नमस्कार,आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757
गुरुवार, 19 मार्च 2020
क्यों और कैसे शुरू हुआ भूमकाल विद्रोह
बस्तर की अर्थव्यवस्था
बस्तर का इतिहास
रविवार, 15 मार्च 2020
छत्तीसगढ़ मित्र
छत्तीसगढ़ मित्र का द्वितीय वर्ष का प्रथम अंक जनवरी सन 1901। संपादक- पं. रामराव चिंचोलकर तथा माधवराव सप्रे.
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मंगलवार, 3 मार्च 2020
गांधी के सपनों का भारत-महेश प्रसाद सिंह
"गांधी महराज के धनि औ दीन शिष्य अनेक
पर एक ऐसी बात है जिसमें सभी हैं एक
हम पेट के हित दीन-पीड़न में नहीं अभ्यस्त
झुकते न धनियों से कभी न होते भय से त्रस्त"
-रवींद्रनाथ टैगोर (गांधी के सपनों का भारत-महेश प्रसाद सिंह)
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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020
बैंकों के विलय का औचित्य
वर्तमान में ही रिजर्व बैंक ने व्यवस्था कर रखी है कि निजी और सरकारी बैंकों को प्राथमिकता वाले क्षेत्र को ऋण देना अनिवार्य होता है। इस अनिवार्यता को ग्रामीण क्षेत्र में विकास आदि पर लागू किया जा सकता था। क्योंकि रिजर्व बैंक इस कार्य को करने में असफल रहा इसलिए सरकार ने इन बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और हम कुएं से निकलकर खाई में जा गिरे। कुएं से निकले इसलिए कि ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाओं का विकास हुआ लेकिन खाई में गिरे इसलिए कि सरकारी बैंकों में लगाई गई आम आदमी की पूंजी का भक्षण सरकारी कर्मियों ने कर लिया। इसलिए सरकार को चाहिए की विलय जैसे दिखावा करने के स्थान पर सभी सरकारी बैंकों का पूर्ण निजीकरण कर दें और रिजर्व बैंक इन्हें मजबूर करे कि यह ग्रामीण एवं प्राथमिकता वाले क्षेत्र में पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराए।
दिवर्ष 1969 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। उनका मानना था कि इन बैंकों पर निजी उद्यमियों का वर्चस्व है और ये जनता के पैसे को अपने व्यक्तिगत काम में ले रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तथा गरीब लोगों को बैंक की सुविधा उपलब्ध कराने में इनकी रुचि नहीं है। इसमें कोई संशय नहीं कि राष्ट्रीयकरण के बाद सरकारी बैंकों की शाखाओं का ग्रामीण क्षेत्रों में भारी विस्तार हुआ है और आम आदमी के लिए बैंक तक पहुंचना आसान हो गया है। इस दृष्टि से राष्ट्रीयकरण को सफल मानना चाहिए। लेकिन राष्ट्रीयकरण के बीते 50 सालों में दूसरी समस्या उत्पन्न हो गई है।
इस लम्बी अवधि में सरकार ने इन बैंकों में जो भी पूंजी का निवेश किया है उसका पूरी तरह क्षरण हो चुका है। वर्ष 2014 से 2019 के बीच केंद्र सरकार ने लगभग 250 करोड़ रुपए का निवेश इन बैंकों में किया है। आज के दिन इन सभी सरकारी बैंकों की सम्मिलित मार्केट कैपिटलाइजेशन यानि इनके समस्त शेयरों की शेयर बाजार में कुल मूल्य लगभग 300 करोड़ रुपए है। अर्थ हुआ कि पिछले 50 वर्षों में देश ने इन बैंकों में जो विशाल पूंजी निवेश किया है वह उसमें से कुल 50 करोड़ रुपए आज बचा है और शेष का क्षरण हो चुका है। यह क्षरण मूलत: इसलिए हुआ है कि इनके द्वारा भारी घाटा खाया जा रहा है।
सरकार इनमें लगातार पूंजी डाल रही है और इनके द्वारा लगातार खाए जा रहे घाटे में यह यह पूंजी समाप्त होती जा रही है। यह घाटा मूलत: इसलिए हो रहा है कि सरकारी बैंक के कर्मियों के व्यक्तिगत स्वार्थ हो और बैंक के स्वार्थों में समन्वय नहीं है। ये अलग-अलग दिशा में चलते हैं। सरकारी बैंक के मुख्य अधिकारी के लिए लाभप्रद होता है कि वह घूस लेकर अथवा राजनीतिक दबाव में ऐसे लोगों को लोन दे जो कि बाद में खटाई में पड़ जाए। ऐसा करने से मुख्य अधिकारी को स्वयं लाभ होता है जबकि बैंक को घाटा होता है। निजी बैंकों में यह समस्या उत्पन नहीं होती है क्योंकि बैंक के मुख्य अधिकारी द्वारा घटिया लोन देने से बैंक को जो घाटा लगता है वह भी उसी मुख्य अधिकारी का होता है। ये एक दिशा में चलते हैं। सरकारी बैंकों के मालिक यानि सरकार और मुख्य अधिकारी के उद्देश्यों में समन्वय नहीं होता है जबकि निजी बैंकों के मालिक और मुख्य अधिकारी एक ही व्यक्ति होते हैं इसलिए उनके उद्देश्यों में समन्वय रहता है। इसलिए निजी बैंकों द्वारा घटिया लोन कम दिए जाते हैं।
इस समस्या का हल सरकारी दायरे में नहीं दिखता है। प्रमाण यह है कि बीते छ: वर्षों में एनडीए सरकार ने सरकारी बैंकों के कार्य में हस्तक्षेप करना कम कर दिया है परन्तु इनकी स्थिति पूर्ववत बिगड़ती ही जा रही है। अर्थ हुआ कि राजनीतिक दखल को इन बैंकों की खस्ता हालत का कारण नहीं कहा जा सकता है। इनके घाटे अपनी संरचना के कारण है जिसमें मुख्य अधिकारी के लिए बैंक को घाटे में डालकर अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को सिद्ध करना संभव होता है। इसी दृष्टि से सरकार द्वारा गठित पी.जे. नायक समिति ने 2014 में संस्तुति की थी कि बैंकों का निजीकरण कर दिया जाए।
वित्त मंत्री ने बजट में इन बैंकों के निजीकरण करने के स्थान पर 10 बड़े सरकारी बैंकों का आपस में विलय करके इन्हें 4 बड़े बैंकों में बनाने का निर्णय लिया है। लेकिन यदि सरकारी बैंक के मुख्य अधिकारी के व्यक्तिगत उद्देश्य बैंक को घाटे में डालकर सिद्ध होते हैं तो विलय से इस समस्या का हल नहीं हो सकता है। विलय से सिर्फ इतना ही हो सकता है कि जो मुख्य अधिकारी ज्यादा घटिया था उसकी तुलना में अब कम घटिया मुख्य अधिकारी उस बैंक का संचालन करेगा। सभी मुख्य अधिकारी मूलरूप से एक से हैं जैसे सभी पॉकेटमार मूलरूप से एक से होते हैं। प्रमाण यह है कि सभी बैंकों की सम्मिलित पूंजियां शून्य हो गई है। यही कारण है कि बीते 50 वर्षों में जनता की गाड़ी कमाई से किया गया निवेश आज शून्य हो गया है। इसमें लाभ और घाटे में चलने वाले सभी बैंक सम्मिलित है।
जानकार बताते हैं कि विलय के पीछे सरकार की मंशा है कि जो पूंजी निवेश किया जाए वह बजट में न दिखे। यदि लाभ में चल रहे सरकारी बैंक द्वारा सरकार को डिविडेंड दिया जाए और उस डिविडेंड की रकम से सरकार घाटे में चलने वाली सरकारी बैंक में निवेश करे तो यह लेन-देन सरकार के बजट में दीखता है। तुलना में यदि घाटे में चलने वाले बैंक का लाभ में चलने वाले बैंक से विलय कर दिया जाए तो वही रकम हस्तांतरित होती है लेकिन वह रकम बजट के बाहर हो जाती है। लाभ में चलने वाले बैंक द्वारा कमाई गई रकम घाटे में चलने वाले बैंक की शाखाओं को जीवित रखने में लग जाती है। यह लेन-देन बजट से बाहर रहता है। अत: विलय से सरकारी बैंकों के कार्य में न कोई सुधार होगा और न ही अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।
इस परिप्रेक्ष्य में हमें 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के निर्णय पर पुन: विचार करना चाहिए। उस समय उद्देश्य था कि बैंकों द्वारा छोटे उद्योगों और ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं उपलब्ध कराई जाए। प्रश्न यह है कि इस कार्य को रिजर्व बैंक द्वारा निजी बैंकों से क्यों नहीं कराया जा सका था? रिजर्व बैंक के पास पर्याप्त अधिकार है। वह निजी बैंकों को मजबूर कर सकता है कि वे विशेष ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी शाखाएं खोले। वर्तमान में ही रिजर्व बैंक ने व्यवस्था कर रखी है कि निजी और सरकारी बैंकों को प्राथमिकता वाले क्षेत्र को ऋण देना अनिवार्य होता है। इस अनिवार्यता को ग्रामीण क्षेत्र में विकास आदि पर लागू किया जा सकता था।
क्योंकि रिजर्व बैंक इस कार्य को करने में असफल रहा इसलिए सरकार ने इन बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और हम कुएं से निकलकर खाई में जा गिरे। कुएं से निकले इसलिए कि ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाओं का विकास हुआ लेकिन खाई में गिरे इसलिए कि सरकारी बैंकों में लगाई गई आम आदमी की पूंजी का भक्षण सरकारी कर्मियों ने कर लिया। इसलिए सरकार को चाहिए की विलय जैसे दिखावा करने के स्थान पर सभी सरकारी बैंकों का पूर्ण निजीकरण कर दें और रिजर्व बैंक इन्हें मजबूर करे कि यह ग्रामीण एवं प्राथमिकता वाले क्षेत्र में पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराए।
बुधवार, 12 फ़रवरी 2020
इस राह से गुजरते हुए- दिवाकर मुक्तिबोध
"इसमें दो राय नहीं कि राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में घी-दूध की नदियां बहने लगी हैं। धन का अपार सैलाब उमड़ रहा है। लेकिन, यह कुछ हजार लोगों की मुट्ठियों में कैद है। हजारों करोड़ रुपये के निर्माण एवं विकास कार्यों में मलाई खाने का अवसर इन्हीं लोगों को मिल रहा है। स्व. राजीव गांधी की वह ऐतिहासिक स्वीकारोक्ति राज्य के संदर्भ में अभी भी एकदम सटीक है कि विकास के मद में राज्य (उन्होंने केंद्र कहा था) से चला एक रुपया गरीब गांव के किसी गरीब की कुटिया तक पहुंचते पहुंचते मात्र 15 पैसे रह जाता है। भ्रष्टाचार की ऐसी कथा शायद ही किसी और राज्य में सुनाई दें।" (इस राह से गुजरते हुए- दिवाकर मुक्तिबोध)
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बुधवार, 11 दिसंबर 2019
संस्कृति के चार अध्याय- रामधारी सिंह दिनकर
'लगभग दो वर्षों के अध्ययन के पश्चात मेरे सामने यह सत्य उद्भासित हो उठा कि भारतीय संस्कृति में चार बड़ी क्रांतियाँ हुईं हैं और हमारी संस्कृति का इतिहास उन्हीं चार क्रांतियों का इतिहास है। पहली क्रान्ति तब हुई, जब आर्य भारतवर्ष में आए अथवा जब भारतवर्ष में उनका आर्येतर जातियों से सम्पर्क हुआ।
आर्यों ने आर्येतर जातियों से मिलकर जिस समाज की रचना की, वही आर्यों अथवा हिन्दुओं का बुनियादी समाज हुआ और आर्य तथा आर्येतर संस्कृतियों के मिलन से जो संस्कृति उत्पन्न हुई, वही भारत की बुनियादी संस्कृति बानी। इस बुनियादी भारतीय संस्कृति के लगभग आधे उपकरण आर्यों के दिये हुए हैं और उसका दूसरा आधा आर्येतर जातियों का अंशदान है।
दूसरी क्रान्ति तब हुई, जब महावीर और गौतम बुद्ध ने इस स्थापित धर्म या संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह किया तथा उपनिषदों की चिंताधारा को खींचकर वे अपनी मनोवांछित दिशा की ओर ले गए। इस क्रान्ति ने भारतीय संस्कृति की अपूर्व सेवा की, किन्तु अन्त में, इसी क्रान्ति के सरोवर में शैवाल भी उत्पन्न हुए और भारतीय धर्म तथा संस्कृति में जो गंदलापन आया, वह, काफी दूर तक, इन्हीं शैवालों का परिणाम था।
तीसरी क्रान्ति उस समय हुई, जब इस्लाम, विजेताओं के धर्म के रूप में, भारत पहुंचा और इस देश में हिंदुत्व के साथ उसका संपर्क हुआ। और चौथी क्रान्ति हमारे आपने समय में हुई, जब भारत में यूरोप का आगमन हुआ तथा उसके संपर्क में आकर हिंदुत्व व इस्लाम, दोनों ने नवजीवन का अनुभव किया। इस पुस्तक में इन्हीं चार क्रान्तियों का संक्षिप्त इतिहास है। (संस्कृति के चार अध्याय- रामधारी सिंह दिनकर)
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रविवार, 8 दिसंबर 2019
निर्मम समाज में स्वच्छता सेनानियों की गुमनाम शहादत
यदि मीडिया मामले को निरन्तर उठाता रहा तो शायद इनमें कुछ इज़ाफ़ा भी हो जाएगा। किन्तु जैसा अब तक होता रहा है सीवर सफाई करने वाले कर्मचारियों को निर्ममतापूर्वक मौत के मुंह में धकेलने वाले धनकुबेर और उनके कारिंदे लंबी न्यायालयीन प्रक्रिया के बाद या तो बेगुनाह छूट जाएंगे या इन्हें नाम मात्र का दंड मिलेगा। गुजरात सरकार ने मृतकों की जान की कीमत 4 लाख रुपए आंकी है जैसा गुजरात के मुख्यमंत्री श्री विजय रुपाणी की एक घोषणा से पता चलता है। शायद गुजरात राज्य सामाजिक न्याय विभाग द्वारा 8.25 लाख प्रति परिवार मुआवजा और दिया जाएगा।
गुजरात सफाई कर्मचारी संघ की ओर से 2 लाख रुपए की मदद का आश्वासन दिया गया है। मृतक सफाई कर्मियों के शोक संतप्त, हतप्रभ और भयाक्रांत परिजनों को हमेशा की तरह यह समझाने की पुरजोर कोशिश की जा रही होगी कि जो मिल रहा है वह मृतकों की हैसियत से बहुत ज्यादा है। मनुष्य द्वारा हाथ से मैला सफाई का यह अमानवीय कारोबार इन सफाई कर्मियों और उनके परिवार के सदस्यों को अंदर से इतना कमजोर, हताश और पराजित बना देता है कि कोई आश्चर्य नहीं यदि इन मृतकों के परिजन भी मुआवजा मिलने को ही अपना परम सौभाग्य मान लें और दोषियों के साधन संपन्न सहयोगियों के समक्ष शरणागत हो जाएं। धीरे धीरे सब कुछ पुराने ढर्रे पर चल निकलेगा और इस तरह की घटनाओं की निर्लज्ज पुनरावृत्ति होती रहेगी। एनसीएसके के आंकड़े बताते हैं कि सीवर सफाई के दौरान हुई मृत्यु के आंकड़ों में गुजरात देश में तामिलनाडु के बाद दूसरे नंबर पर है। गुजरात प्रधानमंत्री का गृह राज्य है और विकास के बहुचर्चित गुजरात मॉडल की प्रयोग स्थली भी। प्रधानमंत्री का बहुप्रचारित स्वच्छता अभियान महात्मा गांधी के आदर्शों से प्रेरित बताया जाता है जो स्वयं इस अमानवीय प्रथा से असहमत और आहत रहे। किन्तु इसके बाद भी गुजरात का यह शर्मनाक रिकॉर्ड गहरी चिंता उत्पन्न करता है। यह दर्शाता है कि सरकार की प्राथमिकताओं में शायद ये सफाई कर्मी सम्मिलित नहीं हैं।
मैला सफाई के इस कार्य के विषय में आरक्षण पर कोई विवाद नहीं है। वाल्मीकि समुदाय के लोग इस कार्य के संपादन के लिए अभिशप्त हैं। उच्चतर वर्णों के लोग वाल्मीकि समुदाय के इस पेशे पर एकाधिकार को कभी चुनौती नहीं देते। आरक्षण का विमर्श इस पेशे से दूरी बना लेता है। चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान हर धर्म में मैला सफाई के लिए कुछ खास जातियां इस कार्य को करने के लिए चिह्नित की गई हैं जिन्हें नारकीय दशाओं में यह कार्य करना पड़ता है क्योंकि समाज उन्हें इस दलदल से निकलने नहीं देता। इस पेशे को छोड़ना भी आसान नहीं है। यहां तक कि जब वाल्मीकि समुदाय के लोग महानगरों की ओर पलायन करते हैं तब भी इन्हें अन्य कार्यों से दूर रखा जाता है और इन्हें मैला सफाई के कार्य से आमरण आबद्ध रखा जाता है। इस कार्य को इतना घृणित माना जाता है कि ऐसे अनेक श्रमिक अपने परिवार तक से यह तथ्य छिपा कर रखते हैं कि वे सीवर सफाई का कार्य करते हैं। ऐसे में कई बार सीवर सफाई के दौरान इनकी मौत की खबर इनके परिजनों को भी हतप्रभ और चकित छोड़ जाती है।
इन मैला सफाई करने वाले श्रमिकों के प्रति प्रशासन तंत्र की उदासीनता चिंतित करने वाली है। सरकार ने मैला सफाई करने वाले श्रमिकों की संख्या और उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति के संबंध में कोई भी सर्वेक्षण नहीं कराया है। लोकसभा में 4 अगस्त 2015 को एक अतारांकित प्रश्न के उत्तर में सरकार द्वारा यह जानकारी दी गई कि 2011 की जनगणना के आंकड़े यह बताते हैं कि देश के ग्रामीण इलाकों में 180657 परिवार मैला सफाई का कार्य कर रहे थे। इनमें से सर्वाधिक 63713 परिवार महाराष्ट्र में थे। इसके बाद मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, त्रिपुरा तथा कर्नाटक का नंबर आता है। यह संख्या इन परिवारों द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में हाथ से मैला सफाई के 794000 मामले सामने आए हैं। सीवर लाइन सफाई के दौरान होने वाली मौतों के विषय में राज्य सरकारें केंद्र को कोई सूचना नहीं देतीं। 2017 में 6 राज्यों ने केवल 268 मौतों की जानकारी केंद्र के साथ साझा की। सरकारी सर्वे के अनुसार तो 13 राज्यों में केवल 13657 सफाई कर्मी हैं। द गार्डियन की 19 सितंबर 2018 की एक रिपोर्ट यह बताती है कि राज्य सरकारें हाथों से मैला सफाई करने वाले श्रमिकों के अस्तित्व से ही इनकार करती हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार जब राज्य सरकारों से हाथों से मैला सफाई करने और ढोने वाले सफाई कर्मियों की संख्या की जानकारी मांगी गई तो तत्कालीन छत्तीसगढ़ और गुजरात सरकार ने क्रमश: 3 और 2 सफाई कर्मियों की संख्या बताई जो अविश्वसनीय और हास्यास्पद थी।
नैशनल कमीशन फॉर सफाई कर्मचारीज ने जब यह बताया कि सन 2017 से हर पांचवें दिन कोई न कोई अभागा सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौत का शिकार बन जाता है तो हम सब चौंक उठे थे। लेकिन इस खुलासे से भी आश्चर्यजनक बात यह थी कि यह इस तरह की मृत्यु के संबंध में पहले आधिकारिक आंकड़े थे। एनसीएसके के अध्यक्ष मनहर वालजी भाई झाला कहते हैं कि यह आंकड़े अपूर्ण हैं क्योंकि अधिकांश राज्यों में इस तरह की मृत्यु रिपोर्ट ही नहीं होती। इन आंकड़ों को हिंदी और अंग्रेजी के समाचार पत्रों में छपी खबरों तथा 29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल 13 द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। इन आंकड़ों में हाथ से मैला उठाने वाले वाल्मीकि समुदाय के स्त्री पुरुषों की विभिन्न रोगों के कारण हुई मृत्यु के आंकड़े सम्मिलित नहीं हैं। असुरक्षित ढंग से मैला और गंदगी उठाते उठाते इन्हें कितने ही संक्रामक रोग हो जाते हैं और इनकी औसत आयु चिंताजनक रूप से कम हो जाती है।
ऐसा नहीं है कि इस संबंध में कानूनों की कोई कमी है। 1993 में 6 राज्यों ने केंद्र सरकार से मैला ढोने की प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए कानून का निर्माण करने का अनुरोध किया। तब द एम्प्लॉयमेंट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन ऑफ ड्राई लैट्रिन्स (प्रोहिबिशन) एक्ट 1993 नरसिम्हा राव सरकार द्वारा पारित किया गया। इस एक्ट के बनने के बाद से 1800 सफाई कर्मियों की सीवर सफाई के दौरान जहरीली गैसों के कारण हुई मौत के मामले मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और सफाई कर्मचारी आंदोलन के समन्वयक श्री बेजवाड़ा विल्सन और उनके साथियों के पास सूचीबद्ध हैं। श्री विल्सन के अनुसार यह संख्या केवल उन मामलों की है जिनके विषय में दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं।
वास्तविक संख्या तो इससे कई गुना अधिक है क्योंकि इस तरह की अधिकांश मौतों के मामले दबा दिए जाते हैं। मृतक के परिजन अशिक्षा और निर्धनता के कारण न्याय के लिए संघर्ष करने की स्थिति में नहीं होते। मृत्यु के लिए जिम्मेदार ठेकेदार और अधिकारी अपने रसूख के बल पर मामले को रफा दफा कर देते हैं। यह मौतें प्राय: सेप्टिक टैंक के भीतर मौजूद मीथेन, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि जहरीली गैसों के कारण होती हैं। डॉ आशीष मित्तल (जो जाने माने कामगार स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं तथा इस विषय होल टू हेल तथा डाउन द ड्रेन जैसी चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं) बताते हैं कि सीवर सफाई से जुड़े अस्सी प्रतिशत सफाई कर्मी रिटायरमेंट की आयु तक जीवित नहीं रह पाते और श्वसन तंत्र के गंभीर रोगों तथा अन्य संक्रमणों के कारण इनकी अकाल मृत्यु हो जाती है। नियमानुसार पहले तो किसी व्यक्ति का सीवर सफाई के लिए मैनहोल में उतरना ही प्रतिबंधित है। किंतु यदि किसी आपात स्थिति में किसी व्यक्ति को सीवर में प्रवेश करना आवश्यक हो जाता है तो लगभग 25 प्रकार के सुरक्षा प्रबंधों की एक चेक लिस्ट है जिसका पालन सुनिश्चित करना होता है।
सर्वप्रथम तो यह जांच करनी होती है कि अंदर जहरीली गैसों का जमावड़ा तो नहीं है। एक विशेषज्ञ इंजीनियर की उपस्थिति अनिवार्य होती है। एम्बुलेंस की मौजूदगी और डॉक्टर की उपलब्धता आवश्यक होती है। सीवेज टैंक में उतरने वाले श्रमिक को गैस मास्क, हेलमेट, गम बूट, ग्लव्स, सेफ्टी बेल्ट आदि से सुसज्जित पोशाक उपलब्ध कराई जानी होती है। तदुपरांत मौके पर उपस्थित किसी जिम्मेदार अधिकारी द्वारा यह प्रमाणित करने पर कि सभी सुरक्षा नियमों का शतप्रतिशत पालन कर लिया गया है श्रमिक सीवर में उतर सकता है। तमाम कानूनी प्रावधानों के बाद भी सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतें थमने का नाम नहीं ले रही। सितंबर 2013 में सरकार ने इस संबंध में नया कानून बनाया। दिसंबर 2013 में सरकार द्वारा प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट एज मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन रूल्स 2013 को लागू किया गया। इन्हें एम एस रूल्स के नाम से जाना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने 2014 में निर्णय दिया- जहां तक सीवर सफाई के दौरान मृत्यु का संबंध है आपात स्थितियों में भी बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर लाइन्स में प्रवेश अपराध की श्रेणी में आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मृत्यु के ऐसे प्रत्येक मामले में 10 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाए। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि भारतीय रेल के यात्री डिब्बों के शौचालय हाथ से मैला सफाई का सबसे बड़ा कारण हैं, सर्वोच्च न्यायालय ने रेल विभाग को निर्देश दिया कि रेल पटरियों पर से मैला उठाने की अमानवीय स्थिति का अंत करने के लिए वह एक समयबद्ध कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करे। रेल मंत्रालय ने सन 2022 तक सारे रेल कोचों में बायो टॉयलेट लगाने का आश्वासन दिया।
यह जानना अत्यंत दु:खद है कि इतने स्पष्ट कानूनी प्रावधानों के बावजूद सीवर लाइन की सफाई के दौरान हुई मौतों के लिए दोषी व्यक्तियों पर एफआईआर दर्ज होने का इक्का दुक्का उदाहरण भी कठिनाई से उपलब्ध है। इन दोषियों को दंड मिलने की बात तो वर्तमान भ्रष्ट और असंवेदनशील तंत्र में असंभव जान पड़ती है। प्राय: होता यह है कि सफाई कार्य करा रहे ठेकेदार बिना किसी सुरक्षा उपकरण के 200-250 रुपए की दिहाड़ी पर कार्य कर रहे इन मजदूरों को रस्से के सहारे मैनहोल से नीचे उतार देते हैं। जहरीली गैसों की जांच के लिए इनके पास माचिस की तीली जलाकर देखना और जीवित कॉकरोच डालकर परीक्षण जैसे आदिम तरीके ही होते हैं। इन सीवर लाइन्स में संचित जहरीली गैसों के प्रभाव से यह मजदूर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं या गंभीर अवस्था में बाहर निकाले जाते हैं।
चूंकि बाहर एम्बुलेंस, डॉक्टर या अन्य कोई आपात चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध नहीं होती इसलिए इनकी मृत्यु अवश्यम्भावी होती है। इसके बाद शुरू होता है मामले को रफा दफा करने का खेल। पुलिस, अधिकारी और ठेकेदार का गठजोड़ मृत्यु के कारण को बदलने का कार्य करता है। एक नाम मात्र की राशि मृतक के परिजनों को ठेकेदार द्वारा दे दी जाती है। यद्यपि ये सरकारी कार्य कर रहे होते हैं लेकिन सरकारें इन्हें अपना कर्मचारी मानने से इनकार कर देती हैं। इन्हें मुआवजा देने से वंचित कर दिया जाता है।
सफाई कर्मचारी आंदोलन ने इस चौंकाने वाले तथ्य की ओर ध्यानाकर्षण किया है कि मैनुअल सफाई व्यवस्था को समाप्त करने के लिए वर्ष 2014-15 में 570 करोड़ का बजट था जो 2017-18 में सिर्फ 5 करोड़ रह गया। जबकि स्वच्छ भारत अभियान का बजट 2014-15 में 4541 करोड़ था, जो 2017-18 में बढ़कर 16248 करोड़ हो गया है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत बनाए जा रहे करोड़ों शौचालयों के लिए सेफ्टी टैंक भी बनाए जा रहे हैं। सरकार द्वारा सन 2019 तक 21 करोड़ शौचालय निर्माण का लक्ष्य है। किन्तु सरकार ने सीवेज सिस्टम के सुधार के लिए कोई खास प्रयत्न नहीं किए हैं। स्वच्छ भारत अभियान शुरू होने के पूर्व ही शहरी इलाकों में एक तिहाई शौचालय सीवर लाइन्स से जुड़े नहीं थे। सरकारी दावे यह बताते हैं कि 2017 के अंत तक ग्रामीण इलाकों में 6 करोड़ नए शौचालय बन चुके थे। इन परिस्थितियों में इनकी मैनुअल सफाई की घटनाएं भी बढ़ेंगी। सीवर लाइन की सफाई के दौरान होने वाली दुर्घटनाएं अब तक महानगरों तक ही सीमित थीं इनका
विस्तार अब छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में होगा।
इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने कुछ दिल दहला देने वाले दृश्यों को उत्पन्न किया है। जेसीबी मशीन और हाइड्रोलिक कटर के उपयोग से मैन होल को बड़ा कर इन अभागे सफाई कर्मचारियों के सीवर की गंदगी में गहरे डूब चुके शवों को निकाला गया। एक छवि वह भी थी जब प्रधानमंत्री जी कुंभ के अवसर पर शानदार कार्य करने वाले स्वच्छता कर्मियों के चरण पखार रहे थे। न चाहते हुए भी इन दोनों छवियों की तुलना तो होगी ही। सरकार स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए अपनी प्रतिबद्धताओं को बार बार दुहराती रही है। केरल के चार युवा इंजीनियरों के एक समूह द्वारा निर्मित स्टार्टअप फर्म जेनोरोबोटीक्स द्वारा विकसित रोबोट, बैंडीकूट का इस्तेमाल सीवर की सफाई के लिए करने के लिए किया जा सकता है। इन युवा इंजीनियरों का यह सपना है कि वे मैनहोल को रोबोहोल में बदल देंगे।
19 नवंबर 2018 को वर्ल्ड टॉयलेट डे के अवसर पर सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक ने भी एक स्वचलित मशीन के विषय में जानकारी दी थी जो मैनुअल स्कैवेनजिंग की समाप्ति कर सकती है। क्या सरकार इन मशीनों के निर्माण और जरूरतमंद लोगों तक इनकी पहुंच को सुनिश्चित करेगी? सरकार का विश्वास यदि जनता को छवियों के माध्यम से संदेश देने में है तब भी उसके लिए बहुत कुछ करणीय है। इन स्वच्छता सेनानियों की शहादत को सलाम करने के लिए इनके अंतिम संस्कार के समय जिले के डीएम, जनप्रतिनिधि और राज्य सरकार के मंत्री उपस्थित रह सकते हैं। अधिकतम संभावित मुआवजे की रकम अंतिम संस्कार के पूर्व ही परिजनों को दी जा सकती है और परिवार के किसी सदस्य को नौकरी का नियुक्ति पत्र भी प्रदान किया जा सकता है। फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन कर दोषियों को न्यूनतम समय में सजा दिलाई जा सकती है। जहां भी ऐसी दु:खद घटना होती है वहां के प्रशासनिक अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई की परिपाटी आरंभ की जा सकती है। शायद सुंदर, सकारात्मक और प्रेरक छवियों की चाह में ही सरकार भारतीय समाज की इस भयंकर कुरीति के विरुद्ध कोई कदम उठा ले।
बुधवार, 27 नवंबर 2019
5 पॉइंट समवन- चेतन भगत
"आप सभी को यहाँ रहने और पढ़ने के लिए शुभकामनाएँ। बेस्ट ऑफ लक। याद रखो, जैसे कि तुम्हारे विभाग प्रमुख प्रो.चेरियन कहते हैं कि कठिन वर्कलोड डिजाइन आपसे सदैव मेहनत करवाने के लिए है। और हाँ, ग्रेडिंग सिस्टम की कद्र करें।
अगर आपको खराब ग्रेड्स मिले, तो याद रखें कि आपको न तो कोई नौकरी मिलेगी और न ही आपका कोई भविष्य होगा। लेकिन अगर आप अच्छा करते हैं तो यह दुनिया आपके कदम चूमेगी। इसलिए खराब प्रदर्शन की कोई गुंजाइश नहीं है।"
जैसे ही प्रो. दुबे ने अपने आखिरी शब्द कहे, हम सभी के अंदर एक सनसनी सी दौड़ गई। प्रोफेसर ने डस्टर मेज पर जोर से पटका और चॉक के बादलों को पीछे छोड़ते हुए कक्षा से बाहर चले गए। (5 पॉइंट समवन- चेतन भगत)
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की बात
गुरुवार, 14 नवंबर 2019
हारने के लिए
उन्होंने जीतना ही कब चाहा था मुझे
मैं तो ज़माने से बैठा था हारने के लिए....
कृष्णधर शर्मा 12.11.19
बुधवार, 13 नवंबर 2019
इसमें मेरी क्या खता
वक्त का तकाज़ा है, तू ही बता इसमें मेरी क्या खता
साजिशों के दौर में, तेरी मोहब्बत भी साजिश लगे है मुझे
कृष्णधर शर्मा 12.11.19
रविवार, 10 नवंबर 2019
कविता के नये प्रतिमान- नामवर सिंह
'कविता के नए प्रतिमानों की चर्चा के प्रसंग में प्रायः सभी नए लेखक इस बात पर एकमत दिखाई पड़ते हैं कि नए प्रतिमानों का संबंध रस से नहीं हो सकता; क्योंकि "कविता से रस का लुप्तीकरण अब विवादास्पद नहीं रह गया है।" "दिन में सैकड़ों बार 'हृदय की अनुभूति', हृदय की अनुभूति' चिल्लाएंगे, पर 'रस' का नाम सुनकर ऐसा मुँह बनाएंगे मानो उसे न जाने कितना पीछे छोड़ आये हैं। भलेमानुस इतना भी नहीं जानते कि हृदय की अनुभूति ही साहित्य में 'रस' और 'भाव' कहलाती है।"
आचार्य शुक्ल ने जहाँ रस को हृदय की अनुभूति के रूप में निरूपित किया है, वहीं आगे यह भी लिखा है कि "शब्द-शक्ति, रस और अलंकार, ये विषय-विभाग काव्य-समीक्षा के लिए इतने उपयोगी हैं कि इनको अंतर्भूत करके संसार की नई-पुरानी सब प्रकार की कविताओं की बहुत ही सूक्ष्म, मार्मिक और स्वच्छ आलोचना हो सकती है। रिचर्ड्स जैसे वर्तमान अंग्रेजी समालोचक किस प्रकार अब समीक्षा में बहुत-कुछ भारतीय पद्धति का अवलंबन करके कूड़ा-करकट हटा रहे हैं, वह मैं शब्द -शक्ति के प्रसंग में दिखा चुका हूँ।"
"शब्द-शक्ति के प्रसंग में आचार्य शुक्ल का कथन इस प्रकार है : "शब्द-शक्ति का विषय बड़े महत्व का है। वर्तमान साहित्य-सेवाओं को इसके संबंध में विचार-परंपरा जारी रखना चाहिए। काव्य की मीमांसा या स्वच्छ समीक्षा के लिए यह उपयोगी सिद्ध होगी।" (कविता के नये प्रतिमान- नामवर सिंह)
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