नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

चलो अच्छा हुआ

 चलो अच्छा हुआ कि मर गए

उनकी भी जान छूटी और हमारी भी

नजरें बचाते हुए, उसने मन ही मन सोचा

वैसे भी, अक्सर बीमार ही तो रहते थे!

न अपने किसी काम के थे, न हमारे

उनके बदबूदार कपडे धोने से

नौकरानी भी कतराती थी अब तो

बहु की तो खैर बात ही नहीं

उनको भी तो, मर जाना चाहिए था

कई साल पहले ही

तब, जब माँ ही चल बसी थीं

कैंसर की लाइलाज बीमारी से

वैसे भी, इतने साल जीकर

आखिर क्या हासिल कर लिया उन्होंने  

बिस्तर पर ही तो पड़े थे पिछले दो सालों से

न उनको कहीं आना-जाना

न हम ही जा पाते थे उन्हें छोड़कर कहीं भी

दो-चार दिन घूमने के लिए भी

इस तरह की कई बातें सोचते हुए

दे रहा था तसल्ली अपने मन को

अपराध बोध से बचने के लिए...

              (कृष्णधर शर्मा 27.02.2023)


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शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

टूटा हुआ चश्मा

लगभग रोज ही देखता है वह

अपने पिताजी का टूटा हुआ धुंधला चश्मा

और लगभग रोज ही सोचता है वह

कि किसी दिन समय निकालकर

जरुर ठीक करवा देगा पिताजी का टूटा हुआ चश्मा

सुबह से शाम तक जीवन की आपाधापी में

रोजी-रोटी कमाने की जद्दोजहद में

टलता जाता है पिताजी का टूटा हुआ चश्मा

हालाँकि वह इस बारे में काफी ईमानदार है

मगर सचमुच ही समय नहीं निकाल पाता

पिताजी के टूटे हुए चश्में को ठीक करवाने के लिए

एक दिन वह काम से जल्दी निकला और उसने सोचा

कि आज पिताजी का टूटा हुआ चश्मा भी

ठीक ही करवा दूंगा कुछ अन्य जरुरी कामों के साथ

जो टलते आ रहे थे महीनों से चश्मे के साथ ही

मगर अचानक घर से आता है फोन

कि जल्दी घर आओ, गिर पड़े हैं पिताजी

फिसलकर अचानक से, और उठ भी नहीं पा रहें हैं

सारे कामों को छोड़कर वह भागता है घर की तरफ

मगर उसके पहुँचने तक, नहीं बच पाते पिताजी

बचा रह जाता है उनका टूटा हुआ चश्मा...

             (कृष्णधर शर्मा 11.02.2023)

यात्रा और यात्री

 

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

चल रहा है तारकों का
दल गगन में गीत गाता
चल रहा आकाश भी है
शून्य में भ्रमता-भ्रमाता

पाँव के नीचे पड़ी
अचला नहीं, यह चंचला है

एक कण भी, एक क्षण भी
एक थल पर टिक न पाता

शक्तियाँ गति की तुझे
सब ओर से घेरे हुए है
स्थान से अपने तुझे
टलना पड़ेगा ही, मुसाफिर!

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

थे जहाँ पर गर्त पैरों
को ज़माना ही पड़ा था
पत्थरों से पाँव के
छाले छिलाना ही पड़ा था

घास मखमल-सी जहाँ थी
मन गया था लोट सहसा

थी घनी छाया जहाँ पर
तन जुड़ाना ही पड़ा था

पग परीक्षा, पग प्रलोभन
ज़ोर-कमज़ोरी भरा तू
इस तरफ डटना उधर
ढलना पड़ेगा ही, मुसाफिर

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

शूल कुछ ऐसे, पगो में
चेतना की स्फूर्ति भरते
तेज़ चलने को विवश
करते, हमेशा जबकि गड़ते

शुक्रिया उनका कि वे
पथ को रहे प्रेरक बनाए

किन्तु कुछ ऐसे कि रुकने
के लिए मजबूर करते

और जो उत्साह का
देते कलेजा चीर, ऐसे
कंटकों का दल तुझे
दलना पड़ेगा ही, मुसाफिर

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

सूर्य ने हँसना भुलाया,
चंद्रमा ने मुस्कुराना
और भूली यामिनी भी
तारिकाओं को जगाना

एक झोंके ने बुझाया
हाथ का भी दीप लेकिन

मत बना इसको पथिक तू
बैठ जाने का बहाना

एक कोने में हृदय के
आग तेरे जग रही है,
देखने को मग तुझे
जलना पड़ेगा ही, मुसाफिर

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

वह कठिन पथ और कब
उसकी मुसीबत भूलती है
साँस उसकी याद करके
भी अभी तक फूलती है

यह मनुज की वीरता है
या कि उसकी बेहयाई

साथ ही आशा सुखों का
स्वप्न लेकर झूलती है

सत्य सुधियाँ, झूठ शायद
स्वप्न, पर चलना अगर है
झूठ से सच को तुझे
छलना पड़ेगा ही, मुसाफिर

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

 

हरिवंश राय बच्चन

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गुरुवार, 12 जनवरी 2023

भारतीय जनजातियाँ संरचना एवं विकास - डॉ. हरिश्चन्द्र उप्रेती

 अतीत में इनकी अर्थव्यवस्था संग्रहण एवं शिकार की अर्थव्यवस्था थी। इनका परंपरागत व्यवसाय लकड़ी के बर्तनों का निर्माण रहा है। जैसे "ठेकी" तथा "पाई" आदि का निर्माण। इसके अतिरिक्त ये लोग जंगली घास से सुन्दर रस्सियाँ बनाते हैं। पहले ये लोग इन वस्तुओं का विनिमय करते थे। स्वनिर्मित वस्तुओं को क्रय करने की इनकी व्यवस्था को “मूक विनिमय” (Silent Trade) की संज्ञा दी जा सकती है। 

चूँकि ये लोग स्वभाव से ही शर्मीली प्रकृति के थे तथा बाह्य लोगों के सम्पर्क से पृथक् रहते थे, अत: रात्रि के समय अपनी निर्मित वस्तुओं को निकटवर्ती हिन्दुओं के गाँवों में जाकर घर के दरवाजे के बाहर रख देते थे तथा यह अपेक्षा रहती थी कि इसके बदले दूसरे दिन उसी स्थान पर रात्रि को उन्हें खाद्य सामग्री उपलब्ध होगी। ग्रामवासी भी इस मूक विनिमय तथा राजी की मंशा से पूर्ण रूप से अवगत होते थे। 

डी.एन. मजूमदार ने इन्हें अज्ञात व्यापारी (Invisible Traders) की संज्ञा दी है। वस्तु विनिमय का यह स्वरूप अब समाप्त हो गया है। ये लोग अतीत में थोड़ी बहुत कृषि भी करते थे जिसका स्वरूप स्थान परिवर्ती था। अतीत में ये लोग वनों एवं कृषि योग्य भूमि की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते थे, परन्तु वर्तमान में वनों का पतन एवं वनों पर सरकारी नियंत्रण के फलस्वरूप स्थान परिवर्ती कृषि-व्यवस्था समाप्त हो गई है। (भारतीय जनजातियाँ संरचना एवं विकास - डॉ. हरिश्चन्द्र उप्रेती)



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शनिवार, 7 जनवरी 2023

बुरा मान जाते हैं

 

बुरा मान जाते हैं अक्सर वह मेरी बात का

जब भी उनकी कोई कमी बताता हूँ मैं उन्हें

                      कृष्णधर शर्मा 05.01.23

शनिवार, 17 दिसंबर 2022

क्या है न्याय व्यवस्था की बीमारी का इलाज!

 इस संदर्भ में अगर भारतीय न्याय व्यवस्था का आकलन करें तो बहुत निराशाजनक दृश्य सामने आता है। इन दिनों लोग यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि कोर्ट के बाहर ही निपटारा कर लो वरना जिंदगी भर पांव घीसते रहोगे। यह बताता है कि भारत में न्याय इतनी देर से मिलता है कि वह अंधेर में बदल जाता है। यही कारण कि चीफ जस्टिस को कहना पड़ा कि 18 हजार जज मिलकर 3 करोड़ मुकदमों का भार नहीं उठा सकते।

 भारतीय न्याय व्यवस्था की स्थिति की पड़ताल उनके इस बयान के संदर्भ में जरूरी हो जाती है।  इस बयान से यह स्पष्ट रूप में समझ आता है कि भारतीय न्याय व्यवस्था जजों की कमी से जूझ रही है। जजों की संख्या बढ़ाया जाना सरकार की शीर्ष प्राथमिकता होना चाहिए। अमूमन राजनेताओं की इसमें दिलचस्पी कम ही होती है। अदालत की कछुआ चाल उनके लिए अधिक सुविधाजनक होती है। भले ही भ्रष्टाचार के मामले हों या फिर उनके कार्यों को चुनौती देने वाली याचिकाएं। उनकी इच्छा यही नजर आती है कि अदालत में जाने वाले मामले लंबे समय तक लंबित रहें। इसमें वे अपने लिए राहत देखते हैं। सरकार को चाहिए कि वह अदालतों को प्रकरणों के त्वरित निपटारे के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध करवाए।  

भारत के चीफ जस्टिस कहते हैं कि लोगों में इस बात के लिए चेतना लाना जरूरी है कि वे राजनेताओं को समय पर न्याय उपलब्ध कराने के लिए बाध्य करें। अपनी इस भूमिका से तो जनता भी अनजान ही है। लंबे समय से खाली पड़े जजों के पद न्याय को सुलभ कैसे करवा सकते हैं। सैंकडों साल चलने वाले मुकदमों से मुक्ति भी तभी संभव है जबकि पर्याप्त जज हों। फिर यह भी कि ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर सरकार के बजाय अदालत को अपना समय देना पड़ता है।   

दूसरे अर्थों में कहें तो जिस सुशासन की जिम्मेदारी सरकार पर है वह काम अदालत को करना होता है। सड़क पर सम और विषम नंबर वाले वाहनों के चलने का मुद्दा हो या फिर स्कूल में एडमिशन को लेकर गाइडलाइन का पालन। इन सभी मुद्दों पर अदालत का बहुत समय जाता है तो उसके पास आम आदमी के प्रकरणों के लिए समय कम हो जाता है। ये सारे मुद्दे कार्यपालिका की जिम्मेदारी पर ही छोड़ दिए जाने चाहिए। कार्यपालिका को इन मुद्दों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को निभानी चाहिए।  

ऊपर अपील से बढ़ रहा बोझ  न्यायपालिका को प्रकरणों के निपटारे का समय छह माह या एक वर्ष तय करना चाहिए जैसा दुनिया के अन्य विकसित देश कर रहे हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका में स्पीडी ट्रायल एक्ट 1947 के अनुसार यह सुनिश्चित किया गया है कि सारे प्रकरण एक समयसीमा में हल किए जाएंगे। केवल अपवाद के रूप में सामने वाले प्रकरणों में ही अधिक समय लग सकता है।  

हालांकि सिविल प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता में प्रकरण के विभिन्ना चरणों के लिए समय सीमा तय की गई है लेकिन पूरे प्रकरण के निपटारे के लिए लगने वाले अधिकतम समय के बारे में स्पष्टता का अभाव है। यह बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष को केस की सुनवाई को कई मर्तबा आगे बढ़वाने की सुविधा देता है और सालों साल केस अदालत में लटके रहते हैं। प्रकरण के स्थगन की सुविधा को लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है और अदालतें मूक दर्शक बनी हैं।  

भारत में बड़ी संख्या में की जाने वाली अपील भी बड़ा मुद्दा है। इसके कारण शीर्ष अदालतों पर बोझ बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और वहां प्रकरण इकट्ठा होते जाते हैं। अगर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे प्रकरणों पर नजर डालें तो उनमें कई प्रकरण बहुत ही मामूली बातों को लेकर भी हैं। तलाक और कॉलेज में एडमिशन के मामले भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं।  मामूली प्रकरण के सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाने की वजह यह है कि संविधान ने सुप्रीम कोर्ट तक जाने की आजादी हर व्यक्ति को दी है। हर व्यक्ति अपने केस की मेरिट देखे बगैर उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाता है। इसके लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है।  

भारत की न्याय व्यवस्था ब्रिटेन और अमेरिका मॉडल पर आधारित है और इसलिए वहां की न्याय प्रणाली को देखा जाना जरूरी है। एक अध्ययन के अनुरूप 2006 से 2011 के बीच भारतीय उच्चतम न्यायालय ने 500 सामान्य मामलों का निपटारा किया और हर महीने यहां 5000 केस नए आ गए। इसके मुकाबले इंग्लैंड की सुप्रीम कोर्ट में 2010 से 2013 के बीच एक दर्जन जज ने मिलकर एक वर्ष में औसतन 70 मामले निपटाए।  इन सुधारों से बन सकती है बात  उच्चतम न्यायालय के एक न्यायधीश के अनुसार निचली अदालतों में आने वाले प्रकरणों को उनकी प्रवृत्ति और स्थिति के अनुरूप अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाना चाहिए और तय किया जाना चाहिए कि किन प्रकरणों में त्वरित निर्णय जरूरी है। जैसे सीनियर सिटीजन और गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति के प्रकरणों में त्वरित सुनवाई की जरूरत होती है। यहां दूसरे मामलों की गंभीरता को कम करना बिल्कुल भी उद्देश्य नहीं है लेकिन व्यक्ति के जीते-जी मामलों का निपटारा जरूरी है।  

भारतीय अदालतों में अभी भी ज्यादातर काम कागज पर होता है जबकि विदेश की अदातलें पेपरलेस हो चुकी हैं। कार्यपालिका ने ई-कोर्ट्स की स्थापना को भी मंजूरी दे दी है लेकिन जिन अदालतों में काम कागज पर हो रहा है उसे सुधारने की जरूरत है। ई-कोर्ट्स में सारी प्रक्रिया ऑनलाइन होगी और लेटलतीफी से मुक्ति मिलेगी।  निचली अदालतों द्वारा लिखे जाने वाले फैसले बहुत स्पष्ट और संक्षिप्त होने चाहिए ताकि जब मामला ऊपरी अदालत तक पहुंचे तो अपीलीय अदालत बहुत जल्दी से पूरे मामले और उस पर सुनाए गए फैसले के कारणों को समझ सके।  किसी भी प्रकरण में बार-बार तारीख दिए जाने से जल्दी सुलझने वाला मामला लंबे समय तक चलता रहता है। मामले को स्थगित रखना दोषी का पक्ष लेने और न्याय की आस करने वाले के खिलाफ जाता है।  

26/11 या फिर सलमान खान हिट एंड रन केस या इसी तरह के अन्य बड़े मामलों का उच्च अदालत तक पहुंचना तय है तो फिर उनके लिए निचली अदालत का समय क्यों जाया हो। इन प्रकरणों को सीधे ही उच्च अदालत द्वारा क्यों न सुना जाए। बहुत सारे लोग निचली अदालतों के न्याय से ही संतुष्ट हो जाते हैं लेकिन वह न्याय भी उन्हें मिले तो।  न्यायालयों में जजों की नियुक्ति लंबे समय तक अटकी पड़ी रहती है और इस दिशा में त्वरित सुधार की जरूरत है ताकि जजों के खाली पड़े पदों पर नियुक्ति संभव हो सके। लॉ कॉलेज की स्थिति सुधारना भी आवश्यक।  फिजूल प्रकरणों को लंबे समय तक खींचने के बजाय उन्हें तुरत ही निपटाया जाए। 

बहुत छोटी बातों पर होने वाले विवादों को न्यायालय में स्वीकार किया जाएगा या नहीं इस पर भी स्पष्ट दिशा निर्देश होने चाहिए। खासकर तब जबकि अदालतों पर केस का इतना ज्यादा बोझ है।  टैक्स नीति या पर्यावरण नीति जैसे तकनीकी मुद्दों से जुड़े प्रकरणों में भी अदालत को बहुत वक्त देना पड़ता है जबकि इन मुद्दों को सरकार अपने स्तर पर निपटा सकती है।    

भारत और अमेरिका में यह फर्क  एक अन्य अध्ययन बताता है कि भारतीय उच्चतम न्यायालय अपने समक्ष आने वाली हर पांच में से 1 अपील को स्वीकार कर लेता है इस लिहाज से यह आने वाले मामलों के मुकाबले स्वीकार करने वाले मामलों का 20 प्रतिशत हुआ जबकि अमेरिका में यह दर केवल 1 प्रतिशत है। वहां 100 केस में से केवल 1 केस स्वीकार किया जाता है। इसी भारतीय न्यायधीशों पर काम का बोझ निश्चित रूप से ज्यादा है।  इन सारे कारणों से भारतीय न्याय व्यवस्था में न्याय के लिए लगाई जाने वाली पुकार दबकर रह जाती है। न्याय की आस में गुहार लगाने वालों को लंबे समय इंतजार करना पड़ता है। सिर्फ जज की संख्या बढ़ाए जाने से काम नहीं चलेगा और व्यवस्था के अन्य पक्षों पर भी सुधार की दरकार है। जजों की कमी तो इस पूरी व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भर है। 

विदेशों में लंबित प्रकरण इसलिए नहीं  दुनिया के विकसित देशों में अदालतों में प्रकरणों के लंबित रहने की समस्या नहीं है। उदाहरण के लिए अमेरिका के उच्चतम न्यायालय में सिलेक्टिव डॉकेट सिस्टम लागू है। वहां किसी याचिका को स्वीकार करने से पहले सुप्रीम कोर्ट के 9 में से 4 जज का मानना जरूरी है कि याचिका में ऐसे प्रश्न हैं जों संघीय कानून या संविधान की अधिक व्याख्या की मांग करते हैं। इस तरह उसके सामने हर वर्ष जो 7000 याचिकाएं पहुंचती हैं उनमें से केवल 75-80 को ही सुना जाता है।  

जर्मनी जैसे देशों में फेडरल कॉन्स्टीट्यूशनल कोर्ट हर प्रस्तुत याचिका को परखती है। 3 जज की एक पैनल जिसे चेम्बर कहा जाता है प्रकरणों की जांच करती हैं। ऐसी याचिकाएं जो कोई नया मुद्दा नहीं उठाती उन्हें तुरंत खत्म किया जाता है। कोर्ट केवल उन्हीं याचिकाओं को सुनती है जो चेंबर की जांच में खरे उतरते हैं।  अमेरिकी अदालत में एक बार केस डॉकेट में आ जाने के बाद तय समय-सीमा का पालन होता है। सुनवाई की तारीख कोर्ट के कैलेंडर में दर्ज हो जाती हैं। एक बार कैलेंडर में दर्ज हो जाने पर उनमें शायद ही कोई बदलाव होता है। हर केस को दो सप्ताह में सुनवाई के लिए लगाया जाता है और वकीलों को अपने पक्ष में 30 मिनट दिए जाते हैं। इसके अतिरिक्त समय किसी भी वकील को नहीं दिया जाता। इस तरह तुरंत न्याय उपलब्ध कराया जाता है।

अभिषेक कपूर

मंगलवार, 13 दिसंबर 2022

नया बहेलिया

बहेलिया जाल बिछाता है

उसमें दाने फैलाता है

पंछी उस दाने के लालच में

जाल में फंस जाता है

आप कहेंगे इसमें नया क्या है!

इसमें नयी बात यह है कि

जो नया बहेलिया आया है

उसने भी वही जाल बिछाया है

वही दाने फैलाया है

मगर इसे बहेलिये का हुनर ही कहेंगे

जो पंछी उसके जाल में फंसता है

वह कुछ सोच-समझ ही नहीं पाता है

इसलिए वह बहेलिये का ही गुण गाता है

              (कृष्णधर शर्मा 13.12.2022)


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मंगलवार, 6 दिसंबर 2022

माँ-बाप के ऋण

कैसी तबियत है आपकी!

खाना खा लिए या अभी नहीं!

और सब तो ठीक-ठाक है न!

फोन पर सिर्फ इतना सुन लेने से

दिन में दो बार

खुश हो जाते हैं माँ-बाप

क्योंकि वह जानते हैं कि

बेटा सिर्फ इतना ही पूछ सकता है

वह चाहकर भी नहीं पूछ पाता है

कि कुछ रूपये-पैसे की जरुरत तो नहीं है न!

चाहता तो जरुर होगा बेटा यह पूछना!

मगर क्या करे, उसकी भी तो गृहस्थी है न

उसके बीवी-बच्चे हैं शहर में

जिनकी जरूरतें भी तो हजार होती हैं

मंहगाई के इस ज़माने में

इसलिए वह नहीं पूछ पाता

अपने माँ-बाप से कभी भी

हाँ, मगर जब भी आता है गाँव

तो अपने बीवी-बच्चों से छुपाकर

पकड़ा देता है हजार-पांच सौ रूपये

मुक्त हो जाता है अपने कर्तव्यों से

और माँ-बाप के ऋणों से भी वह...

            (कृष्णधर शर्मा 6.12.2022)

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सोमवार, 5 दिसंबर 2022

दांत या नाखून का पत्थर- मुद्राराक्षस

 'सच बात है, बुड्ढा अजीब ही था। मुख्यमंत्री ने उसकी एक बड़ी मूरत लगवायी थी एक बार कहते है आधा करोड़ रुपया खर्च हो गया था उसमें बुड्ढा जाने कब वहां गया। पहले तो उसने उस मूरत को गिराने की कोशिश की। मगर वह तांबे की बनी थी। काफी वजनी थी। बुड्ढे ने एक पत्थर लेकर उसकी नाक और आंखें पिचकार्थी और गुस्से में उसके ऊपर पेशाब करके आ गया। सुबह उस पर एक परचा चिपका हुआ लोगों ने देखा, लिखा था- हे राम, ये लोग आदमी को तब तक नहीं पहचानते, जब तक वह देवता न हो जाये। कोई देवता न होना चाहे तो उसे जबरदस्ती बनाते हैं। बड़ा बनने और बनाने का रिवाज कब टूटेगा? मेरे हरिजन भाई की मूरत यहां क्यों नहीं लगी? इतने पैसे लगा दिए, अरे, मेरे गरीब देश को दे देते ये पैसे! 

नीचे दस्तखत था मोहनदास कर्मचन्द गांधी।   लोगों को बहुत अच्छा नहीं लगा। परसराम लिमिटेड के मालिक ने दस लाख रुपया दिया था मूरत के लिए। उसने अपने अखबार में इस बात पर आक्रोश प्रकट किया कि ऐसे कीमती स्मारकों को अपवित्र होने से सरकार बचा नहीं सकती। इसके बाद स्थिति और बुरी हो गयी। दुनिया से गरीबी दूर करने की समस्या पर विचार करने के लिए एक बहुत बड़ा सम्मेलन राजधानी में आयोजित हुआ था। दुनिया के बड़े-बड़े देशों से ऊंची-ऊंची हस्तियां आ रही थीं, जिनके लिए खूबसूरत इलाके में शानदार इमारतें बनायी गयी थीं। इन इमारतों में बड़े लोगों की बड़ी-बड़ी सुविधाएं रातों-रात तैयार की गयी थीं और यहीं बुड्ढे ने गड़बड़ी खड़ी कर दी।    

इमारतों के पाखानों की सफाई के लिए भगियों की फौज में बुद्धा भी आ खड़ा हुआ था। आजादी की लड़ाई के दिनों जो पत्रकार महीनों गांधी के साथ रहा था, उसने एक सुबह देखा, उसके फ्लैट के पाखाने की सफाई वही जाना-पहचाना बुड्ढा कर रहा था। वह फ्रांसीसी पत्रकार अंग्रेजी कम जानता था। फ्रांसीसी में लगभग चीखता हुआ फ्लैट से बाहर भागा। थोड़ी देर में वहां विदेशी देशी प्रतिनिधियों की भीड़ लग गयी। बुड्ढा किसी से कुछ नहीं बोला। बुड्ढा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छपी तस्वीरों से काफी अलग था। हजामत शायद कई रोज से नहीं हुई थी। सर्दी के मौसम में भी उसने सिर्फ एक अंगोछा कमर पर लपेट रखा था। बदन पर बेहद मैला, फटा हुआ, तंग करता था। उसके बदन की खाल जगह-जगह से चटख-सी गयी थी। दरवाजे के पास उमड़ी हुई भीड़ के चेहरे पर किसी कदर आतंक भरा कुतूहल था। धैर्य के साथ अपना काम खत्म करने के बाद फिनायल का डिब्बा, पोंचा और झाडू उठा ली। दरवाजे के करीब वह आया तो सहसा भीड़ बीचों-बीच से फट गई। बुड्ढा बाहर आया, फिर ठिठक गया। कमर में उसने कुछ परचे उड़स रखे थे। शायद वह इसके लिए तैयार था। उसने परचों को सावधानी से खोला और उनमें से कुछ परचे उसने लापरवाही से फर्श पर फेंक दिए और भीगे पांव घसीटता हुआ सीढियों की ओर चल दिया। गनीमत थी कि परचे लोगों के हाथों सही-सलामत आ गए। परचों पर विशेष कुछ नहीं था, सिर्फ लिखा था -हमारी गरीबी का मजाक मत उड़ाओ, महलों में गरीबी पर बहस होने भर से आदमी का दुख कम नहीं होगा, बढ़ेगा। यहां से चले जाओ, हमें हमारे हाल पर छोड़ दो!-गांधी। (दांत या नाखून का पत्थर- मुद्राराक्षस)



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शनिवार, 12 नवंबर 2022

उन्होंने जीतना ही कब चाहा था मुझे

 

उन्होंने जीतना ही कब चाहा था मुझे

मैं तो ज़माने से बैठा था हारने के लिए

                     कृष्णधर शर्मा 12.11.22

सोमवार, 7 नवंबर 2022

आधुनिक मीराबाई- उमा सिंह

 एक बात तो तय है कि ईमानदारी का रास्ता होता कठिन है, मगर मान सम्मान में अवश्य वृद्धि होती है। आत्मसंतुष्टि रहती है, इसका भी अपना सुख है। सचिव साहब ने जब मेरी पीठ थपथपाई कितना आनन्द मिला था। मुझे धन के सुख से कहीं अधिक यह सुख लगा। अधिक धन होना भी सुख चैन हराम कर देता है। उसके खो जाने के गम में असली सुख भी खो जाता है। अपना सिद्धांत है, "सांई इतना दीजिए जाके कुटुम्ब समाय। मै भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाय।" बहुत अधिक संग्रह करके क्या करूँगा ? (आधुनिक मीराबाई- उमा सिंह)



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गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

दर्द से जबसे हमने

 

दूर सारी तकलीफें अब हमसे हो गईं

दर्द से जबसे हमने दोस्ती कर ली

                      कृष्णधर शर्मा 19.10.22

रविवार, 9 अक्टूबर 2022

शातिर बुद्धिजीवी

 अधिकतर लोग काम करके, मेहनत-मजदूरी से

कमाते हैं, अपने परिवार के गुजर-बसर के लिए

मगर एक शातिर बुद्धिजीवी कमाता है

अपनी बुद्धि का उपयोग या दुरुपयोग करके

जो रहता है तमाम तकलीफ़ों के परे

एक सुविधासम्पन्न वातानुकूलित मकान में

जो खुद कोई काम करने के बजाय

अपनी कलम और जुबान चलाना ज्यादा पसंद करता है 

बेहद ही सुविधाभोगी और अवसरवादी होता है

बुद्धिजीवी नाम का यह शातिर प्राणी

अपनी सुविधानुसार रिश्तों को पाज़ कर देना

फिर अपनी सुविधानुसार ही रेज्यूम कर देना

कायल हूँ मैं, बुद्धिजीवीवियों की इस अद्भुत कला का

बहुत ही बारीकी से, लाभ-हानि का सारा गणित

कर लेते हैं अपने ही पक्ष में, ये शातिर बुद्धिजीवी

कई बार आपको लगेगा कि, आपकी तारीफ कर रहे हैं ये

मगर उस तारीफ में भी, कितना मोटा मुनाफा

कमा लेते हैं ये शातिर बुद्धिजीवी

यह समझना, आपके बूते की बात नहीं है फिलहाल

जब तक, आप भी नहीं बन जाते एक शातिर बुद्धिजीवी 

                    (कृष्णधर शर्मा 9.10.2022)

सोमवार, 12 सितंबर 2022

साहित्यिक संस्था के रजिस्टर

 नहीं पड़ता हूँ किसी गुटबाजी में

नहीं लिखा पाता अपना नाम

किसी भी साहित्यिक संस्था के रजिस्टर में

नहीं शामिल हो पाता देर रात तक चलनेवाली

बड़े-बड़े लेखकों की बड़ी-बड़ी पार्टियों में

जिसमें साहित्य के अलावा सबकुछ रहता है

नहीं लगा पाता मस्का किसी मसखरे लेखक को

उसकी अनाप-शनाप और लिजलिजी रचनाओं पर

नहीं कर पाता तारीफ किसी लिपी-पुती लेखिका की

औचित्यहीन कविताओं का

चाह कर भी नहीं बज पाती है मेरी ताली

किसी नामचीन लेखक की हलकी रचनाओं पर

अच्छा नहीं लगता मुझे अक्सर

खाए-अघाए बूढ़े लेखकों को

किसी नवयुवती लेखिका की खुशामद करते हुए

अपनी उम्र का भी ख्याल न करके लार टपकाते देखकर

               (कृष्णधर शर्मा 12.9.2022)