नमस्कार,आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757
शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019
क्यों दूर हो रहे हैं सरकारी स्कूलों से बच्चे?
शनिवार, 16 फ़रवरी 2019
गीतांजलि- रवीन्द्रनाथ ठाकुर हिन्दी काव्य रूपान्तर-डॉ.हरिवंश तरुण
"किसे पूजते तिमिर में खड़े अरे, मन में गोपन हो कहीं खोलकर नयन जरा देखो देवता घर में हैं या नहीं" "नहीं मुझको किंचित स्वीकार अशुचि से पूरित जो उपहार मिले प्रभु तेरा प्रेमोपहार गूँजती जिसमें तव झंकार मात्र यह मुझको है स्वीकार" (गीतांजलि- रवीन्द्रनाथ ठाकुर हिन्दी काव्य रूपान्तर-डॉ.हरिवंश तरुण)
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गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019
पैग़म्बर The Prophet- ख़लील जिब्रान
"प्रेम तुम्हें तुम्हीं को समर्पित करने के अतिरिक्त कुछ नहीं देता, और न ही तुम्हें स्वयं पर न्यौछावर करने के अतिरिक्त तुमसे कुछ माँगता ही है। न तो यह अपने एवज में कुछ माँगता है और न ही यह तुम्हारे समर्पण के एवज में तुम्हें कुछ देगा। प्रेम तो अपने आप में ही परिपूर्ण है, पर्याप्त है। सुबह उठो तो प्रेम-आनन्दित हृदय से ईश्वर का धन्यवाद करो कि उसने तुम्हें प्यार करने के लिए एक और दिन दिया है।" (पैग़म्बर The Prophet- ख़लील जिब्रान)
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न आनेवाला कल- मोहन राकेश
"वह किस स्त्री की बात कर रहा है, यह मुझे पूछने की जरूरत नहीं थी। स्कूल में जब भी आपसी बातचीत में 'उस स्त्री' का जिक्र करता था, तो उसका मतलब मिसेज ज्याफ्रे से होता था। ज्यादातर लोगों का आपसी बातचीत का विषय भी वही रहती थी। इस दृष्टि से स्कूल में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति थी। रहस्यमय भी, क्योंकि उसके अतीत को लेकर कई तरह की बातें लोगों से सुनने को मिल जाती थीं, एक बात जो सबसे ज्यादा प्रचलित थी, वह यह थी कि मॉली क्राउन उसके पति की कोई संतान नहीं है। "मॉली आधी हिंदुस्तानी है"। कोहली कहा करता था "जब कि इसका पति इसकी तरह खालिस अंग्रेज था"। बीस साल यह एक राजकुमारी की गवर्नेस रही है। उसी जमाने में सुना है कि..."। (न आनेवाला कल- मोहन राकेश)
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बुधवार, 13 फ़रवरी 2019
कुलदीप नैय्यर - एक ज़िन्दगी काफ़ी नहीं
"जिन्ना ने 'सीधी कार्रवाई' का आह्वान किया। यह कार्रवाई ब्रिटिशों के खिलाफ न होकर मुसलमानों द्वारा अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए थी, क्योंकि जिन्ना को ऐसा लगता था कि कांग्रेस ने पाकिस्तान की माँग को 'ढिठाई और तिरस्कार' के साथ लिया था। यह पूछे जाने पर कि 'सीधी कार्रवाई' हिंसक होगी या अहिंसक, जिन्ना ने कहा था, "मैं मर्यादाओं की बात नहीं करूँगा।" सीधी कार्रवाई के लिए सिर्फ कलकत्ता को चुना गया था और वह भी सिर्फ एक दिन (16 अगस्त, 1946) के लिए। उस दिन बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार ने सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा कर दी थी। विपक्ष की चेतावनियों और विरोध का कोई असर नहीं हुआ था। लीग ने एक विशाल रैली का आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता खुद मुख्यमंत्री शाहीद सुहरावरदी ने की। मुस्लिम लीग नेशनल गार्ड के जत्थे के जत्थे हिन्दू क्षेत्रों में घुस गए और चंदे की माँग करने लगे, कुछ जगह तो हजार रुपए तक। रैली से लौटते समय ये जत्थे उन हिन्दू दुकानों को लूटने लगे जिन्होंने चंदा नहीं दिया था या हड़ताल की घोषणा के बावजूद अपनी दुकानें बंद नहीं की थीं। हिंदुओं और सिखों पर हमले किए गए। जिस तरीके से ये घटनाएँ घटीं, उससे ऐसा लगता था कि सब कुछ पूर्व नियोजित था।" (कुलदीप नैय्यर - एक ज़िन्दगी काफ़ी नहीं)
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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019
सामान्य ज्ञान
आजकल TV देखने और मोबाइल में समय बर्बाद करने से बेहतर है कि किताबें पढ़ी जायें। जिनसे कुछ अच्छा सीखा जा सकता है।
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मंगलवार, 29 जनवरी 2019
पढ़ते-पढ़ते : लिखते-लिखते, कवि की डायरी- जयप्रकाश मानस
"एक श्रेष्ठ कविता बहु-संदर्भी होती है। यद्यपि कवि का संदर्भ सबका नहीं होता तथापि कविता में सबके संदर्भ हो सकते हैं। कई बार कविता में किसी एक पाठक, श्रोता, संपादक, अध्यापक, समीक्षक या आलोचक द्वारा तलाश किया गया संदर्भ अन्य दूसरे या सभी का संदर्भ नहीं होता। क्योंकि हर व्यक्ति के सोचने-विचारने, देखने-परखने का संदर्भ एक जैसा नहीं होता। फिर भी पाठक या श्रोता का अपना एक संदर्भ तो होता ही है। पाठक या श्रोता अपने उसी संदर्भ-संज्ञानता के बल पर कविता से अपना तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं।" (पढ़ते-पढ़ते : लिखते-लिखते, कवि की डायरी- जयप्रकाश मानस)
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रविवार, 27 जनवरी 2019
बेसन की बर्फी (चक्की) बनाने की विधि – Besan ki Barfi Recipe in Hindi
रसीले गुलाब जामुन
1 कप सूजी\रवा
1 1/2 कप दूध
1 कप पानी
1 कप शक्कर
- इसमें घी डालकर गर्म करें.
- घी के गर्म होते ही इसमें बारीक वाली सूजी डालकर 2-3 मिनट तक चलाते हुए भूनना है.
- सूजी अच्छी तरह भूनने के बाद इसमें एक कप दूध डालें. फिर आधा चम्मच शक्कर डालकर मिलाते हुए पकाएं.
- दूध सूखने के बाद आधा कप और दूध डालें. इस बात का ध्यान रखें कि सूजी की गुठलियां न बनें. इसलिए इसे अच्छी तरह चलाते हुए मिलाएं.
- इसे तब तक पकाएं जबतक दूध सूख नहीं जाता है और सूजी का बढिया आटा नहीं बन जाता.
- आंच से उतारकर इस आटे को ठंडा कर लें.
- ठंडा होने के बाद आटे या मिश्रण को एक प्लेट पर निकाल लें और अच्छी तरह गूंद लें.
- गूंदने से पहले हथेलियों पर थोड़ा-सा घी लगा लें. और मिश्रण को 8-10 मिनट तक गूंदें.
- बढ़िया मुलायम आटा तैयार होने के बाद हथेलियों पर फिर से घी लगा लें और आटे की छोटी-छोटी लोइयां बना लें. अगर लोइयों में क्रैक आ रहा है तो फिर से आटे को गूंद लें.
- पुरे आटे से 16-18 लोइयां बन जाएंगी.
- अब कड़ाही में घी डालकर गर्म करें. आंच धीमी रखें और घी में एक-एक करके 10-12 लोइयां डालकर फ्राई करें.
- लोइयां पकने में 7-8 मिनट का समय लगेगा. जब गोल्डन ब्राउन हो जाएं तो घी से निकाल लें.
- जब तक गुलाब जामुन फ्राई हो रहे हैं तब एक दूसरे बर्तन में एक पानी और एक शक्कर डालकर आंच पर रखें.
- जब शक्कर अच्छी तरह घुल जाए तब आंच बंद कर दें.
- इतनी देर में गुलाब जामुन भी पक जाएंगे.
- आंच से उतारकर गुलाब जामुन को 1-2 घंटे तक चाशनी में डूबे रहने दें.
- इसके बाद निकालकर मजे से रवा वाले गुलाब जामुन का स्वाद लें.
शुक्रवार, 4 जनवरी 2019
गीता माता-मोहनदास करमचंद गांधी
तब भगवान ने उत्तर दिया- "हे पापरहित अर्जुन! आरंभ से ही इस जगत में दो मार्ग चलते आए हैं : एक में ज्ञान की प्रधानता है और दूसरे में कर्म की। पर तू स्वयं देख ले कि कर्म के बिना मनुष्य अकर्मी नहीं हो सकता, बिना कर्म के ज्ञान आता ही नहीं। सब छोड़कर बैठ जानेवाला मनुष्य सिद्ध पुरुष नहीं कहला सकता।" (गीता माता-मोहनदास करमचंद गांधी)
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सोमवार, 24 दिसंबर 2018
योद्धा संन्यासी विवेकानन्द- हंसराज रहबर
"अध्ययन का उद्देश्य सत्य की खोज था और नरेंद्र जिसे सत्य समझ लेता था, उसकी जी-जान से रक्षा करता था। जब देखता था कि कोई दूसरा उसके विपरीत भाव या मत व्यक्त कर रहा है तो नरेंद्र चट विवाद पर उतर आता था और अपने सशक्त तर्कों और युक्तियों द्वारा उसे परास्त करके दम लेता था। पराजित व्यक्ति के बार बिलबिला उठते थे और नरेंद्र पर दम्भी होने का आरोप लगाने में भी संकोच नहीं करते थे। पर नरेंद्र के मन में किसी के प्रति द्वेष भाव नहीं था। और अपनी ही बात को ऊंचा रखने के लिए वह कभी कुतर्क का सहारा नहीं लेता था। उसे जो कहना होता था दूसरे के सामने साफ-साफ कहता था।" (योद्धा संन्यासी विवेकानन्द- हंसराज रहबर)
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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018
बड़ी दीदी-शरतचंद्र चट्टोपाध्याय
"इस धरती पर एक विशेष प्रकार के प्राणी हैं, जो मानो फूस की आग हैं। वे तत्काल जल उठते हैं और झटपट बुझ भी जाते हैं। उनके पीछे हमेशा एक आदमी रहना चाहिए, जो जरूरत के अनुसार उनके लिए फूस जुटा दिया करे। जैसे गृहस्थ घरों की कन्याएं, मिट्टी के दीये जलाते समय उनमें तेल और बाती डालती हैं, उसी तरह वे उसमें एक सलाई भी रख देती हैं। जब दीपक की लौ कुछ कम होने लगती है, तब उस छोटी-सी सलाई की बहुत आवश्यकता पड़ती है। यदि वह न हो, तो तेल और बाती होते हुए भी, दीपक का जलना नहीं हो सकता।" (बड़ी दीदी-शरतचंद्र चट्टोपाध्याय)
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