नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

क्यों दूर हो रहे हैं सरकारी स्कूलों से बच्चे?


आश्चर्य की बात यह है कि भारत के सरकारी शिक्षक न केवल प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाले अपने समकक्ष शिक्षकों की तुलना में बल्कि कई अन्य देशों की तुलना में अधिक वेतन पाते हैं। चीन की तुलना में इनका वेतन चार गुणा अधिक है। प्रख्यात अर्थशास्त्री और नोबेल प्राइज विजेता अमर्त्य सेन और जीन डेरेज के 2013 के एक विश्लेषण के अनुसार यूपी में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का वेतन भारत के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद से चार गुणा और स्वयं उत्तरप्रदेश के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद से 15 गुणा अधिक है। इसके बावजूद सीखने के स्तरों के आधार पर भारतीय शिक्षकों का प्रदर्शन प्रोग्राम फॉर द इंटरनेशनल असेसमेंट (पीआईएसए) टेस्ट में बहुत ही खराब रहा है। इस कार्यक्रम में 74 देशों के बीच भारत का स्थान 73वां रहा वहीँ चीन दूसरे स्थान पर रहा। सरकारी स्कूलों की खराब होती गुणवत्ता का सबसे बड़ा कारण शिक्षा विभाग के अधिकारियों की उदासीनता और लापरवाही है। जो सरकारी खजाने से वेतन और अन्य सुविधाएँ तो प्राप्त करते हैं लेकिन अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं।
2019-20 के अंतरिम बजट में शिक्षा के क्षेत्र में करीब 94 हजार करोड़ रुपए आवंटित किया गया है। जो पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 10 फीसदी अधिक है। अंतरिम बजट में उच्च शिक्षा के लिए 37,461.01 करोड़ रुपए की तुलना में स्कूली शिक्षा के लिए 56,386.63 करोड़ रुपए  आवंटित किये गए हैं। जबकि पिछले वित्तीय वर्ष में 50 हजार करोड़ रुपए  आवंटित किये गए थे। केवल राष्ट्रीय शिक्षा मिशन मंध ही 38,573 करोड़ रूपए के बजट का प्रावधान किया गया है। इन राशियों में जहां क्लास रूम को डिजिटलाइज करना शामिल है वहीँ शिक्षकों के पढ़ाने का स्तर सुधारना और उन्हें ट्रेनिग देना भी शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार इस वित्तीय वर्ष में शिक्षा के बजट में 3.69 फीसद का इजाफा हुआ है।
केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अपने अपने बजट में स्कूली शिक्षा पर एक बड़ी राशि खर्च करने के बावजूद हमारे देश के सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छुपी नहीं है। विशेषकर शिक्षकों के पढ़ाने का स्तर इस पूरी शिक्षा व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी है। देश के सबसे बड़े हिन्दी भाषी राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार के सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है। परिणामस्वरूप अभिभावक अब अपने बच्चों को सरकारी स्कूल की बजाए निजी स्कूल में पढ़ाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। हाल ही में यू-डाइस और कई गैर सरकारी संस्थाओं ने अपनी रिपोर्ट में अभिभावकों के इस रुझान को सामने लाकर सरकारी स्कूलों की हालत और शिक्षकों के पढ़ाने के स्तर जैसी खामियों को उजागर किया है। यूनिफाइड डिस्ट्रक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यू-डाइस) द्वारा जारी रिपोर्ट और आंकड़ों के मुताबिक बिहार और यूपी में अभिभावकों का सरकारी स्कूलों से मोहभंग हो रहा है।
संस्था की रिपोर्ट के अनुसार 2015-16 की तुलना में 2016-17 में इन दोनों राज्यों के सरकारी स्कूलों में नामांकित बच्चों की संख्या में करीब 25 लाख (24.79 लाख) की कमी दर्ज की गई है। अकेले बिहार में ही 15 लाख बच्चे कम नामांकित हुए हैं। आंकड़ों के अनुसार 2015-16 में जहां बिहार के सरकारी स्कूलों में 2.35 करोड़ बच्चों का नामांकन हुआ था वहीँ 2016-17 में यह आंकड़ा घटकर 2.19 करोड़ रह गया। वहीँ यूपी में इसी अवधि के दौरान यह आंकड़ा 1.62 करोड़ की तुलना में घटकर 1.52 करोड़ रह गया है। हालांकि संस्था की रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण भारतीय राज्यों केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक के सरकारी स्कूलों में भी बच्चों के नामांकन में मामूली गिरावट आई है। कुल मिलाकर देश भर के सरकारी स्कूलों में त$करीबन 56.59 लाख बच्चों के नामांकन में कमी आई है और इन आंकड़ों में अकेले बिहार और यूपी का 43 प्रतिशत हिस्सा है।
सरकारी स्कूलों में नामांकन में आयी कमी का अर्थ यह नहीं है कि शिक्षा के प्रति रुचि कम हो गई है बल्कि इसका साफ मतलब यह है कि माता-पिता अब अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए सरकारी स्कूलों से ज्यादा निजी स्कूलों को तरजीह दे रहे हैं। दरअसल सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में आ रही लगातार गिरावट से माँ-बाप को यह एहसास होने लगा है कि यहां उनके बच्चों का भविष्य उज्ज्वल नहीं है। अभिभावकों को लगता है कि सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी केवल एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है, वह भी नाममात्र के लिए। जबकि प्राइवेट स्कूलों में हिंदी विषय को छोड़कर अन्य सभी विषयों को न केवल अंग्रेजी में पढ़ाया जाता है बल्कि स्कूल परिसर में छात्रों को अंग्रेजी भाषा में ही बात करने के लिए प्रेरित भी किया जाता है। उन्हें विश्वास है कि अंग्रेजी भाषा से स्कूली पढ़ाई करने वाले बच्चों को भविष्य में मेडिकल, इंजीनियरिंग, लॉ, मैनेजमेंट और पत्रकारिता की पढ़ाई कराने वाले देश के उच्च शिक्षण संस्थाओं में आसानी से प्रवेश मिल सकता है। जबकि सरकारी स्कूलों में हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों को इन्हीं क्षेत्रों में प्रवेश पाना मुश्किल हो जाता है। यूपीएससी जैसे देश के प्रतिष्ठित प्रतियोगिता परीक्षाओं में भी अंग्रेजी माध्यम वाले परीक्षार्थियों का दबदबा उनकी आशंकाओं को बल देता है।
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में प्राइवेट स्कूलों के प्रति अभिभावकों के बढ़ते रुझानों के पीछे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार भी एक प्रमुख कारण है। पिछले कुछ दशकों में इन दोनों राज्यों में प्रति व्यक्ति आय में काफी सुधार हुआ है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार 2004-05 में बिहार में प्रति व्यक्ति आय 8,560 रूपए से बढ़कर 2014-15 में 16,652 रूपए हो गई। वहीँ यूपी में इसी अवधि के दौरान यह 14,580 रूपए से बढ़कर 22,892 रुपए प्रति व्यक्ति तक पहुंच गई। घर की अच्छी आमदनी ने बच्चों की गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई के प्रति उनके नजरिये को भी विकसित किया है। माँ-बाप के इसी सोच ने बिहार और यूपी में शिक्षा के ट्रेंड को बदल दिया है। इन राज्यों में अब बड़े पैमाने पर कुकुरमुत्ते की तरह प्राइवेट स्कूलों की बाढ़ आ गई है। गली-गली में प्राइवेट स्कूल खुल गए हैं, जो अंग्रेजी भाषा में शिक्षा देने का दावा करते हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश स्कूल सीबीएसई के मानकों पर दूर-दूर तक खरे नहीं उतरते हैं इसके बावजूद उन स्कूलों में बच्चों के नामांकन में तेजी से इजाफा होता जा रहा है। ऐसे स्कूल मनमाने तरीके से फीस निर्धारण एवं अन्य मदों के नाम पर अभिभावकों से मोटी रक़म वसूल कर रहे हैं। उनपर एक बार में ही साल भर की फीस भरने का दबाब बनाया जाता है। वहीँ दूसरी तरफ अभिभावकों को स्कूल ड्रेस सहित किताब-कॉपी भी स्कूल से ही खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है।
एनसीईआरटी की पुस्तकों की बजाए निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें खरीदने को कहा जाता है। इसके पीछे निजी प्रकाशकों एवं अन्य सामाग्री उपलब्ध कराने वाली एजेंसियों से स्कूल को मिलने वाली मोटी कमीशन प्रमुख कारण माना जाता है। लेकिन इसके बावजूद ऐसे ही स्कूलों में दाखिले की होड़ मची होती है। हालांकि इन दोनों ही राज्यों की सरकारों ने निजी स्कूलों की मनमानी को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने का फैसला किया है। बिहार सरकार ने जहां इसके लिए फीस निर्धारण हेतु एक्ट 2018 बनाने की बात कही थी वहीँ यूपी के निजी स्कूलों में मनमानी फीस पर नकेल कसने के लिए सरकार ने यूपी स्ववित्तपोषित स्वतंत्र विद्यालय (शुल्क का विनियमन) विधेयक, 2017 को सख्ती से लागू करने पर जोर दिया है।
दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में लगातार गिरावट आ रही है। देशभर में सरकारी स्कूलों में तकरीबन 60 लाख शिक्षकों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन अलग अलग स्तरों पर जारी किये गए सरकारी आंकड़ों तथा कई संस्थाओं के रिसर्च और रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि इस वक्त देशभर में सरकारी स्कूलों में लगभग दस लाख शिक्षकों के पद खाली हैं। इनमें अकेले 9 लाख पद प्राथमिक स्कूलों में खाली हैं। प्राथमिक स्तर पर सबसे अधिक दो लाख चौबीस हजार से ज्यादा पद यूपी में रिक्त है। जबकि बिहार में दो लाख तीन हजार के करीब है। पश्चिम बंगाल और झारखंड के प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों में भी शिक्षकों की औसतन एक तिहाई सीटें खाली हैं। इसके बाद मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का नंबर आता है, जहां इन राज्यों की अपेक्षा स्थिति कुछ बेहतर है लेकिन इसे भी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। इसके विपरीत गोवा, ओडिशा और सिक्किम में प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों का कोई पद खाली नहीं है। सिक्किम देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां प्राथमिक और माध्यमिक स्तरों पर शिक्षकों के शत-प्रतिशत पद भरे हुए हैं। जबकि माध्यमिक स्तर पर देश में शिक्षकों की सबसे ज्यादा कमी झारखंड में है। बिहार में भी माध्यमिक स्तर पर शिक्षकों के स्वीकृत 17 हजार से अधिक पद खाली है जबकि यूपी में तकरीबन 7 हजार माध्यमिक शिक्षकों के स्वीकृत पद खाली पड़े हैं।
देश के सबसे अशांत राज्य जम्मू-कश्मीर में भी 21 हजार से अधिक माध्यमिक स्तर पर शिक्षकों की जगह खाली है। जहां 25,657 स्वीकृत पदों में केवल 4436 पद ही भरे हुए हैं। हालांकि बिहार के शिक्षा मंत्री ने पिछले वर्ष नवंबर में घोषणा की है कि शिक्षकों के खाली पड़े करीब डेढ़ लाख पदों पर जल्द नियुक्ति की जाएगी। समस्या केवल शिक्षकों की कमी का नहीं है बल्कि प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी भी एक बड़ी समस्या है। सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउंटबिलिटी (सीबीजीए) और चाइल्ड राइट एंड यू (क्राई) की एक रिसर्च के अनुसार योग्य शिक्षकों की कमी देश के लगभग सभी राज्यों में है। समूचे देश में शिक्षक-छात्र अनुपात, शिक्षकों की संख्या और उनकी ट्रेनिग के मामले में बिहार की स्थिति सबसे खराब है। जहां खाली पड़े पदों को भरने के लिए अतिथि शिक्षकों के नाम पर बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती कर दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार बिहार के प्राथमिक स्कूलों में 38.7 प्रतिशत अध्यापक प्रशिक्षित नहीं हैं। जबकि माध्यमिक स्तर पर ऐसे शिक्षकों की संख्या 35.1 फीसदी है। दूसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल आता है जहां प्राथमिक स्तर पर 31.4 और माध्यमिक स्तर पर 23.9 फीसदी शिक्षक प्रोफेशनली ट्रेंड नहीं हैं। हालांकि एक अच्छी बात यह है कि शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए बिहार सरकार प्रशिक्षित शिक्षकों की बहाली की दिशा में लगातार कोशिशें कर रही है।
आश्चर्य की बात यह है कि भारत के सरकारी शिक्षक न केवल प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाले अपने समकक्ष शिक्षकों की तुलना में बल्कि कई अन्य देशों की तुलना में अधिक वेतन पाते हैं। चीन की तुलना में इनका वेतन चार गुणा अधिक है। प्रख्यात अर्थशास्त्री और नोबेल प्राइज विजेता अमर्त्य सेन और जीन डेरेज के 2013 के एक विश्लेषण के अनुसार यूपी में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का वेतन भारत के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद से चार गुणा और स्वयं उत्तरप्रदेश के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद से 15 गुणा अधिक है। इसके बावजूद सीखने के स्तरों के आधार पर भारतीय शिक्षकों का प्रदर्शन प्रोग्राम फॉर द इंटरनेशनल असेसमेंट (पीआईएसए) टेस्ट में बहुत ही खराब रहा है। इस कार्यक्रम में 74 देशों के बीच भारत का स्थान 73वां रहा वहीँ चीन दूसरे स्थान पर रहा।
सरकारी स्कूलों की खराब होती गुणवत्ता का सबसे बड़ा कारण शिक्षा विभाग के अधिकारियों की उदासीनता और लापरवाही है। जो सरकारी खजाने से वेतन और अन्य सुविधाएँ तो प्राप्त करते हैं लेकिन अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं। जरूरत है 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सख्ती से लागू करने की, जिसमे कोर्ट ने सभी नौकरशाहों और सरकारी कर्मचारियों के लिए उनके बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़वाना अनिवार्य किया था। मोटी रकम लेकर एडमिशन देने वाले निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या के बावजूद देश के 55 प्रतिशत (लगभग 26 करोड़) बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। ऐसे में उनके भविष्य को अंधकारमय होने से बचाने के लिए केवल भारी भरकम बजट आवंटित करना ही एकमात्र उपाय नहीं हो सकता है बल्कि सुधार की आवश्यकता सभी स्तरों पर ईमानदारी से किये जाने की जरूरत है।
 (साभार-देशबंधु)

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

गीतांजलि- रवीन्द्रनाथ ठाकुर हिन्दी काव्य रूपान्तर-डॉ.हरिवंश तरुण

 "किसे पूजते तिमिर में खड़े अरे, मन में गोपन हो कहीं खोलकर नयन जरा देखो देवता घर  में  हैं या नहीं" "नहीं मुझको किंचित स्वीकार अशुचि से पूरित जो उपहार मिले प्रभु तेरा प्रेमोपहार गूँजती जिसमें तव झंकार  मात्र यह मुझको है स्वीकार" (गीतांजलि- रवीन्द्रनाथ ठाकुर  हिन्दी काव्य रूपान्तर-डॉ.हरिवंश तरुण)



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गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019

पैग़म्बर The Prophet- ख़लील जिब्रान

 "प्रेम तुम्हें तुम्हीं को समर्पित करने के अतिरिक्त कुछ नहीं देता, और न ही तुम्हें स्वयं पर न्यौछावर करने के अतिरिक्त तुमसे कुछ माँगता ही है। न तो यह अपने एवज में कुछ माँगता है और न ही यह तुम्हारे समर्पण के एवज में तुम्हें कुछ देगा। प्रेम तो अपने आप में ही परिपूर्ण है, पर्याप्त है। सुबह उठो तो प्रेम-आनन्दित हृदय से ईश्वर का धन्यवाद करो कि उसने तुम्हें प्यार करने के लिए एक और दिन दिया है।" (पैग़म्बर The Prophet- ख़लील जिब्रान)



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न आनेवाला कल- मोहन राकेश

 "वह किस स्त्री की बात कर रहा है, यह मुझे पूछने की जरूरत नहीं थी। स्कूल में जब भी आपसी बातचीत में 'उस स्त्री' का जिक्र करता था, तो उसका मतलब मिसेज ज्याफ्रे से होता था। ज्यादातर लोगों का आपसी बातचीत का विषय भी वही रहती थी। इस दृष्टि से स्कूल में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति थी। रहस्यमय भी, क्योंकि उसके अतीत को लेकर कई तरह की बातें लोगों से सुनने को मिल जाती थीं, एक बात जो सबसे ज्यादा प्रचलित थी, वह यह थी कि मॉली क्राउन उसके पति की कोई संतान नहीं है। "मॉली आधी हिंदुस्तानी है"। कोहली कहा करता था "जब कि इसका पति इसकी तरह खालिस अंग्रेज था"। बीस साल यह एक राजकुमारी की गवर्नेस रही है। उसी जमाने में सुना है कि..."। (न आनेवाला कल- मोहन राकेश)



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बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

कुलदीप नैय्यर - एक ज़िन्दगी काफ़ी नहीं

 "जिन्ना ने 'सीधी कार्रवाई' का आह्वान किया। यह कार्रवाई ब्रिटिशों के खिलाफ न होकर मुसलमानों द्वारा अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए थी, क्योंकि जिन्ना को ऐसा लगता था कि कांग्रेस ने पाकिस्तान की माँग को 'ढिठाई और तिरस्कार' के साथ लिया था।  यह पूछे जाने पर कि 'सीधी कार्रवाई' हिंसक होगी या अहिंसक, जिन्ना ने कहा था, "मैं मर्यादाओं की बात नहीं करूँगा।" सीधी कार्रवाई के लिए सिर्फ कलकत्ता को चुना गया था और वह भी सिर्फ एक दिन (16 अगस्त, 1946) के लिए। उस दिन बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार ने सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा कर दी थी। विपक्ष की चेतावनियों और विरोध का कोई असर नहीं हुआ था। लीग ने एक विशाल रैली का आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता खुद मुख्यमंत्री शाहीद सुहरावरदी ने की। मुस्लिम लीग नेशनल गार्ड के जत्थे के जत्थे हिन्दू क्षेत्रों में घुस गए और चंदे की माँग करने लगे, कुछ जगह तो हजार रुपए तक। रैली से लौटते समय ये जत्थे उन हिन्दू दुकानों को लूटने लगे जिन्होंने चंदा नहीं दिया था या हड़ताल की घोषणा के बावजूद अपनी दुकानें बंद नहीं की थीं। हिंदुओं और सिखों पर हमले किए गए। जिस तरीके से ये घटनाएँ घटीं, उससे ऐसा लगता था कि सब कुछ पूर्व नियोजित था।" (कुलदीप नैय्यर - एक ज़िन्दगी काफ़ी नहीं)



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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

मंगलवार, 29 जनवरी 2019

पढ़ते-पढ़ते : लिखते-लिखते, कवि की डायरी- जयप्रकाश मानस

 "एक श्रेष्ठ कविता बहु-संदर्भी होती है। यद्यपि कवि का संदर्भ सबका नहीं होता तथापि कविता में सबके संदर्भ हो सकते हैं। कई बार कविता में किसी एक पाठक, श्रोता, संपादक, अध्यापक, समीक्षक या आलोचक द्वारा तलाश किया गया संदर्भ अन्य दूसरे या सभी का संदर्भ नहीं होता। क्योंकि हर व्यक्ति के सोचने-विचारने, देखने-परखने का संदर्भ एक जैसा नहीं होता। फिर भी पाठक या श्रोता का अपना एक संदर्भ तो होता ही है। पाठक या श्रोता अपने उसी संदर्भ-संज्ञानता के बल पर कविता से अपना तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं।" (पढ़ते-पढ़ते : लिखते-लिखते, कवि की डायरी- जयप्रकाश मानस)


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रविवार, 27 जनवरी 2019

बेसन की बर्फी (चक्की) बनाने की विधि – Besan ki Barfi Recipe in Hindi


आवश्यक सामग्री : Besan Barfi Ingredients

·         बेसन_Gram flour – 250 ग्राम,
·         शक्कर_Sugar – 250 ग्राम,
·         देशी घी_Pure Ghee – 200 ग्राम,
·         दूध_Milk – 02 बड़े चम्मच,
·         काजू_Cashew – 02 बड़े चम्मच (बारीक कतरे हुए),
·         बादाम_Almond – 02 बड़े चम्मच (बारीक कतरे हुए),
·         पिस्ता_Pistachios – 01 बड़ा चम्मच (लम्बे कटे हुए),
·         छोटी इलाइची_Green cardamom – 05 नग (छीलकर पीसी हुई)।

बेसन की बर्फी बनाने की विधि : How To Make Besan Ki Barfi

बेसन बर्फी रेसिपी इन हिंदी Besan ki Barfi Recipe in Hindi के लिये सबसे पहले एक बर्तन में बेसन लेकर उसमें दूध और दो बड़े चम्मच घी डालें और सभी चीजों को अच्छी तरह से मिला लें।
अब कढ़ाई में देशी घी डालकर गरम करें। घी गर्म होने पर उसमें बेसन डालें और लगातार चलाते हुए अच्छी तरह से भून लें।
बेसन को एक प्लेट में निकाल कर रख दें। उसके बाद बर्तन में शक्कर और 1/2 कप पानी डालें और चलाते हुए पकाएं। जब शीरे में दो तार की चाशनी बनने लगेतो उसमें बेसन डाल दें और चलाते हुए पकाएं।
साथ ही इसमें इचाइची पाउडरबादाम और काजू भी डाल दें। जब बेसन का मिश्रण जमने वाली स्थिति में पहुंच जाए उसे गैस से उतार लें।
अब बेसन की चक्की जमाने की बारी है। इसके लिए एक समतल थाली में थोड़ा घी डालकर उसकी सतह चिकनी कर लें। इसके बाद बेसन का मिश्रण थाली में कलछी की सहायता से बराबर फैला दें।
बर्फी के ऊपर कतरे हुए पिस्ता डाल दें और चम्मच की सहायता से बर्फी की सतह को बराबर कर दें औ घंटे के लिए रख दें।
लीजिएबेसन की बर्फी बनाने की विधि कम्‍प्‍लीट हुई। बस 2 घंटे बाद बेसन बर्फी Besan Barfi एक तेज चाकू से मनचाहे शेप में काट लें और परोसें। इसे आप एयर टाइट बर्तन में रख कर 15-20 दिनों तक उपयोग कर सकते हैं।

नोट-
·         बेसन की बर्फी बनाते समय इस बात का ध्यान रखें कि अगर बर्फी घंटे के बाद भी जम नहीं रही हैतो उसे कढ़ाई में फिर से 2-3 मिनट भून लें और जमा दें।
·         अगर आपकी बर्फी जमने के बाद बेहद सख्त हो जाएतो उसे छोटे- छोटे पीस में तोड़ लें और उसमें 1/2 कप दूध मिलाकर फिर से पकाएं और मिश्रण एकसार होने पर पुन: जमा लें।

प्रस्तुति- अर्चना शर्मा (Archana Sharma)




रसीले गुलाब जामुन


मावामिल्क पाउडर या रेडी मिक्स से गुलाब जामुन तो बनते ही हैं. 
हम बता रहे हैं रवा और दूध से गुलाब बनाने का तरीका. रेसिपी आसान है और गुलाब जामुन का स्वाद भी उम्दा होता है.

कितने लोगों के लिए : 4 - 6
समय : 30 मिनट से 1 घंटा
मील टाइप : वेज

सामग्री 
टीस्पून घी
कप सूजी\रवा
1 1/2 
कप दूध
कप पानी
कप शक्कर

विधि 
सबसे पहले मीडियम आंच पर कड़ाही रखें.
इसमें घी डालकर गर्म करें.
घी के गर्म होते ही इसमें बारीक वाली सूजी डालकर 2-3 मिनट तक चलाते हुए भूनना है.
सूजी अच्छी तरह भूनने के बाद इसमें एक कप दूध डालें. फिर आधा चम्मच शक्कर डालकर मिलाते हुए पकाएं.
दूध सूखने के बाद आधा कप और दूध डालें. इस बात का ध्यान रखें कि सूजी की गुठलियां न बनें. इसलिए इसे अच्छी तरह चलाते हुए मिलाएं.
इसे तब तक पकाएं जबतक दूध सूख नहीं जाता है और सूजी का बढिया आटा नहीं बन जाता.
आंच से उतारकर इस आटे को ठंडा कर लें.
ठंडा होने के बाद आटे या मिश्रण को एक प्लेट पर निकाल लें और अच्छी तरह गूंद लें.
गूंदने से पहले हथेलियों पर थोड़ा-सा घी लगा लें. और मिश्रण को 8-10 मिनट तक गूंदें.
बढ़िया मुलायम आटा तैयार होने के बाद हथेलियों पर फिर से घी लगा लें और आटे की छोटी-छोटी लोइयां बना लें. अगर लोइयों में क्रैक आ रहा है तो फिर से आटे को गूंद लें.
पुरे आटे से 16-18 लोइयां बन जाएंगी.
अब कड़ाही में घी डालकर गर्म करें. आंच धीमी रखें और घी में एक-एक करके 10-12 लोइयां डालकर फ्राई करें.
लोइयां पकने में 7-8 मिनट का समय लगेगा. जब गोल्डन ब्राउन हो जाएं तो घी से निकाल लें.
जब तक गुलाब जामुन फ्राई हो रहे हैं तब एक दूसरे बर्तन में एक पानी और एक शक्कर डालकर आंच पर रखें.
जब शक्कर अच्छी तरह घुल जाए तब आंच बंद कर दें.
इतनी देर में गुलाब जामुन भी पक जाएंगे.

इसी तरीके से बाकी लोइयों को फ्राई कर लें.
इन पकी लोइयों या गुलाब जामुन को चाशनी में डालें और आंच पर रखकर एक उबाल लगा लें.
आंच से उतारकर गुलाब जामुन को 1-2 घंटे तक चाशनी में डूबे रहने दें.
इसके बाद निकालकर मजे से रवा वाले गुलाब जामुन का स्वाद लें.
साभार-पकवानगली 
प्रस्तुति-अर्चना शर्मा 




शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

गीता माता-मोहनदास करमचंद गांधी

 तब भगवान ने उत्तर दिया- "हे पापरहित अर्जुन! आरंभ से ही इस जगत में दो मार्ग चलते आए हैं : एक में ज्ञान की प्रधानता है और दूसरे में कर्म की। पर तू स्वयं देख ले कि कर्म के बिना मनुष्य अकर्मी नहीं हो सकता, बिना कर्म के ज्ञान आता ही नहीं। सब छोड़कर बैठ जानेवाला मनुष्य सिद्ध पुरुष नहीं कहला सकता।" (गीता माता-मोहनदास करमचंद गांधी)




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सोमवार, 24 दिसंबर 2018

योद्धा संन्यासी विवेकानन्द- हंसराज रहबर

 "अध्ययन का उद्देश्य सत्य की खोज था और नरेंद्र जिसे सत्य समझ लेता था, उसकी जी-जान से रक्षा करता था। जब देखता था कि कोई दूसरा उसके विपरीत भाव या मत व्यक्त कर रहा है तो नरेंद्र चट विवाद पर उतर आता था और अपने सशक्त तर्कों और युक्तियों द्वारा उसे परास्त करके दम लेता था। पराजित व्यक्ति के बार बिलबिला उठते थे और नरेंद्र पर दम्भी होने का आरोप लगाने में भी संकोच नहीं करते थे। पर नरेंद्र के मन में किसी के प्रति द्वेष भाव नहीं था। और अपनी ही बात को ऊंचा रखने के लिए वह कभी कुतर्क का सहारा नहीं लेता था। उसे जो कहना होता था दूसरे के सामने साफ-साफ कहता था।" (योद्धा संन्यासी विवेकानन्द- हंसराज रहबर)




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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

बड़ी दीदी-शरतचंद्र चट्टोपाध्याय

 "इस धरती पर एक विशेष प्रकार के प्राणी हैं, जो मानो फूस की आग हैं। वे तत्काल जल उठते हैं और झटपट बुझ भी जाते हैं। उनके पीछे हमेशा एक आदमी रहना चाहिए, जो जरूरत के अनुसार उनके लिए फूस जुटा दिया करे।  जैसे गृहस्थ घरों की कन्याएं, मिट्टी के दीये जलाते समय उनमें तेल और बाती डालती हैं, उसी तरह वे उसमें एक सलाई भी रख देती हैं। जब दीपक की लौ कुछ कम होने लगती है, तब उस छोटी-सी सलाई की बहुत आवश्यकता पड़ती है। यदि वह न हो, तो तेल और बाती होते हुए भी, दीपक का जलना नहीं हो सकता।" (बड़ी दीदी-शरतचंद्र चट्टोपाध्याय)




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