नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

तालाब याद आये


हमने तालाबों को
पाट-पाटकर
बड़े-बड़े आलीशान
घर बनाये
घरों में सुख-सुविधा के
तमाम उपकरण लगाये
मगर जब नहीं मिला
पानी गुजर-बसर के लिए
तब हमें वही
पाटे हुए तालाब
बहुत-बहुत याद आये
   (कृष्ण धर शर्मा, 16.05.2018)

हाँ मगर!


तुम्हारी भेड़ियों जैसी भूखी नजरें
तुम्हारी गलीज और कामुक भावनाएं
तुम्हारी अश्लील और गंदी टिप्पणियां
जो, राह चलती किसी की
बहन या बेटी को देखकर
उपजते हैं तुम्हारे भीतर
तुम सोचकर भी देखोगे यही सब
अपनी बहन या बेटी के बारे में कभी
सिहर जाओगे तुम, गड जाओगे जमीन में
कहीं गहरे तक शर्म के मारे
तुम्हें लगेगा कि धरती फट जाये अभी
और समा जाओ तुम उसमें सबसे मुंह छुपाकर
हाँ मगर! तुम इंसान होगे तभी न!
अन्यथा शैतानों का तो यह रोज का काम है....
               (कृष्ण धर शर्मा, 12.04.2018)

इंसान को डर लगता है


इंसान को जिससे-जिससे
डर लगता है
वह उन सबको मार देता है
या फिर मारने की
कोशिश करता रहता है
भले ही वह डर वास्तविक न हो
डर काल्पनिक ही सही
मगर इंसान जिससे-जिससे डरता है
वह उन सबको मार देता है
इंसान जिससे डरता है
वह सांप भी हो सकता है
बिच्छू भी हो सकता है
शेर, भालू, बाघ, चीता सहित
तमाम जानवर या साधारण जीव भी
जिनसे-जिनसे इंसान डरता है 
उन सबको मार देता है
मगर आश्चर्य तो देखो जरा!
सबको मार देने के बाद
इंसान अकेलेपन से घबराकर
आख़िरकार एक दिन डरकर
खुद को भी मार देता है...
        (कृष्ण धर शर्मा, 18.03.2018)

घर और घरवाले


टीवी की आवाज म्यूट कर दो
मोबाइल को साइलेंट में डाल दो
मन को जरा शांत करके
गौर से सुनो तो कभी
तुम्हारा घर और घरवाले
बहुत बेचैन हैं इन दिनों!
वह तुमसे बातें करना चाहते हैं 
उन्हें लगता है कि वह भी
तुम्हारे जीवन का हिस्सा हैं 
टीवी, मोबाइल, गाड़ी, कंप्यूटर
तुम्हारे दोस्तों या अन्य सभी की तरह
जिनके साथ रहकर तुम खुश होते हो
अपने जीवन से जुड़े लोगों को, चीजों को
जिस तरह से देते हो अपना समय
खिलखिलाकर हँसते हो, बातें करते हो
अपने साथियों, संगियों-संगिनियों से
घर और घरवाले भी तो चाहते हैं
वही सबकुछ, उसी तरह से तुम कभी
बातें करो अपने घर से, घरवालों से
मगर न जाने क्यों इसमें तुम
अपनी तौहीन समझते हो! 
            (कृष्ण धर शर्मा, 08.03.2018)

अनमनी सी जिंदगी


अल्लसुबह की मीठी नींद
का मोह छोड़कर
लग जाते हैं काम पर
जाने की तैयारी में
मुंहअँधेरे ही गिरते-पड़ते से
सोते हुए बच्चे का माथा
चूमकर निकल पड़ते हैं
दिनभर काम में
अनमने से खटने के लिए
निभाने पड़ते हैं कई रस्मो-रिवाज
कई रिश्ते भी बेमन से
सुननी पड़ती हैं कई-कई बातें
ताने-उलाहने भी रोज ही
या कहा जाये सीधे-सीधे ही
कि जीनी पड़ती पूरी जिन्दगी ही
बिना मन के, अनमने ही
          (कृष्ण धर शर्मा, 02.03.2018)

राक्षस


अब जिसे राक्षस ही साबित करना हो
वह भला आपके कहने भर से
कैसे हो जायेगा राक्षस
उसके बारे में प्रचारित करना होगा
दुनियाभर का सच-झूठ
जैसे कि वह होता है घोर अत्याचारी
एक विशालकाय शरीर वाला
होते हैं उसके कई सर, कई हाथ
हो सकते हैं उसके सर पर सींग भी
बड़े-बड़े दांत होना तो अनिवार्य ही है
आसमान गूंजता है जब वह बोलता है
धरती कांपती है जब वह चलता है
निगल जाता है वह साबुत ही इंसान को
उसका तो काम ही है अच्छे लोगों को
परेशान करना, मार देना आदि-आदि
उसे राक्षस साबित करना खासतौर पर
और भी जरूरी हो जाता है
जबकि देव बनने की आपकी अभिलाषा
अपने प्रबलतम और निकृष्टतम रूप में हो 
क्योंकि यह तो आपको भी पता ही है
कि देव बनने के लिए किसी दानव का
किसी राक्षस का होना भी बहुत जरूरी है
              (कृष्ण धर शर्मा, 27.02.2018)

मंगलवार, 27 नवंबर 2018

महाराजा-दीवान जरमनी दास

 "महाराजा रात को काफ़ी देर से सोते थे। उनका क़ायदा था कि अगले दिन शाम को उनकी नींद टूटने का जब वक़्त हो, तब उनकी अंग्रेज महारानी डोरोथी और महल की रानियां हल्के-हल्के उनके पैर दबाएं और धीमी मगर सुरीली आवाज़ में गीत गाती रहें। जागने पर महाराजा को 'बेड टी' पेश की जाए। महाराजा कुछ वहमी आदत के थे। रात को, रोज़ उनका हुक्म जारी होता था कि आंखें खुलने पर सबसे पहले महल की फलां-फलां रानियां उनकी नजरों के सामने पड़ें। उनका यकीन था कि अगले 24 घंटे राजी-खुशी गुजारने के लिए यह इंतजाम जरूरी है।" (महाराजा-दीवान जरमनी दास)



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सोमवार, 12 नवंबर 2018

वर्णाश्रम- रामधारी सिंह दिवाकर

 "इतना साहस भी नहीं हुआ कि कि बिल्कुल सामने खड़े अपने पुत्र के पास जाएँ, उसके आँसू पोंछ दें और कंधे पर हाथ रखकर कह सकें कि- हद हो गई अब। चलो, गाँव लौट चलें। गाँव में अपने घर की याद आते ही एक पूरी तसवीर उनकी आँखों में बनने लगी थी। फूस के दो छोटे-छोटे घर, झोंपड़े जैसे दालान, जो मरम्मत के बिना गिरने-गिरने को है। बीमारी से कराहती रहने वाली पंडिताइन, विवाह के योग्य ही रही दो पुत्रियाँ, वृत्तिहीनता और कभी-कभी भूखे सो जाने की दुर्निवार स्थितियाँ। और इन्हीं स्थितियों के समानांतर अभी इसी सप्ताह गुणानंद का भेजा मनीऑर्डर और आश्वस्त करता भविष्य..." (वर्णाश्रम- रामधारी सिंह दिवाकर)



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शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

मुसाहिबजू-रामगढ़ की रानी-वृंदावनलाल वर्मा

 "तीन-चार दिन के भीतर ही मुसाहिबजू  की गढ़ी के आस-पास सैनिकों के झुंड के झुंड एकत्र होने लगे। सबके पास बंदूक और ढाल-तलवार। मूँगिये कपड़े पहने और बुंदेलखंडी झब्बू जूते। न कोई नियम, न कोई संयम। कवायद -परेड बहुत थोड़े सिपाहियों को सिखाई गई थी; पर इनकी नकल अन्य सिपाही उत्साह और ध्यान के साथ कर रहे थे, जो हवलदार के परिश्रम की कमी की पूर्ति कर रही थी।" (मुसाहिबजू-रामगढ़ की रानी-वृंदावनलाल वर्मा)




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शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

फ़क़ीर- रुजबेह एन. भरूचा अनुवाद- डॉली भसीन

 "बेटा तुम्हे पता है कि दुख-दर्द भगवान् का दिया  सबसे बड़ा उपहार है, क्योंकि यही दुख-दर्द, स्नेह औए संवेदना के द्वार खोलता है और यही स्नेह व् संवेदना स्वर्ग तथा ईश्वरीय अभिज्ञान की ओर ले जाते हैं। यदि आप तकलीफ़ में हों तभी आप दूसरों की तकलीफ़  समझकर उनसे सहानुभूति करते हैं। आप दूसरों की कमजोरियों और अजब व्यवहार को समझ पाते हैं। चूँकि दुख-तकलीफ़ में होते हुए कभी आपने भी दूसरों के साथ दुर्व्यवहार किया होगा, उनका दिल दुखाया होगा अथवा कमजोरी के किसी क्षण में ऐसा कुछ किया होगा, जो आपको नहीं करना चाहिए था। तकलीफ़ सदैव आपको भगवान व् दूसरे प्राणियों के निकट ले जाती है। तकलीफ़ आपको दूसरों के दुख क आँसुओं के प्रति अधिक सहृदय बनाती है।" (फ़क़ीर- रुजबेह एन. भरूचा) अनुवाद- डॉली भसीन



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गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

न्याय का गणित- अरुंधति रॉय

 "काश! काश अगर परमाणु युद्ध एक और सामान्य युद्ध की ही तरह होता। काश! यह सामान्य बातों-राष्ट्रों और सीमाओं, देवताओं और इतिहास की तरह होता। काश! हममें से वे लोग जो इससे डरते हैं, नैतिक रूप से कायर होते, जो हमारे विश्वासों के लिए मरने को तैयार नहीं हैं। काश! परमाणु युद्ध ऐसा युद्ध होता जिसमें देश आपस में लड़ रहे होते और जनता आपस में। लेकिन ऐसा नहीं है। अगर कोई परमाणु युद्ध होता है तो हमारे दुश्मन चीन या अमेरिका, या यहाँ तक कि वे एक-दूसरे के नहीं हो सकते। खुद पृथ्वी ही हमारी दुश्मन हो जायेगी। मूल तत्व- आकाश, वायु, पृथ्वी, पवन और जल हमारे विरुद्ध हो जाएंगे। उनका प्रतिशोध भयावह होगा। हमारे शहर और जंगल, हमारे खेत और गाँव कई दिनों तक जलते रहेंगे। नदियाँ जहरीली हो जाएँगी। हवा आग हो जायेगी। बयार लपटों की तरह चलेगी। जब सारी जलनेवाली चीजें जल चुकी होंगी और आग बुझ जायेगी तो धुआँ उठेगा और सूरज को ढक लेगा। पृथ्वी अन्धकार में समा जाएगी। तब कोई दिन नहीं होगा। बस लम्बी, अन्तहीन रात होगी। तापमान हिमांक में चला जायेगा और परमाणविक शिशिर ऋतू शुरू हो जायेगी। पानी जहरीली बर्फ में तब्दील हो जायेगा। हममें से जिन्दा बचे लोग तब क्या करेंगे? झुलसे, अंधे, गंजे और बीमार हम कैंसर पीड़ित अपने बच्चों के कंकालों को संभाले कहाँ जाएँगे? हम क्या खायेंगे? क्या पीयेंगे? हम कैसे साँस लेंगे?" (न्याय का गणित- अरुंधति रॉय)



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शनिवार, 29 सितंबर 2018

महाभोज-मन्नू भंडारी

 " 'लड़का नक्सली था ?' 'नहीं, नक्सलियों की तो आलोचना करता था ।'  'आलोचना ?' इसमें प्रश्न से अधिक अविश्वास की ध्वनि थी । 'उनके काम करने के तरीक़े को वह ग़लत मानता था ।' 'उसका अपना काम करने का तरीक़ा क्या था ?' 'काम ! काम तो शायद वह कुछ करता ही नहीं था !' 'क्यों, सुना है हरिजनों और खेत-मज़दूरों को मालिकों के ख़िलाफ़ भड़काया करता था । नक्सली भी तो यही सब करते हैं ।' 'भड़काया नहीं करता था, सर...उन्हें केवल अवेयर करता था अपने अधिकारों के लिए। जैसे सरकार ने जो मज़दूरी तय कर दी है वह जरूर लो ... नहीं दें तो काम मत करो। पर झगड़ा-फ़साद या मार-पीट के लिए वह कभी नहीं कहता था।'  फिर एक क्षण रुककर बोला, ' इसी बात में तो वह शायद नक्सलियों से अलग भी था ।" (महाभोज-मन्नू भंडारी)




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शनिवार, 22 सितंबर 2018

मार्था का देश- राजी सेठ

 "माँ के पास तो ढेर-ढेर तरीके हैं- यह हलवा तेरे लिए। यह चटनी तेरे लिए। यह तेरी पसंद की चादर। यह तेरे लिए ख़रीदा कैसेट। यह करौंदे का अचार। मेरे पास क्या है जिससे मैं 'माँ को अच्छा लगे' की अनुभूति को संभव बना सकता हूँ। यहाँ कौन सा छोर है जो नितांत मेरा अपना है जो इस हार्दिकता की सृष्टि कर सके।" (मार्था का देश- राजी सेठ)



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गुरुवार, 20 सितंबर 2018

थके पांव- भगवतीचरण वर्मा

 "उस अन्तहीन अवगत पथ के साथ एक अनिवार्य गति भी है जो जिंदगी कहलाती है। इस गति की सीमाएँ हैं जन्म और मृत्यु के रूप में। इस गति का आरम्भ जन्म के साथ होता है, इस गति का अन्त मृत्यु के साथ होता है। जन्म और मृत्यु के बीच इस गति में कहीं किसी प्रकार का व्यक्तिक्रम नहीं। इस गति से किसी को कहीं कोई छुटकारा नहीं।" (थके पांव- भगवतीचरण वर्मा)



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सोमवार, 10 सितंबर 2018

असतो मा सद्गमय- रेणु 'राजवंशी' गुप्ता

 "यह उपन्यास जीवन के सनातन पहलुओं से गुजरती हुई कथा आधुनिक राजतांत्रिक और अफसरशाही तक भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार की कथा भी है तो हमारी पुरातन, परंतु नित नवीन आध्यात्मिक भारत की कथा भी है। इस कथा में भक्ति, ज्ञान, अहंकार, उच्चाकांक्षा, संतोष, भाग्य, पदलिप्सा, लोभ, कर्म, स्नेह,औदार्य सभी भाव समाहित हैं। यह कथा जीवन की सभी कलाओं से परिचय कराती है तथा चेतावनी भी देती है कि बुरे कर्म का परिणाम बुरा ही होता है।" (असतो मा सद्गमय- रेणु 'राजवंशी' गुप्ता)



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रविवार, 26 अगस्त 2018

देख कबीरा रोया-भगवतीशरण मिश्र

 "मैं कबीर, जाति-पांति का पता नहीं, धर्म-संप्रदाय में आस्था नहीं, जिह्वा पर लगाम नहीं, सीधे को उलटा और उलटे को सीधा कहने का आदी, उलटवांसियों के लिए ख्यात-कुख्यात, आज चला हूं लिखने अपनी आत्मकथा-अपनी राम-कहानी।  आप पूछियेगा यह आत्मकथा है कि भूतगाथा? सच पूछिए तो मैंने कभी लिखा नहीं-अपने जीवनकाल में भी। 'मसि कागद छुओ नहीं' इस मेरी प्रसिद्ध उक्ति से आप भी अनभिज्ञ नहीं। जब पढ़ा ही नहीं तो लिखता क्या? जो स्याही कागज से भी दूर रहा वह क्या खाक पढ़ता व लिखता? ऐसे भी पढाई के प्रति मेरी धारणा से बच्चा-बच्चा परिचित है, भले ही इस उक्ति का बहुतों ने अर्थ का अनर्थ कर दिया हो- 'पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय।।" (देख कबीरा रोया-भगवतीशरण मिश्र)



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गुरुवार, 16 अगस्त 2018

तमस-भीष्म साहनी

 "मुहल्लों के बीच अब लीकें खिंच गई थीं, हिंदुओं के मुहल्ले में मुसलमान को जाने की अब हिम्मत नहीं थी, और मुसलमानों के मुहल्ले में हिन्दू-सिख अब नहीं आ-जा सकते थे। आँखों में संशय और भय उतर आये थे। गलियों के सिरों पर, और सड़कों के नाकों पर जगह-जगह कुछ लोग हाथों में लाठियाँ और भाले लिये और मुश्कें बाँधे, छिपे बैठे थे। जहाँ कहीं हिन्दू और मुसलमान पड़ोसी एक-दूसरे के पास खड़े थे, बार-बार एक ही वाक्य दोहरा रहे थे : 'बहुत बुरा हुआ, बहुत बुरा हुआ है। इससे आगे वार्तालाप बढ़ ही नहीं पाता था। वातावरण में जड़ता-सी आ गई थी। सभी लोग मन ही मन जानते थे कि यह कांड यहीं पर ख़त्म होनेवाला नहीं है, लेकिन आगे क्या होगा किसी को भी नहीं मालूम नहीं था।" (तमस-भीष्म साहनी)




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