नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

रविवार, 3 जनवरी 2021

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत

 

मनुष्‍य ने युगों से अपनी आत्‍मा की क्रियाशीलता को अभिव्‍यक्‍त करने का प्रयास किया है, जो कि कला के माध्‍यम से सांसारिकता के आगे की तलाश है ।

काव्‍य, चित्रकला और अन्‍य दृश्‍य कलाओं का विकास पत्‍थर, पत्‍तों तथा कागज पर हुआ है । संगीत का संबंध श्रवण से है, ऐसा कोई प्रमाण उपलब्‍ध नहीं है । अत: प्राचीन समय के संगीत को आज सुन पाना संभव नहीं है ।

ऐसे सांस्‍कृतिक अन्‍तर्संबंधों की विविधता के बावजूद, हमारा संगीत तत्‍त्‍वत: रागात्‍मक रहा है । इसमें एक स्‍वर दूसरे स्‍वर के बाद आता है और प्रभाव की एक सतत इकाई का सृजन होता है, जबकि स्‍वर संगति में संगीतात्‍मक स्‍वर एक-दूसरे पर अध्‍यारोपित किए जाते हैं । हमारे शास्‍त्रीय संगीत ने स्‍वरमाधुर्य के गुण को बनाए रखा है ।

आज हम शास्‍त्रीय संगीत की दो पद्धतियों को पहचानते हैं: हिन्‍दुस्‍तानी एवं कर्नाटक । कर्नाटक संगीत कर्नाटक, आन्‍ध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल तक सीमित है। शेष देश के शास्‍त्रीय संगीत का नाम हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय संगीत है । नि:संदेह, कर्नाटक और आन्‍ध्र में कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय पद्धति का भी अभ्‍यास किया जाता है । कर्नाटक ने अभी हाल ही में हमें हिन्‍दुस्‍तानी शैली के कुछ अति विशिष्‍ट संगीतकार दिए हैं ।

सामान्‍य रूप से यह विश्‍वास किया जाता है कि तेरहवीं शताब्‍दी से पूर्व भारत का संगीत कुल मिलाकर एकसमान है, बाद में जो दो पद्धतियों में विभाजित हो गया था ।

वर्तमान भारतीय संगीत का प्राचीन समय से विकास हुआ है। लगभग प्रत्‍येक जनजाति या व्‍यक्ति ने इस विकास में अपने हिस्‍से का योगदान दिया है । अत: जिसे अब हम राग कहते है वह जनजातीय या लोक धुन के रूप में प्रारम्‍भ हुआ होगा ।

वेदों के गुणगान करने की रागात्‍मक प्रवृत्तियों से भारतीय संगीत को प्रारम्‍भ करना सामान्‍य सी बात है । प्राचीनतम संगीत जिसमें व्‍याकरण निहित था, वैदिक था । नि:संदेह, ऋग्‍वेद को प्राचीनतम कहा जाता है : लगभग 5000 वर्ष पुराना । ऋग्‍वेद के गान को ऋचाएं कहते हैं । यजुर्वेद भी एक धार्मिक गुणगान है लेकिन उन बीते हुए दिनों का उत्‍तरी और दक्षिणी भारत में वास्‍तविक संगीत इस प्रकार का नहीं हो सकता था । अनार्य होते थे, जिनकी अपनी कला थी, उदाहरण के लिएं, भारत के पूर्वी क्षेत्र का संथाल संगीत उनके सामने से ही होकर गुजर गया होगा । जबकि मतभेद स्‍पष्‍ट हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है कि लोगों के इस संगीत ने, जिसे अब हम हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय संगीत कहते हैं, की रचना में अपना योगदान दिया होगा ।

भारतीय संगीत के इतिहास में भरत का नाट्यशास्‍त्र एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण सीमाचिह्न है । यह माना जाता है कि इसे दूसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व और दूसरी शताब्‍दी ईसवी सन् के बीच किसी समय लिखा गया होगा । कुछ विद्वानों को तो यह संदेह है कि क्‍या यह मात्र एक लेखक की रचना (ग्रंथ) है तथा यह एक सार-संग्रह रहा होगा जिसका रूपान्‍तर हमें उपलब्‍ध है । नाट्यशास्‍त्र एक व्‍यापक रचना या ग्रंथ है जो प्रमुख रूप से नाट्यकला के बारे में है लेकिन इसके कुछ अध्‍याय संगीत के बारे में हैं । इसमें हमें सरगम, रागात्‍मकता, रूपों और वाद्यों के बारे में जानकारी मिलती है । तत्‍कालीन समकालिक संगीत ने दो मानक सरगमों की पहचान की । इन्‍हें ग्राम कहते थे । शब्‍द ग्राम ही संभवत: किसी समूह या सम्‍प्रदाय उदाहरणार्थ एक गांव के विचार से लिया गया है । यही संभवत: स्‍वरों की ओर ले जाता है जिन्‍हें ग्राम कहा जा रहा है । इसका स्‍थूल रूप से सरगमों के रूप में अनुवाद किया जा सकता है । उस समय दो ग्राम प्रचलन में थे । इनमें से एक को षडज ग्राम और अन्‍य को मध्‍यम ग्राम कहते थे । दो के बीच का अन्‍तर मात्र एक स्‍वर पंचम में था । अधिक सटीक रूप से कहें तो हम यह कह सकते हैं कि मध्‍यम ग्राम में पंचम षडज ग्राम के पंचम से एक श्रुति नीचे था ।

इस प्रकार से श्रुति मापने की एक इकाई है या एक ग्राम अथवा एक सरगम के भीतर विभिन्‍न क्रमिक तारत्‍वों के बीच एक छोटा-सा अन्‍तर है । सभी व्‍यावहारिक प्रयोजनों के लिए, इनकी संख्‍या बाइस बताई जाती है । जहां तक व्‍यावहारिक गणना का संबंध है, यह मात्र इसी के लिए है । जैसा कि हम कहेंगे कि एक सप्‍तक में सात स्‍वर हैं- सा से ऊपरी सा या तारसप्‍तक के सा तक, लेकिन वास्‍तव में भारतीय संगीत में प्रयोग में लायी जाने वाली, श्रुतियों की संख्‍या असीम है ।

भरत के समय में ग्राम पर लौटें तो इनकी संख्‍या दो है, तथा प्रत्‍येक में सात स्‍वर हैं । भरत ने दो अन्‍य स्‍वरों का उल्‍लेख भी किया है: अन्‍तरा गांधार और काकली निषाद ।

अब प्रत्‍येक ग्राम से अनुपूरक सरगम लिए गए हैं । इन्‍हें मूर्छना कहते हैं । ये एक अवरोही क्रम में बजाए या गाए जाते हैं । एक सरगम में सात मूलभूत स्‍वर होते हैं, अत: सात मूर्छना हो सकते हैं, जैसा कि उल्‍लेख किया गया था, ग्राम दो होते हैं और प्रत्‍येक के सात मानक स्‍वर और दो पूरक स्‍वर होते हैं । चूंकि प्रत्‍येक स्‍वर एक मूर्छना दे सकता है, ऐसे असंख्‍य पूरक सरगम प्राप्‍त किए जा सकते हैं । यह दिखा पाना संभव है कि ग्राम से चौंसठ मूर्छना प्राप्‍त किए जा सकते हैं । इस प्रक्रिया ने स्‍वर संबंधी अलग-अलग पद्धतियां दी जिनके भीतर रहते हुए उन दिनों के सभी ज्ञात लय को समूहबद्ध किया जा सकता है या फिर इनका विकास किया जा सकता है । यह स्थिति कई शताब्दियों तक बनी रही । लगभग तेरहवीं शताब्‍दी ईसवी सन् में शारंगदेव जिनके पूर्वज कश्‍मीर से थे- दक्षिण भारत में बस गए और अपने अतयन्‍त महत्‍त्‍वपूर्ण संगीत रत्‍नाकर की रचना की । इन्‍होंने मूर्छना और ग्राम जैसे तकनीकी शब्‍दों का वर्णन भी किया । मानक सरगमें अब भी वही थीं । जबकि भरत दो सहायक स्‍वरों का उल्‍लेख करते हैं, मध्‍यकालीन युग में इनकी संख्‍या तथा परिभाषा बहुत भिन्‍न थी ।

प्राय: रूपात्‍मक संगीत कहलाने वाली समूची योजना अब हमें काफी अपरिचित प्रतीत होती है लेकिन इस तथ्‍य पर कदापि संदेह नहीं किया जा सकता कि यह अत्‍यधिक उन्‍नत और वैज्ञानिक थी ।

लगभग ग्‍यारहवीं शताब्‍दी से, मध्‍य और पश्चिम एशिया के संगीत ने हमारी संगीत की परम्‍परा को प्रभावित करना प्रारम्‍भ कर दिया था । धीरे-धीरे इस प्रभाव की जड़ गहरी होती चली गई और कई परिवर्तन हुए । इनमें से एक महत्‍त्‍वपूर्ण परिवर्तन था- ग्राम और मूर्छना का लुप्‍त होना ।

लगभग पन्‍द्रहवीं शताब्‍दी के आसपास, परिवर्तन की यह प्रक्रिया सुस्‍पष्‍ट हो गयी थी, ग्राम पद्धति अप्रचलित हो गई थी । मेल या थाट की संकल्‍पना ने इसका स्‍थान से लिया था । इसमें मात्र एक मानक सरगम है । सभी ज्ञात स्‍वर एक सामान्‍य स्‍वर ‘सा’ तक जाते हैं ।

लगभग अठारहवीं शताब्‍दी तक, यहां तक कि हिन्‍दुस्‍तानी संगीत के मानक या शुद्ध स्‍वर भिन्‍न हो गए थे । अठारहवीं शताब्‍दी से स्‍वीकृत, वर्तमान स्‍वर है :

सा रे ग म प ध नि
यह आधुनिक राग बिलावल का मेल आरोह है । इन सात शुद्ध स्‍वरों या स्‍वरों के अतिरिक्‍त, पांच रूप भेद हैं जिसमें कुल सभी बारह स्‍वर मिल कर सप्‍तक बनाते हैं ।
सा रे रे ग ग म म प ध ध नि नि
नि:संदेह, बेहतर रूपभेद है: ये श्रुतियां हैं । अत: इन्‍हें स्‍वर के बजाए 12 स्‍वर संबंधी क्षेत्र कहना बेहतर होगा ।

सभी ज्ञात राग इस बारह स्‍वरों की सरगम में समूहबद्ध हैं । सत्‍तरहवीं शताब्‍दी के एक कर्नाटक संगीत विज्ञानी वेंकटमुखी ने इन बारह स्‍वरों से तैयार किए गए 72 मेलों की एक पद्धति बनाई । बाद में, बीसवीं शताब्‍दी में पंडित भातखण्‍डे ने हिन्‍दुस्‍तानी रागों का वर्गीकरण करने के लिए 72 में से 10 को चुना ।

अभी तक हमने (स्‍वरग्राम) सरगमों की चर्चा की है: ग्राम, मूर्छना और मेल । यह स्‍पष्‍ट ही है कि इन संकल्‍पनाओं का विकास रागों के जन्‍म के पश्‍चात हुआ था । कोई भी लोक गायक एक ग्राम या एक मेल के बारे में नहीं सोचता । जनजातीय और लोक गीत पहले के और बिना किसी सचेत व्‍याकरण के आज भी विद्यमान हैं । संगीत विज्ञानी ने बाद में रागों का सरगम या स्‍वरग्राम में वर्गीकरण किया था ।

अब हम अपना ध्‍यान रागात्‍मक संरचनाओं पर देंगे । प्रथम संहिताबद्ध राग के लिए हमें पुन: वेदों का सहारा लेना होगा । भरत के नाट्य शास्‍त्र में जाति नामक रागात्‍मक रूपों का वर्णन मिलता है । हमें यह जानकारी नहीं है कि इन्‍हें किस प्रकार से गाया या बजाया जाता था । लेकिन नाट्यशास्‍त्र और उत्‍तरवर्ती टीकाओं से कुछ मुख्‍य बिन्‍दु लिए जा सकते हैं । इन जातियों में से प्रत्‍येक को किसी में मूर्छना या अन्‍य में डाला जा सकता है । ग्रह (प्रारम्भिक स्‍वर) न्‍यास (वह स्‍वर जिस पर एक वाक्‍यांश रुकता है), स्‍वरों के राग-निम्‍न तारत्‍व से उच्‍च तारत्‍व जैसी विशेषताएं इन्‍हें विशिष्‍ट बनाती हैं । कई विद्वानों की राय यह है कि राग की संकल्‍पना, जो हमारे संगीत के लिए मूलभूत है, का जन्‍म और विकास जाति से हुआ था । राग के बारे में मतंग का वृहद्देशी नामक एक प्रमुख ग्रंथ है । यह ग्रंथ लगभग छठी शताब्‍दी ईसवीं सन् का है । इस समय तक एक रागात्‍मक योजना के रूप में राग का विचार सुस्‍पष्‍ट और सुपरिभाषित हो गया था । मतंग भारत के दक्षिणी क्षेत्र, सटीक रूप से कर्नाटक से थे । इससे यह पता चलता है कि इस युग तक भारतीय संगीत का व्‍याकरण समूचे देश में लगभग एक ही था । दूसरे, उन्‍होंने देशी संगीत के बारे में लिखा है । इसीलिए उन्‍होंने अपने ग्रंथ का नाम वृहद्देशी रखा था
संगीतात्‍मक लय में भारत का एक विशेष योगदान ताल था । ताल समय इकाइयों का एक चक्रीय प्रबंध है । समय विभाजन की मूलभूत इकाइयां लघु, गुरु, और प्‍लुत हैं । वास्‍तव में इन्‍हें काव्‍यात्‍मक छन्‍द शास्‍त्र से लिया गया है । लघु में अक्षर, गुरु दो, और प्‍लुत तीन शामिल हैं । अपेक्षाकृत बड़ी इकाइयां भी हैं । भरत का नाट्यशास्‍त्र विभिन्‍न समय इकाइयों में से ताल का निर्माण करने, इन्‍हें बजाने के तरीके इत्‍यादि के ब्‍यौरे भी देता है । बाद में लेखकों ने 108 तालों की एक योजना का भी विकास किया । ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन तालों के अतिरिक्‍त कुछ नए तालों जैसे फिरदोस्‍त ने हिन्‍दुस्‍तानी संगीत में प्रवेश कर लिया है । हिन्‍दुस्‍तानी पद्धति में ताल बजाने का सबसे महमहत्‍त्‍वपूर्ण पहलू ठेका के भावों का विकास करना रहा है । ठेका एक तबले पर हल्‍के से स्‍पर्श द्वारा एक ताल को स्‍पष्‍ट करता है । ढोल पर प्रत्‍येक हल्‍के स्‍पर्श को एक नाम, एक बोल कहते हैं । उदाहरण के लिए, धा,ता,घे, आदि ।

किसी भी भाषा में हमें एक महाकाव्‍य, एक चतुर्दश-पदी, एक गीतिकाव्‍य, एक लघुकथा, इत्‍यादि मिल सकते हैं । इसी प्रकार से, किसी एक राग और एक ताल का आधार लेकर संगीत के विभिन्‍न रूपों का सृजन किया गया है । प्राचीन समय से लेकर, संगीत के रूपों को दो व्‍यापक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है । ये अनिबद्ध और निबद्ध थे । प्रथम को खुला या मुक्‍त रूप और द्वितीय को बन्‍द या सीमित कह सकते हैं ।

अनिबद्ध संगीत वह होता है जिसे अर्थपूर्ण शब्‍दों और ताल द्वारा प्रतिबद्ध नहीं किया जा सकता । यह एक मुक्‍त तात्‍कालिक संगीत है । इसका सर्वश्रेष्‍ठ रूप आलाप है ।

निबद्ध संगीत के अनेक रूप हैं । प्रबंध गीति उपलब्‍ध प्रारम्भिक वह रूप है जिसके बारे में कुछ जानकारी मिलती है । वास्‍तव में प्रबंध का प्रयोग प्राय: किसी निबद्ध गीत, संगीतात्‍मक कृति के लिए एक सामान्‍य शब्‍द के रूप में किया जाता है । इन बद्ध रूपों के बारे में हमारे पास बहुत कम प्रमाण हैं, सिवाए इसके कि इन्‍हें रागों और तालों को परिभाषित करने के लिए निर्धारित किया गया था । सभी ज्ञात प्रबंधों में से जयदेव के प्रबंध सर्वश्रेष्‍ठ हैं । यह कवि बारहवीं शताब्‍दी में बंगाल में रहता था और इन्‍होंने गीत गोविन्‍द की रचना की, जो गीतों और श्‍लोकों के साथ संस्‍कृत की एक कृति है । यह अष्‍टपदी है, अर्थात् प्रत्‍येक गीत में आठ पद होते हैं । आज ये गीत समूचे देश में फैल गए हैं और प्रत्‍येक क्षेत्र में इनकी अपनी शैली है । वास्‍तव में, गायकों ने प्रबंधों को अपनी धुनें देने की स्‍वतंत्रता ली है । इसे दृष्टि में रखते हुए, अष्‍टपदियों की मूल धुनों का निर्धारण कर पाना संभव नहीं है ।

जयदेव के गीत गोविन्‍द की लोकप्रियता के कई कारण हैं । नि:संदेह, पहला कारण इस कृति का मूलभूत काव्‍यात्‍मक सौन्‍दर्य है जो लगभग अद्वितीय है । पुन: यह संस्‍कृत में और अन्‍य भाषाओं में भी तैयार हुआ है । इन सब के अतिरिक्‍त, भक्ति ही सबसे महान तथा महत्‍त्‍वपूर्ण है जिसने इसे जीवित रखा है । भक्ति या आराधना उतनी पुरानी है जितना कि मनुष्‍य । यह वास्‍तव में मन की वह स्थिति है जिसमें ईश्‍वर से विनती की जाती है ।

जबकि ईश्‍वरत्‍व भक्‍त के पास शिव के रूप में या एक परब्रह्म के रूप में कई रूप ले कर जाता है- श्री विष्‍णु के दस अवतार की कथा के रूप में भागवत ने भारतीय मानस को जीत लिया है, इसी समय गीतों तथा भवनों की रचना की गई थी, इन दोनों के उपदेश और भजन तरंगों के रूप में उत्‍तर भारत तक पहुंचे ताकि हमें जयदेव, चैतन्‍य महाप्रभु, शंकरदेव, कबीर, तुलसी, मीरां, तुकाराम, एकनाथ, नरसी और नानक जैसे सन्‍त कवि मिल सकें । इस भक्ति आन्‍दोलन ने सूफी सहित सभी धर्मों और वर्गों का परिग्रहण कर लिया । इसने हमें अभंग, कीर्तन, भजन, बाउल गीतों जैसे असंख्‍य भक्तिपूर्ण गीत दिए ।

ध्रुपद द्वारा निबद्ध संगीत के महान औपचारिक पहलू से परिचय होता है । विश्‍वास किया जाता है कि यह प्रबंध संरचना का विस्‍तार है । चौदहवीं शताब्‍दी से लेकर अठारहवीं शताब्‍दी तक ध्रुपद ने लोकप्रियता के लिए एक प्रेरक शक्ति अर्जित की और पन्‍द्रहवीं शताब्‍दी से लेकर अठारहवीं शताब्‍दी तक की अवधि में इसका विकास हुआ । इन शताब्दियों के दौरान हम इसी शैली के सर्वाधिक सम्‍मानित तथा सुप्रसिद्ध गायकों एवं संरक्षकों से परिचित होते हैं । मानसिंह तोमर, ग्‍वालियर के महाराजा ही ध्रुपद की व्‍यापक लोकप्रियता के लिए प्रमुख रूप से उत्‍तरदायी थे । बैजू, बक्षु और अन्‍य भी थे । वृंदावन के स्‍वामी हरिदास न केवल एक ध्रुपदिया थे बल्कि भारत के उत्‍तरी क्षेत्रों में भक्ति सम्‍प्रदाय की सर्वाधिक महत्‍त्‍वपूर्ण विभूतियों में से एक थे । परम्‍परानुसार, स्‍वामी हरिदास तानसेन के गुरु थे, जो ध्रुपद के ज्ञात सर्वोत्‍तम गायकों में एक और सम्राट अकबर के राजदरबार के नौ रत्‍नों में से एक थे ।

ध्रुपद संरचना के दो भाग है, अनिबद्ध अनुभाग और संचारी में धृपद । गायकों प्रथम मुक्‍त आलाप है । ध्रुपद विशिष्‍टत: चार भागों में गाया जाने वाला एक गीत है: स्‍थाई, अन्‍तरा, संचारी और अभोग ।

ध्रुपद की अनिवार्य विशेषता इसकी गंभीरता और लय पर बल है । ध्रुपद को गाने की चार शैलियां या वाणियां थीं । गौहर वाणी में राग या अनलंकृत रागात्‍मक आकृतियों का विकास है । डागर वाणी में रागात्‍मक वक्रताओं और शालीनताओं पर बल दिया गया है । कंधार वाणी में स्‍वरों के शीघ्र अलंकरण की विशेषता है । नौहर वाणी अपने व्‍यापक संगीतात्‍मक लंघन (आकस्मिक परिवर्तनों) के लिए जानी जाती थी । ये वाणियां अब अद़ृश्‍य हो गई हैं ।

ध्रुपद का आज भी अत्‍यधिक सम्‍मान किया जाता है और इसे संगीत-समारोह के मंच पर तथा अधिकांशत: उत्‍तर भारत के मन्दिरों में सुना जा सकता है । अब यह जनसाधारण में इतना लो‍कप्रिय भी नहीं रह गया है और पृष्‍ठभूमि में चला गया है । ध्रुपद से घनिष्‍ठ रूप से बीन और पखावज़ को भी आजकल अधिक संरक्षण या लोकप्रियता प्राप्‍त नहीं है ।

आज शास्‍त्रीय हिन्‍दुस्‍तानी संगीत में ख्‍याल को गौरव का स्‍थान प्राप्‍त है । हम वास्‍तव में ख्‍याल के आरम्‍भ के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकते । यह एक विदेशी शब्‍द है और इसका अर्थ ‘कल्‍पना’ है और इसे सुनेंगे तो यह पाएंगे कि यह ध्रुपद से अधिक गीतात्‍मक है, लेकिन यह संदेह का विषय है कि क्‍या इसका संगीतात्‍मक रूप भी विदेशी है । कुछ विद्वानों की यह राय है कि वास्‍तव में इसकी जड़ें प्राचीन भारतीय रूपक आलापों में हैं । यह भी कहा जाता है कि तेरहवीं शताब्‍दी के अमीर खुसरो ने भी इसे प्रोत्‍साहन दिया । पन्‍द्रहवीं शताब्‍दी के सुलतान मोहम्‍मद शर्खी को ख्‍याल को प्रोत्‍साहित करने का श्रेय जाता है तथापि इसे अठारहवीं शताब्‍दी के नियामत खान, सदारंग और अदारंग के हाथों परिपक्‍वता मिली थी ।

आज ख्‍याल जिस रूप में गाया जाता है इसकी दो विविधताएं हैं : धीमी लय या विलम्बित ख्‍याल और तेज या द्रुत ख्‍याल । रूप में ये दोनों एक समान हैं । इनके दो अनुभाग होते हैं- स्‍थाई और अन्‍तरा । विलम्बित को धीमी लय में गाया जाता है और द्रुत को तेज लय से तकनीक की दृष्टि से प्रतिपादन ध्रुपद की तुलना में कम महत्‍त्‍वपूर्ण है । अधिक कोमल गमक और अलंकरण होते हैं ।

दोनों प्रकार के ख्‍यालों के दो अनुभाग होते हैं । स्‍थाई और अन्‍तरा स्‍थाई अधिकांशत: निम्‍न और मध्‍यम सप्‍तक तक सीमित रहती है । अन्‍तरा सामान्‍यत: मध्‍यम और ऊपरी सप्‍तकों में चलता है । स्‍थाई और अन्‍तरा मिल कर एक गीत, रचना या बन्दिश बनाते हैं जिसे हम ‘चीज़’ कहते हैं । एक समग्र कृति के रूप में यह राग के उस सार को उद्घाटित करता है जिसमें इसे स्‍थापित किया जाता है ।

ध्रुपद में वाणियों की तुलना में ख्‍याल में घराने होते है । ये विभिन्‍न व्‍यक्तियों या राजाओं अथवा कुलीन पुरुषों जैसे संरक्षकों द्वारा स्‍थापित या विकसित गायन शैलियां हैं ।

इनमें से प्राचीनतम ग्‍वालियर घराना है । इस शैली के प्रवर्तक एक नत्‍थन पीरबख्‍श थे जो ग्‍वालियर में बस गए थे और इसीलिए इसका यह नाम पड़ा । इनके हद्दू खां और हस्‍सू खां नाम के दो पोते थे । ये उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में हुए थे और इस शैली के महान उस्‍ताद माने जाते थे । इस घराने की विशेषता खुला स्‍वर, शब्‍दों का स्‍पष्‍ट उच्‍चारण तथा राग, स्‍वर और ताल की ओर एक व्‍यापक ध्‍यान है । इस घराने के कुछ प्रमुख गायक कृष्‍णराव शंकर पण्डित, राजा भैया पूंछवाले आदि हैं ।

आगरा घराने के बारे में कहा जाता है कि इसकी स्‍थापना आगरा के खुदा बख्‍श ने की है । इन्‍होंने ग्‍वालियर के नत्‍थन पीरबख्‍श के साथ अध्‍ययन किया था लेकिन इन्‍होंने अपनी शैली का विकास किया । इस घराने में भी स्‍वर खुला और स्‍पष्‍ट है । इस घराने की विशेषता बोल तान है अर्थात् गीत के बोल या शब्‍दों का प्रयोग करके एक द्रुत या मध्‍यम लयकारी परिच्‍छेदी गीत को मध्‍यम ताल में गाया जाता है । हाल के इस घराने के सबसे प्रसिद्ध संगीतकार विलायत हुसैन खां और फैयाज़ खां रहे हैं ।

जयपुर अतरौली घराने के बारे में यह कहा जाता है कि यह सीधे ध्रुपद से निकला है । यह उन्‍नीसवी-बीसवीं शताब्‍दी के अल्‍लादिया खां द्वारा स्‍थापित है । इस घराने का ख्‍याल सदैव मध्‍यम लय में होता है । शब्‍दों का उच्‍चारण स्‍पष्‍ट रूप में और एक खुले तथा स्‍पष्‍ट स्‍वर में किया जाता है । इसकी विशिष्‍ट विशेषताएं वे परिच्‍छेद हैं जो प्राथमिक रूप से अलंकारों पर आधारित हैं, अर्थात् आवृत्तिमूलक रागात्‍मक मूलभाव-और ताल प्रभाग का एक लगभग तानमानी आग्रह । हाल के कुछ प्रमुख गायक मल्लिकार्जुन मंसूर, किशोरी अमोनकर आदि रहे हैं ।

अन्‍त में हम रामपुर सहसवान घराने पर आते हैं। चूंकि प्रारम्भिक गायक उत्‍तर प्रदेश के रामपुर के थे, इसलिए इस घराने का भी यही नाम पड़ गया । इसमें धीमे और द्रुत ख्‍याल सामान्‍यत: एक तराने के बाद गाते हैं । इस घराने की गायन शैली अति गीतात्‍मक है और स्‍वर अलंकरण से परिपूर्ण होते हैं । हाल के इस घराने के दो प्रमुख गायक निसार हुसैन खां और रशीद खां रहे हैं ।

ठुमरी और टप्‍पा संगीत-समारोहों में सुनी जाने वाली लोकप्रिय गायन शैलियां हैं । ठुमरी अपनी संरचना और प्रस्‍तुति में अति गीतात्‍मक है । इन गायन प्रकारों को ‘अर्द्ध’ या ‘सुगम’ शास्‍त्रीय नाम दिया जाता है । ठुमरी एक प्रेम गीत है और इसलिए शब्‍द रचना अति महत्‍त्‍वपूर्ण है । यह संगीतात्‍मक वादन से घनिष्‍ठ रूप से समन्वित है, और ठुमरी को गाए जाने के लिए मनोदशा को ध्‍यान में रखते हुए इसे खमाज, काफी, भैरवी इत्‍यादि जैसे रागों में प्रस्‍तुत किया जाता है और संगीतात्‍मक व्‍याकरण का सख्‍ती से पालन नहीं किया जाता । ठुमरी गायन की दो शैलियां हैं: पूरब या बनारस शैली जो काफी हद तक धीमी तथा सौम्‍य है और पंजाब शैली, जो अधिक जीवंत है । रसूलन देवी, सिद्धेश्‍वरी देवी इस शैली की प्रमुख गायिकाएं रही हैं ।

टप्‍पा एक ऐसा गीत होता है जिसमें स्‍वरों को द्रुत लय में गाया जाता है । यह एक कठिन रचना होती है और इसमें अधिक अभ्‍यास की आवश्‍यकता होती है । ध्रुपद और ख्‍याल शैलियों की भांति, ठुमरी और टप्‍पा दोनों के लिए विशेष प्रशिक्षण अपेक्षित होता है । टप्‍पा जिन रागों में गाया जाता है, वे उसी प्रकार के राग होते हैं जिनमें ठुमरी गाई जाती है । टप्‍पा गायन में पण्डित एल. के. पण्डित और मालिनी राजुरकर को विशेषज्ञता प्राप्‍त रही है ।

 

साभार- संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार

समाज की बात Samaj Ki Baat

कृष्णधर शर्मा Krishnadhar  Sharma

 

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

रात कि बाँहों में -मोहन राकेश

 "रात एक हसीन जादूगरनी है। हर शाम वह शहर को अपनी बाँहों में समेट लेती है और उस पर अपना सितारों ढका कामदानी का काला दुपट्टा डाल देती है और फिर सुबह होने तक शहर की सारी कुरूपता, शहर के शरीर पर झूलते हुए मैले, बदबूदार चीथड़े, शहर के हाथ-पाँव और चेहरे पर खून और पीप से रिसते हुए ज़ख्म और नासूर- वे सब इस जादू के दुपट्टे से ढके रहते हैं। हर बुराई, हर बदसूरती, हर बेइन्साफी, हर जुल्म पर अँधेरे का परदा पड़ा रहता है। और रात की तिलिस्मी बाँहों में सिमटकर शहर के चेहरे पर निखार आ जाता है; शहर सुन्दर, जवान और स्वस्थ हो जाता है; रोशनी के लाखों दाँतों की नुमायश करने के लिए खिलखिलाकर हँस पड़ता है। मगर फिर सुबह होती है। एक-एक करके रोशनियाँ बुझती जाती हैं, जैसे किसी के चेहरे से खिसियानी हँसी के आसार आहिस्ता-आहिस्ता मिट जाते हैं- और फिर सूरज अपना आग्नेय हाथ बढ़ाता है और शहर को रात की नरम बाँहों में से घसीटकर वास्तविकता के क्रूर उजाले में नंगा ला खड़ा कर देता है।..." (रात कि बाँहों में -मोहन राकेश)



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मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

क्योटो टू काशी- सौरभ शर्मा

 "चरक के अनुसार दुनिया में तीन तरह के स्वभाव के व्यक्ति हैं वात, पित्त और कफ़ वाले। इनकी पहचान कैसे कर सकते हैं। उदाहरण के लिए तीन व्यक्ति स्टेशन में बैठे हैं और ट्रेन के आने में विलम्ब है। वात वाला व्यक्ति बिना कुछ बोले इधर-उधर घूमता रहेगा। पित्त वाला एक ही जगह बैठकर रेलवे सिस्टम को गाली देगा और कफ़ वाला चुपचाप इंतजार करता रहेगा। (क्योटो टू काशी- सौरभ शर्मा)



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बुधवार, 23 दिसंबर 2020

वह शायद मेरा ही तो मुरीद था

 क़ातिल ने मेरा क़त्ल किया बेहद ही धोखे से

क़त्ल से पहले वह शायद मेरा ही तो मुरीद था

                       कृष्णधर शर्मा 21.12.20

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

काला पहाड़- भगवानदास मोरवाल

 "पहली माँग सुनते ही प्रधानमंत्री जी तड़ाक से नीचे आ गिरे।  आखिर वही हुआ जिसका उन्हें रह-रहकर डर सता रहा था। यह तो अच्छा हुआ जो आँखों पर काला चश्मा चढ़ा हुआ था वरना पता नहीं आँखों के ज़रिए कौन उनके मन की बात ताड़ जाता। उन्हें अपना कंठ सूखता-सा महसूस हुआ, उन्होंने तुरंत पानी से भरे गिलास को उठाया और एक ही साँस में रीता कर गए।  

दूसरी माँग के ख़त्म होते-होते प्रधानमंत्री जी का चेहरा ज़र्द पड़ने लगा। प्रधानमंत्री के दाएँ ओर बैठे राज्य के मुख्यमंत्री तक का ललाट पसीने से चू उठा।" (काला पहाड़- भगवानदास मोरवाल)



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गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

जलवायु परिवर्तनसे नाराज चार बच्चों ने किया 33 देशों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज

पुर्तगाल के चार बच्चों और दो नवयुवाओं ने मिल कर यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय के आगे 33 देशों के खिलाफ जलवायु परिवर्तन को गति देने के लिए एक मुक़दमा दर्ज कर दिया है।

स्ट्रासबर्ग में यूरोपीय कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स के सामने दर्ज इस मुक़दमे में पुर्तगाल के इन चार बच्चों और दो नवयुवाओं ने जलवायु संकट को बढ़ाने के लिए 33 देशों को जवाबदेह ठहराया है। ग्लोबल लीगल एक्शन नेटवर्क (GLAN) के समर्थन के साथ लाया गया यह मामला जलवायु परिवर्तन के उनके जीवन और उनके शारीरिक और मानसिक भलाई और स्वास्थ्य के लिए बढ़ते खतरे पर केंद्रित है। सफल होने पर, 33 देश कानूनी रूप से बाध्य होंगे, न केवल उत्सर्जन में कटौती करने के लिए, बल्कि उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों सहित जलवायु परिवर्तन में विदेशी योगदान से निपटने के लिए भी।

पुर्तगाल के नब्बे साल में सबसे गर्म जुलाई रिकॉर्ड किए जाने के बाद मामला फाइल/दर्ज किया गया है। क्लाइमेट एनालिटिक्स द्वारा मामले के लिए तैयार की गई एक विशेषज्ञ रिपोर्ट में पुर्तगाल को एक जलवायु परिवर्तन "हॉटस्पॉट" के रूप में वर्णित किया गया है जो तेजी से घातक गर्मी के चरम को सहने के लिए सेट/तैयार है। चार युवा- आवेदक लीरिया में रहते हैं, जो विनाशकारी जंगल की आग की चपेट में आने वाले क्षेत्रों में से एक है, जिसमें 2017 में 120 से अधिक लोग मारे गए थे। शेष दो आवेदक लिस्बन में रहते हैं, जहां अगस्त 2018 में हीटवेव के दौरान 440C का एक नया तापमान रिकॉर्ड स्थापित किया गया था। वार्मिंग के लगभग 3 डिग्री सेल्सियस की ओर जाने वाले वर्तमान मार्ग पर, वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की है कि पश्चिमी यूरोप में हीटवेव से 2071-2100 की अवधि तक पश्चिमी यूरोप में हीटवेव से होने वाली मौतों में तीस गुना वृद्धि होगी।

उनके वकील आधिकारिक क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर का हवाला देते हैं जो देशों की उत्सर्जन कटौती नीतियों की विस्तृत रेटिंग प्रदान करता है। यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, रूस, तुर्की और यूक्रेन के लिए इसकी रेटिंग - जो मुकदमा दायर होने वाले 33 देशों को कवर करते हैं - बताते हैं कि पेरिस समझौते के समग्र लक्ष्य को पूरा करने के लिए उनकी नीतियां बहुत कमजोर हैं।

इस मामले पर मुक़दमा दर्ज करने वाले दो नवयुवाओं में से एक, कैटरिना मोटा, का कहना है, "मुझे यह जानकर घबराहट होती है कि हमारे द्वारा सहन की गई रिकॉर्ड तोड़ने वाली हीट वेव्स केवल शुरुआत हैं। इसे रोकने के लिए इतना कम समय बचा है, सरकारों को ठीक से हमारी रक्षा करने के लिए मजबूर करने के लिए, हमें वह सब कुछ करना चाहिए जो हम कर सकते हैं। ”

इस मामले पर GLAN के साथ जुड़े हुए कानूनी अधिकारी गैरी लिस्टन का मानना है, “यह मामला ऐसे समय में दायर किया जा रहा है जब यूरोपीय सरकारें कोविड -19 द्वारा प्रभावित अर्थव्यवस्थाओं को बहाल करने के लिए अरबों खर्च करने की योजना बना रही हैं। यदि वे जलवायु तबाही को रोकने के लिए अपने कानूनी दायित्वों के बारे में गंभीर हैं, तो वे इस धन का उपयोग जीवाश्म ईंधन से एक कट्टरपंथी और तेजी से संक्रमण को सुनिश्चित करने के लिए करेंगे। यूरोपीय संघ के लिए विशेष रूप से इसका मतलब है कि 2030 तक न्यूनतम 65% उत्सर्जन में कमी लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध होना। अगर यह एक ग्रीन रिकवरी  वसूली नहीं है तो कोई सच्ची रिकवरी नहीं है।"

(अमलेंदु उपाध्याय)

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सोमवार, 23 नवंबर 2020

एक महिला की हिम्मत से सैंकड़ों की समस्याएं सुलझ रहीं

सरकार के स्तर पर नागरिकों के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं व कार्यक्रम हैं। विशेषकर निर्धन वर्ग व जरूरतमंद महिलाओं के लिए ऐसे अनेक कार्यक्रम हैं जो सही ढंग से उन तक पहुंचें तो काफी राहत पंहुचा सकते हैं। इसके अतिरिक्त समुदाय की आंतरिक समस्याओं से भी राहत मिलने के सरकार के कार्यक्रम है। उदाहरण के लिए घरेलू हिंसा से रक्षा के लिए महिलाओं के लिए अनेक कानूनी प्रावधान हैं व सहायता के कार्यक्रम हैं। 

समस्या यह है कि प्राय: सबसे जरूरतमंद लोगों तक इन कार्यक्रमों का लाभ नहीं पहुंच पाता है। न तो उनके पास इनकी जानकारी पंहुचती है, न वे इतने शिक्षित व सक्षम होते हैं कि इस राहत को प्राप्त करने के लिए समुचित प्रयास वे कर सकें। इस स्थिति में निर्धन वर्ग के बीच निरंतरता से कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता पूरी ईमानदारी व कर्मठता से अपनी भूमिका निभाएं तो वास्तविक जरूरतमंदों तक सरकारी लाभ पहुंचाने में व घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं से रक्षा उपलब्ध करवाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। ऐसी ही भूमिका जयपुर की अनेक निर्धन बस्तियों में पुष्पा सैनी ने निभाई है।

पुष्पा सैनी ने स्वयं अपने निजी जीवन में भी बहुत कठिन स्थितियों का सामना सराहनीय साहस व दृढ़ निश्चय से किया है। प्रतिकूल स्थितियों में उन्होंने न केवल उच्च शिक्षा प्राप्त की अपितु अपने को समाज सेवा के कार्यों से निरंतर जोड़ा। पुष्पा का भरसक प्रयास रहा कि वे अन्य महिलाओं के दुख-दर्द को कम करने में सहायक बनें। इस कार्य में उन्हें जानी-मानी समाज सेविका प्रो. रेणुका पामेचा से बहुत सहयोग व प्रोत्साहन मिला। पुष्पा पहले उनकी छात्रा रही व फिर महिला हिंसा को कम करने में उनकी सह-यात्री बनी। रेणुका पामेचा ने महिला सलाहकार एवं सुरक्षा केन्द्र की स्थापना में व संचालन में अग्रणी भूमिका निभाई। हिंसा की शिकार महिलाओं को राहत दिलवाने के लिए उन्होंने महिला थानों की स्थापना के लिए अथक प्रयास किए। 
जब गांधीनगर (जयपुर) में महिला थाने की स्थापना हुई तो वहां महिला सलाहकार एवं सुरक्षा केन्द्र ने उच्च गुणवत्ता की जो काऊंसलिंग उपलब्ध करवाई उससे संकटग्रस्त महिलाओं की समस्याओं के समाधान में बहुत सहायता मिली। पुष्पा सैनी ने भी पहले यहां काऊंसलिंग की ही जिम्मेदारी संभाली और इसे बहुत मेहनत व योग्यता से निभाया। बाद में परिस्थितियां बदलने पर यह जरूरत महसूस हुई कि काऊंसलिंग व अन्य सहायता का कार्य कुछ निर्धन बस्तियों की महिलाओं के अधिक नजदीक रहकर किया जाए। 

इसी समय के आसपास पुष्पा सैनी को इस कार्य के लिए डैमोक्रेसी फैलोशिप भी प्राप्त हुई। इस फैलोशिप के अंतर्गत उन्हें विभिन्न सामाजिक समस्याओं से जूझने वाले अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलने व उनके अनुभवों से सीखने का अवसर भी मिला। अनेेक स्तरों पर उन्हें क्षमता विकास के अवसर मिले व इससे अपनी नई जिम्मेदारियों को निभाने में उन्हें सहायता मिली। पुष्पा का कार्यक्षेत्र जयपुर में भट्टा नगर व शास्त्री नगर है। 
यहां संजय नगर, राणा कालोनी जैसी अनेक बस्तियां है। इन बस्तियों में निर्धन व जरूरतमंद लोग अधिक है। मुस्लिम बहुल आबादी है। जरूरत पड़ने पर सामान्य कार्यक्षेत्र से बाहर भी पुष्पा पहुंचती हैं। इन बस्तियों में महिला हिंसा की समस्या कम करने में पुष्पा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। प्राय: हिंसा की शिकार अधिकांश महिलाओं का प्रयास यही होता है कि हिंसा होने पर पति (या परिवार के अन्य सदस्य) पर हिंसा की राह छोड़ने के लिए दबाव पड़े। इसमें पुष्पा की भूमिका महिला सलाहकार एवं सुरक्षा केन्द्र की सहायता से यह रहती है कि उन्हें बुलाकर समझाया जाए व यह चेतावनी भी दी जाए कि यदि उन्होंने हिंसा की राह नहीं छोड़ी तो कानून के अन्तर्गत बहुत कड़ी कार्यवाही उनके विरुद्ध होगी। प्राय: इसका असर हिंसा करने वाले पुरुषों पर होता है व वे आगे हिंसा नहीं करते हैं।

पुष्पा ने चूंकि अपना कार्यालय इन बस्तियों के बहुत नजदीक बनाया है व वहां निरंतर जाती रहती हैं, अत: अब महिलाओं के लिए संपर्क करना सरल हो गया है व अधिक आसानी से वे अपनी समस्या का समाधान करा पाती है। पुष्पा ने एक मिसाल कायम की है कि ई-मित्र की भूमिका को पूरी ईमानदारी व निष्ठा से निभाया जाए तो यह भूमिका कमजोर वर्ग, विशेषकर महिलाओं के लिए कितनी लाभदायक हो सकती है। 
ई-मित्र के माध्यम से महिलाओं को पेंशन, राशन, श्रमिक पंजीकरण, विभिन्न योजनाओं व पहचान पत्र के लिए जरूरी सहायता भट्टा बस्ती, शास्त्री नगर आदि के लोगों को उपलब्ध करवाई जाती हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी को पेंशन नहीं मिल रही है या पहले मिलने के बाद अब रुक गई है तो पहले कंप्यूटर पर उसकी स्थिति को भली-भांति देखकर जानकारी दी जाती है व फिर आगे जिस विभाग या अधिकारी से संपर्क करना है वह सहायता भी दी जाती है। 
जन-सुनवाई जैसे कार्यक्रम में भी उनकी समस्या को उठाया जाता है। जन-सुनवाईयों के माध्यम से समस्याओं का समाधान प्राप्त करने का सामाजिक तरीका असरदार सिद्ध हुआ है। महिलाओं में आजीविका अवसर बढ़ाने के लिए महिला पुनर्वास समूह समिति इस क्षेत्र में सक्रिय रही है और पुष्पा संस्था की कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय है। इस संस्था की ओर से यहां सिलाई सिखाने का कार्य किया गया है जिसमें स्थानीय महिलाओं ने बहुत रुचि ली।

आज अनेक महिलाए इस प्रशिक्षण पर आधारित अपनी आय के अवसर प्राप्त कर सकी हैं या बढ़ा सकी हैं। शिक्षा के बाद युवाओं के लिए आजीविका व कौशल-वृद्धि के अवसर कहां उपलब्ध हैं, इसके बारे में भी पुष्पा व समिति की ओर से महत्त्वपूर्ण जानकारी बस्ती स्तर पर उपलब्ध करवाई जाती है। इस कारण अनेक युवा महत्त्वपूर्ण प्रशिक्षणों से जुड़ सके व रोजगार प्राप्त कर सके। 
पुष्पा सैनी का चयन 'डेमोक्रेसी फैलोशिप के रूप में हुआ तो विभिन्न जिम्मदारियों को और भी बेहतर ढंग से निभाने के लिए फष्पा को अपनी क्षमता वृद्धि के भी पर्याप्त अवसर मिले। उदाहरण के लिए ई-मित्र चलाने के लिए प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। यह प्रशिक्षण पुष्पा के लिए व्यवहारिक स्तर पर बहुत उपयोगी रहा। इस फैलोशिप से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला। विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की जानकारी लोगों तक सहज व सरल रूप में पहुंच सके, उसके लिए महिला पुनर्वास समूह समिति ने दो बहुत उपयोगी पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया है। इन्हें तैयार करने में भी पुष्पा ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया व अनेक कार्यालयों में जा कर वहंा से जरूरी जानकारी प्राप्त की। अपनी समस्याओं से घबराए बिना उनका सामना मजबूती से करते हुए पुष्पा ने जिस तरह सैंकड़ों महिलाओं की गंभीर समस्याओं के समाधान में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है, यह बहुत हिम्मत वाली प्रेरणादायक यात्रा रही है। 
(भारत डोगरा) 
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बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

जहालत के पचास साल- श्रीलाल शुक्ल

 "बया ने बन्दर से कहा 'ऐ भाई, तुम क्यों इस घोर वर्षा में कष्ट उठा रहे हो? तुमने शायद मेहनत करके अपना घोंसला नहीं बनाया। इसी कारण तुमको इतना कष्ट हो रहा है। देखो, हमने कितना सुन्दर घोंसला बना लिया है। इसी से हम इस बरसात और जाड़े में भी सुखी हैं। तुम भी अगर आलस त्याग कर अपना घर बना डालो तो तुम्हें इस भयंकर ऋतु का कष्ट न झेलना पड़े। ऐ भाई, साहस और पुरुषार्थ से काम लो।' बन्दर को न जाने क्या सूझा कि वह दाँत निकालकर घोंसले पर झपटा। उसने बया के अंडे तोड़ डाले। उसका घोंसला उजाड़ दिया।

 बया घबराहट में कुछ और न करके चीखने लगा। उसका घोंसला उजड़ गया और वह अपनी पत्नी के साथ दुखी होकर उजड़े हुए घोंसले पर शोक प्रकट करता रहा। सच है, नीच को कभी अच्छी सलाह नहीं देनी चाहिए।" (जहालत के पचास साल- श्रीलाल शुक्ल)



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रविवार, 11 अक्टूबर 2020

माहौल-ए-रंजिश में

 खुशकिस्मत हैं वो मयस्सर है जिन्हें नींद का तोहफा

इस माहौल-ए-रंजिश में भला नींद कहाँ आती है

                       कृष्णधर शर्मा 10.10.20

बुधवार, 23 सितंबर 2020

जातक कथाएं-नरेंद्र शर्मा

 "एक खरगोश नारियल के पेड़ के नीचे आराम से सो रहा था, नींद में उसे यह ख्याल आया कि यह धरती फटने वाली है, इस धरती के फटने से सब कुछ नष्ट हो जाएगा। यह हरा-भरा जंगल धरती के फटते ही नीचे पातालदेश में पहुंच जाएगा। इसके साथ ही हम सब मारे जाएंगे।  

डर के मारे खरगोश का सारा शरीर कांप उठा। उसने समझ लिया कि अब उसका आखिरी वक्त करीब आ रहा है, इसी बीच नारियल के पेड़ से दो-चार नारियल एकदम से टूटकर नीचे आ गिरे। उनके नीचे गिरते ही एक जोरदार धमाका सा हुआ जिसे सुनकर पहले से ही डरा हुआ खरगोश और डर गया। यह धमाका सुनते ही वह समझ गया कि वास्तव में ही धरती फटने लगी है...। फिर क्या था, वह पागलों की भांति पेड़ के नीचे से उठकर भागा और साथ ही चीखने लगा- बचाओ, बचाओ। मौत आ रही है, बचाओ। 

उसे देखकर जंगल के और सारे जानवर भी भागने लगे और सब चिल्लाते जा रहे थे कि भागो-भागो धरती फटने वाली है, सब जान बचाकर भागो... (जातक कथाएं-नरेंद्र शर्मा)




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शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

तेरे धोखे का क्या अंजाम होगा

 मैं तो लौट आऊंगा हर दरो-दीवार, हर जंजीर को तोड़कर

तू अपना सोच कि तेरे धोखे का क्या अंजाम होगा काफ़िर

                        कृष्णधर शर्मा 17.10.20

रविवार, 13 सितंबर 2020

छत्तीसगढ़ मित्र- छत्तीसगढ़ की प्रथम हिन्दी मासिक पत्रिका

 कोई-कोई लोग ऐसे हैं कि वे अपने मित्र के घर के भीतर बिना ही सूचना दिए चले जाते हैं और दिन भर में जितने बार उन्हें फुरसत मिलती है उतने ही बार मित्र के यहां पहुंचते हैं। ऐसे लोग घने मित्र होने पर भी अपनी कदर खो देते हैं। मित्र के घर में जाकर उसकी हर एक चीज बड़े गौर से देखना, उसकी किताबें इधर-उधर उठाना, और उसके हर एक काम में अपनी राय देने बड़प्पन के बिल्कुल विरुद्ध है। यद्यपि तुम इसका अधिकार रखते हो कि अपने मित्र के घर को अपना ही घर समझो, तो भी इससे यह सिध्द नहीं होता कि तुम अनजाने लोगों को भी अपने साथ उसके खास कमरे में ले जाओ।  

मुलाकात का सबसे अच्छा समय सवेरे के सात बजे से नौ बजे तक और शाम के चार बजे से सात बजे तक है। (छत्तीसगढ़ मित्र- छत्तीसगढ़ की प्रथम हिन्दी मासिक पत्रिका, वर्ष 2सरा अंक 6वां)




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गुरुवार, 10 सितंबर 2020

अवमानना

बंगलेनुमा आलीशान मकान में 
बेतहाशा बजते लाउडस्पीकर पर 
बज रहे हैं देशी-विदेशी गाने 
चल रहे हैं दौर पार्टी में 
एक से बढ़कर एक  पकवानों के 
परोसी जा रही हैं मेहमानों को 
मंहगी लाजवाब विदेशी शराबें 
थिरक रहे हैं मस्ती में कुछ जोड़े 
दुनिया के रंजो-गम से बेफिक्र 
मना रहे हैं सब मिलकर उत्सव
खुशियों का उपलब्धियों का 
उसी आलीशान मकान से 
कुछ सौ मीटर की दूरी पर 
सड़क के किनारे बेकार से पड़े 
पुलिया पाइप के अन्दर 
मूसलाधार बरसती हुई रात में 
भीगने से बचने की 
असफल कोशिश में 
पांच जनों का परिवार 
गीले होकर ठिठुरते और 
भूख से छटपटाते हुए 
तीन साल के बच्चे को 
रोटी न पहुंचा पाना 
लोकतंत्र की अवमानना नहीं है 
तो और क्या है माननीय!...
            कृष्णधर शर्मा 2.9.2020 

बुधवार, 9 सितंबर 2020

छत्रपति- मनु शर्मा

 "शिवाजी ज़ोर से हँस पड़े। बोले, 'सम्मान में बट्टा छिपकर आक्रमण करने से नहीं लगता, पराजित होने से लगता है। और यह तो युद्ध-नीति है कि जो जिस प्रकार लड़ना चाहे उसका उत्तर हमें वैसे ही देना चाहिए।" (छत्रपति- मनु शर्मा)



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सोमवार, 7 सितंबर 2020

पीढियां-अमृतलाल नागर

 "उन्नीसवीं सदी के आरम्भिक काल तक अन्न उत्पादन ही हमारे देश का प्रमुख कार्य था। हमारे गांवों की लगभग नब्बे प्रतिशत आबादी उसी पर निर्भर थी। इसके अलावा कुछ वंश-परम्परागत जातीय पेशे और कुटीर उद्योग भी यहां आ पहुंचे। इन उद्योगों के मालिक भी अधिकतर अंग्रेज ही थे। उनकी मुनाफ़ाखोर प्रवृत्ति ने भारतीय ढांचे को ही बदल दिया। 

अच्छी-अच्छी जातियों के लोगों को जो कभी अपने हाथ से हल नहीं पकड़ते थे, बढ़ती मंहगाई की मजबूरी से मिलों में मजदूरी तलाश करनी पड़ी। उन्हें चौदह से सोलह घंटे काम करना पड़ता था। सवेरे मिल का भोंपू बजते ही मिलों में चले जाते और रात में ही वापस आ पाते थे। न खाने की मोहलत, न घड़ी-पल आराम करने की। पाखाने-पेशाब की हाजत लगे तो एक लोहे का वजनी नंबर लेकर जाना पड़ता था। मजदूरों के अंग्रेजी ढंग के बाल कटे देख लेने पर मास्टर उन्हें चमड़े के पट्टों से मारता था। इसके अलावा मजदूर परिवारों की बहू-बेटियों की इज्जत पर भी तरह-तरह के अमानुषिक हमले हुआ करते थे। (पीढियां-अमृतलाल नागर)



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