नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

गुरुवार, 19 मार्च 2020

बस्तर की अर्थव्यवस्था


अर्थव्यवस्था
बस्तर जिले की मुख्य फसल धान है| खरीफ सीजन के दौरान धान मुख्य रूप से उगाया जाता है क्योंकि बारिश वाली फसल में 2.39 लाख हेक्टेयर क्षेत्र होता है लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में इस फसल की उत्पादकता 08.53 क्विंटल / हेक्टेयर है। बस्तर जिले में सिंचित क्षेत्र (1.67%) और उर्वरक उपयोग (4.6 किलोग्राम / हेक्टेयर) बहुत कम है, जो फसल को पर्याप्त पोषक तत्व प्रदान करने के लिए अपर्याप्त है| मक्का दलहन मुख्यतः रबी फसल है |
बस्तर में आजीविका का पैटर्न परंपरा द्वारा निर्धारित किया जा रहा है। आज भी, कृषि प्रथा पारंपरिक हैं। लकड़ी के हल का उपयोग अधिक  है जबकि लोहे के हल की संख्या नगण्य है। 
ट्रैक्टरों की संख्या नगण्य है जबकि बैल गाड़ियां सभी व्यापक हैं। पारंपरिक कृषि उपकरणों के उपयोग ने कृषि के उत्पादन को कम कर दिया है। यहां उगाई गई खरीफ फसलें  धान, उड़द, अरहर, ज्वार और मक्का हैं। रबी फसलों में  तिल, अलसी , मूंग, सरसों और चना  शामिल हैं। वन उत्पादन और अन्य वन-संबंधित कार्यों की संग्रह और बिक्री कम कृषि आय की पूरक है।
अपने जल संसाधनों में असाधारण रूप से भाग्यशाली, इस क्षेत्र में अच्छी बारिश होती है और अपर्याप्त इलाके के कारण तेजी से चलती है। वर्षा जल संचयन की संभावना है|
बस्तर जिले की अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार, कृषि और वनोपज संग्रहण है । कृषि में प्रमुख रूप से धान ,मक्का की फसल का और गेहू, ज्वार, कोदो कुटकी, चना, तुअर, उड़द, तिल, राम तिल, सरसों सहायक रूप से उत्पादन किया जाता है । कृषि के अलावा पशुपालन, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन भी सहायक भूमिका निभाते हैं ।
वनोपज संग्रहण यहाँ के ग्रामीणों के जीवन उपार्जन के प्रमुख श्रोतों में से एक है । वनोपज संग्रहण में कोषा (तसर), तेंदू पत्ता, लाख, धुप, साल बीज, इमली, अमचूर, कंद, मूल ,औषधियां, प्रमुख हैं। पत्थर, गिट्टी, मुरुम, फर्शी पत्थर, रेत का खनन भी अर्थ्वाव्स्था के सहयोगी तत्त्व हैं।
साभार- bastar.gov.in

बस्तर का इतिहास

बस्तर, भारत के छत्तीसगढ़ प्रदेश के दक्षिण दिशा में स्थित जिला है। बस्तर जिले एवं बस्तर संभाग का मुख्यालय जगदलपुर शहर है। यह पहले दक्षिण कौशल नाम से जाना जाता था। ख़ूबसूरत जंगलों और आदिवासी संस्कृति में रंगा ज़िला बस्तर, प्रदेश‌ की सांस्कृतिक राजधानी के तौर पर जाना जाता है। 6596.90 वर्ग किलोमीटर में फैला ये ज़िला एक समय केरल जैसे राज्य और बेल्जियम, इज़राइल जैसे देशॊ से बड़ा था। ज़िले का संचालन व्यवस्थित रूप से हो सके इसके लिए 1999 में इसमें से दो अलग ज़िले कांकेर और दंतेवाड़ा बनाए गए। बस्तर जिला छत्तीसगढ़ प्रदेश के कोंडागांव, दन्तेवाडा ,सुकमा, बीजापुर जिलों से घिरा हुआ है।  बस्तर का ज़िला मुख्यालय जगदलपुर, राजधानी रायपुर से 305 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 
बस्तर जिले की जनसंख्या वर्ष 2011 में 14,13,199 ,वर्तमान कोंडागांव जिले को सम्मिलित करते हुए थी। जिसमे 6,98,487 पुरुष एवं 7,14,712 महिलाएं थी । बस्तर की जनसन्ख्या मे 70 प्रतिशत जनजातीय समुदाय जैसे गोंड, मारिया, मुरिया, भतरा, हल्बा, धुरुवा समुदाय हैं। बस्तर जिला को सात विकासखण्ड / तहसील जगदलपुर, बस्तर, बकावंड, लोहंडीगुडा, तोकापाल, दरभा और बास्तानार में विभाजित किया गया है। बस्तर जिला सरल स्वाभाव जनजातीय समुदाय और प्राकृतिक सम्पदा संपन्न हुए प्राकृतिक सौन्दर्य एवं सुखद वातावरण का भी धनी है।
उड़ीसा से शुरू होकर दंतेवाड़ा की भद्रकाली नदी में समाहित होने वाली करीब 240 किलोमीटर लंबी इंद्रावती नदी बस्तर के लोगों के लिए आस्था और भक्ति की प्रतीक है। इंद्रावती नदी के मुहाने पर बसा जगदलपुर एक प्रमुख सांस्कृतिक एवं हस्तशिल्प केन्द्र है। यहां मौजूद मानव विज्ञान संग्रहालय में बस्तर के आदिवासियों की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं मनोरंजन से संबंधित वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। डांसिंग कैक्टस कला केन्द्र, बस्तर के विख्यात कला संसार की अनुपम भेंट है। बस्तर जिले के लोग दुर्लभ कलाकृति, उदार संस्कृति एवं सहज सरल स्वभाव के धनी हैं।
बस्तर जिला घने जंगलों, ऊँची, पहाड़ियों, झरनों, गुफाओ एवं वन्य प्राणियों से भरा हुआ है। बस्तर महल,  बस्तर दशहरा, दलपत सागर, चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़ जलप्रपात, कुटुमसर और कैलाश‌ गुफ़ा आदि पर्यटन के मुख्य केंद्र हैं|
ऐतिहासिक रूप से क्षेत्र महाकाव्य रामायण में दंडकारण्य और महाभारत में कोसाला साम्राज्य का हिस्सा है।
बस्तर  रियासत  1324 ईस्वी के आसपास स्थापित हुई थी, जब अंतिम काकातिया राजा, प्रताप रुद्र देव (12 9 0-1325) के भाई अन्नाम देव ने वारंगल को छोड़ दिया और बस्तर में अपना शाही साम्रज्य स्थापित किया | महाराजा अन्नम देव के बाद महाराजा हमीर देव, बैताल देव, महाराजा पुरुषोत्तम देव, महाराज प्रताप देव ,दिकपाल देव ,राजपाल देव ने शासन किया |बस्तर शासन की प्रारंभिक राजधानी बस्तर शहर में बसाई गयी, फिर जगदलपुर शहर में स्थान्तरित की गयी। बस्तर में अंतिम शासन महाराजा प्रवीर चन्द्र भंज देव (1936-1948) ने किया। महाराजा प्रवीर चन्द्र भंज देव बस्तर के सभी समुदाय,  मुख्यतः आदिवासियों के बीच बेहद लोकप्रिय थे। ‘दंतेश्वरी, जो अभी भी बस्तर क्षेत्र  की आराध्य देवी है, प्रसिद्ध दांतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा में उनके नाम पर रखा गया है।
1948 में भारत के राजनीतिक एकीकरण के दौरान बस्तर रियासत को भारत में विलय कर दिया गया। 
साभार- bastar.gov.in

रविवार, 15 मार्च 2020

मंगलवार, 3 मार्च 2020

गांधी के सपनों का भारत-महेश प्रसाद सिंह

 "गांधी महराज के धनि औ दीन शिष्य अनेक  

पर एक ऐसी बात है जिसमें सभी हैं एक    

हम पेट के हित दीन-पीड़न में नहीं अभ्यस्त   

झुकते न धनियों से कभी न होते भय से त्रस्त" 

-रवींद्रनाथ टैगोर (गांधी के सपनों का भारत-महेश प्रसाद सिंह)



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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

बैंकों के विलय का औचित्य


वर्तमान में ही रिजर्व बैंक ने व्यवस्था कर रखी है कि निजी और सरकारी बैंकों को प्राथमिकता वाले क्षेत्र को ऋण देना अनिवार्य होता है। इस अनिवार्यता को ग्रामीण क्षेत्र में विकास आदि पर लागू किया जा सकता था। क्योंकि रिजर्व बैंक इस कार्य को करने में असफल रहा इसलिए सरकार ने इन बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और हम कुएं से निकलकर खाई में जा गिरे। कुएं से निकले इसलिए कि ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाओं का विकास हुआ लेकिन खाई में गिरे इसलिए कि सरकारी बैंकों में लगाई गई आम आदमी की पूंजी का भक्षण सरकारी कर्मियों ने कर लिया। इसलिए सरकार को चाहिए की विलय जैसे दिखावा करने के स्थान पर सभी सरकारी बैंकों का पूर्ण निजीकरण कर दें और रिजर्व बैंक इन्हें मजबूर करे कि यह ग्रामीण एवं प्राथमिकता वाले क्षेत्र में पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराए।
दिवर्ष 1969 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। उनका मानना था कि इन बैंकों पर निजी उद्यमियों का वर्चस्व है और ये जनता के पैसे को अपने व्यक्तिगत काम में ले रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तथा गरीब लोगों को बैंक की सुविधा उपलब्ध कराने में इनकी रुचि नहीं है। इसमें कोई संशय नहीं कि राष्ट्रीयकरण के बाद सरकारी बैंकों की शाखाओं का ग्रामीण क्षेत्रों में भारी विस्तार हुआ है और आम आदमी के लिए बैंक तक पहुंचना आसान हो गया है। इस दृष्टि से राष्ट्रीयकरण को सफल मानना चाहिए। लेकिन राष्ट्रीयकरण के बीते 50 सालों में दूसरी समस्या उत्पन्न हो गई है।
इस लम्बी अवधि में सरकार ने इन बैंकों में जो भी पूंजी का निवेश किया है उसका पूरी तरह क्षरण हो चुका है। वर्ष 2014 से 2019 के बीच केंद्र सरकार ने लगभग 250 करोड़ रुपए का निवेश इन बैंकों में किया है। आज के दिन इन सभी सरकारी बैंकों की सम्मिलित मार्केट कैपिटलाइजेशन यानि इनके समस्त शेयरों की शेयर बाजार में कुल मूल्य लगभग 300 करोड़ रुपए है। अर्थ हुआ कि पिछले 50 वर्षों में देश ने इन बैंकों में जो विशाल पूंजी निवेश किया है वह उसमें से कुल 50 करोड़ रुपए आज बचा है और शेष का क्षरण हो चुका है। यह क्षरण मूलत: इसलिए हुआ है कि इनके द्वारा भारी घाटा खाया जा रहा है।
सरकार इनमें लगातार पूंजी डाल रही है और इनके द्वारा लगातार खाए जा रहे घाटे में यह यह पूंजी समाप्त होती जा रही है। यह घाटा मूलत: इसलिए हो रहा है कि सरकारी बैंक के कर्मियों के व्यक्तिगत स्वार्थ हो और बैंक के स्वार्थों में समन्वय नहीं है। ये अलग-अलग दिशा में चलते हैं। सरकारी बैंक के मुख्य अधिकारी के लिए लाभप्रद होता है कि वह घूस लेकर अथवा राजनीतिक दबाव में ऐसे लोगों को लोन दे जो कि बाद में खटाई में पड़ जाए। ऐसा करने से मुख्य अधिकारी को स्वयं लाभ होता है जबकि बैंक को घाटा होता है। निजी बैंकों में यह समस्या उत्पन नहीं होती है क्योंकि बैंक के मुख्य अधिकारी द्वारा घटिया लोन देने से बैंक को जो घाटा लगता है वह भी उसी मुख्य अधिकारी का होता है। ये एक दिशा में चलते हैं। सरकारी बैंकों के मालिक यानि सरकार और मुख्य अधिकारी के उद्देश्यों में समन्वय नहीं होता है जबकि निजी बैंकों के मालिक और मुख्य अधिकारी एक ही व्यक्ति होते हैं इसलिए उनके उद्देश्यों में समन्वय रहता है। इसलिए निजी बैंकों द्वारा घटिया लोन कम दिए जाते हैं।
इस समस्या का हल सरकारी दायरे में नहीं दिखता है। प्रमाण यह है कि बीते छ: वर्षों में एनडीए सरकार ने सरकारी बैंकों के कार्य में हस्तक्षेप करना कम कर दिया है परन्तु इनकी स्थिति पूर्ववत बिगड़ती ही जा रही है। अर्थ हुआ कि राजनीतिक दखल को इन बैंकों की खस्ता हालत का कारण नहीं कहा जा सकता है। इनके घाटे अपनी संरचना के कारण है जिसमें मुख्य अधिकारी के लिए बैंक को घाटे में डालकर अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को सिद्ध करना संभव होता है। इसी दृष्टि से सरकार द्वारा गठित पी.जे. नायक समिति ने 2014 में संस्तुति की थी कि बैंकों का निजीकरण कर दिया जाए।
वित्त मंत्री ने बजट में इन बैंकों के निजीकरण करने के स्थान पर 10 बड़े सरकारी बैंकों का आपस में विलय करके इन्हें 4 बड़े बैंकों में बनाने का निर्णय लिया है। लेकिन यदि सरकारी बैंक के मुख्य अधिकारी के व्यक्तिगत उद्देश्य बैंक को घाटे में डालकर सिद्ध होते हैं तो विलय से इस समस्या का हल नहीं हो सकता है। विलय से सिर्फ इतना ही हो सकता है कि जो मुख्य अधिकारी ज्यादा घटिया था उसकी तुलना में अब कम घटिया मुख्य अधिकारी उस बैंक का संचालन करेगा। सभी मुख्य अधिकारी मूलरूप से एक से हैं जैसे सभी पॉकेटमार मूलरूप से एक से होते हैं। प्रमाण यह है कि सभी बैंकों की सम्मिलित पूंजियां शून्य हो गई है। यही कारण है कि बीते 50 वर्षों में जनता की गाड़ी कमाई से किया गया निवेश आज शून्य हो गया है। इसमें लाभ और घाटे में चलने वाले सभी बैंक सम्मिलित है।
जानकार बताते हैं कि विलय के पीछे सरकार की मंशा है कि जो पूंजी निवेश किया जाए वह बजट में न दिखे। यदि लाभ में चल रहे सरकारी बैंक द्वारा सरकार को डिविडेंड दिया जाए और उस डिविडेंड की रकम से सरकार घाटे में चलने वाली सरकारी बैंक में निवेश करे तो यह लेन-देन सरकार के बजट में दीखता है। तुलना में यदि घाटे में चलने वाले बैंक का लाभ में चलने वाले बैंक से विलय कर दिया जाए तो वही रकम हस्तांतरित होती है लेकिन वह रकम बजट के बाहर हो जाती है। लाभ में चलने वाले बैंक द्वारा कमाई गई रकम घाटे में चलने वाले बैंक की शाखाओं को जीवित रखने में लग जाती है। यह लेन-देन बजट से बाहर रहता है। अत: विलय से सरकारी बैंकों के कार्य में न कोई सुधार होगा और न ही अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।
इस परिप्रेक्ष्य में हमें 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के निर्णय पर पुन: विचार करना चाहिए। उस समय उद्देश्य था कि बैंकों द्वारा छोटे उद्योगों और ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं उपलब्ध कराई जाए। प्रश्न यह है कि इस कार्य को रिजर्व बैंक द्वारा निजी बैंकों से क्यों नहीं कराया जा सका था? रिजर्व बैंक के पास पर्याप्त अधिकार है। वह निजी बैंकों को मजबूर कर सकता है कि वे विशेष ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी शाखाएं खोले। वर्तमान में ही रिजर्व बैंक ने व्यवस्था कर रखी है कि निजी और सरकारी बैंकों को प्राथमिकता वाले क्षेत्र को ऋण देना अनिवार्य होता है। इस अनिवार्यता को ग्रामीण क्षेत्र में विकास आदि पर लागू किया जा सकता था।
क्योंकि रिजर्व बैंक इस कार्य को करने में असफल रहा इसलिए सरकार ने इन बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और हम कुएं से निकलकर खाई में जा गिरे। कुएं से निकले इसलिए कि ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाओं का विकास हुआ लेकिन खाई में गिरे इसलिए कि सरकारी बैंकों में लगाई गई आम आदमी की पूंजी का भक्षण सरकारी कर्मियों ने कर लिया। इसलिए सरकार को चाहिए की विलय जैसे दिखावा करने के स्थान पर सभी सरकारी बैंकों का पूर्ण निजीकरण कर दें और रिजर्व बैंक इन्हें मजबूर करे कि यह ग्रामीण एवं प्राथमिकता वाले क्षेत्र में पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराए।
 डॉ. भरत झुनझुनवाला (साभार-देशबंधु)



बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

इस राह से गुजरते हुए- दिवाकर मुक्तिबोध

 "इसमें दो राय नहीं कि राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में घी-दूध की नदियां बहने लगी हैं। धन का अपार सैलाब उमड़ रहा है। लेकिन, यह कुछ हजार लोगों की मुट्ठियों में कैद है। हजारों करोड़ रुपये के निर्माण एवं विकास कार्यों में मलाई खाने का अवसर इन्हीं लोगों को मिल रहा है। स्व. राजीव गांधी की वह ऐतिहासिक स्वीकारोक्ति राज्य के संदर्भ में अभी भी एकदम सटीक है कि विकास के मद में राज्य (उन्होंने केंद्र कहा था) से चला एक रुपया गरीब गांव के किसी गरीब की कुटिया तक पहुंचते पहुंचते मात्र 15 पैसे रह जाता है। भ्रष्टाचार की ऐसी कथा शायद ही किसी और राज्य में सुनाई दें।" (इस राह से गुजरते हुए- दिवाकर मुक्तिबोध)




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बुधवार, 11 दिसंबर 2019

संस्कृति के चार अध्याय- रामधारी सिंह दिनकर

 'लगभग दो वर्षों के अध्ययन के पश्चात मेरे सामने यह सत्य उद्भासित हो उठा कि भारतीय संस्कृति में चार बड़ी क्रांतियाँ हुईं हैं और हमारी संस्कृति का इतिहास उन्हीं चार क्रांतियों का इतिहास है। पहली क्रान्ति तब हुई, जब आर्य भारतवर्ष में आए अथवा जब भारतवर्ष में उनका आर्येतर जातियों से सम्पर्क हुआ। 

आर्यों ने आर्येतर जातियों से मिलकर जिस समाज की रचना की, वही आर्यों अथवा हिन्दुओं का बुनियादी समाज हुआ और आर्य तथा आर्येतर संस्कृतियों के मिलन से जो संस्कृति उत्पन्न हुई, वही भारत की बुनियादी संस्कृति बानी। इस बुनियादी भारतीय संस्कृति के लगभग आधे उपकरण आर्यों के दिये हुए हैं और उसका दूसरा आधा आर्येतर जातियों का अंशदान है। 

दूसरी क्रान्ति तब हुई, जब महावीर और गौतम बुद्ध ने इस स्थापित धर्म या संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह किया तथा उपनिषदों की चिंताधारा को खींचकर वे अपनी मनोवांछित दिशा की ओर ले गए। इस क्रान्ति ने भारतीय संस्कृति की अपूर्व सेवा की, किन्तु अन्त में, इसी क्रान्ति के सरोवर में शैवाल भी उत्पन्न हुए और भारतीय धर्म तथा संस्कृति में जो गंदलापन आया, वह, काफी दूर तक, इन्हीं शैवालों का परिणाम था। 

तीसरी क्रान्ति उस समय हुई, जब इस्लाम, विजेताओं के धर्म के रूप में, भारत पहुंचा और इस देश में हिंदुत्व के साथ उसका संपर्क हुआ। और चौथी क्रान्ति हमारे आपने समय में हुई, जब भारत में यूरोप का आगमन हुआ तथा उसके संपर्क में आकर हिंदुत्व व इस्लाम, दोनों ने नवजीवन का अनुभव किया। इस पुस्तक में इन्हीं चार क्रान्तियों का संक्षिप्त इतिहास है।  (संस्कृति के चार अध्याय- रामधारी सिंह दिनकर)



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रविवार, 8 दिसंबर 2019

निर्मम समाज में स्वच्छता सेनानियों की गुमनाम शहादत

गुजरात में वडोदरा से 30 किलोमीटर दूर डभोई तहसील के फरती कुई गांव में एक होटल के सीवर की सफाई के दौरान मैन होल में उतरे 7 लोगों की जहरीली गैस से दम घुटने के कारण मौत हो गई। मैन होल से सर्वप्रथम अंदर जाने वाले महेश पाटनवाडिया के बाहर न निकलने पर उनकी कुशलता जानने के लिए एक के बाद एक सात सहकर्मी मैन होल से अंदर प्रविष्ट हुए और 15 मिनट में सभी की मृत्यु हो गई। इनमें 4 सफाई कर्मचारी और 3 होटल कर्मी थे। यह भयंकर और हृदयविदारक घटना इस तरह की लगातार घट रही दुर्घटनाओं से जरा भी भिन्न नहीं थी। सफाई कर्मियों को बिना किसी सुरक्षा उपाय के यह कार्य करने के लिए विवश होना पड़ता था। स्थानीय प्रशासन को अनेक बार संभावित अनहोनी की आशंका से अवगत कराया गया था किंतु कोई कदम नहीं उठाया गया। अब दोषियों की गिरफ्तारी और मुआवजे की घोषणा जैसे रस्मी कदम उठाए जा रहे हैं। होटल मालिक पर जो धाराएं लगाई गई हैं वह उसके अपराध की तुलना में बहुत हल्की हैं।

यदि मीडिया मामले को निरन्तर उठाता रहा तो शायद इनमें कुछ इज़ाफ़ा भी हो जाएगा। किन्तु जैसा अब तक होता रहा है सीवर सफाई करने वाले कर्मचारियों को निर्ममतापूर्वक मौत के मुंह में धकेलने वाले धनकुबेर और उनके कारिंदे लंबी न्यायालयीन प्रक्रिया के बाद या तो बेगुनाह छूट जाएंगे या इन्हें नाम मात्र का दंड मिलेगा। गुजरात सरकार ने मृतकों की जान की कीमत 4 लाख रुपए आंकी है जैसा गुजरात के मुख्यमंत्री श्री विजय रुपाणी की एक घोषणा से पता चलता है। शायद गुजरात राज्य सामाजिक न्याय विभाग द्वारा 8.25 लाख प्रति परिवार मुआवजा और दिया जाएगा।

गुजरात सफाई कर्मचारी संघ की ओर से 2 लाख रुपए की मदद का आश्वासन दिया गया है। मृतक सफाई कर्मियों के शोक संतप्त, हतप्रभ और भयाक्रांत परिजनों को हमेशा की तरह यह समझाने की पुरजोर कोशिश की जा रही होगी कि जो मिल रहा है वह मृतकों की हैसियत से बहुत ज्यादा है। मनुष्य द्वारा हाथ से मैला सफाई का यह अमानवीय कारोबार इन सफाई कर्मियों और उनके परिवार के सदस्यों को अंदर से इतना कमजोर, हताश और पराजित बना देता है कि कोई आश्चर्य नहीं यदि इन मृतकों के परिजन भी मुआवजा मिलने को ही अपना परम सौभाग्य मान लें और दोषियों के साधन संपन्न सहयोगियों के समक्ष शरणागत हो जाएं। धीरे धीरे सब कुछ पुराने ढर्रे पर चल निकलेगा और इस तरह की घटनाओं की निर्लज्ज पुनरावृत्ति होती रहेगी। एनसीएसके के आंकड़े बताते हैं कि सीवर सफाई के दौरान हुई मृत्यु के आंकड़ों में गुजरात देश में तामिलनाडु के बाद दूसरे नंबर पर है। गुजरात प्रधानमंत्री का गृह राज्य है और विकास के बहुचर्चित गुजरात मॉडल की प्रयोग स्थली भी। प्रधानमंत्री का बहुप्रचारित स्वच्छता अभियान महात्मा गांधी के आदर्शों से प्रेरित बताया जाता है जो स्वयं इस अमानवीय प्रथा से असहमत और आहत रहे। किन्तु इसके बाद भी गुजरात का यह शर्मनाक रिकॉर्ड गहरी चिंता उत्पन्न करता है। यह दर्शाता है कि सरकार की प्राथमिकताओं में शायद ये सफाई कर्मी सम्मिलित नहीं हैं।

मैला सफाई के इस कार्य के विषय में आरक्षण पर कोई विवाद नहीं है। वाल्मीकि समुदाय के लोग इस कार्य के संपादन के लिए अभिशप्त हैं। उच्चतर वर्णों के लोग वाल्मीकि समुदाय के इस पेशे पर एकाधिकार को कभी चुनौती नहीं देते। आरक्षण का विमर्श इस पेशे से दूरी बना लेता है। चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान हर धर्म में मैला सफाई के लिए कुछ खास जातियां इस कार्य को करने के लिए चिह्नित की गई हैं जिन्हें नारकीय दशाओं में यह कार्य करना पड़ता है क्योंकि समाज उन्हें इस दलदल से निकलने नहीं देता। इस पेशे को छोड़ना भी आसान नहीं है। यहां तक कि जब वाल्मीकि समुदाय के लोग महानगरों की ओर पलायन करते हैं तब भी इन्हें अन्य कार्यों से दूर रखा जाता है और इन्हें मैला सफाई के कार्य से आमरण आबद्ध रखा जाता है। इस कार्य को इतना घृणित माना जाता है कि ऐसे अनेक श्रमिक अपने परिवार तक से यह तथ्य छिपा कर रखते हैं कि वे सीवर सफाई का कार्य करते हैं। ऐसे में कई बार सीवर सफाई के दौरान इनकी मौत की खबर इनके परिजनों को भी हतप्रभ और चकित छोड़ जाती है।

इन मैला सफाई करने वाले श्रमिकों के प्रति प्रशासन तंत्र की उदासीनता चिंतित करने वाली है। सरकार ने मैला सफाई करने वाले श्रमिकों की संख्या और उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति के संबंध में कोई भी सर्वेक्षण नहीं कराया है। लोकसभा में 4 अगस्त 2015 को एक अतारांकित प्रश्न के उत्तर में सरकार द्वारा यह जानकारी दी गई कि 2011 की जनगणना के आंकड़े यह बताते हैं कि देश के ग्रामीण इलाकों में 180657 परिवार मैला सफाई का कार्य कर रहे थे। इनमें से सर्वाधिक 63713 परिवार महाराष्ट्र में थे। इसके बाद मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, त्रिपुरा तथा कर्नाटक का नंबर आता है। यह संख्या इन परिवारों द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में हाथ से मैला सफाई के 794000 मामले सामने आए हैं। सीवर लाइन सफाई के दौरान होने वाली मौतों के विषय में राज्य सरकारें केंद्र को कोई सूचना नहीं देतीं। 2017 में 6 राज्यों ने केवल 268 मौतों की जानकारी केंद्र के साथ साझा की। सरकारी सर्वे के अनुसार तो 13 राज्यों में केवल 13657 सफाई कर्मी हैं। द गार्डियन की 19 सितंबर 2018 की एक रिपोर्ट यह बताती है कि राज्य सरकारें हाथों से मैला सफाई करने वाले श्रमिकों के अस्तित्व से ही इनकार करती हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार जब राज्य सरकारों से हाथों से मैला सफाई करने और ढोने वाले सफाई कर्मियों की संख्या की जानकारी मांगी गई तो तत्कालीन छत्तीसगढ़ और गुजरात सरकार ने क्रमश: 3 और 2 सफाई कर्मियों की संख्या बताई जो अविश्वसनीय और हास्यास्पद थी।

नैशनल कमीशन फॉर सफाई कर्मचारीज ने जब यह बताया कि सन 2017 से हर पांचवें दिन कोई न कोई अभागा सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौत का शिकार बन जाता है तो हम सब चौंक उठे थे। लेकिन इस खुलासे से भी आश्चर्यजनक बात यह थी कि यह इस तरह की मृत्यु के संबंध में पहले आधिकारिक आंकड़े थे। एनसीएसके के अध्यक्ष मनहर वालजी भाई झाला कहते हैं कि यह आंकड़े अपूर्ण हैं क्योंकि अधिकांश राज्यों में इस तरह की मृत्यु रिपोर्ट ही नहीं होती। इन आंकड़ों को हिंदी और अंग्रेजी के समाचार पत्रों में छपी खबरों तथा 29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल 13 द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। इन आंकड़ों में हाथ से मैला उठाने वाले वाल्मीकि समुदाय के स्त्री पुरुषों की विभिन्न रोगों के कारण हुई मृत्यु के आंकड़े सम्मिलित नहीं हैं। असुरक्षित ढंग से मैला और गंदगी उठाते उठाते इन्हें कितने ही संक्रामक रोग हो जाते हैं और इनकी औसत आयु चिंताजनक रूप से कम हो जाती है।

ऐसा नहीं है कि इस संबंध में कानूनों की कोई कमी है। 1993 में 6 राज्यों ने केंद्र सरकार से मैला ढोने की प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए कानून का निर्माण करने का अनुरोध किया। तब द एम्प्लॉयमेंट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन ऑफ ड्राई लैट्रिन्स (प्रोहिबिशन) एक्ट 1993 नरसिम्हा राव सरकार द्वारा पारित किया गया। इस एक्ट के बनने के बाद से 1800 सफाई कर्मियों की सीवर सफाई के दौरान जहरीली गैसों के कारण हुई मौत के मामले मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और सफाई कर्मचारी आंदोलन के समन्वयक श्री बेजवाड़ा विल्सन और उनके साथियों के पास सूचीबद्ध हैं। श्री विल्सन के अनुसार यह संख्या केवल उन मामलों की है जिनके विषय में दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं।

वास्तविक संख्या तो इससे कई गुना अधिक है क्योंकि इस तरह की अधिकांश मौतों के मामले दबा दिए जाते हैं। मृतक के परिजन अशिक्षा और निर्धनता के कारण न्याय के लिए संघर्ष करने की स्थिति में नहीं होते। मृत्यु के लिए जिम्मेदार ठेकेदार और अधिकारी अपने रसूख के बल पर मामले को रफा दफा कर देते हैं। यह मौतें प्राय: सेप्टिक टैंक के भीतर मौजूद मीथेन, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि जहरीली गैसों के कारण होती हैं। डॉ आशीष मित्तल (जो जाने माने कामगार स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं तथा इस विषय होल टू हेल तथा डाउन द ड्रेन जैसी चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं) बताते हैं कि सीवर सफाई से जुड़े अस्सी प्रतिशत सफाई कर्मी रिटायरमेंट की आयु तक जीवित नहीं रह पाते और श्वसन तंत्र के गंभीर रोगों तथा अन्य संक्रमणों के कारण इनकी अकाल मृत्यु हो जाती है। नियमानुसार पहले तो किसी व्यक्ति का सीवर सफाई के लिए मैनहोल में उतरना ही प्रतिबंधित है। किंतु यदि किसी आपात स्थिति में किसी व्यक्ति को सीवर में प्रवेश करना आवश्यक हो जाता है तो लगभग 25 प्रकार के सुरक्षा प्रबंधों की एक चेक लिस्ट है जिसका पालन सुनिश्चित करना होता है।

सर्वप्रथम तो यह जांच करनी होती है कि अंदर जहरीली गैसों का जमावड़ा तो नहीं है। एक विशेषज्ञ इंजीनियर की उपस्थिति अनिवार्य होती है। एम्बुलेंस की मौजूदगी और डॉक्टर की उपलब्धता आवश्यक होती है। सीवेज टैंक में उतरने वाले श्रमिक को गैस मास्क, हेलमेट, गम बूट, ग्लव्स, सेफ्टी बेल्ट आदि से सुसज्जित पोशाक उपलब्ध कराई जानी होती है। तदुपरांत मौके पर उपस्थित किसी जिम्मेदार अधिकारी द्वारा यह प्रमाणित करने पर कि सभी सुरक्षा नियमों का शतप्रतिशत पालन कर लिया गया है श्रमिक सीवर में उतर सकता है। तमाम कानूनी प्रावधानों के बाद भी सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतें थमने का नाम नहीं ले रही। सितंबर 2013 में सरकार ने इस संबंध में नया कानून बनाया। दिसंबर 2013 में सरकार द्वारा प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट एज मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन रूल्स 2013 को लागू किया गया। इन्हें एम एस रूल्स के नाम से जाना जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने 2014 में निर्णय दिया- जहां तक सीवर सफाई के दौरान मृत्यु का संबंध है आपात स्थितियों में भी बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर लाइन्स में प्रवेश अपराध की श्रेणी में आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मृत्यु के ऐसे प्रत्येक मामले में 10 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाए। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि भारतीय रेल के यात्री डिब्बों के शौचालय हाथ से मैला सफाई का सबसे बड़ा कारण हैं, सर्वोच्च न्यायालय ने रेल विभाग को निर्देश दिया कि रेल पटरियों पर से मैला उठाने की अमानवीय स्थिति का अंत करने के लिए वह एक समयबद्ध कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करे। रेल मंत्रालय ने सन 2022 तक सारे रेल कोचों में बायो टॉयलेट लगाने का आश्वासन दिया।

यह जानना अत्यंत दु:खद है कि इतने स्पष्ट कानूनी प्रावधानों के बावजूद सीवर लाइन की सफाई के दौरान हुई मौतों के लिए दोषी व्यक्तियों पर एफआईआर दर्ज होने का इक्का दुक्का उदाहरण भी कठिनाई से उपलब्ध है। इन दोषियों को दंड मिलने की बात तो वर्तमान भ्रष्ट और असंवेदनशील तंत्र में असंभव जान पड़ती है। प्राय: होता यह है कि सफाई कार्य करा रहे ठेकेदार बिना किसी सुरक्षा उपकरण के 200-250 रुपए की दिहाड़ी पर कार्य कर रहे इन मजदूरों को रस्से के सहारे मैनहोल से नीचे उतार देते हैं। जहरीली गैसों की जांच के लिए इनके पास माचिस की तीली जलाकर देखना और जीवित कॉकरोच डालकर परीक्षण जैसे आदिम तरीके ही होते हैं। इन सीवर लाइन्स में संचित जहरीली गैसों के प्रभाव से यह मजदूर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं या गंभीर अवस्था में बाहर निकाले जाते हैं।

चूंकि बाहर एम्बुलेंस, डॉक्टर या अन्य कोई आपात चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध नहीं होती इसलिए इनकी मृत्यु अवश्यम्भावी होती है। इसके बाद शुरू होता है मामले को रफा दफा करने का खेल। पुलिस, अधिकारी और ठेकेदार का गठजोड़ मृत्यु के कारण को बदलने का कार्य करता है। एक नाम मात्र की राशि मृतक के परिजनों को ठेकेदार द्वारा दे दी जाती है। यद्यपि ये सरकारी कार्य कर रहे होते हैं लेकिन सरकारें इन्हें अपना कर्मचारी मानने से इनकार कर देती हैं। इन्हें मुआवजा देने से वंचित कर दिया जाता है।

सफाई कर्मचारी आंदोलन ने इस चौंकाने वाले तथ्य की ओर ध्यानाकर्षण किया है कि मैनुअल सफाई व्यवस्था को समाप्त करने के लिए वर्ष 2014-15 में 570 करोड़ का बजट था जो 2017-18 में सिर्फ 5 करोड़ रह गया। जबकि स्वच्छ भारत अभियान का बजट 2014-15 में 4541 करोड़ था, जो 2017-18 में बढ़कर 16248 करोड़ हो गया है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत बनाए जा रहे करोड़ों शौचालयों के लिए सेफ्टी टैंक भी बनाए जा रहे हैं। सरकार द्वारा सन 2019 तक 21 करोड़ शौचालय निर्माण का लक्ष्य है। किन्तु सरकार ने सीवेज सिस्टम के सुधार के लिए कोई खास प्रयत्न नहीं किए हैं। स्वच्छ भारत अभियान शुरू होने के पूर्व ही शहरी इलाकों में एक तिहाई शौचालय सीवर लाइन्स से जुड़े नहीं थे। सरकारी दावे यह बताते हैं कि 2017 के अंत तक ग्रामीण इलाकों में 6 करोड़ नए शौचालय बन चुके थे। इन परिस्थितियों में इनकी मैनुअल सफाई की घटनाएं भी बढ़ेंगी। सीवर लाइन की सफाई के दौरान होने वाली दुर्घटनाएं अब तक महानगरों तक ही सीमित थीं इनका

विस्तार अब छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में होगा।
इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने कुछ दिल दहला देने वाले दृश्यों को उत्पन्न किया है। जेसीबी मशीन और हाइड्रोलिक कटर के उपयोग से मैन होल को बड़ा कर इन अभागे सफाई कर्मचारियों के सीवर की गंदगी में गहरे डूब चुके शवों को निकाला गया। एक छवि वह भी थी जब प्रधानमंत्री जी कुंभ के अवसर पर शानदार कार्य करने वाले स्वच्छता कर्मियों के चरण पखार रहे थे। न चाहते हुए भी इन दोनों छवियों की तुलना तो होगी ही। सरकार स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए अपनी प्रतिबद्धताओं को बार बार दुहराती रही है। केरल के चार युवा इंजीनियरों के एक समूह द्वारा निर्मित स्टार्टअप फर्म जेनोरोबोटीक्स द्वारा विकसित रोबोट, बैंडीकूट का इस्तेमाल सीवर की सफाई के लिए करने के लिए किया जा सकता है। इन युवा इंजीनियरों का यह सपना है कि वे मैनहोल को रोबोहोल में बदल देंगे।

19 नवंबर 2018 को वर्ल्ड टॉयलेट डे के अवसर पर सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक ने भी एक स्वचलित मशीन के विषय में जानकारी दी थी जो मैनुअल स्कैवेनजिंग की समाप्ति कर सकती है। क्या सरकार इन मशीनों के निर्माण और जरूरतमंद लोगों तक इनकी पहुंच को सुनिश्चित करेगी? सरकार का विश्वास यदि जनता को छवियों के माध्यम से संदेश देने में है तब भी उसके लिए बहुत कुछ करणीय है। इन स्वच्छता सेनानियों की शहादत को सलाम करने के लिए इनके अंतिम संस्कार के समय जिले के डीएम, जनप्रतिनिधि और राज्य सरकार के मंत्री उपस्थित रह सकते हैं। अधिकतम संभावित मुआवजे की रकम अंतिम संस्कार के पूर्व ही परिजनों को दी जा सकती है और परिवार के किसी सदस्य को नौकरी का नियुक्ति पत्र भी प्रदान किया जा सकता है। फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन कर दोषियों को न्यूनतम समय में सजा दिलाई जा सकती है। जहां भी ऐसी दु:खद घटना होती है वहां के प्रशासनिक अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई की परिपाटी आरंभ की जा सकती है। शायद सुंदर, सकारात्मक और प्रेरक छवियों की चाह में ही सरकार भारतीय समाज की इस भयंकर कुरीति के विरुद्ध कोई कदम उठा ले।
डॉ राजू पाण्डेय  (साभार-देशबंधु)

बुधवार, 27 नवंबर 2019

5 पॉइंट समवन- चेतन भगत

 "आप सभी को यहाँ रहने और पढ़ने के लिए शुभकामनाएँ। बेस्ट ऑफ लक। याद रखो, जैसे कि तुम्हारे विभाग प्रमुख प्रो.चेरियन कहते हैं कि कठिन वर्कलोड डिजाइन आपसे सदैव मेहनत करवाने के लिए है। और हाँ, ग्रेडिंग सिस्टम की कद्र करें।

 अगर आपको खराब ग्रेड्स मिले, तो याद रखें कि आपको न तो कोई नौकरी मिलेगी और न ही आपका कोई भविष्य होगा। लेकिन अगर आप अच्छा करते हैं तो यह दुनिया आपके कदम चूमेगी। इसलिए खराब प्रदर्शन की कोई गुंजाइश नहीं है।" 

जैसे ही प्रो. दुबे ने अपने आखिरी शब्द कहे, हम सभी के अंदर एक सनसनी सी दौड़ गई। प्रोफेसर ने डस्टर मेज पर जोर से पटका और चॉक के बादलों को पीछे छोड़ते हुए कक्षा से बाहर चले गए। (5 पॉइंट समवन- चेतन भगत)



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गुरुवार, 14 नवंबर 2019

हारने के लिए

 उन्होंने जीतना ही कब चाहा था मुझे

मैं तो ज़माने से बैठा था हारने के लिए....

                       कृष्णधर शर्मा 12.11.19

बुधवार, 13 नवंबर 2019

इसमें मेरी क्या खता

 वक्त का तकाज़ा है, तू ही बता इसमें मेरी क्या खता

साजिशों के दौर में, तेरी मोहब्बत भी साजिश लगे है मुझे

                       कृष्णधर शर्मा 12.11.19

रविवार, 10 नवंबर 2019

कविता के नये प्रतिमान- नामवर सिंह

 'कविता के नए प्रतिमानों की चर्चा के प्रसंग में प्रायः सभी नए लेखक इस बात पर एकमत दिखाई पड़ते हैं कि नए प्रतिमानों का संबंध रस से नहीं हो सकता; क्योंकि "कविता से रस का लुप्तीकरण अब विवादास्पद नहीं रह गया है।" "दिन में सैकड़ों बार 'हृदय की अनुभूति', हृदय की अनुभूति' चिल्लाएंगे, पर 'रस' का नाम सुनकर ऐसा मुँह बनाएंगे मानो उसे न जाने कितना पीछे छोड़ आये हैं। भलेमानुस इतना भी नहीं जानते कि हृदय की अनुभूति ही साहित्य में 'रस' और 'भाव' कहलाती है।" 

आचार्य शुक्ल ने जहाँ रस को हृदय की अनुभूति के रूप में निरूपित किया है, वहीं आगे यह भी लिखा है कि "शब्द-शक्ति, रस और अलंकार, ये विषय-विभाग काव्य-समीक्षा के लिए इतने उपयोगी हैं कि इनको अंतर्भूत करके संसार की नई-पुरानी सब प्रकार की कविताओं की बहुत ही सूक्ष्म, मार्मिक और स्वच्छ आलोचना हो सकती है। रिचर्ड्स जैसे वर्तमान अंग्रेजी समालोचक किस प्रकार अब समीक्षा में बहुत-कुछ भारतीय पद्धति का अवलंबन करके कूड़ा-करकट हटा रहे हैं, वह मैं शब्द -शक्ति के प्रसंग में दिखा चुका हूँ।"

 "शब्द-शक्ति के प्रसंग में आचार्य शुक्ल का कथन इस प्रकार है : "शब्द-शक्ति का विषय बड़े महत्व का है। वर्तमान साहित्य-सेवाओं को इसके संबंध में विचार-परंपरा जारी रखना चाहिए। काव्य की मीमांसा या स्वच्छ समीक्षा के लिए यह उपयोगी सिद्ध होगी।" (कविता के नये प्रतिमान- नामवर सिंह)



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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019

विकसित देशों का मोह


सरकार की सोच है कि विकसित देशों की तरह हम भी आधुनिक बड़े-बड़े कारखाने लगायें। इस नीति को लागू करने के लिए नोटबंदी और जीएसटी को लागू किया गया है। इस कारण छोटे उद्यमी दबाव में आ गए हैं, लोगों को रोजगार कम मिल रहा है, आम आदमी की क्रय शक्ति कम हो गई है, बाजार में मांग नहीं हैं और बड़े उद्यमी भी निवेश करने को उद्यत नहीं हैं।

सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन का बनाने का लक्ष्य रखा है।  इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार की रणनीति है कि ब्याजदर में कटौती की जाए जिससे कि उपभोक्ता के लिए ऋण लेकर खपत करना आसान हो जाए। जैसे ऋण लेकर कार खरीदने को वह उद्यत हो अथवा न्यून ब्याज दर से प्रेरित होकर उद्यमी ऋण लेकर फैक्ट्री लगाए जिससे कि रोजगार भी उत्पन्न हो और उत्पादन भी बढ़े और हमारे आर्थिक विकास को गति मिले।  लेकिन उद्यमी के लिए ब्याज दर का विषय बाद में आता है।
उद्यमी के लिए पहला विषय होता है कि बाजार में माल की मांग है या नहीं। यदि बाजार में माल की मांग होती है तो वह येन केन प्रकारेण पूंजी की व्यवस्था कर फैक्ट्री लगाता ही है। इसके विपरीत यदि बाजार में मांग नहीं है तो वह ब्याज दर कम होने पर भी ऋण नहीं लेता है क्योंकि फैक्ट्री लगाकर प्रॉफिट तभी हासिल किया जाता है जब उत्पादित माल को बेचा जा सके। यदि ब्याज दर कम हो और आप उसके लालच में फैक्ट्री लगा लें लेकिन माल बिके नहीं तो वह  न्यून ब्याज दर निरर्थक हो जाता है। हम देख रहे हैं कि पिछले दो वर्षों में रिजर्व बैंक ने कई बार ब्याज दरों में कटौती की है लेकिन अर्थव्यवस्था की विकासदर लगातार गिरती ही जा रही है। यह इस बात का प्रमाण है कि ब्याज दर को न्यून करके हम आर्थिक विकास को हासिल नहीं कर सकते हैं। इसके विपरीत यदि बाजार में मांग हो और उद्यमी फैक्ट्री लगाने को उद्यत हो तो न्यून ब्याजदर उसे अवश्य ही प्रेरित करती है कि वह छोटे के स्थान पर बड़ी फैक्ट्री लगाए और 10 के स्थान पर 20 कर्मियों को रोजगार दे। अत: मुख्य बात बाजार में मांग का होना है।
प्रश्न है कि इस समय बाजार में मांग क्यों नहीं उत्पन्न हो रही है। मांग उत्पन्न होने के लिए आम आदमी के पास क्रय शक्ति होनी चाहिए। किसान अथवा माध्यम वर्गीय कर्मियों के पास आय होनी चाहिए जिससे कि वे बाजार में जाकर टेलीविजन अथवा बाइक खरीदें।  बाजार में मांग न होना इस बात की तरफ संकेत करता है कि आम आदमी के पास क्रय शक्ति नहीं है। प्रश्न है कि यह क्रय शक्ति गई कहां? मेरा मानना है कि नोटबंदी और जीएसटी ने आम आदमी की जीविका पर भारी चोट की है। नोटबंदी के कारण तमाम छोटे उद्यमियों का धंधा चौपट हो गया है। नोटबंदी के बाद एक ओला के ड्राईवर से बातचीत हुई।
उन्होंने बताया कि वह तीस वर्षों से 3-4 कर्मियों को रोजगार देते थे। साड़ियों पर एम्ब्रॉयडरी इत्यादि करा कर उन्हें बेचते थे। लेकिन नोटबंदी से उनके क्रेताओं ने माल खरीदना बंद कर दिया। उन्हें अपने कर्मियों को बर्खास्त करना पड़ा और स्वयं ओला की ड्राइवरी करने को मजबूर हुए। मेरा अनुमान है कि इस प्रकार के तमाम उदाहरण हैं जिसके कारण आम आदमी की क्रय शक्ति कम हो गई है और बाजार में मांग कम हो गई है। जीएसटी का प्रभाव भी कुछ इसी प्रकार हुआ है। पूरे देश का बाजार एक हो गया है।  इसका विशेष लाभ बड़े उद्यमियों को हुआ है। हरिद्वार के एक परदे बनाने वाले ने बताया कि पूर्व में उसके बनाए परदे बिकते थे क्योंकि सूरत के परदे आने में सरहद पर क्रय कर का प्रपंच रहता था।  जीएसटी लागू होने के बाद सूरत के परदे बेरोक-टोक उत्तराखंड में प्रवेश कर रहे हैं और उसका धंधा दबाव में आ गया है।
सरकार की सोच है कि विकसित देशों की तरह हम भी आधुनिक बड़े-बड़े कारखाने लगायें। इस नीति को लागू करने के लिए नोटबंदी और जीएसटी को लागू किया गया है। इस कारण छोटे उद्यमी दबाव में आ गए हैं, लोगों को रोजगार कम मिल रहा है, आम आदमी की क्रय शक्ति कम हो गई है, बाजार में मांग नहीं हैं और बड़े उद्यमी भी निवेश करने को उद्यत नहीं हैं।
सरकार की सोच यह भी है कि छोटे उद्यमियों को 10 वर्ष मात्र तक छूट दी जाए जिसमे ब्याजदर कम होती है अथवा कुछ कानूनों से मुक्ति मिलती है। सरकार का कहना है कि जिस प्रकार एक पौधा सदा छोटा नहीं रहता बल्कि समय अनुसार उसे बड़े पौधे में बढ़ना चाहिए उसी प्रकार छोटे उद्यम को सदा छोटा नहीं रहना चाहिए। यदि वह बड़ा नहीं होता तो उसका छोटे उद्यम का दर्जा दस वर्ष बाद समाप्त कर देना चाहिए। मेरा मानना है कि पौधे से तुलना करना उचित नहीं है। सही तुलना है धावक से। हर व्यक्ति की दौड़ करने की क्षमता अलग-अलग होती है। जो व्यक्ति कम तेजी से दौड़ता है उसे दौड़ से सदा के लिए बाहर नहीं करना चाहिए। वह रिक्शा चला सकता है यद्यपि वह उतना तेज नहीं चला सकेगा जितना दूसरा रिक्शाचालक चलाता है। तमाम ऐसे उद्यमी हैं जिनकी क्षमता छोटे उद्यम को चलाने तक सीमित है। हम यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि हर छोटा उद्यम समय क्रम में बड़ा हो ही जाएगा। लेकिन सरकार की सोच है कि इस प्रकार के छोटे उद्यम को समाप्त कर दिया जाए। सरकार की इस सोच के कारण देश में आम आदमी का रोजगार कम हो रहा है और बाजार में मांग कम हो रही है और निवेश भी कम हो रहा है।
सरकार की यह सोच भी है कि चीन द्वारा 80 और 90 के दशक में अपनाई गई नीति को हम अपनाएं। लेकिन आज की परिस्थितियों में मौलिक अंतर है। उस समय विकसित देशों में नए-नए तकनीकी आविष्कार हो रहे थे जैसे विंडोज का सॉफ्टवेर, लैपटॉप अथवा इन्टरनेट। इन नयी तकनीकी आविष्कारों के बल पर विकसित देशों की आय बढ़ रही थी और वे चीन से सस्ता माल खरीद रहे थे। आज विकसित देशों के पास इन्टरनेट जैसे आविष्कार कम ही उपलब्ध हैं। उनकी विकासदर भी दबाव में है इसलिए उनकी मांग कम बन रही है। दूसरी बात यह कि रोबोट और आटोमेटिक मशीनों के आविष्कारों से आज विकसित देशों में माल का उत्पादन भी लाभप्रद हो गया है। जैसे पूर्व में फुटबॉल बनाने के लिए कर्मियों की भारी संख्या में जरूरत पड़ती थी इसलिए फुटबॉल का उत्पादन चीन में होता था। आज यदि रोबोट के द्वारा फुटबॉल बनाई जाने लगे तो उसका उत्पादन विकसित देशों में हो सकता है। इस कारण आज विकसित देशों द्वारा भारत जैसे देशों से माल का आयात कम ही किया जा रहा है। आज हम चीन द्वारा पूर्व में अपनाई गई नीति को अपनाकर आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।
सरकार को चाहिए कि अपनी नीतियों में मौलिक परिवर्तन करें अन्यथा स्थिति बिगड़ती जायेगी। मूल बात यह है कि छोटे कर्मियों, छोटे किसानों और छोटे बिल्डरों सबको संरक्षण दिया जाए। इनके द्वारा रोजगार अधिक बनते हैं और इन रोजगारों से ही अर्थव्यवस्था में मांग बनती है। विकसित देशों के बड़े- बड़े  उद्यमियों और बिल्डरों की चकाचौंध से सरकार को भटकना नहीं चाहिए। जब तक सरकार अपने आम आदमी के रोजगार की ओर ध्यान नहीं देगी तब तक देश की अर्थव्यवस्था में सुधार होने की संभावना कम ही है।
 (डॉ. भरत झुनझुनवाला साभार- देशबंधु )
 


सोमवार, 21 अक्टूबर 2019

चिन्तामणि- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

 ''काव्य का जो चरम लक्ष्य सर्वभूत को आत्मभूत करके अनुभव कराना है। (दर्शन के समान केवल ज्ञान कराना नहीं) उसके साधन में भी अहंकार का त्याग आवश्यक है। जब तक इस अहंकार से पीछा न छूटेगा तब तक प्रकृति के सब रूप मनुष्य की अनुभूति के अंदर नहीं आ सकते। 

 इधर वाल्मीकि को देखिए। उन्होंने प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन में केवल मंजरियों से छाए हुए रसालों, सुरभित सुमनों से लदी हुई मालती लताओं, मकरंद-पराग-पूरित सरोजों का ही वर्णन नहीं किया, इंगुदी, अंकोट, तेंदू-बबूल, बहेड़े आदि जंगली पेड़ों का भी तल्लीनता के साथ वर्णन किया है। उसी प्रकार योरप के कवियों ने भी अपने गांव के पास बहते हुए नाले के किनारे उगने वाली झाड़ी या घास तक का नाम आँखों में आँसू भरकर लिया है।

 इससे स्पष्ट है कि मनुष्य को उसके व्यापरगर्त से बाहर प्रकृति के विशाल और विस्तृत क्षेत्र में ले जाने की शक्ति फारस की परिमित काव्यपद्धति में नहीं है--भारत और योरप की पद्धति में है।" (चिन्तामणि- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल)



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शनिवार, 12 अक्टूबर 2019

खुशकिस्मत हैं वो

 

खुशकिस्मत हैं वो मयस्सर है जिन्हें नींद का तोहफा

इस माहौल ए रंजिश में भला नींद कहाँ आती है

                       कृष्णधर शर्मा 10.10.19

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019

फोन में चला जाए बारिश का पानी तो करें ये काम

 स्मार्टफोन हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. लेकिन जरा सी लापरवाही जैसे बारिश में भीग जाना, ये सब मोबाइल को खराब करने के लिए काफी है. अगर आपके फोन में बारिश का पानी चला जाए तो घबराएं नहीं बल्कि कुछ स्मार्ट स्टेप्स अपनाकर आप अपने डिवाइस को बचा सकते हैं.

मोबाइल हमारी रोजमर्रा जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। इसके बिना कई काम ठप्प हो जाते हैं और ऐसे भी कई यूजर्स है जो फोन के बिना रह नहीं सकते हैं। वहीं, आजकल देशभर के कई राज्यों में बारिश का मौसम चल रहा है। बारिश के मौसम में फोन का पानी में भीग जाना आम बात होती है।  

ऐसी कंडीशन में बहुत से लोग तो घबराकर तुरंत फोन ऑन करने या सुखाने की कोशिश में लग जाते हैं, लेकिन आपको ऐसे में जल्दबाजी बिलकुल नहीं करनी है, नहीं तो आपकी एक छोटी सी गलती फोन को हमेशा के लिए खराब कर सकती है। अगर आपका फोन भी बारिश में भीग गया है तो कुछ टिप्स अपनाकर अपने फोन को खराब होने से बचा सकते हैं।  

सबसे पहले फोन को स्विच ऑफ करें जैसे ही फोन में पानी चला जाता है तो कई लोग बारिश में भीगने के बाद अपने फोन को चेक करने की कोशिश करते हैं और देखते हैं कि वह ठीक से काम कर रहा है या नहीं, लेकिन फोन को तुरंत चालू करना एक बड़ी गलती है। इससे फोन में शॉर्ट सर्किट भी हो सकता है और फोन खराब हो सकता है। 

  फोन को चार्ज न करें फोन में पानी चले जाने के बाद कुछ लोग तो तुरंत डिवाइस को चार्जिंग पर लगा देते हैं ताकि वह जल्दी से चालू हो जाए, लेकिन यह खतरे से खाली नहीं है। चार्जिंग के दौरान पानी और करंट के कांटेक्ट में आने से फोन और चार्जर दोनों में शॉर्ट सर्किट हो सकता है। इससे आपका महंगा फोन खराब हो सकता है।

#समाजकीबात Samaj Ki Baat 

कृष्णधर शर्मा