नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

नौकर की कमीज- विनोद कुमार शुक्ल

 "लोग सब्जी बाजार से लौटते समय कैसे सर्राफ की दुकान में घुस जाते हैं और एक सोने की अँगूठी खरीद लेते हैं? सोने की अँगूठी खरीदने घर का नौकर कभी नहीं जाएगा। सब्जी खरीदने जा सकता है। उससे एक-दो रुपये खो जाएँ, यहाँ तक तो ठीक है। पर दस-बीस रुपये वह नहीं पचा सकता। दफ्तर के साहब के लिए मँहगू कितना भी ईमानदार हो, पर सौ रुपये के लिए उसकी नीयत डोल सकती थी। यानी निन्यानवे रुपये तक वह ईमानदार था। हैसियत के अनुसार नीयत डोलने की सीमा निर्धारित होती है। मेरे जैसी हैसियतवाला, यानी संतू बाबू, जिसकी सालभर से ज्यादा नौकरी हो गई थी और करीब सालभर शादी को हो गया, वह चार-पाँच सौ में अपनी नीयत खराब नहीं करेगा।" (नौकर की कमीज- विनोद कुमार शुक्ल)



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लेबनान संकट

 महामारी और आर्थिक संकट से जूझ रहे मध्यपूर्वी देश लेबनान में मंगलवार को हुए धमाकों ने भारी तबाही मचाई है। राजधानी बेरूत के पोर्ट इलाके में एक वेयर हाउस में रखे 2750 टन अमोनियम नाइट्रेट के कारण कई छोटे-बड़े धमाके हुए, जिसने एक खूबसूरत शहर को मलबे और राख के ढेर में बदल कर रख दिया है। बताया जा रहा है कि इतनी बड़ी मात्रा में यह खतरनाक रसायन असुरक्षित तरीके से रखा हुआ था। 2013 में एक माल्दोवियन कार्गो शिप इस रसायन को लेकर जा रहा था, लेकिन तकनीकी खराबी आने के कारण इसे बेरूत में ही उतार दिया गया और उसके बाद से यह वेयरहाउस में रखा हुआ था। 

अमोनियम नाइट्रेट अमूमन खेती के लिए उर्वरक में नाइट्रोजन के स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसे ईंधन वाले तेल के साथ मिलाकर विस्फोटक भी तैयार किया जाता है, जिसका इस्तेमाल खनन और निर्माण उद्योगों में होता है। चरमपंथियों ने कई बार इसका इस्तेमाल बम बनाने में भी किया है। 

जानकारों का कहना है कि अमोनियम नाइट्रेट को अगर ठीक से स्टोर किया जाए, तो ये सुरक्षित रहता है। लेकिन अगर बड़ी मात्रा में ये पदार्थ लंबे समय पर ऐसे ही जमीन पर पड़ा रहा, तो धीरे-धीरे खराब होने लगता है। बेरूत के वेयरहाउस में रखे इस रसायन के बारे में भी यही कहा जा रहा है कि या तो इसका निपटारा किया जाना चाहिए था या फिर इसे बेच देना चाहिए था। 

लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार ने और संबंधित अधिकारियों ने इस ओर लापरवाही दिखाई और बेरूत को इतनी बड़ी औद्योगिक दुर्घटना का शिकार होना पड़ा। ये धमाके कितने शक्तिशाली थे, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 2 सौ किमी दूर साइप्रस में इसकी आवाज सुनी गई। धमाके के बाद जिस तरह की शॉकवेव उठी, उससे नौ किलोमीटर दूर बेरूत अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पैसेंजर टर्मिनल में शीशे टूट गए। इस हादसे में कम से कम 135 लोगों की मौत हो चुकी है और 5 हजार के करीब घायल हुए हैं। 

अस्पताल मरीजों और पीड़ितों से भर गए हैं। 3 लाख से अधिक लोगों के बेघर होने की आशंका है और 10-15 अरब डालर का नुकसान हो चुका है।  जहां धमाके हुए, वहां पास में ही सरकारी अनाज के गोदाम भी थे, जो अब पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं। इन गोदामों में रखा करीब 15 हजार टन अनाज राख हो चुका है और अब लेबनान के पास केवल एक महीने की खाद्य सामग्री है। 

इसका मतलब आने वाले समय में भयंकर खाद्य संकट देखने मिल सकता है। लेबनान अपनी जरूरत का अधिकतर अनाज आयात करता है, लेकिन पहले से आर्थिक संकट झेल रहे देश के पास और अनाज आयात करने के लिए पैसे नहीं हैं। 

कुछ लोगों की लापरवाही लाखों लोगों के जीवन के लिए भयावह संकट साबित हुई है। हालांकि लेबनान के राष्ट्रपति मिशेल आउन और प्रधानमंत्री हसन दियाब ने मामले की कड़ी जांच करने और दोषियों को सजा देने की बात कही है, लेकिन इतिहास के अनुभव यही बताते हैं कि इस तरह के हादसों के जिम्मेदार लोग किसी किसी तरह बच निकलते हैं और जनता अपने घावों के साथ कराहती रह जाती है। बीते वक्त में चेर्नोबिल से लेकर भोपाल गैस कांड तक कई भयावह औद्योगिक दुर्घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें इंसाफ मिलने की उम्मीद समय बीतने के साथ कम होती जाती है। 

वैसे इस तरह की दुर्घटनाओं में जहां ताकतवर लोगों का स्वार्थी चरित्र उजागर हो जाता है, वहीं आम जनता की उदारता की ताकत भी दिखने लगती है। बेरूत में धमाकों के बाद सरकारी राहत और मदद की प्रतीक्षा करने की जगह बहुत से युवा स्वयंसेवी बनकर सड़कों पर उतर गए। दास्ताने और मास्क पहने ये युवा मलबा हटाने, सफाई करने से लेकर घायलों की तीमारदारी में लग गए। 

कई लोगों ने भोजन-पानी और दवा का इंतजाम किया। बहुत से लोगों ने अपने घरों में बेघरों को पनाह दी। कई व्यापारियों ने मरम्मत के काम को मुफ्त कर देने का प्रस्ताव रखा। ये तमाम लोग सरकार के ढीले-ढाले रवैये से नाराज हैं और अपने देशवासियों की मदद खुद करना चाहते हैं। बहुत से देश भी इस मुसीबत की घड़ी में लेबनान की मदद के लिए आगे आए हैं। 

जर्मनी ने खोज और बचाव विशेषज्ञ भेजे, मेडिकल सहायता का प्रस्ताव रखा है साथ ही रेडक्रास को 10 लाख यूरो की मदद की है। फ्रांस ने राहत और चिकित्सा सामग्री भेजी और इसके साथ राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों खुद लेबनान पहुंच गए। ऐसा करने वाले वे पहले विदेशी नेता बन गए। आस्ट्रेलिया, इराक, मिस्र, जोर्डन और अमेरिका जैसे तमाम देशों ने भी मदद की पेशकश की है। 

इस मानवीय संकट के वक्त मदद और सहानुभूति दवा की तरह साबित होते हैं। वैसे लेबनान के जख्मों को भरने में काफी वक्त लगेगा, यह बात भारत के लोग भी समझ सकते हैं, जो खुद भोपाल गैस कांड का पीड़ित है। उस घटना के लगभग 3 दशक बाद भी पूरी तरह उबरा नहीं जा सका है। इस तरह की घटनाओं के वक्त जांच और एहतियात जैसे शब्द काफी जोर देकर इस्तेमाल किए जाते हैं, लेकिन वक्त बीतने के साथ फिर लापरवाही का सिलसिला शुरु हो जाता है। 

भारत में ही भोपाल की घटना के बाद औद्योगिक दुर्घटनाओं को पूरी तरह रोका नहीं जा सका। लेबनान की घटना से दुनिया को एक चेतावनी और मिल गई है, पर क्या सरकारें इसे सुनने को तैयार हैं।


(साभार- देशबंधु)

शनिवार, 25 जुलाई 2020

भारत विकास की दिशाएं- अमर्त्य सेन, ज्यां दृज

 "स्वतंत्र भारत की विफलताओं के लिए अक्सर बाजार अभिप्रेरणाओं के अपर्याप्त विकास को उत्तरदायी ठहराया जाता है। हमारा तर्क होगा कि यह विचार काफी हद तक ठीक होते हुए भी देश की सभी विफलताओं के निदान के लिए पर्याप्त नहीं है। ये विफलतायें अनेक हैं, जैसे - सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएँ, सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था, स्थानीय लोकशाही, पर्यावरण प्रतिरक्षण आदि। बाजार अभिप्रेरणाओं को कुंठित रखना तो इस व्यापक परिदृश्य का एक अंगमात्र है। इन विफलताओं को केवल सरकारी 'अतिसक्रियता' का परिणाम मानना ठीक नहीं होगा। जहाँ किन्हीं क्षेत्रों में सरकार अतिसक्रिय रही है वहीं अन्य कार्यों में इसकी 'निष्क्रियता' भी आकलन क्षमता से परे रही है।"

 (भारत विकास की दिशाएं- अमर्त्य सेन, ज्यां दृज)



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शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

अछूत- मुल्कराज आनंद

 "अछूतों को कुंए की दीवार चढ़ने की मनाही थी। यदि वे कुंए से पानी निकाल लेते, तो उच्च वर्ण के हिन्दुओं के अनुसार पानी भ्रष्ट हो जाता। इसी प्रकार उन्हें कुंए के पास बने नाले तक जाना भी मना था; क्योंकि इस प्रकार नाला भी भ्रष्ट हो जाता। अछूतों का अपना कोई कुंआ नहीं था। बुलाशाह जैसे पहाड़ी शहर में कुंआ खोदने के लिए कम से कम एक हजार रुपयों की लागत आती। लाचार होकर उन्हें सवर्ण हिन्दुओं के चरणों में बैठकर ही, उनकी दया पर ही निर्भर रहना होता था, ताकि वे उनके घड़ों में कुछ पानी उडेल दें। (अछूत- मुल्कराज आनंद)




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बुधवार, 8 जुलाई 2020

शब्दों का सफ़र- अजित वडनेरकर

 "शब्द विश्व के सबसे बड़े यायावर हैं। वे मनुष्य की अभिव्यक्ति के घोड़े पर सवार होकर यात्रा करते हैं। मानव एक मुसाफ़िर है, जो अपने साथ अपनी बोलचाल की भाषा लेकर चलता है। कभी विराम करता है, कभी आगे बढ़ता है। मुसाफ़िर जहाँ रुकता है, वहाँ अपनी कुछ-न-कुछ पहचान छोड़ जाता है। यह छूटी हुई पहचान उसके शब्द भी हो सकते हैं, जो उस स्थान पर उस मुसाफ़िर के स्मारक के रूप में रह जाते हैं। फिर मुसाफ़िर को तो भुला दिया जाता है, पर उसके छूटे हुए शब्द बाक़ायदा इस्तेमाल होते रहते हैं। बोलचाल की भाषाओं के माध्यम से शब्दों के आदान-प्रदान का यह सिलसिला अनादि काल से आज तक चला आ रहा है। इतना जरूर हुआ कि समय की छाप उनपर पड़ती रही है, जिससे कभी कभी शब्द की ध्वनियाँ बदलीं, कभी उनके अर्थ बदले और कभी दोनों ही बदल गए। और सब कुछ इतना बदल गया कि उनके मूल रूपों की पहचान कठिन हो गई। Ajit Wadnerkar अजित वडनेरकर ने अथक अध्यवसाय से उन शब्दों के मूल रूपों की खोज की और आज के पाठकों से उनका परिचय कराया। यह परिचय प्राप्त कर पाठकों को सुखद आश्चर्य होता है, क्योंकि अब तक वे जिन्हें पराया समझते थे, वे स्वजन निकले। यह भारतीय आर्य परिवार की बहुत बड़ी सेवा है। उन्होंने उसके नए आयाम खोजे और उसका विस्तार किया। (सुरेश कुमार वर्मा)" (शब्दों का सफ़र- अजित वडनेरकर)



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मंगलवार, 7 जुलाई 2020

क्यों खास है यह पत्थर!

 दही जमाने के लिए लोग अक्सर जामन ढूंढ़ते नजर आते हैं... वहीं राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित इस गांव में जामन की जरूरत नहीं पड़ती है...यहां ऐसा पत्थर है जिसके संपर्क में आते ही दूध जम जाता है... इस पत्थर पर विदेशों में भी कई बार रिसर्च हो चुकी है...फॉरेनर यहां से ले जाते हैं इस पत्थर के बने बर्तन....।

स्वर्णनगरी जैसलमेर का पीला पत्थर विदेशों में अपनी पहचान बना चुका है... इसके साथ ही जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर स्थित हाबूर गांव का पत्थर अपने आप में विशिष्ट खूबियां समेटे हुए है..इसके चलते इसकी डिमांड निरंतर बनी हुई है...हाबूर का पत्थर दिखने में तो खूबसूरत है ही, साथ ही उसमें दही जमाने की भी खूबी है... इस पत्थर का उपयोग आज भी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में दूध को जमाने के लिए किया जाता है... इसी खूबी के चलते यह विदेशों में भी काफी लोकप्रिय है..इस पत्थर से बने बर्तनों की भी डिमांड बढ़ गई है..।

कहा जाता है कि जैसलमेर पहले अथाह समुद्र हुआ करता था और कई समुद्री जीव समुद्र सूखने के बाद यहां जीवाश्म बन गए व पहाड़ों का निर्माण हुआ.. हाबूर गांव में इन पहाड़ों से निकलने वाले इस पत्थर में कई खनिज व अन्य जीवाश्मों की भरमार है.
 जिसकी वजह से इस पत्थर से बनने वाले बर्तनों की भारी डिमांड है। साथ ही वैज्ञानिकों के लिए भी ये पत्थर शोध का विषय बन गया है... इस पत्थर से सजे दुकानों पर बर्तन व अन्य सामान पर्यटकों की खास पसंद होते हैं और जैसलमेर आने वाले वाले लाखों देसी विदेशी सैलानी इसको बड़े चाव से खरीद कर अपने साथ ले जाते हैं...।

▪️क्यों है खास
▪️हाबूर का पत्थर

इस पत्थर में दही जमाने वाले सारे कैमिकल मौजूद है... विदेशों में हुए रिसर्च में ये पाया गया है कि इस पत्थर में एमिनो एसिड, फिनायल एलिनिया, रिफ्टाफेन टायरोसिन हैं... ये कैमिकल दूध से दही जमाने में सहायक होते हैं... इसलिए इस पत्थर से बने कटोरे में दूध डालकर छोड़ देने पर दही जम जाता है…. इन बर्तनों में जमा दही और उससे बनने वाली लस्सी के पयर्टक दीवाने हैं... अक्सर सैलानी हाबूर स्टोन के बने बर्तन खरीदने आते हैं... इन बर्तनों में बस दूध रखकर छोड़ दीजिए, सुबह तक शानदार दही तैयार हो जाता है, जो स्वाद में मीठा और सौंधी खुशबू वाला होता है... इस गांव में मिलने वाले इस स्टोन से बर्तन, मूर्ति और खिलौने बनाए जाते हैं... ये हल्का सुनहरा और चमकीला होता है.. इससे बनी मूर्तियां लोगों को खूब अट्रैक्ट करती हैं..।

साभार-वैदिक साइंस
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रविवार, 5 जुलाई 2020

रोग प्रतिरोधकता


बहुत ही साधारण शब्दों में कहें तो शरीर की रोग पैदा करने वाले हानिकारक कीटाणुओं को कोशिकाओं के अंदर प्रवेश ना करने देने की क्षमता को ही रोगप्रतिरोधकता कहते हैं।

रोगप्रतिरोधकता कितने प्रकार की होती है?

यह मुख्यतः दो प्रकार की होती है

1. जन्मजात रोगप्रतिरोधकता
2. उपार्जित रोगप्रतिरोधकता

जन्मजात रोगप्रतिरोधकता किसी भी जीव में जन्म के समय से ही विद्यमान होती है जबकि उपार्जित रोगप्रतिरोधकता जन्म के बाद हासिल की जाती है। जन्मजात रोगप्रतिरोधकता के काम ना करने की स्थिति में उपार्जित रोगप्रतिरोधकता अपना काम करने लगती है।

उपार्जित रोगप्रतिरोधकता भी दो प्रकार की होती है

1. प्राकृतिक
2. कृत्रिम

प्राकृतिक उपार्जित रोगप्रतिरोधकता भी दो प्रकार की होती है

1. पैसिव और
2. एक्टिव

▪️पैसिव प्राकृतिक उपार्जित रोगप्रतिरोधकता गर्भावस्था के दौरान माँ से भ्रूण में प्लेसेंटा के द्वारा स्थानांतरित की जाती है। इसमें मुख्यतः IgG का ट्रांसफर होता है और जन्म के तुरंत बाद के दूध में IgA एंटीबॉडीज का ट्रांसफर होता है। जबकि एक्टिव प्राकृतिक उपार्जित रोगप्रतिरोधकता में रोग पैदा करने वाले किसी रोगकारक के सम्पर्क में आने के बाद शरीर में उसकी इम्यूनोलॉजिकल मेमोरी रह जाती है।

अब बात करते हैं कृत्रिम उपार्जित रोगप्रतिरोधकता की। यह भी दो तरह की होती है

1. पैसिव और
2. एक्टिव

▪️पैसिव कृत्रिम उपार्जित रोगप्रतिरोधकता एंटीबाडी ट्रांसफर से प्राप्त की जाती है। जबकि एक्टिव कृत्रिम उपार्जित रोगप्रतिरोधकता प्राप्त करने के लिए वैक्सीन का सहारा लिया जाता है।

रोगप्रतिरोधकता का काम है रोगाणुओं से लड़ना और रोगप्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है सन्तुलित पोषण। शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने में मुख्य भूमिका निभाते हैं प्रोटीन, विटामिन्स और मिनरल्स जो हमें मिलते हैं उस सात्विक भोजन से जिसे प्रकृति ने हमें इसी उद्देश्य से प्रदान किया है।

आज हम बात करेंगे उन्हीं 15 खाद्य पदार्थों की जो शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकास करने में सहायक हैं। ये खाद्य पदार्थ हैं

1. *हल्दी*: हल्दी को सूजन कम करने की विशेषता के कारण ओस्टियोअर्थराइटिस और रह्यूमेटॉइड अर्थराइटिस के इलाज के लिए सदियों से उपयोग किया जा रहा है। आप सभी अब जान चुके हैं कि हल्दी के अंदर पाया जाने वाला कुरक्यूमिन शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकास करने में सर्वोपरि है और यह एन्टीवायरल भी है।

2. *लहसुन*: इसके अंदर पाया जाने वाला सल्फर युक्त कम्पाउंड एलिसिन कमाल का है। इसी के कारण आयुर्वेद में लहसुन को रोगप्रतिरोधक क्षमता बढाने वाला बताया गया है।

3. *अदरख*: अदरख में पाया जाने वाला जिंजीरोल ही इसकी जान है। तीखा जरूर है मगर है बहुत कमाल का। गले की खिचखिच मिनटों में दूर कर देता है। इन्फ्लेमेशन कम करता है और कोलेस्ट्रॉल भी कम करता है।

4. *नींबू वर्गीय फल*: निम्बू वर्गीय फलों में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है और यह विटामिन सी ही हमें रोगों से लड़ने की अनोखी शक्ति प्रदान करता हैं। विटामिन सी श्वेत रक्त कणिकाओं के बनने में सहायक होता है और यह श्वेत रक्त कणिकाएं ही रोगाणुओं से लड़कर हमें रोग से बचाती हैं। इन फलों में चकोतरा, संतरा, नींबू और मुसम्मी प्रमुख हैं।

5. *पपीता*: पपीता भी विटामिन सी का अच्छा स्रोत है। इसके अलावा पपीते में पैपेन होता है जो डाइजेस्टिव एंजाइम है और एन्टीइन्फ्लामेट्री है।

6. *कीवी फ्रूट*: कीवी में भी विटामिन सी के अलावा फोलिक एसिड, पोटैशियम, विटामिन के और विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

7. *ब्ल्यूबेरी*: ब्ल्यूबेरी में एंथोसायनिन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो एन्टीऑक्सीडेंट होता है और श्वसन तंत्र के इम्यून डिफेंस सिस्टम को मजबूत करता है।

8. *शिमला मिर्च*: शिमला मिर्च में संतरे के मुकाबले में तीन गुना विटामिन सी पाया जाता है। इसके अलावा इसमें बीटा कैरोटीन भी भरपूर होता है जो हमारे शरीर में जाकर विटामिन ए में बदल दिया जाता है। विटामिन ए हमारी आंखों की ज्योति के लिए भी परम् आवश्यक है।

9. *ब्राकोली*: इसमें विटामिन ए, विटामिन सी और विटामिन ई के अलावा रेशा भी खूब होता है। बस आपको करना इतना है कि इसे या तो कच्चा ही खाइए या कम से कम पकाइए या फिर भाप में पकाइए।

10. *पालक*: पालक में ना केवल विटामिन सी और आयरन प्रचुर मात्रा में होता है बल्कि इसके अंदर असंख्य एन्टीऑक्सीडेंट्स और बीटा कैरोटीन भी पाया जाता है और यह सभी रोगप्रतिरोधकता का विकास करने में सहायक हैं।

11. *शकरकंद*: शकरकंद में बीटा कैरोटीन पाया जाता है जो शरीर में जाकर विटामिन ए में बदल जाता है और शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।

12. *बादाम*: प्रोटीन के साथ साथ विटामिन ई का बेहतरीन स्रोत। चूंकि विटामिन ई वसा में घुलनशील विटामिन है इसलिए बादाम के साथ घी का प्रयोग विटामिन ई के अवशोषण को काफी हद तक बढा देता है।

13. *सूरजमुखी के बीज*: इनमें फास्फोरस और मैग्नीशियम के अलावा विटामिन बी6 और विटामिन ई प्रचुर मात्रा में होता है। जिनके कारण रोगप्रतिरोधकता विकसित करने में यह बहुत अच्छी भूमिका निभाते हैं।

14. *योगार्ट*: एक दिन हमने पहले भी बताया था कि इसके अंदर प्रोबायोटिक होते हैं अर्थात ऐसे लाभकारी बैक्टीरिया होते हैं जो अपनी संख्या बढाकर रोग पैदा करने वाले रोगाणुओं के लिए समस्या पैदा कर देते हैं और उन्हें पनपने नहीं देते। योगार्ट का नियमित सेवन रोगप्रतिरोधकता बनाए रखता है।

15. *डार्क चॉकलेट*: डार्क चॉकलेट में पाया जाने वाला थियोब्रोमीन शरीर की कोशिकाओं को फ्री रेडिकल्स से बचाकर शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है।

उपरोक्त 15 खाद्य पदार्थों के अलावा कुछ जड़ी बूटियां भी शरीर की रोगप्रतिरोधकता क्षमता का विकास करती हैं जैसे *गिलोय* और *कालमेघ*। इनका जिक्र किसी अन्य पोस्ट में करेंगे।

और हाँ.... हमेशा की तरह... *गौ माता* से बेहतरीन सुरक्षा कौन प्रदान कर सकता है!!! *पंचामृत* का सेवन आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखेगा। इसलिए गाय के दूध, गाय के दूध की दही, गाय के दूध से बना घी, शहद और नारियल पानी से बने पंचामृत का नियमित सेवन करें। जय हो।

डॉ संजीव कुमार वर्मा
प्रधान वैज्ञानिक
भा.कृ.अनु.प. - केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान
मेरठ छावनी (उत्तर प्रदेश)
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कैलाश मंदिर एलोरा (महाराष्ट्र)

कैलाश मंदिर संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु जिसे मालखेड स्थित राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण (प्रथम) (757-783 ई0) में निर्मित कराया था। यह एलोरा (जिला औरंगाबाद) स्थित लयण-श्रृंखला में है।

बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे द्रविड़ शैली के मंदिर का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में नन्दी है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी तथा स्तंभ बने हैं। यह कृति भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है।

1.भगवान् शिव को समर्पित इस कैलाशनाथ मंदिर को बनाने में 10 पीढियों ने लगातार लगभग 200 वर्ष तक काम किया था।

2.कैलाशनाथ मंदिर की ऊचांई 90 फ़ीट है, यह 276 फ़ीट लम्बा और 154 फ़ीट चौड़ा गुफा मंदिर है।

3.कैलाशनाथ मंदिर एक ही विशाल चट्टान को तोड़ कर बनाया गया है, लगभग 40 हजार टन भार के पत्थारों को चट्टान से अलग कर के बनाया गया है यह भव्य मंदिर।

4.कैलाशनाथ मंदिर बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को ही तराश कर इसे द्रविड़ शैली के मंदिरों का रूप दिया गया है। लगभग 7000 शिल्पियों ने लगातार काम करके इसे तैयार किया है, इसकी नक्काशी अत्यंत विशाल और भव्‍य है।

5.मंदिर में एक विशाल हाथी की प्रतिमा भी है जो अब खंडित हो चुकी है।

7.विशाल गोपुरम से प्रवेश करते ही सामने खुले मंडप में नंदी की प्रतिमा नजर आती है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी और स्तंभ बने हुए हैं।

8.कैलाश नाथ मंदिर में बनी भैरव की मूर्ति काफी भयकारक दिखाई देती है। कैलाश मंदिर में एक अति विशाल और भव्य शिवलिंग भी है। इसके अलावा भगवान शिव की तांडव करती हुई प्रतिमा इतनी भव्य है जैसी कहीं और देखने को नहीं मिलेगी ।

साभार-Indias Heritage
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