नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

सोमवार, 18 मार्च 2024

जैनेन्द्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ- डॉ. निर्मला जैन

 सड़क पर से नर-नारियों का अविरत प्रवाह आ रहा था और जा रहा था। उसका न ओर था न छोर। यह प्रवाह कहां जा रहा था और कहां से आ रहा था, कौन बता सकता है ? सब उम्र के संब तरह के लोग उसमें थे। मानो मनुष्य के नमूनों का बाजार, सजकर, सामने से इठलाता निकला चला जा रहा हो। 

अधिकार-गर्व में तने अंग्रेज उसमें थे, और चिथड़ों से सजे, घोड़ों की बाग थामें वे पहाड़ी उसमें थे, जिन्होंने अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान को कुचल कर शून्य बना लिया है, और जो बड़ी तत्परता से दुम हिलाना सीख गये हैं। 

भागते-खेलते, हंसते शरारत करते, लाल-लाल अंग्रेज बच्चे थे और पीली-पीली आंखें फोड़े, पिता की ऊंगली पकड़कर चलते हुए अपने हिन्दुस्तानी नौनिहाल भी थे। 

अंग्रेज पिता थे जो अपने बच्चों के साथ भाग रहे थे, हंस रहे थे और खेल रहे थे। उधर भारतीय पितृदेव भी थे, जो बुजुर्गो को अपने चारों तरफ लपेटे धन-सम्पन्नता के लक्षणों का प्रदर्शन करते हुए चल रहे थे। 

अंग्रेज रमणियां थीं, जो धीरे नहीं चलती थीं, तेज चलती थीं। उन्हें न चलने में थकावट आती थी, न हंसने में लाज आती थी। कसरत के नाम पर भी बैठ सकती थीं, और घोड़े के साथ ही साथ जरा जी होते ही, किसी हिन्दुस्तानी पर भी कोड़े फटकार सकती थीं। वह दो-दो-तीन-तीन, चार-चार की टोलियों में निश्शक, निरापद, इस प्रवाह में मानो अपने स्थान को जानती हुई, सड़क पर से चली जा रही थीं। 

उधर हमारी भारत की कुललक्ष्मियां, सड़क के बिल्कुल किनारे-किनारे दामन बचाती और सम्हलाती हुई, साड़ी की कई तहों में सिमट सिमटकर, लोक-लाज, स्त्रीत्व और भारतीय गरिमा के आदर्श को अपने परिवेष्टनों में छिपाकर, सहमी सहमी धरती में आंखें गाड़े कदम-कदम बढ़ रही थीं। इसके साथ ही भारतीयता का एक और नमूना था। अपने कालेपन को खुरच-खुरच कर बहा देने की इच्छा करने वाले अंग्रेजीदा पुरुषोत्तम भी थे, जो नेटिव को देखकर मुंह फेर लेते थे और अंग्रेज को देखकर आंखे बिछा देते थे, और दुम हिलाने लगते थे। वैसे वह अकड़ कर चलते थे-मानो भारत भूमि को इसी अकड़ के साथ कुचल-कुचलकर चलने का उन्हें अधिकार मिला है। (जैनेन्द्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ- डॉ. निर्मला जैन)




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शनिवार, 9 मार्च 2024

रेत जैसे रंग वाली लड़की

रेत जैसे रंग वाली लड़की

रेत के घरौंदे बनाया करती थी

ताम्बई रंग वाला लड़का

उन घरौंदों को लात मारकर

अक्सर तोड़ जाया करता था

बहुत मजा आता था उसे

रेत जैसे रंग वाली लड़की के

रेत वाले घरौंदों को तोड़कर

बहुत खुश होता था

ताम्बई रंग वाला लड़का

रेत जैसे रंग वाली लकड़ी के

चेहरे पर उदासी देखकर

मगर रेत जैसे रंग वाली लड़की

ताम्बई रंग वाले लड़के से

नाराज न होकर

फिर-फिर रेत के घरौंदे

बनाती थी इस उम्मीद में

कि कभी तो ताम्बई रंग वाला लड़का

उसके बनाये घरौंदे की

करेगा तारीफ़ और कहेगा

कि ओ रेत जैसे रंग वाली लड़की

तुम रेत के घरौंदे कितना सुन्दर बनाती हो...

             कृष्णधर शर्मा  9.3.24 

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शनिवार, 2 मार्च 2024

सौदामिनी-विभूतिभूषण मुखोपाध्याय

 वास्तव में, दो दिन में ही, जैसा धैर्य-च्युत हो बैठा हूं-इससे भली-भांति समझा जा सकता है कि यह नौकरी रहेगी नहीं। एक तो इस अभिजात वातावरण में अपने को एडजस्ट नहीं कर पा रहा। दूसरे एक रहस्य भी है....इस कोठी में कहीं कोई एक गृहस्वामिनी भी है किन्तु उनके अस्तित्व का पक्की तरह निदर्शन नहीं मिल रहा। देखता हूं, मीरा ही सर्वमयी है। शायद मेरी नौकरी से उसका कोई साक्षात् सम्बन्ध नहीं फिर भी कुछ परेशानी का अनुभव कर रहा हूं। सबसे अधिक असह्य हो उठा है पत्थर जैसा खाली वक्त ! 

तरु प्रातः कहां जाती है ? ट्यूशन पढ़कर आती है ? दोपहर को कहां जाती है? स्कूल ?.... फिर मुझे इतना वेतन देकर क्यों रखा गया है ? काम के अभाव में कोठी के साथ किसी सम्पर्क सूत्र का अनुभव भी नहीं कर पा रहा हूं। अच्छी चाल है बड़े लोगों की ! आदमी रख लिया, पर उसका काम तक निश्चित नहीं कर देते। इसके बिल्कुल विपरीत पहले वाली सब जगहों पर गार्जियन-उपगार्जियनों का दल भागकर आता कि एक क्षण भी खाली तो नहीं बैठा हूं कहीं ! पर इससे तो सौ गुणा वही अच्छा था। 

रहस्य उस दिन कुछ खुला। 

चिट्ठी पोस्ट करके मन-ही-मन सोचता-विचारता बाग में एक लोहे के बेंच पर जा बैठा। बाहर से बाग जितना अधिक कृत्रिम और भद्दा लग रहा था अब उतना नहीं लग रहा। बल्कि कहूं कि अच्छा ही लग रहा है। साफ-सुथरे कटे-छटे बालों वाले व्यक्ति के शरीर पर जैसे ढीला-ढाला कोट अच्छा नहीं दीखता, बल्कि सुडौल कुरता सुन्दर लगता है। इस कोठी के ख्याल से यह बाग भी कुछ वैसा ही है। 

मेरे बेंच के पास गुलाब की एक क्यारी है। हाथ के पास वाले पौधे में पांच-छह गुलाब खिले हुए हैं। इन दिनों सोचते-सोचते कोठी के अन्दर की हवा मानो भाराक्रांत हो उठी थी....यहां अच्छा लगा। मैंने गन्ध लुब्ध हो एक फूल खींचकर अलग पकड़ लिया- पत्ते घास पर झर पड़े। मैं शंकित हो उठा। एक बार देखा-निःशब्द वहां से चले जाने की सोच ही रहा था कि बरामदे से बेयरा ने आवाज दी, "मास्टर साहब मेम साहब आपको बुला रही हैं।" 

(सौदामिनी-विभूतिभूषण मुखोपाध्याय)




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बुधवार, 31 जनवरी 2024

अग्निगर्भ- महाश्वेता देवी

 प्राचीन भारत के आदर्श में तरुण लोगों के लिए जगह नहीं है। सारे स्थान वृद्धों के ही लिए हैं। विरोधी पक्ष 'कॉज के लिए सर्मापत फ़ाख़्ता' छोकरों को ऊपर उठाता है और उन्हें नाम देता है 'तरुण तुर्क' । पार्टी वह भूल नहीं करती। मैदान मैं और मेनीफ़ेस्टो में वे युवकों से डबल जोर से पुकार कर कहते हैं, 'रक्त दो।' किन्तु कार्यकाल में किसी तरह गद्दी नहीं छोड़ते । एक भी नया काडर' तैयार नहीं करते। एक बार जो लीडर बन गया, आज भी वही लीडर है-सिर्फ वामपंथ में ! ब्लडप्रेशर, रक्त में शर्करा, हृद्धाप-सत्र लेकर आज भी वे नक़ली दाँत और लटकती खाल लिये पद संभाले हुए हैं। ब्रूटस की तरह ये ऑनरेबल मेन हैं। 

हज़ारों कार्यकर्ताओं की हालत काली की तरह है। ये सब प्रश्न कलेजे में लिये तमाम लोगों को आउट ऑफ़ लॉयल्टी चुप रहना पड़ता है। पार्टी इमेज को रिइटरेट करके चलना पड़ता है। परिणामस्वरूप पत्नी-पुत्र- परिवार एक छत के नीचे रहते हुए भी दूर हो जाते हैं। होंठों के कोने लटक जाते हैं, चेहरे पर रेखाएँ पड़ जाती हैं, भयंकर रूप से आशाएँ टूट जाती हैं, मन का संताप कलेजे में दवाकर बढ़ते रहना पड़ता है। 

यह प्रक्रिया नाशकारी है। पार्टी के पक्ष में। अच्छा काडर वह मिट्टी है जिस पर पार्टी खड़ी है। काडर के मन में प्रश्न उठते रहते हैं। उस मिट्टी का कटाव होता रहता है। थोड़े-थोड़े कटाव से धरती उर्वरता खोकर नष्ट हो जाती है। निचली मिट्टी में निरंतर मृदा का क्षरण होते रहने से पार्टी में धँसाव नहीं होगा ? 

यह सोचकर ही काली साँतरा का मन बैठ जाता। उसके पहले काली मरना चाहता है। कार्यकर्ता के प्रति पार्टी के अन्यायी मनोभाव के फलस्वरूप खिसकाव होने से पार्टी नहीं रहेगी ? पार्टी नहीं रहेगी ? पार्टी न रहे, ऐसे दिन की बात काली साँतरा सोच नहीं सकता है। पार्टी सदा रहे, तुम रहो। तुम्हारे लिए मैंने अपने को कब का उजाड़ कर दिया है। वह 'सोने का बंगाल श्मशान बन गया' उसी 'जनयुद्ध' अखबार के जमाने से । मैन-मेड फ़ेमिन इन बेंगाल । मैन मेड फ़ेमिन । फ़ेमिन या दुभिक्ष इस तरह का नहीं होता है। 

आदमी आदमी को नहीं समझता, पार्टी मनुष्य की समस्त सत्ता को लील जाती है और बदले में प्रयोजनीय स्नेह और अंडरस्टैंडिग देना भूल जाती है। परिणामस्वरूप मानव मनुष्यों के मन में एक और ही क़िस्म का अकाल तैयार करता है। मिट्टी का कटाव होने से आजकल पौधे बौने रह जाते हैं। (अग्निगर्भ- महाश्वेता देवी)



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शनिवार, 20 जनवरी 2024

नील कुसुम- रामधारी सिंह दिनकर

 पत्थरों में भी कहीं कुछ सुगबुगी है? 

दूब यह चट्टान पर कैसे उगी है? 

ध्वंस पर जैसे मरण की दृष्टि है, 

सृजन में त्यों ही लगी यह सृष्टि है। 

एक कण भी है सजल आशा जहाँ, 

एक अंकुर सिर उठाता है वहाँ। 

मृत्यु का तन आग है, अंगार है;

 जिन्दगी हरियालियों की धार है। 

क्षार में दो बूँद आँसू डाल कर, 

और उसमें बीज कोई पाल कर, 

चूम कर मृत को जिलाती जिन्दगी। 

फूल मरघट में खिलाती जिन्दगी ।. 

निर्झरी बन फूटती पाताल से, 

कोंपलें बन नग्न, रूखी डाल से। 

खोज लेती है सुधा पाषाण में, 

जिन्दगी रुकती नहीं चट्टान में। 

बाल - भर अवकाश होना चाहिए, 

कुछ खुला आकाश होना चाहिये, 

बीज की फिर शक्ति रुकती है कहाँ?  

भाव की अभिव्यक्ति रुकती है कहाँ?

 (नील कुसुम- रामधारी सिंह दिनकर)




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सोमवार, 15 जनवरी 2024

पाकिस्तान मेल- खुशवंत सिंह

 इकबाल ने बर्दाश्त करने की कोशिश की, "आप लोग आजाद होना क्यों नहीं चाहते? आप क्या जिन्दगी भर गुलाम ही बने रहना चाहते हैं?" 

लम्बी चुप्पी के बाद लम्बरदार बोला, "आजादी में जरूर कोई अच्छी बात होगी। पर हमें इससे क्या मिलना-मिलाना है? आप जैसे पढ़े-लिखे लोगों को अंग्रेजोंवाली नौकरियाँ मिल जाएँगी। हमें क्या और जमीनें मिलेंगी? और भैंसें मिलेंगी?"

 "नहीं," मुस्लिम ने कहा, "आजादी तो उन्हीं पढ़े-लिखे लोगों के लिए है जिन्होंने उसके लिए लड़ाई लड़ी। हम तो पहले अंग्रेजों के गुलाम थे, अब पढ़े-लिखे हिन्दुस्तानियों या पाकिस्तानियों के होंगे?"

 इकबाल उनके इस विश्लेषण से काँप उठा।

 "जो आप लोग कहते हैं; वह बिलकुल ठीक है," उसने सहृदयता से हामी भरते हुए कहा, "अगर आप किसान और मजदूर आजादी से कुछ चाहते हैं तो आपको एकजुट होकर लड़ना होगा। कांग्रेसी सरकार के इस बरगद को उखाड़ना होगा। जमींदारों और राजों-रजवाड़ों को मिटाना होगा। तभी आजादी का आप लोगों के लिए कोई मतलब होगा। आपको ज्यादा जमीनें मिलेंगी और पैसे मिलेंगे। और आप पर कोई कर्ज भी नहीं चढ़ेगा।" 

मीत सिंह ने फिर बीच में टोका, "यही तो वह भी कह रहा था। अरे वही...लम्बरदारा! क्या नाम था उसका? कुछ कामरेड...! बाबू साहब। आप भी क्या कामरेड हो?"

 "नहीं।" 

"चलो अच्छा हुआ। वह कामरेड तो भगवान में भी विश्वास नहीं करता था। कह रहा था कि अगर उसकी पार्टी की सरकार बनी तो वे तरन-तारन के पवित्र तालाब को खाली करके इसमें धान बोएँगे। कहता था, उससे ज्यादा फायदा होगा।"

 "यह सब फालतू की बकवास है।" इकबाल ने कहा और मन-ही-मन सोचा कि काश मीत सिंह को उस कामरेड का नाम याद होता। उसकी तो हेड-क्वार्टर में रिपोर्ट करके सबक सिखाना चाहिए था। प्रत्यक्ष में वह उनसे बोला, "अगर हमें ऊपरवाले में विश्वास न हो तो हममें और पशुओं में फर्क ही क्या?" 

मुस्लिम ने गम्भीर होते हुए कहा, "धार्मिक आदमी की तो सारी दुनिया कद्र करती है। गांधी को देखो! मैंने सुना है कि वह अपने वेदशास्त्रों' के साथ-साथ कुरान और अंजील भी पढ़ते हैं। दुनिया के चारों कोने में उनकी धूम मची है। गांधी की प्रार्थना सभा की एक फोटो मैंने अखबार में देखी थी। उसमें बहुत सारे अंग्रेज आदमी और औरतें भी पालथी मारकर बैठे थे। एक अंग्रेज़ लड़की आँखें बन्द किए बैठी थी। कहते हैं वह बड़े लाट साहब की बेटी है। मीत सिंह! देखा तुमने, अंग्रेज तक धार्मिक आदमी की कद्र करते हैं।" 

"हाँ, चचा! आपकी बात सोलह आने सच है," मीत सिंह ने अपनी तोंद पर हाथ फेरते हुए हामी भरी।

 इकबाल को गुस्सा चढ़ने लगा था, "उनकी तो नस्ल ही चार सौ बीसों की है," उसने जोर देकर कहा, "उनकी बात पर भरोसा मत करो!" 

एक बार फिर उसने महसूस किया कि उसका तीर खाली गया। लेकिन फिर भी सच्ची बात यही थी कि वह न तो कभी लॉर्ड साहब की बेटी का प्रेस-फोटोग्राफरों के फायदे के लिए आँखें बन्द किए पालथी मारकर प्रार्थना-सभा में बैठना सह पाया था, न ही हिन्दुस्तानी बोलनेवाले, किंग जॉर्ज के भतीजे, स्वयं बड़े लॉर्ड साहब का हिन्दुस्तान के प्रति मिशनरियों का-सा प्रेमभाव। उसने कहा- 

"मैं उनके मुल्क में कई बार रहकर आया हूँ। इसमें कोई शक नहीं कि वे इनसान बहुत अच्छे हैं, लेकिन राजनीतिक नजरिए से देखा जाए तो वे दुनिया के सबसे बड़े चार सौ बीस हैं। अगर वे ऐसे ही ईमानदार होते तो दुनिया के कोने-कोने में उनका राज न फैला होता।" इकबाल ने उन्हें समझाते हुए कहा। फिर सोचा कि अब बात बदलनी चाहिए, "खैर, उन सब बातों का अभी कोई तुक नहीं। सोचने की बात तो यह है कि अब क्या होना चाहिए।" 

लम्बरदार ने भी जरा तुर्शी से जवाब दिया, "हम जानते हैं, अब क्या हो रहा है, मुल्क में तबाही की हवाएँ चल रही हैं। चारों तरफ एक ही शोर है-मारो, मारो! बस जिन्हें कोई आजादी है तो वे हैं-चोर, डाकू और गलाकाटू लोग।" फिर तनिक हौले से बोला, "हम तो अंग्रेजों के नीचे ही भले थे। कम-से-कम कोई हिफाजत तो थी जान-माल की।" (पाकिस्तान मेल- खुशवंत सिंह)




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शुक्रवार, 29 दिसंबर 2023

बिन्दो का लड़का- शरतचन्द्र

 "बिन्दो समझ गई कि उसी का गिला हो रहा था। सामने आकर वह बोली, 'अरे कहो न, रुक क्यों गई?' 

डर के मारे जैसे कदम की जीभ लटपटा गई। वह बोली, 'नहीं बहू, यह समझो कि-बड़ी जीजी ने कहा था सो मैंने कहा-क्या नाम से-कि-कि।' 

'सब जानती हूँ। चल भाई तू! जाकर अपना काम देख!' कदम तो जान छुड़ाकर भागी। तब बिन्दो ने अन्नपूर्णा को लक्ष्य करके व्यंग्य किया, 'मालकिन के सलाहकार भी खूब हैं। जेठ जी से कहकर इनकी तनख्वाह की तरक्की करा देनी चाहिए।' 

बिन्दो प्रसन्न रहती है तो अन्नपूर्णा को जीजी कहती है और नाराज होने पर, मालकिन। 

अन्नपूर्णा भी कुढ़ गई। बोली, 'जा-जा कह दे। तेरे जेठ जी मेरा सिर कटवा देंगे न।

तेरे जेठ जी भी कम नहीं हैं। देखते ही शुरू हो जाएंगे-'क्या है बहूरानी, ठीक कहती हो, ठीक बात है।' मैंने भी तेरी जैसी तकदीर वाली कभी नहीं देखी। क्या भाग्य है, छोटी होकर घर पर राज करती है।' 

अन्नपूर्णा की बात पर बिन्दो को हंसी आ गई बोली, लेकिन तुम कहां डरती हो?'

 'तेरी रणचण्डी की मूर्ति देखकर किसकी छाती का खून पानी न हो जाय। पर इतना गुस्सेल मिजाज अच्छा नहीं बहू। और अब तू कोई बच्ची नहीं। अगर बच्चे होते तो चार-पांच की मां होती। लेकिन तेरा भला क्या दोष! दोष तो उस बूढ़े का है जो तुम्हें लाड़-प्यार करके बिगाड़ दिया है।' 

'तकदीर लेकर तो जरूर पैदा हुई हूं जीजी। धन, दौलत, लाड़, प्यार तो बहुतों को मिलता है, इसमें कुछ खास नहीं। लेकिन ऐसा देवता-सा जेठ पाना तो कई-कई जन्म की तपस्या का ही फल है। मेरे भाग्य से डाह मत करो जीजी। मगर उनके लाड़ ने मेरा सिर नहीं फिराया। तुम्हारे लाड़ ने मेरा सिर फिराया है। समझीं।" (बिन्दो का लड़का- शरतचन्द्र)




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बुधवार, 20 दिसंबर 2023

युवाओं के सामाजिक सरोकार

 आजकल के नौजवानों का क्या? उन्हें तो मोटी सेलरी वाली अच्छी नौकरी मिल जाए, रोज-रोज होटल का खाना, ब्रैंडेड कपडे, महंगा मोबाइल, टैब-शैब, महंगी कार, बिना मतलब वाली कानफाडू म्यूजिक, डांस, पार्टी-शार्टी.. बस! जिंदगी का कुल मतलब उनके लिए यहीं तक सीमित रह गया है। देश-दुनिया में क्या हो रहा है और उसमें उनका क्या फर्ज बनता है, इससे तो उनका कोई मतलब ही नहीं है..  दो-तीन साल पहले तक अधिकतर बुजुर्गो की युवाओं के बारे में यही राय थी। वे मानते थे कि आज का युवा न तो अपने रीति-रिवाज और परंपराओं की कोई समझ रखता है, न इतिहास और अपने महानायकों को जानता है और न आसपास के परिवेश से ही उसका कोई मतलब है। लेकिन, इधर यह सोच बदली है। आज अगर कोई बुजुर्ग ऐसा कुछ कहे तो उसके हमउम्र साथी ही उसे टोकते हैं.

ऐसा नहीं है भाई! आज के बच्चे हमारी पीढी से बहुत तेज हैं। वे समाज में लगातार सक्रिय केवल दिखते ही नहीं हैं, लेकिन खयाल हर बात का रखते हैं। देश और समाज से लेकर इतिहास-भूगोल और अर्थव्यवस्था तक सब उनकी चिंता के विषय हैं। कभी फेसबुक-ट्विटर पर देखा है, कैसे कमेंट्स होते हैं आज की व्यवस्था पर इन लोगों के। कुछ तो एकदम नौजवान लडके-लडकियां ऐसी बातें करते हैं, जो हमें दंग कर देती हैं। ऐसे कमेंट्स बिना चिंता किए नहीं निकलते। लेकिन, एक बात हमेशा ध्यान रखने की है। वह यह कि उनका समय हमारे समय से बहुत कठिन है। उनकी मुश्किलों पर गौर करें तो आपकी सारी शिकायतें दूर हो जाएंगी.

इसके पहले कि हम नई पीढी के सरोकारों की बात करें, इस बात पर गौर करना जरूरी होगा कि वह किन हालात में जिंदगी जी रही है। अगर आप 80-90 की कस्बाई जीवनशैली की कसौटी पर रख कर आज के युवाओं के सरोकारों का विश्लेषण करना चाहें तो शायद उसके साथ कभी न्याय नहीं हो सकेगा। न तो अब कहीं 10-5 बजे वाली नौकरियां रह गई हैं, न होलसेलर से सामान लेकर ग्राहक को बेच देने तक सीमित व्यापार और न पहले जैसी परंपरागत खेती ही। कडी प्रतिस्पर्धा के इस दौर में सब कुछ बदल चुका है। हर क्षेत्र में हर स्तर पर नए प्रयोगों की भरमार है और बडी मेहनत से निकाले गए प्रयोग भी नए और कारगर साबित हो पाएंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। 

 स्थितियों के आकलन का अगर कोई पैमाना होता और उस पर देखा जा सकता तो शायद यह पाया जाता कि आज के युवा की जिंदगी पहले की तुलना में कई गुना च्यादा कठिन हो गई है। यह सही है कि सुविधाएं बढी हैं, लेकिन जितनी तेजी से सुविधाएं बढी हैं, हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और भविष्य के प्रति असुरक्षा की भावना उससे कहीं च्यादा तेजी से बढी है। इसमें अपने को टिकाए रखने के लिए सिर्फ दिमाग का तेज रहना और कडी मेहनत ही पर्याप्त नहीं, खुद को अपने और दूसरे क्षेत्रों की नवीनतम गतिविधियों से लगातार अपडेट भी रखना पडता है। यह एक ऐसी आवश्यकता है, जिसके लिए आज का युवा लगातार कुछ नया जानने, सीखने और पढने में लगा रहता है। लगातार दिखता अपना लक्ष्य उसे दफ्तर और घर में अंतर नहीं करने देता। इसके अलावा खुद को एकरसता या ऊब से बचाने और तरोताजा बनाए रखने के लिए मनोरंजन की खुराकभी जरूरी ही है। 

 सार्थक हस्तक्षेप का जोश  इन हालात में भी हम विभिन्न सोशल नेटव‌र्क्स से लेकर ब्लॉग और आंदोलनों तक में युवाओं की सक्रिय हिस्सेदारी देखते हैं। यह सही है कि वे महत्वाकांक्षी हैं और जिंदगी से हमेशा कुछ अधिक चाहते रहते हैं और यह कोई अपराध नहीं है। ऐसी कोई पीढी नहीं हुई है, जिसने अपने जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश न की हो। यही वे भी कर रहे हैं। लेकिन, इसी क्रम में वे अपना सारा कामकाज छोडकर उन सामाजिक आंदोलनों में हिस्सेदारी भी निभाते हैं, जिनसे उनका और देश का सीधा जुडाव है। किसी की मदद से भी वे पीछे नहीं हटते हैं। शर्त यह है कि उसका औचित्य उनकी समझ में आए। हवा-हवाई नारों और झूठमूठ के वादों में वे विश्वास नहीं करते। आज का युवा जिस चीज से सबसे च्यादा परेशान है, वह सरकारी महकमों में व्याप्त भ्रष्टाचार है। इसके लिए वह एक स्थायी समाधान चाहता है। काले धन को बाहर लाने या जन लोकपाल की मांग को लेकर हुए आंदोलनों में न केवल दिल्ली, बल्कि देश भर के युवाओं ने अपने निजी नुकसान की शर्त पर भी हिस्सेदारी की। ठीक ऐसी ही बेताबी निर्भया के साथ हुई दरिंदगी के समय भी देखी गई।

  काले धन और जन लोकपाल वाले मसले तो सामाजिक-राजनीतिक संगठनों की ओर से उठाए गए थे, लेकिन निर्भया के मसले पर तो किसी संगठन की ओर से कोई आह्वान तक नहीं किया गया और फिर भी इंडिया गेट के आसपास का पूरा क्षेत्र घेर लिया गया। आसपास के इलाकों में मेट्रो रेल रोक देने और प्रवेश वर्जित कर देने के बाद भी कई दिनों तक धरना चलता रहा। यह विरोध प्रदर्शन करने वाले सारे युवा ही थे। इनमें कॉलेजों के छात्र-छात्राओं से लेकर नए प्रोफेशनल्स तक शामिल थे। वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठीचार्ज सब झेलकर भी वे डटे रहे। इन सभी मामलों में लडकियों की शिरकत भी लडकों से कुछ कम नहीं थी। क्या अपने समय के समाज से जुडे होने और उसमें सार्थक हस्तक्षेप की अपनी भूमिका सुनिश्चित करने का इससे बडा कोई और प्रमाण चाहिए?

कर्तव्यों का बोध  ऐसा भी नहीं है कि युवाओं का यह जोश केवल विरोध प्रदर्शन और उनकी चेतना केवल अपने अधिकारों तक ही सीमित है। यह पीढी अपने कर्तव्यों और दायित्वों के प्रति भी कम जागरूक नहीं है। विभिन्न सामाजिक आयोजनों में आप उसे हर स्तर पर सहयोग करते देख सकते हैं। ऐसे युवाओं की कमी नहीं है जो अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद गरीब ब"ाों को पढाने, युवाओं को रोजगार की तरकीबें सिखाने, सामाजिक-धार्मिक आयोजनों की व्यवस्था बनाने के लिए समय निकालते हैं। वहां भी वे अपनी जिम्मेदारी पूरी लगन के साथ निभाते हैं। पिछले दो बार से चुनावों में हम मतदान का प्रतिशत अप्रत्याशित रूप से बढते देख रहे हैं और साथ ही युवा मतदाताओं की संख्या भी। इस बार लोकसभा चुनावों में जो 10 करोड नए मतदाता जुडे हैं, उनमें 2.31 करोड 18-19 वर्ष आयु वर्ग के हैं और कमोबेश सभी राजनीतिक पार्टियों की कोशिश इन्हें लुभाने की है। निश्चित रूप से यह उनकी क्षमताओं और जागरूकता को देखते हुए ही हो रहा है। पार्टियां यह भी जानती हैं कि यह युवा वोटर जाति-धर्म जैसे आभासी मुद्दों पर आकर्षित होने वाला नहीं है। वह खोखले आदर्शो और आधार विहीन योजनाओं में यकीन नहीं करता। उसे अपने और देश के विकास के लिए ठोस कार्ययोजना चाहिए। शायद यही वजह है कि हर स्तर पर व्यापक बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। 

 अपनी संस्कृति का मोह  जिन युवाओं को हम अपनी संस्कृति से टूटा हुआ समझते हैं, उन्हीं में से कई अपने प्राचीन साहित्य और संस्कृति में नए अर्थ की तलाश में लगे हैं। इनमें से कई तो रोजगार के लिए अपना देश छोडकर अमेरिका, यूरोप और दूसरे देशों में रह रहे हैं। दूसरे देशों में रहते हुए भी अपनी संस्कृति से उनका जुडाव देखना चाहते हैं तो कभी ब्लॉग की दुनिया का रुख करें। आप पाएंगे कि नई पीढी में सॉफ्टवेयर, इंजीनियरिंग, चिकित्सा विज्ञान और अकाउंटेंसी जैसी साहित्येतर विधाओं से जुडे कई लोग अपनी संस्कृति को दुनिया की संस्कृति के सामने रखकर देखने की कोशिश में लगे हैं और ऐसा करते हुए वे किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं हैं। वे न तो अपने को किसी से बेहतर मानते हैं और न ही कमतर। बल्कि इस तरह वे अपनी संस्कृति में नई संभावनाएं तलाश रहे हैं और इस क्रम में संगीत, नृत्य, साहित्य, पुरातत्व और धर्मशास्त्र सब खंगाल रहे हैं।  

इन चीजों को लेकर उनकी सोच पहले की तरह केवल मिशनरी नहीं, बल्कि प्रोफेशनल है। वे देख रहे हैं कि संस्कृति केवल अपनी पहचान जताने ही नहीं, बल्कि पर्यटन का एक महत्वपूर्ण तत्व भी है और पर्यटन दुनिया के सबसे बडे उद्योगों में से एक है। भारत में इसके लिए प्रचुर संभावनाएं हैं और यह हमारे लिए केवल आय का जरिया ही नहीं बनेगा, विश्व समुदाय में इसे नई प्रतिष्ठा भी दिला सकता है। यह अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति नई पीढी की जागरूकता का प्रमाण है।

हताशा भी कम नहीं  हालांकि उसे तब घोर हताशा होती है, जब वह देखता है कि हमारे यहां बदलाव की प्रक्रिया बहुत धीमी है। अपनी संस्कृति की महानता की दुहाई देते न थकने वाले कुछ लोग यत्र नार्यस्तु पूच्यंते रमंते तत्र देवता का हवाला जरूर देते हैं, लेकिन उन्हीं लोगों को दहेज के लिए अपने घर की बहू को जला देने में कोई पछतावा नहीं होता। दहेज या मायके की हैसियत को लेकर उन पर व्यंग्य करने में भी उन्हें कोई संकोच नहीं होता। वहशीपने का आलम यह है कि अबोध ब"िायां तक सामूहिक दुष्कर्म की शिकार हो जा रही हैं। सिस्टम ऐसा कि जिसमें कहीं किसी बात की सुनवाई हो जाए, यही बहुत है। यह स्थिति उनमें आक्रोश भरती है और उन्हें हताश करती है। बेशक, इन्हीं चीजों को लेकर कभी-कभी वह अराजक होती दिखती है, लेकिन उसका जोर अपने सिस्टम को दुरुस्त करने पर है, न कि उसे बिगाडने या बदले की कार्रवाई पर। 

 वह अपनी हताशा को छिपाने की चालाक कोशिश नहीं करता। अगर उसे उम्मीद की कोई किरण दिखती है और उस पर उसका भरोसा बन पाता है, तो उसे अपनी बाकी व्यस्तताएं छोडकर उसके साथ हो लेने में कोई दिक्कत महसूस नहीं होती और अगर उसे लगता है कि वह इसमें छला गया तो उसे उससे अलग होते भी देर नहीं लगती। व्यक्ति की पहचान के मामले में अपनी गलती स्वीकार करने में उसे कमतरी का एहसास नहीं होता। हाल के आंदोलनों में उसकी शिरकत और फिर मोहभंग इसके बडे उदाहरण हैं। इसकी वजह यही है कि वह किसी प्रयास से सिर्फ विचार के नाम पर नहीं, बल्कि ठोस परिणाम के लिए जुडता है।  

सूचनाक्रांति का असर  पिछले दो दशकों में सूचना तकनीक की दुनिया में जो क्रांति आई है, उसने जीवनशैली ही नहीं, जीवन से आम आदमी की अपेक्षाएं भी बदल दी हैं। अब उसे किसी दूसरे देश की व्यवस्था जानने के लिए ग्रंथालयों की दौड लगाने और किताबों के पन्ने पलटने की जरूरत नहीं होती। एक क्लिक पर दुनिया भर की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थाएं और इतिहास-भूगोल सब उसके सामने होता है। पहले जिन जगहों और तकनीकों को केवल सफेद-काले चित्र देखकर समझना पडता था, अब टीवी पर उनका लाइव शो होता है। किसी कारण से आप उसे न भी देख सकें तो रिकॉर्डिग से लेकर यूटयूब तक कई दूसरे उपाय भी मौजूद हैं। इस क्रांति के चलते सूचनाओं की प्राप्ति ही नहीं, उनकी साझेदारी और अभिव्यक्ति में भी विस्फोट जैसी स्थिति बनी है। मन में जो कुछ चल रहा है, वह दुनिया को बताने के लिए उन्हें बहुत इंतजार करने की जरूरत नहीं होती। वे किसी भी सोशल नेटवर्क पर प्रोफाइल बनाते हैं और अपने सुख-दुख से लेकर विभिन्न मसलों पर विचार तक सब सीधे सबके सामने।

नए भारत की ओर  विभिन्न माध्यमों पर आ रहे उसके विचार यह स्पष्ट करते हैं कि वह पहले की तरह डरा हुआ नहीं है और न संकोची ही। उसने आजाद देश की हवा में सांस ली है और आजादी के मूल्य को वह समझता है। वह इसे बनाए रखना चाहता है और इसीलिए व्यवस्था में सुधार को अनिवार्य मानता है। वह अभिव्यक्ति की आजादी की अहमियत, अर्थ और उसकी सीमाएं भी जानता है। वह संकोच में कुछ भी मान नहीं लेता, तर्क करता है और ठोस सुबूतों के साथ ठोस कार्ययोजना चाहता है। बेहतर होगा कि इस तर्कशीलता को अशिष्टता के रूप में न देखें।  

वह हर चीज को अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार ही आंकने की कोशिश करता है। आत्मविश्वास से लबरेज आज के युवा के इस तेवर और नए तरह के उसके संस्कार को समझने के लिए बडों को भी थोडे धैर्य और नई समझ का परिचय देना होगा। अगर उसे सहानुभूतिपूर्वक समझा जाए और उसके लिए उसके स्पेस का सम्मान करते हुए उसे नई दिशा दी जाए तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि आने वाले दिनों में हम एक नए भारत के नागरिक होंगे, जिसका दुनिया भर में अपना अलग और बेहद सम्मानजनक स्थान होगा।

अमीर देश का युवा  इम्तियाज अली  

20 साल पहले का युवक ज्यादा पाखंडी था। आज के युवकों का सोसायटी से कंसर्न है। वह अपनी बातें खुलकर कहने लगा है। उसे किसी से मॉरल सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। यह कहना सही नहीं होगा कि आज के युवक मोटी सेलरी और बडी नौकरी के पीछे भाग रहे हैं। गौर करें तो वे अपने मन की नौकरी करना चाहते हैं और उसके लिए अच्छे पैसे पा रहे हैं। सच कहूं तो आज का युवक अमीर देश का नागरिक है। वह 20 साल पहले के युवकों की गरीब सोच से आगे निकल चुका है। ऊपरी तौर पर उसमें तडप कम है, क्योंकि उसका पेट भरा हुआ है। मुझे लगता है कि आज के युवकों के पास रोल मॉडल की कोई कमी नहीं है। पारंपरिक सोच में हम कुछ नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को ही रोल मॉडल मानते हैं। आज एक फिल्म स्टार, क्रिकेटर, बैंकर, नॉवेलिस्ट, एनजीओ कार्यकर्ता आदि रोल मॉडल हो सकते हैं। समकालीन युवकों को समझने के लिए हमें अपनी पुरानी सोच बदलनी पडेगी। 

अब इस नजरिये से देखें तो रोल मॉडल के लिए इंदिरा गांधी या अमिताभ बच्चन तक सीमित रहने की जरूरत नहीं है। यह भी जरूरी नहीं है कि भारतीय युवक का रोल मॉडल कोई भारतीय ही हो। मैं अपनी बेटी की बात बताऊं। उसे सुपरवुमन नाम की एक गायिका बहुत पसंद है। वह उसकी फैन है। उसका ऑटोग्राफ लेकर आई है। उसकी इस पसंद पर मैं चौंका, लेकिन आप कोई सवाल नहीं कर सकते। वह एक यूट्यूबर है। अपने गाने बनाती है और यूट्यूब पर डालती है। उसका वास्तविक नाम लीली है। अन्ना आंदोलन हो या निर्भया दुष्कर्म कांड.. ऐसी घटनाओं पर युवकों के सडक पर उतर आने को मैं बहुत सही नहीं मानता। इसे आप उनकी आजादी का प्रदर्शन कह सकते हैं। हो सकता है गुस्सा और विरोध भी हो। कई बार मुझे लगता है कि यह हडबडी में लिया गया फैसला होता है। वे अभियान या आंदोलन को शुरू तो कर देते हैं, लेकिन उसे किसी अंजाम तक नहीं पहुंचा पाते। सडकों पर आ जाना ही निदान या समाधान नहीं है।

कोई रोल मॉडल ही नहीं  सलिल भट्ट, शास्त्रीय संगीतज्ञ 

 आज के युवा की स्थिति दो दशक पहले जैसी नहीं रह गई है। सूचना का जो विस्फोट हुआ है, उसने सब कुछ बदल दिया है। इसने हमें निजी और सामाजिक दोनों ही स्तरों पर बदला है। कुछ मामलों में वह समाज से कटा है तो कुछ में जुडा भी है। आम तौर पर देखने में ऐसा लगता है कि वह अपने तक ही सिमट कर रह गया है, लेकिन पिछले दो-तीन वर्षो में ऐसा बहुत कुछ हुआ है जिससे समाज से उसके सरोकार बहुत मुखर रूप में सामने आए हैं। इससे जाहिर होता है कि वह समाज से कटा नहीं है। हां, यह जरूर है कि बेमतलब के झंझटों में वह नहीं पडना चाहता। इसकी एक वजह तो यह है कि उसके पास समय का बहुत अभाव है। कठिन प्रतिस्पर्धा के इस दौर में उसे सबसे पहले समाज में अपनी स्थिति सुनिश्चित करनी है, जो दिन-ब-दिन बहुत मुश्किल होती जा रही है। इसी हाल में वह यह भी देख रहा है कि उसके सामने कोई भरोसे लायक रोल मॉडल ही नहीं है। लोग आते तो हैं समाज का भला करने के नाम पर और फिर जुट जाते हैं केवल अपना, अपने परिवार और रिश्तेदारों का भला करने में। ऊपर से वह मनोरंजन के सस्ते साधनों से जकडा हुआ है। यह सही है कि आज सूचना और मनोरंजन के लिए बहुत सारे साधन हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर अपरिपक्व और सतही किस्म के हैं। जो अच्छे और गुणवत्तापूर्ण साधन हैं, उन तक अभी भी कम लोगों की पहुंच है। इसे सर्वसुलभ बनाया जाना चाहिए। हमारे देश की युवा ऊर्जा अपने समग्र रूप में एक सही दिशा पाए, इसके लिए सामूहिक प्रयास होना चाहिए।  

समय का अभाव  सुदीप नागरकर, लेखक  

आज के युवा के पास खुद के लिए ही समय नहीं है। प्रतिस्पर्धा और महंगाई इतनी बढ गई है कि उसके लिए कोई विकल्प ही नहीं बचा। ऐसी स्थिति में वह समाज के लिए समय निकाले कैसे? फिर भी हम यह देखते हैं कि व्यस्तता और आपाधापी के इस दौर में भी वह बडे-बडे आंदोलनों में शामिल होता है। स्वत: स्फूर्त ढंग से बडे आंदोलन खडे कर देता है। जाहिर है, वह सब कुछ करने के लिए तैयार है। बस जरूरत इस बात की है कि कोई बात उसके मन को छुए और नेतृत्व पर उसका भरोसा बने। इसका आप पूरा असर सोशल नेटवर्किग पर देख सकते हैं। मुझे तो लगता है कि अगले लोकसभा चुनाव में भी फेसबुक-ट्विटर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहने वाली है। लेकिन आज का युवा अगर अपने आसपास के मामलों में रुचि लेता दिखाई नहीं देता तो इसमें कई बार हमारे कानून भी कारण होते हैं। मसलन किसी दुर्घटना के शिकार व्यक्ति को अस्पताल तक न पहुंचाने में वह संकोच करता है। इसका एक ही कारण है और वह है पुलिस की बेमतलब पूछताछ। 

अगर पुलिस इस सोच से उबर सके तो इन स्तरों पर भी वह सक्रिय दिखाई देगा।  यह संक्रमण का समय है संदीप नाथ, गीतकार भारत को आजाद हुए छह दशक से ज्यादा बीत गए। आज का युवा आजादी के बाद की चौथी पीढी है। इस पीढी ने वह कष्ट नहीं देखा जो हमारे पूर्वजों ने देखा और थोडा हमने भी महसूस किया। हमारा समय भी संक्रमण का समय है। एक सदी छोडकर दूसरी में आए ही हैं। बाजारवाद का जो सरकारीकरण 91 में शुरू हुआ था, वह शुरुआत में बहुत अच्छा लगा। लोगों को ऐसा लगा कि शायद अब योग्यता और क्षमता की कद्र होगी। कुछ दिनों तक ऐसा रहा भी। लेकिन जल्दी ही यह भ्रम टूट गया। इससे उसके भीतर आक्रोश पैदा हुआ। इसके साथ ही एक नए बदलाव के लिए बेचैनी शुरू हो गई। यह सही है कि आज के युवा को अच्छा खाना-पहनना अच्छा लगता है। लेकिन, इसका यह मतलब नहीं कि उसके लिए जीवन का कुल अर्थ यहीं तक सीमित है। वह समाज के सुख-दुख से भी वह उतना ही जुडा है, जितना कि अपनी निजी चाहतों से।

 वह भौतिकवादी भी है और आध्यात्मिक भी। लेकिन पहले की तरह समाज में सिर्फ औपचारिकताएं निभाने के लिए वह समय नहीं निकाल सकता। उसके पास अपने लिए ही समय नहीं है तो वह समाज के लिए कहां से निकाले। लेकिन जहां वास्तविक जरूरत होती है, वहां वह किसी भी कीमत पर हाजिर होता है। अपने बडे नुकसान करके भी। छोटी-छोटी बातों पर लडना उसके लिए संभव नहीं है। आज उसकी कोई प्रासंगिकता भी नहीं है। वह चाहता है सिस्टम में बदलाव लाना और सिस्टम के ख्िालाफ अपनी आवाज बुलंद करने का उसके पास बहुत बडा माध्यम आज उसका वोट है। रही बात कुछ आत्मकेंद्रित और पलायनवादी लोगों की, तो ऐसे लोग किस समय नहीं थे? आजादी के पहले भी कुछ लोग सर और रॉय बनने की होड में लगे रहते थे और कुछ लोग सिर कटाने को बेताब थे। ये दोनों तरह के लोग हमेशा थे और हमेशा रहेंगे।

छिप जाती हैं अच्छाइयां महेश भट्ट  

मैं कुछ उदाहरणों से अपनी बात रखना चाहूंगा। अंतरराष्ट्रीय सम्मान जीतने वाली सारांश में अनुपम खेर ने रिटायर्ड अध्यापक का किरदार निभाया था, जो अपनी पेइंग गेस्ट की सहायता करना कर्तव्य समझता है। सत्ता के मद में डूबे राजनेता से लडाई मोल लेता है। इससे उनके उदास दिल को शांति मिलती है और उन्हें जिंदगी का मकसद मिलता है। फि ल्म डैडी, जिससे मेरी बेटी पूजा ने करियर शुरू किया था, इसमें एक सत्रह वर्षीय युवती की उन मुश्किलों को संवेदनशील तरीके से दिखाया गया था, जो अपने शराबी पिता को संभालने की जिम्मेदारी उठाती है। अनुपम खेर ने इसमें पिता का किरदार निभाया था। फिल्म इतनी असरदार थी कि आज भी ऐसे कई लोग मिल जाते हैं, जिन्होंने फिल्म देखने के बाद शराब से तौबा कर ली। कन्या भ्रूण हत्या पर बनी फिल्म तमन्ना पूजा द्वारा निर्मित पहली फिल्म थी। इसने सामाजिक समस्या पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था। 

 रमजान के महीने में मुंबई के गटर से एक हिजडा नन्ही मासूम बच्ची को उठा कर घर लाता है, उसे पालता है। जिम्मेदारी लेने का यह संदेश मेरी ज्यादातर फिल्मों की जान है। इन सभी फिल्मों को दर्शकों की अच्छी प्रतिक्रिया मिली। मतलब यह कि दर्शक, खासकर आज के युवा उन फिल्मों में उठाए गए विषयों से कोरिलेट करते हैं। एमएनसी में काम करने के साथ-साथ समाज को वापस देने की प्रवृत्ति भी उसमें है। उसे पता है कि सामाजिक जिम्मेदारी निभाना मानव प्रगति की ऊर्जा है। इसे भुलाते ही हम विफल हो जाएंगे और बिखर भी जाएंगे। बल्कि वह तो आक्रामक है। सभी कुरीतियों को जड से उखाड फेंकना चाहता है। यह अलग बात है कि उसकी जश्न मनाने की प्रवृत्ति की ओट में उसकी अच्छाइयां, समझदारी और परिपक्वता छिप जाती है।

आक्रामक हैं युवा  विद्या बालन  

आज के युवा वर्क लाइक ए कुली, लिव लाइक ए किंग में यकीन रखते हैं। वे जीतोड मेहनत कर खुद अपनी, परिवार, समाज और राष्ट्र की तरक्की में अहम भूमिका निभाना चाहते हैं। निर्भया केस हो या अन्ना आंदोलन वे अपनी समझ और होशो हवास में गुनहगारों पर बिना किसी लाग-लपेट के कार्रवाई की मांग करते हैं। वे तकनीकी विवरणों में नहीं जाते। सरल शब्दों में सीधी बात करते हैं और सीधे शब्दों में ठोस कार्रवाई की मांग करते हैं। पर साथ ही जीवन का जश्न मनाने में भी कोई कोताही नहीं बरतना चाहते। वे काम और मौज-मस्ती दोनों ही एक्स्ट्रीम लेवेल पर करते हैं। आज ऐसे ही आक्रामक युवाओं की दरकार हर देश को है, वरना कडी प्रतिस्पर्धा के दौर में वह पीछे छूट जाएगा।

इंटरव्यू : मुंबई से अजय ब्रह्मात्मज, अमित, दुर्गेश और दिल्ली से इष्ट देव।  

इष्ट देव सांकृत्यायन साभार- जागरण  


समाज की बात Samaj Ki Baat 

कृष्णधर शर्मा Krishnadhar Sharma


बुधवार, 15 नवंबर 2023

स्थानांतरण

स्थानांतरण मात्र स्थानांतरण नहीं होता है

वह तो होता है एक तरह का विस्थापन

सालों की जमी-जमाई गृहस्थी को

एक झटके में समेट कर अचानक से

चल देना होता है एक नई जगह के लिए

बिना कुछ सोचे-समझे देखे-भाले

अपनी जान-पहचान अपना कमाया सम्मान

सब वहीँ छोड़ कर बढ़ जाना होता है

एक अनजान दिशा में

जहाँ पर होता है सब कुछ नया-नया

अपरिचित, अनजान सा

जहाँ पर शुरू करना पड़ता है

सब कुछ शुरू से, नए सिरे से

जहाँ बनाने पड़ते हैं सारे रिश्ते नए

चाहे वह पड़ोसी हों या दूधवाला

या फिर सब्जी बेचनेवाला ही हो

मिटानी पड़ती हैं कुछ पुरानी यादें

नए रिश्तों को जगह देने के लिए...

            कृष्णधर शर्मा  15.11.23

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Samajkibaat समाज की बात 

शनिवार, 4 नवंबर 2023

खाली जगह- गीतांजलि श्री

 कुछ टुकड़े, बाक़ी राख । कैफ़े के पंखें यों नरम पिघले लचके ज्यों नृत्यांगना की मुद्राएँ। बर्तन झाड़न यों लटके कतार में और बोतलें भी, जैसे काली अदाकारियों की नुमाइश । पूरा कैफ़े किसी कलाकार का स्याह सपना । टुकड़े टुकड़े। एब्स्ट्रेक्ट आर्ट । टुकड़े टुकड़े। जो कुर्सियाँ हो सकती थीं, मेज़, इडली, साम्भर, गुलाबजामुन, पाव भाजी, अब काले और चूर चूर । टुकड़े, जो लोग हो सकते थे, लड़के और लड़कियाँ, युनिवर्सिटी की इमारत में घुसने के पहले। टुकड़े, जो उन्नीस जन जुड़ते अगर जोड़ना आता तोड़नेवाले को। अगर होता वह ब्रह्मा विष्णु महेश सब !

 उन्नीस लोग। जिनकी पहचान होनी थी। टुटहे फुटहे टुकड़े जिनकी पहचान बाक़ी थी। पहचान में डालना ही टुकड़े में तोड़ना है। यहाँ कोशिश हो रही थी टुकड़ों को पहचानने की ! 

और एक मैं, साबुत टुकड़ा, जिसे चींटियाँ गोद रही थीं या गोद में लिये थीं ! उन्नीस जन के टुकड़े और तीन बरस का टुकड़ा जो किसी का भी हो सकता था, बम का भी, या बम ही, या दानव, या देव, जो आता है अभी भी रातों में खुरच खुरच चींटियों को लेकर कि मुझ पर पड़ी नींद का कवच उतार दें खुरच खुरच और फिर वही तीन बरस का पड़ा हो ख़ाली जगह में और फिर वही भकभक लपटें उससे दूर मगर एकदम पास उछलें और फिर वही अट्ठारह बरस के टुकड़े टुकड़े अँधेरे में भर जाएँ जिनके बीच से फिर सब गिरता ही गया गिरता ही गया और है किसी का दिल जो धड़के जा रहा है विस्फोट के पहले और है उसी की नींद जो उतर गई है खुरच खुरच और पूरी लम्बी रात है जिसे पार करना है किसी तरह किसी न किसी तरह ... | मेरे पूरे बदन पर लाल लाल रैश फट पड़ता है। (खाली जगह- गीतांजलि श्री)




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Samajkibaat समाज की बात


शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

हमारी बिसात ही फिर क्या

 

गिर जाते हैं भरभरा कर एक झटके में पुल बड़े-बड़े

नींव भी तो नहीं है हमारी बिसात ही फिर क्या

                         कृष्णधर शर्मा 02.11.23