नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

सोमवार, 23 नवंबर 2020

एक महिला की हिम्मत से सैंकड़ों की समस्याएं सुलझ रहीं

सरकार के स्तर पर नागरिकों के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं व कार्यक्रम हैं। विशेषकर निर्धन वर्ग व जरूरतमंद महिलाओं के लिए ऐसे अनेक कार्यक्रम हैं जो सही ढंग से उन तक पहुंचें तो काफी राहत पंहुचा सकते हैं। इसके अतिरिक्त समुदाय की आंतरिक समस्याओं से भी राहत मिलने के सरकार के कार्यक्रम है। उदाहरण के लिए घरेलू हिंसा से रक्षा के लिए महिलाओं के लिए अनेक कानूनी प्रावधान हैं व सहायता के कार्यक्रम हैं। 

समस्या यह है कि प्राय: सबसे जरूरतमंद लोगों तक इन कार्यक्रमों का लाभ नहीं पहुंच पाता है। न तो उनके पास इनकी जानकारी पंहुचती हैन वे इतने शिक्षित व सक्षम होते हैं कि इस राहत को प्राप्त करने के लिए समुचित प्रयास वे कर सकें। इस स्थिति में निर्धन वर्ग के बीच निरंतरता से कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता पूरी ईमानदारी व कर्मठता से अपनी भूमिका निभाएं तो वास्तविक जरूरतमंदों तक सरकारी लाभ पहुंचाने में व घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं से रक्षा उपलब्ध करवाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। ऐसी ही भूमिका जयपुर की अनेक निर्धन बस्तियों में पुष्पा सैनी ने निभाई है।

पुष्पा सैनी ने स्वयं अपने निजी जीवन में भी बहुत कठिन स्थितियों का सामना सराहनीय साहस व दृढ़ निश्चय से किया है। प्रतिकूल स्थितियों में उन्होंने न केवल उच्च शिक्षा प्राप्त की अपितु अपने को समाज सेवा के कार्यों से निरंतर जोड़ा। पुष्पा का भरसक प्रयास रहा कि वे अन्य महिलाओं के दुख-दर्द को कम करने में सहायक बनें। इस कार्य में उन्हें जानी-मानी समाज सेविका प्रो. रेणुका पामेचा से बहुत सहयोग व प्रोत्साहन मिला। पुष्पा पहले उनकी छात्रा रही व फिर महिला हिंसा को कम करने में उनकी सह-यात्री बनी। रेणुका पामेचा ने महिला सलाहकार एवं सुरक्षा केन्द्र की स्थापना में व संचालन में अग्रणी भूमिका निभाई। हिंसा की शिकार महिलाओं को राहत दिलवाने के लिए उन्होंने महिला थानों की स्थापना के लिए अथक प्रयास किए। 
जब गांधीनगर (जयपुर) में महिला थाने की स्थापना हुई तो वहां महिला सलाहकार एवं सुरक्षा केन्द्र ने उच्च गुणवत्ता की जो काऊंसलिंग उपलब्ध करवाई उससे संकटग्रस्त महिलाओं की समस्याओं के समाधान में बहुत सहायता मिली। पुष्पा सैनी ने भी पहले यहां काऊंसलिंग की ही जिम्मेदारी संभाली और इसे बहुत मेहनत व योग्यता से निभाया। बाद में परिस्थितियां बदलने पर यह जरूरत महसूस हुई कि काऊंसलिंग व अन्य सहायता का कार्य कुछ निर्धन बस्तियों की महिलाओं के अधिक नजदीक रहकर किया जाए। 

इसी समय के आसपास पुष्पा सैनी को इस कार्य के लिए डैमोक्रेसी फैलोशिप भी प्राप्त हुई। इस फैलोशिप के अंतर्गत उन्हें विभिन्न सामाजिक समस्याओं से जूझने वाले अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलने व उनके अनुभवों से सीखने का अवसर भी मिला। अनेेक स्तरों पर उन्हें क्षमता विकास के अवसर मिले व इससे अपनी नई जिम्मेदारियों को निभाने में उन्हें सहायता मिली। पुष्पा का कार्यक्षेत्र जयपुर में भट्टा नगर व शास्त्री नगर है। 
यहां संजय नगरराणा कालोनी जैसी अनेक बस्तियां है। इन बस्तियों में निर्धन व जरूरतमंद लोग अधिक है। मुस्लिम बहुल आबादी है। जरूरत पड़ने पर सामान्य कार्यक्षेत्र से बाहर भी पुष्पा पहुंचती हैं। इन बस्तियों में महिला हिंसा की समस्या कम करने में पुष्पा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। प्राय: हिंसा की शिकार अधिकांश महिलाओं का प्रयास यही होता है कि हिंसा होने पर पति (या परिवार के अन्य सदस्य) पर हिंसा की राह छोड़ने के लिए दबाव पड़े। इसमें पुष्पा की भूमिका महिला सलाहकार एवं सुरक्षा केन्द्र की सहायता से यह रहती है कि उन्हें बुलाकर समझाया जाए व यह चेतावनी भी दी जाए कि यदि उन्होंने हिंसा की राह नहीं छोड़ी तो कानून के अन्तर्गत बहुत कड़ी कार्यवाही उनके विरुद्ध होगी। प्राय: इसका असर हिंसा करने वाले पुरुषों पर होता है व वे आगे हिंसा नहीं करते हैं।

पुष्पा ने चूंकि अपना कार्यालय इन बस्तियों के बहुत नजदीक बनाया है व वहां निरंतर जाती रहती हैंअत: अब महिलाओं के लिए संपर्क करना सरल हो गया है व अधिक आसानी से वे अपनी समस्या का समाधान करा पाती है। पुष्पा ने एक मिसाल कायम की है कि ई-मित्र की भूमिका को पूरी ईमानदारी व निष्ठा से निभाया जाए तो यह भूमिका कमजोर वर्गविशेषकर महिलाओं के लिए कितनी लाभदायक हो सकती है। 
ई-मित्र के माध्यम से महिलाओं को पेंशनराशनश्रमिक पंजीकरणविभिन्न योजनाओं व पहचान पत्र के लिए जरूरी सहायता भट्टा बस्तीशास्त्री नगर आदि के लोगों को उपलब्ध करवाई जाती हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी को पेंशन नहीं मिल रही है या पहले मिलने के बाद अब रुक गई है तो पहले कंप्यूटर पर उसकी स्थिति को भली-भांति देखकर जानकारी दी जाती है व फिर आगे जिस विभाग या अधिकारी से संपर्क करना है वह सहायता भी दी जाती है। 
जन-सुनवाई जैसे कार्यक्रम में भी उनकी समस्या को उठाया जाता है। जन-सुनवाईयों के माध्यम से समस्याओं का समाधान प्राप्त करने का सामाजिक तरीका असरदार सिद्ध हुआ है। महिलाओं में आजीविका अवसर बढ़ाने के लिए महिला पुनर्वास समूह समिति इस क्षेत्र में सक्रिय रही है और पुष्पा संस्था की कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय है। इस संस्था की ओर से यहां सिलाई सिखाने का कार्य किया गया है जिसमें स्थानीय महिलाओं ने बहुत रुचि ली।

आज अनेक महिलाए इस प्रशिक्षण पर आधारित अपनी आय के अवसर प्राप्त कर सकी हैं या बढ़ा सकी हैं। शिक्षा के बाद युवाओं के लिए आजीविका व कौशल-वृद्धि के अवसर कहां उपलब्ध हैंइसके बारे में भी पुष्पा व समिति की ओर से महत्त्वपूर्ण जानकारी बस्ती स्तर पर उपलब्ध करवाई जाती है। इस कारण अनेक युवा महत्त्वपूर्ण प्रशिक्षणों से जुड़ सके व रोजगार प्राप्त कर सके। 
पुष्पा सैनी का चयन 'डेमोक्रेसी फैलोशिप के रूप में हुआ तो विभिन्न जिम्मदारियों को और भी बेहतर ढंग से निभाने के लिए फष्पा को अपनी क्षमता वृद्धि के भी पर्याप्त अवसर मिले। उदाहरण के लिए ई-मित्र चलाने के लिए प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। यह प्रशिक्षण पुष्पा के लिए व्यवहारिक स्तर पर बहुत उपयोगी रहा। इस फैलोशिप से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला। विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की जानकारी लोगों तक सहज व सरल रूप में पहुंच सकेउसके लिए महिला पुनर्वास समूह समिति ने दो बहुत उपयोगी पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया है। इन्हें तैयार करने में भी पुष्पा ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया व अनेक कार्यालयों में जा कर वहंा से जरूरी जानकारी प्राप्त की। अपनी समस्याओं से घबराए बिना उनका सामना मजबूती से करते हुए पुष्पा ने जिस तरह सैंकड़ों महिलाओं की गंभीर समस्याओं के समाधान में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया हैयह बहुत हिम्मत वाली प्रेरणादायक यात्रा रही है। 
(भारत डोगरा) 
#समाज की बात #SamajkiBaat #कृष्णधर शर्मा 





बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

जहालत के पचास साल- श्रीलाल शुक्ल

 "बया ने बन्दर से कहा 'ऐ भाई, तुम क्यों इस घोर वर्षा में कष्ट उठा रहे हो? तुमने शायद मेहनत करके अपना घोंसला नहीं बनाया। इसी कारण तुमको इतना कष्ट हो रहा है। देखो, हमने कितना सुन्दर घोंसला बना लिया है। इसी से हम इस बरसात और जाड़े में भी सुखी हैं। तुम भी अगर आलस त्याग कर अपना घर बना डालो तो तुम्हें इस भयंकर ऋतु का कष्ट न झेलना पड़े। ऐ भाई, साहस और पुरुषार्थ से काम लो।' बन्दर को न जाने क्या सूझा कि वह दाँत निकालकर घोंसले पर झपटा। उसने बया के अंडे तोड़ डाले। उसका घोंसला उजाड़ दिया।

 बया घबराहट में कुछ और न करके चीखने लगा। उसका घोंसला उजड़ गया और वह अपनी पत्नी के साथ दुखी होकर उजड़े हुए घोंसले पर शोक प्रकट करता रहा। सच है, नीच को कभी अच्छी सलाह नहीं देनी चाहिए।" (जहालत के पचास साल- श्रीलाल शुक्ल)



#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात


रविवार, 11 अक्टूबर 2020

माहौल-ए-रंजिश में

 खुशकिस्मत हैं वो मयस्सर है जिन्हें नींद का तोहफा

इस माहौल-ए-रंजिश में भला नींद कहाँ आती है

                       कृष्णधर शर्मा 10.10.20

बुधवार, 23 सितंबर 2020

जातक कथाएं-नरेंद्र शर्मा

 "एक खरगोश नारियल के पेड़ के नीचे आराम से सो रहा था, नींद में उसे यह ख्याल आया कि यह धरती फटने वाली है, इस धरती के फटने से सब कुछ नष्ट हो जाएगा। यह हरा-भरा जंगल धरती के फटते ही नीचे पातालदेश में पहुंच जाएगा। इसके साथ ही हम सब मारे जाएंगे।  

डर के मारे खरगोश का सारा शरीर कांप उठा। उसने समझ लिया कि अब उसका आखिरी वक्त करीब आ रहा है, इसी बीच नारियल के पेड़ से दो-चार नारियल एकदम से टूटकर नीचे आ गिरे। उनके नीचे गिरते ही एक जोरदार धमाका सा हुआ जिसे सुनकर पहले से ही डरा हुआ खरगोश और डर गया। यह धमाका सुनते ही वह समझ गया कि वास्तव में ही धरती फटने लगी है...। फिर क्या था, वह पागलों की भांति पेड़ के नीचे से उठकर भागा और साथ ही चीखने लगा- बचाओ, बचाओ। मौत आ रही है, बचाओ। 

उसे देखकर जंगल के और सारे जानवर भी भागने लगे और सब चिल्लाते जा रहे थे कि भागो-भागो धरती फटने वाली है, सब जान बचाकर भागो... (जातक कथाएं-नरेंद्र शर्मा)




#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात


शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

तेरे धोखे का क्या अंजाम होगा

 मैं तो लौट आऊंगा हर दरो-दीवार, हर जंजीर को तोड़कर

तू अपना सोच कि तेरे धोखे का क्या अंजाम होगा काफ़िर

                        कृष्णधर शर्मा 17.10.20

रविवार, 13 सितंबर 2020

छत्तीसगढ़ मित्र- छत्तीसगढ़ की प्रथम हिन्दी मासिक पत्रिका

 कोई-कोई लोग ऐसे हैं कि वे अपने मित्र के घर के भीतर बिना ही सूचना दिए चले जाते हैं और दिन भर में जितने बार उन्हें फुरसत मिलती है उतने ही बार मित्र के यहां पहुंचते हैं। ऐसे लोग घने मित्र होने पर भी अपनी कदर खो देते हैं। मित्र के घर में जाकर उसकी हर एक चीज बड़े गौर से देखना, उसकी किताबें इधर-उधर उठाना, और उसके हर एक काम में अपनी राय देने बड़प्पन के बिल्कुल विरुद्ध है। यद्यपि तुम इसका अधिकार रखते हो कि अपने मित्र के घर को अपना ही घर समझो, तो भी इससे यह सिध्द नहीं होता कि तुम अनजाने लोगों को भी अपने साथ उसके खास कमरे में ले जाओ।  

मुलाकात का सबसे अच्छा समय सवेरे के सात बजे से नौ बजे तक और शाम के चार बजे से सात बजे तक है। (छत्तीसगढ़ मित्र- छत्तीसगढ़ की प्रथम हिन्दी मासिक पत्रिका, वर्ष 2सरा अंक 6वां)




#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात

 


गुरुवार, 10 सितंबर 2020

अवमानना

बंगलेनुमा आलीशान मकान में 
बेतहाशा बजते लाउडस्पीकर पर 
बज रहे हैं देशी-विदेशी गाने 
चल रहे हैं दौर पार्टी में 
एक से बढ़कर एक  पकवानों के 
परोसी जा रही हैं मेहमानों को 
मंहगी लाजवाब विदेशी शराबें 
थिरक रहे हैं मस्ती में कुछ जोड़े 
दुनिया के रंजो-गम से बेफिक्र 
मना रहे हैं सब मिलकर उत्सव
खुशियों का उपलब्धियों का 
उसी आलीशान मकान से 
कुछ सौ मीटर की दूरी पर 
सड़क के किनारे बेकार से पड़े 
पुलिया पाइप के अन्दर 
मूसलाधार बरसती हुई रात में 
भीगने से बचने की 
असफल कोशिश में 
पांच जनों का परिवार 
गीले होकर ठिठुरते और 
भूख से छटपटाते हुए 
तीन साल के बच्चे को 
रोटी न पहुंचा पाना 
लोकतंत्र की अवमानना नहीं है 
तो और क्या है माननीय!...
            कृष्णधर शर्मा 2.9.2020 

बुधवार, 9 सितंबर 2020

छत्रपति- मनु शर्मा

 "शिवाजी ज़ोर से हँस पड़े। बोले, 'सम्मान में बट्टा छिपकर आक्रमण करने से नहीं लगता, पराजित होने से लगता है। और यह तो युद्ध-नीति है कि जो जिस प्रकार लड़ना चाहे उसका उत्तर हमें वैसे ही देना चाहिए।" (छत्रपति- मनु शर्मा)



#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात


सोमवार, 7 सितंबर 2020

पीढियां-अमृतलाल नागर

 "उन्नीसवीं सदी के आरम्भिक काल तक अन्न उत्पादन ही हमारे देश का प्रमुख कार्य था। हमारे गांवों की लगभग नब्बे प्रतिशत आबादी उसी पर निर्भर थी। इसके अलावा कुछ वंश-परम्परागत जातीय पेशे और कुटीर उद्योग भी यहां आ पहुंचे। इन उद्योगों के मालिक भी अधिकतर अंग्रेज ही थे। उनकी मुनाफ़ाखोर प्रवृत्ति ने भारतीय ढांचे को ही बदल दिया। 

अच्छी-अच्छी जातियों के लोगों को जो कभी अपने हाथ से हल नहीं पकड़ते थे, बढ़ती मंहगाई की मजबूरी से मिलों में मजदूरी तलाश करनी पड़ी। उन्हें चौदह से सोलह घंटे काम करना पड़ता था। सवेरे मिल का भोंपू बजते ही मिलों में चले जाते और रात में ही वापस आ पाते थे। न खाने की मोहलत, न घड़ी-पल आराम करने की। पाखाने-पेशाब की हाजत लगे तो एक लोहे का वजनी नंबर लेकर जाना पड़ता था। मजदूरों के अंग्रेजी ढंग के बाल कटे देख लेने पर मास्टर उन्हें चमड़े के पट्टों से मारता था। इसके अलावा मजदूर परिवारों की बहू-बेटियों की इज्जत पर भी तरह-तरह के अमानुषिक हमले हुआ करते थे। (पीढियां-अमृतलाल नागर)



#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात

 


गुरुवार, 27 अगस्त 2020

भादों की इस भारी बारिश में

कितने ही चेहरे खिल उठे होंगे
सूखे सावन के बाद हुई
भादों की इस भारी बारिश में
कितने ही अरमानों को आज
पंख मिल गए होंगे
भादों की इस भारी बारिश में
कितने ही तो भजिये खाकर
इतराते होंगे, इठलाते होंगे
भादों की इस भारी बारिश में
कितने ही कवि कवितायें
लिखते होंगे इस बारिश पर
भादों की इस भारी बारिश में
कितनी ही कच्ची दीवारों ने
दम तोड़ा होगा आज अपना
भादों की इस भारी बारिश में
कितने ही बेघर हुए होंगे आज
भादों की इस भारी बारिश में
कितने ही चूल्हे जले न होंगे
भादों की इस भारी बारिश में
चूल्हे को तकती आँखों को देख
कितनी ही माएं होंगी उदास
भादों की इस भारी बारिश में
            (कृष्ण धर शर्मा, 19.08.2020)

बुधवार, 26 अगस्त 2020

मध्यकालीन कला एवं संस्कृति एक सर्वेक्षण -धीरज कुमार राय

 "इतिहास के साधनों में शिलालेख, पुरालेख और साहित्य के समानान्तर कला भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके द्वारा हमें मानव की मानसिक प्रवृत्तियों का ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता वरन निर्मितियों में उनका कौशल भी दिखलाई देता है। यह कौशल तत्कालीन मानव के विज्ञान तथा तकनीक के साथ-साथ समाज, धर्म, आर्थिक, और राजनीतिक विषयों का तथ्यात्मक विवरण प्रदान करने में इतिहास का स्रोत बन जाता है। इसमें स्थापत्य, मूर्ति, चित्र, मुद्रा, वस्त्राभूषण, श्रृंगार-प्रसाधन, घरेलू उपकरण इत्यादि जैसे कई विषय समाहित हैं जो पुनःविभिन्न भागों में विभक्त किये जा सकते हैं। (मध्यकालीन कला एवं संस्कृति एक सर्वेक्षण -धीरज कुमार राय)



#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात


शनिवार, 22 अगस्त 2020

बस्तर मेरा देश- सनत कुमार जैन

 "इन वन प्रान्तों में रहकर हमेशा से लगता था मुझमें जो ऊर्जा है वह यहां बहने वाली वायु से मिलती है। बसंत ग्रीष्म में आम के बौरों व काजू के फूलों से उठती मदमस्त गंध से, लाल टेसू के फूलों की लालाई से। मानों निश्छल पवन अपने अदृश्य झूलों में बिठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाती हो। इस प्राकृतिक ऊर्जा से लैस हर वक्त तरोताजा महसूस होता है। पर शहर की बंद गलियों में इस शरीर का रहना जीवन की भौतिक मजबूरी है। आत्मा तो आज भी गांव के खेत-खलिहान, जंगल-बियावान में भटकती है।"

 (बस्तर मेरा देश- सनत कुमार जैन)



#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात



बुधवार, 19 अगस्त 2020

दुनिया को एक संदेश है राम जन्मभूमि मंदिर

 अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर दोबारा बनने जा रहा है। इस बीच, दुनिया के एक दूसरे हिस्से से आई खबर ने मेरा ध्यान खींचा है। इस्तांबुल में हागिया सोफिया म्यूजियम को हाल में फिर से मस्जिद बना दिया गया। यह तुर्की की सबसे बड़ी अदालत का फैसला था। तुर्की गणराज्य के संस्थापक कमाल अतातुर्क ने 1935 में सेक्युलरिज्म की राह पकड़ी थी और इसे म्यूजियम बना दिया था। लेकिन अदालत ने उनका निर्णय पलट दिया। दो साल पहले मैं तुर्की गया था। मुझे तभी लगा था कि वहां के लोगों के लिए यह भावनात्मक मुद्दा है। वे अपनी पवित्र जगह पर एक बार फिर इबादत करने को बेकरार थे। 

वहां के अधिकतर लोगों की नजर में म्यूजियम को फिर से मस्जिद बनाना बिल्कुल सही है, लेकिन मुझे ग्रीक ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों का दर्द भी समझ में आ रहा है।  प्रार्थना की हूक हागिया सोफिया बहुत पहले चर्च था। 1453 में तुर्कों ने कुंस्तुनतूनिया फतह कर लिया। वही कुंस्तुनतूनिया, जो करीब एक हजार साल से ग्रीक ऑर्थोडॉक्स चर्च का मरकज था। तुर्कों ने उसका नामोनिशान मिटा दिया। बसाया एक नया शहर इस्तांबुल और हागिया सोफिया चर्च को मस्जिद बना दिया। तो क्या ग्रीक ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों के मन में वहां प्रार्थना करने की हूक नहीं उठती? कुछ समय के लिए हागिया सोफिया एक रोमन कैथलिक चर्च भी था। ऐसे में क्या रोमन कैथलिक ईसाई भी वहां प्रार्थना नहीं करना चाहते होंगे? 

सबसे बड़ी विडंबना यह कि किसी को भी आदिम धर्म (पैगन) में विश्वास करने वालों के टेंपल का दर्द महसूस नहीं हो रहा। वह टेंपल, जिसकी बुनियाद पर 1500 साल पहले हागिया सोफिया को बनाया गया। दरअसल यूरोप में प्रचलित धर्मों से अलग आदिम धर्मों को मानने वाला अभी शायद ही कोई हो। तो जब कोई पैगन है ही नहीं तो उस ऐतिहासिक गलती का दर्द कौन महसूस करे?  पैगन एक निषेधात्मक शब्द है। इसका इस्तेमाल उनके लिए किया जाता है जो अब्राहमिक न हों। यानी जो इस्लाम, ईसाई या यहूदी धर्मों को न मानते हों। 

लोग भूल गए हैं कि एक समय पूरा विश्व ही ‘पैगन’ था। मूर्ति पूजक था, देवियों की पूजा करता था और प्रकृति उपासक था। उन लोगों के लिए कोई एक सच नहीं था। वे दिव्यता के कई रूपों के साथ सहज थे। यहां तक कि नास्तिक भी उनमें शामिल थे। लेकिन वे सारी संस्कृतियां नष्ट कर दी गईं। अधिकतर को खून-खराबे के जरिए मिटाया गया। दूसरों के धर्म परिवर्तन के जरिए अपना विस्तार करने में यहूदी धर्म की दिलचस्पी ना के बराबर थी। लेकिन ईसाइयों और मुसलमानों ने आदिम धर्मों पर विश्वास रखने वालों पर बेइंतहा जुल्म किए, उनका नरसंहार किया।  कैथरीन निक्सी की ‘द डार्केनिंग एज’ सहित कई किताबों में इसका दुखद वर्णन है। 

हालांकि यह बात भी पुरजोर तरीके से कही जानी चाहिए कि सभी ईसाइयों या मुसलमानों ने पैगन लोगों पर अत्याचार नहीं किए। कुछ समूह थे, जिन्होंने मार-काट की। इनमें सबसे आगे थे यूरोप के ईसाई और तुर्किक मुसलमान। यह हिंसक विस्तारवादी रुझान अफ्रीकी ईसाइयों और इंडोनेशिया के मुसलमानों में नदारद था। लेकिन यह भी है कि यूरोप और तुर्की के अभी के लोगों का उनके पूर्वजों के कृत्य से कोई लेना-देना नहीं है।  इतिहास की यह बात हम भारतीयों के लिए क्यों अहम है? इसलिए कि हम उन कुछ ‘सनातन संस्कृतियों’ में से हैं, जिनका अस्तित्व खत्म नहीं हुआ। 

कांस्य युग के पहले की एकमात्र सभ्यता हमारी है, जो निरंतर चली आ रही है। चीन भी ‘पैगन कल्चर’ है लेकिन वह कांस्य युग के पहले की सभ्यता नहीं है। जो कुछ दूसरे आदिम धर्मों पर विश्वास करने वालों पर गुजरी, उसे हमने भी सहा। 1000 ईसवी से लगातार हमले हुए। पहले तुर्कों के कई कबीलों के हमले, फिर यूरोप के साम्राज्यवादियों के। उन विदेशी हमलावरों ने हजारों मंदिर ध्वस्त किए और वहीं पर मस्जिदें या चर्च बनाए गए, कभी-कभी तो गिराए गए मंदिर के अवशेषों से ही। 

सीताराम गोयल ने अपनी किताब ‘हिंदू टेंपल्स: व्हाट हैपेंड टु देम’ में ऐसे कई उदाहरण दर्ज किए हैं। दसियों विश्वविद्यालयों को जलाकर राख कर दिया गया। कई सदियों में करोड़ों लोगों को कत्ल किया गया।  हमारे साथ जो हुआ वह कोई अलग बात नहीं थी। दुनिया में लगभग हर प्राचीन संस्कृति के साथ ऐसा ही हुआ। लेकिन खास बात यह है कि हमने अपना अस्तित्व बनाए रखा। कैसे और क्यों? इसका एक प्रमुख कारण यह है कि हमारे पूर्वजों ने आत्मसमर्पण नहीं किया। मुझे याद आ रही है बैरन मैकाले की एक शानदार पंक्ति। वही मैकाले जिनका नाम सुनकर भारत में कुछ लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। उन्होंने लिखा था, ‘अपने पूर्वजों की अस्थियों और अपने देवताओं के मंदिरों के लिए मर-मिटने से बेहतर और क्या तरीका हो सकता है जान देने का!’ हमारे पूर्वजों ने यही किया। पुनर्निर्माण का जिम्मा हमारा है लेकिन हमें याद रखना होगा कि पुनर्निर्माण करते हुए हमें अपने पूर्वजों का या उनकी जीवन शैली का अपमान नहीं करना है।  

सनातन, शाश्वत, एकजुट हमें धर्म का पालन करना होगा। जो हमारी सभ्यता के साथ हुआ, वह हमें सच-सच कहना होगा, लेकिन बिना नफरत के। हमें समझना होगा कि आधुनिक दौर के पहले के यूरोपीय लोगों, तुर्कों और दूसरे विदेशी हमलावरों ने जो किया, उससे आज के भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों का कोई लेना-देना नहीं है। हमें एकजुट होकर, एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना के साथ अपने मंदिरों और विहारों को दोबारा बनाना होगा। उनको हमें केवल पूजास्थलों के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान और सामाजिक समरसता के केंद्र के रूप में विकसित करना चाहिए, जैसे वे प्राचीन काल में थे।

 यह पुनर्निर्माण एक पूरी सभ्यता से जुड़ी जिम्मेदारी है। अपने पूर्वजों और आने वाली पीढ़ियों के प्रति यह दायित्व हमें निभाना है। ये दुनिया को हमारा संदेश है कि हम नष्ट नहीं होंगे, हम सनतान हैं, हम शाश्वत हैं और सबसे अहम बात यह कि हम एकजुट हैं। हम सभी 130 करोड़ लोग। जय श्रीराम। जय मां भारती।  अमीश त्रिपाठी (साभार- NBT)

प्रवासी श्रमिकों को वापस भेजिए

 मूल राज्यों को नेट आधारित रोजगार उत्पन्न करने के लिए प्रयास करने चाहिए। जैसे हर जिले में विदेशी भाषाओं को पढ़ाने की संस्था बनाई जा सकती है जिसके आधार पर हमारे युवा एक विदेशी भाषा से दूसरी विदेशी भाषा में अनुवाद करके अपनी जीविका चला सकें। जैसे दरभंगा का युवक जर्मन से जापानी में ट्रांसलेशन कर सके। इन कदमों को उठाने से वापस आये श्रमिकों को अपने मूल राज्य में समाहित करके भी लाभ अर्जित किया जा सकता है।

 वर्तमान में श्रमिकों का पलायन एक देश से दूसरे देश को और एक राज्य से दूसरे राज्य को भारी संख्या में हो रहा है। एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र को श्रम का पलायन दो कारणों से होता है। पहला कारण भौगोलिक है। जैसे बिहार में कृषि बहुत आराम से हो जाती थी इसलिए वहां के लोगों ने औद्योगीकरण के लिए विशेष प्रयास नहीं किया। दूसरी तरफ पंजाब में भाखड़ा बांध के कारण सिंचाई का विस्तार हुआ और वहां श्रम की मांग बढ़ी। इस प्रकार बिहार के आरामदेह भूगोल और भाखड़ा के सिंचाई के भूगोल के कारण बिहार से पंजाब को श्रम का पलायन हुआ। 

पलायन का दूसरा कारण शासन की गुणवत्ता है। आज उत्तर प्रदेश के श्रमिक सूरत को पलायन कर रहे हैं और उत्तर प्रदेश के उद्यमी भी सूरत को पलायन कर रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तर प्रदेश का उद्यमी उत्तर प्रदेश के श्रमिक को सूरत में रोजगार दे रहा है। वहीं उत्तर प्रदेश का उद्यमी उत्तर प्रदेश में उसी श्रमिक को रोजगार देने को स्वीकार नहीं करता है। आज के युग में माल की ढुलाई आसान है  इसलिए कपड़े जैसे उद्योग को उतनी ही आसानी से सूरत में चलाया जा सकता है जितना कि उत्तर प्रदेश में। किसी समय उत्तर प्रदेश में टांडा और बनारस में विशाल कपड़ा उद्योग था।

 लेकिन उत्तर प्रदेश के ये कपड़ा उद्यमी आज टांडा में उद्योग चलाने के स्थान पर सूरत को स्वयं पलायन कर रहे हैं। कारण यह कि गुजरात की तुलना में उत्तर प्रदेश में शासन की गुणवत्ता न्यून है। यहां पर अधिकारियों का रुख उद्यमी से अधिकाधिक वसूलने का होता है। नेताओं और दबंगों द्वारा वसूली की जाती है। यहां उद्योग को आगे बढ़ाने में व्यवधान आते हैं इसलिए उत्तर प्रदेश का उद्यमी उत्तर प्रदेश से पलायन कर रहा है। 

कोविड ने बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के तमाम श्रमिकों को मेजबान राज्यों से अपने मूल राज्य को वापस आने के लिए मजबूर कर दिया है। इनके लिए  हमारे सामने दो विकल्प हैं। एक यह कि हम इन श्रमिकों को पुन: उन मेजबान राज्यों में भेजने की व्यवस्था करें जहां ये पहले कार्यरत थे। दूसरा यह कि हम इनके लिए मनरेगा, खाद्य सब्सिडी, बेरोजगारी भत्ता इत्यादि जन कल्याणकारी कार्यक्रमों को लागू करें जिससे ये अपने मूल राज्य में ही अपना जीवनयापन कर सकें। 

मूल राज्य में इनको समाहित करने से तीन समस्या पैदा होती है। पहली समस्या यह कि ये प्रवासी श्रमिक सूरत में कपड़ा बुनाई के लूम को चलाने एवं मरम्मत इत्यादि को करने अथवा हीरों को तराशने की दक्षता हासिल कर चुके हैं। वे वहां 1000-1500 रुपये तक दैनिक वेतन पाते थे। और इससे भी ज्यादा वे देश की आय में जोड़ते थे मान लें 2500 रुपए। जब हम इन्हें वापस अपने गांव ले आते हैं तो यहां पर मनरेगा के अंतर्गत इन्हें मिट्टी उठाने का कार्य करना होगा जिस कार्य का देश की आय में योगदान कुल 300 रुपया प्रतिदिन और इन्हें वेतन मात्र 200 रुपये प्रति दिन मिलेगा। इसलिए इनको घरेलू राज्य में समाहित करने से देश के आर्थिक विकास का ह्रास होगा। 

जो व्यक्ति देश की आय में एक दिन में 2500 रुपये जोड़ सकता था वह अब केवल 300 रुपये ही जोड़ेगा। अपने मूल राज्य में श्रमिक को समाहित करने में दूसरी समस्या यह है कि कृषि में श्रम को समाहित करने की सीमा है। आज विकसित देशों में कुल जनसंख्या का 1 फीसदी से भी कम कृषि के क्षेत्र में कार्यरत है। अपने देश में स्वतंत्रता के समय लगभग 50 प्रतिशत जनता कृषि पर आधारित थी जो आज घट कर 18 प्रतिशत हो गई है। 

आर्थिक विकास के साथ कृषि का महत्व घटता जाता है। ऐसे में इन वापस आये श्रमिकों को कृषि में समाहित करना इन्हें उस क्षेत्र में प्रवेश कराना होगा जहां पहले ही आय न्यून है जैसे इन्हें गड्ढे में धकेला जा रहा हो। इनके प्रवेश करने से कृषि में श्रम की उपलब्धि बढ़ेगी, कृषि श्रमिक के वेतन घटेंगे, इन वापस आये श्रमिकों कि आय और घटेगी। तीसरी समस्या यह है कि मूल राज्यों को इन्हें मनरेगा इत्यादि में रोजगार देने के लिए सरकारी खर्च बढ़ाने होंगे। ये राज्य जो रकम सड़क अथवा अस्पताल बनाने के लिए उपयोग कर सकते थे उसका उपयोग ये इन श्रमिकों को जीवनयापन करने के लिए देने में करेंगे। चौथा बड़ा नुकसान यह है कि मेजबान देश में श्रमिक की उपलब्धता कम हो जाने के कारण वहां मशीनों का उपयोग बढ़ेगा। जैसे पंजाब में हार्वेस्टर का और सूरत में आटोमेटिक मशीनों का उपयोग बढ़ेगा और इन राज्यों में श्रम की मांग स्थायी रूप से कम हो जाएगी। 

गुजरात और पंजाब में श्रम की मांग कम होने का अर्थ होगा कि सम्पूर्ण देश में श्रम की मांग कम होगी और श्रम का अस्तित्व कमजोर होगा। इन तमाम कारणों से सरकार को चाहिए कि वापस आये श्रमिकों को शीघ्रातिशीघ्र उनके मेजबान राज्यों में पहुंचाने की जुगत करे। इस दिशा में सरकार को निम्न कदमों पर विचार करना चाहिए। पहला यह कि कानून बनाकर सभी प्रवासी श्रमिकों को आश्वासन देना चाहिए कि यदि कभी दुबारा लॉकडाउन जैसी परिस्थिति बनी तो उन्हें मेजबान देश में न्यूनतम जीविका उपलब्ध करा दी जाएगी। 

दूसरा कार्य यह कि वापस आये श्रमिकों को मूल राज्य में ही उच्च कोटि के रोजगार उत्पन्न कराने के प्रयास करने होंगे। इसके लिए सुशासन पर ध्यान देना होगा कि उत्तर प्रदेश का  उद्यमी उत्तर प्रदेश में ही उद्योग लगाये और यहीं श्रमिकों के लिए रोजगार बनाये। तीसरा यह कि उच्च कीमत के कृषि उत्पाद जैसे गुलाब अथवा ग्लाइडोलस के फूलों के उत्पादन के लिए मिशन बनाना चाहिए। हर डिवीजन में एक संस्था को मिशन मोड पर कार्य देना चाहिए कि उस क्षेत्र के लिए उपयोगी कीमती कृषि उत्पादों को बढ़ाये जिससे कि कृषि में ही इन लोगों को उच्च वेतन मिल सके। 

और यह कि मूल राज्यों को नेट आधारित रोजगार उत्पन्न करने के लिए प्रयास करने चाहिए। जैसे हर जिले में विदेशी भाषाओं को पढ़ाने की संस्था बनाई जा सकती है जिसके आधार पर हमारे युवा एक विदेशी भाषा से दूसरी विदेशी भाषा में अनुवाद करके अपनी जीविका चला सकें। जैसे दरभंगा का युवक जर्मन से जापानी में ट्रांसलेशन कर सके। इन कदमों को उठाने से वापस आये श्रमिकों को अपने मूल राज्य में समाहित करके भी लाभ अर्जित किया जा सकता है।

डॉ. भरत झुनझुनवाला (साभार- देशबंधु)

सोमवार, 17 अगस्त 2020

आत्मदान- नरेन्द्र कोहली

 "राजवर्धन का सारा संस्कार क्षत्रियों की भांति हुआ था किन्तु उनमें क्षत्रिय दर्प कभी नहीं जागा।... उनका शरीर सक्षम ठौर शास्त्र-विद्या भी उन्होंने सीखी थी, पर युद्ध...। युद्ध में उनकी तनिक भी रुचि नहीं थी। युद्ध किसलिए? कोई क्यों किसी को अपना शत्रु मानता है? क्यों वह युद्धक्षेत्र में शवों के ढेर लगा देता है? हत्या में भी कोई सुख होता है क्या? किसी जीव का वध करने में क्या उपलब्धि है? बहता हुआ रक्त देखकर राज्यवर्धन को कभी प्रसन्नता नहीं हुई।   

तब भी उन्होंने अत्यंत उदासीन भाव से पिता को निहारा था, "पिताजी! यद्यपि आपने मेरे नाम राज्यवर्द्धन रखा है किन्तु मेरी न तो राज्य में कोई रुचि है, न राज्य के वर्धन में। युद्ध किसलिए पिताजी? अपने ही जैसे मनुष्य के संहार के लिए? क्षत्रिय का शरीर कवच धारण करने के योग्य क्या केवल इसलिए होता है कि वह युद्ध के नाम पर हत्याएं करे? जीवित मनुष्य को शवों अथवा पंगु, लुंज-पुंज पीड़ित शरीरों में बदल दे।...नहीं पिता! मनुष्य के जीवन का, उसकी क्षमताओं का लक्ष्य कुछ और होना चाहिए!" (आत्मदान- नरेन्द्र कोहली)



#साहित्य_की_सोहबत  #पढ़ेंगे_तो_सीखेंगे

#हिंदीसाहित्य  #साहित्य  #कृष्णधरशर्मा

Samajkibaat समाज की बात


शनिवार, 15 अगस्त 2020

कुत्तों का रोना

कुत्तों को आज फिर खाना नसीब नहीं हुआ
रात से ही शुरू हुई बारिश देर शाम तक चली
बारिश जरा थमी तो लोग अंगड़ाई लेते हुए
जकड़न मिटाने अपने-अपने घरों से निकले
मगर बारिश ने उन्हें उससे भी कम वक्त दिया
जितना वक्त कर्फ्यू में मिल पाता है लोगों को
जरूरी सामानों की खरीददारी करने के लिए
भुनभुनाते हुए लोग फिर अपने घरों में घुस गए
कुत्तों को जो आशा मिली थी खाना मिलने की
बारिश शुरू होते ही ख़त्म सी हो गई
सुबह के भूखे कुत्तों से जब बर्दाश्त नहीं हुआ
तो फूट पड़ी उनकी रुलाई रोने लगे एक सुर में
घर की महिलाओं ने कहा अपने घर के पुरुषों से
कुत्तों का रोना बड़ा अपशकुन माना जाता है
जाओ उन्हें भगाओ अपने घर के सामने से जरा
पुरुषों ने भी उठाई अपनी छतरी और निकले बाहर
खदेड़ दिए गए कुत्ते अपने घरों के सामने से
भूख से रोते कुत्ते जहाँ भी गए वहीँ से भगाए गए
सब डर रहे थे कुत्तों के रोने से अपशकुन से
किसी को भी गलती से यह ख्याल नहीं आया
कि यह रोते हुए कुत्ते कहीं भूख से तो नहीं रो रहे...

                 (कृष्ण धर शर्मा, 14.08.2020)

ऐ जिंदगी जाने दे मुझे अनजानी राहों में

जिंदगी की बेतरह, बेवजह
भागम-भाग से थककर
जब उसने, मौत को
अपने गले लगाना चाहा
जिंदगी हर बार उसका
रास्ता रोककर खड़ी हो गई
तुम मुझे अपनी कैद से
आजाद क्यों नहीं होने देती!
जब-जब उसने पूछा सवाल
जिंदगी ने दिया उसे हरबार
वही रटा-रटाया जवाब
इससे पहले कि मौत को
तू अपने गले से लगा
अरे! जाने से पहले मेरा
कर्ज तो चुकाता जा...

              (कृष्ण धर शर्मा, 11.08.2020)

प्रकृति की गोद में

पहाड़ों पर उतरे हैं बादल
पूछने या बताने!
एक-दूसरे का हाल-चाल
या शायद दोनों ही!
मैं भी तो आखिर भाग ही आया
घबराकर कांक्रीट के जंगलों से
प्रकृति की गोद में
नया ठिकाना है अब मेरा
पेड़ों, पहाड़ों और बादलों के बीच
जहाँ पर महसूस कर पाता हूँ
मैं खुद को और जीवन को भी

             (कृष्ण धर शर्मा, 12.08.2015)

व्यवस्था के खिलाफ

मारा जायेगा हर वह आदमी
जो उठाएगा सवाल
तुम्हारी इस भेदभावपूर्ण
व्यवस्था के खिलाफ
दबा दी जाएगी हर वह आवाज
जो उठेगी तुम्हारे खिलाफ
काट दी जाएगी हर वह नस
जिसमें बहेगा लहू तुम्हारी
अतिवादी सोच के खिलाफ
बंद कर दिए जायेंगे हर वह रास्ते
जो जाते हों मानवता के मंदिर की ओर
मजबूर कर दिया जायेगा सबको
आपस में नफ़रत करने पर
एक-दूसरे को मारने-काटने पर
फिर सबकुछ वैसा ही होने लगेगा
जैसा कि तुम कल्पना करते थे
मगर क्या तुम जी पाओगे चैन से!
जबकि न होगा तुम्हारा कोई विरोधी
अगर तुम गड्ढे में भी गिरने वाले होगे
तो कोई भी नहीं करेगा तुम्हें सचेत
क्योंकि सब तो तुमसे डरे हुए ही होंगे!

      (कृष्ण धर शर्मा, 19.01.2020)

अवांछित

तुम बनाओ अच्छे-अच्छे मकान
बड़ी-बड़ी साफ़-सुथरी कालोनियां
उनमें बनें ख़ूबसूरत बाग़-बागीचे
जिसमें सुबह की सैर पर आ सकें
संभ्रांत और आभिजात्य लोग
मगर यह भी ध्यान रखना कि,
उन कालोनियों, बाग़-बागीचों में
घुसने न पायें गंदे कपडे पहने हुए
भूखे-नंगे और फटेहाल गरीब लोग
नहीं तो तुम्हारी आभिजात्यता को
पहुँच सकती है चोट, हो सकती है आहत
तुम बनाओ अच्छी-अच्छी चमचमाती
और बेहद ही साफ-सुथरी मखमली सड़कें
जिस पर चल सको तुम और तुम्हारे जैसे
सभ्य, संभ्रांत और आभिजात्य लोग
हाँ मगर यह भी ध्यान रखना कि,
उसमें घुसने न पायें कोई भी ठेलेवाले
फेरीवाले, सब्जीवाले या रिक्शेवाले
नहीं तो पड़ सकती है बाधा, रूकावट
तुम्हारे बनाये नियमों, कानूनों में
तुम्हें हो सकती है एलर्जी
ऐसे लोगों को देखकर
जो हैं तुम्हारी बनाई हुई
व्यवस्था में अनचाहे अवांछित

       (कृष्ण धर शर्मा, 04.01.2020)