जैसे मोरपंखियों के दो-तीन पेड़ों के पीछे पूरे-पूरे दो ताजमहल चश्मे के शीशों में उतर आए हैं...दूधिया हाथी दाँत के बने-से दो सफ़ेद नन्हे-नन्हे खिलौने...

पता नहीं क्यों, उसे ताजमहल कभी अच्छा नहीं लगा। ध्यान आया, अवांछित बूढ़े प्रहरी की तरह ताजमहल पीछे खड़ा देख रहा है। बातों के बीच वह उसे कई बार भूल गया था, लेकिन दाँतों में अटके तिनके-सा अचानक ही उसे याद आ जाता था कि वे उसकी छाया में बैठे हैं जो महान् है, जो विराट है...जो...? इतनी बड़ी इमारत! इसके समग्र सौंदर्य को एकसाथ वह कभी कल्पना में ला ही नहीं पाया...एक-एक हिस्सा देखने में कभी उसमें कुछ सुंदर लगा नहीं। लोगों के अपने ही मन का काव्य और सौंदर्य रहा होगा जो इसमें आरोपित करके देख लेते हैं। कभी मौक़ा मिलेगा तो वह हवाई जहाज़ से ताज की सुंदरता के समग्र हो पाने की कोशिश करेगा। कई विहंगम चित्र इस तरह के देखे तो हैं...और तब सारे वातावरण के बीच कोई बात लगी तो है...मगर ये चश्मे के काँचों में झलमलाते, धूप में चमकते ताज...। खिंचाव वहीं थम गया। उसने बड़े बेमालूम-से ढंग से गहरी साँस ली और अपने हाथ हटा लिए, आहिस्ते से।—’नहीं, यहाँ नहीं। कोई देख लेगा...’ यह उसे क्या हो गया...?

 

सहसा मीरा सचेत हो आई। उमड़ती लाज छिपाने के लिए सकपकाकर इधर-उधर देखा, कोई भी तो नहीं था। पास वाली लाल-लाल ऊँची दीवार पर अभी-अभी राज-मज़दूर-से लगनेवाले मरम्मतिए लोग आपस में हँसी-मज़ाक़ करते एक दूसरे के पीछे भागते गए हैं। बंदर की तरह दीवार पर भाग लेने का अभ्यास है। रविश के पार-पड़ोस के लॉन में दो-तीन माली पाइपों को इधर-उधर घुमाते पानी लगा रहे थे—वे भी अब नहीं हैं। खाना खाने गए होंगे। मीरा ने बग़ल से साड़ी खींचकर कंधे का पल्ला ठीक कर लिया। फिर विजय ने अनमने भाव से घास का एक फूल तोड़ा और आँखों के आगे उँगलियों में घुमाने लगा। मीरा ने चश्मा उतारकर, मुँह से हल्की-सी भाप दी और साड़ी से काँच पोंछे, बालों की लटों को कानों के पीछे अटकाया और चश्मा लगाकर कलाई की घड़ी देखी।

बड़ा बोझिल मौन आ गया था दोनों के बीच। विजय को लगा, उन्हें कुछ बोलना चाहिए, वरना यह चुप्पी का बोझ दोनों के बीच की किसी बहुत कोमल चीज़ को पीस देगा। हथेली पर यूँही उस तिनके से क्रास और त्रिकोण बनाता वह शब्दों को ठेलकर बोला, “तो फिर अब चलें...? देर बहुत हो रही है...”

 

मीरा ने सिर हिला दिया। लगा, जैसे वह कुछ कहते-कहते रुक गई हो या प्रतीक्षा कर रही हो कि विजय कुछ कहना चाहता है, लेकिन कह नहीं पा रहा। फिर थोड़ी देर चुप्पी रही। कोई नहीं उठा। तब फिर उसने मरे-मरे हाथों से जूतों के फीते कसे, अख़बार में रखे और संतरे और मूँगफली के छिलके फेंके। बैठने के लिए बिछाए गए रूमाल समेटे गए और दोनों टहलते हुए फाटक की तरफ़ चले आए।

तीन का समय होगा—हाथ में घड़ी होते हुए भी उसने अंदाज़ लगाया। धूप अभी भी बहुत तेज़ थी। एकाध बार गले और कनपटियों का पसीना पोंछा। आते समय तो बारह बजे थे। उस वक़्त उसे हँसी आ रही थी, मिलने का समय भी उन लोगों ने कितना विचित्र रखा है...

 

जैसे इस समय से बहुत दूर खड़े होकर उसने दुहराया था—बारह...बजे, जून का महीना और ताजमहल का लॉन। वह पहले आ गया था और प्रतीक्षा करता रहा था। उस समय कैसी बेचैनी, कैसी छटपटाहट, कैसी उतावली थी...यह समय बीतता क्यों नहीं है? बहुत दिनों से घड़ी की सफ़ाई नहीं हो पाई, इसलिए शायद सुस्त है। अभी तक नहीं आई। इन लड़कियों की इसी बात से सख़्त झुँझलाहट होती है। कभी समय नहीं रखतीं। जाने क्या मज़ा आता है इंतिज़ार कराने में! वह जान-बूझकर उधर आने वाले रास्ते की ओर से मुँह फेरे था। उम्मीद कर रहा था कि सहसा मुड़कर उधर देखेगा तो पाएगा कि वह आ रही है। लेकिन दो-तीन बार ऐसा कर चुकने के बाद भी वह नहीं आई। जब दूसरी ओर मुँह मोड़े रहकर भी वह कनखियों से उधर ही झाँकने की कोशिश करता तो ख़ुद अपने पर हँसी आती। अच्छा, सीढ़ियाँ उतरकर आने वाले तीन व्यक्तियों को वह और देखेगा और अगर इसमें भी मीरा नहीं हुई तो ध्यान लगाकर किताब पढ़ेगा—जब आना हो, आ जाए। एक-दो-तीन! हो सकता है, अगली वही हो। हिश, जाए जहन्नुम में नहीं आती तो, हाँ तो नहीं! अच्छा, आओ, तब तक यही सोचें कि मीरा इन तीन सालों में कैसी हो गई होगी? कैसे कपड़े पहनकर आएगी? एक-दूसरे को देखकर वे क्या करेंगे? हो सकता है, आवेश से लिपट जाएँ, कुछ बोल न पाएँ। उसके साथ ऐसा होता नहीं है, लेकिन कौन जाने, उस आवेश में...।

आख़िर वह आई तो वह उसे पास आते देखता रहा था। हर बार वह उधर से निगाहें हटाने की कोशिश करता कि उसे यूँ न देखे, पास आने पर ही देखे और हठात् मिलने के थ्रिल को महसूस करे। लेकिन वह देखता रहा था और निहायत ही संयत भाव से बोला था, “नमस्ते मीरा जी!” झेंपकर मीरा मुस्कुरा पड़ी थी। धूप में चेहरा लाल पड़ गया था। फिर दोनों इस लॉन में आ बैठे थे—ऐसे अचंचल, ऐसे आवेशहीन, जैसे रोज़ मिलते हों।

 

“मैंने सोचा, तुम शायद न आओ। याद न रहे।”

“आपने लिखा था तो याद कैसे नहीं रहता? लेकिन टाइम बड़ा अजीब है।”

 

“हाँ, शरद-पूर्णिमा की चाँदनी रात तो नहीं ही है।” अपने मज़ाक़ पर वह ख़ुद ही व्यर्थता महसूस करता, गंभीर बनकर बोला, “इस वक़्त यहाँ ज़रा एकांत होता है।”

सचमुच अजीब टाइम था—मीरा के साथ एक-एक क़दम लौटते हुए उसने सोचा—’दोपहर की धूप और... और दो प्यार करते प्राणी!’ ‘प्यार करते प्राणी...’उसने फिर दुहराया। यह प्यार था? जैसे बरसों बाद मिलने वाले दो मित्र हों, जिनमें बातें करने के विषय चुक गए हों। सफ़ेद संगमरमर पर धूप पड़ रही थी, चौंधा था इसलिए उधर पीठ कर ली थी। रह-रहकर झुँझलाहट आती—किस शाप ने हमारे ख़ून को जमा दिया है? यह हो क्या गया है हमें? कोई गर्मी नहीं, कोई आवेश और कोई उद्वेग नहीं...क्या बदल गया है इसमें? हाँ, मीरा का रंग कुछ खुल गया है...शरीर निखर आया है...

 

लौटते समय भी उसकी समझ में नहीं आया कि यह बोझ, यह खिंचाव क्या है...दोनों यूँही घास में काटी हुई लाल पत्थरों की जाली पर क़दम-क़दम टहलते हुए सीढ़ियों तक जाएँगे...फाटक में बैठे हुए गाइडों और दरबानों की बेधती याचक निगाहों को बलपूर्वक झुठलाते, बजरी पर चरचर-चरचर करते हुए ताँगे या रिक्शे में जा बैठेंगे...और एक मोड़ लेते ही सब कुछ पीछे छूट जाएगा।...कल वह लिखेगा—‘मेरी मीरा, कल के मेरे व्यवहार पर तुम्हें आश्चर्य हुआ होगा। हो सकता है, बुरा भी लगा हो... लेकिन...लेकिन...‘और फिर चश्मे के काँचों में झाँकता ताजमहल साकार हो आया। ‘तुम्हारी पलकों पर तैरते दो ताजमहल’—कितना सुंदर वाक्य है! (यह तो नई कविता हो गई!) टैगोर ने देखा होता तो ‘काल के गालों पर ढुलक आई आँसू की बूँद’ कभी न कहते...। कहते—’गालों पर ढुलक आए आँसुओं में झाँकते ताजमहल की रुपहली मछलियों-सी परछाइयाँ’...लेकिन मीरा की आँखों में तो उसे नमी का भी आभास नहीं हुआ था। कितने जड़ हो गए हैं हम लोग भी आजकल! वह कल वाले पत्र में लिखेगा—‘हक्सले की नक़ल नहीं कर रहा, जाने क्यों, मुझे ताजमहल कभी ख़ूबसूरत नहीं लगा। लेकिन पहली बार जब मैंने तुम्हारी पलकों पर ताज की परछाईं देखी तो देखता रह गया...पिछले दिनों की एक अजीब-सी बात मुझे याद हो आई, उस क्षण...’

अरे हाँ, अब याद आया कि क्यों वह अचानक यों सुस्त हो गया था। उस बात को भी कभी भूला जा सकता है? ‘हाँ, मेरे लिए तो वह बात ही थी...’ वह लिखेगा। उसे लगा, मन-ही-मन वह जिसे ही संबोधित कर रहा है, जिसे पत्र लिख रहा है वह साथ-साथ चलने वाली यह मीरा नहीं है। वह तो कोई और है... कहीं दूर...बहुत दू...र...वही मीरा तो उसकी असली बंधु और सखा है, यह...यह...इससे तो जब-जब मिला है, इसी तरह उदास हो गया है। लेकिन उस मीरा से मिलने का आकर्षण इसके पास खींच लाता है। इसकी तो जाने कितनी बातें हैं, जो उसे क़तई पसंद नहीं हैं। जैसे? वह याद करने की कोशिश करने लगा, जैसे उसे क्या-क्या पसंद नहीं है? जैसे इस समय उसे इसी बात पर झुँझलाहट आ रही है कि मीरा नीचे बनी जाली के पत्थरों पर ही पाँव रखकर क्यों नहीं चल रही, बीच-बीच में घास पर पाँव क्यों रख देती है...

 

और इस सबके पार दोनों कान लगाए रहे कि दूसरा कुछ कहे। एक बात सोचकर सहसा वह ख़ुद ही मुस्कुरा पड़ा—जब वे लोग बहुत बड़े-बड़े हो जाएँगे; समझो चालीस-पचास साल के, तो हँस-हँसकर कैसे दूसरों को अपनी-अपनी बेवक़ूफ़ियाँ सुनाया करेंगे—कैसे वे लोग छिप-छिपकर ताजमहल में मिला करते थे!

‘चार-पाँच साल हो गए होंगे उस बात को...’ उसके मन के भीतरी स्तरों पर पत्र चलता रहा। यह सब वह उस पत्र में लिखेगा नहीं, वह सिर्फ़ उस बहाने क्रमबद्ध शब्दों में उस सारी घटना को याद करने की कोशिश कर रहा है...वह, देव, राकाजी और मुनमुन इसी तरह तो लौट रहे थे, चुप-चप, उदास और मनहूस साँझ थी इसलिए परछाइयाँ ख़ूब लंबी-लंबी चली गई थीं...

 

अच्छी तरह याद है, सितंबर या अक्टूबर का महीना था। कॉलेज से आकर चाय का कप होंठों से लगाया ही था कि किसी ने बताया, “आपको कोई साहब बुला रहे हैं।” वह अनखाकर उठा—कौन आ गया इस वक़्त?

“अरे, आप!”

 

“पहचाना या नहीं, आपने?”

“अरे साहब ख़ूब, आपको नहीं पहचानूँगा?” लेकिन सचमुच उन्होंने पहचाना नहीं था। देखा ज़रूर है कहीं, शायद कलकत्ता में। ऐसा कई बार हुआ है, लेकिन वह भरसक यह जताने की कोशिश करता है कि पहचान रहा है और बातचीत से परिचय के सूत्र पकड़कर याद करने की कोशिश करता है, “आइए न भीतर...”

 

“नहीं मिस्टर माथुर, बैठूँगा नहीं। गली के बाहर मेरी वाइफ़ और बच्चा खड़े हैं...” उन्होंने क्षमा चाहने के लहज़े में कहा, “आप कुछ कर रहे हैं क्या?...”

“लेकिन उन्हें वहाँ...? यहीं बुला लीजिए न...”

 

“नहीं, देखिए, ऐसा है कि हम लोग ज़रा ताज देखने आए थे। याद आया आप भी तो यहीं रहते हैं। जगह याद नहीं थी, सो एक-डेढ़ घंटे भटकना पड़ा। ख़ैर, आप मिल गए। अब अगर कुछ काम न हो तो...बात ऐसी है कि हमें आज ही लौट जाना है...” वे सीढ़ी पर एक पाँव रखे खड़े थे, “आप किसी तरह के संकोच में न पड़िए, पाँवों में चप्पल डालिए और चले आइए।”

गली के बाहर गाड़ी खड़ी थी। पीछे का दरवाज़ा खुला था और उसको पकड़े पिछले मडगार्ड से टिकी एक महिला खड़ी थी—गहरी हरी बंगलौरी रेशम की साड़ी, बंगाली ढंग का चौड़ा-चौड़ा जूड़ा और बीचों-बीच जगमग करता अठपहलू रुपहला सितारा। मडगार्ड पर छोटा-सा चार-पाँच साल का बच्चा फिसलते जूतों को जैसे-तैसे रोके बैठा था। दोनों बाँहों से उसे सँभाले हुए वे उसकी कलाई पकड़े छोटी-सी अँगुली से धूल-लदे मडगार्ड पर लिखा रही थी—टी.ए.जे। जूतों की आवाज़ से चौंककर मुड़ीं और स्वागत में मुस्कुराई। बच्चे को सँभालकर उतारा, फिर दोनों हाथ जोड़ दिए। फिर ख़ुद ही बोली, “देखिए, आपसे वायदा किया था कि...”

 

“हज़रत आ ही नहीं रहे थे...” वे बीच में ही बात काटकर बोले। फिर सहसा बोले, “अच्छा राका, अब बैठो वरना अँधेरा हो जाएगा तो देखने का मज़ा भी नहीं रहेगा।”

राका...राका...हाँ, कुछ याद तो आ रहा है। ड्राइवर की बग़ल में बैठकर उसने एकाध बार घूमकर देखा, जैसे यहीं कहीं उनका नाम भी लिखा मिल जाएगा।

 

“कैसे हैं?—बहुत दिनों बाद मिले हैं। याद है आपको, कलकत्ता में हम लोग मिले थे...?... उस दिन हम लोगों ने आपको कितनी देर कर दी थी”... सुनहला रंग, कानों में गोल कुंडल, बहुत ही बेमालूम-सी लिपस्टिक। साड़ी का पल्ला साधने के लिए खिड़की पर टिकी हुई कुहनी...

अरे हाँ, अब याद आया—इनसे तो मुलाक़ात बड़े अजीब ढंग से हुई थी। न्यू मार्केट के एक रेस्तराँ में बैठा वह शौक़िया अपनी-अपनी संगीत-कला का प्रदर्शन करने वालों को देख रहा था। फिर जाने क्या मन में आया कि ख़ुद भी उठकर माउथ-ऑरगन पर देर तक सिनेमा के गीतों की धुनें निकालता रहा। उस छोटे-से मंच से हटकर जिस मेज़ पर वह बैठा था, उसी पर बैठे थे ये लोग, यह राका जी और मिस्टर...क्या? हाँ, मिस्टर देव।

 

“सचमुच आपने बहुत ही सुंदर बजाया। बड़ी अच्छी प्रैक्टिस है।” देव ने उसके बैठते ही कहा। रूमाल से बाजे को अच्छी तरह पोंछकर जेब में रख ही रहा था कि चौंक गया। राका के चेहरे पर प्रशंसा उतर आई थी और यूँही कप के ऊपर हथेली टेके, वह एकटक मेज़ को देख रही थी।

“आपकी चाय तो पानी हो गई होगी। और मँगाए देते हैं। बैरा, सुनो इधर...”

 

उसके मना करने पर भी चाय और आई। “छुट्टियों में घूमने आए हैं...? अच्छा, कैसा लगा कलकत्ता आपको...जी हाँ, गंद तो है बंबई के मुक़ाबले...लेकिन एक बार मन लग जाने पर छोड़ना मुश्किल हो जाता है...” फिर प्रशंसा, कृतज्ञता का आदान-प्रदान, परिचय और रात देर तक उनके लोअर सर्कुलर रोड के फ़्लैट पर बातें, खाना, कॉफ़ी और संगीत। राका को सितार का शौक़ है। देव किसी विदेशी कंपनी के इंचार्ज मैनेजर की संगति में विदेशी सिंफनियाँ पसंद करते हैं। उसका माउथ-ऑरगन सुनने के बाद राका जी ने सितार सुनाया था और फिर देव निहायत ही ख़ूबसूरत प्लास्टिक के लिफ़ाफ़ों में बंद अपने विदेशी रिकॉर्ड निकाल लाए थे। एक-एक रिकॉर्ड आध घंटे चलता था और उसमें तीन-तीन कंपोज़ीशंस थे। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया था, लेकिन वह बैठा लिफ़ाफ़ों पर लिखे हुए परिचय और संगीतज्ञ की तसवीर को ज़रूर ग़ौर से देखता रहा था। कोई चियाकोवस्की या कुछ बेंगर था जिसका नाम वे बार-बार लेते थे। एक-एक रिकॉर्ड चालीस-पचास रुपए का था। बीच-बीच में, “कभी ज़रूर आएँगे आगरा। बहुत बचपन में एक बार देखा था, शायद दिमाग़ में जो नक़्शा है उससे मेल ही न खाए। शादी के बाद एक बार देखने का प्रोग्राम बहुत दिनों से बना रहे हैं। ये तो हर छुट्टी में पीछे पड़ जाती हैं। जी नहीं, इन्होंने नहीं देखा... इधर ही रहे इनके फ़ादर वग़ैरा सब। अब तो आप वहाँ हैं ही...” उस दिन दोनों देरी के लिए रास्ते-भर क्षमा माँगते हुए अपनी गाड़ी पर ही विवेकानंद रोड तक छोड़ने आए थे। रास्ते-भर बातचीत के टुकड़े, सितार की गूँज और सिंफनी की कोई डूबती-सी दर्दीली कराह उसे अभिभूत किए रही...कैसे अजीब ढंग से परिचय हुआ है, कितना सुखी जोड़ा है उसे बहुत ही ख़ुशी हुई थी। बच्चा बाद में आया है, नाम है मुनमुन।

देव बता रहे थे, “नुमाइश में हमारा स्टाल आया है न, सो हम लोग भी दिल्ली आए थे। सोचा, इतने पास से, यूँ बिना देखे लौटना अच्छा नहीं है। आपको यूँही घसीट लाए, कोई काम तो...”

 

“नहीं, नहीं...” जल्दी से कहा। उसे और तो सब बातें याद आ रही थीं, लेकिन यह याद ही नहीं आ रहा था कि इन मिस्टर देव के आगे-पीछे क्या लगता है। बड़ी बेचैनी थी। कैसे जाने? बस, उस मुलाक़ात के बाद फिर कभी भेंट नहीं हुई। याददाश्त अच्छी है इन लोगों की, “आपने याद ख़ूब रखा...” सोचा, उस मुलाक़ात में ऐसी कोई ख़ास बात भी तो नहीं थी।

“जब भी हम लोग ताज की बात करते, आपकी बात याद आ जाती। और कोई दिन ऐसा नहीं गया जब ताज की बात न आई हो...” फिर राका जी की ओर देखकर ख़ुद ही बोले, “आज हमारे विवाह को सातवाँ वर्ष पूरा हुआ है...आपके सामने यह मुनमुन नहीं था...”

 

“मुनमुन, तुमने अंकल जी को मत्ते नहीं किया? कहो, अंकल जी, आज हमाले पापा-डैडी के विवाह की सातवीं वर्छगाँठ है...” राका जी उसके हाथ जुड़वाती बोली, “बहुत ही शैतान है। मुझे दिन-भर ख़याल रखना पड़ता है कि किसी दिन कुछ कर-करा न ले।”

“तब तो आपको बधाई देनी चाहिए...” लेकिन इस सबके पार विजय को लगा, कहीं घुटन है जो अदृश्य कुहरे की तरह गाढ़ी होती हुई छाई है। रहा नहीं गया, पूछा, “आप कुछ सुस्त हैं। तबीअत...”

 

“नहीं जी।” उन्होंने दोनों हाथ उठाकर एक क्लिप ठीक किया और स्वस्थ ढंग से मुस्कुराने का प्रयत्न करके कहा, “गाड़ी में बैठे-बैठै पाँच घंटे हो गए। एक घंटे से तो यहीं आपको ही खोज रहे हैं...”

“सच्च, सचमुच बहुत ज़ियादती है यह तो आपकी।” कृतज्ञता भाव से वह बोला, “कम-से-कम मुँह-हाथ तो धो ही लेतीं राका जी।”

 

“सब ठीक है—लौटना भी तो है न आज ही।”

फिर सभी ने ख़ूब घूम-घूमकर ताज देखा था। मुनमुन का एक हाथ देव के हाथों में था और एक राका जी के। कभी-कभी तो तीनों आपस में ही ऐसे व्यस्त होकर खो जाते कि विजय को लगता—वह बेकार ही अपनी उपस्थिति से इनके बीच विघ्न बन रहा है। ऊपर इमारत के सफ़ेद-काले चबूतरे पर देव बड़ी देर तक पैसा लुढ़काकर उसके पीछे भागते और बच्चे को खिलाते रहे, और विजय के साथ-साथ राकाजी जालियों की बनावट, दरवाज़े पर लिखी क़ुरान की आयतें और बूटों की नक़्क़ाशी देखती रहीं। साँझ की पीली-पीली सुहानी धूप थी। लॉनों की नरमी साँवली हो आई थी, मोरपंखी और चौड़े-चौड़े ताड़ जैसे पत्तों के गुंबदाकार कुंज मोमबत्ती की हरी-सुनहली लौ जैसे लगते थे—जैसे आनंद में फूले-फूले कबूतर हों और अभी हुलसकर फुरहरी ले लेंगे तो चिनगारियों की तरह सुर्ख़ फूल इधर-उधर बिखर पड़ेंगे। वे लोग भीतर क़ब्रों के पास अपनी आवाज़ गुँजाते रहे—कैसी लरजती-सी तैरती चली जाती है। जैसे बहुत ही महीन रेशों का बना हुआ, घड़ी में लगे बाल-स्प्रिंग की तरह बड़ा-सा वर्तुलाकर कुछ है जो कभी सिकुड़कर सिमट उठता है। देव की आवाज़ थी, “रा का...रा का...रा-का...” एक-दूसरे पर चढ़ते चले जाते शब्द...दूर खोते हुए...किन्हीं अनजानी घाटियों की तलहटियों में—“मुनमुन मु उ-उ न-अ-अ...” देव देर तक डूबे हुए इस खेल को खेलते रहे थे। लगता था, उनके भीतर है कुछ, जो इस खेल के माध्यम से अभिव्यक्ति पा रहा है। वह राका या मुनमुन का नाम ले देते और देर तक अँधेरे में इन शब्दों को डूबता-खोता देखते रहते—जैसे हाथ बढ़ाकर उन्हें वापस पकड़ लेना चाहते हों। उन्हें कब्रों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। बड़ी देर बाद, बहुत मुश्किल से जब वे उस वातावरण से टूटकर बाहर निकले तो बहुत उदास और खोए-खोए थे। विजय के पास से मुनमुन को लेकर ज़ोर से छाती से भींच लिया।

 

बाहर निकलकर आए तो देखा कि नदी किनारे वाली बुर्जी के पास राका जी चुपचाप दूर शहर और लाल पुल की ओर देखती खड़ी हैं। सिंदूरी आसमान के गहरे सिलेटी बादल नदी के चौखटे में वाश-कलर की तरह फैल गए हैं। बुर्जी से लेकर बीच के मक़बरे तक चबूतरे की काली-सफ़ेद शतरंजी को सिमटती धूप ने तिरछा बाँट लिया है...हवा में साड़ी उनके शरीर से चिपक गई है और कानों के ऊपर की लटें उच्छृंखल हो आई हैं। देव बहुत देर तक उन्हें यूँही देखते रहे, जैसे उन्हें पहचानते ही न हों। और उस सारे वातावरण में, सफ़ेद पत्थर के उस विराट क़ैदख़ाने में जैसे किसी अभिशप्त जलपरी को यूँ भटकने के लिए छोड़ दिया गया हो...। यह जगह, यह वातावरण है ही कुछ ऐसा। विजय ने अपने-आपसे कहा और जान-बूझकर दूसरी तरफ़ हट आया। शायद राका जी मुमताज़ के प्रेम की बात सोच रही हों, अपने मरने के बाद अपनी ऐसी ही यादगार चाहती हों या कुछ भी न सोच रही हों—बस, पुल से गुज़रती रेल की खिड़की से झाँकती हुई, ताज को देखकर सौंदर्य और कल्पना की स्तब्ध ऊँचाइयों में खो गई हों...

अपनी छाती तक ऊँची पीछे की दीवार से मुनमुन नदी की ओर झाँकता हुआ हाथ हिला-हिलाकर नीचे जाते बच्चों को बुला रहा था। कौवे काँव-काँव करने लगे थे। मुनमुन के पास वह संगमरमर की दीवार पर झुककर हथेलियाँ टेके सामने की धारा और पेड़ों की घनी पाँतों को देखता रहा। जाने कब देव भी बराबर ही आ खड़े हुए...काफ़ी दूर हटकर उसी तरह बुर्जी के पास झुकी राका जी...हवा में फहराती साड़ी को एक हाथ से पकड़कर रोके हुए...

 

“भीतर की आवाज़ और गूँज को सुनकर बड़ी अजीब-सी अनुभूति होती है...होती है न? जैसे जाने किन वीरान जंगलों और पहाड़ों में आपका कोई बहुत ही निकट का आत्मीय खो गया है और आपकी निष्फल पुकारें टूट-टूटकर उसे गुहारती चली जाती हैं...चली जाती हैं और खो जाती हैं...। न वह आत्मीय लौटता है और न आवाज़ें—जैसे युगों से किसी की भटकती आत्मा उसे पुकारती रही हो और वह है कि गूँजों और झाँइयों में ही घुल-घुलकर बिखर जाता है...डूब जाता है...बिलमता है और साकार नहीं हो पाता...”

नदी में ताज की घनी-घनी परछाईं लहरों में टूट-टूट जाती थी...अनजाने ही देव की आँखों में आँसू भर आए।

 

“ऐसा ही होता है, ऐसे वातावरण में ऐसा ही होता है।” विजय ने अपने-आपसे कहकर मानो स्थिति को शब्द देकर समझना चाहा, “जब कोई किसी को बहुत प्यार करे, बहुत प्यार करे, और फिर ऐसी ख़ूबसूरत मनहूस जगह आ जाए तो कुछ ऐसी ही अनुभूतियाँ मन में आती हैं...अभी लॉन पर चलेंगे, मुनमुन के साथ किलकारियाँ मारेंगे—सब ठीक हो जाएगा...”

देव ने सुना और गहरी साँस लेकर बड़ी कातर निगाहों से विजय की ओर देखा। कुछ कहते-कहते रुक गए। और दोनों चुपचाप ही टहलते हुए सामने की ओर आ गए...मुनमुन राका जी के पास चला गया था। नीचे की सीढ़ियाँ उतरते-उतरते सहसा ही देव ने विजय के कंधे पर हाथ रख दिया था। कुछ कहने को होंठ काँपे, “आपको पता है मिस्टर विजय!” विजय स्वर और मुद्रा से चौंक गया था।

 

“नहीं...कुछ नहीं...” ऊपर हरी साड़ी की झलक दिखी और फिर दोनों सीढ़ियाँ उतर आए। जूते पहनते हुए बोले...“आपको ताज्जुब तो बहुत होगा कि हम यूँ अचानक आपको लिवा लाए...”

“नहीं तो, इसमें ऐसी क्या बात है?” विजय ने शिष्टता से कहा।

 

“हाँ, बात कुछ नहीं है, लेकिन बहुत बड़ी बात है।” फिर गहरी साँस।

अब विजय को लगा कि सचमुच कोई बहुत बड़ी बात है जो देव के भीतर से निकलने के लिए झटपटा रही है। तब पहली बार उसका ध्यान इस स्थिति की विचित्रता की ओर गया। बीच के चबूतरे तक दोनों बिलकुल चुप रहे...चबूतरे के ख़ूबसूरत कोनों वाले हौज़ में आग लग गई थी...गहरे साँवले आसमान में लाल-लाल गुलाबी बादलों के बगूले उतर आए थे। उलटे ताज की परछाईं दम तोड़ते साँप-सी इनके क़दमों पर फ़न पटक-पटककर लहरा रही थी। धूप ऊपर बुर्जियों पर सिमट गई थी। उस पर आँखें टिकाए देव बड़ी देर तक यूँ ही देखते रहे। सामने मुनमुन को लिए राका जी चली आ रही थीं, लेकिन जैसे कोई किसी को नहीं देख रहा हो—हाँ, विजय कभी उसे और कभी इसे या मशक लेकर आते भिश्ती को देखता रहा। टप-टप बूँदों की सर्पाकार लाइनें उसकी उँगलियों से टपक रही थीं। बड़े साहस से शब्दों को धकेल-धकेलकर देव बोले, “यह सारी स्थिति...यह...यह टूट जाने की हद तक आ जाने वाला चरमराता तनाव... मौत के पहले के ये कह-कहे। औपचारिकता का वह बर्फ़ीला कफ़न...शायद हममें से कोई इसे अकेला नहीं सह पाता...कोई एक चाहिए था जो इसकी ओर से हमारा ध्यान हटाए रखे...इस समाप्ति का गवाह बन सके।”

 

“मैं समझ नहीं सका मिस्टर देव...” घबराकर विजय ने पूछा था।

बूटों के दोनों पंजों पर ज़रा-सा मचककर देव निहायत ही इत्मिनान से धीरे से हँसे। “आप...आप—विजय साहब, यह हमारी आख़िरी संध्या है...” और विजय के कुछ पूछने से पहले ही उन्होंने कह डाला। “मैंने और राका ने निश्चय किया है कि अब हम लोगों को अलग ही हो जाना चाहिए...दोनों तरफ़ से शायद सहने की हद हो गई है...नसों का यह तनाव मुझे या उसे पागल बना दे, या कोई ऐसी-वैसी बेहूदगी करने पर मजबूर करे, इससे अच्छा हो कि दोनों अलग ही रहें। चाहे तो वह किसी के साथ सैटिल हो जाए। वह मुनमुन को रखना चाहती है, रखे। वैसे जब भी वह उसके बाधक लगे, निस्संकोच मेरे पास भेज दे...”

 

विजय का सिर भन्ना उठा। वह चुपचाप हौज़ की गहराई से तड़पती ताज की परछाईं पर निगाहें टिकाए रहा।

“लेकिन आप दोनों...” विजय ने कहना चाहा।

 

देव ने हाथ फैलाकर रोक दिया, “वह सब हो चुका। सारी स्थितियाँ ख़त्म हो गई। हमने तय किया कि क्यों न अपनी अंतिम संध्या हँसी-ख़ुशी काटें...मित्र बने रहकर ही हँसते-हँसते विदा लें...” फिर कुछ देर तक चुप रहकर कहा, “राका को बड़ी इच्छा थी कि ताज देखे, शादी की पहली रात उसने चाहा था कि हनीमून यहाँ ही हो...लेकिन...लेकिन...” फिर हाथ झटक दिया, “अजब संयोग है न?—लेकिन...”

लेकिन विजय को लगा था जैसे किसी डैम की रेलिंग पर झुका खड़ा है और नीचे से लाखों टन पानी धाड़-धाड़ करता गिरता चला जा रहा है...गिरता चला जा रहा है...और उसका सिर चकरा उठा—। नहीं, उससे किसी ने कुछ भी नहीं कहा। यह सब तो सिर्फ़ वह कल्पना कर रहा है। कहीं ऐसी अविश्वसनीय बात...ध्यान उसका टूटा देव की आवाज़ से, ‘उसे रोको राका, माली वग़ैरह मना करेंगे...नहीं मुनमुन!’ स्वर बहुत मुलायम था। और फिर देव ने दौड़कर प्यार से मुनमुन को दोनों बाँहों में उठा लिया और उसके पेट में अपना मुँह गड़ा दिया...मुनमुन खिलखिलाकर हँस पड़ा...आँखों में लाड़-भरे राका जी मुस्कुराती रहीं। नहीं, अभी जो कुछ सुना था, वह इन लोगों के आपसी संबंधों के बारे में नहीं था—हो नहीं सकता।

 

बहुत बार विजय ने राका जी का चेहरा देखना चाहा, लेकिन लगा, वे इधर-उधर के सारे वातावरण को ही पीने में व्यस्त हैं। चिड़ियाँ चहचहाने लगी थीं...

इन्हीं जालियों पर इसी तरह तो वे लोग चल रहे थे कि पास आकर धीरे से देव ने कहा था, “ राका से कुछ मत पूछिएगा...”

 

क्या पूछेगा वह राका जी से...?

“सॉरी, आपको यूँ घसीट लाए हम लोग...”

 

और इस बार कातर निगाहों से देखने की बारी विजय की थी...इतना ग़लत समझते हैं आप...

चार-पाँच साल हो गए, लेकिन बात कितनी ताज़ी हो आई है...वह, देव, राका जी और मुनमुन इसी तरह लौट रहे थे, चुपचाप, उदास और मनहूस...साँझ का बजरा रात का किनारा छूने लगा था। जैसे किसी वर्षों की तूफ़ानी यात्रा से वे तीनों लौटकर आ रहे हों। पेड़ों और इमारतों की परछाइयाँ ख़ूब लंबी-लंबी चौड़ी धारियों की तरह पीछे चली गई थीं...कुंजों और लॉन की हरियालियाँ अजीब टटकी-टटकी हो उठी थीं... हरियाली के सुरमई धुँधले काँच पर सफ़ेद फूल छिटक आए थे...

 

मीरा के चश्मे के काँचों में झाँकती परछाईं को देखकर, जाने क्यों उसे वही याद ताज़ी हो गई थी...वही ताज जो उस दिन हौज़ में मानो आसमानी जार्जेट के पीछे से झाँक रहा था और अपने-आपसे लड़ते हुए देव उसे बता रहे थे।...आज अगर देव होते तो क्या जवाब देता...? तो क्या वे भी उसी तरह अलग हो रहे हैं...?

सहसा चौंककर उसने मीरा को देखा। उसे लगा, जैसे उसने कुछ कहा है, “कुछ कह रही थीं क्या?”

 

“मैं?...नहीं तो।” फिर वही मौन और घिसटती उदासी का कंबल।

लगा, जैसे कोई मुर्दा-क्षण है जिसका एक सिरा मीरा पकड़े है और दूसरा वह, और उसे चुपचाप दोनों रात के सन्नाटे में कहीं दफ़नाने के लिए जा रहे हों...डरते हों कि किसी की निगाहें न पड़ जाएँ—कोई जान न ले कि वे हत्यारे हैं...कहीं किसी झाड़ी के पीछे इस लाश को फेंक देंगे और ख़ुश्बूदार रूमालों से कसकर ख़ून पोंछते हुए चले जाएँगे...भीड़ में खो जाएँगे...। जैसे एक-दूसरे की ओर देखने में डर लगता है...कहीं आरोप करती आँखें हत्या स्वीकारने के मजबूर न कर दें...

 

बाहर वे दोनों ताँगा लेंगे...झटके से मोड़ लेता हुआ ताँगा ढाल पर दौड़ पड़ेगा और ताजमहल पीछे छूटता जाएगा...और फिर ‘अच्छा’ कहकर सूखे होंठों के भरे स्वर पर मुस्कुराहट का कफ़न लपेटकर दोनों एक-दूसरे से विदा लेंगे...।

 

राजेंद्र यादव

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