नमस्कार,आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757
रविवार, 27 जनवरी 2019
बेसन की बर्फी (चक्की) बनाने की विधि – Besan ki Barfi Recipe in Hindi
रसीले गुलाब जामुन
1 कप सूजी\रवा
1 1/2 कप दूध
1 कप पानी
1 कप शक्कर
- इसमें घी डालकर गर्म करें.
- घी के गर्म होते ही इसमें बारीक वाली सूजी डालकर 2-3 मिनट तक चलाते हुए भूनना है.
- सूजी अच्छी तरह भूनने के बाद इसमें एक कप दूध डालें. फिर आधा चम्मच शक्कर डालकर मिलाते हुए पकाएं.
- दूध सूखने के बाद आधा कप और दूध डालें. इस बात का ध्यान रखें कि सूजी की गुठलियां न बनें. इसलिए इसे अच्छी तरह चलाते हुए मिलाएं.
- इसे तब तक पकाएं जबतक दूध सूख नहीं जाता है और सूजी का बढिया आटा नहीं बन जाता.
- आंच से उतारकर इस आटे को ठंडा कर लें.
- ठंडा होने के बाद आटे या मिश्रण को एक प्लेट पर निकाल लें और अच्छी तरह गूंद लें.
- गूंदने से पहले हथेलियों पर थोड़ा-सा घी लगा लें. और मिश्रण को 8-10 मिनट तक गूंदें.
- बढ़िया मुलायम आटा तैयार होने के बाद हथेलियों पर फिर से घी लगा लें और आटे की छोटी-छोटी लोइयां बना लें. अगर लोइयों में क्रैक आ रहा है तो फिर से आटे को गूंद लें.
- पुरे आटे से 16-18 लोइयां बन जाएंगी.
- अब कड़ाही में घी डालकर गर्म करें. आंच धीमी रखें और घी में एक-एक करके 10-12 लोइयां डालकर फ्राई करें.
- लोइयां पकने में 7-8 मिनट का समय लगेगा. जब गोल्डन ब्राउन हो जाएं तो घी से निकाल लें.
- जब तक गुलाब जामुन फ्राई हो रहे हैं तब एक दूसरे बर्तन में एक पानी और एक शक्कर डालकर आंच पर रखें.
- जब शक्कर अच्छी तरह घुल जाए तब आंच बंद कर दें.
- इतनी देर में गुलाब जामुन भी पक जाएंगे.
- आंच से उतारकर गुलाब जामुन को 1-2 घंटे तक चाशनी में डूबे रहने दें.
- इसके बाद निकालकर मजे से रवा वाले गुलाब जामुन का स्वाद लें.
शुक्रवार, 4 जनवरी 2019
गीता माता-मोहनदास करमचंद गांधी
तब भगवान ने उत्तर दिया- "हे पापरहित अर्जुन! आरंभ से ही इस जगत में दो मार्ग चलते आए हैं : एक में ज्ञान की प्रधानता है और दूसरे में कर्म की। पर तू स्वयं देख ले कि कर्म के बिना मनुष्य अकर्मी नहीं हो सकता, बिना कर्म के ज्ञान आता ही नहीं। सब छोड़कर बैठ जानेवाला मनुष्य सिद्ध पुरुष नहीं कहला सकता।" (गीता माता-मोहनदास करमचंद गांधी)
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सोमवार, 24 दिसंबर 2018
योद्धा संन्यासी विवेकानन्द- हंसराज रहबर
"अध्ययन का उद्देश्य सत्य की खोज था और नरेंद्र जिसे सत्य समझ लेता था, उसकी जी-जान से रक्षा करता था। जब देखता था कि कोई दूसरा उसके विपरीत भाव या मत व्यक्त कर रहा है तो नरेंद्र चट विवाद पर उतर आता था और अपने सशक्त तर्कों और युक्तियों द्वारा उसे परास्त करके दम लेता था। पराजित व्यक्ति के बार बिलबिला उठते थे और नरेंद्र पर दम्भी होने का आरोप लगाने में भी संकोच नहीं करते थे। पर नरेंद्र के मन में किसी के प्रति द्वेष भाव नहीं था। और अपनी ही बात को ऊंचा रखने के लिए वह कभी कुतर्क का सहारा नहीं लेता था। उसे जो कहना होता था दूसरे के सामने साफ-साफ कहता था।" (योद्धा संन्यासी विवेकानन्द- हंसराज रहबर)
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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018
बड़ी दीदी-शरतचंद्र चट्टोपाध्याय
"इस धरती पर एक विशेष प्रकार के प्राणी हैं, जो मानो फूस की आग हैं। वे तत्काल जल उठते हैं और झटपट बुझ भी जाते हैं। उनके पीछे हमेशा एक आदमी रहना चाहिए, जो जरूरत के अनुसार उनके लिए फूस जुटा दिया करे। जैसे गृहस्थ घरों की कन्याएं, मिट्टी के दीये जलाते समय उनमें तेल और बाती डालती हैं, उसी तरह वे उसमें एक सलाई भी रख देती हैं। जब दीपक की लौ कुछ कम होने लगती है, तब उस छोटी-सी सलाई की बहुत आवश्यकता पड़ती है। यदि वह न हो, तो तेल और बाती होते हुए भी, दीपक का जलना नहीं हो सकता।" (बड़ी दीदी-शरतचंद्र चट्टोपाध्याय)
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मंगलवार, 18 दिसंबर 2018
स्वेटर, कहानी संग्रह-अशोक जमनानी
पिछले कुछ महीनों के सारे दुःख उसे अचानक याद आ गए। हर एक दुःख का सामना करते वक्त एक भरोसा उसके साथ रहा कि कभी न कभी ये समय बीत जायेगा और वो फिर से अपनी पुरानी ज़िन्दगी पा लेगा। लेकिन आज न जाने क्यों उसके अपने पाँव ही उसका साथ नहीं दे रहे थे। मज़दूरी करते वक्त छह दिन वो इसी उम्मीद में काटता था कि शनिवार की रात से सोमवार सुबह तक वो अपने घर में अपनी मर्ज़ी का मालिक रहेगा। यह एक उम्मीद ही उसके भीतर दूसरी हर एक उम्मीद को जन्म देती थी। (स्वेटर, कहानी संग्रह-अशोक जमनानी)
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शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018
आँगन में एक वृक्ष- दुष्यन्त कुमार
"मुंशीजी ने कभी किसी से कड़वी बात नहीं कही, कभी किसी पर गुस्सा नहीं किया और कभी किसी को नाराज नहीं किया। हालाँकि कई बार मुंशीजी ने पिताजी के लिए काश्तकारों की जमीनें हड़पी, उन्हें बेदखल कराया या किसी पर सौ के बदले हजार रुपये की नालिश ठोक दी, मगर मीठे वे फिर भी बने रहे। अनेक ऐसे मौके भी आये जब मुंशीजी को उन लोगों की गालियाँ, धमकियाँ और जूते तक बरदाश्त करने पड़े। एक बार तो अपने भिक्खन चमार ने ही उन्हें स्टेशन से आते हुए, रास्ते में, मुंगड़पुर गाँव के ठीक बीचोंबीच पकड़कर दस जूते मारे थे" (आँगन में एक वृक्ष- दुष्यन्त कुमार)
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गुरुवार, 6 दिसंबर 2018
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग,
लेकिन आग जलनी चाहिए
दुष्यंत कुमार
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बुधवार, 5 दिसंबर 2018
हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़-विनोद कुमार शुक्ल
"अपने सबके अन्दर चाहे कोई कितना भी छोटा हो पर सबकी गहराई अन्दर की गहरी है- खुद अपने अन्दर भी गिरते पड़ते रहते हैं एक और संसार अपनी गहराई में चाहे उल्टा बसा हो बाहर के संसार से कभी वहीं रहे आने का मन करता है रह लेना चाहिए। (हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़-विनोद कुमार शुक्ल)
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