नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

जीवन के चौराहे पर

अजीब सी अनुभूति होती है
कभी कभी जिन्दगी में
जब हम खुद को
चौराहे पर खड़ा पाते हैं
इधर जायें या जायें उधर
कुछ समझ नहीं पाते हैं
चुन तो लेते हैं राह कोई
पर सही है या गलत
यह तय नहीं कर पाते हैं
कर तो लेते हैं
जल्दबाजी में कोई फैसला
पर हुआ गलत तो
जीवन भर पछताते हैं.(कृष्ण धर शर्मा,2003)

आगत के लिये

लोग आते हैं लोग जाते हैं
अधिकतर लोग आते हैं
और चले जाते हैं
पर कुछ लोग आकर
कुछ ऐसा कर जाते हैं
कि आगत के लिये 
प्रेरणा स्रोत बन जाते हैं.(कृष्ण धर शर्मा,2000)

मिला है जीवन तो

सदा हंसते रहो मुस्कुराते रहो
कुछ ना कुछ यूं ही गुनगुनाते रहो
चेहरे पर ये उदासी अच्छी नहीं लगती
जिन्दगी मुझे तो इतनी सस्ती नहीं लगती
मिला है जीवन तो
खुशियों से इसे संवार दो
चार दिन की है जिन्दगी
हँसते हुये गुजार दो.(कृष्ण धर शर्मा,2003)

हमनें देखा है

हमने देखा है बहारों को
आते हुये
हमने देखा है भौंरों को
गुनगुनाते हुये
हमने देखा है तितलियों को
इठलाते हुये
हमने देखा है कलियों को
शरमाते हुये
हमने देखा है फूलों को
मुस्कुराते हुये
हमने देखा है पतझड़  भी
आते हुये.  (कृष्ण धर शर्मा,2003)

पहचानेगी ये दुनिया

आज नही तो कल
हमको भी जानेगी ये दुनिया
कभी ना कभी तो हमको भी
पहचानेगी ये दुनिया
हैं गुमनाम आज तो क्या
कल चर्चे होंगे हमारे
करते हैं जो बुराई आज
प्रशंसा करेंगे कल सारे. (कृष्ण धर शर्मा,2000)

यही तो जिन्दगी है

गम भी है खुशी भी है
अरे यही तो जिन्दगी है
नाम जिसका जिन्दगी है
सुख दुख से वह बनी है
न नर्क है कहीं न स्वर्ग है कहीं
जो कुछ भी है, है सब यहीं.(कृष्ण धर शर्मा,1999)

आदत सी हो चली है

ऊब गया हूं इस घुटन भरी दुनिया से
अब चाहता हूं थोडी़ सी शांति
पर हैरान हूं परेशान हूं
कि जिसकी तलाश है मु÷ो
वह नजर ही नहीं आ रही है
नजर ना आने से उसके
बेचैनी मेरी बढ़ती ही जा रही है
लगता है वह भी समझ गयी है कि
जरुरत ही नहीं है उसकी किसी को
क्योंकि सबको आदत सी हो चली है
इस घुटन भरे माहौल में जीने की.(कृष्ण धर शर्मा,2000)

हमारे सयाने

हमारे सयाने जो कहते हैं
हम लोग वही करते हैं
वह चाहे अच्छा हो या बुरा
आखिर सयानों का है कहा.(कृष्ण धर शर्मा,1999)

तूफान आने ही वाला है

हवा यकायक
शांत हो गयी
हर तरफ
सन्नाटा सा छा गया
हम समझ गये
तूफान आने ही वाला है.(कृष्ण धर शर्मा,1998)

पूजा के सुमन

तुमको सब अर्पित रचनायें हमारी हैं
रचनायें मेरी प्रिये प्रेरणा तुम्हारी हैं
यह उद्वगार नहीं मेरे पूजा के सुमन हैं
तुमको सुमन समर्पित पूजा ये तुम्हारी है.(कृष्ण धर शर्मा,2000)

मैं बेरोजगार हूं

मैं बेरोजगार हूं
मैंने न जाने कितने आवेदन किये
कितने ही लोगों से निवेदन किये
जाने कितने ही दफ्तरों के चक्कर काटे
कितनी ही गलियों की खाक छानी
न दिन को दिन माना
न रात को रात मानी
न जाने कितने ही जूतों के घिस गये तले
फिर भी मैं और चलने को तैयार हूं
क्योंकि मैं बेरोजगार हूं.(कृष्ण धर शर्मा,2000)

प्रकाश ही प्रकाश

जाने कब से छाया था अंधेरा
कुछ नजर न आ रहा था
कहां क्या हो रहा था
कुछ समझ न आ रहा था
एक दिन अचानक सब कुछ
शीशे की तरह साफ हो गया
अंधेरे का तो नामोनिशां ही मिट गया
जाने कहां से आकर रोशनी
सब कुछ उजला कर गई
जहां तक छाया था अंधेरा
प्रकाश ही प्रकाश भर गई.(कृष्ण धर शर्मा,2003)

स्वतंत्र रहेंगे जब तक

उड़ रहे हैं पंछी खुले आसमान में
कलरव करते हुये
जीवन का सच्चा आनंद लेते हुये
मस्त गगन में उड़ते हुये
ना कोई चिंता ना कोई बीमारी है उन्हें
स्वतंत्रता जान से भी ज्यादा प्यारी है उन्हें
स्वतंत्र रहेंगे जब तक वह
तभी तक खुश रह पायेंगे
हो गये अगर परतंत्र तो
हमारी तरह वह भी
तनावग्रस्त हो जायेंगे.(कृष्ण धर शर्मा,2003)

तलाश अभी अधूरी है

रास्ता भटक जाने भर से
मंजिल की तलाश नहीं छोड़ते
कांटों भरा रास्ता हो मगर
बढ़े कदम तो वापस नहीं मोड़ते
हम तो ऐसे राही हैं जो
आसानी से हार नहीं मानेंगे
कितनी भी मुशिकल हो मंजिल
कभी तो ढ़ंूढ़ निकालेंगे
हर हाल में हमको अपनी
आशा करनी पूरी है
रास्ते में हैं कांटे बहुत
मगर तलाश अभी अधूरी है.(कृष्ण धर शर्मा,2003)

सीखो उड़ना

जब इरादा कर ही लिया है
आगे बढ़ने का
तो पीछे मुड़कर देखना छोड़ दो
तोड़ दो सारी जंजीरें
नवयुग से नाता जोड़ लो
तितलियों की तरह सीखो उड़ना
जो स्वछंद विचरण करती हैं
छोड़ कर सारी चिन्तायें जो
उन्मुक्त होकर उड़ती हैं.(कृष्ण धर शर्मा,2000)

अपनी ही धुन में

एक अनजाना सा सफर

एक अनजानी सी डगर

मंजिल है किधर

कुछ भी नहीं खबर

अनजाना सा गीत कोई

गुनगुना रहा हूं

बस अपनी ही धुन में

मैं चला जा रहा हूं .(कृष्ण धर शर्मा,2000)

आंसू खुशी के

कितनी खुशी होती है मन को
मिल जाता है जब कुछ मनचाहा
मन में उठने लगती हैं
खुशियों की हिलोरें
झूम उठता है तन बदन सारा
लगने लगता है सब कुछ प्यारा
मिल जाती हैं जब
खुशियां ढेर सारी
ते कभी कभी
भर आती हैं आंखें भी
आ जाते हैं आंखों में
कुछ बूंद आंसू भी
मगर ये आंसू दुख के नहीं
खुशी के होते हैं
जी हां! मानिये यकीन
आंसू खुशी के भी होते हैं.(कृष्ण धर शर्मा,2003)

हम मजदूर हैं

ऐ महलों में रहने वालों

हम भी तो इन्सान हैं

मगर जानें क्यों फिर भी

हम सदा ही गुमनाम हैं

ये जो तुम्हारे महल खडे़ हैं

हमारे पुरखे ही इनकी नींव मे गडे़ हैं

ये तुम्हारे ऐशो आराम के सामान

सब हम ही तो बनाते हैं

मगर क्या कभी हम इनका

जरा सा भी सुख ले पाते हैं

इतना सब बनाकर भी

हम इनसे बहुत दूर हैं

करें हम कितनी भी मेहनत

आखिर हम मजदूर हैं.(कृष्ण धर शर्मा,1998)

क्यूं नहीं आते फरिश्ते

कहां गया वह जमाना जब
आते थे फरिश्ते धरती पर
अब तो लगता है देखने से भी
कतराते हैं फरिश्ते धरती पर
एक जमाना था जब
द्रौपदियों की लाज बचाने
आते थे फरिश्ते धरती पर
सक्रिय  होतीं आसुरी शकितयां
तब उन्हें मिटाने को
आते थे फरिश्ते धरती पर
जब बढ़ जाता बोझ  धरा पर
आते थे फरिश्ते धरती पर
संपूर्ण पापियों का सर्वनाश
कर जाते थे फरिश्ते धरती पर
लेकिन लुट रही आज द्रौपदियां
मगर लाज बचाने को 
नहीं आते फरिश्ते धरती पर
रौंदे जा रहे आज संतजन
नहीं आते फरिश्ते धरती पर
हर तरफ मचा है हाहाकार,अत्याचार
क्यूं नही आते फरिश्ते धरती पर.(कृष्ण धर शर्मा,1998)

नींद नहीं क्यों आती तुमको

दूसरों का दुख दर्द समझना सीखो

इन्सान तभी बन पाओगे

करो दूसरों की कभी तुम मदद

सच्चा सुख तुम पाओगे

नींद नहीं क्यों आती तुमको

बतलाऊं मैं सच्ची बात

सताते हो तुम जिनको दिन भर

देते हैं बद्दुआ वे सारी रात. (कृष्ण धर शर्मा,1999)